श्रीयंत्र की साधना | Shri Yantra for Money

Shri Yantra Gold Plated 3x3

श्रीयंत्र की साधना (Shri Yantra for Money)

Shri Yantra Gold Plated
Shri Yantra Gold Plated 3×3

मानव जीवन का संचालन धन के बिना संभव नहीं हैं, मनुष्य को अपनी आवश्यकता पूर्ति हेतु पग-पग पर धन की आवश्यकता पड़ती हैं दरिद्रता को सबसे बड़ा अभिशाप माना गया है। यदि धन न हो तो जीवन नरक तुल्य बन जाता है। ऐसे व्यक्ति को भाई-बंधु, मित्रा, रिश्तेदार सब छोड़ देते हैं। व्यक्ति को कितना धन मिलेगा, वह कैसा जीवन जियेगा यह सब उसके पूर्व जन्म कर्मानुसार माँ के गर्भ में ही तय हो जाता है-
आयु कर्म वित च विद्या निधनमेव च।
प चैतानि सृजयन्ते गर्भस्थयैव देहिनः।।

पूर्वजन्मदुष्कर्मानुसार ही व्यक्ति की कुंडली में केमद्रुम, हृद योग, काक योग, दरिद्र योग, हुताशन योग, रेका योग, शकट योग, ऋण योग, मृति योग, दुर्याेग, निर्भाग्य योग, निःस्व योग एवं ऋण ग्रस्त योग आदि अशुभ योग आते हैं। ये योग व्यक्ति के जीवन को धन एवं ऐश्वर्यहीन बनाते हैं। इन कुयोगों को दूर करने हेतु हमें जप, पूजा, अनुष्ठान एवं यंत्र-मंत्र-तंत्रादि का सहारा लेना पड़ता हैं। इन कुयोगों को दूर कर व्यक्ति को धन एवेश्वर्य देने वाले यंत्र राज श्री यंत्र(shri yantra) की महत्ता प्रस्तुत हैं। यंत्र मंत्र मय हैं जिस प्रकार आत्मा और शरीर में भेद नहीं होता उसी प्रकार यंत्र एवं देवता में कोई भेद नहीं होता है। यंत्रादेवता का निवास स्थान माना गया है-
यन्त्रमन्त्रमयं प्रोक्तं मंत्रात्मा देवतैवहि। देहात्मनोर्यथा भेदो यन्त्र देवयोस्तथा।

यंत्र और मंत्र मिलकर शीघ्र फलदायी होते हैं। मंत्रों में शक्ति शब्दों में निहित होती है, वहीं यह शक्ति यंत्रों के रेखा एवं बिन्दुओं में रहती है। श्री यंत्र में लक्ष्मी का निवास रहता है। इस यंत्र की रचना के बारे में कहा गया है-
बिंदुत्रिकोण वसुकोण दशारयुग्म, मन्वस्व नागदल षोडसपंचयुक्तम्।
वृत्तत्रायं च धरणी सदनत्रायं च, श्री चक्रमेतदुदितं परदेवतायाः।।

अर्थात् श्री यंत्र बिंदु, त्रिकोण, वसुकोण, दशारयुग्म, चतुर्दशार, अष्टदल, षोडसार, तीनवृत तथा भूपुर से निर्मित है। इसमें चार ऊपर मुख वाले त्रिकोण शिव त्रिकोण, पाँच नीचे मुख वाले शक्ति त्रिकोण होते हैं। इस तरह त्रिकोण, अष्टकोण, दो दशार, पाँच शक्ति तथा बिंदु, अष्टकमल षोडस दल कमल तथा चतुरस्र हैं। ये इसकी कृपा से व्यक्ति को अष्टसिद्धि एवं नौ विधियों की कृपा प्राप्त होती है। इस यंत्र के पूजन अनुष्ठान से व्यक्ति को दश महाविद्याओं की भी कृपा प्राप्त होती हैं-
काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी, भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या घुमावती तथा।
मातंगी सिद्ध विद्या च कथिता बगलामुखी, एतादश महाविद्या सर्वतंत्रोषु गोपिता।।

काली, तारा, शोडषी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, मातंगी, कमला और बगलामुखी ये दश महाविद्यायें हैं।

श्री यंत्र(shri yantra) का निर्माण स्वर्ण, चाँदी, स्फटिक, भोजपत्र आदि पर किया जाता है। भोज पत्र पर निर्मित यंत्र साधारण फलदायी रहता हैं। यह ताम्र पत्र पर श्रेष्ठ, चाँदी पर श्रेष्ठता तथा स्वर्ण पर निर्मित होने पर श्रेष्ठतम फल देता है। स्फटिक एवं मणि आदि पर निर्मित श्री यंत्र(sphatik shri yantra) भी अत्यंत शुभ फलप्रद रहता हैं। विभिन्न प्रसिद्ध तीर्थस्थलों पर स्थापित इन यंत्रों की महिमा सर्वविदित हैं। तिरूपति के बालाजी मंदिर में स्थापित श्री यंत्र (षोडश यंत्र), जगन्नाथ जी के मंदिर में भैरवी चक्र तथा श्री नाम मंदिर में सुदर्शन चक्र स्थापित हैं, जो यंत्रो की महत्ता का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इन तीर्थ स्थलों पर अपार संपत्ति है। विभिन्न तांत्रिक गंथों में श्री यंत्र की महिमा को अपार बताया गया है। इसमें सभी देवी देवताओं का निवास बताया गया है। यंत्र का निर्माण शुभ मुहुर्त जैसे- सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, रविपुष्य, गुरू पुष्य योग, चारों नवरात्र, दीपावली, शिवरात्रि आदि दिनों में किया जाना चाहिये या कराया जाना चाहिये। यह कार्य जटिल एवं श्रमसाध्य हैं। हर कोई इस कार्य को नहीं कर सकता है। कर्मकांड जानने वाले विद्वान पंडितों से यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा करवा लेना चाहिये। प्राण प्रतिष्ठा युक्त यंत्र शीघ्र फलदायी होते हैं। यदि ऐसा कराया जाना संभव न हो तो किसी विश्वसनीय प्रतिष्ठान, संस्थान से प्राण प्रतिष्ठा युक्त यंत्र प्राप्त कर अपनी पूजा में शुभ मुहूर्त में किसी पंडित से अनुष्ठान पूर्वक स्थापित करा लेना चाहिये। फिर प्रतिदिन पवित्र होकर इस यंत्र की पूजा करनी चाहिये, पवित्रता का ध्यान रखना अत्यावाश्यक हैं। यथा-देवोभूत्वा यजे देवं ना देवो देवमर्चयेत्। देवार्चा योग्यता प्राप्त्यैभूतिशुद्धि समाचरेत्।। इस यंत्र की प्रतिदिन पूजा करें तथा श्री सूक्त के 12 पाठ करें एवं निम्नलिखित लक्ष्मी मंत्रों में से किसी एक मंत्र का नियमित एक माला जप करने मात्र से ही धन संकट दूर होता है। व्यक्ति संपन्न एवं ऐश्वर्यशाली बन जाता है, जप के लिये ‘‘माला कमल गट्टे’’ की श्रेष्ठ है। रूद्राक्ष की माला का भी उपयोग किया जा सकता है। इस साधना से लक्ष्मी जी के साथ सभी देवी देवताओं की कृपा बनी रहती है। लेकिन व्यक्ति को सदाचरण नहीं छोड़ना चाहिये। चरित्र बल बनाये रखना एवं मांस मदिरा से दूर रहना चाहिये। यंत्र, मंत्र, तंत्र, देवी, देवता, यज्ञ, औषधि, तीर्थ, एवं गुरू में श्रद्धा अनिवार्य शर्त है, तभी ये चीजें फलदायी होती हैं। श्री यंत्र में तो इतना आकर्षण है कि, इसका दर्शन मात्र ही लाभ दे देता हैं।

मंत्र:-
(1) ऊँ श्रीं हृीं श्रीं कमले कमलालेय प्रसीद प्रसीद श्रीं हृीं ऊँ महालक्ष्मयै नमः।
(2) ऊँ हृीं श्रीं लक्ष्मीं महालक्ष्मी सर्वकामप्रदे सर्व-सौभाग्यदायिनी अभिमत्ं प्रयच्छ सर्वसर्वगत सुरूपे सर्वदुर्जयविमोचनी हृीं सः स्वाहा।
(3) ऊँ महालक्ष्मर्य च विद्महे विष्णु पत्नीम् च धीमहि तन्नों लक्ष्मी प्रचोदयात्।
(4) ऊँ श्रीं हृीं क्लीं श्रीं लक्ष्मी रागच्छागच्छमममन्दिरे तिष्ठ स्वाहा।
(5) ऊँ श्रीं दृीं श्रीं नमः।
(6) ऊँ दृीं श्रीं लक्ष्मी दुर्भाग्यनाशिनी सौभाग्यप्रदायिनी श्रीं हृीं ऊँ।
(7) ऐं दृीं श्रीं क्लीं सौं जगत्प्रसूत्यै नमः।
(8) ऊँ नमः कमलवासिन्यै स्वाहा।
(9) ऊँ श्री हृीं जयलक्ष्मी प्रियाय नित्यप्रदितचेत से लक्ष्मी सिद्धां देहाय श्रीं हृीं नमः।

संतान प्राप्ति मंत्र | Santaan Prapti Mantra – दीपावली विशेष साधना

जब जन्म कुण्डली में संतानोत्पत्ति योग न हो, अथवा अनेक बार गर्भ हानि होती रहे, या संतान दीघार्यु नहीं होती हो तो, उसके लिये यह प्रयोग महत्वपूर्ण है। इस साधना प्रयोग को दीपावली की रात्रि में संतान की इच्छा करने वाली महिला के संपन्न करने से संतान का योग प्रबल होकर संतानोत्पत्ति का योग बनता है। और वह संतान आज्ञाकारी होती है। इस प्रकार के प्रयोग से गृहस्थ जीवन अनुकूल एवं सुखदायक बन जाता है।

साधना विधि– साधिक को चाहिये कि वह दीपावली की रात्रि में स्नानादि कर पीले वस्त्र धारण कर पूर्व की तरफ मुख कर के पीले आसन पर बैठ जाये, सामने लकड़ी के तख्ते पर एक थाली में चावल से त्रिकोण बनाकर उसके मध्य में मोती पर बने अभिमंत्रित मुक्ता गणपति की स्थापना करें, और फिर पंचोपचार (फूल, चावल, रोली, कलावा तथा धूप-दीप) से पूजा करके पुत्रजीवा की 108 दानों वाली माला से 21 माला अग्रलिखित मंत्र जप पूर्ण करें।

यही प्रयोग प्रत्येक माह गर्भवती होने तक संतान की इच्छा रखने वाली महिला को दोहराना चाहिये। निश्चय ही उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। यही प्रयोग उस महिला का पति भी सम्पन्न कर सकता है, या घर का कोई अन्य सदस्य भी कर सकता है, परंतु उसको उस महिला के नाम का पहले संकल्प अवश्य लेना होगा। यदि कोई साधक-साधिका किसी दूसरे के लिये प्रयोग करना चाहे तो संकल्प ले लें कि ‘मैं यह प्रयोग अमुक व्यक्ति के लिये संपन्न कर रहा हूँ।

Santaan prapti mantra मंत्र – ऊँ नमो नारायणाय पुत्र सन्तानं देही देहि ठः ठः स्वाहा।

जप पूर्ण होने पर गणपति जी को मिष्ठान का भोग लगवाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें। वह माला जल में विसर्जित कर दें। मुक्ता गणपति का लॉकेट महिला को गले में धारण करना होगा।

साधना सामग्री – अभिमंत्रित मुक्ता गणपति (मोती पर बने गणपति), 108 दाने की पुत्रजीवा माला (putrajeeva mala)

न्यौछावर राषि – रू. 2000 रू

संपर्क – Shukracharya Delhi, 09810143516