स्वप्न

मृतक लोगों का स्वप्न मे आना, शुभाशुभ विचार :-

Dr.R.B.Dhawan

स्वप्न हर मनुष्य को दिखाई देते हैं, और स्वस्थ व्यक्ति के लिए स्वप्न देखना जरूरी भी है, नींद की अवस्था में कई प्रकार के स्वप्न दिखाई देते हैं, जिनमें कुछ प्रसन्नता देने वाले और कुछ चिंतित करने वाले भी होते हैं, कभी-कभी स्वप्न में हमें अपने ही पूर्वज या पितर अथवा कोई मृत व्यक्ति दिखाई देता है, तब हमें इस प्रकार के स्वप्न का अर्थ समझ नहीं आता। क्या आपके सपने में भी कभी कोई मृत व्‍यक्ति आकर कुछ कहते हैं? क्या होता है, जब आप सपनों में मृत व्‍यक्तियों की आवाज सुनते हैैं, या वो आपका नाम बुलाते हैं। क्‍या आपको मालूम है कि जब कभी मृत व्‍यक्ति सपने में आकर आपका नाम लेते हैं तो, इसका एक मतलब होता है। संभव है वो आपको कुछ बताना चाहते हैं, हो सकता है कि वो आपको कुछ संकेत दे रहें हों? यहां आज हम आपको कुछ बातें बता रहे हैं कि सपने में कोई मृत व्‍यक्ति यदि आप का नाम लेता है तो इसका क्या अर्थ हो सकता है :-

1. यदि आप किसी कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे हैं तो, बार बार कोई मृत व्‍यक्ति आपको सपने में आकर आपका नाम ले रहा है तो, इसका अर्थ है कि वो व्‍यक्ति आपको कुछ अनहोनी के बारे में आगह करना चाहता है।

2. यदि सपने में मृत व्‍यक्ति किसी की बात या किसी व्यक्ति की ओर इशारा कर रहा है तो, इसका अर्थ है, उस व्‍यक्ति से संबंधित या उस बात से संबंधित कोई बुरा समाचार मिलने वाला है।
3. यदि स्वप्न में मृत व्‍यक्ति आपसे कुछ कह रहा है, और आप उनको सुन नहीं पा रहे हैं तो, समझ जाइए कि कोई खुशखबरी आने वाली है।

4. यदि वो सपने में आपसे बात कर रहा है और उसकी आवाज में एक अलग हड़बड़ाहट है तो, इसका अर्थ है कि आप किसी पुराने परिचित से मिलने वाले हैं।

5. यदि सपने में आपको कोई मिलनसार आत्‍मा दिखाई देती है या कोई आत्‍मा आपके साथ थोड़ी फ्रेंडली बनने की कोशिश करती है। तो इसका अर्थ है कि आप अपार सफलता प्राप्‍त करने वाले हैं।
6. यदि आप के सपने में मृत व्‍यक्ति की आवाज थोड़ी तीखी और गहरी होती है तो, वह यह बताती है कि आपकी लाइफ में जल्‍द ही कुछ नया बदलाव आने वाला है।

7. यदि आप सपने में खाली कब्र और शोक सभा की प्रार्थना देखते हैं तो इसका अर्थ है कि आपकी निजी जिंदगी में कोई खतरा आ सकता  है।

सैकड़ों प्रकार के स्वप्नों के फल का उल्लेख हमारे पुराणों में कहीं कहीं मिलता है, इसके अलावा बहुत से विद्वानों ने भी इस विषय पर ग्रंथ लिखे हैं, उन में स्वप्न के अनेक प्रकार और फल दिये गये हैं।

राह दिखाती यह 6 बातें

जीवन को व्यवस्थित करने वाली यह 6 बातें :-

Dr.R.B.Dhawan

श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों में जीवनोपयोगी अनेक शिक्षाएं हैं, जो आज के समय में हमें सही रास्ता दिखाती हैं, श्रीरामचरितमानस के अरण्यकांड में शूर्पणखा जब लक्ष्मण द्वारा नाक, कान काटे जाने के बाद रावण के पास जाती है, तब वह रावण को कहती है कि जीवन में कभी इन 6 बातों को कभी छोटा नहीं समझना :-

रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।

अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।

अर्थात :- शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। ऐसा कहकर शूर्पणखा अनेक प्रकार से विलाप करके रोने लगी।

1. शत्रु अर्थात् दुश्मन :- दुश्मन भले ही कितना ही छोटा क्यों न हो, उसे छोटा नहीं समझना चाहिए, उससे हमेशा सावधान रहना चाहिए। कई बार छोटे दुश्मन भी इतना बड़ा नुकसान कर देते हैं, जिसके कारण बाद में पछताना पड़ता है। यदि छोटे-छोटे राजा मिलकर किसी चक्रवर्ती राजा पर एक साथ हमला कर दें तो उसे भी हरा सकते हैं। इसलिए दुश्मन को कभी छोटा यानी कमजोर नहीं समझना चाहिए।

2. रोग-बीमारी :- छोटी से छोटी बीमारी को भी कभी नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। सर्दी, जुकाम या बुखार आदि भले ही साधारण लगते हों, लेकिन जब यह जब बढ़ जाते हैं तो, शरीर को खोखला कर देते हैं। कई बार ये बड़ी बीमारी का कारण भी बन जाते हैं। साधारण लगने वाली खांसी टी.बी. भी हो सकती है। इन छोटी लगने वाली बीमारियों के कारण ही कई बार मनुष्य को अपने प्राण गंवाने पड़ जाते हैं। इसलिए छोटी बीमारी में भी तुरंत इलाज करवाने में ही समझदारी है।

3. अग्नि अर्थात् आग :- आग में इतनी शक्ति है कि वह कुछ ही समय में बड़े से बड़े जंगल को भी जला कर राख कर सकती है। आग का सबसे छोटा रूप एक चिंगारी होती है, लेकिन जब यह विकराल रूप ले लेती है तो, इस पर नियंत्रण पाना किसी के बस में नहीं होता। इसलिए आग के साथ कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। ये कभी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है।

4. पाप कर्म अर्थात् बुरे काम :- धर्म ग्रंथों के अनुसार, मनुष्यों को उनके द्वारा किए गए कामों के आधार पर पाप व पुण्य की प्राप्ति होती है। कई बार मनुष्य सब कुछ जानकर भी छोटे-छोटे गलत कार्य करते हैं। इन कामों से प्राप्त होने वाला पाप भी कम ही होता है, लेकिन जब इन छोटे-छोटे पाप कर्मों का फल एकत्रित हो जाता है तो इसकी भयानक सजा मिलती है। इसलिए पाप कर्म भले ही छोटा है, लेकिन करने से बचना चाहिए।

5. स्वामी अर्थात् मालिक :- मालिक को कभी भी छोटा नहीं समझना चाहिए। क्योंकि अगर मालिक नाराज हो जाए तो, वह आपका बड़ा नुकसान कर सकता है। अगर आप नौकर हैं, और सोचते हैं कि मालिक को डरा-धमका कर या किसी भी तरीके से अपना काम निकाल लेंगे तो यह आपकी बहुत बड़ी भूल है। मालिक को जब भी मौका मिलेगा, वह आपका नुकसान करने से नहीं चूकेगा। इसलिए मालिक को कभी छोटा यानी कमजोर नहीं समझना चाहिए।

6. सर्प अर्थात् सांप :- सांप दिखने में भले ही कितना भी छोटा क्यों न हो, लेकिन यदि वह एक बार काट ले तो, मृत्यु का कारण बन सकता है। कई बार देखने में आता है कि सांप पकड़ने वाले ही सांप का शिकार बन जाते हैं, क्योंकि उन्हें यही लगता है कि हमेशा की तरह वे सांप को अपने वश में कर लेंगे। उनकी यही सोच कई बार उनकी जान की दुश्मन बन जाती है। इसलिए सांप को कभी छोटा (कमजोर) नहीं समझना चाहिए।

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चंद्रमा

चंद्रमा मन का कारक :-

Dr.R.B.Dhawan

चंद्रमा सौरमंडल के ग्रहों में सबसे तीव्र गति से चलने वाला ग्रह है, ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा को काल पुरुष का मन कहा गया है, यह ग्रह मन का प्रतिनिधित्व करता है, इसी लिए चन्द्रमा को काल पुरुष का मन कहा गया है। चन्द्रमा माता, मन, स्वभाव, जननेन्द्रियों, प्रजनन सम्बन्धी रोगों, गर्भाशय इत्यादि का कारक है, चन्द्रमा जातक के मन की भावनाओं पर नियन्त्रण रखता है, यह जल तत्व ग्रह है, सभी तरल पदार्थ चन्द्रमा के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं इसके अतिरिक्त चन्द्रमा बाग-बगीचे, नमक, समुद्री औषधी, जड़ी-बूटी, मौसम परिवर्तन, विदेश यात्रा, दूध, मान आदि का प्रतिनिधित्व भी करता है। चन्द्रमा के मित्र ग्रह सूर्य और बुध हैं, चन्द्रमा किसी ग्रह से शत्रुता नहीं रखता, चन्द्रमा मंगल, गुरु, शुक्र व शनि से सम संबन्ध रखता है, चन्द्रमा कर्क राशि का स्वामी है, वृषभ राशि में उच्च स्थान प्राप्त करता है, और वृश्चिक राशि में होने पर नीच राशि में और उत्तर-पश्चिम दिशाओं का प्रतिनिधित्व करता है, चन्द्र का भाग्य रत्न मोती है, चन्द्रमा ग्रह का रंग श्वेत, और धातु चांदी माना गया है, चन्द्र का शुभ अंक 2, 11, 20 है, चन्द्रमा के लिए दुर्गा, पार्वती और देवी गौरी की उपासना करनी चाहिए।

चन्द्रमा ग्रह का बीज मंत्र:- ” ऊँ स्रां स्रीं स्रौं स: चन्द्रमसे नम:।” (जप संख्या 11000)

चन्द्र ग्रह का वैदिक मंत्र :- ” ऊँ दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम ।
भाशिनं भवतया भाम्भार्मुकुट्भुशणम।।”

चन्द्रमा की दान योग्य वस्तुएं :- चावल, दूध, चांदी, मोती, दही, मिश्री, श्वेत वस्त्र, श्वेत फूल या चन्दन. इन वस्तुओं का दान सोमवार के दिन सायंकाल में करना चाहिए।

चन्द्रमा से प्रभावित व्यक्तित्व:- चन्द्र राशि लग्न भाव में हो या चन्द्रमा जन्म राशि हो, अथवा चन्द्र लग्न भाव में बली अवस्था में हो, तो व्यक्ति को कफ रोग प्रभावित करते हैं, शरीर की गोलाकार प्रकृति, मन प्रसन्न कर देने वाली आंखे, विनोदी स्वभाव, अतिकामुक, अस्थिर विचारधारा, यह चन्द्रमा से प्रभावित जातक के लक्षण हैं।

चंन्द्रमा के रोग :- चन्द्रमा शरीर में बाईं आंख, गाल, मांस, रक्त बलगम,
वायु, स्त्री में दाईं आंख, पेट, भोजन नली, गर्भाशय, अण्डाशय, मूत्राशय. चन्द्र कुण्डली में कमजोर या पिडित हो, तो व्यक्ति को ह्रदय रोग, फेफडे, दमा, अतिसार, दस्त गुर्दा, बहुमूत्र, पीलिया, गर्भाशय के
रोग, माहवारी में अनियमितता, चर्म रोग, रक्त की कमी, नाडी मण्डल, निद्रा, खुजली, रक्त दूषित होना, फफोले, ज्वर, तपेदिक, अपच, बलगम, जुकाम, सूजन, जल से भय, गले की समस्याएं, उदर-पीडा, फेफडों में सूजन, क्षयरोग, चन्द्रमा से प्रभावित जातक बार-बार विचार बदलने वाला होता है।

चंद्रमा के बली और निर्बल होने पर :-

बाली:- जन्मकुंडली में चन्द्रमा यदि अपनी ही राशि में या मित्र, उच्च राशि षड्बली, शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो, चन्द्रमा की शुभता में वृद्धि होती है, जन्म कुण्डली में चंद्रमा यदि मजबूत एवं बली अवस्था में हो तो, व्यक्ति समस्त कार्यों में सफलता पाने वाला तथा मन से प्रसन्न रहने वाला होता है, पद प्राप्ति व पदोन्नति, जलोत्पन्न, तरल व श्वेत पदार्थों के कारोबार से लाभ मिलता है।

निर्बल:- यदि चन्द्रमा कृष्ण पक्ष की एकादशी से शुक्ल पक्ष की पंचमी के बीच का अथवा नीच या शत्रु राशि में हो, तथा अशुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो, चंद्रमा निर्बल हो जाता है, ऎसी स्थिति में निद्रा व आलस्य घेरे रहता
है, व्यक्ति मानसिक रुप से बेचैन रहता है, उसका मन चंचलता से भरा रहता है, मन में भय व्याप्त रहता है।

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​राहु

कैसे प्रभावित करता है, राहु मनुष्य के स्वभाव को:-

Dr.R.B.Dhawan

राहु ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में एक छाया ग्रह कहा गया है, अर्थात इस ग्रह का कोई अपना पिंड नहीं है, वस्तुत: यह दो ग्रहों के भ्रमण मार्ग का कटाव बिंदु मात्र है, परंतु फिर भी कभी-कभी इस ग्रह (कटाव बिंदु) का मनुष्य के मन मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। राहु की प्रवृति राक्षसी होने के कारण ये मनुष्य को तामसिक प्रवृति का अपना गुण प्रदान कर ही देता है, कुंडली में नकारात्मक राहु से प्रभावित व्यक्ति अक्सर भ्रमित रहता है।

पौराणिक धारणा

कैसे बना राहू ग्रह? क्या है राहू ?:-

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हिरन्यकश्यप की सिंहिका नामक पुत्री का विवाह विप्रचिति नामक दानव के साथ हुआ था उसी के गर्भ से राहु ने जन्म लिया। विप्रचिति हमेशा दानवी शक्तियों, आसुरी शक्तियों से दूर रहे और साथ ही समुद्र मंथन के समय अमृतपान के कारण राहु को अमरत्व एवं देवत्व की प्राप्ति हुई। तभी से शिव भक्त राहु अन्य ग्रहों के साथ ब्रह्मा जी की सभा में विराजमान रहते हैं इसलिए इन्हें ग्रह के रूप में मान्यता मिली।

क्या है राहू ?

जन्मकुंडली में राहु पूर्व जन्म के कर्मों के बारे में बताता है, राहु परिवर्तनशील, अस्थिर प्रकृति का ग्रह माना जाता है। राहु में अंतर्दृष्टि भी होती है ताकि वह काल की रचनाओं के बारे में सोच सके बता सके। भौतिक दृष्टि से इसका कोई रंग, रूप, आकार नहीं है, इसकी कोई राशि, वार नहीं होता। वैदिक ज्योतिषियों ने इसकी स्वराशि, उच्च राशि और मूलत्रिकोण राशियों की कल्पना की है। जातक परिजात में राहु की उच्च राशि मिथुन, मूलत्रिकोण कुंभ और स्वराशि कन्या मानी गई है। राहु का व्यवहार अत्यंत प्रभावशाली देखा गया है। राहु पूर्वाभास की योग्यता भी विकसित करता है। विशेषकर जब राहु जल राशियों कर्क, वृश्चिक, मीन में हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि हो।

राहु छुपे हुए रहस्यों, तंत्र, मंत्र, काला जादू व भूत प्रेत का कारक भी है। राहु की तामसिक प्रवृत्ति के कारण वह चालाक है और व्यक्ति को भौतिकता की ओर पूर्णतया अग्रसर करता है, बहुत महत्वाकांक्षी व लालची बनाता है, जिसके लिए व्यक्ति साम-दाम-दंड-भेद की नीतियां अपनाकर जीवन में आगे बढ़ता है।

 इसी तरह यह व्यक्ति को भ्रमित भी रखता है। एक के बाद दूसरी इच्छाओं को जागृत करता है। इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह विभिन्न धार्मिक कार्य व यात्राएं भी करता है। राहु प्रधान व्यक्ति में दिखावा करने की प्रवृत्ति विशेष रूप से पायी जाती है। राहु कार्य जाल में फंसाता है, जीवन में आकर्षण को बनाये रखता है, हार नहीं मानता अर्थात इच्छा शक्ति को जागृत रखता है।

 राहु का योग जन्म पत्रिका में जिस ग्रह के साथ होगा उसी में विकार उत्पन्न हो जायेगा और केतु का योग जिस ग्रह के साथ होगा उसकी काट होगी। उसका दोष कम हो जायेगा। कोई भी ग्रह राहु के मुख में होगा उस व्यक्ति का व्यवहार उस भाव से संबंधित असंयमित हो जायेगा।

 सूर्य के निकट रहने पर राहु सूर्य का सारा बल ग्रहण कर लेता है । इस प्रकार राहु चंद्र के साथ मन की स्थिति बहुत अव्यवस्थित करके मन में उथल-पुथल मचा देता है। विचारों और भावनाओं में विकार उत्पन्न हो जाता है। ऐसा देखने में आया है कि जिन जातकों की जन्मपत्रिका में राहु और चंद्रमा की युति हो वे बहुत परेशान देखे गये हैं, मानसिक सामंजस्यता की बेहद कमी देखी गयी है। अन्य पाप ग्रहों का भी दृष्टि या युति संबंध हो तो मानसिक रोगी व पागलपन की स्थिति भी देखी गयी है।

 राहु गुरु के साथ मिलकर गुरु चांडाल योग का निर्माण करता है जो विवाह व ज्ञान प्राप्ति में बाधा बन जाता है। इस प्रकार राहु सभी ग्रहों के साथ युति करके किसी न किसी प्रकार का विकार उत्पन्न करता है। किंतु यह सब फल राहु की दशा अंतर्दशा आने पर ही मिलते हैं। मित्र राशियों में शुभ व शत्रु राशियों में अशुभ फल देते हैं। राहु के परिणाम शुभ मिलेंगे या अशुभ यह मूलतः नक्षत्रों द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।राहु के अपने नक्षत्र हैं आद्रा, स्वाति एवं शतभिषा। इन नक्षत्रों में राहु रहने पर शुभ परिणाम देता है।

ज्योतिष शास्त्रों में राहु पीड़ा को भूत, प्रेत, पिशाच, मसान आदि भी कहा गया है, आयुर्वेद के ग्रंथों में भूत-बाधा को एक विशेष प्रकार की मानसिक बीमारी बताया गया है। आगे की पंक्तियों में कुछ ग्रह योग दे रहा हूं, जो कुंडली में हों तो जातक को अपना प्रभाव दिखाते हैं:-

— लग्न में राहु तथा चंद्र और त्रिकोण में मंगल व शनि हों, तो जातक को प्रेत पीड़ा होती है।

— चंद्र राहु से युक्त अथवा पाप ग्रह से दृष्ट हो, शनि सप्तम में हो तथा कोई शुभ ग्रह चर राशि में हो, तो भूत पीड़ा होती है।

— शनि तथा राहु लग्न में हो, तो जातक को भूत सताता है।

— लग्नेश या चंद्र से युक्त राहु लग्न में हो, तो प्रेत पीड़ा होता है।

— यदि दशम भाव का स्वामी आठवें या एकादश भाव में हो और उस भाव के स्वामी से दृष्ट हो, तो ऐसी स्थिति में प्रेत पीड़ा होता है।

— नीच राशि में स्थित राहु के साथ लग्नेश हो तथा वह लग्नेश सूर्य, शनि व अष्टमेश से दृष्ट हो तो जातक को भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

— पंचम भाव में सूर्य तथा शनि हो, निर्बल अथवा राहु युक्त चन्द्रमा सप्तम भाव में हो तथा बृहस्पति बारहवें भाव में हो, तो भी भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

— जन्म समय चन्द्र ग्रहण हो और लग्न, पंचम तथा नवम भाव में पाप ग्रह हों तो जन्मकाल से ही पिशाच बाधा का भय होता है।

— षष्ठ भाव में पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट राहु या केतु की स्थिति भी पैशाचिक बाधा उत्पन्न करती है।

— लग्न में शनि, राहु की युति हो अथवा दोनों में से कोई भी एक ग्रह स्थिति हो अथवा लग्नस्थ राहु पर शनि की दृष्टि हो, भ्रम होता है।

— लग्नस्थ केतु पर कई पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो, पैशाचिक बाधा होती है।

— निर्बल चन्द्रमा शनि के साथ अष्टम में हो तो पिशाच, भूत-प्रेत मशान आदि का भय।

— निर्बल चन्द्रमा षष्ठ अथवा बाहरहवें में मंगल, राहु या केतु के साथ हो तो भी पिशाच भय।

— चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) के लग्न में राहु और लग्नेश पर यदि षष्ठेश की दृष्टि हो।

— एकादश भाव में मंगल राहु हो तथा नवम भाव में स्थिर राशि (वृष, सिंह,वृश्चिक, कुंभ) और सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु मीन) हो।

— लग्न भाव मंगल से दृष्ट हो तथा षष्ठेश, दशम, सप्तम या लग्न भाव में राहु की स्थिति हों।

— मंगल यदि लग्नेश और राहु के साथ केंद्र या लग्न भाव में स्थिति हो तथा छठे भाव का स्वामी लग्नस्त हो।

— पापग्रहों से युक्त या दृष्ट केतु लग्नगत हो।

— शनि राहु केतु या मंगल में से कोई भी एक ग्रह सप्तम स्थान में हो।

— जब लग्न में चन्द्रमा के साथ राहु हो और त्रिकोण भावों में क्रूर ग्रह हों तो, मानसिक व्याधियां कष्ट देती हैं।

— राहु शनि से युक्त होकर लग्न में स्थित हो तो, मानसिक व्याधियां होती हैं।

— लग्नेश एवं राहु अपनी नीच राशि का होकर अष्टम भाव या अष्टमेश से संबंध करे।

— राहु अष्टम भाव में हो तथा लग्नेश शनि के साथ द्वादश भाव में स्थित हो, तो प्रेत बाधा का प्रभाव संभव होता है।

— द्वितीय में राहु द्वादश में शनि षष्ठ मं चंद्र तथा लग्नेश भी अशुभ भावों में हो।

— चन्द्रमा तथा राहु दोनों ही नीच राशि के होकर अष्टम भाव में हो।

— चतुर्थ भाव में राहु हो वक्री मंगल द्वादश भाव में हो तथा अमावस्या तिथि का जन्म हो तो, नकारात्मक ऊर्जा परेशान करती हैं।

— नीचस्थ सूर्य के साथ केतु हो तथा उस पर शनि की दृष्टि हो तथा लग्नेश भी नीच राशि का हो तो, नकारात्मक ऊर्जा पीड़ित करती है।

— जिन जातकों की कुण्डली में उपरोक्त योग हों, उन्हें विशेष सावधानी पूर्वक रहना चाहिए तथा संयमित जीवन शैली को ग्रहण करना चाहिए। जिन परिस्थितियों के कारण भ्रम अथवा प्रेत बाधा का प्रकोप हो सकता है उनसे बचें। जातक को भ्रम, नकारात्मक ऊर्जा अथवा प्रेतबाधा से मुक्त रखने में यह उपाय सहायक सिद्ध हो सकते हैं:-

— शारीरिक सुचिता के साथ-साथ मानसिक पवित्रता का ध्यान रखें।

— नित्य हनुमान चालीसा तथा बजरंग बाण का पाठ करें।

— मंगलवार का व्रत रखें तथा सुन्दरकांड का पाठ करें।

— पुखराज रत्न से प्रेतात्माएं दूर रहती हैं, पुखराज रत्न धारण करें।

— घर में नित्य शंख बजाये, इससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।

— नित्य गायत्री मंत्र की तीन माला जाप करें।

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नीचभंग राजयोग

नीचभंग राजयोग

Dr.R.B.Dhawan :- 

किसी जातक की जन्मकुंडली में जितने ग्रह बलवान होते हैं, उसकी जन्मकुंडली उतनी ही अधिक बलवान मानी जाती है। इसके अतिरिक्त जन्मकुंडली में जितने ग्रह उच्च राशि में होंगे वह जन्मकुंडली उतनी ही मजबूत होती है । सामान्य स्थिति में तो जन्मकुंडली में कोई ग्रह नीच राशिगत हो तो जन्म कुंडली प्रभावहीन मानी जाती है। नीच ग्रह को देखते ही कुछ ज्योतिषी तो अशुभ फल की घोषणा ही कर देते हैं। भले ही वह प्रभाव किसी अन्य ग्रह के द्वारा दिया गया हो। परंतु मंत्रेश्वर ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ फलदीपिका में इस सिद्धांत का एक दूसरा पहलू भी प्रकाशित किया है, जो की उपरोक्त सिद्धांत के विपरीत है – जन्मकुंडली में नीच राशि के ग्रह होने पर भी कभी-कभी ग्रहों की विशेष स्थिति के कारण जन्मकुंडली में राजयोग का निर्माण होता है।

निचस्थिति जन्मनि यो ग्रह: स्थतदराशिनाथोsपि तदुचनाथा: । 

स चंद्र लग्नायदी केन्द्रवर्ती राजा भवेदधार्मिक चक्रवर्ती  ।।26।।

मंत्रेश्वर ने कहा है- जिन जातको की जन्म कुंडली में नीचभंग राजयोग होता है, वे चट्टानो से भी जल निकालने की क्षमता रखते हैं। ऐसे जातक बहुत अधिक मेहनती होते है, और अपने दम पर एक मुकाम हासिल करते हैं। ये जातक जिस क्षेत्र में भी जाते हैं वही अपनी अमिट छाप बना देते हैं । चाहे दुनिया इनके पक्ष में हो या विपक्ष में इनको सफलता मिलना तय होता हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रमोदी कि कुंडली इसका एक उदाहरण है, जिसमें वृश्चिक लग्न में चंद्रमा और मंगल दोनों स्थित हैं, लग्न में चंद्रमा नीच राशिगत केंद्र में है। आइए देखें कैसे बनते हैं ये नीचभांग राज योग –

1. जातक के जन्म के समय कोई भी एक ग्रह अगर नीच राशिगत हो तो, वो जिस राशि मे नीच होता है, उस राशि का स्वामी यदि चंद्र से केंद्र में हो तो ग्रह का निचभंग होता है ।

2. निचग्रह जिस राशि में उच्च का होता है, उस राशि का स्वामी यदि चंद्र सेे केंद्र में हो तो उस ग्रह का नीचभंग होता है, व जातक राजा होता है, अथवा उच्च पद प्राप्त करता है।

3. जो ग्रह नीच राशिगत होता है, उस राशि का उच्चनाथ यदि चंद्र राशि से केंद्र में हो तो नीचभंग होता है, ऐसा मानते हैं।

4. जो ग्रह नीच राशि मे नीच होता है, वही ग्रह उस राशि स्वामी से यदि युक्त अथवा दृष्ट है, तो नीचभंग राजयोग होता है। परंतु वह नीच ग्रह 6 – 8 – 12 स्थान में नही होना चाहिए (अन्य स्थान में हो तो नीच भंग होता है।) यह योग प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की कुंडली में है।
5. जो ग्रह नीच हो, और नीच ग्रह के राशि स्वामी, व नीच ग्रह जिस राशि मे उच्च होता है, उसका स्वामी ये एक दूसरे से केंद्र में हो तो नीचभंग राजयोग होता है ।

6. नीच ग्रह और नीच ग्रह का राशि स्वामी जिस राशि मे उच्च होता है, वह राशि स्वामी ये दोनों ग्रह यदि लग्न से केंद्र में हो तो नीचभंग होता है।
7. नीच ग्रह का नवमांश स्वामी लग्न के केंद्र व त्रिकोण में हो तो नीचभंग होता है (लग्न व लग्नेश चर राशि मे हों तो यह योग बनता है)
8. नीच ग्रह का राशि स्वामी लग्न व चंद्र से त्रिकोण में हो तो नीचभंग होता है।

9. नीच ग्रह का राशि स्वामी, जहाँ उच्च होता है, वो ग्रह व नीच ग्रह का उच्चनाथ चंद्र के त्रिकोण में हे तो नीचभंग होता है ।।
ऊपर दिये हुये नियम से किसी ग्रह का यदि नीचभंग हुवा है तो भी ये देखना आवश्यक है कि वह योग किस दर्जे का बलवान नीच भंग राजयोग बना रहा है।

विशेष:- इस प्रकार के योग जन्मकुंडली में सैकड़ों बनते हैं, परंतु उन योगों के साथ-साथ एेसे योगों को देखना भी जरूरी है, जो राज योगों को भंग या नगण्य कर देते हैं।

समय समय पर मैं ज्योतिष के ग्रंथों का सार लेकर आर्टिकल लिखता रहता हूं। आप यदि मेरे लेख पसंद करते हैं तो Aap Ka Bhavishya मेरी Android app अवश्य डाउनलोड कीजिए। यह एक ज्योतिषीय पत्रिका की एप है, जो पत्रिका गत 17 वर्षों से निरंतर प्रकाशित होती रही है। आज इलैक्ट्रोनिक मीडिया का युग है, इस लिसे यह मेगज़ीन को भी नये रूप में प्रस्तुत करना जरूरी हो गया था, अत: Aap Ka Bhavishya अवश्य डाउनलोड कीजिए।

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Diwali muhurat 2017

2015 Diwali Muhurat

Diwali Pooja muhurat 2017

by :-​Dr.R.B.Dhawan

diwali 2017 का पर्व 19 अक्टूबर 2017 बृहस्पिवार के दिन है। कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि प्रदोषकाल, स्थिर लग्न में अथवा  महानिशीथ काल, स्थिर लग्न में अनुकूल चौघडिया के समय गणेश सहित देवी महालक्ष्मी-महाकाली-महासरस्वती diwali Pooja की पूजा-आराधना Laxmi pooja करने से यह देवीयां भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं।

इस वर्ष दीपावली depawli pooja, Laxmi Pooja का पर्व 19 अक्तूबर 2017 बृहस्पतिवार के दिन होगा। दिल्ली की समय गणना अनुसार इस दिन अमावस्या रात्रि 24:44 तक रहेगी, चित्रा नक्षत्र 19:28 से आरंभ होगा, वृष (स्थिर लग्न) 19:11 से 21:06 तक रहेगी। निशीथ काल nishith kaal 20:20 से 22:54 तक, प्रदोष काल pradosh kaal 17:46 से 20:20 तक रहेगा। दीपावली की शाम प्रदोष काल में स्नान के उपरांत वस्त्राभूषण धारण करके धर्मस्थल पर श्रद्धापूर्वक दीपदान करके शुभ मुहूर्त अनुकूल चौघडिया में अपने निवास स्थान पर श्री गणेश सहित देवी महालक्ष्मी महाकाली महासरस्वती और कुबेर की पूजा diwali pooja करनी चाहिए।

महालक्ष्मी Laxmi Pooja पूजन विशेष मुहूर्त diwali muhurat 2017, :-   (1). सायं 19 : 11 से 20 : 20 तक। (2). रात्रि 20 : 20 से 20 : 59 तक। यह दोनों मुहूर्त वृष लग्न के हैं।

Diwali Special muhurt 2017, मध्य रात्रि महानिशीथ काल सिंह लग्न : 25 : 39 से 25 : 48 तक है।

Diwali muhurat by:- Dr.R.B.Dhawan, Top astrologer in Delhi, Best astrologer in India 


कर्ज की समस्या

कर्ज की समस्या और ज्योतिषीय कारण:-

Dr.R.B.Dhawan:-

       जन्म होते ही हम अपने प्रारब्ध के चक्र से बंधे होते हैं, और जन्मकुंडली हमारे इसी प्रारब्ध को सूचित करती है। हमारे जीवन में सभी घटनाएं नवग्रह द्वारा ही सूचित होती हैं। आज के समय में जहाँ आर्थिक असंतुलन हमारी चिंता का एक मुख्य कारण है, वहीँ एक दूसरी स्थिति जिसके कारण अधिकांश लोग चिंतित और परेशान रहते हैं वह है “कर्ज की स्थिति” धन चाहे व्यक्तिगत लिया गया हो, या सरकारी लोन के रूप में, ये दोनों ही स्थितियां व्यक्ति के ऊपर एक बोझ के समान बनी रहती हैं, कई बार ना चाहते हुये भी परिस्थितिवश व्यक्ति को कर्ज रुपी बोझ का सामना करना ही पड़ता है, वैसे तो आज के समय में अपने कार्यो की पूर्ती के लिए अधिकांश लोग कर्ज लेते हैं, परन्तु जब जीवन पर्यन्त बनी रहे या बार-बार यह स्थिति सामने आये तो वास्तव में यह भी हमारी कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोगों के द्वारा ही सूचित होती है।कुंडली में “छटा भाव” कर्ज का भाव माना गया है, अर्थात कुंडली का छटा भाव ही व्यक्ति के जीवन में कर्ज की स्थिति को सूचित करता है, जब कुंडली के :-

छटे भाव में कोई पाप योग बना हो, या षष्टेश ग्रह बहुत पीड़ित हो तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है जैसे – 

यदि छटे भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में भावस्थ हो, छठ्ठेे भाव में राहु-चन्द्रमाँ की युति हो, राहु-सूर्य के साथ होने से ग्रहण योग बन रहा हो, छठ्ठेे भाव में राहु मंगल का योग हो, छठ्ठे भाव में गुरु-चाण्डाल योग बना हो, शनि-मंगल या केतु-मंगल की युति छठ्ठे भाव में हो तो …ऐसे पाप या क्रूर योग जब कुंडली के छटे भाव में बनते हैं तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या बहुत परेशान करती है और री-पेमेंट में बहुत समस्यायें आती हैं। 

छठ्ठे भाव का स्वामी ग्रह भी जब नीच राशि में हो अष्टम भाव में हो या बहुत पीड़ित हो तो कर्ज की समस्या होती है । इसके अलावा “मंगल” को कर्ज का नैसर्गिक नियंत्रक ग्रह माना गया है ! अतः यहाँ मंगल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है यदि कुंडली में मंगल अपनी नीच राशि (कर्क) में हो आठवें भाव में बैठा हो, या अन्य प्रकार से अति पीड़ित हो तो भी कर्ज की समस्या बड़ा रूप ले लेती है”   

विशेष: – यदि छठ्ठे भाव में बने पाप योग पर बलवान बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो कर्ज का रीपेमेंट संघर्ष के बाद हो जाता है या व्यक्ति को कर्ज की समस्या का समाधान मिल जाता है परन्तु बृहस्पति की शुभ दृष्टि के आभाव में समस्या बनी रहती है।

छठ्ठे भाव में पाप योग जितने अधिक होंगे उतनी समस्या अधिक होगी, अतः कुंडली का छठा भाव पीड़ित होने पर लोन आदि लेने में भी बहुत सतर्कता बरतनी चाहिये।

बहुत बार व्यक्ति की कुंडली अच्छी होने पर भी व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है, जिसका कारण उस समय कुंडली में चल रही अकारक ग्रहों की दशाएं या गोचर ग्रहों का प्रभाव होता है, जिससे अस्थाई रूप से व्यक्ति उस विशेष समय काल के लिए कर्ज के बोझ से घिर जाता है।

उदाहरणार्थ : अकारक षष्टेश और द्वादशेश की दशा व्यक्ति को कर्ज की समस्या देती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में अलग-अलग ग्रह-स्थिति और अलग-अलग दशाओं के कारण व्यक्तिगत रूप से तो कुण्डली विश्लेषण के बाद ही किसी व्यक्ति के लिए चल रही कर्ज की समस्या के लिए सटीक ज्योतिषीय उपाय निश्चित किये जा सकते हैं। अतः यहाँ हम कर्जमुक्ति के लिए ऐसे कुछ मुख्य उपाय बता रहे हैं, जिन्हें कोई भी व्यक्ति कर सकता है:-

उपाय :- 
1. मंगल यन्त्र को घर के मंदिर में लाल वस्त्र पर स्थापित करें, और प्रतिदिन इस मंत्र का एक माला जाप करें :- ॐ क्राम क्रीम क्रोम सः भौमाय नमः।

2. प्रति दिन *ऋणमोचन मंगल स्तोत्र* का पाठ करें। 

3. *हनुमान चालीसा* का पाठ करें। 

शनिश्चरी अमावस्या

शनिश्चरी अमावस्या जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं-

  1. ग्रह दोष
  2. पितृदोष
  3. सहभागी कृत दोष

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष- आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

शनैश्चरी अमावस्या-

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री- इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य है, उन सभी के नाप की ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ प्राप्त कर लेनी चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित की गई हो। यह मुद्रिका ऐसी होनी चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

 

 

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण भारतीय ऋषियों ने 16 संस्कारों के रूप में जो अनुशासित व्यवस्था व्यक्तित्व निर्माण के लिये रूपान्तरित की है, उसमें विवाह संस्कार का स्थान महत्वपूर्ण है। विवाह पीढ़ी-विस्तार का समाज सम्मत हेतु है। विवाह विभिन्न सभ्यताओं, सुसंस्कृतियों, संस्कारों, विचार धाराओं और भाव धाराओं के सम्पर्क का भी हेतु है।

विवाह नामक रसपूर्ण संस्कार के प्रति व्यक्ति कि उत्कंठा, जिज्ञासा और लालसा सहज ही है। किन्तु नियति सबके प्रति समान रूप से उदार नहीं होती। आज उचित समय पर विवाह सम्पन्न होना एक दुःसाध्य प्रक्रिया हो गई है- विशेषतः कन्या पक्ष के संदर्भ में। ग्रहों का अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन पर निर्विवाद रूप से पड़ता है। इस संदर्भ में आस्था अनास्था से कोई अन्तर नही पड़ता। जैसे किसी बंद कमरे में बैठकर सूर्य के आलोक अथवा तेज का प्रतिवाद नही किया जा सकता उसी प्रकार ज्योतिष भाग्य और ईश्वर में अश्रद्धा उसके मौलिक प्रभाव को क्षति नही पहुँचाती। इस सत्य को निरन्तर ध्यान में रखना चाहिए। व्यक्ति के जीवन में जन्म के समय ग्रहों की स्थिति एक प्रमुख भूमिका रखती है।

समस्त जीवन इनकी शुभता-अशुभता, सुसंयोगिता- कुसंयोगिता और प्रभुता-क्षीणता के द्वारा निर्धारित होता है। व्यक्ति आजीवन अपनी नियति से संघर्ष करता है और पराभूत होने का दर्शन सीखता है। कन्या के विवाह में अनपेक्षित विलम्ब देखकर अभिभावक चिन्ता के महासमुद्र में निमग्न हो जाते हैं।

अपनी समस्त शक्ति और सामाजिक परिचय का उपयोग करके भी वे अपनी कन्या के लिए उपयुक्त वर नहीं प्राप्त कर पाते। जीवन ऐसे अभावों का क्रूर साक्षात्कार है।

जीवन के अभावों की पूर्ति के लिए मानव ने तंत्र-मंत्र-यंत्र का भी समय समय पर प्रयोग-उपयोग किया है। सर्वप्रथम मंत्र के अर्थ विस्तार की संक्षिप्त विवेचना अनिवार्य है। वैदिक ऋचाओं से दैवी शक्तियों की स्तुतियों, यज्ञादि के लिए विचरित पदों एवं शब्द प्रतीकों तक मंत्र की एक सुसंस्कृत परम्परा प्रवाहमान है। मंत्र शब्द की सामथ्र्य का चरणतम केन्द्रियभूत आह्नान है। ‘मंत्र’ शब्द मंत्रि गुप्तभाषणे’’ धातु से घ् प्रत्यय द्वारा निष्पन्न होता है जिसका तात्पर्य है रहस्य। वह रहस्य जो देवोपम है किन्तु मानवीय अनुभूति का विषय है। तंत्र साहित्य के मतानुसार वह प्रत्येक शब्द मंत्र है जो देवता की स्तुति में निवेदित है। श्रुति, स्मृति, पुराण, उपनिषद, आगम और निगम सभी मंत्रों के उल्लेख से परिपूर्ण हैं। यह सत्य है कि वैदिक मंत्र जितने शक्तिसम्पन्न हैं, उनकी साधना उतनी हीं दुरूह और दुष्कर है। इसलिए वेदोक्त मंत्रों के स्थान पर तंत्र शास्त्र आज किंचित् सहज समझा जाता है। इस तथ्य के विस्तार में जाना इसलिए अप्रासंगिक होगा क्योंकि इस लेख की केन्द्रिय वस्तु है कि विवाह योग्य युवक या कन्या के विवाह में विलम्ब होने पर किन मंत्रो के प्रयोग से आशानुकूल सफलता प्राप्त होगी। अनुभव से सिद्ध हो चुका है कि युवक या कन्या के विवाह मे आने वाली अनेकानेक बाधाओं की शांति मंत्रशक्ति से सुनिश्चित हो सकती है।

जन्मांग में शनि की स्थिति, शनि द्वारा प्रचालित स्थिति, राशियाँ, नक्षत्र और भाव आदि का अध्ययन करना चाहिए। यदि शनि शुक्र से युक्त होकर, सूर्य अथवा चन्द्र किसी एक ग्रह पर दृष्टि निक्षेप करता हो तो विवाह मे विलम्ब होता है। यदि सूर्य अथवा चन्द्र या दोनों संयुक्त रूप से शनि के नवांश में स्थित हों और शुक्र भी शनि से अक्षिप्त हो तो विवाह में आशा के विपरीत विध्न उपस्थित होतें हैं। सप्तम भाव अथवा लग्न के पाप ग्रहक्रांत होने पर पापकर्तरि योग की स्थापना होती है जिसके परिणाम स्वरूप दाम्पत्य अनेकानेक संकटो से घिर जाता है। लग्न सप्तम भाव अथवा इसके अधिपति ग्रह यदि सूर्य और शनि, शनि और मंगल, शनि और राहु, आकर सूर्य जैसे क्रूर ग्रहों से आबद्ध होते हैं तो विवाह की दिशा में विलम्ब अथवा निषेध जैसे संकेत प्राप्त होते हैं। विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब तब भी होता है जब लग्नाधिपति, सप्तमाधिपति, चन्द्रराशि-अधिपति और स्वयं चन्द्र शनि से दृष्ट, युक्त अथवा द्वादश भावस्थ होते हैं। वक्री ग्रह की सप्तम भाव अथवा सप्तम भावेश पर दृष्टि अथवा स्थिति या युति विवाह में बाधा उत्पन्न करती हैं। इन्हीं स्थितियों में द्वितीय भाव या शुक्र हो तो विवाह विलम्बित होता है। पंचमेश और सप्तमेश का परस्पर परिवर्तन योग स्थापित हो अथवा राहु और शुक्र सप्तम अथवा नवम भाव में हों तथा क्रूर ग्रह की दृष्टि का कुसंयोग हो तो विवाह में ज्योतिषीय दृष्टि से विलम्ब की घोषणा की जा सकती है।

 

सरकारी नौकरी का योग

Dr.R.B.Dhawan

पराशरी ज्योतिष के सिद्धांत अनुसार सूर्य को ग्रहों का राजा कहा गया है, राजा अनेक प्रकार से सिद्ध होता है जैसे :- शरीर में सिर और मस्तिष्क जिनका कारक सूर्य है, अर्थात- शरीर पर सिर और मस्तिष्क शासन करते हैं। और सिर व मस्तिष्क पर आत्मा का शासन है। ठीक इसी प्रकार शहर पर विधायक, जिले पर सांसद और सांसदों पर मंत्री, मंत्रीमंडल पर प्रधानमंत्री का शासन होता है, इन सब का सहयोग करते हैं प्रशासनिक अधिकारी। इस प्रकार सूर्य को सौर परिवार का राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। जन्म कुंडली में सरकारी नोकरी के मामले में सूर्य की विभिन्न स्थितियां इस प्रकार फलदायी होती है :–

1- लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य स्थित हो तो व्यक्ति शाोषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है।

2- सूर्य की दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाती है। यहां चंन्द्रमा हो तो, चंद्रमा चंचल तथा अस्थिर ग्रह है, जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार-बार गुजरते हैं।

3- सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते हैं। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप-चुप तरीके से कार्य करने वाले होते हैं।

4-सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा भी प्राप्त होता है।

5- यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध सी.ए., एकाऊंट, गुरु- शिक्षा, बैंक या इंश्योरेंस, शुक्र फाइनेंस सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है।

6-सूर्य का चतुर्थ प्रभाव भी जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते हैं।

7- सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। ऐसे योग राजनीति में भी सफलता दिलाने वाले होते हैं। दशम स्थान कर्म का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है।

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