कर्ज की समस्या

Dr.R.B.Dhawan:-

कर्ज की समस्या और ज्योतिषीय कारण:-

         जन्म होते ही हम अपने प्रारब्ध के चक्र से बंधे होते हैं, और जन्मकुंडली हमारे इसी प्रारब्ध को सूचित करती है। हमारे जीवन में सभी घटनाएं नवग्रह द्वारा ही सूचित होती हैं। आज के समय में जहाँ आर्थिक असंतुलन हमारी चिंता का एक मुख्य कारण है, वहीँ एक दूसरी स्थिति जिसके कारण अधिकांश लोग चिंतित और परेशान रहते हैं वह है “कर्ज की स्थिति” धन चाहे व्यक्तिगत लिया गया हो, या सरकारी लोन के रूप में, ये दोनों ही स्थितियां व्यक्ति के ऊपर एक बोझ के समान बनी रहती हैं, कई बार ना चाहते हुये भी परिस्थितिवश व्यक्ति को कर्ज रुपी बोझ का सामना करना ही पड़ता है, वैसे तो आज के समय में अपने कार्यो की पूर्ती के लिए अधिकांश लोग कर्ज लेते हैं, परन्तु जब जीवन पर्यन्त बनी रहे या बार-बार यह स्थिति सामने आये तो वास्तव में यह भी हमारी कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोगों के द्वारा ही सूचित होती है।कुंडली में “छटा भाव” कर्ज का भाव माना गया है, अर्थात कुंडली का छटा भाव ही व्यक्ति के जीवन में कर्ज की स्थिति को सूचित करता है, जब कुंडली के :-

छटे भाव में कोई पाप योग बना हो, या षष्टेश ग्रह बहुत पीड़ित हो तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है जैसे – 

यदि छटे भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में भावस्थ हो, छठ्ठेे भाव में राहु-चन्द्रमाँ की युति हो, राहु-सूर्य के साथ होने से ग्रहण योग बन रहा हो, छठ्ठेे भाव में राहु मंगल का योग हो, छठ्ठे भाव में गुरु-चाण्डाल योग बना हो, शनि-मंगल या केतु-मंगल की युति छठ्ठे भाव में हो तो …ऐसे पाप या क्रूर योग जब कुंडली के छटे भाव में बनते हैं तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या बहुत परेशान करती है और री-पेमेंट में बहुत समस्यायें आती हैं। 

छठ्ठे भाव का स्वामी ग्रह भी जब नीच राशि में हो अष्टम भाव में हो या बहुत पीड़ित हो तो कर्ज की समस्या होती है । इसके अलावा “मंगल” को कर्ज का नैसर्गिक नियंत्रक ग्रह माना गया है ! अतः यहाँ मंगल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है यदि कुंडली में … मंगल अपनी नीच राशि(कर्क) में हो आठवें भाव में बैठा हो, या …अन्य प्रकार से अति पीड़ित हो तो भी कर्ज की समस्या बड़ा रूप ले लेती है”   

विशेष: – यदि छठ्ठे भाव में बने पाप योग पर *बलि बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो कर्ज का रीपेमेंट संघर्ष के बाद हो जाता है या व्यक्ति को कर्ज की समस्या का समाधान मिल जाता है परन्तु बृहस्पति की शुभ दृष्टि के आभाव में समस्या बनी रहती है।

छठ्ठे भाव में पाप योग जितने अधिक होंगे उतनी समस्या अधिक होगी, अतः कुंडली का छठा भाव पीड़ित होने पर लोन आदि लेने में भी बहुत सतर्कता बरतनी चाहिये।

बहुत बार व्यक्ति की कुंडली अच्छी होने पर भी व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है, जिसका कारण उस समय कुंडली में चल रही अकारक ग्रहों की दशाएं या गोचर ग्रहों का प्रभाव होता है, जिससे अस्थाई रूप से व्यक्ति उस विशेष समय काल के लिए कर्ज के बोझ से घिर जाता है।

उदाहरणार्थ : अकारक षष्टेश और द्वादशेश की दशा व्यक्ति को कर्ज की समस्या देती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में अलग-अलग ग्रह-स्थिति और अलग-अलग दशाओं के कारण व्यक्तिगत रूप से तो कुण्डली विश्लेषण के बाद ही किसी व्यक्ति के लिए चल रही कर्ज की समस्या के लिए सटीक ज्योतिषीय उपाय निश्चित किये जा सकते हैं। अतः यहाँ हम कर्जमुक्ति के लिए ऐसे कुछ मुख्य उपाय बता रहे हैं, जिन्हें कोई भी व्यक्ति कर सकता है:-

उपाय :- 
1. मंगल यन्त्र को घर के मंदिर में लाल वस्त्र पर स्थापित करें, और प्रतिदिन इस मंत्र का एक माला जाप करें :- ॐ क्राम क्रीम क्रोम सः भौमाय नमः।

2. प्रति दिन *ऋणमोचन मंगल स्तोत्र* का पाठ करें। 

3. *हनुमान चालीसा* का पाठ करें।

शनिश्चरी अमावस्या

शनिश्चरी अमावस्या जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं-

  1. ग्रह दोष
  2. पितृदोष
  3. सहभागी कृत दोष

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष- आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

शनैश्चरी अमावस्या-

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री- इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य है, उन सभी के नाप की ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ प्राप्त कर लेनी चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित की गई हो। यह मुद्रिका ऐसी होनी चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

 

 

सरकारी नौकरी का योग

Dr.R.B.Dhawan

पराशरी ज्योतिष के सिद्धांत अनुसार सूर्य को ग्रहों का राजा कहा गया है, राजा अनेक प्रकार से सिद्ध होता है जैसे :- शरीर में सिर और मस्तिष्क जिनका कारक सूर्य है, अर्थात- शरीर पर सिर और मस्तिष्क शासन करते हैं। और सिर व मस्तिष्क पर आत्मा का शासन है। ठीक इसी प्रकार शहर पर विधायक, जिले पर सांसद और सांसदों पर मंत्री, मंत्रीमंडल पर प्रधानमंत्री का शासन होता है, इन सब का सहयोग करते हैं प्रशासनिक अधिकारी। इस प्रकार सूर्य को सौर परिवार का राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। जन्म कुंडली में सरकारी नोकरी के मामले में सूर्य की विभिन्न स्थितियां इस प्रकार फलदायी होती है :–

1- लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य स्थित हो तो व्यक्ति शाोषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है।

2- सूर्य की दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाती है। यहां चंन्द्रमा हो तो, चंद्रमा चंचल तथा अस्थिर ग्रह है, जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार-बार गुजरते हैं।

3- सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते हैं। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप-चुप तरीके से कार्य करने वाले होते हैं।

4-सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा भी प्राप्त होता है।

5- यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध सी.ए., एकाऊंट, गुरु- शिक्षा, बैंक या इंश्योरेंस, शुक्र फाइनेंस सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है।

6-सूर्य का चतुर्थ प्रभाव भी जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते हैं।

7- सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। ऐसे योग राजनीति में भी सफलता दिलाने वाले होते हैं। दशम स्थान कर्म का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है।

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जन्म कुंडली के विशेष योग

यूं तो एक जातक की जन्मकुंडली में सैकड़ों योग बनते हैं, इनमें से कुछ योग बलवान होते हैं, और कुछ निर्बल। निर्बल योगों का फल कब फलित हुआ यह पता ही नहीं चलता, और बलवान योग अपना फलित प्रकट करते हुए स्पष्ट दिखाई देते हैं। इस लेख में कुंडली के कुछ विशेष योग बताए ज रहे हैं, जो अपना न्यूनाधिक फल देते हैं।

द्विभार्या योग :-

राहू लग्न में पुरुष राशि (सिंह के अलावा) में हो अथवा 7वें भाव में सूर्य, शनि, मंगल, केतु या राहू में से कोर्इ भी दो ग्रह (युति दृष्टि द्वारा) जुड़ जाएं तो द्विभार्या योग बनता है। (ऐसे में सप्तमेष व द्वादशेश की स्थिति भी विचारनी चाहिए)। अष्टमेश सप्तमस्थ हो तो द्विभार्या योग होता है।

राजयोग :-

नवमेश तथा दशमेश एकसाथ हो तो राजयोग बनता है। दशमेश गुरू यदि त्रिकोण में हो तो राजयोग होता है। एकादशेश, नवमेश व चन्द्र एकसाथ हो (एकादश स्थान में) तथा लग्नेश की उन पर पूर्ण दृष्ट हो तो राजयोग बनता है। ( राजयोग में धन, यश, वैभव, अधिकार बढ़ते है)

विपरीत राजयोग :-

6ठें भाव से 8वें भाव का सम्बन्ध हो जाएं। अथवा दशम भाव में 4 से अधिक ग्रह एक हो जाएं। या फिर सारे पापग्रह प्राय: एक ही भाव में आ जाए तो विपरित योग बनता है। इस राजयोग के भांति यदा तरक्की नही होती जाती। किन्तु बिना प्रयास के ही आकस्मिक रूप से सफलता, तरक्की धन या अधिकार की प्राप्ति हो जाती है।

आडम्बरी राजयोग :-

कुंडली में समस्त ग्रह अकेले बैठें हो तो भी जातक को राजयोग के समान ही फल मिलता है। किन्तु यह आडम्बरी होता है।

विद्युत योग :-

लाभेश परमोच्च होकर शुक्र के साथ हो या लग्नेश केन्द्र में हो तो विधुत योग होता है। इसमें जातक का भाग्योदय विधुतगति से अर्थात अति द्रुतगामी होता है।

नागयोग :-

पंचमेश नवमस्थ हो तथा एकादशेश चन्द्र के साथ धनभाव में हो तो नागयोग होता है। यह योग जातक को धनवान तथा भाग्यवान बनाता है।

नदी योग :-

पंचम तथा एकादश भाव पापग्रह युक्त हों किन्तु द्वितीय व अष्टम भाव पापग्रह से मुक्त हों तो नदी योग बनता है, जो जातक का उच्च पदाधिकारी बनाता है।

विश्वविख्यात योग :-

लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, दशम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक विश्व में विख्यात होता है। इसे विश्वविख्याति योग कहते है।

अधेन्द्र योग :-

लग्नकुंडली में सभी ग्रह यदि पांच से ग्यारह भाव के बीच ही हों तो अधेन्द्र योग होता है। ऐसी जातक सर्वप्रिय, सुन्दर देहवाला व समाज में प्रधान होता है।

दरिद्र योग :-

केन्द्र के चारों भाव खाली हों अथवा सूर्य द्वितीय भाव में तथा द्वितियेश शनि वक्री हों और 2, 8, 6, 12 या 3 भाव में हों तो लाख प्रयास करने पर भी जातक दरिद्र ही रहता है।

बालारिष्ट योग :-

चन्द्रमा 5, 7, 8, 12 भाव में हो तथा लग्न पापग्रहों से युत हो तो बालारिष्ट योग बनता है। अथवा चन्द्रमा 12वें भाव में क्षीण हो तथा लग्न व अष्टम में पापग्रह हों, केन्द्र में भी कोर्इ शुभ ग्रह न हो तो भी बालारिष्ट योग बनता है। बालारिष्ट योग में जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है। अथवा बाल्यवस्था में उसे मृत्यु तुल्य कष्ट झेलना पड़ता है।

मृतवत्सा योग :-

पंचमेश षष्ठ भाव में गुरू व सूर्य से युक्त हो तो जातक की पत्नी का गर्भ गिरता रहता है। अथवा मृत संतान पैदा होती है। अत: इसे मृतवत्सा योग कहते है।

छत्रभंग योग :-

राहू, शनि व सूर्य में से कोर्इ भी दो ग्रह यदि दशम भाव पर निज प्रभाव ड़ालते है। और दशमेश सबल न हो तो छत्रंभग योग बनता है। जातक यदि राजा है तो राज्य से पृथक हो जाता है। अन्यथा कार्यक्षेत्र व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयां व विघ्न आते है, तरक्की नही हो पाती।

चाण्डाल योग :-

क्रूर व सौम्य ग्रह एक ही भाव में साथ हों तो चाण्डाल योग बनता है। विशेषकर गुरू-मंगल, गुरू-शनि, या गुरू-राहू साथ हों तो। इससे योग के बुरे फल मिलते है। तथा जातक की संगति व सोच दूषित हो जाते है।

सुनफा योग :-

कुंडली में चन्द्रमा जहां हो उससे अगले भाव में (सूर्य को छोड़कर) यदि कोर्इ भी ग्रह बैठा हो तो सुनफा योग बनता है। इससे जातक का लाभ बढ़ता है। (यदि आगे बैठने वाला ग्रह सौम्य या चन्द्रमा का मित्र है तो शुभ लाभ व फल बढ़ते है। अन्यथा कुछ अपेक्षाकृत कमी आ जाती है)।

महाभाग योग :-

यदि जातक दिन में जन्मा है। (प्रात: से साय: तक) तथा लग्न, सूर्य व चन्द्र विषम राशि में है। तो महाभाग योग बनता है। यदि रात में जन्मा है। (साय: के बाद प्रात: से पूर्व) तथा लग्न, सूर्य व चंद्र समराशि में है। तो भी महाभाग योग बनता है। यह सौभाग्य को बढ़ाता है।

प्रेम विवाह योग :-

तृतीय, पंचम व सप्तम भाव व उनके भावेषों का परस्पर दृष्टि युति राशि से संबध हो जाए तो जातकों (स्त्री-पुरूष) में प्रेम हो जाता है। लेकिन यदि गुरू भी इन संबधो में शामिल हो जाए तो उनका प्रेम ‘प्रेम विवाह’ में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन तृतीय भाव व तृतीयेश न हो, केवल पंचम, सप्तम भाव व भावेश का ही दृष्टि, युति, राशि संबंध हों और गुरू भी साथ हो तो जातक प्रेम तो करता है, लेकिन जिससे प्रेम करता हेै। उससे विवाह नही करता। भले ही जातक स्त्री हो या पुरूष।

गजकेसरी योग :-

लग्न या चन्द्र से गुरू केन्द्र में हो तथा केवल शुभग्रहों से दृष्टयुत हो, अस्त, नीच व शत्रु राशि में न हो तो गजकेसरी योग होता है। जो जातक को अच्छी पहचान प्रतिष्ठा दिलाता है।

बुधादित्य योग :-

10वें भाव में बुध व सूर्य का योग हो। पर बुध अस्त न हो तथा सूर्य मित्र या उच्च का हो तो व्यापार में सफलता दिलाने वाला यह योग बुधादित्य योग के नाम से जाना जाता है।

पापकर्तरी योग :-

शुभ ग्रह जिस भाव में हो उसके पहले व बाद के भाव में क्रूरपापग्रह हों तो पापकर्तरी योग बनता है। इससे बीच के भाव में बैठा हुआ ग्रह पाप प्रभाव तथा दबाव में आकर पीड़ित होता है। अत: शुभ फल कम दे पाता है, उसी भाव में शुभ ग्रह दो पापग्रहों या दो से अधिक पापग्रहों के साथ बैठे तो पापमध्य योग बनता है।

सरकारी नौकरी/व्यवसाय का योग :-

जन्मकुंडली में बाएं हाथ पर ग्रहों की संख्या अधिक हो तो जातक नौकरी करता है। दाएं हाथ पर अधिक हों तो व्यापार करता है। सूर्य दाएं हाथ पर हों तो सरकारी नौकरी कराता है। शनि बाएं हाथ पर हो तो नौकरी कराता है। 10 वें घर से शनि व सूर्य का सम्बन्ध हो जाए (दृष्टियुतिराशि से) तो जातक प्राय: सरकारी नौकरी करता है। गुरू व बुध बैंक की नौकरी कराते है। बुध व्यापार भी कराते है। गुरू सुनार का अध्यापन कार्य भी कराता है।

विजातीय विवाह योग :-

राहू 7वें भाव में हो तो जातक का विवाह प्राय: विजातीय विवाह होता है। (पुरूष राशि में हो तो और भी प्रबल सम्भावनाएं होती है।

चक्रयोग :-

यदि किसी कुंडली में एक राशि से छ: राशि के बीच सभी ग्रह हों तो चक्रयोग होता है। यह जातक को मंत्री पद प्राप्त करने वाला होता है।

अनफा योग :-

यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा से पिछले भाव में कोर्इ शुभ ग्रह हों तो अनफा योग बनता है। इससे चुनाव में सफलता तथा अपने भुजाबल से यश, धन प्राप्त होता है।

भास्कर योग :-

सूर्य से दूसरे भाव में बुध, बुध से 11वें भाव में चन्द्र और चन्द्र से त्रिकोण में गुरू हो तो भास्कर योग होता है। ऐसा जातक प्रखरबुद्वि, धन, यश, रूप, पराक्रम, शास्त्र ज्ञान, गणित व गंधर्व विधा का जानकार होता है।

चक्रवती योग :-

यदि कुंडली के नीच /पाप ग्रह की राशि का स्वामी या उसकी उच्च राशि का स्वामी लग्न में हो या चन्द्रमा से केन्द्र (1,4,7,10) में हो तो जातक चक्रवती सम्राट या बड़ी धार्मिक गुरूनेता होता है।

कुबेर योग :-

गुरू, चन्द्र, सूर्य पंचमस्थ, तृतीयस्थ व नवमस्थ हो और बलवान स्थिति में भी हो तो जातक कुबेर के समान धनी व वैभवयुक्त होता है।

अविवाहित/विवाह प्रतिबंधक योग :-

चन्द्र पंचमस्थ हो या बलहीन अस्त पाप पीडित हो तथा 7वें व 12वें भाव में पापग्रह हो तो जातक कुंआरा ही रहता है। शुक्र व बुुध 7वें भाव में शुभग्रहों से दृष्ट न हों तो जातक कुंआरा रहता है। अथवा राहू व चन्द्र द्वादशस्थ हों तथा शनि व मंगल से दृष्ट हों तो जातक आजीवन कुंआरा रहता है। इसी प्रकार सप्तमेष त्रिकस्थान में हो और 6, 8, 12 के स्वामियों में से कोर्इ सप्तम भाव में हो तब भी जातक कुंआरा रहता है। शनि व मंगल, शुक्र व चन्द्र से 180° पर कुंडली में हो तो भी जातक कुंआरा रहता है।

पतिव्रता योग :-

यदि गुरू व शुक्र, सूर्य या मंगल के नवमांश में हो तो जातक एक पत्नीव्रत तथा महिला जातक पतिव्रता होती है। यदि द्वितीयेश व सप्तमेश नीच राशि में हो परन्तु सभी शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हो तो स्त्री जातक पतिव्रता तथा जातक एक पत्नीव्रत वाला होता है। बुध यदि गुरू के नवमांश में हों तो भी पतिव्रता योग होता है चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हो (महिला कुंडली) पाप प्रभाव में न हो तों भी स्त्री पति के लिए कुछ भी कर सकने वाली होती है।

अरिष्ट योग :-

शुक्लपक्ष की रात्रि का जन्म हो और छठे या 8वें भाव में चन्द्र हो तो सर्वारिष्ट नाशक योग होता है। जन्म राशि का स्वामी 1, 4, 7, 10 में स्थित हों तो भी अरिश्टनाशक योग होता है। चन्द्रमा, स्वराशि, उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो सर्वारिष्ट नष्ट होते है। चन्द्रमा के 10वें भाग में गुरू, 12वें में बुध, शुक्र व कुंडली के 12वें में पापग्रह हों तो भी अरिष्ट नष्ट होते है।

मूक योग :-

गुरू व षष्ठेश लग्न में हो अथवा बुध व षष्ठेश की युति किसी भी भाव (विशेषकर दूसरे) में हो। अथवा क्रूर ग्रह सनिध में और चन्द्रमा पापग्रहों से युक्त हो। या कर्क, वृश्चिक व मीन राशि के बुध को अमावस्य का चन्द्र सम्बन्ध है। तो मूक योग बनता है। इस योग में जातक गूंगा होता है।

विशेष योग :-

8 व 12 राशि पापग्रहों से युक्त हो तथा किसी भी राशि के अंतिम अंशो में वृष राशि का चन्द्र हो तथा चंद्र पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो जातक जीवन भर गूंगा रहता है।

बधिर योग :-

शनि से चौथे स्थान में बुध हो तथा षष्ठेश त्रिक भावों में हो तो बधिर योग होता है। अथवा पूर्ण चन्द्र व शुक्र साथ बैठे हो तो बधिर योग बनता है। 12वें भाव में बुध-शुक्र की युति हो अथवा 3, 5, 9, 11 भावों में पापग्रह बिना शुभ ग्रहों से दृष्ट हों अथवा 6,12 भाव में बैठे षष्ठेश पर शनि की दृष्टि न हो तो भी बधिर योग होता है।

पितृ-दोष

Dr.R.B.Dhawan

पितृ-दोष होता क्या है? –

हमारे ही पूर्वज सूक्ष्म लोक से अपने सूक्ष्म शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं, और महसूस करते हैं कि, हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति कोई श्रद्धा रखते हैं, और न ही इन्हें हमसे कोई प्यार या स्नेह है, और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं, ना ही अपने पूर्वजों के ऋण चुकाने का प्रयास करते हैं, तो ये आत्माएं दु:खी होकर अपने ही वंशजों को श्राप दे देती हैं, जिसे ‘पितृ-दोष’ कहा जाता है।

पितृ-दोष एक ऐसी बाधा है जो अदृश्य रहकर भी बहुत कष्ट देती है। ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण उत्पन्न होती है । पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं, जैसे :- आपके आचरण से, किसी परिजन द्वारा जानबूझ कर की गयी गलती से, श्राद्ध आदि कर्म ना करने से, अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण ऐसा हो सकता है।

पितृ-दोष के दुष्प्रभाव :-  मानसिक पीड़ा (टेंशन) अवसाद, व्यापार में हानि, परिश्रम के अनुसार फल न मिलना, वैवाहिक जीवन में समस्याएं, कैरिअर में समस्याएं, या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है। पितृ-दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति, गोचर, दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते, कितना भी पूजा पाठ, देवी, देवताओं की अर्चना की जाए, उसका शुभ फल नहीं मिल पाता।

पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है:-

1. अधोगति वाले पितरों के कारण।

2. उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण।

अधोगति वाले पितर :- इनके दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, और अतृप्त इच्छाएं, जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत उपभोग होने पर, विवाहादि में परिजनों द्वारा गलत निर्णय लिए जाने पर, परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं, ऐसे में पितर परिवार जनों को श्राप दे देते हैं, और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।

उर्ध्व गति वाले पितर :- सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।

इनके द्वारा उत्पन्न श्राप (पितृदोष) से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बाधित हो जाती है, फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जायें, कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जायें, उनका कोई भी कार्य पितृदोष के कारण सफल नहीं होता। पितृ-दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि, किस कोनसा ग्रह पितृदोष की सूचना दे रहा है? और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?

जन्म पत्रिका और पितृ-दोष :- जन्म पत्रिका में लग्न, पंचम, अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ-दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि, और राहू-केतु की स्थितियों से विचार किया जाता है।

इनमें से भी गुरु, शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ-दोष में महत्वपूर्ण होती है, इनमें सूर्य से पिता या पितामह, चन्द्रमा से माता या मातामह, मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।

अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु, शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है, इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ-साथ व्यक्ति यदि अपनी  कुंडली के अनुसार रुद्राक्ष भी धारण कर ले, तो पितृ-दोष का शीघ्र निवारण हो जाता है।

पितृ-दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है।

हर मनुष्य पर मुख्य रूप से 5 ऋण होते हैं, जिनका कर्म न करने (फर्ज पूरा नहीं करने पर) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है, ये ऋण (फर्ज) हैं :-  1. मातृ-ऋण, 2. पितृ-ऋण, 3. मनुष्य-ऋण, 4. देव-ऋण और 5. ऋषि-ऋण।

माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमें, मामी, नाना, नानी, मौसा, मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं, क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है, अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है, अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है, तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है।

पिता पक्ष के लोग जैसे बाबा, ताऊ, चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है, पिता हमें आकाश की तरह छत्र-छाया देता है, हमारा जिंदगी भर पालन-पोषण करता है, और अंतिम समय तक हमारे सारे दु:खों को खुद झेलता रहता है। पर आज के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ? पितृ-भक्ति करना मनुष्य का धर्म है, इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को ही झेलना पड़ता है, इससे घर में आर्थिक अभाव, दरिद्रता, संतान हीनता,ब संतान को विबिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि। माता-पिता प्रथम देवता हैं, जिसके कारण भगवान गणेश महान बने। इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी, दुर्गा माँ, भगवान विष्णु आदि आते हैं, जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है, हमारे पूर्वज भी अपने-अपने कुल देवताओं को मानते थे, लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है, इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं। जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए, वंश वृद्धि की, उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है, उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य संपन्न नहीं होते हैं, इसलिए उनका श्राप पीडी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है।

ऐसे परिवार को पितृ-दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है ।रामायण में श्रवण कुमार के माता-पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा, ये जग-ज़ाहिर है इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ-दोषों का निवारण करना बहुत आवश्यक है।

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Dukh Nashak Shani Dev सर्व दुःख नाशक शनि देव

Shani Dev

Sarv Dukh Nashak Shani Dev सर्व दुःख नाशक शनि देव

Shani Dev
Sarv Dukh Nashak Shani Dev

समस्त ग्रहों में शनिदेव(shani dev)  ही ऐसे ग्रह हैं, जो अत्यन्त क्रोधी होते हये भी अत्यन्त दयालु कहे गये हैं। इनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं, तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।

पौराणिक कथाओं में शनि(shani dev) को सूर्य-पुत्र, यम का भाई, अपने भक्तों को अभय देने वाला, समस्त विघ्नों को नष्ट करने वाला एवं सम्पूर्ण सिद्धियों का दाता कहा गया है। जबकि ज्योतिष की दृष्टि में शनि एक क्रूर ग्रह है। कहा गया है, कि यह क्रूर ग्रह एक ही पल में राजा को रंक बना देता है।

जब बात आती है शनि दशा या साढेसाती की, तो हमारा भयभीत एवं चिन्तित होना स्वाभाविक होता है। समस्त ग्रहों में शनिदेव ही ऐसे ग्रह हैं, जो अत्यन्त क्रोधी होते हुये भी अत्यन्त दयालु हैं। इनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं, तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।

जब सृष्टि की रचना आरम्भ हुई, तो सृष्टि रचना का कार्यभार ब्रह्मा ने संभाला, विष्णु ने जीवों के पालन एंव उनकी रक्षा का उत्तरदायित्व लिया और भगवान शंकर को आवश्यकता पड़ने पर सृष्टि का संहार एवं दुष्ट जनों के विनाश का कार्य सौंपा गया। अपने भक्तों की रक्षा एवं पतितों को उनके पापों का दण्ड देने के लिये शिवजी ने अपने गणों की उत्पत्ति की।

सूर्य पुत्र यम एवं शनि (shani dev) को भी उनके गणों में सम्मिलित किया गया। शनि अत्यन्त पराक्रमी होने के साथ उद्दण्ड भी थे; तोड़-फोड़, मार-काट एवं विनाशकारी कार्यो में इनकी आरम्भ से ही रूचि थी। यह देखकर शिवजी ने यम को तो मृत्यु का देवता बनाया और शनि को दुष्ट जनों को उनके पापों का दण्ड देने का कार्य सौंपा।

शनि (shani dev) भगवान शंकर के शिष्य, सूर्य के पुत्र तथा यम के भाई हैं। शनि सर्वदा प्रभु भक्तों को अभय दान देते हैं, और उसकी हर प्रकार से रक्षा करते हैं। शनि समस्त सिद्धियों के दाता हैं। साधना, उपासना द्वारा सहज ही प्रसन्न होते हैं, और अपने भक्तों की समस्त कामनाओं को पूरा करते हैं। शनि सभी ग्रहों में महाशक्तिशाली और घातक हैं। कहते हैं कि सांप का काटा और शनि का मारा पानी नहीं मांगता।

जब शनि (shani dev) का प्रभाव पड़ा, तो श्री कृष्ण को द्वारिका में शरण लेनी पड़ी। और भगवान राम को, जिनका राज तिलक होने वाला था, सब कुछ छोड़कर नंगे पांव वन में जाना पडा। शनि के प्रभाव से जब अवतारी पुरूष भी नहीं बच सके, तो भला सामान्य लोगों का शनि के प्रकोप से बच पाना सम्भव कहां है?

ये सभी कथायें एक सीमा तक सत्य हैं, परन्तु इनके आधार पर भ्रमित होना विद्वता नहीं हैं। वस्तुतः शनि ग्रह की व्याख्या ही अधूरी है। शनि का तात्पर्य है ‘जीवन की गति’।

राशिगत शनि का प्रभाव किस प्रकार से पड़ता है? और किस राशि पर यह विचरण करता है, इस का क्या प्रभाव होता है? यह किसी विद्वान ज्योतिषी से ही जाना जा सकता है। शनि (shani dev) पीड़ादायक हो सकता है, लेकिन यदि शनि को अनुकूल बना लिया जाये, तो यह सर्वोच्चता भी प्रदान कर सकता है।

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ब्रह्मवैवर्त पुराण में यह वर्णन मिलता है, कि जब माता-पार्वती के गर्भ से भगवान गणपति ने जन्म लिया, तो नवजात शिशु को आशीर्वाद प्रदान करने के लिये समस्त देवी-देवता ग्रह नक्षत्र, यक्ष-गन्धर्व आदि उपस्थित हुये तथा एक-एक कर सभी ने गणपति को अपने सामर्थ्य अनुसार तेजस्विता प्रदान की।

इस क्रम में माता पार्वती का ध्यान शनि देव (shani dev) पर गया, जो कि एक किनारे चुप-चाप सिर झुकाऐ खडे़ थे। थोड़ी देर तक माता पार्वती इस बात को देखती रहीं, किन्तु समझ में नहीं आया, कि शनिदेव आगे बढ़कर शिशु का मुख देखकर उसे आशीर्वाद क्यों नहीं दे रहें हैं, अतः उन्होंने इसका कारण शनिदेव से ही पूछा-‘क्या आपको खुशी नहीं हो रही है?’

प्रसन्नता नहीं हो रही है? आप क्यों नहीं आगे बढ़कर मेरे पुत्र को आशीर्वाद दे रहे हैं? मेरे पुत्र की तरफ आप क्यों नहीं दृष्टिपात कर रहे हैं? यह सुनकर शनिदेव ने सिर झुकाये हुये अत्यन्त विनम्रता से कहा- ‘मां ! ऐसा करने के लिये आप मुझे न कहें, क्योंकि मैं नहीं चाहता हूं, कि इस कोमल शिशु का अनिष्ट हो।’ यह सुनकर पार्वती को उनकी बात पर भरोसा नहीं हुआ और उन्होनें आज्ञा दी-‘तुम आगे आओ और बालक को देखकर आशीर्वाद दो।’

अत्यन्त विवश होकर शनिदेव (shani dev) ने थोड़ा सा सिर उठाकर बालक की ओर देखा, तो उनकी दृष्टि पड़ते ही उस शिशु का सिर धड़ से अलग हो गया। यह देखकर पार्वती को बहुत कष्ट हुआ और क्रोध भी आया, किन्तु वे शनि को कुछ कह भी नहीं पा रही थीं, क्योंकि आज्ञा उन्होंने स्वयं दी थी। फिर उनके मुंह से निकल गया-‘भगवान शिव ही बचायें शनि की दृष्टि से’।

एक और प्रसंग है, रोहिणी शकट भेदन से सम्बन्धित, जो इस प्रकार है-
ज्योतिषियों ने जब नीलम सी क्रांति वाले शनिदेव को कृतिका नक्षत्र के अन्तिम चरण में देखा, तो वे भयभीत हो गए। रोहिणी शकट भेदन देवताओं के लिये भी दुःखदायी होता है, तथा राक्षस भी इससे भयभीत हो जाते हैं। सभी राजाओं के लिये यह परेशानी का कारण था, राजा दशरथ जो कि महा तेजस्वी व ईश्वर भक्त थे, उनका रथ नक्षत्र मण्डल को भी पार करने की शक्ति रखता था।

बहुत सोच-विचार करने पर भी तब कोई हल न निकला, तो वे अपने अलौकिक अस्त्र-शस्त्र लेकर नक्षत्र मण्डल की ओर चल दिये। वे सूर्य से भी ऊंचे उठकर रोहिणी पृष्ठ की ओर गये। वहां से उन्होंने शनिदेव को कृतिका से रोहिणी में प्रवेश को तत्पर जानकर अलौकिक संहारास्त्र का प्रयोग करने हेतु अपने आपको संयोजित किया।

तब शनिदेव (shani dev) महाराज दशरथ का यह अदम्य साहस देखकर बहुत प्रसन्न हुये और वरदान मांगने को कहा। शनिदेव को प्रसन्न हुये देख महाराज दशरथ ने उनकी स्तुति की और कहा, हे शनिदेव! प्रजा के कल्याण हेतु आप रोहिणी नक्षत्र का भेदन न करें।

शनि देव ने प्रसन्न हो कर तुरंत कहा ‘‘तथास्तु’’ और यह भी कहा कि जो व्यक्ति आप द्वारा सुनाये गये स्तोत्र से मेरी स्तुति करेंगे, उन पर मेरा प्रतिकूल प्रभाव कभी नहीं होगा।

जय शनि देव।। 

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Mesh Lagn Features मेष लग्न की विशेषता

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मेष लग्न की विशेषता Mesh Lagn Features

मेष लग्न (Mesh Lagn) में जन्म लेने वाला व्यक्ति मंझले कद का तथा ललाई युक्त गौर वर्ण का होता है। ऐसा व्यक्ति चतुर तथा तुरन्त निर्णय लेने वाला होता है, राज्य समाज में प्रगति करता है। प्रत्येक कार्य के वैज्ञानिक विधि से सम्पन्न करना चाहता है। स्वयं की प्रतिभा से प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। ज्यौतिष आदि किसी कला का प्रेमी होता है,परंतु जल से भय करता है।

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मेष लग्न (Mesh Lagn) के विभिन्न ग्रहों से सम्बन्धित फल :

सूर्य:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में सूर्य पंचमेश होता है, वह इस भाव से सम्बन्धित-विद्या, बुद्धि, विवेक, वाणी, सन्तान तथा तेज से सम्बन्धित फल प्रदान करता है। त्रिकोणाधिपति होने से सूर्य कारक माना जाता है। तथा अपनी महादशा व अन्तर्दशा में भाव स्थिति के अनुसार शुभ फल प्रदान करता है।

चन्द्र:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में चन्द्र चतुर्थ, भाव का अधिपति होता है। शुभ ग्रह केन्द्राधिपति हो तो अशुभ फल प्रदान करता है। चन्द्र माता का नैसर्गिक कारक ग्रह है। यह माता, भूमि मनोबल, सुख, वाहन, जायदाद आदि से सम्बन्धित फल प्रदान करेगा।

मंगल:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में मंगल लग्नेश व अष्टमेश होता है, लग्नेश होने से कारक तथा अष्टमेश होने से मारक होता है, पर लग्नेश को अष्टमेश होने का दोष नहीं लगता। अतः मंगल कारक ही रहेगा तथा अपनी दशा अन्तर्दशा में शुभ फल प्रदान करेगा। मंगल छठे, आठवे या बारहवें भाव में स्थित होने पर इसके कारकत्व में कुछ कमी आ जाती है। मंगल तन, रूप, आयु दिनचर्या, आत्मबल, पुरातत्व, उदर आदि से सम्बन्धित फल प्रदान करता है।

बुध:- तृतीयेश व षष्ठेश होने से बुध मेष लग्न (Mesh Lagn) में सर्वथा अकारक माना जाता है, तथा अपनी दशा अन्तर्दशा में अशुभ फल प्रदान करता है। यह चर्म रोग व शत्रु उत्पन्न करता है। तथा व्यापार में उतार-चढ़ाव लाता है। भाई-बहन, पराक्रम, प्रभाव, शत्रु, रोग ननिहाल, आदि से सम्बन्धित फलादेश बुध की स्थिति से देखा जाता है।

गुरू:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में गुरू भाग्येश व व्ययेश होता है। भाग्येश होने से पूर्ण कारक तथा व्ययेश होने से अकारक होता है। अतः गुरू-दशा का पूर्वाद्ध शुभ तथा उत्तरार्द्ध व्यय कारक होता है। कतिपय पंडितों के मतभेद के बाबजूद भी मेष लग्न में गुरू को कारक ही मानना चाहिये। क्योंकि लग्न से गिनने पर जो भाव पहले आता है, उससे सम्बन्धित फल ही वह ग्रह प्रदान करता है।
नवम भाव द्वादश भाव से प्रथम आने के कारण गुरू भाग्य-वर्द्धक ही रहेगा। फिर वह नैसर्गिक शुभ ग्रह भी है। तीसरे यह भी सामान्य सिद्धान्त है कि दो भावों का अधिपति होने की दशा में कोई भी ग्रह उस भाव से सम्बन्धित फल विशेष रूप से प्रदान करेगा। जिस भाव में उसकी मूल त्रिकोण राशि होगी। गुरू की मूल त्रिकोण राशि नवम भाव में होगी।
अतः गुरू इस भाव से सम्बन्धित फल ही प्रदान करेगा। शुभ स्थान में स्थित होने पर अवश्यमेव उच्च फल प्रदान करेगा। भाग्य, धर्म, यश, व्यय, अन्य स्थान आदि से सम्बन्धित फल गुरू की स्थिति से देखना चाहिये।

शुक्र:- मेष लग्न में शुक्र द्धितीयेश व सप्तमेश होता है। द्धितीयेश होने से शुक्र का सम्बन्ध धन-कुटुम्ब आदि से तथा सप्तमेश होने के कारण जीवन साथी, रोजगार, भोग-विलास आदि से होता है। द्धितीयेश होने से शुक्र अकारक तथा मारक प्रभाव लिये हुये होता है। पर स्वगृही या उच्च का होने पर अपनी महादशा व अन्तर्दशा में खूब धन व भोग विलास देता है। सप्तमेश (शुभ ग्रह केन्द्राधिपति होने से) शुक्र भी अकारक माना जाता है। अतः मेष लग्न में शुक्र अकारक ही रहेगा। तीसरे भाव का शुक्र भी अपनी दशा में अशुभ फल ही देगा। मेष लग्न में शुक्र की सर्वोत्तम स्थिति द्धितीय व द्धादश भाव में होगी।

शनि:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में शनि दशमेश व एकादशेश अर्थात् राज्येश लाभेश होगा। दशमेश होने से (क्रूर ग्रह केन्द्राधिपति होने पर शुभ फल प्रदान करता है) शनि कारक तथा एकादशेश होने से अकारक है, लग्न से दशम भाव प्रथम होने के कारण उस भाव से सम्बन्धित फल शनि अधिक देगा पर उसकी मूल त्रिकोण राशि कुम्भ एकादश भाव में होने के कारण एकादश भाव से सम्बन्धित फल ही प्रदान करेगा।
अतः शनि सम हुआ। पर स्वभाव से क्रूर ग्रह होने के कारण मेष लग्न में शनि अकारक ही रहेगा। शुभ भाव में स्थित होने पर ही (सप्तम या दशम भाव में) अपनी महादशा व अन्तर्दशा में उच्च फल प्रदान करेगा, अन्यथा नहीं।

राहु-केतु:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में तीसरे, छठे एवं ग्यारहवें भाव में स्थित होने पर राहु केतु अच्छा फल प्रदान करेगे।

मेष लग्न (Mesh Lagn) में उच्च नीच व स्वगृही ग्रहों का फल:-

सूर्य:- मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली Kundli  में प्रथम भाव में स्थित होने पर सूर्य उच्च का होता है, 10 अंश तक परमेच्य होता है। जिस जातक के सूर्य लग्न में स्थित होता है, वह व्यक्ति स्वस्थ शरीर वाला, विद्वान होता है। सन्तान पक्ष की प्रबलता, बुद्धिमत्ता, साहस, धैर्य, व्यवहार कुशलता तथा महात्वाकाँक्षा आदि गुण उसे सहज ही प्राप्त होते हैं।

पर सप्तम भाव पर सूर्य की नीच दृष्टि पड़ने के कारण उस भाव में सम्बन्धित फल में न्यूनता आ जायेगी। अतः जातक को दाम्पत्य सुख में कुछ कमी तथा क्लेश की प्राप्ति होती है, और उसकी मर्जी के अनुसार भी कम ही चलेगी। रोजगार के क्षेत्र में भी (विशेष कर सूर्य की दशा, अन्तर्दशा में) उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

पंचम भाव में स्वगृही सूर्य के होने पर जातक अत्यन्त व्रिद्धान, बुद्धिमान, प्रभावशाली तथा वाणी का धनी होगा, तथा सन्तान से शक्ति प्राप्त करेगा। ऐसे सूर्य की लाभ स्थान पर शत्रु क्षेत्रीय दृष्टि होने से आमदनी के मार्ग में रूकावट आयेगी।

मेष लग्न (Mesh Lagn) की कुण्डली kundli के सप्तम भाव में नीच राशिस्थ सूर्य के प्रभाव से जीवन साथी के सम्बन्ध में कुछ न कुछ परेशानी बनी रहेगी, तथा जीवन साथी का सुख कम प्राप्त होगा। जीवन यापन के मार्ग में निरन्तर कठिनाइयाँ आयेंगी।

पंचमेश सूर्य के नीच राशि में होने से विद्या क्षेत्र में कमजोरी रहेगी, तथा सन्तान पक्ष कमजोर रहेगा। सूर्य की सप्तम उच्च दृष्टि लग्न पर होने के कारण जातक का शरीर कुछ लम्बे कद का होगा। हृदय में स्वाभिमान की मात्रा अधिक होगी। युक्ति बल द्वारा वह सम्मान तथा प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा।

उच्च नीच व स्वगृही चन्द्र का फल:-

द्वितीय भाव में उच्चस्थ चन्द्र के प्रभाव से जातक बहुत धनी तथा जमीन जायदाद का स्वामी होगा। श्वेत वस्तु चाँदी आदि का व्यापार करेगा। जिसमें अच्छा लाभ होगा। कुटुम्ब की वृद्धि होगी। द्धितीय स्थान मारक प्रभाव युक्त भी होता है।

अतः माता के सम्बन्ध में किसी न किसी कमी का अनुभव भी होता रहेगा। अष्टम भाव पर नीच दृष्टि होने से आयु, व पुरातत्व के सम्बन्ध में कुछ परेशानी भी बनी रहेगी। शुक्र की महादशा व चन्द्र के अन्तर में यदि चाँदी आदि श्वेत वस्तु का व्यवसाय किया जाये तो लाखों की प्राप्ति होती है।

चतुर्थ भाव में स्वगृही चन्द्र के प्रभाव से जातक की माता, भूमि व जमीन जायदाद का उŸाम सुख प्राप्त होगा। मनोरंजन के साधन निरन्तर प्राप्त होंगे। पर दशम भाव में शनि की मकर राशि पर चन्द्र की दृष्टि होने से पिता से वैमनस्य रहता है, तथा राज्य पक्ष में भी व्यवधान आ सकता है।

अष्टम भाव में नीच राशिस्थ चन्द्र के प्रभाव से आयु व पुरातत्व सम्बन्धी हानि उठानी पड़ती है। चतुर्थेश के नीचस्थ होने के कारण माता सम्बन्धी सुख में कमी आती है, जन्म स्थान से बाहर रहना पड़ता है। तथा घरेलू सुख शान्ति में कमी आती है। पर धन भाव पर चन्द्र की उच्य दृष्टि पड़ने से धन सम्बन्धी सुख निरन्तर प्राप्त होता रहता है। जातक धन व सुख प्राप्त करने हेतु मनोयोग के साथ निरन्तर प्रयत्न शील रहेगा।

उच्च, स्वगृही व नीचस्थ मंगल का फल:-

मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली के दशम भाव में मंगल के स्थित होने पर वह उच्च का माना जाता है। मंगल अपने शत्रु शनि की राशि पर होने के कारण पिता के साथ जातक का कुछ वैमनस्य रहता है, पर जातक व्यवसाय में विशेष उन्नति प्राप्त करेगा, तथा राज्य से भी पुरस्कार प्राप्त हो सकता है। मंगल जो लग्नेश है लग्न भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है। अतः शारीरिक प्रभाव में उन्नति करेगा। चतुर्थ भाव पर नीच दृष्टि पड़ने से माता तथा भूमि सम्बन्धी सुख में कमी आयेगी।

प्रथम भाव में स्वगृही मंगल की स्थिति के प्रभाव से जातक का शरीर पुष्ट होगा, तथा आत्मबल प्रचुर मात्रा में होगा पर अष्टमेश होने के कारण कभी-कभी रोगों का शिकार भी होना पड़ता है।
चतुर्थ भाव पर नीच दृष्टि होने से माता, जमीन, जायदाद के सम्बन्ध में परेशानी होती है।
सप्तम भाव पर मंगल की दृष्टि स्त्री व रोजगार के क्षेत्र में बाधा डालती है।
मंगल की महादशा व अंतर्दशा सामान्यतया लाभप्रद रहेगी।

चतुर्थ भाव में नीचस्थ मंगल के प्रभाव से जातक को माता, जमीन, जायदाद तथा सुख में कमी आती है।
सप्तम भाव पर दृष्टि होने से स्त्री व रोजगार सम्बन्धी बाधा आती है।
पर दशम भाव पर उच्च दृष्टि पड़ने से पिता तथा राज्य सम्बन्धी मामलों मे विशेष उन्नति होती है।
जिस भाव में कोई भी नीच का ग्रह स्थित होगा वहाँ उस भाव से सम्बन्धी फलों में कुछ न्यूनता आ जायेगी।
स्वगृही ग्रह अपने भाव से सम्बन्धित उच्च फल ही देगा।

मेष लग्न में विभिन्न योग:-

1. रूचक योग:- किसी भी लग्न कुण्डली में यदि मंगल अपनी राशि का होकर, या मूल त्रिकोण का होकर अथवा उच्च राशि का होकर केन्द्र में स्थित होगा तो रूचक योग बनेगा। मेष लग्न कुण्डली में मंगल के लग्न अथवा दशम भाव में स्थित होने पर यह योग बनता है।
फल:- इस योग वाला जातक हृष्ट-पुष्ट बलिष्ठ तथा चरित्रवान होता है। वह अपने कार्यो से प्रसिद्धि प्राप्त करता है। देश व संस्कृति के प्रति जागरूक रहता है, सेना में उच्च अधिकारी हो सकता है।

2. मालव्य योग:- शुक्र के स्वराशि, मूल त्रिकोण या उच्च राशि का होकर केन्द्र में स्थित होने पर मालव्य योग बनता है। मेष लग्न में शुक्र केवल सप्तम भाव में बैठ कर मालव्य योग बना सकता है। (सप्तम भाव में शुक्र अकारक तथा गृहस्थ-जीवन को बिगाड़ने वाला माना जाता है।)
फल:- इस योग वाला जातक सुन्दर व आकर्षक शरीर वाला, धनी ख्याति प्राप्त कलाकार, दीर्घायु एवं उŸाम वाहन का मालिक होता है।

3. शश योग:- शनि अपनी उच्च शशि, स्वराशि या मूल त्रिकोण राशि का हो, तथा केन्द्र में स्थित हो तो शश योग बनता है। मेष लग्न की कुण्डली में शनि सप्तम भाव एवं दशम भाव में स्थित होकर शश योग बनता है।
फल:- शश योग रखने वाला जातक राजनीति में चतुर होता हैं। धीरे-धीरे उन्नति करता है, तथा नौकरों पर उसकी आज्ञा चलती है।

4. चामर योग:- लग्नेश उच्च का होकर केन्द्र में स्थित हो तथा गुरू उसे देखता हो। मेष लग्न कुण्डली में यदि मंगल दशम भाव में स्थित हो तथा गुरू द्वितीय, चतुर्थ, तथा षष्ठ भाव में हो तो चामर योग बनता है।
फल:- चामर योग वाला जातक उच्च, प्रतिष्ठित, मान्य, विद्धान, वेद शास्त्रों, का ज्ञाता व पूर्णायु होता है। तथा स्व-कार्यो से प्रसिद्धि प्राप्त करता है।
5. लक्ष्मी योग:- भाग्येश यदि स्वराशि, उच्च अथवा मूल त्रिकोण राशि का होकर केन्द्र में स्थित हो, तथा लग्नेश बलवान हो तो, लक्ष्मी योग बनता है। मेष लग्न में गुरू भाग्येश होता है। जो चतुर्थ भाव में बैठ कर लक्ष्मी योग बनाता है। इसके साथ-साथ मंगल लग्न अथवा दशम भाव में होना चाहिये।
फल:- लक्ष्मी योग वाला जातक सम्पन्न धनवान, भाषण कला में प्रवीण, लोगों को अपने पक्ष में करने की युक्ति जानने वाला, गुणी, चतुर, योग्य तथा ख्याति प्राप्त व्यक्ति होता है।

6. राज योग:- मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली में सूर्य चन्द्र का संयोग प्रबल राज योग कारक होता है। क्योंकि चन्द्र चतुर्थ का व सूर्य पंचम भाव का अधिपति होने से केन्द्र त्रिकोण का सम्बन्ध स्थापित कर देते है। मंगल सूर्य तथा शनि गुरू की युति भी राज योग कारक मानी गई है। पर मंगल लग्नेश होने के साथ-साथ अष्टमेश भी है, गुरू नवमेश होने के साथ-साथ व्ययेश भी होता है। तथा शनि दशमेश के साथ लाभेश है, अतः इस राजयोग में कुछ न्यूनता आ जाती है। कुछ पण्डितों का यह भी मत है कि मंगल सूर्य की युति भी प्रबल राजयोग कारक होती है, क्योंकि लग्नेश को अष्टमेश होने का दोष नहीं लगता ।

7. अन्य सामान्य योग:-
(1) मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली में शुक्र की सर्वोत्तम स्थिति द्वादश भाव में होती है। ऐसा शुक्र अपार धन देता है। तथा सर्वोत्तम जीवन साथी का सुख भी। द्वादश भाव में शुक्र सामान्यतः भोगदाता होता है। मेष लग्न (Mesh Lagn) में द्वादश भाव में शुक्र की उच्च राशि होती है। इस प्रकार शुक्र धनेश व सप्तमेश होकर अपनी उच्च राशि एवं प्रिय भाव में बैठ कर अतुल धन राशि तथा उत्तम स्त्री सुख देगा। द्वितीय भाव में भी शुक्र स्वगृही होने से धन दाता माना गया है।
(2) मंगल का सम्बन्ध डाक्टरी विद्या (सर्जन) से होता है। अतः लग्न द्वितीय भाव एवं पंचम भाव का सम्बन्ध मंगल से हो तो वह व्यक्ति डाक्टर बनता है। चूँकि मेष लग्न में मंगल स्थित हो तो उसकी द्रष्टि द्धितीय तथा पंचम भाव पर पड़ेगी। इस प्रकार मंगल का सम्बन्ध लग्न, द्धितीय व पंचम भाव से हो जाने के कारण जातक एक सफल डाक्टर (सर्जन) होगा। दशम या द्वितिय भाव में मंगल की स्थिति भी डाक्टरी योग बनाती है।
(3) भावार्थ रत्नाकर की पंक्ति “शुक्रस्य षष्ठ संस्थानं योगदं भवतु ध्रुवम्” के अनुसार छठे भाव में भी शुक्र योग कारक होता है। पर मेष लग्न मे यह नियम लागू नहीं होगा। क्योंकि षष्ठ भाव में शुक्र की नीच राशि होगी। धनेश का नीच राशि में होना भी हानि कारक है, तथा सप्तमेश शुक्र का नीच राशिगत होना और अधिक बाधा कारक होगा। इसका कारण यह है कि एक तो शुक्र स्त्री भवन का अधिपति है, दूसरे वह स्त्री सुख का नैसर्गिक कारक ग्रह है। अतः छठे भाव में शुक्र के होने से जातक को गृहस्थ जीवन का सुख बहुत कम मिलेगा, तथा साथी बीमार रहेगा।
(4) षष्ठेश बुध यदि सप्तम भाव में होगा तो, जातक के जीवन-साथी को रोगी बना देगा।
(5) मेष लग्न जातक की कुण्डली में बुध और मंगल का संयोग सिर दर्द तथा मस्तिष्क की शिराओं का रोग देने वाला होगा।
(6) लग्नेश मंगल, धनेश शुक्र एवं भाग्येश गुरू का परस्परिक सम्बन्ध या धनेश, लग्नेश व पंचमेश का सम्बन्ध किसी भी शुभ भाव में हो तो, खूब लाभ देगा।
(7) लग्नेश अष्टमेश मंगल यदि नीच राशि में (चतुर्थ भाव ) हो, और साथ में गुरू न हो तो, चेचक अथवा अन्य घावों जैसे निशान होंगे।
(8) नवम भाव में शुक्र गुरू की युति जातक को कलाकार बनाती है।

शकुन शास्त्र Shakun Apshakun

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शकुन शास्त्र और Shakun Apshakun शकुन अपशकुन

शकुन शास्त्र को अंधविश्वास की श्रेणी में रखा जाये अथवा भविष्य बताने वाली एक विद्या के रूप में माना जाये? वस्तुतः यह विद्या (Shakun Apshakun) भी ज्योतिष की तरह ही वैज्ञानिक (Scientific) विद्या है। अष्टांग ज्योतिष का एक भाग होने के अतिरिक्त ज्योतिष की तरह इसका भी एक आधार है, इसका मूल आधार प्रकृति विज्ञान है।

जो घटना घट रही है, उसके प्रारम्भ की स्थूल प्रक्रिया भले ही हमारे सामने आज प्रारम्भ हो रही है। किन्तु प्राकृतिक वातावरण में उसके प्रारम्भ की सूक्ष्म प्रक्रिया बहुत पहले प्रारम्भ हो चुकी होती है। उस सूक्ष्म प्रक्रिया का प्रभाव प्रकृति के वातावरण में रहने वाले प्राणियों द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है, या पहचान लिया जाता है।

वे अपनी अंग चेष्टाओं से उस प्रभाव की अभिव्यक्ति प्रकट करते हैं। प्राचीन महर्षियों ने प्रकृति की सूक्ष्म प्रक्रिया से प्रभावित प्राणियों की उन अंग-चेष्टाओं को अभिव्यक्त प्राणियों को सूक्ष्म दृष्टि से देखा, पहचाना और फिर परीक्षण भी किया हैं। प्राचीन महर्षियों ने सूक्ष्म प्रक्रिया से प्रभावित प्राणियों की उनकी चेष्टाओं का सूक्ष्म अध्ययन कर जो फलादेशों का संग्रह किया, वह कदापि अवैज्ञानिक नहीं हो सकता।

shakun apshakun shastra
shakun apshakun shastra

‘शकुन, पक्षी का पर्यायवाची है। शकुन शास्त्र (Shakun Apshakun) का सर्व प्रथम संकलन जिस समय हुआ होगा, उस समय केवल शकुन अर्थात् पक्षियों के दर्शन तथा शब्द श्रवण के आधार पर ही शुभाशुभ के निर्णय संकलित किये गये होंगे। क्योंकि प्राकृतिक वातावरण में पले पौधे, पक्षियों पर सूक्ष्म प्राकृतिक परिवर्तनों का प्रभाव शीघ्रतिशीघ्र पड़ता है। वे अत्यधिक संवेदनशील होते हैं।

आहार अन्वेषण की कठिनाई तथा शीत और तुफानी मौसम से बचने के लिये उत्तरी गोलार्द्ध के लाखों पक्षी हजारो मील की यात्रा करके दक्षिण गोलार्द्ध के गर्म देशों में पहुंच जाते हैं। खंजन पक्षी भी भारत में केवल शीत काल में ही रहता है। चिड़ियों का रज-स्नान वर्षा का सूचक होता है। सारस और चक्रवाक गीष्म के प्रारंभ में उत्तरी प्रदेशों में चले जाते हैं।

ज्यों-ज्यों इस निमित्त (Shakun Apshakun) शास्त्र की ओर सर्व साधारण की रूचि जागृत हुई त्यों-त्यों शुभाशुभ सूचक शकुनों के साथ पशुओं की चेष्टाओं तथा शब्दों की शुभाशुभता का संकलन भी होता चला गया।

इस प्रकार उत्तरोत्तर संकलनों में बादल, वायु, विद्युत, उल्कापात, गान्धर्वनगर, ग्रहण आदि आन्तरिक्ष; अंगस्फुरण, पल्लीपतन, छींक विचार आदि कायिक और श्रृगाल, श्वान, सिंह, मार्जार आदि श्वापद; हाथी, ऊँट, वृषभ, गाय, भैंस आदि चतुष्पद; सर्प, नकुल, मूषक आदि सरिसृप; भुजगादि सरिसृप जन्तुओं की चेष्टाओं तथा शब्दों का शुभाशुभ भी जोड़ दिया गया होगा।

शकुन विद्या (Shakun Apshakun) विशारदों का यह अनुभव है कि, शुभाशुभ कार्यों के विपाक से प्रतिक्षण प्रत्येक मानव जो शुभाशुभ फल भोगते हैं, वे शकुन द्वारा पहले जाने जा सकते हैं।

तत् पश्चात् धार्मिक अनुष्ठानों से अशुभ का प्रतिकार और शुभ का परिश्कार कर सुख सम्पत्ति से समृद्ध हो सकते हैं। विपत्ति से बचने की और सम्पत्ति प्राप्त करने की कामना सांसारिक जीवों को सर्वदा रही है। सभी प्राणी सुख के इच्छुक देखे गये हैं, किन्तु किसी को दुःख का इच्छुक कभी नहीं देखा गया।

इसलिये शकुन विद्या (Shakun Apshakun) का अतीत में जितना महत्व था, वर्तमान में भी इसका इतना ही महत्व हैं। शकुन विद्या आज भी प्रकाश स्तम्भ बनी हुई है। आधुनिक जीवन में भी यदि इसका उपयोग किया जाये तो सुख-दुःख का ज्ञान अविलम्ब एवं स्पष्ट हो सकता है।

पक्षियों की पहचान और उनकी ध्वनियों का विज्ञान कुशाग्र बुद्धि के अतिरिक्त कौन प्राप्त कर सकता है? अंग चेष्टाओं का विश्लेषण करके शुभाशुभ भविष्य का क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त करने की यदि इच्छा हो तो, मनुष्य को इस विद्या का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त हो सकता है।

शकुन विद्या का प्रचार-प्रसार शिक्षित वर्ण की अपेक्षा अशिक्षित लोगों में अधिक पाया जाता है। जंगलों में रहने वाले भील मेना, कंजर, वागरी, नायक, बावरी, सांसी आदि अनेक लोग इस शकुन विद्या के जानकार होते हैं। यह ज्ञान उन्हें अपने पूर्वजों की परम्परा से प्राप्त होता रहा है। अनपढ़ होने के कारण अपने ज्ञान को लिपिबद्ध करने में वे अब तक भी असमर्थ रहे हैं। इसलिये यह ज्ञान शनैः क्षीण होता जा रहा है।

शिक्षित वर्ग से यह ज्ञान अशिक्षित वर्ग में कैसे पहुंचेगा? यह प्रश्न है। इसका समाधान यह है कि जिस प्रकार इस विद्या (Shakun Apshakun Shastra) के महान् आचार्यों का निवास अतीत में प्रायः तपोवनों में था। वहां वनवासी जातियों के बाल, वृद्ध, युवा, स्त्री पुरूषों को उन महान् पुरूषों की सेवा व सत्संग का लाभ मिलता रहता था।

पक्षियों की ध्वनियों का श्रवण व उनका विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करना वनवासियों के लिये जितना सरल व सुगम हो सकता है, उतना ग्राम व नगर में भी। जिन का शकुन ज्ञान महान् चमत्कार पूर्ण है, वे अशुभ शकुन देख कर भावी विगत्तियों से सावधान हो जाते हैं, और सुरक्षा के लिये हर संभव प्रयत्न करके सफलता प्राप्त कर लेते हैं, और शुभ शकुन देखकर अपने इष्ट कार्य में सफलता प्राप्त कर लेते हैं, तथा वे जीवन सुखमय बनाने में संलग्न रहते हैं।

शकुनों (Shakun Apshakun) की वैज्ञानिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण भूकंप उत्पात के सम्बंध में उद्धृत ये पंक्तियां हैं- प्रतिवर्ष विश्व के किसी न किसी कोने में भीषण उत्पात की संभावना रहती है। अभी तक न कोई ऐसा यंत्र आविष्कृत हुआ है, और न ही किसी ऐसी विधि का पता चला है कि भूकम्प की पूर्व सूचना दे सके।

अनेक भूकम्पीय घटनाओं से एक मनोरंजक बात का पता लगा है कि पशुओं को इन दैवी आपत्तियों की पूर्व सूचना मिल जाती है, तथा वे सबको सावधान करने का प्रयत्न करते हैं। समुद्र का पानी भयंकर गति से जब चढ़ता है तो, उसके एक दिन पहले सीगाल नामक पक्षी सुरक्षित स्थल पर चले जाते हैं।

तथा अनेक मामलों में देखा गया कि भयंकर भूकम्प के समय कुत्ते भौंकते हुये, बिल्लियां और गायें इतनी जोर से चिल्लाये कि सारा नगर जाग गया, तथा उसके कुछ क्षणों बाद भूचाल आया, इस लिये शकुन विद्या को अवैज्ञानिक या अविश्वस्त मानना या कहना कोई बुद्धिमत्ता नहीं हैं।

जिस प्रकार गणित की सूक्ष्म प्रक्रिया में सामान्य भूल होने पर आधुनिक यंत्रों का निर्माण एवं उनकी कार्य प्रणाली यथेष्ट नहीं हो पाती है, उसी प्रकार शुभाशुभ शकुनों (Shakun Apshakun) के फलादेशों में कभी-कभी जो वैपरीत्य दिखाई देता है, उसका एकमात्र कारण यह है कि हमारा निमित्त ज्ञान परिपूर्ण नहीं है।

अतः दृष्ट तथा श्रृत शुभाशुभ शकुनों (Shakun Apshakun) के अनुसन्धानों में रही हुई त्रुटियों का हमें बोध नहीं हो पाता। इसलिये फलादेश हमें विपरीत मालुम देता है। यह सत्य है, किन्तु हम अपने अज्ञान का दोष विद्या पर मढ़ कर उस विद्या को अवैज्ञानिक या अस्तित्वहीन कहें यह अनुचित है। श्रीमद्भागवत का शकुनशास्त्र से विशेष परिचय जान पड़ता है।

उसमें उत्पातों के तीन भेद बतलाए गये है। वे भेद दिव्य, भौम तथा आन्तरिक्ष उत्पात के रूप में हैं। ये अपने-अपने क्षेत्र में घटित होने के कारण इन नामों से अभिहित किये गये है। (श्री. भा. 3. 17. 3; 11. 30. 4) एक अन्य स्थल में उत्पातों के तीन भेदों में अन्तरिक्ष के स्थान पर दैहिक की गणना की गई है (श्री. भा. 1. 14. 10)।

अर्जुन के द्धारका से नहीं लौटने पर युधिष्ठिर ने घोर रूप वाले विविध अपशकुनों को देखा। काल की गति रौद्र हो गयी थी। प्रकृति में ऋतु के विपरीत लक्षण दीखने लगे थे। अतिशय भय कारक निमित्तों को देख कर युधिष्ठर को मनुष्यों के प्रलयकाल की आशंका होने लगी थी (श्री. भा. 1. 14. 2-5) । उन्होंने भीम को उन दिव्य, भौम और दैहिक उत्पातों की ओर संकेत किया। बुद्धि को मोहित करने वाले उत्पातों को देखकर आने वाले अनर्थ को वे जान गये थे।

उनकी जंघा, आँखे एवं बाहु बार-बार फड़कने लगे। हृदय में कम्पन होने लगा। अग्नि के समान लाल मुख वाली शिवा (मियारनी) उगते हुये सूर्य की और मुख करके रोने लगी। कुत्ते निडर होकर उनकी ओर मुख करके रो रहे थे। अच्छे पशु बाँयी ओर से तथा बुरे पशु दहिनी ओर से गुजरने लगे। वाहन के पशु हाथी घोडे आदि रोने लगे।

मृत्युदूत पेडुखी, उल्लू और कौये रात को कठोर शब्द करने लगे। दिशाएं धुंधली हो गयी थी। सूर्य और चन्द्र की चारों और बार-बार परिवेष मण्डल लगने लगे थे। पृथ्वी एवं पर्वतों में कम्पन होने लगे। बादल जोर-जोर से गरजने लगे। यत्र-तत्र विजली गिरने लगी। शरीर को छेदने वाली तथा धूल से अन्धकार फैलाने वाली आंधी चलने लगी।

बादलों में भयानक दृश्य बनने लगे, और उनसे शोणित की वर्षा होने लगी। आकाश में ग्रह-युद्ध होने लगे। दिशाओं में दाह होने लगे। नदी, नद, तालाब और लोगों के मन क्षुब्ध हो गये। घी से भी आग नहीं जलती थी। बछड़ों ने दूध पीना छोड दिया। गौयें दूहने नहीं देती थीं।

गोशाला में गौंयें रो रही थीं। बैल सब उदास थे। देवताओं की मूर्तियाँ रोने लगी थीं। उनसे पसीना चूने लगा था। उनमें कम्पन भी होने लगा। देश, गाँव, शहर, बगीचे, धर्मशालायें और आश्रम शोभाहीन और आनन्दरहित लगने लगे (श्री. भा. 1. 14. 10-21)।

इसी प्रकार हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के जन्म के समय विविध उत्पातों (Shakun Apshakun) के घटित होने का उल्लेख भी है। इस समय तीनों प्रकार के उत्पात हुये। पृथ्वी एवं पर्वत में कम्पन, उल्कापात वज्रपात और धूमकेतु के उदय होने लग गये। भयानक शब्द के साथ वृक्षों को उखाड़ने वाली विकट एवं असह्म आंधी आयी।

धूलों से सम्पूर्ण पृथ्वी एवं आकाश व्याप्त हो गये। बिजली की चमक भयानक हो गयी थी। मेघों की सधन घटाओं से सूर्य-चन्द्र लुप्त हो गये और अंधकार छा गया। समुद्र मे दुःखी मनुष्य की तरह कोलाहल होने लगा। उसमें ऊंची तरंगें उडने लगीं। समुद्री जीवों में हलचल मच गयी। नदियों तथा तालाबों मे भी खलबली मच गयी।

अनेक कमल सूख गये। सूर्य चन्द्र के बारबार ग्रहण होने गले। उनके आमंगल सूचक परिवेष भी लगने लगे। बिना बादलों के गर्जना सुनायी देने लगी। गुफाओं में रथ की आवाज-सी सुनाई देने लगी। गांवों में गीदड़ और उल्लुओं के भयानक शब्द के साथ गीदड़नियां मुख से आग उगल कर अमगंल शब्द करने लगीं।

कुत्ते गरदन ऊपर उठाकर कभी गाने तथा कभी रोने का शब्द करने लगे। झुण्ड के झुण्ड गधे पृथ्वी खोदते और कठोर शब्दों के साथ रेंगते हुये इधर-उधर दौडने गले। पक्षीगण गधों के शब्द से डर कर घोसलों को छोडकर रोने-चिल्लाने लगे। बंधे और बन में चरते पशु डर कर मलमूत्र त्यागने लगे।

गौयें ऐसी डर गयीं कि दूहने पर उनके थन से खून निकलने लगा। बादलों से पीब की वर्षा होने लगी। देवमूर्तियाँ रोने लगीं। तथा बिना वायु के ही वृक्ष हिलने लगे। शनि, राहु आदि क्रूर ग्रह प्रबल होकर चन्द्र बृहस्पति आदि सौम्य ग्रहों तथा अनेक नक्षत्रों का अतिक्रमण कर वक्रगति हो गये। ग्रहों के युद्ध होने लगें। इन उत्पातों को देखकर सनक आदि ऋषियों को छोडकर शेष सभी जीव भयभीत हो गये (श्री. भा. 3. 17. 3-15)।

हिरण्यकशिपु की तपस्या के समय भी ऐसे ही उत्पात हुए थे। ग्रह और तारे टूट-टूट कर गिरने लगे थे। तथा दिग्दाह होने लगे थे। (श्री. भा. 7. 3. 5) इस प्रकार श्रीमद्भागवत में दित्य, भौम, एवं आन्तरिक्ष एवं दैहिक उत्पातों का विशद वर्णन मिलता है।

कंस की मृत्यु निकट आने पर उसने जो अशुभ निमित्त देखे उनका विशद वर्णन भी श्री मदूभागवत में प्राप्त होता है- जाग्रित अवस्था में कंस को जल या दर्पण में छापा पड़ने पर भी शिर नहीं दीखता था। चन्द्र तारे, सूर्य एवं दीप दो-दो दिखाई पड़ते थे। अपनी छाया में छेद दीखता था।

कानों में अंगुली डालकर सुनने पर प्राणों का धूं-धूं शब्द नहीं सुनाई पड़ता था। वृक्ष सुनहरे प्रतीत होते थे। घूल आदि में चलने पर अपने पैरों के चिह्न नहीं दीखते थे। वह स्वप्न में प्रेतों से लिपटता था। गधे की सवारी करता था। विष का भक्षण करता था। अड़हुल की माला पहनता था। तेल की मालिश करता था और नंगे शरीर होकर यात्रा करता था। इन अपशकुनों (Shakun Apshakun) को देख कर कंस अपनी निकट मृत्यु के आभास से भयभीत हो गया था। (श्री. भा. 10. 42. 28-30)।

कुण्डली में विवाह प्रतिबंधक योग Vivah Pratibandak Yog in Kundli

कुण्डली में विवाह प्रतिबंधक योग Vivah Pratibandak Yog in Kundli

मित्रों इस लेख में जातकों की कुंडली में विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) के बारे में आपको अति अन्वेषित एवं अनुभव युक्त लेख सम्पादित कर रहा हूँ। शेयर करें व ज्ञान को असीम जनता तक पहुँचायें।

बचपन की सीमा लांघ कर जैसे ही मनुष्य यौवनावस्था में प्रवेश करता है, उसे एक जीवन-साथी की आवश्यकता महसूस होती है। यह प्राकृतिक नियम है, यौवन के आते ही युवा स्त्री अथवा पुरुष में विवाह की इच्छा उत्पन्न होती ही है। आदिमकाल में तो असभ्य मानव अन्य प्राणियों की तरह यौन सम्बंध बनाकर अपनी यौनेच्छा की पूर्ति कर लेता था, किन्तु ज्यों-ज्यों मनुष्य में सामाजिक भावना का उदय हुआ उसने समाज की व्यवस्था को बनाये रखने के लिये ‘विवाह’ vivah जैसी सामाजिक प्रथा को जन्म दिया, और स्वीकार किया।

तभी से समाज की स्वीकृति के बिना स्थापित किया गया यौन सम्बंध अनैतिक समझा जाने लगा। भारत में विवाह को एक पवित्र बंधन माना जाता है, प्रणय-सूत्र में बंधते ही स्त्री और पुरुष दोनों ही कुछ व्यक्तिगत पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों को समझने लगते हैं। जिनके फलस्वरूप उनमें प्रेम, स्नेह, आत्मसमर्पण एवं कर्त्तव्च्य परायणता से युक्त भावनाओं का जन्म होता है, और इसी कारण उनका विवाहित अथवा गृहस्थ जीवन सुखमय बन पाता है।

सुखमय और प्रेम पूर्ण विवाहित जीवन के लिये यह आवश्यक है कि, स्त्री और पुरुष दोनों ही उत्तम चरित्र से युक्त हों, एक दूसरे को पसंद करते हों, और एक-दूसरे के सुख दुःख में भाग लेते हों, और एक दूसरे को इतना अधिक प्रेम करते हों कि अल्प समय के लिये बिछुड़ने पर बेचैनी का अनुभव करते हों।

अगर स्त्री या पुरुष में से कोई एक अथवा दोनों अपने दायित्वों को नहीं समझते और उनमें उपरोक्त भावनाओं का अभाव हो तो, उनका जीवन कलहपूर्ण होने की संभावना बनी रहती है, या वे विवाहित जीवन में सुख का अभाव या न्यूनता का अनुभव करने लगते हैं, जिसके फलस्वरूप तलाक अथवा आत्महत्या तक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

यह सभी तो तब महत्वपूर्ण है, जब जातक की जन्म कुण्डली में विवाह का योग उचित समय में बन रहा हो, इसके विपरीत यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में विवाह का योग ही नहीं बन रहा हो, अर्थात् विवाह प्रतिबंधक योग बना हो तब! ऐसी स्थिति में जातक के साथ-साथ उसके माता-पिता भी चिंता में डूबे रहते हैं।

अनेक उपाय, अनेक यत्न-प्रयत्न करने पर भी विवाह नहीं होता, तब निराश होकर ज्योतिषीयों और कभी-कभी ओझाओं मौलवीयों की शरण में जाते हैं। वस्तुतः विवाह का योग या विवाह का सुख प्रारब्ध का खेल समझा जाता है, जिसकी सूचना हमें जन्म समय की ग्रह स्थिति (जन्म कुण्डली kundli) से मिलती है।

कभी-कभी जन्म कुण्डली kundli में अनेक प्रकार के ग्रहयोग से विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) का निर्माण हो रहा होता है। इन योगों के साथ-साथ यदि उन विवाह प्रतिबंधक योग बनाने वाले ग्रहों पर किसी शुभ ग्रह की कृपा नहीं होती तो विवाह या विवाह होकर भी वैहिक सुख से जातक हीन रहता है। शुभ ग्रह यदि अपना शुभ प्रभाव डाल रहे हों, तब वह विवाह प्रतिबंधक योगों को भीे भंग कर देते हैं।

अतः एक कुशल विद्वान को विवाह प्रतिबंध करने वाले ग्रहयोंगों के साथ-साथ यह भी विचार करना आवश्यक होता है कि, विवाह प्रतिबंधक योगों पर शुभग्रह अपना प्रभाव किस हद तक डाल रहे हैं? शुभ ग्रह अपना प्रभाव डाल भी रहे हैं अथवा नहीं?

आगे एक जातक की जन्म कुण्डली प्रस्तुत की जा रही है, इस कुण्डली में किस प्रकार विवाह प्रतिबंधक ग्रहों (vivah pratibandak yog in kundli) का प्रभाव है, देखें-
30/10/1982 16:37 Vadodara

vivah pratibandak yog in kundli
vivah pratibandak yog in kundli

ग्रहों के भोगांश
लग्न        11रा    17° 25″ 15′
सूर्य         06रा   13° 06″ 03′
चन्द्रमा    11रा   16°  15″ 58′
मंगल      08रा  05° 26″ 39′
बुध          06रा  00° 22″ 41′
गुरू          06रा  23° 41″ 50′
शुक्र         06रा   11° 55″ 50′
शनि        06रा  03° 00″ 40′
राहु          02रा  13°  33″ 07′

आज इस जातक की आयु लगभग 34 वर्ष हो चुकी है, अभी तक अनेक प्रयत्न कर चुके इसके अभिभावक अनेक उपाय कर, कर के थक चुके हैं, परंतु विवाह नहीं हो रहा। मीन लग्न की इस कुण्डली में सप्तम भाव का स्वामी बुध है, यह ग्रह शुक्र की तुला राशि में परंतु अष्टम भाव में सूर्य से अस्त है, हालांकि सप्तम भाव पर पंचमेश चन्द्रमा की सप्तम पूर्ण दृष्टि का योग है, कुण्डली में लग्न तथा चन्द्र लग्न दोनों से सप्तमेश बुध अस्त तथा अष्टम भाव में विवाह का प्रतिबंध सूचित कर रहा है।vivah pratibandhak yog in navansh kundli

विवाह कारक शुक्र द्वितीय व अष्टम भावाधिपति होकर अष्टम भाव में स्थित है, बेशक यह ग्रह स्वग्रही है परंतु इस स्थान में अशुभ फल ही प्रदान कर रहा है, यह शुक्र यहां सूर्य से अस्त भी है। शुक्र तथा बुध का षष्ठेश सूर्य के साथ अष्टम भाव में अस्त होना निश्चित ही विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) का निर्माण कर रहा है।

यहां लग्नेश गुरू शुभ ग्रह होने के कारण थोड़ा शुभ फल दे सकता था परंतु यह ग्रह भी सूर्य के सानिध्य में अस्त है। लग्नेश गुरू, सप्तमेश-चतुर्थेश बुध तथा विवाह सुख का कारक ग्रह शुक्र अष्टम भाव में तो हैं ही, साथ-ही अस्त भी हैं।

इन ग्रहों के साथ कुण्डली में भाग्य स्थान के स्वामी मंगल पर शनि की क्रूर दृष्टि भी विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) में अपना योगदान दे रही है। वर्तमान समय में 13-06-2007 से जातक की शुक्र की महादशा है, इस समय शुक्र की महादशा में राहु की अंतरदशा 13-08-2017 तक रहेगी।

आगे 13 अगस्त 2017 से 13-04-2020 तक गुरू की अंतरदशा होगी, इस अवधि में नैसर्गिक शुभ ग्रह गुरू के शुभ प्रभाव से उपरोक्त अवधि में जातक के लिये शुभ की आशा की जा सकती है। परंतु इस अवधि में भी विवाह संभव होगा या नहीं? पूरी तरह मैं आशा नहीं कर सकता।

गुरू ही एक ग्रह है, जो इस जन्म कुण्डली के अशुभ ग्रहों को अपने शुभ प्रभाव से अनुकूल कर सकता है। परंतु कुण्डली के अधिकांश ग्रह विवाह प्रतिबंधक ग्रहों अथवा योगों (vivah pratibandak yog in kundli) को ही बलवान सूचित कर रहे हैं।

राहु – केतु का मनुष्य पर प्रभाव Rahu Ketu Effects

rahu ketu effects

राहु – केतु का मनुष्य पर प्रभाव Rahu Ketu Effects

राहु एवं केतु (rahu ketu effects) छाया ग्रह कहे जाते हैं। सूर्यादि अन्य ग्रहों के समान इनका स्वतंत्र पिंड और भार नहीं है, उनकी तरह ये दिखलाई भी नहीं देते, अपने क्रान्ति वृत पर भ्रमण करता चन्द्रमा जब भचक्र (पृथ्वी के भ्रमण मार्ग) के उस बिन्दु पर पहुंचता है। जिसे काटकर वह उत्तर की ओर चला जाता है। वह बिन्दु राहु कहलाता है। पाश्चात्य ज्योतिष में इसीलिए इसको ‘‘नॉथ नोड ऑफ द मून’’ कहा जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार राहु एक चतुर एवं धूर्त राक्षस था, जो समुद्र मन्थन से निकले अमृत के वितरण के समय, मोहिनी रूपधारी भगवान् विष्णु के छल को तत्काल भॉप कर, स्वार्थ (अमृत पान) सिद्वि हेतु रूप बदल कर देव पंक्ति में बैठ गया।

सूर्य चन्द्र के संकेत से विष्णु ने उसका शिरोच्छेद किया तथापि अमृत पान के कारण उसकी मृत्यु तो नहीं हो सकी। उल्टे उसका शिरो भाग राहु एवं शेष शरीर केतु (rahu ketu effects) कहलाया। इसीलिए यह सूर्य एवं चन्द्र का भंयकर शत्रु बन गया। यह तामसिक एवं महापापी ग्रह हैं। भौतिक साधनों की किसी भी मूल्य पर प्राप्ति लालसा इसका स्वभाव है, जिसके लिए यह निकृष्ट से निकृष्ट साधन अपना सकता हैं। मूलतः यह अविद्या का कारक है जो आत्मा को अन्धकार से आच्छादित कर लेता है। इस के मायावी प्रभाव से जातक की बुद्धि उलझती चली जाती है।

कर्मपाश और गहरा जाते हैं यदि सभी ग्रह राहु-केतु के बीच में आ जाते हैं तो ‘काल सर्प योग’ का जन्म होता है। जिसे विशेष अनिष्ट कारक एवं दुर्भाग्यशाली योग माना गया है। छाया ग्रह होने के बावजूद भी ज्योतिष मर्मज्ञों ने फलित में इनसे सदा सर्तक रहने का संकेत दिया है। जन्मांग में अच्छा होने पर भी इसका चौथाई दोष तो बचा ही रहता है इस अशुभ ग्रह का रंग बिलकुल काला, वस्त्र काले एवं चित्र-विचित्र, जाति शूद्र, आकार दीर्घ और भयानक, स्वभाव तीक्ष्ण, दृष्टि नीच, गुण अत्यधिक तामस, प्रकृति वात प्रधान, तथा अवस्था अति वृद्ध मानी जाती हैं।

रूड़ी एवं मायाचारी विद्या के कारक इस पुरूष ग्रह की दिशा नैऋत्य, भूमि ऊसर। धातु लोहा, मतान्तर से पंचधातु, स्थान सांप के बिल, रोग अस्थि रोग, तथा ऋतुशिशिर कही गयी हैं। हृदय से कपटी, पाखण्डी तथा झूठ बोलने वाले इस ग्रह से पितामह का विशेष विचार किया जाता है।
राहु-केतु (rahu ketu effects) के मायावी प्रभाव से जातक की जड़- बुद्वि उलझती चली जाती है। कर्मपाश और गहरा जाते हैं यदि सभी ग्रह राहु-केतु (rahu ketu effects) के बीच में आ जाते हैं तो ‘काल सर्प योग’ का जन्म होता है। जिसे विशेष अनिष्ट कारक एवं दुर्भाग्यशाली योग माना गया है। छाया ग्रह होने के बावजूद भी ज्योतिषमर्मज्ञों ने फलित में इनसे सदा सर्तक रहने का संकेत दिया है। मिथुन राशि के 15 अंश पर इसे उच्च का मानते हैं।

महर्षि पराशर के अनुसार राहु की उच्चराशि वृष है। इसकी स्वराशि एवं उच्चराशि के बारे में विद्वानों में मतभेद है। कर्क राशि इसी मूल त्रिकोण राशि एवं कुम्भ तथा कन्या स्वगृह कहे गए है। मेष, वृश्चिक, कुम्भ, कन्या, वृष तथा कर्क राशि तथा जन्मांग के तीसरे, छठे, दसवें और ग्याहरवें भाव में इसे बलवान माना गया है। सूर्य, चन्द्र एवं मंगल इसके शत्रु, गुरू सम एवं शेष ग्रह मित्र होते हैं। आद्रा स्वाती एवं शतभिषा नक्षत्रों का अधिपति राहु एक राशि में प्रायः 18 महीने भ्रमण करता है। यह सदा वक्री ही रहता है, अर्थात उल्टा चलता है।

इसका प्रधान देवता काल व अधिदेवता सर्प है। झूठ, कुतर्क, दुष्ट अथवा अन्त्यज स्त्री गमन, नीच जनों का आश्रय, गुप्त और षड़यंत्रकारी कार्य, धोखे-बाजी, विश्वासघात जुआ, अधार्मिकता, चोरी, पशुमैथुन, रिश्वत लेना, भ्रष्टाचार निन्ध्य एवं गुप्त पाप कर्म, दांई ओर से लिखी जाने वाली भाषा जैसे उर्दू, कठोर भाषण, अन्य देश में गमन, विषम स्थान भ्रमण, छत्र, दुर्गा उपासना, राजवैभव, पितामह, आकस्मिक आपत्तियाँ इन का कारक राहु माना गया है।
निर्बल राहु के कारण वायु विकार, अपस्समार (मिर्गी), चेचक, कोढ़, हकलाहट, देहताप, पूराने जटिल रोग, विषविकार, पैरों के रोग, महामारी, सर्पदंश, बालारिष्ट, फौड़े, जेल जाना, स्त्री योग, प्रेत-पिशाच सर्प से भय, शत्रु पीड़ा, ब्राह्यण और क्षत्रिय से विरोध, स्त्री पुत्र पर आपत्ति, संक्रामक एवं कृमिजन्य रोग, आत्महत्या की प्रवृत्ति, बालरोग आदि पीड़ायें सम्भावित हैं।

राहु-केतु (rahu ketu effects) जन्मांग के जिस भाव में बैठते हैं उसके भावेश के अनुसार एवं जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उसके अनुसार विशेष फल प्रदान करते हैं। तथापि 3, 6, 11 भावों के अतिरिक्त प्रत्येक भाव में स्थित राहु प्रायः अनिष्ट फलकारक ही होता है पाप एवं क्रूर ग्रहों के साथ राहु को बहुत भयानक माना गया है अपनी उच्च एवं मित्र राशि व शत्रु ग्रह की दृष्टि से अशुभ फलों में कमी आ जाती है।

राहु-केतु के एकादश भाव में प्रभाव Rahu Ketu Effects

प्रथम भाव में अशुभ और निर्बल राहु- कामुक, स्वार्थी एवं दुष्ट प्रवृति, धूर्तता, गुप्त महत्वकांक्षाओं में निराशा, ईर्ष्या, काम भोग में अतृप्ति पाप पूर्ण विचार, वैवाहिक जीवन में विलम्ब और विषमता, गर्भपात, वातरोग, नशेबाजी आदि देता है। आन्तरिक असन्तोष एवं व्यभिचार भी इसकी देन होती हैं। शनि के साथ स्थित होने से क्षय रोग का भय रहता है।

द्वितीय भावस्थ राहु, वाँणी एवं गले में दोष, रोग, हकलाहट, निन्द्य एवं कटु भाषण, धन, परिवार में अस्थिरता व क्लेश, भ्रष्ट स्त्रियों से धनोपार्जन शिक्षा में बाधा, हीन मनोवृत्ति, प्रदान करता है।

तीसरे भाव में राहु अच्छा फल प्रदान करता है परन्तु कर्ण रोग, भाईयों को कष्ट एवं स्वजनों से कष्ट आदि अशुभ फल भी देता है।

चतुर्थ भाव में राहु माता को कष्टकारक, असन्तोष, कपट, उन्नति, प्रमोशन आदि में बाधा, उदर व्याधि, काल सर्प योग होने से जातक की भिखारी जैसी परिस्थिति में, अपने घर से दूर मृत्यु होने की सम्भावना बनती है। स्त्री जन्मांग में चतुर्थस्थ राहु यदि चन्द्र और शनि या मंगल से युक्त है तो स्वयं एवं माता के चरित्र को संदिग्ध तथा दाम्पत्य विषमता का योग बनाता है। राहु, शनि, चन्द्र और मंगल की युति विष प्रयोग या आत्महत्या कारक भी होती है।

पंचम भाव में या पंचमेश युक्त, पाप सहित या दृष्ट राहु सर्प-श्राप से सन्तान बाधक या कष्ट योग कारक बनाता है। उदर विकार, शूल, गर्भपात, क्रोधी अनियंत्रित तेज मिजाज, चित्त भ्रान्ति, स्त्री कष्ट कारक आदि फल होते हैं।

छठे भाव का दूषित एवं निर्बल राहु, कलह, शत्रु, भय, स्वजन विग्रह, भ्रष्ट आचरण, गुदा रोग, कुष्ट चर्मरोग, कमर दर्द, दांत के रोग, परस्त्री गमन, मामा को कष्ट, पत्थर आदि से चोट या पेड़ से गिरने की सम्भावना व्यक्त करता है। छठे और आठवें भाव में पाप दृष्ट मंगल सहित राहु आत्महत्या की प्रवृत्ति देता है। इस योग में यदि चन्द्रमा भी हो तो उन्माद भय कारक होता है।

सप्तम भाव के पाप युक्त विशेष रूप से शनि युक्त राहु को एक अभिशाप ही समझना चाहिए। दूषित और निर्बल राहु इस भाव में- वैवाहिक जीवन में विषमता, अवैध सम्बन्ध, पत्नी के लिए कष्टकारक एवं स्वयं को भी उनसे कष्ट प्राप्ति, प्रमेह, धातु अथवा वात विकार, हड्डी आदि टूटना, दुर्घटनाएं, विवाह में विलम्ब द्विभार्या योग, सेक्स जीवन में कुण्ठा, द्यूत, मद्यपान प्रवृत्ति, सर्प-दंश या विष से भय आदि अशुभ फलकारक है। पूर्व जन्म में किसी स्त्री को भ्रष्ट करने या अकारण कष्ट देने के कारण ही ऐसे अभिशाप स्वरूप राहु की सप्तम भाव में स्थिति होती हैं।

अष्टमस्थ राहु जातक को उदर बवासीर व गुप्त रोगी, अण्डकोश वृद्वि, क्रोधी, बकवादी, चोर, क्रूरपापकर्मा, व्यभिचारी, विश्वासघाती एवं षड्यंत्रकारी बनाता है। शनि, गुलिक शुक्र के साथ अप्राकृतिक मैथुन प्रवृत्ति देता है (सप्तम भाव में भी यही फल है)। मंगल के साथ दुर्घटना, विष और अग्नि से भय, चेचक, पित्त प्रकोप और उष्ण रोग, आकस्मिक मृत्यु कारक, स्त्री जन्मांग में वैधव्य कारक और विषकन्या व चरित्रहीन योग आदि दुष्ट फल होते हैं।

नवम भाव में राहु पिता के लिए अरिष्ट कारक, पुत्र शोक, झूठ मुखौटा, गुरूद्वेष या गुरूश्राप, बन्धु विरोध या हानि, शूद्र स्त्री से संभोग का सूचक है। भाग्योदय में रूकावटें आती हैं, जिससे मानसिक संताप होता हैं।

एकादश भाव का दूषित राहु, मन्दाग्नि, पेचिश आदि उदर विकार, सुस्ती, सन्तानकष्ट और रिश्वतखोरी, धूर्तता का सूचक है।

बारहवें भाव के राहु Rahu Ketu Effects का प्रभाव बहुत अशुभ माना गया है। दुर्भाग्य, पापचरण, धन नाश, व्यसन, स्त्री पुत्र को कष्ट, असफलतायें, हानि, प्रपंच कपट दुर्बद्वि, नेत्र चर्म रोग, पार्श्व व हृदय में वातजन्य शूल, दीर्घकालीन रोग, मानसिक व यौन दुर्बलता, आत्माहत्या की प्रवृत्ति सूचक है। इस स्थिति में शतचण्डी अनुष्ठान और हवन करना चाहिए। राहु पीड़ा नागश्राप से भी सम्बन्धित रहती है, अतः नागदेव की मूर्ति बनवाकर उसकी विधिवत पूजा करके, दान करना चाहिए। सामान्य जन अधिक न करें, तो राहु मन्त्र का जप- हवन और भार्गव ऋषि प्रणीत लक्ष्मी -हृदय का पाठ करें, साथ ही शनि का व्रत करें, क्योंकि ‘शनिवद् राहुः’ प्रसिद्ध ही है। औषधी स्नान, एवं गूगल की नित्य धूप देना भी लाभप्रद हैं। गोमेद धारण और राहु मंत्र का जाप भी लाभप्रद रहेगा। नित्य देवी पूजन और यथा शक्ति काले पदार्थों का दान करते रहना चाहिए।