यज्ञ से रोग निवारण

यज्ञ द्वारा रोग निवारण/नियंत्रण : आदियुग से अब तक रोगों को नियंत्रित रखने हेतु चिकित्सा प्रणाली का विकास हुआ है । चिकित्सा प्रणालियों के क्रमिक विकास में वेदों में अनेक प्रकार कि पद्धतियों का उल्लेख मिलता है । जब सब प्रकार के उपचार और वैद्य, रोगी को स्वस्थ करने में असमर्थ हो जाते हैं, तब वह रोगी पूजा अर्चाना, स्तुति, प्रार्थना, यज्ञ, याग, दान, पुण्य आदि की शरण लेता है । रोग मुक्ति के अनेको मन्त्र ऋग्वेद, अर्थवेद और यजुर्वेद में पाए जाते हैं । यहां हम यज्ञ द्वारा रोग निवारण की ही चर्चा कर रहे हैं, जिसे वेदों में सवोपरि माना गया है । वैसे तो वेद मन्त्रों द्वारा ही जीवन की सभी इच्छाएं पूर्ण हो सकती हैं, और इसके लिए बड़े – बड़े राजसू्य यज्ञ, पुत्रेष्टि यज्ञ, रोग निवारणार्थ यज्ञों के मन्त्र और उनकी समिधा, औषधियां और विधि कही एक सूत्र से न होकर अनेकानेक गर्न्थो में फैली पड़ी है । यदि इन सब विधियों को संकलित कर लिया जाये तो मानव के स्वास्थय लाभ के लिए सबसे सरल, सफल, हानिरहित चिकित्सा पद्धति का उपयोग हो सकता है।

एलोपैथी की सभी रोगाणु नाशक औषधियों के सम्बन्ध में सभी डॉक्टरों का एक मत है कि ये शरीर को हानि पहुचाये बिना रोगाणुओं का नाश कर ही नहीं सकती । जबकि यज्ञ पद्धति से ऐसे सूक्ष्म कणो को त्सर्जन होता है, जो शरीर को हानि पहुंचाये बिना किटाणुओं को समाप्त कर देते हैं । यज्ञ का सर्वश्रेष्ठ गुण तो यह है, कि इसमें रोगी को औषधी सेवन करने की आवश्यकता ही नहीं होती । इसके द्वारा शरीर में औषधि इन्जेक्शन के तीव्र प्रभाव से अधिक शीघ्र शरीर पर अपना प्रभाव डाल देती है । अग्नि के इस महान कार्य के लिए ही हमारे पूर्वजों ने अग्नि को देव माना है ।

यज्ञ में प्रयुक्त विशेष वृक्ष की समिधा और औषधि मिलकर वाष्प रूप में श्वास के द्वारा शरीर की रक्त प्रणाली में पहुंचते ही अपना प्रभाव तत्काल दिखाती है, इसीलिए यज्ञ में प्रयुक्त की जाने वाली । समिधा (लकड़ी) पीपल, आम, गूलर, जामुन आदि वृक्षों से ग्रहण करने का विधान है। वैदिक यज्ञ और यज्ञ चिकित्सा का अपना शास्त्रीय विधान है । विधानानुसार किए गए प्रयास ही फलदायी होते हैं ।

डॉक्टर जिस मरीज के मर्ज को लाईलाज घोषित कर चुके हों, ऐसे रोगियों ने भी स्वास्थ्य लाभ पाया है । किस रोग के लिये किस मन्त्र का जप या अभिषेक अथवा हम करना है, इस विषय के जानकार तथा संयम से रहने वाले साधक ही यज्ञ द्वारा चिकित्सा कर सकते हैं।

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यज्ञ चिकित्सा के विषय में चिकित्सा चूडामणि महामहोपाध्याय श्रीकृष्णचन्द्र द्विवेदी के पास मार्च मास सन् 75 के दिन एक युवक आया । उसने प्रार्थना करते हुए कहा कि मुझे अपने पिता को दिखाना है । कृपा करके आप कष्ट कीजिए , उस युवक का आग्रह स्वीकार करके उसी की कार से उसके घर जा पहुंचे । – रोगी का निरीक्षण करके यह ज्ञात हुआ कि यकृत में पितव्रण था , जिसका आपरेशन कराए दो मास हो चुके हैं । किन्तु तभी से वे और अधिक कष्ट अनुभव कर रहे थे*

*गोधृत मिलाकर हवन में गिलोय , काले तिल , ढाक के सूखे फूल की सामग्री बनाकर , ढाक की समिधाओं ( लकडी ) से । हवन कराया गया । प्रथम गणेशाम्बिका पूजन करके निम्नलिखित मन्त्र से आहुतियां दी गयी ।*

– *रोगान शेषानपहसिंतुष्टा रूष्टातु कामान् सकलान् भिष्टान् । । जापानिां न तिपत्नराणां त्वामाश्रिता याश्रयतां प्रयान्ति । ।*

* *500 आहुतियां प्रतिदिन पांच दिन तक हवन किया गया , औषधियों के सेवन व हवन से ।मुख ठीक हो गया ।इस प्रकार उच्च कोटि के डाक्टरों से निराश रोगी एक मास में पूर्ण स्वस्थ हो गये ।*
*

* *चरक संहिता आयुर्वेद का श्रेष्ठतम ग्रन्थ है ।चिकित्सा खण्ड में यज्ञ – चिकित्सा पर ।विस्तृत प्रकाश डाला है ।तपेदिक रोग से मुक्ति की इच्छा रखने बालों का यक्ष्मा नाशक वेद विहित यज्ञ का आश्रय लेना चाहिए ।अथर्वेद में कहा गया है*

*।किन तं यक्ष्मा अरुन्धते नैर्नशयथोऽश्नुते ।।*

*अर्थात गूगल औषधि की उत्तम गन्ध जिस रोगी को प्राप्त होती है उसे ।यक्ष्मा आदि छत की बिमारियां नहीं सताती है ।ऋग्वेद में औषिधियों का जन्म यज्ञाग्नि से बताया गया है ।*

* *औषधियाँ को सम्बोधित करते हुए कहा गया है ।कि हे औषधियों !तुम ।सैकड़ों गुणों से सम्पन्न हो और प्राणियों को अरोग्यता प्रदान करने वाली हो ।बिना श्रद्धा के किया हुआ यज्ञ सफल नहीं होता है ।श्रद्धा के साथ विधि भी आवश्यक है*

*यज्ञ वेदी से उठने वाले धुए से जहां नाना भांति के अस्वास्थ्यकार आकाशीय कीट पतंगों का विनाश होता है वहीं संस्कृत की सूक्तियों के उच्चारण से हृदय में पवित्रता , निर्मलता का संचार होता है ।*

*किस रोग में कौनसी औषधि से करें*

*यज्ञ यदि किसी रोग विशेष को चिकित्सा के लिए हवन करना हो तो उसमें उस रोग को दूर करने वाली ऐसी औषधियाँ सामग्री में और मिला लेनी चाहिए जो हवन करने पर खाँसी न उत्पन्न करती हो । यह मिश्रण इस प्रकार हो सकता है*

*( 1 ) साधारण बखारो में तुलसी की लकड़ी , तुलसी के बीज , चिरायता , करंजे की गिरी*

*( 2 ) विषम ज्वरों में – पाढ़ की जड़ , नागरमोथा , लाल चन्दन , नीम की गुठली , अपामार्ग ,*

*( 3 ) जीर्ण ज्वरों में – केशर , काक सिंगी , नेत्रवाला , त्रायमाण , खिरेंटी , कूट , पोहकर मूल*

*( 4 ) चेचक में – वंशलोचन , धमासा , धनिया , श्योनाक , चौलाई की जड़*

*( 5 ) खाँसी में – मुलहठी , अडूसा , काकड़ा सिंगी , इलायची , बहेड़ा , उन्नाव , कुलंजन*

*( 6 ) जुकाम में – अनार के बीज , दूब की जड़ , गुलाब के फूल , पोस्त , गुलबनफसा*

*( 7 ) श्वॉस में – धाय के फूल , पोन्त के डौड़े , बबूल का वक्कल , मालकाँगनी , बड़ी इलायची ,*

*( 8 ) प्रमेह में – ताल मखाना , मूसली , गोखरु बड़ा , शतावर , सालममिश्री , लजवंती के बीज*

*( 9 ) प्रदर में – अशोक की छाल , कमल केशर मोचरस , सुपाड़ी , माजूफल*

*( 10 ) बात व्याधियों में – सहजन की छाल , रास्ना , पुनर्नवा , धमासा , असगंध , विदारीकंद , मैंथी ,*

*( 11 ) रक्त विकार में – मजीठ , हरड , बावची , सरफोका , जबासा , उसवा*

*( 12 ) हैजा में – धनियाँ , कासनी , सौफ , कपूर , चित्रक*

*( 13 ) अनिद्रा में – काकजघा पीपला – मूल , भारंगी*

*( 14 ) उदर रोगों में – चव्य , चित्रक, तालीस पत्र , दालचीनी , जीरा , आलू बुखारा , पीपरिं ,*

*( 15 ) दस्तों में – अतीस , बेलगिरी , ईसबगोल , मोचरस , मौलश्री की छाल , ताल मखाना , छूहारा ।*

*( 16 ) पेचिश में – मरोडफली , अनारदाना , पोदीना , आम की गुठली , कतीरा*

*( 17 ) मस्तिष्क संबंधी रोगों में – गोरख मुंडी , शंखपुष्पी , ब्राह्मी , बच शतावरी ।*

*( 18 ) दांत के रोगों में – शीतल चीनी , अकरकरा , यवूल की छाल , इलायची , चमेली की जड़*

*( 19 ) नेत्र रोगों में – कपुर , लौंग , लाल चन्दन , रसोत , हल्दी , लोध ।*

*( 20 ) घावों में – पद्माख , दूब की जड़ , बड़ की जटाएं , तुलसी की जड़ , तिल , नीम की गुठली ,आँवा हल्दी ।*

*( 21 ) बंध्यत्व में – शिवलिंग के बीज , जटामासी , कूट , शिलाजीत , नागरमोथा , पीपल वृक्ष के पके फल , गूलर के पके फल , बड़ वृक्ष के पके फल , भट कटाई ।*

*इसी प्रकार अन्य रोगों के लिए उन रोगों की निवारक औषधियाँ मिलाकर हवन सामग्री तैयार कर लेनी चाहिये ।*

*निरोगी रहने हेतु महामन्त्र*

*मन्त्र 1 :-*

*• भोजन व पानी के सेवन प्राकृतिक नियमानुसार करें*

*• ‎रिफाइन्ड नमक,रिफाइन्ड तेल,रिफाइन्ड शक्कर (चीनी) व रिफाइन्ड आटा ( मैदा ) का सेवन न करें*

*• ‎विकारों को पनपने न दें (काम,क्रोध, लोभ,मोह,इर्ष्या,)*

*• ‎वेगो को न रोकें ( मल,मुत्र,प्यास,जंभाई, हंसी,अश्रु,वीर्य,अपानवायु, भूख,छींक,डकार,वमन,नींद,)*

*• ‎एल्मुनियम बर्तन का उपयोग न करें ( मिट्टी के सर्वोत्तम)*

*• ‎मोटे अनाज व छिलके वाली दालों का अत्यद्धिक सेवन करें*

*• ‎भगवान में श्रद्धा व विश्वास रखें*

*मन्त्र 2 :-*

*• पथ्य भोजन ही करें ( जंक फूड न खाएं)*

*• ‎भोजन को पचने दें ( भोजन करते समय पानी न पीयें एक या दो घुट भोजन के बाद जरूर पिये व डेढ़ घण्टे बाद पानी जरूर पिये)*

*• ‎सुबह उठेते ही 2 से 3 गिलास गुनगुने पानी का सेवन कर शौच क्रिया को जाये*

*• ‎ठंडा पानी बर्फ के पानी का सेवन न करें*

*• ‎पानी हमेशा बैठ कर घुट घुट कर पिये*

*• ‎बार बार भोजन न करें आर्थत एक भोजन पूणतः पचने के बाद ही दूसरा भोजन करें*

*भाई राजीव दीक्षित जी के सपने स्वस्थ भारत समृद्ध भारत और स्वदेशी भारत स्वावलंबी भारत स्वाभिमानी भारत के निर्माण में एक पहल*

*स्वदेशीमय भारत ही हमारा अंतिम लक्ष्य है :- भाई राजीव दीक्षित जी*

*मैं भारत को भारतीयता के मान्यता के आधार पर फिर से खड़ा करना चाहता हूँ उस काम मे लगा हुआ हूँ*

*आपका अनुज गोविन्द शरण प्रसाद वन्देमातरम जय हिंद*क्टर जिस मरीज के मर्ज को लाईलाज घोषित कर चुके हों , ऐसे रोगियों ने भी स्वास्थ्य लाभ पाया है । किस रोग के लिये किस मन्त्र का जप या अभिषेक अथवा हम करना है , इस विषय के जानकार तथा संयम से रहने वाले जन ही यज्ञ द्वारा चिकित्सा कर सकते हैं ।*

*यज्ञ चिकित्सा के विषय में चिकित्सा चूडामणि महामहोपाध्याय श्रीकृष्णचन्द्र द्विवेदी के पास मार्च मास सन् 75 के दिन एक युवक आया । उसने प्रार्थना करते हुए कहा कि मुझे अपने पिता को दिखाना है । कृपा करके आप कष्ट कीजिए , उस युवक का आग्रह स्वीकार करके उसी की कार से उसके घर जा पहुंचे । – रोगी का निरीक्षण करके यह ज्ञात हुआ कि यकृत में पितव्रण था , जिसका आपरेशन कराए दो मास हो चुके हैं । किन्तु तभी से वे और अधिक कष्ट अनुभव कर रहे थे*

*गोधृत मिलाकर हवन में गिलोय , काले तिल , ढाक के सूखे फूल की सामग्री बनाकर , ढाक की समिधाओं ( लकडी ) से । हवन कराया गया । प्रथम गणेशाम्बिका पूजन करके निम्नलिखित मन्त्र से आहुतियां दी गयी ।*

– *रोगान शेषानपहसिंतुष्टा रूष्टातु कामान् सकलान् भिष्टान् । । जापानिां न तिपत्नराणां त्वामाश्रिता याश्रयतां प्रयान्ति । ।*

* *500 आहुतियां प्रतिदिन पांच दिन तक हवन किया गया , औषधियों के सेवन व हवन से ।मुख ठीक हो गया ।इस प्रकार उच्च कोटि के डाक्टरों से निराश रोगी एक मास में पूर्ण स्वस्थ हो गये ।*
*

* *चरक संहिता आयुर्वेद का श्रेष्ठतम ग्रन्थ है ।चिकित्सा खण्ड में यज्ञ – चिकित्सा पर ।विस्तृत प्रकाश डाला है ।तपेदिक रोग से मुक्ति की इच्छा रखने बालों का यक्ष्मा नाशक वेद विहित यज्ञ का आश्रय लेना चाहिए ।अथर्वेद में कहा गया है*

*।किन तं यक्ष्मा अरुन्धते नैर्नशयथोऽश्नुते ।।*

*अर्थात गूगल औषधि की उत्तम गन्ध जिस रोगी को प्राप्त होती है उसे ।यक्ष्मा आदि छत की बिमारियां नहीं सताती है ।ऋग्वेद में औषिधियों का जन्म यज्ञाग्नि से बताया गया है ।*

* *औषधियाँ को सम्बोधित करते हुए कहा गया है ।कि हे औषधियों !तुम ।सैकड़ों गुणों से सम्पन्न हो और प्राणियों को अरोग्यता प्रदान करने वाली हो ।बिना श्रद्धा के किया हुआ यज्ञ सफल नहीं होता है ।श्रद्धा के साथ विधि भी आवश्यक है*

*यज्ञ वेदी से उठने वाले धुए से जहां नाना भांति के अस्वास्थ्यकार आकाशीय कीट पतंगों का विनाश होता है वहीं संस्कृत की सूक्तियों के उच्चारण से हृदय में पवित्रता , निर्मलता का संचार होता है ।*

*किस रोग में कौनसी औषधि से करें*

*यज्ञ यदि किसी रोग विशेष को चिकित्सा के लिए हवन करना हो तो उसमें उस रोग को दूर करने वाली ऐसी औषधियाँ सामग्री में और मिला लेनी चाहिए जो हवन करने पर खाँसी न उत्पन्न करती हो । यह मिश्रण इस प्रकार हो सकता है*

*( 1 ) साधारण बखारो में तुलसी की लकड़ी , तुलसी के बीज , चिरायता , करंजे की गिरी*

*( 2 ) विषम ज्वरों में – पाढ़ की जड़ , नागरमोथा , लाल चन्दन , नीम की गुठली , अपामार्ग ,*

*( 3 ) जीर्ण ज्वरों में – केशर , काक सिंगी , नेत्रवाला , त्रायमाण , खिरेंटी , कूट , पोहकर मूल*

*( 4 ) चेचक में – वंशलोचन , धमासा , धनिया , श्योनाक , चौलाई की जड़*

*( 5 ) खाँसी में – मुलहठी , अडूसा , काकड़ा सिंगी , इलायची , बहेड़ा , उन्नाव , कुलंजन*

*( 6 ) जुकाम में – अनार के बीज , दूब की जड़ , गुलाब के फूल , पोस्त , गुलबनफसा*

*( 7 ) श्वॉस में – धाय के फूल , पोन्त के डौड़े , बबूल का वक्कल , मालकाँगनी , बड़ी इलायची ,*

*( 8 ) प्रमेह में – ताल मखाना , मूसली , गोखरु बड़ा , शतावर , सालममिश्री , लजवंती के बीज*

*( 9 ) प्रदर में – अशोक की छाल , कमल केशर मोचरस , सुपाड़ी , माजूफल*

*( 10 ) बात व्याधियों में – सहजन की छाल , रास्ना , पुनर्नवा , धमासा , असगंध , विदारीकंद , मैंथी ,*

*( 11 ) रक्त विकार में – मजीठ , हरड , बावची , सरफोका , जबासा , उसवा*

*( 12 ) हैजा में – धनियाँ , कासनी , सौफ , कपूर , चित्रक*

*( 13 ) अनिद्रा में – काकजघा पीपला – मूल , भारंगी*

*( 14 ) उदर रोगों में – चव्य , चित्रक, तालीस पत्र , दालचीनी , जीरा , आलू बुखारा , पीपरिं ,*

*( 15 ) दस्तों में – अतीस , बेलगिरी , ईसबगोल , मोचरस , मौलश्री की छाल , ताल मखाना , छूहारा ।*

*( 16 ) पेचिश में – मरोडफली , अनारदाना , पोदीना , आम की गुठली , कतीरा*

*( 17 ) मस्तिष्क संबंधी रोगों में – गोरख मुंडी , शंखपुष्पी , ब्राह्मी , बच शतावरी ।*

*( 18 ) दांत के रोगों में – शीतल चीनी , अकरकरा , यवूल की छाल , इलायची , चमेली की जड़*

*( 19 ) नेत्र रोगों में – कपुर , लौंग , लाल चन्दन , रसोत , हल्दी , लोध ।*

*( 20 ) घावों में – पद्माख , दूब की जड़ , बड़ की जटाएं , तुलसी की जड़ , तिल , नीम की गुठली ,आँवा हल्दी ।*

*( 21 ) बंध्यत्व में – शिवलिंग के बीज , जटामासी , कूट , शिलाजीत , नागरमोथा , पीपल वृक्ष के पके फल , गूलर के पके फल , बड़ वृक्ष के पके फल , भट कटाई ।*

*इसी प्रकार अन्य रोगों के लिए उन रोगों की निवारक औषधियाँ मिलाकर हवन सामग्री तैयार कर लेनी चाहिये ।*

*निरोगी रहने हेतु महामन्त्र*

*मन्त्र 1 :-*

*• भोजन व पानी के सेवन प्राकृतिक नियमानुसार करें*

*• ‎रिफाइन्ड नमक,रिफाइन्ड तेल,रिफाइन्ड शक्कर (चीनी) व रिफाइन्ड आटा ( मैदा ) का सेवन न करें*

*• ‎विकारों को पनपने न दें (काम,क्रोध, लोभ,मोह,इर्ष्या,)*

*• ‎वेगो को न रोकें ( मल,मुत्र,प्यास,जंभाई, हंसी,अश्रु,वीर्य,अपानवायु, भूख,छींक,डकार,वमन,नींद,)*

*• ‎एल्मुनियम बर्तन का उपयोग न करें ( मिट्टी के सर्वोत्तम)*

*• ‎मोटे अनाज व छिलके वाली दालों का अत्यद्धिक सेवन करें*

*• ‎भगवान में श्रद्धा व विश्वास रखें*

*मन्त्र 2 :-*

*• पथ्य भोजन ही करें ( जंक फूड न खाएं)*

*• ‎भोजन को पचने दें ( भोजन करते समय पानी न पीयें एक या दो घुट भोजन के बाद जरूर पिये व डेढ़ घण्टे बाद पानी जरूर पिये)*

*• ‎सुबह उठेते ही 2 से 3 गिलास गुनगुने पानी का सेवन कर शौच क्रिया को जाये*

*• ‎ठंडा पानी बर्फ के पानी का सेवन न करें*

*• ‎पानी हमेशा बैठ कर घुट घुट कर पिये*

*• ‎बार बार भोजन न करें आर्थत एक भोजन पूणतः पचने के बाद ही दूसरा भोजन करें*

*भाई राजीव दीक्षित जी के सपने स्वस्थ भारत समृद्ध भारत और स्वदेशी भारत स्वावलंबी भारत स्वाभिमानी भारत के निर्माण में एक पहल*

*स्वदेशीमय भारत ही हमारा अंतिम लक्ष्य है :- भाई राजीव दीक्षित जी*

*मैं भारत को भारतीयता के मान्यता के आधार पर फिर से खड़ा करना चाहता हूँ उस काम मे लगा हुआ हूँ*

*आपका अनुज गोविन्द शरण प्रसाद वन्देमातरम जय हिंद*

मानसिक रोग

चिकित्सा ज्योतिष में मानसिक रोगों का अध्ययन :-

Dr.R.B.Dhawan, top best astrologer in Delhi

आज के इस लेख में हम मानसिक रोगों के अध्ययन की बात करेगें- मानसिक रोग होने के बहुत से कारण होते हैं, लेकिन इन कारणों का ज्योतिषीय आधार क्या है? इसकी चर्चा इस लेख के माध्यम से की जा रही है चिकित्सा ज्योतिष में सभी रोगों के कुछ योग होते हैं, और ग्रहों के परस्पर संबंध बने होते हैं, जिनके आधार पर यह पता चलता है कि जातक को जीवन में किस प्रकार के रोग हो सकते हैं, लेकिन इसका निर्धारण किसी कुशल ज्योतिषी से ही कराना चाहिए अन्यथा बेकार का तनाव उत्पन्न हो सकता है। आइए कुंडली के उन योगों का अध्ययन करें, जिनके आधार पर मानसिक रोगों का पता चलता है :-

मानसिक रोगों में चंद्रमा, बुध, चतुर्थ भाव व पंचम भाव का आंकलन किया जाता है, चंद्रमा मन है, बुध से बुद्धि देखी जाती है, और चतुर्थ भाव भी मन है। तथा पंचम भाव से बुद्धि देखी जाती है, जब व्यक्ति भावुकता में बहकर मानसिक संतुलन खोता है, तब उसमें पंचम भाव व चंद्रमा की भूमिका अहम मानी जाती है, रोग में चतुर्थ भाव की भूमिका मुख्य मानी जाती है, शनि व चंद्रमा की युति भी मानसिक शांति के लिए शुभ नहीं मानी जाती है, मानसिक परेशानी में चंद्रमा पीड़ित होता है।

जन्म कुंडली में चंद्रमा अगर राहु के साथ है, तब जातक को मानसिक रोग होने की संभावना बनती है, क्योकि राहु मन को भ्रमित रखता है, और चंद्रमा मन है, मन के घोड़े बहुत ज्यादा दौड़ते हैं, व्यक्ति बहुत ज्यादा हवाई किले बनाता है। यदि जन्म कुंडली में बुध, केतु और चतुर्थ भाव का संबंध बन रहा है, और यह तीनों अत्यधिक पीड़ित हैं, तब जातक में अत्यधिक जिद्दीपन हो सकता है, और वह सेजोफ्रेनिया का शिकार हो सकता है. इसके लिए बहुत से लोगों ने बुध व चतुर्थ भाव पर अधिक जोर दिया है। जन्म कुंडली में गुरु लग्न में स्थित हो और मंगल सप्तम भाव में स्थित हो या मंगल लग्न में और सप्तम में गुरु स्थित हो तब मानसिक आघात लगने की संभावना बनती है। जन्म कुंडली में यदि शनि लग्न में और मंगल पंचम भाव या सप्तम भाव या नवम भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।
कृष्ण पक्ष का बलहीन चंद्रमा हो, और वह शनि के साथ 12वें भाव में स्थित हो, तब मानसिक रोग की संभावना बनती है। शनि व चंद्र की युति में जातक मानसिक तनाव ज्यादा रखता है। जन्म कुंडली में शनि लग्न में स्थित हो, सूर्य 12वें भाव में हो, मंगल व चंद्रमा त्रिकोण भाव में स्थित हो, तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।
जन्म कुंडली में मांदी सप्तम भाव में स्थित हो, और अशुभ ग्रह से पीड़ित हो रही हो। राहु व चंद्रमा लग्न में स्थित हो, और अशुभ ग्रह त्रिकोण में स्थित हों, तब भी मानसिक रोग की संभावना बनती है।
मंगल चतुर्थ भाव में शनि से दृष्ट हो, या शनि चतुर्थ भाव में राहु/केतु के अक्षांश पर स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है। जन्म कुंडली में शनि और मंगल की युति छठे भाव या आठवें भाव में हो रही हो। जन्म कुंडली में बुध पाप ग्रह के साथ तीसरे भाव में हो या छठे भाव में हो या आठवें भाव में हो या बारहवें भाव में स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है। यदि चंद्रमा की युति केतु व शनि के साथ हो रही हो, तब यह अत्यधिक अशुभ माना गया है, और अगर यह अंशात्मक रुप से नजदीक हैं, तब मानसिक रोग होने की संभावना अधिक बनती है। जन्म कुंडली में शनि और मंगल दोनो ही चंद्रमा या बुध से केन्द्र में स्थित हों तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

मिरगी होने के जन्म कुंडली में लक्षण :-

इसके लिए चंद्र तथा बुध की स्थिति मुख्य रुप से देखी जाती है, साथ ही अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जाती है। शनि व मंगल जन्म कुंडली में छठे या आठवें भाव में स्थित हों, तब जातक को मिरगी संबंधित बीमारी का सामना करना पड़ सकता है। कुंडली में शनि व चंद्रमा की युति हो, और यह दोनो मंगल से दृष्ट हों,
जन्म कुंडली में राहु व चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हों।

मानसिक रुप से कमजोर बच्चे अथवा मंदबुद्धि बच्चे:-

जन्म के समय लग्न अशुभ प्रभाव में हो, विशेष रुप से शनि का संबंध बन रहा हो, यह संबंध युति, दृष्टि व स्थिति किसी भी रुप से बन सकता है। शनि पंचम से लग्नेश को देख रहा हो, तब व्यक्ति जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है, जन्म के समय बच्चे की कुण्डली में शनि व राहु पंचम भाव में स्थित हो, बुध बारहवें भाव में स्थित हो, और पंचमेश पीड़ित अवस्था में हो, तब बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है। पंचम भाव, पंचमेश, चंद्रमा व बुध सभी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तब भी बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है। जन्म के समय चंद्रमा लग्न में स्थित हो और शनि व मंगल से दृष्ट हो तब भी व्यक्ति मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है। पंचम भाव का राहु भी व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट करने का काम करता है, बुद्धि अच्छी नहीं रहती है।

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मेरे ओर लेख देखें :- astroguruji.in, rbdhawan.wordpress.com, guruji ke title.com, shukra Haryana.com पर।

त्राटक

त्राटक साधना :-

मानवी कल्पनात्मक विचार शक्ति का अत्यधिक प्रवाह नेत्रों द्वारा ही होता है, जिस प्रकार कल्पनात्मक विचार शक्ति को सीमाबद्ध करने के लिए ध्यान योग की साध ना की जाती है, उसी प्रकार इस मानवी विद्युत प्रवाह को दिशा विशेष में प्रयुक्त करने के लिए नेत्रों की ईक्षण शक्ति को साधा जाता है। इस प्रक्रिया को त्राटक का नाम दिया गया है। सरल भाषा में अपनी दृष्टि किसी एक वस्तु पर स्थिर करने की क्रिया को त्राटक कहा जाता है। वास्तविक ध्यानावस्था प्राप्त करने हेतु अपनी दृष्टि को स्थिर कर पाने की क्षमता अत्यंत आवश्यक है।

यदि एक ध्यान योगी अपने नेत्रों को स्थिर नहीं कर पाता तो वह सूक्ष्म अवस्था पाने में असफल रहेगा। ऐसा मुख्यतः इसलिए क्योंकि यदि आप अपनी पाँच कर्मेन्द्रियों– नेत्र, नासिका, कान, मुख एवं त्वचा द्वारा अपने शरीर को सदा कुछ न कुछ प्रदान करते रहेंगे तो आपकी देह के प्रति ध्यान भी बना रहेगा। यह ब्रह्मांड से एकाकार होने में बाधा है। यह आपको ध्यानावस्था में जाने से रोकता है, उस दिव्य आनंद से दूर रखता है, जिसे समाधि कहा जाता है। एक लंबे अंतराल तक, बिना हिले डुले, अविचल, एक ही स्थिति में बैठे रहने की योग्यता एक सच्चे योगी का अचूक शस्त्र है। अपनी दृष्टि को एक बिन्दु पर स्थिर करने की योग्यता एक सिद्ध योगी ही प्राप्त कर सकता है।

त्राटक के प्रयोग :-
त्राटक आध्यात्मिक और शारीरिक दोनों ही शक्तियों को प्राप्त करने के मकसद से किया जा सकता है।त्राटक अपने प्रकार से किया जा सकता है:- दीपक त्राटक, मोमबत्ती त्राटक, बिन्दु त्राटक, शक्ति चक्र त्राटक इत्यादि। प्रज्ज्वलित दीपक या जलती हुई मोमबत्ती की लौ पर नजर जमाना दीपक त्राटक कहलाता है, और सर्वश्रेष्ठ त्राटक में से एक है। इस त्राटक से हम अपनी आँखों में तेज उत्पन्न कर सकते हैं, जिसका प्रयोग दूसरों को आकर्षित करने के लिए कर सकते हैं, इसका अभ्यास मान-सम्मान की प्राप्ति के लिए किया जाता है।

यह त्राटक हमें क्रोधी या उग्र भी बना सकता है, क्यों की इससे आँखों में तेज उत्पन होता है, और ये तेज हमें व्याकुल भी कर सकता है, बेहतर होगा की इसके साथ-साथ हमें मन को भी साधना चाहिये।

त्राटक की विधि :-
1. सुख आसन में, हो सके तो घुटने मोड़ कर, बैठ जायें।

2. अपने सामने, लगभग 3 फुट की दूरी पर, एक शुद्ध घी का दीपक जला लें।

3. ध्यान रखें की इस दीपक की लौ आपके नेत्रों के समान ऊंचाई में हो।

4. कम से कम 10 मिनट तक बिना पलक झपकाये उस लौ को निहारते रहें। प्रतिदिन क्रमशः समयावधि को थोड़ा थोड़ा बढ़ाते जायें।

5. वास्तविक अभ्यास के दौरान अपने इधर उधर भटकते विचारों को नियंत्रित करें। (अपने मन को ध्यान की वस्तु पर लाते रहें।) मान लें कि आप दस मिनट की अवधि के लिए त्राटक का अभ्यास कर रहे हैं। उस दस मिनट के लिए आप को एक चट्टान की भांति स्थिर रहना है, साथ ही अपने नेत्रों को भी अविचल रखना है। यह अति आवश्यक है कि आप पलकें बिलकुल भी न झपकायें। नेत्रों से अश्रुपात आरंभ हो जाएगा, किन्तु आपको स्थिर ही रहना है। जब जब मन भटके, उसे धीरे से, प्रेमपूर्वक पुनः ध्यान की वस्तु पर स्थापित करें। आप त्राटक के लिए उपरोक्त किसी भी वस्तु का चयन कर सकते हैं, किन्तु यदि दीपक कि ज्योति पर यह अभ्यास हो तो इसका आपके मन पर एक निर्मल, पावक प्रभाव पड़ता है। इस अभ्यास को दिन में कम से कम दो बार अवश्य करना चाहिये। (प्रातःकाल व रात्रि को सोने से पूर्व)। इस अभ्यास का एक भाग यह है कि आप धीरे धीरे व अनुशासित रूप से नेत्रों को स्थिर रखने की अवधि को बढ़ाते चलें। इसके लिए संकल्प बल व धैर्य आवश्यक है। यदि आप में यह दोनों गुण विद्यमान हैं, तो आपको इस अभ्यास से उत्तम लाभ अवश्य मिलेगा।

त्राटक का उचित रूप से किया गया अभ्यास साधक के मन को स्थिर व शांत करने में अति सहायक होता है। एकनिष्ठ एकाग्रता व उत्तम स्मरण शक्ति एवं स्मरण किए हुए तथ्यों को पुनः मानस पटल पर लाने में यह एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है। तथापि, इसके लाभ यहीं तक सीमित नही है। आपकी देह दस विभिन्न प्रकार की वात ऊर्जाओं द्वारा संचालित होती है। पाँच प्रकार की वात ऊर्जा – नाग, कूर्म, कर्कर, देवदत्त व धनंजय। इनका कार्य क्षेत्र क्रमशः डकार, छींकना, नेत्रों का झपकना, जम्हाई लेना तथा त्वचा पर खिंचाव ऐंठन करना है।

त्राटक के अभ्यास से यह पाँच वात ऊर्जायें स्थिर होती हैं, जिससे शरीर की उपरोक्त स्वचालित क्रियाओं पर आपका संयम होने लगता है। एक उन्नत श्रेणी के साधक के लिए यह संयम अनिवार्य भी है, यदि आप अपने अन्तःकरण के उस शांत, दिव्य स्वरूप का अविरल आस्वादन पाने के इच्छुक हैं। ध्यानावस्था के दौरान यदि उपरोक्त शारीरिक क्रियाओं में से कोई भी स्वतः आ जाए अथवा होने लगे तो तत्काल क्षण देह बोध हो जाता है, जो दिव्य से एकाकार होने में बाधक हो जाता है।

सावधानी जो आवश्यक है :-
किसी भी विधि से यह साधना करें, लेकिन ध्यान रखें साधना के लिए बैठते वक्त पेट न तो पूरी तरह खाली हो, और ना पूरी तरह भरा हो। खाली पेट गैस बनाता है, पेट दर्द की शिकायत हो सकती है। इसलिए थोड़ा बहुत खाकर बैठना आवश्यक है। परंतु पूरी तरह भरे पेट से बैठने से एकाग्र होना असंभव है।

यदि परिवार के मध्य रहते हैं, तो घर के सभी सदस्यों को पता होना चाहिये कि इस समय आपको आवाज नहीं देना है। फोन अलार्म आदि बंद रखें। यहाँ तक कि दरवाजे पर दस्तक होने पर कौन द्वार खोलेगा यह भी सुनिचित कर लें। जल्दी जल्दी साधना विधि न बदले। जिस विधि का चुनाव करें उस पर कम से कम छह महीने अवश्य परिश्रम करें।

त्राटक साधना से लाभ :-
त्राटक साधना तंत्र मंत्र से सर्वथा भिन्न साधना मार्ग है, इसे किसी निश्चित दिन, निश्चित रंग के कपड़े प्रसाद धूप दीप अगरबत्ती से कुछ भी लेना देना नहीं है। इसकी सफलता आप के आत्म शक्ति पर निर्भर करती है। जिसे अंग्रेजी में विलपावर कहा जाता है। यह एक सतत प्रक्रिया है। इस के लिए दो-माह चार माह की सीमा में बांधने के बजाय इसे अपनी दिनचर्या में शामिल कर लें। जिस प्रकार बैटरी कुछ दिन बाद डिस्चार्ज हो जाती है, उसी प्रकार इस साधना के बाद प्राप्त हुआ ओज धीरे धीरे मंद पड़ जाता है। यह ओज निरंतर बनी रहे, इस के लिए प्रतिदिन थोड़ी ही देर के लिए सही त्राटक अवश्य करें। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि किसी भी विधि से यह साधना करने पर लाभ और हानि एक समान ही हैं।

इस साधना से चेहरे पर कान्ति आ जाती है। चेहरे पर आकर्षण उत्पन्न होता है। नेत्र में इतना तेज आ जाता है कि किसी को देखते ही वह सम्मोहित हो जाता है। यह सम्मोहन तंत्र-मंत्र से प्राप्त सम्मोहन शक्ति से भिन्न है। इसे सौम्य सम्मोहन कह सकते हैं, जो आपमें आई सकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से उत्पन्न होता है। स्वभाव में आमूल चूल परिवर्तन हो जाता है। पहले बात बात पर उत्तेजित होने वाला इंसान इस साधना के बाद धीर गंभीर और सोच समझकर निर्णय लेने वाला बन जाता है। इस साधना के बाद एकाग्रता अत्यधिक बढ़ जाती है। छात्रों के लिए यह साधना रामबाण है। त्राटक अभ्यास के बाद कठिन से कठिन विषय पर ध्यान केन्द्रित करना आसान हो जाता है।

त्राटक साधना से हानि :-

यद्यपि यह साधना अत्यंत सरल है, मात्र इच्छा शक्ति के दम पर साधक अनेक विशिष्ट गुणो का स्वामी बन सकता है। तथापि त्रुटि होने पर कुछ हानि भी हो सकती हैं, जैसे– साधना काल में अचानक तेज ध्वनि होने पर साधक अचेत हो सकता है। यहाँ तक कि हृदय गति भी रुक सकती है। लगातार एकटक देखने से कभी-कभी आंखो में समस्या आने लगती है। आँसू निकल आते हैं, या साधना के तुरंत बाद देखने में समस्या होने लगती है। दो चार दिन साधना करने के बाद नेत्र चिकित्सक से इसके प्रभाव की जांच करवा लेना उचित होगा। यदि पहले से नेत्र संबंधी समस्या हो तो यह साधना न करें। इस साधना को आरम्भ करने से पहले इस विषय के अच्छे जानकार से परामर्श अवश्य करें।