शनिदेव की क्रूरता क्यों

शनिदेव की क्रूरता क्यों शनि भगवान् सूर्य के पुत्र हैं। छाया (स्वर्णा) इनकी माता हैं शास्त्रों के अनुसार ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। यह कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में इस प्रकार आयी है-

बचपन से ही शनि देवता भगवान् कृष्ण के अनुराग में निमग्न रहते थे। व्यस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। पत्नी सती-साध्वी और तेजस्विनी थी। एक रात ऋतु-स्नानकर पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा से वह पति के पास पहुँची। पति ध्यान में बैठे थे। बाह्य ज्ञान न था। पत्नी प्रतीक्षा कर थक गयी। ऋतुकाल निष्फल हो चुका था। इस उपेक्षा से क्रुद्ध होकर सती ने शाप दे दिया कि जिसे तुम देख लोगे वह नष्ट हो जायेगा। ध्यान टूटने पर शनि देवता ने पत्नी को मनाया। पत्नी को स्वयं पश्चाताप हो रहा था, किंतु शाप के प्रतीकार की शक्ति उसमें न थी। तब से शनि देवता सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वे किसी का अहित नहीं चाहते थे। उनकी दृष्टि पड़ते कोई भी नष्ट हो सकता था। शनि ग्रह यदि कहीं रोहिणी-शकट भेदन कर दें तो पृथ्वी पर बारह वर्ष घोर दुर्भिक्ष पड़ जाये और प्राणियों का बचना ही कठिन हो जाये।

ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से शनिग्रह जब रोहिणी का भेदन कर बढ़ जाता है, तब यह योग आता है।

यह योग महाराज दशरथ के समय में आने वाला था। इस योग के आने पर पानी और अन्न के बिना उनकी प्रजा तड़प-तड़प कर मर जायेगा, यह दारुण दृश्य महाराज के सामने आ गया। प्रजा को इस कष्ट से बचाने के लिये रथ पर बैठकर महाराज दशरथ नक्षत्र मण्डल में जा पहुँचे। पहले तो महाराज ने शनि देवता को प्रतिदिन की भाँति प्रणाम किया और बाद में क्षत्रिय-धर्म के अनुसार उन पर संहारस्त्र का संधान किया। शनि देवता महाराज की राजोचित कर्तव्य-निष्ठा से प्रसन्न हो गये और वरदान माँगने को कहा। महाराज ने वर में माँगा कि जब तक सूर्य, नक्षत्र आदि विद्यमान हैं, आप कभी शकट-भेदन न करें। शनि देवता ने यह वरदान दे दिया। शनि देव की कृपा देखकर महाराज को रोमांच हो आया। उन्होंने रथ में धनुष डाल दिया और उनकी पूजा की। उसके बाद सरस्वती और गणेश का ध्यान कर स्तोत्र की रचना की।

शनि स्तोत्र-

नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।

नमः कालाग्रिरूपाय कृतान्ताय च वै नमः।।

नमो निर्मासदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते।।

नमो कोटरक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः।

नमो धोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तुते ।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च।।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः।

त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः।।

प्रसादं करू मे देव वराहोहमुपागतः।

एवं स्तुतस्तदा सौरिग्र्रहराजो महाबलः।।

यह शनि स्तोत्र अचूक प्रभावकारी है, प्रतिदिन इसका एक पाठ करना चाहिये।

यदि प्रतिदिन न कर सकें तो प्रत्येक शनिवार को अवश्य ही स्तोत्र पाठ करें।

इस स्तुति से शनि देवता संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने एक वरदान और माँगने को कहा। महाराज ने दूसरे वरदान मे माँगा- ‘भगवन्! देवता, मानव, पशु-पक्षी किसी को आप कष्ट न दें।’ शनि देवता ने एक शर्त के साथ यह वरदान भी दे दिया। शर्त यह थी कि यदि किसी की कुण्डली या गोचर में मृत्यु-स्थान, जन्मस्थान अथवा चतुर्थ स्थान में मैं रहूँ, तब मैं उसे मृत्यु का कष्ट दे सकता हूँ, किंतु यदि वह मेरी प्रतिमा की पूजा कर तुम्हारे द्वारा किये गये स्तोत्र का पाठ करेगा तो उसे मैं कभी पीड़ा नहीं दूंगा। अपितु उसकी रक्षा करूँगा। शनि के अधिदेवता प्रजापति और प्रत्याधिदेवता यम हैं। शनि ग्रह एक-एक राशि में तीस-तीस महीने रहते हैं और तीस ही वर्ष में सब राशियों को पार करते हैं।

(श्रीमद्भ० 5।22।14)

वर्ण- शनि देवता का वर्ण कृष्ण है।

(मत्स्यपु० 14।6)

वाहन- इनका वाहन गीध तथा रथ लोहे का बना हुआ है।

(मत्स्यपु० 127।8)

आयुध- धनुष-बाण और त्रिशूल इनके आयुध है। इनका स्वरूप इस प्रकार है-

इन्द्रनीलद्युतिः शूली वरदो गृध्रवाहनः।

बाणबाणासनधरः कर्तव्योऽर्कसुतस्तथा।।

(मस्त्यपु० 14।6)

‘शनैश्चर की शरीर-कान्ति इन्द्रनीलमणि की-सी है। वे गीध पर सवार होते हैं और हाथ में धनुष, बाण, त्रिशूल और वर मुद्रा धारण किये रहते हैं।’

वैदिक तथा तंत्रिक मंत्रों के रूप में हमें अनेक ग्रंथों में उपलब्ध हैं।

आज विज्ञान का युग है। पर इस युग में भी मंत्र-तंत्र में कोई वास्तविक शक्ति है या नहीं- यह एक पहेली बनी हुई है। यह तो र्निर्ववाद है कि प्राचीनकाल में मानवीय विश्वासों और मान्यताओं में मंत्र- तंत्रों का बहुत बड़ा स्थान था और आज भी है। अन्य दृष्टियों से विकसित और परिष्कृत रूचि के लोग मंत्र तंत्रों के चमत्कारिक गुण और प्रभाव में आज भी अगाध विश्‍वास रखते हैं। यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि तांत्रिक सिद्धियाँ और सिद्ध पुरूषों के वर्णनातीत प्रभाव हमें उलझन में डाल देते हैं और आज जब मनुश्य में स्थित छठी इंद्रिय की और इंद्रियातीत शक्तियों की खोजे हो रही है, हमें एक नितांत मानवीय विश्वास का पुर्नमूल्यांकन करने की सच्ची प्रेरणा मिलती दिखाई पड़ती है। परामनोविज्ञान की खोजों ने तो भौतिकवादी देश तक को इतना प्रभावित किया है कि रूस जैसे देश में भी इस पर शोधकार्य प्रारंभ हो गया। यह तो मानी हुई बात है कि किसी भी समस्या का दो टूक समाधान नहीं है और ऐसी जगह तो हमारे वैज्ञानिक साधन भी प्रायः समाप्त हो जाते हैं। पर आज ऐसे लोगों को भी जो इंद्रियातीत किसी शक्ति या रहस्य में विश्वास नहीं करते। आये दिन ऐसे अनुभव होते हैं, जिनसे उनकी सारी मान्यता धूल में मिल जाती है।

‘तंत्र’ का अर्थ वह शास्त्र है, जिसके द्वारा ज्ञान का विस्तार किया जाता है- तन्यते विस्तार्यते ज्ञानमनेन इति तंत्रम्। इसके दो विशिष्ट अंग है। संयम करना, नियंत्रण करना या विस्तृत शक्ति को केंद्रिकृत करना। सूर्य की किरणें जगत में व्याप्त हैं। इन विस्तीर्ण किरणों को केंद्रियभूत करने पर शक्ति संचारित होती है। जिससे अलौकिक कार्य किये जा सकते हैं। रशिमयों में अत्यंत सूक्ष्म शक्तियाँ हैं। जिन्हें एकत्रित कर विज्ञान के विधानानुसार विकीर्ण कर अनेक भीषण कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं।

अब मंत्रों को लीजिये- ‘मंत्र’ शब्द मन धातु के उत्तर ‘त्रै, धातु एवं ङ् प्रत्यय के योग से निष्पन्न होता है। (मनत्रै=मंत्र) ’ मननात् त्रायते यस्मात् तस्मान्मन्त्र मंत्र उदाहृतः।’ जिसके मनन द्वारा, चिंतन द्वारा, ध्यान द्वारा, दुःख कष्ट की निवृति होकर परमानंद की प्राप्ति होती है। उसी का नाम मंत्र है। सामान्यतया मंत्र के तीन प्रकार हैं- वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक। तीनों प्रकार के मंत्रों में तीन तत्त्व निहित रहते हैं। मंत्र के साथ प्रणव अथवा व्याहृतियों का चोली दामन का संबध है। इन से हमें आध्यात्मिक लाभ क्या हैं आइये इस पर एक दृष्टि डालें।

प्रणव अथवा व्याहृति- परम तत्त्व के निकट आना।

बीज- परम तत्त्व का दर्शन करना और उसे उपलब्ध करना।

देवता- लौटते समय अपने सभी तत्वों को तदभव से परिभावित करना। एकाक्षर मंत्र में भी ये तीनों तत्त्व पाये जाते हैं। एकाक्षर प्रणव या ऊँकार सर्वव्यापी भगवतत्त्व को प्रकाश करता है। इसमें शक्तिमान और शक्तितत्त्व के सब रहस्य विद्यमान हैं। इसके अकार, उकार, मकार- शक्तितत्त्व के और अर्द्धमात्रा ‘शांतं शिवमद्वैतम्’ के द्योतक हैं।