कर्ज की समस्या

Dr.R.B.Dhawan:-

कर्ज की समस्या और ज्योतिषीय कारण:-

         जन्म होते ही हम अपने प्रारब्ध के चक्र से बंधे होते हैं, और जन्मकुंडली हमारे इसी प्रारब्ध को सूचित करती है। हमारे जीवन में सभी घटनाएं नवग्रह द्वारा ही सूचित होती हैं। आज के समय में जहाँ आर्थिक असंतुलन हमारी चिंता का एक मुख्य कारण है, वहीँ एक दूसरी स्थिति जिसके कारण अधिकांश लोग चिंतित और परेशान रहते हैं वह है “कर्ज की स्थिति” धन चाहे व्यक्तिगत लिया गया हो, या सरकारी लोन के रूप में, ये दोनों ही स्थितियां व्यक्ति के ऊपर एक बोझ के समान बनी रहती हैं, कई बार ना चाहते हुये भी परिस्थितिवश व्यक्ति को कर्ज रुपी बोझ का सामना करना ही पड़ता है, वैसे तो आज के समय में अपने कार्यो की पूर्ती के लिए अधिकांश लोग कर्ज लेते हैं, परन्तु जब जीवन पर्यन्त बनी रहे या बार-बार यह स्थिति सामने आये तो वास्तव में यह भी हमारी कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोगों के द्वारा ही सूचित होती है।कुंडली में “छटा भाव” कर्ज का भाव माना गया है, अर्थात कुंडली का छटा भाव ही व्यक्ति के जीवन में कर्ज की स्थिति को सूचित करता है, जब कुंडली के :-

छटे भाव में कोई पाप योग बना हो, या षष्टेश ग्रह बहुत पीड़ित हो तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है जैसे – 

यदि छटे भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में भावस्थ हो, छठ्ठेे भाव में राहु-चन्द्रमाँ की युति हो, राहु-सूर्य के साथ होने से ग्रहण योग बन रहा हो, छठ्ठेे भाव में राहु मंगल का योग हो, छठ्ठे भाव में गुरु-चाण्डाल योग बना हो, शनि-मंगल या केतु-मंगल की युति छठ्ठे भाव में हो तो …ऐसे पाप या क्रूर योग जब कुंडली के छटे भाव में बनते हैं तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या बहुत परेशान करती है और री-पेमेंट में बहुत समस्यायें आती हैं। 

छठ्ठे भाव का स्वामी ग्रह भी जब नीच राशि में हो अष्टम भाव में हो या बहुत पीड़ित हो तो कर्ज की समस्या होती है । इसके अलावा “मंगल” को कर्ज का नैसर्गिक नियंत्रक ग्रह माना गया है ! अतः यहाँ मंगल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है यदि कुंडली में … मंगल अपनी नीच राशि(कर्क) में हो आठवें भाव में बैठा हो, या …अन्य प्रकार से अति पीड़ित हो तो भी कर्ज की समस्या बड़ा रूप ले लेती है”   

विशेष: – यदि छठ्ठे भाव में बने पाप योग पर *बलि बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो कर्ज का रीपेमेंट संघर्ष के बाद हो जाता है या व्यक्ति को कर्ज की समस्या का समाधान मिल जाता है परन्तु बृहस्पति की शुभ दृष्टि के आभाव में समस्या बनी रहती है।

छठ्ठे भाव में पाप योग जितने अधिक होंगे उतनी समस्या अधिक होगी, अतः कुंडली का छठा भाव पीड़ित होने पर लोन आदि लेने में भी बहुत सतर्कता बरतनी चाहिये।

बहुत बार व्यक्ति की कुंडली अच्छी होने पर भी व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है, जिसका कारण उस समय कुंडली में चल रही अकारक ग्रहों की दशाएं या गोचर ग्रहों का प्रभाव होता है, जिससे अस्थाई रूप से व्यक्ति उस विशेष समय काल के लिए कर्ज के बोझ से घिर जाता है।

उदाहरणार्थ : अकारक षष्टेश और द्वादशेश की दशा व्यक्ति को कर्ज की समस्या देती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में अलग-अलग ग्रह-स्थिति और अलग-अलग दशाओं के कारण व्यक्तिगत रूप से तो कुण्डली विश्लेषण के बाद ही किसी व्यक्ति के लिए चल रही कर्ज की समस्या के लिए सटीक ज्योतिषीय उपाय निश्चित किये जा सकते हैं। अतः यहाँ हम कर्जमुक्ति के लिए ऐसे कुछ मुख्य उपाय बता रहे हैं, जिन्हें कोई भी व्यक्ति कर सकता है:-

उपाय :- 
1. मंगल यन्त्र को घर के मंदिर में लाल वस्त्र पर स्थापित करें, और प्रतिदिन इस मंत्र का एक माला जाप करें :- ॐ क्राम क्रीम क्रोम सः भौमाय नमः।

2. प्रति दिन *ऋणमोचन मंगल स्तोत्र* का पाठ करें। 

3. *हनुमान चालीसा* का पाठ करें।

अष्ट सिद्धियां

Dr.R.B.Dhawan

पुराणों में बार-बार अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का उल्लेख मिलता है, विशेषकर हनुमान चालीसा में सीताजी द्वारा हनुमान जी को दिए वरदान में इनके दिए जाने का विवरण है। आईये जानें कि क्या हैं ये आठ सिद्धियां? –

हर मनुष्य में बीजरूप (अति सूक्षम) कुछ विशेष नैसर्गिक गुण होते हैं। इन्हीं में ही धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य भी हैं। ऐश्वर्य का मतलब धन संपदा से नहीं है, वह श्री के अंतर्गत आती है। ये ऐश्वर्य अणिमादिक अष्ट सिद्धिंयाँ ही हैं। इन अष्ट सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सदाचार युक्त जीवन व्यतीत करना पडता है, और कहीं न कहीं वैराग्य भाव का भी इसमें योगदान है। वैराग्य detachment है। जितने भी अलौकिक शक्तियों से संपन्न देवी-देवता हुए हैं, उन्होंने सभी चमत्कारपूर्ण कार्य अष्ट सिद्धियों के बल पर ही किसे थे।

आठ प्रमुख सिद्धियाँ हैं, सिद्धि का अर्थ है पूर्णता की प्राप्ति होना व सफलता की अनुभूति मिलना, सिद्धि को प्राप्त करने का मार्ग एक कठिन मार्ग है, ओर जो इन सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है, वह जीवन की पूर्णता को पा लेता है। असामान्य कौशल या क्षमता अर्जित करने को ही ‘सिद्धि’ कहा गया है। चमत्कारिक साधनों द्वारा ‘अलौकिक शक्तियों को पाना जैसे – दिव्यदृष्टि, अपना आकार छोटा कर लेना, घटनाओं की स्मृति प्राप्त कर लेना इत्यादि. ‘सिद्धि’ यही होती है। शास्त्रों में अनेक सिद्धियों की चर्चा की गई है, और इन सिद्धियों को यदि नियमित और अनुशासनबद्ध रहकर किया जाए तो, अनेक प्रकार की परा और अपरा सिद्धियाँ चिन्हित कि जा सकती है। यह सिद्धियाँ भी दो प्रकार की होती हैं, एक परा और दूसरी अपरा, यह सिद्धियां इंद्रियों के नियंत्रण और व्यापकता को दर्शाती हैं। सब प्रकार की उत्तम, मध्यम और अधम सिद्धियाँ अपरा सिद्धियां कहलाती है। मुख्य सिद्धियाँ आठ प्रकार की कही गई हैं, इन सिद्धियों को पाने के उपरांत साधक के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। सिद्धियां क्या हैं? व इनसे क्या हो सकता है ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर मार्कंडेय पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में प्राप्त होता है जो इस प्रकार है:- 

अणिमा लघिमा गरिमा प्राप्ति: प्राकाम्यंमहिमा तथा।

ईशित्वं च वशित्वंच  सर्वकामावशायिता:।।

यह आठ मुख्य सिद्धियाँ इस प्रकार हैं:- अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता और वंशिका।

1. अणिमा सिद्धि –

अपने शरीर को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता ही अणिमा सिद्धि है, यह वह सिद्धि है, जिससे युक्त हो कर व्यक्ति सूक्ष्म रूप धर कर एक प्रकार से दूसरों के लिए अदृश्य हो जाता है. इसके द्वारा आकार में लघु होकर एक अणु रुप में परिवर्तित हो सकता है. अणु एवं परमाणुओं की शक्ति से सम्पन्न हो साधक वीर व बलवान हो जाता है. अणिमा की सिद्धि से सम्पन्न योगी अपनी शक्ति द्वारा अपार बल प्राप्त कर लेता है ।

2. महिमा सिद्धि –

अपने को बड़ा एवं विशाल बना लेने की क्षमता को महिमा सिद्धि कहा जाता है, यह शरीर के आकार को विस्तार देती है, विशालकाय स्वरुप को जन्म देने में सहायक है, इस सिद्धि से सम्पन्न होकर साधक प्रकृति को विस्तारित करने में भी सक्षम होता है, जिस प्रकार केवल ईश्वर ही अपनी इसी सिद्धि से ब्रह्माण्ड का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार साधक भी इस सिद्धि को पाकर वैसी शक्ति पाता है।

3. गरिमा सिद्धि –

इस सिद्धि से मनुष्य अपने शरीर को जितना चाहे, उतना भारी बना सकता है, यह सिद्धि साधक को अनुभव कराती है कि उसका वजन या भार उसके अनुसार बहुत अधिक बढ़ सकता है, जिसके द्वारा वह किसी के हटाए या हिलाए जाने पर भी नहीं हिल सकता ।

4. लघिमा सिद्धि –

स्वयं को हल्का बना लेने की क्षमता ही लघिमा सिद्धि होती है, लघिमा सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत हल्का अनुभव करता है, इस दिव्य महासिद्धि के प्रभाव से योगी सुदूर अनन्त तक फैले हुए ब्रह्माण्ड के किसी भी पदार्थ को अपने पास बुलाकर उस को लघु करके अपने हिसाब से उसमें परिवर्तन कर सकता है ।

5. प्राप्ति सिद्धि –

कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता इस सिद्धि के बल पर प्राप्त होती है, साधक कुछ भी पाना चाहें उसे प्राप्त कर सकता है, इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक जिस भी किसी वस्तु की इच्छा करता है, वह असंभव होने पर भी उसे प्राप्त हो जाती है, जैसे रेगिस्तान में प्यासे को पानी प्राप्त हो सकता है या अमृत की चाह को भी पूरा कर पाने में वह सक्षम हो जाता है, केवल इसी सिद्धि द्वारा ही वह असंभव को संभव कर सकता है।

6. प्राकाम्य सिद्धि –

कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता प्राकाम्य सिद्धि की उपलब्धि है, इसके सिद्ध हो जाने पर मन  के विचार आपके अनुरुप परिवर्तित होने लगते हैं, इस सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत शक्तिशाली अनुभव करता है, इस सिद्धि को पाने के बाद मनुष्य जिस वस्तु कि इच्छा करता है, उसे पाने में सफल होता है, व्यक्ति चाहे तो आसमान में उड़ भी सकता है, और यदि चाहे तो पानी पर चल भी सकता है।

7. ईशिता सिद्धि –

हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना ही इस सिद्धि की पूर्णता है, इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक समस्त प्रभुत्व और अधिकार प्राप्त करने में सफल हो जाता है, सिद्धि प्राप्त होने पर अपने आदेश के अनुसार किसी पर भी अधिकार जमाया जा सकता है, वह चाहे राज्यों से लेकर साम्राज्य ही क्यों न हो, इस सिद्धि को पाने पर साधक ईश रुप में परिवर्तित हो जाता है।

8. वशिता सिद्धि –

जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता को ही वशिता या वशिकरण सिद्धि कहा जाता है, इस सिद्धि के द्वारा जड़, चेतन, जीव-जन्तु, पदार्थ-प्रकृति, सभी को स्वयं के वश में किया जा सकता है।

इन अष्ट सिद्धियों को जो प्राप्त कर लेता है, उसे इस मृत्युलोक में ईश्वर मान लिया जाता है, बहुत से योगियों ने इन्हें प्राप्त किया होगा। लेकिन उपलब्ध ग्रंथों, कथाओं, रामायण, महाभारत के अनुसार केवल दो शरीर धारिओं अर्थात जिसने धरती पर जन्म लिया, उन्होंने इनका खुल के प्रयोग किया। कौन हैं ये दोनों? हनुमान और श्रीकृष्ण। इसीलिए इनका यश और कीर्ति अमर व् अक्शुण है। श्रीकृष्ण को साक्षात् ईश्वर माना गया है व जरंगबली की महिमा अपरम्पार है।

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दीपावली पूजन

श्री महालक्ष्मी पूजन
दीपावली पर महालक्ष्मी पूजन की परम्परा रही है। पूजन के समय सावधानी रखने योग्य नियमों का पालन करने पर शुभ कामनाएं शीध्र फलदायक होती हैं। यह विषय हालांकि बहुत बड़ा है, लेकिन आप का भविष्य के गुणी पाठकों को पूजन की सरलतम विधि से अवगत कराया जा रहा है। सर्वप्रथम गणेश जी महाराज का पूजन अति आवश्यक है। फिर सूर्य एंव नवग्रहों का पूजन करना चाहिए। महालक्ष्मी पूजन से पहले भगवान विष्णु की पूजा भी करनी चाहिए। जिन पुष्पों में गंध नहीं हो, वह नहीं चढ़ाये जाने चाहिए। पहले दिन लाकर रखे गये बासी, अपने आप टूट कर गिरे तथा जल में सुरक्षित रखे गये फूल भी नहीं चढ़ाने चाहिए। पूजा में पत्र, पुष्प एवं फल जो भी चढ़ाया जाये, उसका मुख नीचे या पूजा करने वाले के सामने नहीं हो, तुलसी के पत्ते साबुत ही लेने चाहिये, भगवान विष्णु को चावल, गणेश जी को तुलसी, सूर्य को विल्व पत्र अर्पित नहीं करना चाहिये। जो नागर बेल का पान पूजा के काम में लिया जाये, वह सड़ा गला नहीं हो। महालक्ष्मी पूजन के दिन जो तुलसी काम में लाई जाती है, वह अमावस्या, रविवार और संध्या के समय नहीं तोड़नी चाहिये। लक्ष्मी पूजन में पाटली, शंख पुष्पि, लाल गुलाबी व पीले रंग के गुलाब के फूल, विल्वपत्र तथा विल्वफल अर्पित करना चाहिये। इसी तरह महालक्ष्मी को लाल वस्त्र समर्पित करना चाहिए। एक और ध्यान देने वाली बात यह है कि पूजा स्थल ईशान कोण में हो अर्थात् देवी देवताओं के मुंह पश्चिम की ओर तथा पूजा करने वाले का पूर्व की ओर रहे।
सर्वप्रथम काष्ठ के गट्टे पर यथा संभव पीला वस्त्र बिछाकर एक सुपारी पर मोली लपेटकर चावलों की ढेरी पर गणेशजी स्थापित करें। फिर गणेशजी का ध्यान करें और प्रार्थना करें कि हे प्रभो, आप विघ्नों का नाश करने वाले तथा सफल सिद्धि प्रदान करने वाले हैं। श्री गणेश जी महाराज आप पधारिये, मैं महालक्ष्मी की पूजा करने जा रहा हूं, इसमें किसी प्रकार का विघ्न न हो, इसमें आप मेरी सहायता व रक्षा करें। इस विनती के बाद श्री गणेश जी के सामने चार बार जल छोड़कर पाद्य, अर्घ्य, आचमन और स्नान के लिए निवेदन करें। फिर पंचामृत का छींटा देकर पंचामृत का स्नान निवेदन करें। फिर जल का छींटा देकर शुद्ध स्नान का निवेदन करें। इसके बाद वस्त्र हो तो वस्त्र और नहीं हो तो मोली का तीन तार वस्त्र के रूप में अर्पण करें। फिर चंदन, रोली, सिंदूर, पुष्प, दुर्वा के अंकुर, विल्वपत्र चढ़ायें। इसके बाद यज्ञोपवीत, जेवर (कोई गहना) हो तो वह, अगर नहीं हो तो ताजे पुष्पों से बनी माला, अक्षत, सुगंध तेल व इत्र चढ़ायें। धूप और अरगबत्ती जलाकर अर्पण करें। गाय के शुद्ध घी में शुद्ध रूई की बत्ती भिगोकर प्रज्वलित कर समर्पित करें। गणेशजी को आमतौर पर लड्डू या गुड़ ही चढ़ता है। इसके साथ पेडा़, बताशा या मिश्री भी चढ़ाये जा सकते हैं। भोग अर्पित करने के बाद आचमन के लिए चार बार जल छोड़ा जाये। यह जल तांबा के छोटे कलश में हो तथा छोड़ने के लिए ताम्र चम्मच न मिलने पर नागर पान का उपयोग किया जा सकता है। ऋतु के अनुसार जो भी फल मिल सके वह भी अर्पित करना चाहिये, इसके बाद फिर चार बार आचमन करायें। अब सुपारी, पान, लोंग व इलायची अर्पण करें दक्षिणा भेंट आदि श्री गणेशजी की सेवा में अर्पित करें। गणेशजी की पूजा प्राथमिक तौर पर ही नहीं सम्पन्न हो जाती है, लेकिन महालक्ष्मी पूजन के उपरान्त आखिर में क्षमा प्रार्थना की जाती है और कहा जाता है कि मेरे द्वारा इस पूजा में कोई कमी रही हो तो उसके लिए क्षमा करें। मुझसे जैसी भी पूजा बनी, उसे मेरे पर अनुग्रह करके स्वीकार करें। श्री गणेश जी के बाद सूर्य समेत नवग्रहों की पूजा होती है। इसके लिए काष्ठ के पट्टे पर ही सफेद, पीला या लाल कपड़ा बिछाकर चावल की नौ ढेरियां बनायें। नवग्रह की सूर्य समेत अगर तस्वीर मिल जाये तो उसे भी काम में लिया जा सकता है। इन ढेरियों को नवग्रह मानकर एक-एक ग्रह की गणेश जी की पूजा विधि के अनुसार ही पूजन करें।
इसके बाद बारी आती है रक्षा विधान की। बायें हाथ में पीली सरसों अथवा चावल और तीन तार की मोली लेकर दाहिने हाथ से ढंककर नमस्कार प्रार्थना करें। प्रार्थना में सर्वप्रथम ओम, गणों के अधिकारी, पितामह ब्रह्माजी भगवान विष्णु, शिव लक्ष्मीजी, भगवती, जगदम्बा, सरस्वती मां, स्थान के अधिपति देवता, समस्त ग्रहों के अधिपति सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, शनि, राहू तथा केतु को इस पूजा यज्ञ के आरंभ में विशेष रूप से नमस्कार किया जाये। इसके बाद रक्षा सूत्र जो कि तीन तार वाली मोली हो, उसे हाथ में रख लें और पीली सरसों या चावल के दो-दो दानें दसों दिशाओं में छोड़ते हुए कहें कि इन दसों दिशाओं की ओर से कोई विध्न होने वाला हो तो उससे हमारे इस पूजन कार्य की भगवान जनार्दन वासुदेव रक्षा करें। साथ ही इस पूजा कर्म को निर्विघ्न पूर्ण कराने का अनुग्रह करें। इसके बाद यह रक्षा सूत्र श्री गणेशजी के सामने रख देवें। अब किसी पूजनीय व्यक्ति अथवा घर के बुजुर्ग से आशीर्वाद ग्रहण करें। अब भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी दोनों का ध्यान करें तथा अग्रलिखित श्लोक बोलें-
शांताकारम् भुजंग शयनम्, पदम्नाभम् सुरेशम्।
विशवाधारम् गगन सदृश्यं, मेघ वर्णम् शुभांगं।
लक्ष्मी कांतम् कमल नयनं, योगिर्मिध्यान गम्यं।
वंदे विष्णु भवं भय हरम्, सर्व लौकेकनाथकम्।।
इसके बाद महालक्ष्मी का ध्यान करें और उन्हें प्रणाम करें। सबसे पहले महालक्ष्मी का आव्हान करें और आग्रह करें कि मेरी पूजन एवं स्तुति स्वीकार करने के लिए आप पधारें। काष्ठ के पट्टे पर लाल कपड़ा बिछाकर कहें कि हे मां महालक्ष्मी यह आसन अपर्ण करता हूं, आप इसे स्वीकार करें और इस पर विराजमान हों। यह कहकर महालक्ष्मी का चित्र विराजमान करें तथा उसके आगे पुष्प अर्पित करें।
अब पाद्य समर्पण करें। इसके लिए कहें कि मां महालक्ष्मी गंगाजल समान इस निर्मल जल को पैर धोने के लिए पाद्य रूप में ग्रहण करें। जल के कुछ छींटे महालक्ष्मी चित्र पर चरण कमलों की ओर अर्पित करें। इसके बाद अर्ध्य दिया जाता है। इसमें स्वच्छ जल, दूर्वा, पुष्प और चावल से युक्त जल महालक्ष्मी को अर्पित कर अर्ध्य के रूप में स्वीकार करने का आग्रह करें। अब कर्पूर मिश्रित जल से आचमन करायें और ग्रहण करने की विनती करें। इसके बाद आंवले का चूरा, मुलतानी मिट्टी को स्नान सामग्री के रूप में प्रस्तुत करें और स्वीकार करने का आग्रह करें अब साफ जल स्नान के लिए अर्पित करें और स्वीकृति की विनती करें। इसके बाद गाय का दूध स्नान के लिए अर्पित करें। इसी तरह गाय के दूध, दही स्नान के लिए अर्पित करें। फिर स्निग्धता प्रदान करने वाला घी स्नान के लिए अर्पित करें। अब शहद स्नान के लिए अर्पित करें फिर चीनी स्नान के लिए समर्पित करें। अब पंचामृत से स्नान करायें। उसके बाद फिर शुद्ध जल से स्नान करायें अर्थात् स्नान के लिए जल अर्पित करें।
स्नान के बाद वस्त्र एवं उपवस्त्र अर्पित करें। अब दही, घी और शहद को मिलाकर बनाया गया मधुपर्क समर्पित करें और वर दायिनी महालक्ष्मी से स्वीकार करने का आग्रह करें। अब अगरबत्ती और धूप जलाकर गंध समर्पित करें। इसके बाद कुम्कुम लगायें और कहें कि कामनियों को दिव्य एवं उत्तम कांति प्रदान करने वाला कुम्कुम अर्चना के रूप में आपको समर्पित है, स्वीकार करें। अब हो सके तो कोई आभूषण महालक्ष्मी को समर्पित करें, न हो पाए तो ताजा पुष्पों की माला अक्षत समेत समर्पित करें। इसके बाद सिंदूर, फिर काजल समर्पित करें। फिर सौभाग्य सूत्र प्रस्तुत करें। सौभाग्य सूत्र के मायने सवर्ण, मणि एवं रत्नों की माला से है। अब परिमल द्रव्य अर्पित करें। यह द्रव्य चंदन, अगर, कर्पूर, कुम्कुम, गोरोचन, कस्तुरी और केसर आदि सुगंधित द्रव्यों से बना होता है। न मिलने पर इत्र प्रस्तुत करें।
इसके बाद कुमकुम से रंगे अक्षत् समर्पित करें। अक्षत् के बाद पुष्प और पुष्प माला, फिर विल्वपत्र अर्पित करें। अब धूप जाग्रत करें और स्वीकार के लिए विनती करें। इसके बाद अंग पूजन होता है। इसके बाद अष्टसिद्धि को नमन किया जाता हैः –
ऊँ अणिम्नै नमः। ऊँ महिम्नै नमः। ऊँ गारिम्नै नमः। ऊँ लघिम्नै नमः। ऊँ प्राप्तयै नमः। ऊँ प्राप्तयै नमः। ऊँ इंषितार्य नमः। वाषित्तम नमः। इसके बाद अष्ट लक्ष्मी का नमन किया जाता है।
ऊँ आद्यलक्ष्म्यै नमः। ऊँ विद्या लक्ष्म्यै नमः। ऊँ सौभाग्य लक्ष्म्यै नमः। ऊँ अमृत लक्ष्म्यै नमः। ऊँ काम लक्ष्म्यै नमः। ऊँ सात्व लक्ष्म्यै नमः। ऊँ भोग लक्ष्म्यै नमः। ऊँ योग लक्ष्म्यै नमः।
इस नमन के बाद सबसे पहले गाय के दूध से बने घी में दीप जलाकर महालक्ष्मी को समर्पित करें और कहें-
कार्पास वर्त्ति संयुक्तं धृतयुक्तं मनोहरम्।
तमो नाश करं दीपं ग्रहण परमेश्वरी।
इसके बाद नेवैद्य अर्पित होगा, इसके साथ कहना होगा-
¬ नैवेद्य ग्रह्यतां देव्यो।
भक्ष्य भोज्य समन्वितं।
षड सैरन्वितम् दिव्यम्।
लक्ष्मी देवी नमोस्तुते।
इसके बाद ऋतुफल यह कहकर अर्पित किया जाएगा-
फलेन फलितंम् सर्वे त्रैलोक्य सचराचरम्।
तस्मात फल प्रदानेन, पूर्णा संतु मनोरथा।
अब आचमन किया जायेगा, यह कहकर-
शीतलम् निर्मलम् तोयं, कपूरेण सुर्वसितम्।
आचम्यतामियम् देव्यों, प्रसीद एवं महेश्वरी।
इसके बाद अखंड ऋतु नारियल भेंट किया जाता है और कहा जाता है-
इंद फलं मया नीतं, सरसं च निवदितम्।
ग्रह्यण परमेशानि, प्रसीद प्रणमाम्यहम्।
इसके बाद सुपारी अर्पित की जाती है और कहा जाता हैं-
एला लवंगा कपूर नात्र, पत्रादि मिर्युतम् तांबूलम्, प्रतिग्रह्यताम।
फिर दक्षिणा दी जाती है यह कहकर कि-
हिरण्य गर्भ गर्भस्थं, हेमबीजं विभावसौः।
अनंत पुण्यं फलदम् तः शांति प्रयच्छ में।
दक्षिणा के उपरांत यह प्रार्थना की जाती है-
सुरा सुरैन्द्रादि किरीट मौक्तिकै युक्तं सदा यत्त व पाद पंकजम्।
परावरं पातु वंर सुमंगल नमामि भक्त्या तव काम सिद्धये।
भवानी त्वं महालक्ष्मीः सर्व काम प्रदायेगी।
सुपूजिता प्रसन्ना स्थान महालक्ष्मी नमोस्तुते।
नमस्ते सर्व देवानाम् वरदारिन हरि प्रिये।
या गति स्तवत्प्रपन्नानाम सा मे भूयात्तव दर्चनात्।
महालक्ष्मी के पूजन का यह चरण यहीं समाप्त होता है। आरती से पहले महाकाली अर्थात् स्याही की दवात, लेखनी अर्थात् कलम् महासरस्वती और कुबेर का पूजन किया जाता है।
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आकषर्ण, सम्मोहन कवच- (एक कवच के लिये न्यौछावर राशि- रु 3000)
हर महिला चाहती है कि उसमें आकर्षण, सम्मोहन तथा वशीकरण की ऐसी शक्ति हो, जिससे कि वह सुंदर तथा आकर्षक तो दिखाई दे ही साथ ही अपने पति को किसी अन्य स्त्री के मोहजाल में भटकने से रोक भी सकती हो। यह सब तभी संभव है जब वह स्वयं आकर्षक व सुंदर तो दिखाई दे ही साथ में वह आवश्यकता पडने पर वशीकरण का प्रयोग भी कर सके। क्योकि जब किसी युवती में सुंदरता या आकर्षण का अभाव होता है, तब उसके पति का झुकाव किसी दूसरी सुंदर महिला की तरफ हो सकता है।
क्योकि एक व्यवस्थित व संतुलित देह वाली स्त्री हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित करती ही है। (कभी-कभी सावंली सलौनी होते हुये भी सुन्दर नैन-नक्श व्यवस्थित परिधान, मुस्कराता चेहरा भी मनुष्य को आकर्षित करता है।) इसलिये तंत्र-शास्त्रों में ऐसे अनेक मंत्र-तंत्र-यंत्र बताये गये हैं, जिससे युवतियां अपने में आकर्षण पैदा कर सकें व हीन भावना निकाल अपने पति के साथ गृहस्थ सुख को पूर्णरूप से भोग सकें।
आकर्षण-सम्मोहन-वशीकरण कवच उन स्त्रियों के लिये विशेष रूप से निर्मित किया जा रहा है जो कि किसी न किसी व्यवसाय से जुड़ी हैं, जिन्हें बहुत अधिक व्यक्तियों से मिलना होता है, उन्हें अपनी प्रतिभा से वशीभूत करना होता है, चाहे वह टी. वी. में आने वाली कोई आर्टिस्ट हो, कोई अभिनेत्री हो, कोई टेलीफोन ऑपरेटर हो, कोई कम्प्यूटर ऑपरेटर हो या कोई व्यवसायी महिला हो। इन सबके लिए यह प्रभावशाली कवच है।
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(एक दिवसीय दीपावली साधना प्रयोग) वशीकरण प्रयोग-

साधना सामग्री- अभिमंत्रित हरितमणी गणपति, वशीकरण लॉकेट एवं हरे रंग की विद्युत माला।

न्यौछावर राषि- रू. 3100/-

विधि- यह रात्रि कालीन एक दिन का प्रयोग है, दीपावली की रात्रि में यह साधना करने से आश्चर्यजनक रूप से वशीकरण का प्रभाव प्रकट होता है। दीपावली की रात्रि को साधक स्वस्थ व प्रसन्नचित्त होकर स्नान आदि से निवृत्त होकर, हरे आसन पर, हरी धोती और दुपट्टा ओढ़ कर बैठ जायें, किसी महिला को यह साधना करनी हो तब वह हरी साडी धारण करके बैठे। सामने एक लकड़ी के बाजोट पर हरा वस्त्र बिछाकर, किसी प्लेट में हरी कुंकुंम से पांच बिन्दयां बनाकर उस पर अभिमंत्रित हरितमणी गणपति को स्थापित कर दें, और हरे कुंकुंम से उस पर चार बिन्दियां लगायें। इसके पश्चात् अलग से एक चावल की ढे़री बनाकर उस पर हरे रंग की विद्युत माला को स्थापित कर दें। इसके बाद अक्षत, पुष्प, धूप-दीप आदि दिखाकर पूजन करें, और पांच मिनट तक दीपक की ज्योति पर एकाग्रचित्त होकर त्राटक करें, तत्पश्चात् हाथ में जल लेकर अपने नाम व पिता का नाम, शहर, स्थान आदि का उच्चारण कर जिसको अपने मनोनुकूल करना हो उसी कामना को पूरी करने का संकल्प करें, और फिर जल को जमीन पर छोड़ दें। इसके बाद हरे रंग की विद्युत माला से निम्न मंत्र का आसन पर बैठे-बैठे 11 माला जप करें।
मंत्र- ऊँ क्रीं अमुक मम् वश्यं क्रीं फट्। जप करने के बाद मिष्ठान का भोग लगाते हुये हरितमणी गणपति को नमस्कार तथा कामनापूर्ति की प्रार्थना करते हुये वशीकरण लॉकेट गले में धारण करें।
प्रयोग समाप्ति के बाद रात्रि में ही या अगले दिन साधना-सामग्री (पूजा वाले चावल, फूल इत्यादि) को किसी एकान्त स्थान में घर से दूर ले जाकर जमीन में गाड़ दें, या नदी अथवा कुंए में इसे विसर्जित कर दें।
इस प्रयोग की समाप्ति के 30 दिन पश्चात् आप स्वयं में एक विशेष परिवर्तन अनुभव करने लग जाएंगे, और आपके व्यक्तित्व में पहले से आकषर्ण का प्रभाव प्रकट होने लगेगा। आप प्रखर व्यक्तित्व के स्वामी बन इच्छित व्यक्ति का आकर्षण कर सकेंगे। (सामग्री के लिये ‘शुक्राचार्य संस्थान’ से सम्पर्क करें ूूण्ेनातंबींतलंण्बवउ)
ैनातंबींतलंए थ्.265ए ळंसप छवण् 22ए स्ंगउप छंहंतए क्मसीप.110092ए डवइरू 09810143516
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(एक दिवसीय दीपावली साधना प्रयोग) संतान प्राप्ति प्रयोग

साधना सामग्री- अभिमंत्रित मुक्ता गणपति (मोती पर बने गणपति), 108 दाने की पुत्रजीवा माला।

न्यौछावर राषि- रू. 3100
कुण्डली में संतानोत्पत्ति योग न हो अथवा अनेक बार गर्भ हानि होती रही हो या संतान दीघार्यु नहीं होती हो तो उसके लिए यह प्रयोग महत्वपूर्ण है। इस साधना प्रयोग को दीपावली की रात्रि में संतान की इच्छा करने वाली महिला के संपन्न करने से संतान का योग प्रबल होकर एक वर्ष में संतानोत्पत्ति अवश्य होती है। और वह संतान आज्ञाकारी होती है। इस प्रकार के प्रयोग से गृहस्थ जीवन अनुकूल एवं सुखदायी बन जाता है।
साधिका को चाहिए कि वह दीपावली की रात्रि में स्नानादि कर पीले वस्त्र धारण कर पूर्व की तरफ मुख कर के पीले आसन पर बैठ जाएं सामने लकड़ी की चौकी पर एक थाली में चावल से त्रिकोण बनाकर उसके मध्य में मोती पर बने अभिमंत्रित मुक्ता गणपति की स्थापना करें और फिर पंचोपचार (फूल, चावल, रोली, कलावा तथा धूप-दीप) से पूजा करके पुत्रजीवा की 108 दानों वाली माला से 51 माला अग्रलिखित मंत्र जप पूर्ण करें।
यही प्रयोग प्रत्येक माह शुक्ल पंचमी के दिन गर्भवती होने तक पुत्र की इच्छा रखने वाली महिला को दोहराना चाहिये। निश्चय ही उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। यही प्रयोग उस महिला का पति या घर का कोई अन्य सदस्य भी कर सकता है, परंतु उसको उस महिला के नाम का संकल्प अवष्य लेना होगा। यदि कोई साधक-साधिका किसी दूसरे के लिए प्रयोग करना चाहे तो संकल्प ले लें कि ‘मैं यह प्रयोग अमुक व्यक्ति के लिए संपन्न कर रहा/रही हूँ।

मंत्र- ऊँ नमो नारायणाय पुत्र सन्तानं देही देहि ठः ठः स्वाहा।
जप पूर्ण होने पर गणपति जी को मिष्ठान का भोग लगवाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें। वह माला जल में विसर्जित कर दें। मुक्ता गणपति का चांदी में लॉकेट बनवाकर महिला को गले में धारण करना चाहिये।
ैनातंबींतलंए थ्.265ए ळंसप छवण् 22ए स्ंगउप छंहंतए क्मसीप.110092ए डवइरू 09810143516
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कैसे करें दीपावली पूजन

दीपावली के उत्सव को पवित्र मन और विचारों से युक्त होकर मनाना चाहिए यदि इस दिन उपवास कर सकें तो अत्युत्तम है। साँयकाल देव पूजन तथा भगवती लक्ष्मी का पूजन करना चाहिए। कम से कम 5 दीपक घी के तथा अन्य सरसों के तेल से प्रज्वलित करें। जिस स्थान पर लक्ष्मी पूजन हो वहां पर घी के दीपक जलाएँ और घर में जिस स्थान पर धन अथवा आभूषण आदि रखें हों उस के पास भी घी का दीपक जलाना चाहिए।
इस प्रकार यदि दुकान हो तो उस स्थान अथवा जहां पर कि गल्ला रखा जाता हो वहाँ भी घी का दीपक जलाना चाहिए एक घी का दीपक गंगा जी के नाम का और आस-पास जितने भी देव स्थान हों वहाँ भी घी का दीपक जलाना चाहिए घर के भीतरी तथा बाहरी भागों में तेल के दीपक जलावें। निवास के सभी कमरे सुगन्धित धूप व अगरबत्ती आदि से सुवासित करने चाहिएँ।
व्यवसायी व्यक्तियों को चाहिए कि वह अपने व्यवसायिक केन्द्र पर जाकर सिन्दूर से मांगलिक चिन्ह अंकित करेंं, और दीपोत्सव लक्ष्मी-गणेश पूजन सहित मनाएँ। लक्ष्मी पूजन के समय अपने बही-खातों व कलम-दवात आदि का भी पूजन अवश्य करें। दीपावली धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीजी का पर्व माना गया है। गणेश पूजन, दीप पूजन और गौ द्रव्य पूजन इस पर्व की विशेषतायें हैं।
दीपावली अपने जीवन को विकसित सामर्थ्यवान बनाने के लिये, माँ लक्ष्मी के रूप में अर्थ की पूजा करने का एक विशेष पर्व है। आर्थिक क्षेत्र में सन्तुलन तथा व्यवस्था कायम रखने के लिए अपनी आवश्यकता अनुसार खर्च करना चाहिए और धन को उपयोगी कार्यो में लगाना चाहिए बजट बनाकर अपनी क्षमता के अनुसार खर्च करना चाहिए। यदि फिजूल खर्च की आदत होगी तो धन का संचय कैसे संभव है। यही सन्देश हैं दीपावली पर्व का।

दीपावली पूजन का शुभ मुहूर्त
इस वर्ष 2016 ई. दीपावली का यह ज्योतिपर्व 30 अक्तूबर रविवार के दिन है। महालक्ष्मी पूजन एवं दीपावली का महापर्व कार्तिक अमावस में प्रदोष काल एवं अर्धव्यपिनी हो, तो विशेष शुभ मुहूर्त होता है।

कार्तिकस्यासिते पक्षे लक्ष्मीर्निदां विमुच्चति।
स च दीपावली प्रोक्ताः सर्वकल्याणरूपिणी।।

दीप प्रज्जवलन, महालक्ष्मी पूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल ही विशेष प्रशस्त माना गया है। दीपावली पाँच पर्वों का महोत्सव है, जिसका आरम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धन-त्रयोदशी) से लेकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई-दूज) तक रहती है। दीपावली के दिन सॉयकाल (प्रदोषकाल में) स्नानादि के उपरांत स्वच्छ वस्त्राभूषण धारण करके किसी धर्मस्थल में मंत्रपूर्वक दीप-दान करके अपने निवास पर श्रीगणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर तथा महाकाली पूजन करना चाहिये। पूजन के उपरांत अल्पाहार करना चाहिये। इसके बाद उपलब्ध शुभ मुहूर्त में (निशीथ या महानिशीथ काल में) मंत्र-जप, यंत्र सिद्धि एवं विशेष अनुष्ठान सम्पादित करने चाहियें। दीपावली पूजन के पश्चात घर में चौमुखा दीपक रात्रिभर प्रज्जवलित रखना चाहिये, इसे सौभाग्य एवं लक्ष्मी का द्योतक माना जाता है।
इस वर्ष दीपावली 30 अक्तूबर 2016 ई. रविवार के दिन है। इस दिन चित्रा/स्वाती नक्षत्र, प्रीति योग, उपलब्ध होंगे। सॉयकाल प्रदोषकाल निशीथ काल एवं अमावस्या युक्त आंशिक महानिशीथ काल में विशेष पूजन पुण्यप्रदायक होगा। दीपावली पूजन में अमावस तिथि, प्रदोष निशीथ एवं महानिशीथ काल तथा तुला राशि में सूर्य व चन्द्रमा का होना, यह मुहूर्त विशेष महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यह सब काल एवं चौघड़िया मुहूर्त महालक्ष्मी, कुबेर एवं महाकाली की विशेष पूजा-साधना व अनुष्ठानादि के लिये विशेष शुभ माने जाते हैं।
प्रदोषकाल- 30 अक्तूबर 2016 के दिन 17ः37 से 20ः13 तक प्रदोष काल रहेगा। महालक्ष्मी पूजन के लिये कार्तिक अमावस्या के दिन, प्रदोष काल की अवधि के मध्य वृष (स्थिर लग्न) लग्न, स्वाती नक्षत्र, तथा सूर्य व चन्द्रमा की तुला राशि में स्थिति होने से अत्यंत शुभ मुहूर्त होगा।
सर्वोत्तम मुहूर्त- इस दिन सॉयकाल वृष लग्न के समय (18ः28 से 20ः22) के मध्य ही शुभ, अमृत तथा चर का चौघड़िया अत्यंत शुभ हैं। इसी समय में दीपदान, गणपति सहित श्रीमहालक्ष्मी पूजन, कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन, धर्मस्थलों तथा अपने घर में दीप प्रज्जवलित करना ब्राह्मणों तथा आश्रितों को भेंट, मिष्ठानादि बाँटना शुभ होगा।
निशीथ काल- 30 अक्तूबर 2016 के दिन 20ः12 से 22ः50 तक निशीथ काल रहेगा। 22ः37 तक मिथुन (मध्यम शुभ) लग्न रहेगी। इस वर्ष अमावस 23ः06 तक रहने से निशीथ काल का विशेष महत्व रहेगा।
महानिशीथ काल- इस वर्ष 30 अक्तूबर 2016 के दिन अमावस का समय 23ः06 पर समाप्त होगा परंतु महानिशीथ काल 22ः49 से 25ः29 तक रहेगा, अतः महानिशीथ काल का महत्व केवल 17 मिनट (22ः49 से 23ः06) तक ही रहेगा। इस लिये यंत्र-मंत्र-तंत्र की क्रिया करने वाले साधकों को यथासम्भव निशीथ काल में ही जपानुष्ठान प्रारम्भ करना चाहिये।
स्थिर लग्न में दीपावली पूजन क्यों- स्थिर लग्न (विशेषकर वृष तथा सिंह लग्न) में महालक्ष्मी पूजन करने से धन-धान्य स्थिर रहता है। चर लग्न में धन-धान्य आता-जाता रहता है। द्विस्वभाव लग्न में मध्यम फल होता है। महालक्ष्मी की पूजा धन-धान्य की स्थिरता के लिये ही किया जाता है। अतः इसके लिये स्थिर लग्न का ही चुनाव करना उचित होगा।

महालक्ष्मी पूजन मुहूर्त 30 अक्तूबर 2016
वृष (स्थिर) लग्न में पूजा का सम्पूर्ण समय- 01 घ. 41 मि.
प्रदोषकाल- 17ः37 से 20ः13 तक।
वृष लग्न- 18ः28 से 20ः22 तक
निशीथ काल- 20ः12 से 22ः50 तक।
महानिशीथ काल- 22ः49 से 25ः29 तक।
सिंह लग्न दिल्ली- 24ः58 से 27ः15 तक।
अमावस्या तिथि- 29 अक्तूबर 2016 = 20ः40 से आरम्भ होकर 30 अक्तूबर 2016 = 23ः08 तक रहेगी।

शुभ चौघड़िया मुहूर्त-
प्रातः 07ः58 से 12ः05 (चर, लाभ, अमृत)।
दोपहरः 13ः27 से 14ः49 तक (शुभ)।
रात्रिः 17ः33 से 22ः27 (शुभ, अमृत, चर)।

महानिशीथ काल में महालक्ष्मी, काली एवं कुबेरादि देवताओं का पूजन विशेष फल देने वाले होते हैं।

।। पूजन की तैयारी।।
इस शुभ मुहूर्त में नवीन वस्त्र धारण कर गृहलक्ष्मी के साथ पूजा के स्थान पर बैठें। पूजा प्रारम्भ होने से पूर्व पूजा के स्थान पर रखने के लिये लक्ष्मी-गणेश का चित्र तथा सिक्के, लक्ष्मी-गणेश यंत्र, स्फटिक या चांदी का श्री यंत्र, अथवा कुबेर यंत्र, रख लें, यदि व्यापार स्थान पर पूजा कर रहे हैं तो चाँदी पर उभरे व्यापार वृद्धि यंत्र की स्थापना करें। बहीखाता, कलम, दवात आदि भी ले लेनी चाहिए एवं आवश्यक पूजन सामग्रीः- रोली, कलावा, चावल, पान-सुपारी, मिष्ठान गुलाब के फूल, धूप, दीपक इत्यादि भी तैयार कर लेने चाहिएँ।

।। पूजन विधान।।
पूजन स्थल को शुद्ध जल से साफ-सुथरा कर आसन बिछाना चाहिए और सर्वप्रथम विघ्नविनाशक श्री गणेश- लक्ष्मी के चाँदी के सिक्के को दूध से स्नान करवा लें और श्री यंत्र को अष्टदल कमल या स्वास्तिक बना कर उस पर विराजित करें फिर षोडशोपचार पद्धति से श्रद्धा पूर्वक सपरिवार लक्ष्मी जी की पूजा पौराणिक या वैदिक विधि से करें।
प्रथम हाथ में जल व चावल ले कर यह संकल्प मंत्र का पाठ करें-

।। अथ संकल्प।।
¬¬ श्रीं विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरूषस्य विष्णोराज्ञा प्रवर्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणोन्हि द्वितीय परार्द्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे 2064 संवत्सरे दक्षिणायने हेमन्तऋतौ कार्तिकमासे कृष्णपक्षे अमावस तिथौ भृगुवासरे 15 पुण्यतिथौ अमुकगोत्रो अमुकशर्माहं स्थिरलक्ष्मीप्राप्त्यर्थ श्री लक्ष्मी प्रीत्यर्थं सर्वारिष्ट निवृति पूर्वक व्यापारे लाभार्थे च महालक्ष्मी महाकाली, महासरस्वति नवग्रहादि पूजनं करिष्ये।
संकल्प पाठ के उपरांत जल भूमि पर छोड़ दें।

।। श्रीगणेश अवाहनम्।।
दीपावली पर्व पर गणेश पूजन से तात्पर्य यह है कि हम धन को खर्च और अर्जित करने के लिए बुद्धि-विवेक से काम लें। अविवेक व बुद्धिहीनता के साथ उसे गलत ढंग से खर्च न करें। गणेश आह््वान से पूर्व हाथ में फूल चावल लेकर आह््वान मंत्र का पाठ करें।
एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।।
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय।
नागाननाय श्रृति यज्ञ विभूषिताय, गौरी सुताय गणनाथ नमो नमस्ते।।
ऊँ श्रीगणेशाय नमः।
आह््वान मंत्र पाठ के उपरांत फूल चावल पूजन स्थल पर रख दें।

।। लक्ष्मी आवाहनम्।।
लक्ष्मीजी को श्री विष्णु भगवान की पत्नी अर्थात् जगमाता माना गया है। जीवन को भली प्रकार विकसित होने के लिए अर्थ प्रधान साधनों की आवश्यकता होती है, इसी लिए दीपावली पर महालक्ष्मीजी का आह््वान और पूजन किया जाता है। लक्ष्मीजी के आह््वान से पूर्व हाथ में फूल चावल लेकर आह््वान मंत्र का पाठ करें। निम्न मंत्र से माँ लक्ष्मी जी का भाव भरा आह््वान करें :-
महालक्ष्मे विद्महे, विष्णुप्रियायै धीमहि। तन्नों लक्ष्मी प्रचोदयात्।।
ऊँ आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्ति महेश्वरि।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।
स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महा शक्ति महोदरे।
महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।
पशसनस्थिते देवि परब्रह्म स्वरूपिणी।
परमेशवरी जगन्मातर्म हालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।
श्वेताम्बर धरे देवि नानालंकारभूषिते।
जगत्स्थिते जगन्मातर्म हालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।
¬ श्री लक्ष्म्यै नमः।।
आह््वान मंत्र पाठ के उपरांत फूल चावल पूजन स्थल पर रख दें और सभी अह्वाहित देवताओं का षोडषोपचार पूजन करें।
¬ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। आवाहयामि, स्थापयामि। आसनं समर्पयामि। पाद्यं समर्पयामि। अर्ध्यं समर्पयामि। आचमनम् समर्पयामि। स्नानम् समर्पयामि। वस्त्रं समर्पयामि। यज्ञोपवीतम् समर्पयामि। गन्धम विलेपयामि। पुष्पाणि समर्पयामि। धूप माध्रापयामि। दीपम् दर्शयामि। नैवेद्यं निवेदयामि। ताम्बूल पुंगीफलानि समर्पयामि। क्षिणां समर्पयामि। सर्वाभावे अक्षतान् समर्पयामि। ततो पश्चात नमस्कार करोमि। नमः सर्वहितार्थाय जगदाधार हेतवे। साष्टांगोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मयाकृतः।।

बहीखाते एवं-कलम दवात का पूजन-
बही हिसाब रखने का साधन है, यह आय-व्यय को बताने वाली है इसलिए दीपावली पर बही का भी पूजन किया जाता है। कलम दवात लेखन के मुख्य उपकरण हैं इसी लिए इन की भी पूजा की जाती है। नये वर्ष के लिए प्रयुक्त की जाने वाली बही तथा कलम-दवात का पूजन विधिवत् निम्न मंत्रों के साथ करें। पूजन करने के समय उन्हे अक्षत, रोली, पुष्प, धूप, दीप आदि समर्पित करके प्रणाम करें।
बहीखाता पूजनम्-
प्रसवे त उदीरते तिस्रो वाचो मखस्युवः।
यदव्य एषि सानवि।।

कलम-दवात पूजनम्-
शिशुर्न जातोऽव चक्रदद्वने स्वार्यद्वाज्यरूषः सिषासति। दिवो रेतसा सचते पयोबृधा तमीमहे सुमती शर्म सप्रथः।
दीपदान- ज्ञान और प्रकाश के वातावरण में ही लक्ष्मी निवास करती हैं। एक थाल में 5 या 11 घृत-दीप जलाकर उसका निम्न मंत्र से विधिवत् पूजन करें तत्पश्चात् दीपावली के रूप में जितने चाहें उतने दीपक तेल से जलाकर विभिन्न स्थानों पर रखें।
¬ अग्निर्ज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा। सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा। अग्निर्वर्च्चोः ज्योतिर्वर्च्चः स्वाहा। सूर्यो वर्च्चो ज्योतिर्वर्च्चः स्वाहा। ज्योति सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।।
।। संकल्प।।
इस पावन पर्व पर यह संकल्प लेना चाहिये की हम आर्थिक क्षेत्र में सन्तुलन तथा व्यवस्था कायम रखने के लिए आवश्यकतानुसार खर्च करेंगे तथा धन को उपयोगी कार्यो में लगाएंगे। बजट बनाकर अपनी क्षमता के अनुसार खर्च करेंगे। संकल्प का मन्त्र बोलते हुए, पूजा स्थान पर फूल चावल चढ़ाते हुए सभी परिजन देवी को भोग लगा प्रसाद ग्रहण करें। देवी को सदा आपे घर पर ही निवास करने की प्रार्थना करते हुए भूल-चूक की क्षमा माँगें और पूजन क्रम को सम्पन्न किया जाये।
……………….नामाहं महालक्ष्मीपूजनपर्वणि अर्थशक्तिं महा लक्ष्मीप्रतीकं विज्ञाय अपव्ययादिदोषं परिष्कारण्स्य संकल्पमहं करिष्ये।

-शुक्राचार्य ऐस्ट्रालॉजीकल रिसर्च सेन्टर
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दरिद्रता निवारक महालक्ष्मी प्रयोग
आज का युग अर्थ प्रधान युग है। अर्थ की आवश्यकता आज सर्वोपरि है। साधारण परिवार में आय की न्यूनता और खर्च की अधिकता, भौतिकता की चाह, ऐश्वर्य आराम की वस्तुओं की इच्छा तथा पढ़-लिख कर भी बेकार रहने के कारण प्रायः अधिकांश लोग तनाव ग्रस्त हैं। इसी तनाव के कारण गृहकलह होना भी स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त परस्पर अविश्वास, भोग में असंतुष्टि, अधिक संतान का होना, प्रेम की न्यूनता, कुटुम्ब का असहयोग आदि अनेक कारणों से गृहकलेश होते देखा गया है। इन में से कोई एक भी कारण हो तो हर प्रकार के संभव असंभव उपाय करके भी मनुष्य गृहकलेश से छुटकारा नहीं पा सकता है। निरंतर प्रयास करने पर भी आपसी दूरियां बढ़ती ही चली जाती हैं। ऐसी परिस्थितियों से मुक्ति पाने के लिये आप भी दरिद्रता निवारक महालक्ष्मी प्रयोग सम्पन्न कर सकते हैं। वैसे तो यह प्रयोग कभी भी सम्पन्न किया जा सकता है, लेकिन कार्तिक मास में दीपावली की रात्रि में यह प्रयोग सम्पन्न करने से विशेष सफलता प्राप्त होती है, और इस प्रयोग का लाभ भी स्थाई रूप में मिलता है। दीपावली की रात्रि में आधी रात के पश्चात ही यह साधना प्रारम्भ करनी चाहिये, रात्रि में साधक लाल धोती व स्त्री साधिका हो, तो लाल साड़ी पहन कर उत्तर दिशा में मुख करके बैठ जायें, और सामने एक बड़ा सा तेल का दीपक लगा दें। इसके बाद सामने एक लकडी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछा कर उस पर अभिमंत्रित रोली से स्वास्तिक की रचना करें इस के बाद प्राण प्रतिष्ठित स्फटिक पर निर्मित श्रीयंत्र व श्रीदेवी की तस्वीर स्थापित करें। इसके उपरांत अन्य पूजा सामग्री भी श्रीयंत्र व देवी के चित्र के आगे समर्पित करें। तांत्रोक्त नारियल पर कलावे को लपेटकर चावल तथा जनेऊ के साथ चढावें। इसके बाद उस लक्ष्मीजी के चित्र पर फूल समर्पित करें, धूप तथा दीपक दिखावें। मिष्ठान का भोग लगावें, और निम्न मंत्र की 21 माला मंत्र जप करें, इस मंत्र जप में स्फटिक या कमल गटट्े की माला का ही प्रयोग किया जा सकता है।
मंत्र- ऊँ अर्हि यं लक्ष्मी श्रं अर्हि ऊँ।
जब मंत्र जप पूरा हो जाये, तब चढ़ाये हुए प्रसाद को थोड़ा सा ग्रहण कर लें, और रात्रि को वहीं सोयें, दीपक रात भर जलता रहना चाहिये। सुबह उठ कर सारी पूजा सामग्री को जल में विसर्जित कर दें या किसी खेत में भूमि में दबा दें, तो आगे के जीवन भर के लिये लक्ष्मी का वास बना रहता है, और साधक अपने जीवन में निरन्तर उन्नति करता रहता है। यदि साधक चाहे तो लाल वस्त्र में उन वस्तुओं को बांध कर घर के किसी कोने में भी रख दें, तो वह भी गाड़ा हुआ माना जाता है, यह प्रयोग अपने आप में अत्यन्त महत्वपूर्ण है, और चमत्कारिक है, यदि आप कार्तिक मास में दीपावली की रात्रि में इस प्रयोग को सम्पन्न करें, तो धन का आभाव तो दूर होता ही है साथ ही अधिकारी वर्ग अथवा जो व्यक्ति शत्रु भाव रखता हो उससे भी अनुकूल किया जा सकता है। शास्त्रों में लिखा गया है, कि दीपावली के दिन शत्रु मारण प्रयोग, स्तम्भन प्रयोग, वशीकरण प्रयोग आदि सम्पन्न करने से पूर्ण सफलता तथा विजय प्राप्त होती है, आवश्यकता केवल इस बात की है, कि कोई भी साधना पूर्ण विधि-विधान सहित शुद्ध सामग्री के साथ सम्पन्न की जाये तथा जहां तक हो सके किसी को हानि देने वाले प्रयोग सम्पन्न नहीं किये जायें, तभी सिद्धि तथा सफलता मिलती है।
ैनातंबींतलंए थ्.265ए ळंसप छवण् 22ए स्ंगउप छंहंतए क्मसीप.110092ए डवइरू 09810143516
साधना सामग्री- प्राण प्रतिष्ठित स्फटिक पर निर्मित श्रीयंत्र, अभिमंत्रित रोली, देवी की तस्वीर, तथा तांत्रोक्त नारियल।
साधना सामग्री के लिये न्यौक्षावर राशि-3100
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दीपावली पूजन का षुभ मुहूर्त
ब्रह्मपुराण के अनुसार दीपावली पूजन के लिये अर्द्धरात्रि व्यापनी- अर्थात् आधी रात तक रहने वाली अमावस्या श्रेष्ठ होती है। यदि आधी रात तक न रहे तो प्रदोषव्यापिनी अमावस्या लेनी चाहिए-
दीपाप्दत्त्वा प्रदोष तु लक्ष्मीं संपूज्य यथाविधि। स्वालंकृतेन भोक्तव्यं सितवस्त्रोपशोभिना।। (निर्णय सिन्धु)
दीपावली वस्तुतः पाँच पर्वों का महोत्सव माना जाता है, जिसका शुभारम्भ कार्तिक कृष्ण त्रियोदशी (धनतेरस) से होकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई दूज) तक रहता है।
दीपावली की शाम (प्रदोषकाल) में स्नानादि के उपरान्त स्वच्छ वस्त्राभूषण धारण करके धर्मस्थल पर मन्त्रपूर्वक दीपदान करके अपने निवास स्थान पर श्री गणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर, महाकाली पूजन आदि करके अल्पाहार करना चाहिए। तदुपरान्त उपलब्ध शुभ मुहूर्तों में मंत्र-जप, यंत्र सिद्धि आदि अनुष्ठान सम्पादित करने चाहिए। दीपावली पूजन के पश्चात् घर में चौमुखा दीपक रात्रि भर प्रज्ज्वलित रहना चाहिए जो कि सौभाग्य व लक्ष्मी वृद्धि का घोतक माना जाता है।
इस वर्ष 30 अक्तूबर 2016 को कार्तिक अमावस को अर्द्धरात्रि तक 20ः40 से आरम्भ होकर 23ः08 तक व्याप्त रहने से दीपावली का महत्व और भी अधिक प्रशस्त होगा। श्रीमहालक्ष्मी पूजन, मंत्र जाप, पाठ, तंत्रादि साधना के लिए प्रदोष, निशीथ, महानिशीथादि काल व साधनाकाल अनुष्ठानानुसार अलग अलग महत्व रखते हैं। आगे दीपावली पर्व में विशेष तौर पर प्रदोषादि काल एवं मुहूर्त लिखे जा रहे हैं-
1. प्रदोष काल मूहूर्त- 30 अक्तूबर को, सूर्यास्त से लेकर 2 घण्टे 36 मिनट पर्यन्त प्रदोष काल होगा। दिल्ली में प्रदोष काल सायं 5ः37 से रात्रि 8 बजकर 13 मिनट तक रहेगा। सायं 5 बजकर 37 मिनट तक मेष लग्न में दीपावली पूजन न करने की सलाह (गुरू जी की राय में) दी जाती।
दीपावली पूजन के लिये सांयकाल 06ः28 से रात्रि 08ः22 तक स्थिर वृष लग्न तथा प्रदोष काल विशेषतः 18ः28 से 20ः01 तक शुभ मुहूर्त रहेगा। इस समय वृष लग्न भी होगी तथा प्रदोषकाल भी रहेगी। लग्न पर शुक्र, शनि तथा गुरू की शुभ दृष्टि होगी। प्रदोष काल और वृष लग्न कालीन स्वाति नक्षत्र, तुला चंद्र एवं प्रीति नामक शुभ योग भी रहेगा। इस योग में दीपदान, श्रीमहालक्ष्मी पूजन व गणेश पुजन, कुबेर पूजन, बही खातों का पूजन, धर्म एवं गृह स्थलों पर दीप प्रज्वलित करना ब्राह्मणों तथा अपने आश्रितों को भेंट, मिष्ठानादि बांटना शुभ होता है।
2. निशीथ काल- 30 अक्तूबर, रविवार को दिल्ली व समीपवर्ती नगरों में निशीथ काल रात्रि 20 बजकर 12 मिनट से शुरू होकर रात्रि 22ः50 तक रहेगा। इस दौरान मिथुन लग्न 10ः37 तक होगी, इस मध्य 22ः27 तक शुभ, अमृत और चर का चौघड़िया तथा स्वाति नक्षत्र रहेगा। इस अवधि में श्रीमहालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन, लेखनी पूजन, कुबेर आदि देवताओं का पूजन, श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त एवं पुरूष सूक्त तथा अन्य काम्य मंत्रों का जपानुष्ठान करना चाहिए।
3. विशेष उच्च स्तरीय साधनाओं के लिये महानिशीथकाल- रात्रि 22ः49 से अर्द्धरात्रि 25ः29 तक महानिशीथ काल रहेगा। इस दारौन सिंह लग्न 24ः58 से 27 प्रशस्त रहेगा। महानिशीथ काल में श्रीमहालक्ष्मी व महाशक्ति काली की उपासना, यंत्र-मंत्र-तंत्र आदि क्रियाएँ, विशेष काम्य प्रयोग व तंत्र अनुष्ठान व यज्ञादि किये जाते हैं। क्योंकि पत्रिका के पाठक सम्पूर्ण भारत वर्ष में हैं, इसलिए इस वर्ष हम भारत के मानक समय के अनुसार दीपावली पूजन एवं साधना आदि के लिए प्रशस्त प्रदोष काल मुहूर्त तथा विशेष महानिशीथकाल शुभ मुहूर्त का विवरण दे रहे हैं, साधक अपनी सुविधा अनुसार शुभ मुहूर्त का चुनाव कर सकते हैं।
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दीपावली पूजन के लिये अति शुभ मुहूर्त
1. इस वर्ष 30 अक्तूबर 2016 दीपावली, महालक्ष्मी पूजन के लिये कार्तिक अमावस्या के दिन, प्रदोष काल की अवधि के मध्य वृष (स्थिर लग्न) लग्न, शुभ-अमृत का चौघड़िया, स्वाती नक्षत्र, तथा सूर्य व चन्द्रमा की तुला राशि में स्थिति होने से दीपावली पूजन का प्रथम अत्यंत शुभ मुहूर्त होगा- 17ः37 से 20ः01 तक।
2. अमावस्या तिथि अर्तगत, वृष लग्न तथा शुभ, अमृत, चर का चौघड़िया का योग होगा – 18ः28 से 20ः22 तक।
3. महानिशीथ काल तथा सिंह लग्न का योग होगा – 22ः49 से 25ः29 तक।
4. अमावस्या तिथि तथा महानिशीथ काल का योग होगा -22ः49 से 23ः08 तक।
स्थिर लग्न में दीपावली पूजन क्यों- स्थिर लग्न (विशेषकर वृष तथा सिंह लग्न) में महालक्ष्मी पूजन करने से धन-धान्य स्थिर रहता है। इसी समय में दीपदान, गणपति सहित श्रीमहालक्ष्मी पूजन, कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन, तंत्र-मंत्र-यंत्र की साधनायें भी की जाती हैं। इस दिन धर्मस्थलों तथा अपने घर में दीप प्रज्जवलित करना ब्राह्मणों तथा आश्रितों को भेंट, मिष्ठानादि बाँटना शुभ होता है।

रूद्राक्ष में अलौकिक गुण

रूद्राक्ष : आसाम, नेपाल और हिमालय के कई क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाला एक सुपरिचित बीज है, जिसे पिरोकर मालाएं बनाई जाती हैं किन्तु इसके अलौकिक गुणों की जानकारी हर एक को नहीं है। जन सामान्य की धारणा है कि रूद्राक्ष पवित्र होता है इसलिए इसे पहनना चाहिए बस इससे अधिक जानने की चेष्टा कोई नहीं करता।

वस्तुतः रूद्राक्ष पवित्र तो होता ही है इसके अतिरिक्त इसमें अलौकिक गुण भी हैं इसके चुम्बकिय प्रभाव को तथा स्पर्ष-षक्ति को आधुनिक विज्ञानवेत्ता भी स्वीकार करते हैं यह रोग-षमन और अदृष्य बाधाओं के निवारण में अत्यंत प्रभावशाली होता है। स्वास्थ्य, शान्ति और श्री-समृद्धि देने में भी रूद्राक्ष का प्रभाव अद्वितीय है। रूद्राक्ष के खुरदरे बीज धारियाँ लिए होते हैं, इन धारियों की संख्या एक से ग्यारह तक पाई जाती है इन धारियों को ही ‘मुख’ कहते हैं।

मुख की संख्या के आधार पर रूद्राक्ष के गुण, प्रभाव और मूल्य में अन्तर होता है। एकमुखी रूद्राक्ष दुर्लभ होता है और दो से लेकर सातमुखी तक सरलता से मिल जाते हैं पर आठ से चौदह तक मुख वाले कदाचित ही मिल पाते हैं फिर 15 से 21 धारी वाले नितान्त दुर्लभ हैं सर्वसुलभ दाना पंचमुखी है, सामान्यतः प्रयास करने पर 2 से 13 मुखी तक के दाने भी मिल जाते हैं। इन सभी के अलग-अलग देवता हैं प्रत्येक दाने में धारियों के क्रम से उसके देवता की शक्ति समाहित रहती है और उसके धारक को उस देवता की कृपा सुलभ होती है। यों तो सभी रूद्राक्ष शिवजी को प्रिय हैं और उनमें से किसी को भी धारण करने से साधक शिव-कृपा का पात्र हो जाता है।

रूद्राक्ष का दाना अथवा माला जो भी सुलभ हो उसे गंगाजल या अन्य पवित्र जल से स्नान कराकर धूप-दीप से पूजन करें, पूजनोपरान्त  नमः शिवाय मन्त्र का 1100 पाठ कर 108 मंत्र का हवन करना चाहिए तत्पष्चात् रूद्राक्ष को शिवलिंग से स्पर्ष कराकर उपरोक्त मंत्र जपते हुए पूर्व या उत्तर की और मुख करके धारण कर लेना चाहिए, धारण करने के पश्चात् हवन-कुण्ड की भस्म का तिलक लगाकर षिव-प्रतिमा को प्रणाम करें। इस विधि से धारण किया गया रूद्राक्ष निष्चित रूप से प्रभावशाली होता है यह रूद्राक्ष धारण करने की सरलतम पद्धति है।

वैसे समर्थ साधक रूद्राक्ष को पंचामृत से स्नान कराकर अष्टगन्ध अथवा पंचगन्ध से भी नहलायें फिर पूर्ववत् पूजा करके उसे सम्बन्धित मन्त्र विषेष का 1100 जाप कर 108 मंत्र का हवन करें तथा भस्म लेपन के पष्चात् शिव-प्रतिमा को प्रणाम कर धारण कर लें। धर्म शास्त्रों में एक-मुखी से लेकर चौदह मुखी तक रूद्राक्ष की धारण विधि एवं मंत्र महर्षियों ने निर्धारित किये हैं।

रूद्राक्ष की माला 108 मनकों की अधिक प्रभावशाली होती है जिसमें पंचमुखी का कम से कम एक दाना और शेष अन्य मुख वाले दाने हो सकते हैं। इसे बाहु या कण्ठ पर धारण करने से भी पूर्ण लाभ होता है। ये समस्त रूद्राक्ष व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक कष्टों का शमन करके उसमें आस्था, शुचिता और देवत्व के भाव को जागृत करते हैं भूत-बाधा, अकाल-मृत्यु, आकस्मिक-दुर्घटना, मिर्गी, उन्माद, हृदय-रोग, रक्तचाप, आदि में रूद्राक्ष धारण करने से चमत्कारी लाभ दृष्टिगोचर होता है। रूद्राक्ष को लाल धागे में पिरोकर धारण करना चाहिए।

शनिश्चरी अमावस्या

शनिश्चरी अमावस्या जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं-

  1. ग्रह दोष
  2. पितृदोष
  3. सहभागी कृत दोष

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष- आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

शनैश्चरी अमावस्या-

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री- इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य है, उन सभी के नाप की ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ प्राप्त कर लेनी चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित की गई हो। यह मुद्रिका ऐसी होनी चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

 

 

काल को जीतने का उपाय

काल को जीतने का उपाय देवी पार्वती ने कहा- प्रभु! काल से आकाश का भी नाश होता है। वह भयंकर काल बडा विकराल है। वह स्वर्ग का भी एक मात्र स्वामी है। आपने उसे दग्ध कर दिया था, परंतु अनेक प्रकार के स्त्रोतो द्वारा जब उसने आपकी स्तुति कि तब आप फिर संतुष्ट हो गये और वह काल पुनः अपनी प्रकृति को प्राप्त हुआ- पूर्णतः स्वस्थ हो गया। आपने उससे बातचीत में कहा- ‘‘काल! तुम सर्वत्र विचरोगे, किंतु लोग तुम्हें देख नहीं सकेंगे।’’

आप प्रभु की कृपादृष्टि होने और वर मिलने से वह काल जी उठा तथा उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया। अतः महेश्वर! क्या यहां ऐसा कोई साधन है, जिससे वह काल को नष्ट किया जा सके? यदि हो तो मुझे बताईये; क्योकि आप योगियों में शिरोमणि और स्वतंत्र प्रभु हैं। आप परोपकार के लिये ही शरीर धारण करते हैं।

शिव बोले– देवी! श्रेष्ठ देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, नाग और मनुश्य- किसी के द्वारा भी काल का नाश नहीं किया जा सकता; परंतु जो ध्यान परायण योगी है, वे शरीर धारी होने पर भी सुख पूर्वक काल को नष्ट कर देते हैं। वरारोहे! ये पंचभौतिक शरीर सदा उन भूतों के गुणों से युक्त होता है और उन्हीं में इसका लय होता है। मिट्टी की देह मिट्टी में ही मिल जाती है।

आकाश से वायु उत्पन्न होती है, वायु से तेज तत्व प्रकट होता है, तेज से जल का प्रकाट्य बताया गया है और जल से पृथ्वी का आविर्भाव होता है। पृथ्वी आदि भूत क्रमशः अपने कारण में लीन होते हैं। पृथ्वी के पांच, जल के चार, तेज के तीन और वायु के दो गुण होते हैं। आकाश का एकमात्र शब्द ही गुण है। पृथ्वी आदि में जो गुण बताये गये हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं- शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। जब भूत अपने गुण को त्याग देता है, तब वह नष्ट हो जाता है और जब गुण को ग्रहण करता है, तब उसका प्रादुर्भाव हुआ बताया जाता है।

देवेश्वरी! इस प्रकार तुम पांचो भूतों के यथार्थ स्वरूप को समझो। देवी! इस कारण काल को जीतने की इच्छा वाले योगी को चाहिये की वे प्रतिदिन प्रयत्न पूर्वक अपने-अपने काल में उसके अंशभूत गुणों का चिंतन करे।

योगवेत्ता पुरूष को चाहिये कि सुखद आसन पर बैठकर विशुद्ध श्वास (प्राणायाम) द्वारा योगाम्यास करे। रात में जब सब लोग सो जायें, उस समय दीपक बुझाकर अंधकार में योगधारण करें। तर्जनी अंगुली से दोनो कानों को बंद करके दो घडी तक दबाये रखें। उस अवस्था में अग्निप्रेरित शब्द सुनाई देता है। इससे संध्या के बादका खाया हुआ अन्न क्षण भर में पच जाता है और सम्पूर्ण रोगों तथा ज्वर आदि बहुत से उपद्रवों का शीघ्र नाश कर देता है।

जो साधक प्रतिदिन इसी प्रकार दो घडी तक शब्द गृहण का साक्षात्कार करता है, वह मृत्यु तथा काम को जीतकर इस जगत में स्वछंद विचरता है और सर्वज्ञ एवं समदर्शी होकर सम्पूर्ण सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। जैसे आकाश में वर्षा से युक्त बादल गरजता है, उसी प्रकार उस शब्द को सुनकर योगी तत्काल संसार बंधन से मुक्त हो जाता है।

तदंतर योगियों द्वारा प्रतिदिन चिंतन किया जाता हुआ वह शब्द क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो जाता है। देवी! इस प्रकार मैने तुम्हें शब्द ब्रह्म के चिंतन का क्रम बताया है। जैसे ध्यान चाहने वाला पुरूष पुआलको छोड देता है, उसी तरह मोक्ष की इच्छा वाला योगी सारे बंधनों को त्याग देता है।

इस शब्द-ब्रह्म को पाकर भी जो दूसरी वस्तु की अभिलाषा करते हैं, वे मुक्के से आकाश को मारते और भूख-प्यास की कामना करते हैं। यह शब्द-ब्रह्म ही सुखद, मोक्ष का कारण, बाहर-भीतर के भेद से रहित, अविनाशी और स्मस्त उपाधियों से रहित परब्रह्म हैं। इसे जानकर मनुश्य मुक्त हो जाते हैं। जो लोग कालपाश से मोहित हो शब्दब्रह्म को नहीं जानते, वे पापी और कुबुद्धि मनुश्य मौत के फंदे में फंसे रहते हैं। मनुश्य तभी तक संसार में जन्म लेते हैं, जबतक सबके आश्रयभूत परम तत्व (परब्रह्म परमात्मा) की प्राप्ति नहीं होती।

परमतत्व का ज्ञान हो जाने पर मनुश्य जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है। निद्रा और आलस्य साधना का बहुत बड़ा विध्न है। इस शत्रु को यत्नपूर्वक जीतकर सुखद आसन पर आसीन हो प्रतिदिन शब्दब्रह्म का अभ्यास करना चाहिये। सौ वर्ष की अवस्था वाला वृद्ध पुरूष आजीवन इसका अभ्यास करे तो उसका शरीर रूपी स्तम्भ मृत्यु को जीतने वाला हो जाता है और उसे प्राणवायु की शक्ति को बढ़ाने वाला आरोग्य प्राप्त होता है।

वृद्ध पुरूष में भी शब्द ब्रह्म के अभ्यास से होने वाले लाभ का विश्वास देखा जाता है, फिर तरूण मनुश्य को इस साधना से पूर्ण लाभ हो, इसके लिये तो कहना ही क्या है। यह शब्द ब्रह्म न ओंकार है न मंत्र है, न बीज है, न अक्षर है। यह अनाहत्नाद (बिना आहत् के अथवा बिना बजाये ही प्रकट होने वाला शब्द) है। इसका उच्चारण किये बिना ही चिंतन होता है। यह शब्दब्रह्म परम कल्याणमय है। प्रिय! शुद्ध बुद्धि वाले पुरूष यत्न पूर्वक निरंतर इसका अनुसंधान करते हैं। अतः 9 प्रकार के शब्द बताये गये हैं। जिन्हें प्राणवेत्ता पुरूषों ने लक्षित किया है। मैं उन्हें प्रयत्न करके बता रहा हूँ। उन शब्दों को नाद्सिद्धि भी कहते हैं। वे शब्द क्रमशः इस प्रकार हैं-

घोष, कांस्य (झांझ आदि), शृंग (सिगा आदि), घंटा, वीणां आदि, बांसुरी, दुन्दु भी, शंख, नवां मेघ गर्जन- इन 9 प्रकार के शब्दों को त्याग कर तुंकार का अभ्यास करें। इस प्रकार सदा ही ध्यान करने वाले योगी पुण्य और पापों से लिप्त नहीं होते। देवी! योगाभ्यास के द्वारा सुनने का प्रयत्न करने पर भी जब योगी उन शब्दों को नहीं सुनता और अभ्यास करते-करते मरणासन्न हो जाता है, तब भी वह दिन-रात उस अभ्यास में ही लगा रहे। ऐसा करने से सात दिनों में वह शब्द प्रकट होता है, जो मृत्यु को जीतने वाला है। देवी! वह शब्द 9 प्रकार का है। उसका मैं यथार्थ रूप से वर्णन करता हूँ।

पहले तो घोषात्मक नाद् प्रकट होता है, जो आत्म शुद्धि का उत्कृष्ठ साधन है। वह उत्तम नाद् सब रोगों को हर लेने वाला तथा मन को वशीभूत करके अपनी और खींचने वाला है।

दूसरा कांस्य-नाद है, जो प्राणियों की गति को स्तम्भित् कर देता है। वह विष, भूत और ग्रह आदि सबको बांधता है- इसमें संशय नहीं है।

तीसरा श्रृग नाद् है, जो अभिचार से सम्बन्ध रखने वाला है। उसका शत्रु के उच्चाटन और मारण में नियोग एवं प्रयोग होता है।

चैथा घंटा नाद् है, जिसका साक्षात् परमेश्वर शिव उच्चारण करते हैं। वह नाद् सम्पूर्ण देवताओं को आकर्षित कर लेता है, फिर भूतल के मनुष्यों की तो बात ही क्या है। यक्षों और गंघर्वो की कन्यायें उस नाद् से आकर्षित हो योगी को उसकी इच्छा के अनुसार महासिद्धि प्रदान करती हैं तथा उसकी अन्य कामनायें भी पूर्ण करती हैं।

पांचवा नाद् वींणा है, जिसे योगी पुरूष ही सदा सुनते हैं। देवी! उस वींणा नाद् से दूर दर्शन की शक्ति प्राप्त होती है। वंशी नाद् का ध्यान करने वाले योगी को सम्पूर्ण तत्व प्राप्त हो जाता है।

दुंदुभी नाद् का चिंतन करने वाला साधक जरा और मृत्यु के कष्ट से छूट जाता है। देवेश्वरी्! शंख नाद् का अनुसंधान होने पर इच्छा अनुसार रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। मेघ नाद् के चिंतन से योगी को कभी विपत्ति का सामना नहीं करना पड़ता। वरानने! जो प्रतिदिन एकाग्र चित्त से ब्रह्म रूपी तुंकार का ध्यान करता है, उसके लिये कुछ भी असाध्य नहीं होता।

उसे मनोवांछित सिद्धि प्राप्त हो जाती है। वह सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और इच्छानुसार रूपधारी होकर सर्वत्र विचरण करता है, कभी विकारों के वशीभूत नहीं होता। वह साक्षात् शिव ही है- इसमें संशय नहीं है। परमेश्वरी! इस प्रकार मैने तुम्हारे समक्ष शब्दब्रह्म के नवधा स्वरूप का पूर्णतया वर्णन किया है।

 

जीवन संचालन करने वाले मुख्य पाँच भौतिक तत्व

जीवन संचालन करने वाले मुख्य पाँच भौतिक तत्व धरती पर जीवन का संचालन करने वाले मुख्य पाँच भौतिक तत्व ही हैं-

  1. पृथ्वी
  2. अग्नि
  3. आकाश
  4. जल
  5. वायु

इन सबसे मिलकर यह सारा ब्रह्माण्ड बना है। हमारा शरीर भी पंचभूत है इन्हीं पांच तत्त्वों से भरपूर जीवन में मनुष्य वास्तु में इन पांचों तत्वों को संतुलित करके ही सुख समृद्धि तथा शांति प्राप्त कर सकता है लेकिन इन पांचों तत्वों में से एक भी तत्त्व की कमी हो तो हानि, रोग, शोक आदि का मुंह देखना पड़ता है। प्राचीनकाल में हमारे भवन का निर्माण करने वाले राज मिस्त्रियों को वास्तु का बहुत ज्ञान था। जहां मनुष्य, वास करता है। उसी का नाम वास्तु है, सुखी समृद्धि एवं सुखमय जीवन यापन करने के लिए वास्तु के नियमों का पालन अवश्य करना चाहिये।

पिरामिडोलॉजी’ नामक एक विशुद्ध विज्ञान का विकास प्राचीनकाल में इसी उद्देश्य के लिये हमारे ऋषियों के द्वारा किया गया है। आज इसके प्रवक्ताओं का मत है कि पिरामिडों के विशिष्ट आकार प्रकार में ‘अलौकिक शक्ति’ छिपी पड़ी है। इनकी आकृति इतनी मायावी है कि उसे निखिल ब्रह्माण्ड का मानव कृत लघु संस्करण कहा जा सकता है। इनमें ‘सूक्ष्म ब्रह्माण्डीय ऊर्जा’ का बहुलता से एकत्रीकरण होता रहता है। जो जीवित तथा निर्जीव पदार्थों को प्रभावित किए बिना नहीं रहती।

पिरामिडनुमा भवन चाहे वह चैकोर हो अथवा गोलाकार, विभिन्न प्रकार की ब्रह्मंडीय तरंगों को आकर्षित कर अपना प्रभाव मानव शरीर और मन पर अवश्य डालते हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि सभी पिरामिड उत्तर-दक्षिण एक्सिस पर बने हैं। यह भी एक वैज्ञानिक रहस्य है जो बताता है कि भू चुम्बकत्व एवं ब्रह्मांडीय तरंगों का इस विशिष्ट संरचना से निश्चय ही कोई संबंध है। उत्तर-दक्षिण गोलाद्धों को मिलाने वाली रेखा पृथ्वी की चुम्बकीय रेखा है। चुम्बकीय शक्तियाँ विद्युत तरंगों से सीधी जुड़ी हुई हैं जो यह दर्शाती हैं कि ब्रह्मांड में बिखरी मैग्नेटोस्फीयर में विद्यमान चुम्बकीय किरणों को संचित करने की अभूतपूर्व क्षमता पिरामिड में है। यही किरणें एकत्रित होकर अपना प्रभाव अंदर विद्यमान वस्तुओं या जीवधारियों पर सकारात्मक रूप से डालती हैं। इन सभी पिरामिडों का प्रयोग यदि आज की आवश्यकता के अनुरूप किया जाये तो मनुष्य अवश्य इनसे अनेक लाभ उठा सकता है।

 

आत्मा की सत्ता

आत्मा की सत्ता महर्षि पातांजलि के अनुसार वासनाओं के अनुसार ही अगले जन्म में नया शरीर प्राप्त होता है। डार्विन का कहना है कि कामनाओं की पूर्ति के निमित्त जीवधारियों के शरीर में परिवर्तन होता रहता है और एक पीढ़ी का परिवर्तन दूसरी पीढ़ी को उत्तराधिकार के रूप में मिलता है। इस प्रकार परिवर्तन होते-होते एक योनि दूसरी योनि में परिवर्तित हो जाती है। अपने मत की पुष्टि में अफ्रीका के पशु जिराफ का उदाहरण देते हैं, जिनकी गर्दन इसलिये बहुत लंबी हो गई है कि अफ्रीका के वृक्ष बहुत ऊंचे होते हैं और उसकी पत्तियाँ खाने के लिये उन्हें अपनी गर्दन बहुत अधिक उठानी पड़ती थी। प्रत्यक्ष भी देखने में आता है कि काम-क्रोध, भय, शोक, लोभादि का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ता है, जिसका एक सूक्ष्म अंश स्थायी परिवर्तन छोड़ देता है। यही कारण है कि अनुभवी लोग मनुश्य की आकृति को देखकर बहुत ऊँचे स्वभाव एवं चरित्र का पता लगा लेते हैं।

कामना और शरीर का संबंध एक प्रकार से समझ में आता है। जीवन में जो कुछ भी हमें अपनी कामनाओं के अनुकल प्राप्त होता है, उसे ही हम रखने का प्रयत्न करते हैं और जो कुछ ऐसा प्राप्त होता है जो हमारी कामनाओं में बाधक हो, उसे हटाने का प्रबंध करते हैं और जो कामनाओं की पूर्ति में न तो सहायक है न बाधक उसकी ओर हमारी दृष्टि तटस्थता की होती है अब शरीर को लीजिये इसे न तो हम त्यागना चाहते हैं और न इसकी ओर तटस्थ हैं। यही नही, इसके छूट जाने की कल्पना तक से हम सिहर उठते हैं। अतः सिद्ध हुआ कि हमारा शरीर हमारी कामनाओं के अनुरूप ही है। पातांजलि और डार्कवन दोनों के अनुसार कामना कारण है और शरीर कार्य। प्रत्यक्ष देखने में आता है कि मृत्युकाल तक हमारी वे कामनायें नष्ट नहीं होती, जो एक शरीर के बिना पूरी नही हो सकती तो फिर जिस प्रकार एक घर के नष्ट हो जाने पर यदि वे कामनायें नष्ट नहीं हुई, जिनकी पूर्ति एक घर के बिना असंभव है, एक वस्त्र के बिना असंभव है, तो हम अपनी आवश्यकता, सामथ्र्य और परिस्थितियों के अनुसार नया घर अथवा नये वस्त्र को प्राप्त होते हैं।

उसी प्रकार एक शरीर छूट जाने पर यदि हमारी कामनायें नहीं छूटी, जिनकी पूर्ति एक शरीर के बिना असंभव है, तो हम अपनी वासना, सामथ्र्य और परिस्थितियों के अनुसार एक नया शरीर धारण करते हैं। जब तक कारण नष्ट नहीं हुआ, कार्य नष्ट नहीं हो कर वह अपना रूप बदलता रहता है। शरीर और वासना का संबंध समझ लेने के पश्चात् हम यह भी जान सकते हैं कि अगले जन्म में किसे कौन सी योनि प्राप्त होगी। जो लोग अति कामुक हैं उन्हें बंदर या चिड़े की योनि प्राप्त होनी चाहिये; क्योकि मानव शरीर में इतने काम सेवन की क्षमता नहीं है। इसलिये अत्यंत क्रोध वालों के लिये हम सर्प योनि की भविष्यवाणी कर सकते हैं।

एक वस्त्र छूट जाने पर दूसरा वस्त्र धारण करने तक के बीच का जो समय निर्वस्त्रता का है, वैसा ही एक शरीर छूट जाने पर दूसरा शरीर प्राप्त होने के बीच का समय प्रेतावस्था का है। पर आजकल विकासवादी धूम है। शरीर रचना में वासना के महत्व को स्वीकार करते हुये भी विकासवाद पुनर्जन्म को नही मानता । विकासवादी शरीर से भिन्न आत्मा की सत्ता स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार जड़ के एक विशेष संयोग से चेतन उत्पन्न हो जाता है और शरीर के नष्ट होने के साथ-साथ वह भी नष्ट हो जाता है। अतः पुनर्जन्म या परलोक का भी कोई प्रश्न नहीं उठता। हम पुनर्जन्मवादी इसमें केवल इतना स्वीकार करते हैं कि जड़ के विशेष प्रकार के संयोग में विशेष प्रकार की आत्मा को आकर्षित करने की शक्ति आ जाती है परंतु वह संयोग आत्मा को उत्पन्न कर देता है-

हम यह स्वीकार नहीं कर सकते । गुड़ में मक्खी को आकर्षित करने की शक्ति है। वह मक्खी को उत्पन्न नही कर सकता । यदि चेतन की उत्पत्ति केवल जड़ और परिस्थितियों पर ही निर्भर है तो एक ही परिस्थिति में उसी जड़ का केवल एक अंश ही मनुश्य क्यों बना? दूसरा वनस्पति बनकर क्यों रूक गया ? तीसरा केवल मछली तक और चैथा केवल वानर तक ही क्यों पहुंच पाया और पांचवाँ आज भी क्यों जड़ है? एक उद्योगशाला में एक ही परिस्थिति में एक से कच्चे माल से जो पदार्थ निर्मित होते हैं, वे एक से होते हैं, जबकि क्रमिक विकास की सृष्टि में ऐसा नही है। यहाँ तक कि मानव योनि में भी कोई दो व्यक्ति ऐसे नही मिलेंगें, जिनके अंगूठों की छाप तक एक जैसी हो। अतः मानना पड़ेगा कि जीवधारियों के पारस्परिक भेद का कारण परिस्थिति विकासवाद और वंशानुक्रम के अतिरिक्त कुछ और भी है।

जिस क्षेत्र में मानव का अवतरण हो चुका है।, वहाँ बंदर अब भी रहते हैं। अतः मानना पड़ेगा कि जो वानर मनुश्य बन गये, वे विशेष प्रकार के वानर थे और इन वानरों से भिन्न थे, जो मानव नहीं बन पाये और जो आगे चलकर मानव बनने का कोई लक्षण उनमें आज भी पाया जाता है इसी प्रकार जो जड़ मछली बना और जो मछली वानर बनी, वह आज के जड़ और मछली से नितांत भिन्न थे। नही तो क्या कारण है कि हमारा वर्तमान जड़ मछली और आज की मछली वानर नहीं बन सकी। प्रकृति में इतनी विषमता क्यों हुई कि उसकी क्रमिक विकास की चेष्टा का कुछ तो प्रभाव हुआ और कुछ पर नही और जिन पर हुआ उन पर भी एक सा नही ? यदि सारा ही जड़ मानव बन जाये तो मानव क्या एक दूसरे को खायेगा? क्रमिक विकास के साथ साथ प्रकृति की यह चेष्टा भी देखने को मिलती है कि जड़ वनस्पति, जलचर, नभचर, वनचर और मानव में एक उचित संतुलन रखा जाये, नहीं तो विकास का अर्थ विनाश होगा। अतः मानना पड़ेगा कि इस क्रमिक विकास के पीछे भी किसी चेतन सत्ता का हाथ है जड़वादी यह बतलाने में असमर्थ हैं कि यदि पृथ्वी पर भी वे परिस्थितियाँ उत्पन्न न हुई होती जो क्रमिक विकास का कारण बनी और सारी पृथ्वी जड़ पड़ी रहती जैसा कि बहुत से ग्रह अब भी पड़े हुये हैं तो क्या हानि थी? मनुश्य का अवतरण जैसी एक भीषण क्रांति जो आगे चलकर सारी क्रान्तियों का कारण बनी -क्या एकमात्र संयोग की बात है? क्या इस विकास में मनुश्य का अपना कुछ कर्तव्य नहीं है? क्या यह सब निरूद्देश्य है? यदि ऐसा ही है तो फिर मनुश्य जीवन में ही उद्देश्य की स्थापना क्यों की जाये? जब मानव जड़ का ही एक रूप है तो मानव जीवन की महत्ता ही क्या रही? जब मानव को यह शरीर उसके पूर्वजन्मकृत सुकृत का फल न होकर केवल संयोगवश प्राप्त हुआ है तो उससे यह छीन लेने में कौन सा पाप है?

परलोकवाद को न मानने वाले और नैतिकता के समर्थक यह कहा करते हैं कि मनुश्य को अपने पाप पुण्यों का फल इसी जन्म में मिल जाता है। ऐसा भी हो तो इतना तो वे भी स्वीकार करेंगें कि हमें अपने पाप पुण्य का फल तत्काल नहीं मिलता। परिस्थिति व दूसरों की चेष्टा के अतिरिक्त इसमें हमारी चेष्टा भी एक बहुत बड़ा कारण होती है। प्रयत्न करने पर हम अपने पाप कर्मों के फल को कुछ और समय तक के लिये टाल सकते हैं तो जीवन पर्यंत भी टाल सकते हैं। केवल परलोकवादी ही धर्म पर स्थिर रह सकता है; क्योंकि वह समझता है कि यदि पाप कर्म का फल आजीवन टाल भी दिया तो उसे परलोक या अगलेे जन्म में भोगना पड़ेगा।

अतः वह पाप करने का और यदि पाप बन गया तो उसके फल को टालने का प्रयत्न नहीं करता जबकि जड़वादी की सारी चेष्टा यही रहती है कि जिन पापों से अपने स्वार्थ की पूर्ति होती है। उन्हें इस प्रकार करो कि जिससे उनका फल न भोगना पड़े। इसी प्रकार पुण्यकर्म करने के बाद उसका फल प्राप्त करने के लिये भी जड़वादी बहुत उतावला रहता है क्यो कि पुण्य कर्म का फल भी तत्काल नहीं मिलता। जड़वादी समझता है कि यदि इसी बीच में मेरी मृत्यु हो गई तो वह पुण्यकर्म निष्फल गया। परलोक वादी ऐसा नहीं मानता । वह समझता है कि इस जन्म में न सही अगले जन्म में फल अवश्य मिलेगा। नैतिक आचरण के पक्ष में जड़वादियों का कहना है कि हमंे जनता को यह समझाना चाहिये कि हमारे पाप पुण्यों के कर्मों का फल हमें भले ही न मिले, वह हमारे समाज, जाति, राष्ट्र, मानवता व भावी पीढि़यों को अवश्य प्राप्त होगा।

यह ठीक है कि कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति कर्म करते समय उसके परिणाम को न केवल व्यक्तिगत, अपितु पारिवारिक, सामाजिक जातीय, राष्ट्रीय व भावी पीढि़यों की दृष्टि से भी सोचता है; परंतु हमें यह नहीं भूल जाना चाहिये कि ये सारे पारिवारिक सामाजिक, जातीय, राष्ट्रीय व भावी पीढ़ीगत स्वः-व्यक्तिगत स्वः के ही विस्तार हैं और जब तक मनुश्य की समझ में यह न आ जाये कि उसके पाप पुण्य कर्मो का फल उसके व्यक्तिगत स्वः को भी अवश्य प्राप्त होगा, तब तक नैतिकता के लिये कोई भी सुदृढ़ आधार नहीं मिलता। जड़वाद नहीं, परलोकवाद ही व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक जातीय, राष्ट्रीय मानवतागत व भावी पीढ़ीगत सभी ‘स्व’ में समन्वय स्थापित करता है और बतलाता है जो बात विशाल से विशालतर सबके लिये लाभदायक है। इस प्रकार आत्मा और परलोक का अस्तित्व न मानने से नैतिकता की जड़ें हिल गयी हैं।

जब मानव जड़ का ही एक रूप है तो फिर जड़ से अधिक उसका महत्व क्यों? रही सुसंस्कृत मन की बात तो सुसंस्कृत मन तो वही कहा जायेगा जो सारे विश्व को ‘सीयाराममय’ जानकर युगपत नमस्कार करता है, न कि वह अपने को भी जड़वाद मानकर चलता है। एक विकासवादी भावी पीढ़ी की भी चिंता क्यों करें? जब हमारे पूर्वज जड़, मत्स्य और वानरों ने भावी पीडि़यों की कोई चिंता किये बिना और न इनमें इस प्रकार की चिंतन की कोई क्षमता ही थी, अपनी भावी पीढि़यों को मानव बनाकर दिखला दिया तो हम भावी पीढि़यों की चिंता कर इससे भी अधिक अच्छे परिणाम दिखला सकेगें? जीवन में सबसे महत्वपूर्ण घटना हमारा अपना जीवन है। व्यक्तिगत दृष्टि से और सामूहिक दृष्टि से मनुश्य का पृथ्वी पर अवतरण।

यदि जन्म नहीं तो, कुछ भी नही और यदि पृथ्वी पर मानव अवतरित न हुआ होता तो। और यही जन्म हमारे अपने पाप पुण्य का फल न होकर केवल संयोगमात्र है और यही पृथ्वी पर मानव का अवतरण उसके पूर्वजों की योजना तथा पुरूषार्थ का परिणाम न होकर प्रकृति की एक चेष्टा मात्र है तो हमारे सारे पुरूषार्थ एवं प्रयास का क्या मूल्य रह जाता है? इस प्रकार जड़वाद की पुरूषार्थ से संगति नही बैठती। फिर यह जड़वाद यह भी नहीं बतलाता कि जब अनादि काल से सृष्टि जड़ चली आ रही थी तो यकायक यह रचना क्यों आरंभ हो गई। क्या पहले भी ऐसी कोई रचना आरंभ होकर नष्ट हुई है? नष्ट नहीं हुई तो वह कहां है और यह विकास कब तक चलता रहेगा? इसकी कोई अंतिम परिणति है या नही, तो वह क्या है। विकासवाद अंतिम सत्य नहीं है। अधिक से अधिक वह एक देशीय सत्य हो सकता है। अंतिम दर्शन तो भारतीय दर्शन है। जिसमें उचित स्थान विकासवाद को भी मिला है और आत्मा एवं शरीर की पृथक सत्ता व पुनर्जन्म सभी भारतीय मनीषियों ने स्वीकार किया है और हमारे आचार्यो के अतिरिक्त अनेक महापुरूषों और जातियों ने, जिनमें से कुछ के नाम नीचे दिये जाते हैं-

 

  1. पाईथागोरस प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक एवं गणितज्ञ।
  2. हेनरी फार्ड प्रसिद्ध अमेरिकन धनकुबेर एवं उद्योगपति।
  3. गाल जाति वर्तमान आयरलैण्ड वासियों के पूर्वज। इनमें सती की प्रथा भी थी।
  4. इंग्लैण्ड के वेल्स प्रदेश के निवासियों के पूर्वज जो पुनर्जन्म, निर्वाण वेदांत, ज्योतिष और देवी देवताओं तथा यज्ञ में विश्वास रखते थे। इनका कहना था कि

ष् लवन सपअमक दक कपमक उंदल जपउमे नदजपस लवन मतम मक बसमंद व नउंद पससे दक उमदजंस पउचनतपजलण्ष्

जब तक मनुश्य पाप और वासनाओं से मुक्त नही हो जाता तब तक वह बार-बार जन्म मरण को प्राप्त होता रहता है। यह जाति बड़ी विद्याव्यसनी थी। इनके बड़े-बड़े पुस्तकालय एवं विद्यालय थे। लगभग 4000 वर्ष तक इस जाति की तूती बोली। जब रोमन लोगों ने (60 ई0 पू0 लगभग) इन पर आक्रमण करके इनके पुस्तकालय तथा विद्यालय फूक डाले और इनका हत्याकांड आरंभ कर दिया तो वे नार्वे तथा आइसलैंड भाग गये। ये लोग अब से 6000 वर्ष पूर्व दक्षिणी एशिया से चलकर मिश्र, यूनान, फ्रांस होते हुये इंग्लैंड पंहुचे थे।

संतान प्राप्ति के लिये शास्त्रीय उपाय ‘संतानगोपाल मंत्र

संतान प्राप्ति के लिये शास्त्रीय उपायों में ‘संतानगोपाल मंत्र’ की साधना अत्यंत प्रभावशाली है। अतः संतान की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस मंत्र का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये। इस मंत्र का जप दो प्रकार से किया जाता है। एक बीज सहित और दूसरे बिना बीज मंत्र के। बीज सहित मंत्र शीघ्र फलदायी होता है। किन्तु इसे गुरू से दीक्षा लिये हुये व्यक्ति को ही करना चाहिये, बिना बीजाक्षरों के कोई भी कर सकता है। आगे बीज सहित संतानगोपाल मंत्र के अनुष्ठान की विधि दी जा रही है। यदि पाठक स्वयं न कर सके तो किसी विद्वान ब्राह्मण से यह अनुष्ठान करवा सकते हैं। इस मंत्र की सम्पूर्ण जप संख्या 100000 (एक लाख मंत्र) है। उसका दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण और तर्पण का दशांश मार्जन करना चाहिये। यदि बिना बीज मंत्र के साधक स्वयं जप करता है तब चैगुना संख्या में जप करने का शास्त्र निर्देश है। सर्वप्रथम निम्नांकित वाक्य पढ़कर विनियोग करे- अस्य श्रीसंतान गोपाल मंत्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छंद्ः, श्रीकृष्णो देवता, ग्लौं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अंगन्यास- ‘देवकीसुत गोविंद’ हृदयाय नमः (इस वाक्य की बोलकर दाहिने हाथ की मध्यमा, अनामिका और तर्जनी अंगुलियों से हृदय का स्पर्श करें)। ‘वासुदेव जगत्पते’ शिरसे स्वाहा’ (इस वाक्य को बोलकर सिर का स्पर्श करें)। ‘देहि में तनयं कृष्ण’ शिखयै वषट् (इस वाक्य को बोलकर दाहिने हाथ के अंगुठे से सिर का स्पर्श करें)। ‘त्वामहं शरणं गतः’ ( इस वाक्य को बोलकर दाहिनी हाथ के पाँचों उंगलियों से बायीं भुजा का एवं बायीं हाथ की पाँचों उंगलियों से दाहिनी भुजा का स्पर्श करें)। ‘ऊँ नमः’ अस्त्राय फट् (इस वाक्य को बोलकर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से पीछे की ओर ले जाकर दाहिनी ओर से आगे कि ओर ले आय और तर्जनी तथा मध्यमा उंगुलियों से बाँय हाथ की हथेली पर बजायें।

इसके पश्चात् निम्नांकित रूप से ध्यान करें-

 

वैकुण्ठाद्गतं कृष्णं रथस्थं करूणानिधिम्।

किरीटिसारथि पुत्रमानयंत्र परात्परम्।। 1 ।।

आदाय तं जलस्थं च गुरूवे वैदिकाय च।

अर्पयंतं महाभागं ध्यायेत् पुत्रार्थमच्यृतम्।। 2 ।।

‘पार्थसारथि अच्युत भगवान् श्रीकृष्ण करूणा के सागर हैं। वे जल में डूबे हुए गुरू पुत्र को लेकर आ रहें है। वे वैकुण्ठ से अभी-अभी पधारे हैं और रथ पर विराजमान हैं। अपने वैदिक गुरू सांदीपनि को उनका पुत्र अर्पित कर रहें है- साधक पुत्र की प्राप्ति के लिए इस रूप में महाभाग भगवान् श्रीकृष्ण का चिंतन करें’।

मूल मंत्र (बीज सहित) –

ऊँ श्रीं ह्नीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः।।’

इस मंत्र का भावार्थ इस प्रकार है- सच्चिदानंद स्वरूप, ऐश्वर्यशाली, कामनापूरक, सौभाग्य स्वरूप, देवकीनंदन! गोविंद! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरण में आया हुँ, आप मुझे पुत्र प्रदान करें।

आगे संतान गोपाल मंत्र बिना बीज मंत्र के भी दिया जा रहा है जिसे कोई भी साधक संकल्प लेकर स्वयं ही कर सकता है।

संतानगोपाल मंत्र- 2

विनियोग

अस्त श्रीसंतानगोपालमंत्रमंत्रस्य ब्रह्म ऋषिर्गायत्रीच्छंदः, श्रीकृष्ण देवता, क्लीं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अंगन्यास-

ग्लौं हृदयाय नमः। क्लीं श्शिरसे स्वाहा। ह्नीं शिखायै वषट्। श्रीं कवचाय हुम्। ऊँ अस्त्राय फट्।

ध्यान-

यांखचक्रगदापह्मं दधानं सूतिकागृहे।

अंके शयानं देवक्याः कृष्णं वंदे विमुक्तये।।

जो सूतिकार गृह में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये माता देवकी की गोद में सो रहें हैं, उन भगवान् श्री कृष्ण की मैं (संतान रूप में ) मोक्ष की प्राप्ति के लिए वन्दना करता हूँ।

बिना बीज का मूल मंत्र इस प्रकार है-

ऊँ नमो भगवते जगदात्मसूतये नमः’

(सम्पूर्ण जगत् जिनकी अपनी संतान है, उन भगवान् श्री कृष्ण को नमस्कार है) इसका चार लाख जप करना चाहिए।

 

दण्डाधिकारी शनिदेव

दण्डाधिकारी शनिदेव शनिदेव की चित्र-विचित्र विशिष्टताओं की व्याख्या करने के लिये अनेकानेक प्रसंग प्राचीन भारतीय साहित्य में उपलब्ध होते हैं इनके द्वारा क्रूर तथा अनुकूल फल देने वाले शनि ग्रह की सामथ्र्य का पता चलता है। शनि के स्वरूप को यमझने के लिये इन पुराण के आख्यानों का उल्लेख आवश्यक है। इनसे ज्ञात होता है कि शनि ने ईश्वरीय अवतारों से लेकर चक्रवर्ती सम्राटों तक को अपनी विशेष ऊर्जा से विचलित किया है।

परब्रह्म के रूवरूप- ब्रह्मा-विष्णु-महेश में भूतभावन भगवान् शंकर ने सृष्टी के संहार अथवा विसर्जन का दायित्व ग्रहण किया है। सृर्ष्टि के समस्त जीवधारियों को आचरण के अनुरूप अनुशासित करना बहुत कठिन कार्य था। इस वृहत्तर कार्य में अपनी सहायता हेतु भगवान् शिव ने सहयोगी गणों को जब अपने साथ लिया था प्रायः इसी समय छाया के गर्भ से भगवान् भास्कर के 9 पुत्रों ने जन्म लिया था। इन 9 पुत्रों में शनि एवं यम की भयोत्पादक गतिविधियाँ विस्मयकारी थी। इनके प्रचण्ड बाहुबल से दैवी शक्तियाँ अत्यंत प्रभावित थीं। परिणामतः कल्याण तथा विध्वंस के देव भवान शंकर ने इन्हें अपनी सेवा में ग्रहण कर लिया। शनिदेव को शिव द्वारा कर्मानुसार दण्ड प्रदान करने का अधिकार प्राप्त हुआ। यम मृत्यु के निमित्त नियुक्त हुए। इस पुराणगाथा में शनि के कारकत्व से संबधित अनेक सूक्ष्म संकेत उपलब्ध होते हैं। साथ ही शनि-उपचार में शिवोपासना का माहात्म्य भी रेखांकित होता है।

भगवान् सूर्य के नौ पुत्रों में अपनी भीषणता के लिए शनि सर्वोपरि हैं। कृष्ण वर्ण यमुना शनि की सहोदरा और कालनियन्त्रक यम शनि के अनुज हैं। शनि की रूक्षता का कारण उनका विचित्र परिवार भी है। पुराण कथाओं के अनुसार सन्तानों के योग्य होने पर सूर्य ने प्रत्येक सन्तान हेतु एक-एक लोक की व्यवस्था की। किन्तु प्रकृति से पापप्रधान ग्रह शनि अपने एक लोक के अधिपत्य से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने समस्त लोकों पर आक्रमण करने की योजना तैयार की। सूर्य को शनि की भावना से अत्याधिक पीड़ा हुई। किन्तु उनके परामर्श का शनि पर कोई प्रभाव नहीं पडा। अन्ततः सूर्य ने भगवान् शिव से आतुर निवेदन किया। भक्तभयहारी शिव ने तब उद्दण्ड शनि को चेतावनी दी। शनि ने जब उपेक्षा की तो शिव-शनि युद्ध प्रारम्भ हुआ। शनि ने अदभुत पराक्रम से नन्दी तथा वीरभद्र सहित समस्त शिवगणों को परास्त कर दिया। अपने सैन्यबल का संहार देखकर शिव कुपित हो गये। उन्होंने प्रलयंकारी तृतीय नेत्र खोल दिया। शनि ने भी अपनी मारक दृष्टि का संधान किया। शिव और शनि की द्रिष्टियों से उत्पन्न एक अप्रतिम ज्योति ने शनि लोक को आच्छादित कर लिया।

तत्पश्चात भगवान् शंकर ने क्रोधित होकर शनि पर त्रिशूल से प्रहार किया। शनि यह आघात सहन नहीं कर सके। वह संज्ञासून्य हो गये। पुत्र की यह स्थिति देखकर सूर्य का पुत्रमोह जाग उठा। भगवान् आशुतोष से उन्होंने शनि के जीवन रक्षण हेतु भावभरा निवेदन किया आशुतोष ने प्रसन्न होकर शनि के संकट को हर लिया इस घटना से शनि ने भगवान् शिव की सर्वसमर्थता स्वीकार कर ली। उन्होंने शिव से पुनः पुनः क्षमायाचना की। शनि ने यह भी इच्छा व्यक्त की कि वह अपनी समस्त सेवायें शिव को समर्पित करना चाहते हैं। प्रचण्ड पराक्रमी शनि के रणकौशल से अभिभूत भूतभावन भगवान् भोले नाथ ने शनि को अपना सेवक बना लिया। शिव ने शनि को दण्डाधिकारी नियुक्त किया।

 

फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या

फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या है जो आज पूरे विश्व में छाई हुई है फैंगशुई का अर्थ है विन्ड वॉटर (हवा और पानी) हवा ऊर्जा को चारों ओर वितरित करती है और पानी संचित करती है। ये दोनों ऊर्जाएं मनुष्य के जीवन पर प्रभाव डालती है अच्छी ऊर्जा (च्वेपजपअम म्दमतहल) उस परिवेश में रहने वालों को अच्छा स्वास्थ्य शांति तथा समृद्धि प्रदान करती हैं। फैंगशुई को अपनाकर इस नकरात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के लिए क्र्योस (उपाय) का सहारा लेते हैं।

वास्तव में यह एक जीवनशैली (लाइफ स्टाइल) है जो पूर्ण रूप से हमारे जीवन से जुड़ी हुई है हमारे आस-पास की चीजों का स्थान परिवर्तन करके जीवन में सुधार लाया जा सकता है। फैंगशुई को चीन की वास्तुकला भी कहते हैं। हजारों वर्षो से चीन के लोग वातावरण में मौजूद इन सकारात्मक एवं नकारात्मक शक्तियों का सफलता पूर्वक प्रयोग करके व उन्हें ठीक दिशा में प्रवाहित करके उनके माध्यम से अपने जीवन में खुशहाली प्राप्त करने में सफल रहे हैं।

यदि आप भी अपने आस-पास की वस्तुओं को ठीक जगह पर स्थापित कर लें जो प्रकृति के साथ अच्छा तालमेल बिठाने में समर्थ होंगे। दोषपूर्ण फैंगशुई जीवन में असामंजस्यता तथा परेशानियों का कारण हो सकती है। वास्तुशास्त्र के अनुसार भवन निर्माण से पहले दिशाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है या निर्मित भवन को तोड़कर उसमें सुधार लाया जा सकता है जबकि फैंगशुई में आप सिर्फ अपने आस-पास की वस्तुओं को ठीक जगह स्थापित करके या क्योर लगा कर इसका लाभ उठा सकते है सही दिशा में संबंधित क्योर लगाकर हम उस दिशा से संबंधित परेशानियों का निवारण कर सकते हैं।