रावण संहिता

रावण संहिता रावणसंहिता क्या है? भारतीय प्राचीन विधाओं में जिन विषयों से सम्बन्धित पुस्तकों के प्रति तंत्र-मंत्र में रूची रखने वाले विशेष पाठक विशेष रूप से लालयित रहते हैं, रावणसंहिता उनमें से एक है। रावणसंहिता दशानन महाविद्वान रावण की वह अमर रचना है जिस का उपदेश उसे भगवान शिव के द्वारा दिया गया था। अर्थात् रावणसंहिता में लंकेश रावण द्वारा भगवान शिव से प्राप्त तंत्र-मंत्र-यंत्र का गुप्त दुर्लभ ज्ञान संकलित किया गया है। अधिकांश लोग इसे इन्द्रजाल’ के नाम से ही जानते हैं। इसमें संकलित तंत्र-मंत्र आदि कामना पूर्ति कारक प्रयोगों के उत्कीलन की आवश्यकता नहीं होती। क्योकि भगवान शिव ने कहा है-

ब्राह्मण काम क्रोध वश रहेऊ। त्यहिकारण सब कीलित भयऊ।।

कहौ नाथ बिन कीलेमंत्रा। औरहु सिद्ध होय जिमिमंत्रा।।

देखा जाये तो रावणसंहिता में तंत्र के शट्कर्मो जैसे शान्ति कर्म, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन एवं मारण कर्मो में किये जाने वाले विविध प्रकार के तंत्र-मंत्र-यंत्र से संबंधित प्रयोगों का विवरण दिया गया है। यह ग्रन्थ अलग-अलग लेखकों एवं प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित इन्द्रजाल नामक पुस्तक के रूप में उपलब्ध है। इस ग्रंथ में शिव रावण वार्ता के दौरान भगवान शिव द्वारा बताये गये तांत्रिक प्रयोगों का समावेश किया गया है। इसी लिये रावणसंहिता (इन्द्रजाल) को कौतुक रत्न कोष भी माना जाता है। क्योंकि इसमें दिये गये प्रयोग आश्चर्य जनक परिणाम प्रदान करते हैं। तंत्र-मंत्र-यंत्र के प्रयोगों के अतिरिक्त इस ग्रंथ में रसायन शास्त्र और औषधि विज्ञान के चमत्कार भी वर्णित हैं। क्योकि लंकेश रावण औषधि विज्ञान के भी महान ज्ञाता थे। इस ग्रंथ को अनेक प्रकाशकों ने अलग-अलग ढ़ंग से प्रकाशित किया है। किसी-किसी ने तो इसमें मदारियों द्वारा दिखाये जाने वाले खेल और हाथ की सफाई से किये जाने वाले जादू के खेलों का संकलन भी इन्द्रजाल में कर दिया है।

और किसी अन्य ने इन्द्रजाल में औद्योगिक उपयोग के नुस्खे भी बताये हैं। वास्तव में रावणसंहिता में कुछ ऐसी तंत्र-मंत्र की रहस्यमयी जानकारीयाँ दी गईै हैं जिनमें से कुछ का प्रयोग आज के युग में वर्जित है। इस ग्रंथ का मूल नाम बदलने का कारण यह कहा जाता है कि आज से लगभग 100 वर्ष पूर्व विदेशी शासन काल में इस ग्रंथ के प्रकाशन पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया गया था। जिससे बाद में इसमें से आपत्तिजनक और गूढ़ रहस्यमयी विद्याओं को काट-छांटकर इसे इन्द्रजाल के रूप में प्रकाशित किया गया था। रावणसंहिता में अनेक सिद्धियों के अतिरिक्त यक्षिणी सिद्धि के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई हैं विभिन्न प्रकार की यक्षिणी किस प्रकार की विशेषता से युक्त होती हैं तथा प्रसन्न होने पर साधक को किस प्रकार से लाभ पहुँचाती हैं, इसका पूर्ण विवरण रावणसंहिता में है।

इधर इन्द्रजाल में अनेक अजूबे प्रयोग पढ़ने को मिलते हैं जिन पर विश्वास नहीं होता है। परंतु यदि इन्द्रजाल की विषय वस्तु का गहरायी से अध्ययन किया जाए तो निश्चित रूप से पाठकों को लगेगा की यह अंश रावण संहिता से ही लिये गये हैं। रावण संहिता से साधक को शीघ्र सफलता मिलती है। यह इन्द्रजाल की पुस्तके भी दुर्लभ इन्द्रजाल, असली इन्द्रजाल, असली बड़ा इन्द्रजाल और वृहत् इन्द्रजाल के नाम से बेची जा रही हैं। कुछ लोग हैं जो आज भी असली इन्द्रजाल को रावणसंहिता ही मानते हैं और वह मानते हैं कि यह ग्रंथ भोजपत्र पर लिखा हुआ ग्रन्थ है। जिसमें कि पाँच सौ से अधिक पृष्ठों पर तांत्रिक प्रयोगों का विसतृत विवरण दिया गया है। परंतु आज इन्द्रजाल नामक ग्रंथ को ही रावणसंहिता होने की धारणायें अधिक हैं। पर कहीं-कहीं अभी भी इस बारे में उतनी भ्रांतियोँ और अफवाहें सुनने को मिलते हैं जितनी कि भृगु संहिता के बारे में। मैं दंतकथाओं के आधार पर इन्द्र्रजाल को ही रावणसंहिता मानता हूँ हालांकि इस विषय के मेरे पास भी कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं। यह एक खोज का विषय हो सकता है।