संजीवनी मंत्र

Dr.R.B.Dhawan, top best astrologer in delhi

वेदों में महामृत्युंजय तथा गायत्री मंत्र की बड़ी महिमा बताई गई है, इसी लिए विद्वानों द्वारा कहा जाता है कि इन में से किसी भी एक मंत्र का सवा लाख जाप करके जीवनी की इच्छा को पूरा किया जा सकता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इन दोनों मंत्रों को मिलाकर एक अन्य मंत्र महामृत्युंजय गायत्री मंत्र अथवा मृत संजीवनी मंत्र का निर्माण किया था। इस मंत्र को संजीवनी विद्या के नाम से जाना जाता है। इस मंत्र के जाप से मृत व्यक्ति को भी जीवित करना संभव है।

क्या है संजीवनी मंत्र :-

ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ त्रयंबकंयजामहे ॐ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ॐ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम ॐ भर्गोदेवस्य धीमहि ॐ उर्वारूकमिव बंधनान ॐ धियो योन: प्रचोदयात ॐ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ॐ स्व: ॐ भुव: ॐ भू: ॐ स: ॐ जूं ॐ हौं ॐ

ऋषि शुक्राचार्य ने इस मंत्र की आराधना की थी जिसके प्रभाव से वह देव-दानव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए दानवों को सहज ही जीवित कर सके। महामृत्युंजय मंत्र में जहां सनातन धर्म के सभी 33 देवताओं (8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 वषट तथा ॐ) की शक्तियां समाहित हैं, वहीं गायत्री मंत्र की प्राण ऊर्जा तथा आत्मशक्ति को चमत्कारिक रूप से बढ़ाने वाला मंत्र है।

संजीवनी मंत्र के जाप में निम्न बातों का ध्यान रखें:-

1. जपकाल के दौरान पूर्ण रूप से सात्विक जीवन जिएं।

2. मंत्र के दौरान साधक का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।

3. इस मंत्र का जाप शिवमंदिर में या किसी शांत एकांत जगह पर रूद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए।

4. मंत्र का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और सही होना चाहिए साथ ही मंत्र की आवाज होठों से बाहर नहीं आनी चाहिए।

5. जपकाल के दौरान व्यक्ति को मांस, शराब, सेक्स तथा अन्य सभी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए। उसे पूर्ण ब्रहमचर्य के साथ रहते हुए अपनी पूजा करनी चाहिए।

महामृत्युंजय + गायत्री (संजीवनी) मंत्र का जाप का अभ्यास गुरु के द्वारा मंत्र प्राप्त करके ही करना चाहिये। आध्यात्म विज्ञान के अनुसार संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है, जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता। अर्थात् इस मंत्र साधना को किसी अनुभवी गुरू के दिशा- निर्देश में ही करनी चाहिए। गुरु जी से मंत्र प्राप्त करके गौरीपति मृत्युञ्जयेश्वर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करनेके पश्चात भक्त को सदा मृतसञ्जीवन नामक कवच का सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये। महादेव भगवान् शंकर का यह मृतसञ्जीवन नामक कवच पुण्यप्रद है, गुह्य और मङ्गल प्रदान करनेवाला है।

आचार्य शिष्य को उपदेश करते हैं कि – हे वत्स! अपने मन को एकाग्र करके इस मृतसञ्जीवन कवच को सुनो। यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है। इस मंत्र की गोपनीयता सदा बनाये रखना।

मृतसञ्जीवन नामक कवच:-

॥1॥ सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं । महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ 2।।समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं । शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥3॥ वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवित: । मृत्युञ्जयो महादेव: प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥4॥ जरा से अभय करनेवाले, निरन्तर यज्ञ करने वाले, सभी देवताओं से आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव ! आप पर्व-दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥4॥ दधाअन: शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुज: प्रभु: ।सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥5॥ अभय प्रदान करने वाली शक्ति को धारण करने वाले, तीन मुखों वाले तथा छ: भुजओं वाले, अग्रिरूपी प्रभु सदाशिव अग्रिकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥5॥ अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभु: । यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ॥6॥ अट्ठरह भुजाओं से युक्त, हाथ में दण्ड और अभय मुद्रा धारण करने वाले, सर्वत्र व्याप्त यमरुपी महादेव शिव दक्षिण-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥6॥ खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवित: । रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ॥7॥ हाथ में खड्ग और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, धैर्यशाली, दैत्यगणोंसे आराधित रक्षोरुपी महेश नैर्ऋत्यकोणमें मेरी सदा रक्षा करें ॥7।। पाशाभयभुज: सर्वरत्नाकरनिषेवित: । वरुणात्मा महादेव: पश्चिमे मां सदावतु ॥8॥ हाथ में अभय मुद्रा और पाश धाराण करनेवाले, शभी रत्नाकरों से सेवित, वरुण स्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम- दिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥8॥ गदाभयकर: प्राणनायक: सर्वदागति: । वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्कर: पातु सर्वदा ॥9॥ हाथों में गदा और अभय मुद्रा धारण करने वाले, प्राणों के रक्षक, सर्वदा गतिशील वायुस्वरूप शंकरजी वायव्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥9॥ शङ्खाभयकरस्थो मां नायक: परमेश्वर: । सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्कर: प्रभु: ॥10॥ हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले नायक (सर्वमार्गद्रष्टा) सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओं के मध्य में मेरी रक्षा करें ॥10॥ शूलाभयकर: सर्वविद्यानमधिनायक: । ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वर: ॥11॥ हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सभी विद्याओं के स्वामी, ईशानस्वरूप भगवान् परमेश्व शिव ईशानकोण में मेरी रक्षा करें ॥11॥ ऊधर्व भागे ब्र:मरूपी विश्वात्माऽध: सदावतु । शिरो मे शङ्कर: पातु ललाटं चन्द्रशेखर:॥12॥ ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊधर्व भाग में तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभाग में मेरी सदा रक्षा करें । शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें ॥12॥ भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु । भ्रूयुग्मं गिरिश: पातु कर्णौ पातु महेश्वर: ॥13॥ मेरे भौंहों के मध्य में सर्वलोकेश और दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें, दोनों भौंहों की रक्षा गिरिश एवं दोनों कानों की रक्षा भगवान् महेश्वर करें

॥13॥ नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वज: । जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ॥14॥ महादेव मेरी नासीका की तथा वृषभ ध्वज मेरे दोनों ओठों की सदा रक्षा करें । दक्षिणामूर्ति मेरी जिह्वा की तथा गिरिश मेरे दाँतोंकी रक्षा करें ॥14॥ मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषण: । पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ॥15॥ मृत्युञ्जय मेरे मुख की एवं नागभूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठ की रक्षा करें । पिनाकी मेरे दोनों हाथों की तथा त्रिशूली मेरे हृदय की रक्षा करें ॥15॥ पञ्चवक्त्र: स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वर: । नाभिं पातु विरूपाक्ष: पाश्र्वौ में पार्वतीपति: ॥16॥ पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनो की और जगदीश्वर मेरे उदर की रक्षा करें । विरूपाक्ष नाभि की और पार्वतीपति पाश्र्वभाग की रक्षा करें ॥16॥ कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिप: । गुह्यं महेश्वर: पातु ममोरू पातु भैरव: ॥17॥ गिरीश मेरे दोनों कटिभाग की तथा प्रमथाधिप पृष्टभाग की रक्षा करें । महेश्वर मेरे गुह्यभाग की और भैरव मेरे दोनों ऊरुओं की रक्षा करें ॥17॥ जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका । पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्य: सदाशिव: ॥18॥ जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनों की, जगदम्बिका मेरे दोनों जंघो की तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्तर मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें ॥18॥ गिरिश: पातु मे भार्यां भव: पातु सुतान्मम । मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायक: ॥19॥ गिरीश मेरी भार्या की रक्षा करें, तथा भव मेरे पुत्रों की रक्षा करें । मृत्युञ्जय मेरे आयु की गणनायक मेरे चित्त की रक्षा करें ॥19॥ सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकाल: सदाशिव: । एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥20॥ कालों के काल सदाशिव मेरे सभी अंगो की रक्षा करें ।

[ हे वत्स ! ] देवताओंके लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवचका वर्णन मैंने तुमसे किया है ॥20॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् । सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥21॥ महादेवजी ने मृतसञ्जीवन नामक इस कवच को कहा है । इस कवच की सहस्त्र (1000) आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है ॥21॥ य: पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहित: । सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥22॥ जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथावा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयुका उपयोग करता है ॥ 22॥ हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ । आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥23॥ जो व्यक्ति अपने हाथसे मरणासन्न व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कवच का पाठ करता है, उस आसन्नमृत्यु प्राणीके भीतर चेतनता आ जाती है । फिर उसे कभी आधि-व्याधि नहीं होती ॥23॥ कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा । अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तम: ॥24॥ यह मृतसञ्जीवन कवच काल के गाल में गये हुए व्यक्ति को भी जीवन प्रदान कर ‍देता है, और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणोंसे युक्त ऐश्वर्य को प्राप्त करता है ॥24॥ युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं । युद्दमध्ये स्थित: शत्रु: सद्य: सर्वैर्न दृश्यते ॥25॥ युद्ध आरम्भ होने के पूर्व जो इस मृतसञ्जीवन कवच का 28 बार पाठ करके रणभूमिमें उपस्थित होता है, वह उस समय सभी शत्रुओं से अदृश्य रहता है।

॥25॥ न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै । विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ॥26॥ यदि देवताओं के भी साथ युद्ध छिड जाये तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नही कर सकते, वह विजय प्राप्त करता है ॥26॥ प्रातरूत्थाय सततं य: पठेत्कवचं शुभं । अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ॥27॥ जो प्रात:काल उठकर इस कल्याणकारी कवच सदा पाठ करता है, उसे इस लोक तथा परलोक में भी अक्षय्य सुख प्राप्त होता है ॥27॥ सर्वव्याधिविनिर्मृक्त: सर्वरोगविवर्जित: । अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिक: ॥28॥ वह सम्पूर्ण व्याधियों से मुक्त हो जाता है, सब प्रकार के रोग उसके शरीर से भाग जाते हैं । वह अजर-अमर होकर सदा के लिये सोलह वर्षवाला व्यक्ति बन जाता है ॥28॥ विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् । तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ॥29॥ इस लोकमें दुर्लभ भोगों को प्राप्त कर सम्पूर्ण लोकों में विचरण करता रहता है । इसलिये इस महागोपनीय कवच को मृतसञ्जीवन नाम से कहा है ॥29॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ॥30॥ यह देवतओं के लिय भी दुर्लभ है ॥30॥ ॥ इति वसिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ॥——————————————————

मेरे और लेख देखें :-

Aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordprees.com, guruji ke totke.con, astroguruji.in पर।

गुरु जी से मिलने के लिए appointment लेकर मिल सकते हैं : 011-22455184, 09810143516, www.shukracharya.com

Learn astrology online : 09810143516

चक्षुषोपनिषद् , Chaksusopnisad

Dr.R.B.Dhawan top best astrologer in delhi

‘चाक्षुषी विद्या’ चक्षुषोपनिषद् ,Chaksusopnisad में उल्लेखित विद्या है, यद विद्या जटिल से जटिल नेत्ररोग का हरण करने वाली, पाठ मात्र से सिद्ध होने वाली विद्या है। जिससे समस्त नेत्ररोगों का सम्पूर्णत: नाश हो जाता है। और नेत्र तेज युक्त हो जाते हैं। उस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द हैं, सूर्य भगवान देवता हैं, नेत्ररोग की निवृत्ति के लिये चाक्षुषी विद्या मंत्र का जप होता है।

नेत्रोपनिषद् मंत्रः-
ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरिमं चछुरोगान् शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कलप्य। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मलय निर्मलय। ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करूणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम। खेचराय नमः महते नमः रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्रमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवा छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चाक्षुष्मतीविद्याां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्यक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।
ॐ (भगवान का नाम ले कर कहे)। हे चक्षु के अधिकारी सूर्य देव ! आप चक्षु में चक्षु के तेज रूप में स्थिर हो जायें, मेरी रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आंखों के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना स्वर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे में अन्धा न होऊँ (कृपया) वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, उखाड़ दें। ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्कर को नमस्कार है। ॐ करूणाकर अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ॐ सूर्य भगवान् को नमस्कार है। ॐ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्य देव को नमस्कार है। ॐ आकाश बिहारी को नमस्कार है। परम श्रेष्ठस्वरूप को नमस्कार है। ॐ (सबमें क्रिया-शक्ति उत्पन्न करने वाले) रजोगुणरूप सूर्य भगवान को नमस्कार है। (अन्धकार को सर्वथा अपने अंदर समा लेने वाले) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! मुझको असत से सत की ओर ले चलिये। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्ण स्वरूप भगवान् सूर्य शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं- उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई नहीं है। जो ब्रह्माण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है, उसको नेत्र सम्बंधी कोई रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अंधा नही होता। आठ ब्रह्ममणों को इस विद्या का दान करने पर इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्ध होती है।
जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों से सुशोभित एवं जातवेदा ( भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाले ) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय (सुवर्ण के समान कान्तिमान्) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व जो एकमात्र उत्पत्ति स्थान हैं, उन प्रचण्ड प्रताप वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव समस्त प्रजाओं ( प्राणियों ) के समक्ष उदित हो रहे हैं।
ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।
ॐ षड्विध ऐश्वर्य से समपन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, दिन का भार वहन करने वाली है। हम उन भगवान् के लिये उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेघा अत्यंत प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पंछी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे। ‘भगवन् ! इस अंधकार को छिपा दीजिये, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिये तथा तमोमय बन्धन में बधे हुये हम सब प्राणियों को अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार है। पुष्करेक्षण को नमस्कार है। निर्मल नेत्रों वाले अमलेक्षण को नमस्कार है। कमलेक्षण को नमस्कार है। विश्व रूप को नमस्कार है।
नेत्र रोग से पीड़ित श्रद्धालु साधक को चाहिये कि प्रतिदिन प्रातःकाल पूर्व की ओर मुख करके बैंठे और हरिद्रा (हल्दी) की माला से ॐ ह्नीं हंसः इस बीज मंत्र की छः मालायें जप कर नेत्रोंपनिषद के कम से कम बारह पाठ करें। पाठ के पश्चात फिर उपर्युक्त बीजमंत्र की पांच मालायें जपें। तदनन्तर सूर्य भगवान् को श्रदापूर्वक अर्घ्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा।

———————————————————

मेरे और लेख देखें :-

Aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordprees.com, guruji ke totke.con, astroguruji.in पर।

गुरु जी से मिलने के लिए appointment लेकर मिल सकते हैं : 011-22455184, 09810143516, www.shukracharya.com

Learn astrology online : 09810143516

मंगल, मांगलिक

Dr.R.B.Dhawan, top best astrologer in delhi

मंगल से प्रायः सभी भयभीत रहते हैं। विशेषकर बालिका/बालक की कुंडली यदि मंगलीक हुई तो माता-पिता की चिंता बढ़ जाती है। वैसे ज्योतिष में मंगल को काल पुरूष का पराक्रम माना गया है। यह तमोगुणी अग्नि तत्व प्रधान ग्रह है। यह मेष एवं वृश्चिक राशि का स्वामी है। मकर राशि इसकी उच्च राशि तथा कर्क राशि इसकी नीच राशि है। यह मेष राशि में 1 से 12 अंश तक मूल त्रिकोण में, मेष में ही 13 अंश से
30 तक तथा सम्पूर्ण वृश्चिक राशि में स्वराशि का, मकर में 28 अंश तक उच्च का, एवं कर्क में 28 अंश तक नीच राशि का होता है। मंगल का सम्बंध मकर राशि से सर्वोत्तम, मेष से उत्तम, सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु व मीन राशि से मध्यम, वृष एवं मिथुन से सामान्य तथा कर्क, तुला व कुंभ राशि से प्रतिकूल होता है। मंगल कुंडली में अपने स्थित भाव से चौथे, सातवें एवं आठवें भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है। कुंडली में यह तीसरे भाव का कारक है। मंगल के लिये तीसरा, छठा एवं ग्यारहवाँ भाव पूर्णतः शुभ है, लेकिन तीसरे भाव में स्थित मंगल नौवें भाव में स्थित ग्रह से वेध पाता है। वेध प्राप्त शुभ मंगल भी अशुभ फलदायी होता है।

जन्म कुंडली में लग्न भाव से मंगल के लिये 3, 6, 10, 11 भाव शुभ होते हैं। 1, 2, 5, 7, 9 भाव अरिष्ट दायक तथा 4, 8, 12वाँ भाव में से किसी में भी स्थित मंगल जातक/जातिका के लिये अत्यंत अरिष्ट प्रभाव देता है। मंगल कर्क, सिंह, मीन लग्न के लिये प्रबल कारक ग्रह है। मेष राशि के लिये अष्टमेश होकर तथा वृश्चिक राशि लग्न के लिये षष्ठेश होकर तटस्थ स्वभाव का हो जाता है। कारक होकर अत्यंत शुभ फलदायक होता है।

यदि जन्म कुंडली में मंगल लग्न (प्रथम भाव) चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या बारहवें भाव में हो तो कुंडली मंगलिक अर्थात मंगल दोष युक्त हो जाती है, और ऐसा मंगल दाम्पत्य सुख की हानि करता है। लग्नस्थ मंगल की पति/ पत्नी भाव पर पूर्ण दृष्टि पड़ती है। अतः दाम्पत्य जीवन ठीक नहीं बीतता है। जातक/जातिका शिरोव्यथा से पीड़ित हो सकते हैं। लग्नस्थ मंगल जातक को क्रोधी, हिंसक, झगड़ालू प्रवृत्ति का कर देता है, जीवन भर कोई न कोई स्वास्थ्य बाधा बनी रहती है।

चतुर्थ भावास्थित मंगल की सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि पड़ती है, अतः यदि मंगली लड़के या लड़की की शादी गैर मंगली लड़की या लड़के से हो जाये तो पति/पत्नी सदैव रूग्ण रहते हैं। संतान का अभाव हो सकता है। गर्भाशय या गुप्तांग के विकार रहते हैं। आॅपरेशन से भी गुजरना पड़ सकता है। यदि मंगल युवावस्था में हो (प्रत्येक ग्रह 10 से 23 अंश तक युवावस्था में होता है) तथा सप्तम या अष्टम भाव में स्थित हो तो पति/पत्नी की आयुहानि करता है। वैधव्य/विधुरता देता है। बारहवें भाव स्थित मंगल व्यक्ति के जीवन में अस्थिरता देता है। दाम्पत्य सुख नहीं मिलने देता है। कोई न कोई बाधा सच्चा पति/पत्नी सुख नहीं भोगने देती है। द्वितीय भाव स्थित मंगल की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ भाव पर, अष्टम भाव पर एवं नवम भाव पर पड़ती है, अतः यह भी पति/पत्नी के सुख की हानि करता है।
मंगली लड़के की शादी मंगली लड़की से करने से यह दोष को दूर होता है, लेकिन दोनों के मंगल एक ही भाव में न हों। अशुभ प्रभावकारी मंगल उदर विकार, एपैन्डि साइटिस, रक्त विकार सूखा रोग, एनीमिनीया, पित्त विकार, जलना, गिरना, गुप्त रोग, स्नायु दौर्बल्य आदि रोगों से कष्ट देता है। मंगल की गर्मी को कोई भी ग्रह शांत नहीं कर सकता है। मंगल-शनि युति या मंगल-केतु युति या मंगल-राहु युति अत्यंत अशुभ परिणाम देती है। यदि यह युति सप्तम भाव, सप्तमेश, गुरू या शुक्र को प्रभावित करें तो भी दाम्पत्य सुख दिव्य स्वप्न बन जाता है। इसी प्रकार यदि दोनों अग्नि कारक ग्रह सूर्य एवं मंगल की युति हो जायें तो, बहुत हानि होती है। शुक्र के साथ मंगल की युति अति कामुक बना देगी तथा वीर्य स्राव दोष देती है। यदि रक्त का कारक ग्रह मंगल उपरोक्तानुसार पाप प्रभाव में हो तो कैंसर रोग हो सकता है। जिन लग्नों के लिये मंगल मारक प्रभाव वाला ग्रह हो, अर्थात् मारकेश हो तो उन लग्नों को मंगल की अशुभ स्थिति अत्यंत कष्टप्रद होती है। मंगल निम्नलिखित लग्नों के लिये मारक होता है- वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर एवं कुंभ। कुछ योग जो मंगलीक दोष को निष्प्रभावी कर देते हैं:-

1. यदि मेलापक में लड़के-लड़की दोनों ही मंगलीक हों तो, मंगल दोष निष्प्रभावी हो जाता है, अर्थात् शादी उपरांत दोनों का जीवन ठीक चलता है।

2. कुंडली में मंगल शुक्र के साथ स्थित हो या शुक्र से दृष्ट हो अर्थात दोनों एक दूसरे से सम सप्तक स्थित हों। केन्द्र में मंगल की युति भी मांगलीक दोष का निवारण करती है।

3. यदि मंगल अपनी ही राशि में हो, उच्च या नीच राशि में हो, वक्री हो, अस्त हो तो मंगलदोष नहीं रहता है। मूल त्रिकोण में भी मंगलिक दोष नहीं होता है।

4. जन्म कुंडली में मंगल जन्म लग्न से केन्द्रस्थ हो तथा चंद्रमा साथ में हो तो मंगल दोष मिट जाता है।

5. मिथुन लग्न एवं कन्या लग्न में जन्मे जातक/जातिका का पति/पत्नी भाव का स्वामी (सप्तमेश) गुरू होता है और यदि गुरू 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगलिक दोष मिट जाता है। मंगल 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं हो।

6. जन्म लग्न मेष या सिंह, कर्क, मीन, धनु होने पर मंगल दोष कारक नहीं रहता है। यदि एक पक्ष मंगलीक है, तथा दूसरे पक्ष की कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में यदि मंगल न हो तो, इन्हीं भावों में से किसी में भी सूर्य या शनि होने से मंगलिक दोष का निवारण हो जाता है।

7. चर राशि मेष, कर्क, तुला एवं मकर में से किसी भी राशि में स्थित मंगल दोषकारी नहीं है।

8. यदि शुभ ग्रह यथा बलवान चंद्रमा, बुध, गुरू शुक्र केन्द्र में हों, तथा शनि, राहु, केतु एवं सूर्य त्रिक स्थान में स्थित हों तो, भी मंगलिक दोष मिट जाता है।

9. लग्न में मेष का मंगल, चतुर्थ में वृश्चिक राशि का मंगल, सप्तम में मकर राशि का मंगल, बारहवें भाव मेें धनु राशि का मंगल, लग्न में सिंह या मकर राशि का मंगल, द्वादश भाव में वृष और तुला राशि का मंगल चौथे भाव में मेष, धनु या मीन राशि का मंगल हो तो, मंगल दोषदायक नहीं रहता है।

10. सप्तमेश केन्द्र में बलवान हो, और मंगल वृष या तुला राशि में हो तो, दोष मिट जाता है। मंगल गुरू के साथ हो, या गुरू से दृष्ट हो तो, भी मंगलिक दोष नहीं होता है।

11. यदि मेलापक के गुण 25 से आगे हों, राशि मैत्री हो, दोनों के गुण एक हों तो, भी मंगलदोष निष्प्रभावी हो जाता है।

मंगलिक दोष को मिटा देने वाले ये कुछ परिहार हैं- इनमें से कुछ विवादास्पद भी हैं, अतः कुंडली मिलान करते समय यदि कुंडली प्रथम दृष्टि में मंगलिक प्रतीत हो तो, उसका सूक्ष्म परीक्षण परिहारों के संदर्भ में करें केवल इस आधार पर कि –

लग्न व्यये च पाताले यामित्रे चाऽष्टमे कुजः।
कन्या भर्तृविनाशाय वरः कन्या विनाशकृत।।

किसी जातक/जातिका की कुंडली को मंगलिक घोषित कर माँ-बाप को चिंताग्रस्त नहीं बना देना चाहिये, और यदि कुुंडली वास्तव में मंगलिक दोष युक्त है तो-

कुज दोषवती देया कुज दोषवते सदा।
नास्ति दोषो न चानिष्टं दम्पत्योः सुख वर्धनम्।।

अर्थात् मंगलिक दोषयुक्त कन्या की शादी मंगलिक दोष युक्त लड़के से कर दी जाये तो दोष समाप्त हो जाता है। कोई अनिष्ट नहीं होता है, और दाम्पत्य सुख की वृद्धि होती है।

कब कुंडली मिलान की आवश्यकता नहीं:- मिलान केवल जन्म कुंडली होने पर ही मंगलिक दोष देखा जा सकता है। जन्म कुंडली न होने की स्थिति में दोनों के नाम के प्रथमाक्षर से केवल अष्टकूटों का मिलान ही देखना चाहिये। दोनों में से यदि एक विधवा या विधुर हों या परित्यक्त या परित्यक्ता हों तो किसी प्रकार के मिलान की आवश्यकता नहीं है। मंगलिक की भी नहीं। जातक/ जातिका में से कोई भी एक विकृतांग हो तो भी किसी भी प्रकार के मिलान की जरूरत नहीं है। दोनों में परस्पर शादी से पूर्व ही प्रेमाशक्ति हो और दोनों शादी करने के लिये उद्यत हों तो भी मिलान या अन्य किसी दोष को देखने की आवश्यकता नहीं है।

——————————————————

अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, aap ka bhavishya.com, rbdhawan.wordpress.com, guruji ke totke.com.

Astrological products and astrology course के लिए विजिट कीजिए :- http://www.shukracharya.com

Learn astrology online : 09810143516

मंगली, mangli

मंगली योग का प्रभाव क्या है?

Dr.R.B.Dhawan, top best astrologer in Delhi, astrological consultant

भारतीय जीवनशैली में गृहस्थ आश्रम का विशेष महत्व है। गृहस्थ जीवन की शुरुआत पाणिग्रहण संस्कार से आरंभ होती हैं। प्रणय-सूत्र में बंधना सुखदायी होगा या दुःखदायी, यह दोनों के ग्रहों पर निर्भर करेगा जो कि एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। भारत में सर्वाधिक प्रचलित योग ‘मंगली योग’ है। इसे कुज दोष कहते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि ज्योतिष के प्राचीन महत्वपूर्ण ग्रंथ, वृहत पाराशर, होरा शास्त्र, सारावली, जातक परिजात इत्यादि में मंगली योग का कहीं भी उल्लेख नहीं है फिर भी यह योग इतना प्रचलित है कि बच्चे के जन्म लेने के बाद, विशेषकर कन्या के जन्म लेने के उपरांत माता-पिता यही चिन्ता व्यक्त करते हैं कि कन्या मंगली तो नहीं है। आज भी यही धारणा है कि मंगली योग ही विवाह जीवन को नष्ट करता है, अथवा लड़की की कुंडली में यही योग वर को मृत्यु देगा। इतना भयावह रूप प्रचलित है। असल में तथाकथित झोला छाप पंडितों ने या अज्ञानियों ने तिल का पहाड़ बना दिया है। इसका परिहार होता है, या नहीं। कहां से अच्छा है और कहां बुरा, इसका पूर्ण ज्ञान किए बिना बस जातक को भयभीत करना ही जैसे उनका अधिकार है। मंगल ग्रह के देवता हैं श्री गणेश, श्री हनुमान और मां दुर्गा, ये तीनों ही विघ्न बाधाएं और अमंगल दूर करते हैं। अतः यह जानना आवश्यक है कि जिस ग्रह से मंगली या मांगलिक होना बताया गया है, उसके क्या गुण हैं? और स्वभाव क्या है?
मंगल ग्रह का नाम ‘लौहितंऽग’ हैं, क्योंकि यह दूर से लाल दीख पड़ता है। इसका नामा ‘कुज’ और ‘भौम’ भी है। भूमि पुत्र होने से कुज और पृथ्वी से पृथक् हो जाने के कारण भौम नाम हुआ। चूंकि कुछ संघर्ष के उपरान्त पृथ्वी से पृथकत्व हुआ। अतः मंगल लड़ाई-झगड़ा का कारक ग्रह माना गया है। ग्रहों के कुटुम्ब में रवि, पृथ्वी के पिता और चन्द्र माता के स्थान में है। इसीलिए मंगल में रवि और चन्द्र दोनों के गुणों का मिश्रण पाया जाता है।

आचार्य वराहमिहिर द्वारा –
क्रूरदृक तरुण मूर्ति रूदारः पैत्तिकः, सुचपलः कृशमध्यः।
दुष्ट दृष्टिवाला, नित्य युवा ही प्रतीत होने वाला, दाता, शरीर में पित्त की मात्रा अधिक, अस्थिर चित्त, संकुचि तथा पतली कमर, ऐसा मंगल का स्वरूप है।

पाराशर द्वारा-
‘सत्वकुंजः, नेताज्ञेयो धरात्मजः अत्युच्चांगोभौमः, रक्त वर्णो भौमः, देवता षडानन, भौमा अग्नि, कुजः क्षत्रियः आरः तमः भौमः मज्जा, भौमवार, भौम तिृक्तः, भौम, दक्षिणे, कुजः निशायांबली, भौमः कृष्णेचबली, क्रूर स्वदिवसमहो। रामासपर्वकालवीर्यक्रमात् श. कु. बु. गु. शु. चराघा वृद्धितोवीर्यवत्तराः। स्थूलान् जनयातिसूर्ये दुर्भगान्् सूर्यपुत्रकः। श्रीरोपेतान् तथा चन्द्रः कटुकाधान् धरासुतः। वस्त्रे रक्तचित्रे कुजस्य। कुजः ग्रीष्मः।।

सत्वगुण प्रधान तथा शक्तिशाली भौम है। मंगल नेता है। मंगल का कद बहुत ऊंचा है। भूमि पुत्र मंगल रक्तवर्ण है। इसका देवता षडानन, कीर्तिकेय है। यह पुरुषग्रह है। भौम अग्नितत्व प्रधान है। भौम क्षत्रिय है। यह तामस है। भौम मज्जासार है। वारों में भौमासार, मंगल का है। इसे तिक्त रस पसंद है। इसकी दिशा दक्षिण है यह रात्रिबली है। कृष्ण पक्ष में बली है। क्रूर स्वभाव है। अपने दिवस में, अपनी होरा में, अपने मास में, अपने पर्व और काल में श. भौ. बु. गु. और शु. वृद्धिक्रम से अधिक बलीयान होते हैं। सूर्य बली हो तो जातक स्थूलकाय होता है, शनि से जातक कुरूप और अभागा होता है। चन्द्र से क्षीर युक्त तथा रस प्रधान पदार्थ होते हैं। मंगल कटुक पदार्थों को जन्म देता है। मंगल के वस्त्र लाल और चित्रित होते हैं। मंगल-ग्रीष्म ऋतु का स्वामी है। जहां एक ओर यह क्रूर स्वभावी है, कटुक पदार्थों का जन्मदायक है वहीं वृहत् संहिता अनुसार यह कल्याणकारी भी है।

विपुल विमलमूर्तिः किंशुकाशोवर्णः स्पुटरूचिरमयूश्वस्तप्तताम्र प्रभावः।
विचरतियदि मार्गे चोत्तरे मेदिनीजः
शुभकृदवनिपाना हृदिदश्चप्रजानाम्।।

इसका आकार बड़ा होता है, वर्ण अशोक का किंशुक के फूलों जैसा लाल होता है। किरण स्वच्छ और मनोहर होते हैं, कांति तपे हुए तांबे के समान होती है।
यही मंगल मार्ग से जब चलता है, तब राजा और प्रजा के लिए कल्याणकारी होता है।
अर्थात इन सभी मतों से निष्कर्ष निकलता है कि मंगल ऊर्जा शक्ति है, चंचल स्वभाव, कार्यचतुर, शूर सिद्धांत वचन कहने वला, हिंसक प्रवृत्ति, तमोगुणी, प्रतापी, साहसी, शत्रुओं, को मारने में निपुण, स्वभाव में उग्र, दृष्टि में क्रूरता, कामक्रीड़ा में अति चचंल, उदारचित्त, चपल और आलस्य रहित है, निर्भीक है, स्पष्ट जोरदार बोलने वाला है। अर्थात यदि मंगल शुभ स्थिति में है, उच्च का है, मूल त्रिकोण में है, स्वराशि में है, मित्र राशि में है, योग कारक, शुभग्रहों के साथ तथा शुभ से दृष्ट है तो, उपर्युक्त लिखित गुण जातक में होंगे ही।
मंगली योग भावानुसार- मंगली योग जन्म कुण्डली में मंगल के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित होने से बनता है। उत्तर भारत में द्वितीय भाव में मंगल को मंगली नहीं मानते किन्तु दक्षिण भारत में मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश में कहीं भी वह मंगली ही माना जाता है।
अधिकांश विद्वानों का मत है कि मांगलिक दोष चन्द्र लग्न से तथा शुक्र लग्न से भी देखा जाना चाहिए।
चन्द्र लग्न से मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो तो (कुज दोष) मंगली योग होता है।
शुक्र लगन से मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम या अष्टम में भाव में स्थित हो तो मंगली योग होता है।
मंगली योग चन्द्र, शुक्र से इसलिए देखा जाना चाहिए क्योंकि लग्न के साथ, चन्द्रमा मन का कारक है जिससे समस्त मन की अनुभूति होती है तथा शुक्र, विवाह का कारक है। इसलिए इन दोनों का वैवाहिक जीवन में महत्व है।
मंगल क्रूर ग्रह है इसका गुण अशुभ ही होता है ऐसा सत्य नहीं है। इसको जानने के लिए 1, 2, 4, 7, 8, 12 भावों में परिणाम तथा प्रत्येक बारह राशियों में परिणाम जानने होंगे। क्योंकि मंगल विभिन्न राशियों में भिन्न-भिन्न फल देता है।

उदाहरणार्थ- यदि किसी की कुण्डली में मंगली योग है और मंगल निर्बल है तो मंगल अधिक हानि नहीं कर सकता ऐसी कुण्डली के मिलान के लिए, यह जरूरी नहीं है कि दूसरे की कुण्डली में मांगलिक योग हो। मंगल यदि अस्त है या बली क्रूर ग्रहों से दृष्ट है या संधि में हैं तो मंगल निर्बल होगा।
यदि किसी की कुण्डली में वैवाहिक जीवन सुखद है तथा आयु भी पूर्ण है, तो सका विवाह मंगली योग वाले से किया जाय तो कोई हानि नहीं होगी।
अतः हमें यह जानना आवश्यक है कि मंगल कुण्डली के किस भाव में स्थित है, तथा अपनी दृष्टि द्वारा किन-किन भावों को प्रभावित कर रहा है। मंगल किन ग्रहों के साथ है, तथा मंगल पर किसी ग्रह की दृष्टि है। मंगल के द्वारा कौन से योग बन रहे हैं।? मंगल तात्कालिक शुभ है और अशुभ। इससे पता चलेगा कि यह कुण्डली में कहा लाभ पहुंचाएगा। मंगल अपनी शक्ति अनुसार ही लाभ या हानि पहुंचाएगा। केवल मंगली होना ही वैवाहिक जीवन को खराब नहीं करता और इसका फल सभी के लिए एक जैसा भी नहीं होता। अतः भली भांति अध्ययन करके ही मंगली और वैवाहिक योग बताना चाहिए।
यूं तो ऊपर काफी कुछ लिखा जा चुका है परन्तु मंगली-दोष का परिहार अर्थात निरस्तीकरण भी होता है।

परिहार-
1. मंगल यदि मेष या वृश्चिक राशि में 1, 2, 4, 7, 8, 12वें भाव में हो।

2. बृहस्पति किसी भाव में स्थित होकर मंगल को पूर्ण दृष्टि से देखता हो।

3. शनि किसी भाव में स्थित होकर मंगल को पूर्ण दृष्टि से देखता हो।

4. राहु यदि बृहस्पति या शनि से पूर्ण दृष्टि होकर मंगल पर पूर्ण दृष्टि डालता हो।

5. मंगल चतुर्थ अथवा सप्तम भाव में हो और वहां मेष, कर्क, वृश्चिक या मकर राशि हो।

6. यदि मंगल 1, 2, 4, 7, 8, 12 भाव में बली चन्द्रमा, बृहस्पति या बुध से संयुक्त हो।

7. वृषभ व तुला में चतुर्थ व सप्तम भाव का मंगल हो।

8. मिथुन व कन्या राशि का द्वितीय भावसंधि में मंगल हो।

9. मंगल, कर्क, सिंह अथवा मकर में स्थित हो।

10. मंगल, धनु व मीन का अष्टम में स्थित हो।

11. मगल, तुला व वृषभ में द्वादश में स्थित हो।

12. यदि मंगल शनि के साथ स्थित हो।

13. लड़क या लड़की की कुण्डली में मंगल जहां है वहीं दूसरी कुण्डली में शनि हो।

14. द्वादश भाव में मंगल, बुध, शुक्र की राशि में हो।

15. मंगल, सिंह राशि में स्थित हो।

16. कुम्भ, मकर लग्न में मंगल सप्तम भाव में हो।

17. कर्क व सिंह लग्न में मंगल अष्टम भाव मं हो।

18. शनि की राशि पर मंगल अष्टम भाव में हो।

वक्रिणि नीचारिस्थे वार्कस्थे वा न कुजदोषः।

अनिष्ट स्थान में मंगल यदि वक्री हो व नीच (कर्क राशि) हो अथवा शत्रु राशि (मिथुन व कन्या) राशि का हो तो वह अनिष्ट कारक नहीं होता।

कुजो जीव समायुक्तो युक्तो व शशिना यदा।
चन्द्रः केन्द्रगतो वाऽपि तस्य दोषों न मंगली।।

1, 4, 7, 8, 12 भाव में या अरिष्ट कारक स्थानों में से किसी एक में मंगल बृहस्पति अथवा चन्द्रमा के साथ बैठा हो, किन्तु चन्द्रमा केन्द्र में हो तो वह मंगली दोष नहीं कहा जाता। इस प्रकार मांगलिक कुंडली के अनेक परिहार हैं, अतः अध्ययन करने की आवश्यकता है, डराने की नहीं, और ना ही डरने की आवश्यकता है।

मेरे और लेख देखें :- Aap ka bhavishya.com, Aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordprss.com, astroguruji.in, guruji ke title.com, vaifhraj.com

ज्योतिषीय विश्लेषण के लिये समय लेकर मिल सकते हैं- 011-22455184, 09810143516
Learn astrology online : 09810143516

मानसिक रोग

चिकित्सा ज्योतिष में मानसिक रोगों का अध्ययन :-

Dr.R.B.Dhawan, top best astrologer in Delhi

आज के इस लेख में हम मानसिक रोगों के अध्ययन की बात करेगें- मानसिक रोग होने के बहुत से कारण होते हैं, लेकिन इन कारणों का ज्योतिषीय आधार क्या है? इसकी चर्चा इस लेख के माध्यम से की जा रही है चिकित्सा ज्योतिष में सभी रोगों के कुछ योग होते हैं, और ग्रहों के परस्पर संबंध बने होते हैं, जिनके आधार पर यह पता चलता है कि जातक को जीवन में किस प्रकार के रोग हो सकते हैं, लेकिन इसका निर्धारण किसी कुशल ज्योतिषी से ही कराना चाहिए अन्यथा बेकार का तनाव उत्पन्न हो सकता है। आइए कुंडली के उन योगों का अध्ययन करें, जिनके आधार पर मानसिक रोगों का पता चलता है :-

मानसिक रोगों में चंद्रमा, बुध, चतुर्थ भाव व पंचम भाव का आंकलन किया जाता है, चंद्रमा मन है, बुध से बुद्धि देखी जाती है, और चतुर्थ भाव भी मन है। तथा पंचम भाव से बुद्धि देखी जाती है, जब व्यक्ति भावुकता में बहकर मानसिक संतुलन खोता है, तब उसमें पंचम भाव व चंद्रमा की भूमिका अहम मानी जाती है, रोग में चतुर्थ भाव की भूमिका मुख्य मानी जाती है, शनि व चंद्रमा की युति भी मानसिक शांति के लिए शुभ नहीं मानी जाती है, मानसिक परेशानी में चंद्रमा पीड़ित होता है।

जन्म कुंडली में चंद्रमा अगर राहु के साथ है, तब जातक को मानसिक रोग होने की संभावना बनती है, क्योकि राहु मन को भ्रमित रखता है, और चंद्रमा मन है, मन के घोड़े बहुत ज्यादा दौड़ते हैं, व्यक्ति बहुत ज्यादा हवाई किले बनाता है। यदि जन्म कुंडली में बुध, केतु और चतुर्थ भाव का संबंध बन रहा है, और यह तीनों अत्यधिक पीड़ित हैं, तब जातक में अत्यधिक जिद्दीपन हो सकता है, और वह सेजोफ्रेनिया का शिकार हो सकता है. इसके लिए बहुत से लोगों ने बुध व चतुर्थ भाव पर अधिक जोर दिया है। जन्म कुंडली में गुरु लग्न में स्थित हो और मंगल सप्तम भाव में स्थित हो या मंगल लग्न में और सप्तम में गुरु स्थित हो तब मानसिक आघात लगने की संभावना बनती है। जन्म कुंडली में यदि शनि लग्न में और मंगल पंचम भाव या सप्तम भाव या नवम भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।
कृष्ण पक्ष का बलहीन चंद्रमा हो, और वह शनि के साथ 12वें भाव में स्थित हो, तब मानसिक रोग की संभावना बनती है। शनि व चंद्र की युति में जातक मानसिक तनाव ज्यादा रखता है। जन्म कुंडली में शनि लग्न में स्थित हो, सूर्य 12वें भाव में हो, मंगल व चंद्रमा त्रिकोण भाव में स्थित हो, तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।
जन्म कुंडली में मांदी सप्तम भाव में स्थित हो, और अशुभ ग्रह से पीड़ित हो रही हो। राहु व चंद्रमा लग्न में स्थित हो, और अशुभ ग्रह त्रिकोण में स्थित हों, तब भी मानसिक रोग की संभावना बनती है।
मंगल चतुर्थ भाव में शनि से दृष्ट हो, या शनि चतुर्थ भाव में राहु/केतु के अक्षांश पर स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है। जन्म कुंडली में शनि और मंगल की युति छठे भाव या आठवें भाव में हो रही हो। जन्म कुंडली में बुध पाप ग्रह के साथ तीसरे भाव में हो या छठे भाव में हो या आठवें भाव में हो या बारहवें भाव में स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है। यदि चंद्रमा की युति केतु व शनि के साथ हो रही हो, तब यह अत्यधिक अशुभ माना गया है, और अगर यह अंशात्मक रुप से नजदीक हैं, तब मानसिक रोग होने की संभावना अधिक बनती है। जन्म कुंडली में शनि और मंगल दोनो ही चंद्रमा या बुध से केन्द्र में स्थित हों तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

मिरगी होने के जन्म कुंडली में लक्षण :-

इसके लिए चंद्र तथा बुध की स्थिति मुख्य रुप से देखी जाती है, साथ ही अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जाती है। शनि व मंगल जन्म कुंडली में छठे या आठवें भाव में स्थित हों, तब जातक को मिरगी संबंधित बीमारी का सामना करना पड़ सकता है। कुंडली में शनि व चंद्रमा की युति हो, और यह दोनो मंगल से दृष्ट हों,
जन्म कुंडली में राहु व चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हों।

मानसिक रुप से कमजोर बच्चे अथवा मंदबुद्धि बच्चे:-

जन्म के समय लग्न अशुभ प्रभाव में हो, विशेष रुप से शनि का संबंध बन रहा हो, यह संबंध युति, दृष्टि व स्थिति किसी भी रुप से बन सकता है। शनि पंचम से लग्नेश को देख रहा हो, तब व्यक्ति जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है, जन्म के समय बच्चे की कुण्डली में शनि व राहु पंचम भाव में स्थित हो, बुध बारहवें भाव में स्थित हो, और पंचमेश पीड़ित अवस्था में हो, तब बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है। पंचम भाव, पंचमेश, चंद्रमा व बुध सभी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तब भी बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है। जन्म के समय चंद्रमा लग्न में स्थित हो और शनि व मंगल से दृष्ट हो तब भी व्यक्ति मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है। पंचम भाव का राहु भी व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट करने का काम करता है, बुद्धि अच्छी नहीं रहती है।

——————————————————

मेरे ओर लेख देखें :- astroguruji.in, rbdhawan.wordpress.com, guruji ke title.com, shukra Haryana.com पर।

संतान योग

इस‌ लेख में जन्म कुंडली में संतान योग कैसे बनता है, यह अनेक उदाहरणों के साथ समझाया गया है:-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

जन्म कुंडली में संतान विचारने के लिए पंचम भाव का मुख्य स्थान होता है। पंचम भाव से संतान का विचार करना चाहिए। दूसरी संतान का विचार करना हो, तो सप्तम भाव से करना चाहिए। तीसरी संतान के विषय में जानना हो, तो अपनी जन्म कुंडली के भाग्य स्थान से विचार करना चाहिए

1. पंचम भाव का स्वामी स्वग्रही हो।
2. पंचम भाव पर पाप ग्रहों की दॄष्टि ना होकर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो, अथवा स्वयं चतुर्थ सप्तम भाव को देखता हो।
3. पंचम भाव का स्वामी कोई नीच ग्रह ना हो यदि भाव पंचम में कोई उच्च ग्रह हो तो अति सुंदर योग होता है।
4. पंचम भाव में कोई पाप ग्रह ना होकर शुभ ग्रह विद्यमान हों, और षष्ठेश या अष्टमेश की उपस्थिति भाव पंचम में नही होनी चाहिये।
5. पंचम भाव का स्वामी को षष्ठ, अष्टम एवम द्वादश भाव में नहीं होना चाहिये, पंचम भाव के स्वामी के साथ कोई पाप ग्रह भी नही होना चाहिये साथ ही स्वयं पंचम भाव का स्वामी नीच का नही होना चाहिये।
6. पंचम भाव का स्वामी उच्च राशिगत होकर केंद्र त्रिकोण में हो।
7. पति एवम पत्नी दोनों की कुंडलियों का अध्ययन करना चाहिए।
8. सप्तमांश लग्न का स्वामी जन्म कुंडली में: बलवान, शुभ स्थान, सप्तमांश लग्न भी शुभ ग्रहों से युक्त।
9. एकादश भाव में शुभ ग्रह बलवान हो।

संसार में कोई भी ऐसा दंपति नहीं होगा, जो संतान सुख नहीं चाहता हो। चाहे वह गरीब हो या अमीर। सभी के लिए संतान सुख होना सुखदायी ही रहता है। संतान चाहे खूबसूरत हो या बदसूरत, लेकिन माता-पिता को बस संतान चाहिए। फिर चाहे वह संतान माता-पिता के लिए सहारा बने या न बने। अकबर बादशाह ने भी काफी मन्नतें मानकर सलीम को माँगा था।

किसी-किसी की संतान होती है, और फिर गुजर जाती है। ऐसा क्यों होता है? ये सब ग्रहों की अशुभ स्थिति से होता है। यहाँ पर हम इन्हीं सब बातों की जानकारी देंगे, जिससे आप भी जान सकें कि संतान होगी या नहीं।

पंचम स्थान संतान का होता है। वही विद्या का भी माना जाता है। पंचम स्थान कारक गुरु और पंचम स्थान से पंचम स्थान (नवम स्थान) पुत्र सुख का स्थान होता है। पंचम स्थान गुरु का हो तो हानिकारक होता है, यानी पुत्र में बाधा आती है।

सिंह लग्न में पंचम गुरु वृश्चिक लग्न में मीन का गुरु स्वग्रही हो, तो संतान प्राप्ति में बाधा आती है, परन्तु गुरु की पंचम दृष्टि हो, या पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो संतान सुख उत्तम मिलता है।

पंचम स्थान का स्वामी भाग्य स्थान में हो, तो प्रथम संतान के बाद पिता का भाग्योदय होता है। यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो उसकी पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो पुत्र अत्यंत प्रभावशाली होता है। मंगल की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या पंचम भाव पर पड़ रही हो, तो पुत्र अवश्य होता है।

पुत्र संततिकारक चँद्र, बुध, शुक्र यदि पंचम भाव पर दृष्टि डालें तो पुत्री संतति होती है। यदि पंचम स्थान पर बुध का संबंध हो, और उस पर चँद्र या शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो, तो वह संतान होशियार होती है। पंचम स्थान का स्वामी शुक्र यदि पुरुष की कुंडली में लग्न में या अष्टम में या तृतीय भाव पर हो, एवं सभी ग्रहों में बलवान हो, तो निश्चित तौर पर लड़की ही होती है। पंचम स्थान पर मकर का शनि कन्या संतति अधिक होता है। कुंभ का शनि भी लड़की देता है। पुत्र की चाह में पुत्रियाँ होती हैं। कुछ संतान नष्ट भी होती है।

पंचम स्थान का स्वामी जितने ग्रहों के साथ होगा, उतनी संतान होगी। जितने पुरुष ग्रह होंगे, उतने पुत्र और जितने स्त्रीकारक ग्रहों के साथ होंगे, उतनी संतान पुत्री होगी। सप्तमांश कुंडली के पंचम भाव पर या उसके साथ या उस भाव में कितने अंक लिखे हैं, उतनी संतान होगी। एक नियम यह भी है कि सप्तमांश कुंडली में चँद्र से पंचम स्थान में जो ग्रह हो, एवं उसके साथ जीतने ग्रहों का संबंध हो, उतनी संतान होगी।

संतान सुख कैसे होगा :-

संतान प्राप्ति के लिए भी हमें पंचम स्थान का ही विश्लेषण करना होगा। पंचम स्थान का मालिक किसके साथ बैठा है, यह भी जानना होगा। पंचम स्थान में गुरु शनि को छोड़कर पंचम स्थान का अधिपति पाँचवें हो, तो संतान संबंधित शुभ फल देता है। यदि पंचम स्थान का स्वामी आठवें, बारहवें हो, तो संतान सुख नहीं होता। यदि हो भी तो सुख मिलता नहीं या तो संतान नष्ट होती है, या अलग हो जाती है। यदि पंचम स्थान का अधिपति सप्तम, नवम, ग्यारहवें, लग्नस्थ, द्वितीय में हो, तो संतान से संबंधित सुख शुभ फल देता है। द्वितीय स्थान के स्वामी ग्रह पंचम में हो, तो संतान सुख उत्तम होकर लक्ष्मीपति बनता है।

पंचम स्थान का अधिपति छठे में हो, तो दत्तक पुत्र लेने का योग बनता है। पंचम स्थान में मीन राशि का गुरु कम संतान देता है। पंचम स्थान में धनु राशि का गुरु हो, तो संतान तो होगी, लेकिन स्वास्थ्य कमजोर रहेगा। गुरु का संबंध पंचम स्थान पर संतान योग में बाधा देता है। सिंह, कन्या राशि का गुरु हो तो संतान नहीं होती। इस प्रकार तुला राशि का शुक्र पंचम भाव में अशुभ ग्रह के साथ (राहु, शनि, केतु) के साथ हो, तो संतान नहीं होती।

पंचम स्थान में मेष, सिंह, वृश्चिक राशि हो, और उस पर शनि की दृष्टि हो, तो पुत्र संतान सुख नहीं होता। पंचम स्थान पर पड़ा राहु गर्भपात कराता है। यदि पंचम भाव में गुरु के साथ राहु हो, तो चांडाल योग बनता है, और संतान में बाधा डालता है, यदि यह योग स्त्री की कुंडली में हो तो। यदि यह योग पुरुष कुंडली में हो तो संतान नहीं होती। नीच का राहु भी संतान नहीं देता। राहु, मंगल, पंचम हो तो एक संतान होती है। पंचम स्थान में पड़ा चँद्र, शनि, राहु भी संतान बाधक होता है। यदि योग लग्न में न हों तो चँद्र कुंडली देखना चाहिए। यदि चँद्र कुंडली में यह योग बने तो उपरोक्त फल जानें।

पंचम स्थान पर राहु या केतु हो, तो पितृदोष, दैविक दोष, जन्म दोष होने से भी संतान नहीं होती। यदि पंचम भाव पर पितृदोष या पुत्रदोष बनता हो, तो उस दोष की शांति करवाने के बाद संतान प्राप्ति संभव है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य संतान पक्ष में चिंता देता है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य ऑपरेशन द्वारा संतान देता है। पंचम स्थान पर सूर्य मंगल की युति हो, और शनि की दृष्टि पड़ रही हो, तो संतान की शस्त्र से मृत्यु होती है।

पंचम भाव और गुरु :-

गुरु जब मीन राशी में पंचम में हो, तो अल्प संतति देते है। धनु में हो, तो बहुत प्रयास के बाद देते है। कर्क और कुम्भ राशी में होने पर गुरु संतति नहीं देते ऐसे ही फल पंचम भाव में कर्क, मीन, कुम्भ या धनु राशी में होने पर संतति सुख नहीं देते। लेकिन बाकी पंचमेश और युति और दृष्टि सम्बन्ध भी देख लेना चाहिए, खाली एक गुरु के उपर कुछ भी नहीं बोलना चाहिए।

एक बात हमेशा ध्यान रखें, की गुरु सिंह राशी में निर्बल हो जाते हैं, जबकि गुरु और सूर्य परम मित्र हैं, इसके पीछे एक तर्क तो ये है की गुरु मंत्री है और सूर्य रजा, अब राजा के घर में गुरु कैसे स्थान हानि करेंगे, और एक तर्क ये है, की गुरु अपनी उच्च राशी कर्क से निकल कर नीच राशी गत होता है, इसी कारण गुरु पंचम में सिंह राशी में स्थान हानि नहीं करते। वही कुम्भ राशी राजा के गृह से सबसे अधिक दूर होने से वह वे अपने स्थान भ्रष्ट करने के स्वभाव का पूर्ण प्रभाव दिखाते है।

सिर्फ गुरु के इन परिस्थतियो के आधार पर ही फलित नहीं करना चाहिए, कहा जाता है की पंचम का गुरु यदि मंगल और सूर्य से दृष्ट है, तो भी स्थान हानि नहीं कर पाता, अगर कर्क का गुरु चंद्रमा से दृष्ट या फिर कुम्भ का गुरु शनि से दृष्ट है तो भी गुरु के योग विफल हो जायेंगे। पंचम भाव पर पंचमेश की दृष्टि भी उस भाव को बल देगी, अतः इन परिस्थितियों में योग विफल हो जाएगा, ये तो हम सब जानते ही हैं की पूर्ण कुडंली विश्लेषण के बाद ही पूर्ण फलादेश किया जा सकता है, यहाँ तो हम सिर्फ गुरु के पंचम में होने की स्थितियों पर चर्चा कर रहे हैं।

संतान प्राप्ति का समय :-
संतान प्राप्ति के समय को जानने के लिए पंचम भाव, पंचमेश अर्थात पंचम भाव का स्वामी, पंचम कारक गुरु, पंचमेश, पंचम भाव में स्थित ग्रह और पंचम भाव, पंचमेश पर दृष्टियों पर ध्यान देना चाहिए। जातक का विवाह हो चुका हो, और संतान अभी तक नहीं हुई हो, संतान का समय निकाला जा सकता है। पंचम भाव जिन शुभ ग्रहों से प्रभावित हो उन ग्रहों की दशा-अंतर्दशा और गोचर के शुभ रहते संतान की प्राप्ति होती है। गोचर में जब ग्रह पंचम भाव पर या पंचमेश पर या पंचम भाव में बैठे ग्रहों के भावों पर गोचर करता है, तब संतान सुख की प्राप्ति का समय होता है। यदि गुरु गोचरवश पंचम, एकादश, नवम या लग्न में भ्रमण करे तो भी संतान लाभ की संभावना होती है। जब गोचरवश लग्नेश, पंचमेश तथा सप्तमेश एक ही राशि में भ्रमण करे, तो संतान लाभ होता है।

———————————————————————-

अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

Astrological products and astrology course के लिए विजिट कीजिए :- www.shukracharya.com

वास्तु शास्त्र

वास्तु शास्त्र से करें गृह निर्माण :-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

प्रत्येक परिवार की पहली आवश्यकता होती है- अपना घर। मध्यम वर्ग इस सपने को संजोने के लिए जीवन भर संघर्ष करता है। जिस समय यह सपना सच होने जा रहा हो, तो हमें वह घर पूर्ण रूप से समृद्धि दें, इसका ध्यान रखना चाहिए। अत: वास्तु के अनुसार गृह निर्माण करवाना चाहिए।

किसी भी प्लॉट या भूमि पर गृह निर्माण करते समय यह ध्यान रखें कि भूमि (प्लॉट) के अग्नि कोण में खाना बनाने का स्थान (रसोई घर), दक्षिण-पश्चिम में शयन गृह, अस्त्र-शस्त्रागार, पश्चिम में भोजन करने का स्थान, वायव्य कोण में मेहमान का कमरा, ईशान में देवालय एवं उत्तर में भारी वस्तुयें रखने का स्थान होना चाहिए, तथा उत्तर-पूर्व के मध्य बाथरूम होना अच्छा है।

जल स्थान एवं वास्तुशास्त्र :-

मकान में पानी का स्थान सभी मतों से ईशान से प्राप्त करने को कहा जाता है, और घर के पानी को उत्तर दिशा में घर के पानी को निकालने के लिये कहा जाता है। लेकिन जिनके घर पश्चिम दिशा की तरफ़ अपनी फ़ेसिंग किये होते हैं, और पानी आने का मुख्य स्तोत्र या तो वायव्य से होता है, या फ़िर दक्षिण पश्चिम से होता है, उन घरों के लिये पानी को ईशान से कैसे प्राप्त किया जा सकता है? इसके लिये वास्तुशास्त्री अपनी अपनी राय के अनुसार कहते हैं, कि पानी को पहले ईशान में ले जायें।
मेरा मानना है कि घर के अन्दर पानी का इन्टरेन्स कहीं से भी हो, लेकिन पानी को ईशान में ले जाने से पानी की घर के अन्दर प्रवेश की क्रिया से तो वास्तुदोष दूर नही किया जा सकता है, लेकिन ईशान में रख कर उसका ख़राब इफ़ेक्ट तो हम कम कर सकते ही हैं।

पानी के प्रवेश के लिये अगर घर का फ़ेस साउथ में है, तो और भी जटिल समस्या पैदा हो जाती है, नैऋत्य दिशा से आता है तो कीटाणुओं और रसायनिक जांच से उसमे किसी न किसी प्रकार की गंदगी जरूर मिलेगी, और अगर वह अग्नि दिशा से प्रवेश करता है, तो घर के अन्दर पानी की कमी ही रहेगी, और जितना पानी घर के अन्दर प्रवेश करेगा, उससे कहीं अधिक महिलाओं सम्बन्धी बीमारियां मिलेंगी।

पानी को उत्तर दिशा वाले मकानों के अन्दर ईशान और वायव्य से घर के अन्दर प्रवेश दिया जा सकता है, लेकिन मकान के बनाते समय अगर पानी को ईशान में नैऋत्य से ऊंचाई से घर के अन्दर प्रवेश करवा दिया गया तो भी पानी अपनी वही स्थिति रखेगा जो नैऋत्य से पानी को घर के अन्दर लाने से माना जा सकता है।

पानी को ईशान से लाते समय जमीनी सतह से नीचे लाकर एक टंकी पानी की अण्डर ग्राउंड बनवानी चाहिए, फ़िर पानी को घर के प्रयोग के लिये लाना चाहिये। बरसात के पानी को निकालने के लिये जहां तक हो उत्तर दिशा से ही निकालें, फ़िर देखें घर के अन्दर धन की आवक में कितना इजाफ़ा होता है, लेकिन उत्तर से पानी निकालने के बाद आपका मनमुटाव सामने वाले पडौसी से हो सकता है, इसके लिये उससे भी मधुर सम्बन्ध बनाने की कोशिश करते रहे।

वास्तुशास्त्र में भवन का निर्माण करते समय जल का भंडारण किस दिशा में हो यह एक महत्वपूर्ण विषय है शास्त्रों के अनुसार भवन में जल का स्थान ईशान कोण (नॉर्थ ईस्ट) में होना चाहिए परन्तु उतर दिशा, पूर्व दिशा और पश्चिम दिशा में भी जल का स्थान हो सकता है, परन्तु आग्नेय कोण में यदि जल का स्थान होगा तो पुत्र नाश, शत्रु भय और बाधा का सामना होता है, दक्षिण पश्चिम दिशा में जल का स्थान पुत्र की हानि,दक्षिण दिशा में पत्नी की हानि, वायव्य दिशा में शत्रु पीड़ा और घर का मध्य में धन का नाश होता है।

वास्तु शास्त्र में भूखंड के या भवन के दक्षिण और पश्चिम दिशा की और कोई नदी या नाला या कोई नहर भवन या भूखंड के समानंतर नहीं होनी चाहिए परन्तु यदि जल का बहाव पश्चिम से पूर्व की और हो या फिर दक्षिण से उतर की और तो उत्तम होता है, भवन में जल का भंडारण आग्नेय, दक्षिण पश्चिम, वायव्य कोण, दक्षिण दिशा में ना हो, जल भंडारण की सबसे उत्तम दिशा पूर्व, उत्तर या ईशान कोण है।

अग्नि कोण के गेट वाले घर :-

अग्नि कोण के गेट वाले घरों में और उत्तर की तरफ़ सीढियों वाले मकान कभी भी कर्जे से मुक्त नही हो पाते हैं। जिन घरों के दरवाजे नैऋत्य में होते हैं, और उनके नैऋत्य में ही अगर पानी के टेंक अन्डरग्राउंड बना दिये गये हैं, तो उस मकान में रहने वाले जीवन भर कोर्ट केस और सरकारी कर्जों से मुक्त नही हो पाते हैं। अक्सर इस दिशा के दरवाजे वालों के दो ही पुत्र होते हैं, जिनमें बडे पुत्र के कारण पूरे घर की सम्पत्ति का विनाश हो जाता है,और अंत में वह भी एक पुत्री के होने के बाद अपनी लीला किसी तामसी कारण से समाप्त कर लेता है।

ईशान दिशा :-

यदि ईशान क्षेत्र की उत्तरी या पूर्वी दीवार कटी हो, तो उस कटे हुए भाग पर एक बड़ा शीशा लगाएं। इससे भवन का ईशान क्षेत्र प्रतीकात्मक रूप से बढ़ जाता है। यदि ईशान कटा हो, अथवा किसी अन्य कोण की दिशा बढ़ी हो, तो किसी साधु पुरुष अथवा अपने गुरु या बृहस्पति ग्रह या फिर ब्रह्मा जी का कोई चित्र अथवा मूर्ति या कोई अन्य प्रतीक चिह्न ईशान में रखें। गुरु की सेवा करना सर्वोत्तम उपाय है। बृहस्पति ईशान के स्वामी और देवताओं के गुरु हैं। कटे ईशान के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए साधु पुरुषों को बेसन की बनी बर्फी या लड्डुओं का प्रसाद बांटना चाहिए। यह क्षेत्र जलकुंड, कुआं अथवा पेयजल के किसी अन्य स्रोत हेतु सर्वोत्तम स्थान है। यदि यहां जल हो, तो चीनी मिट्टी के एक पात्र में जल और तुलसीदल या फिर गुलदस्ता अथवा एक पात्र में फूलों की पंखुड़ियां और जल रखें। शुभ फल की प्राप्ति के लिए इस जल और फूलों को नित्य प्रति बदलते रहें। अपने शयन कक्ष की ईशान दिशा की दीवार पर भोजन की तलाश में उड़ते शुभ पक्षियों का एक सुंदर चित्र लगाएं। कमाने हेतु बाहर निकलने से हिचकने वाले लोगों पर इसका चमत्कारी प्रभाव होता है। यह अकर्मण्य लोगों में नवीन उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है। बर्फ से ढके कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ योगी की मुद्रा में बैठे महादेव शिव का ऐसा फोटो, चित्र अथवा मूर्ति स्थापित करें, जिसमें उनके भाल पर चंद्रमा हो और लंबी जटाओं से गंगा जी निकल रही हों।
ईशान में विधि पूर्वक बृहस्पति यंत्र की स्थापना करें।

पूर्व दिशा में दोष /बचाव के उपाय :-

* यदि भवन में पूर्व दिशा का स्थान ऊँचा हो, तो व्यक्ति का सारा जीवन आर्थिक अभावों, परेशानियों में ही व्यतीत होता रहेगा, और उसकी सन्तान अस्वस्थ, कमजोर स्मरणशक्ति वाली, पढाई-लिखाई में जी चुराने तथा पेट और यकृत के रोगों से पीडित रहेगी।

* यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान न हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर हो, तो परिवार के मुखिया को आँखों की बीमारी, स्नायु अथवा ह्रदय रोग की स्मस्या का सामना करना पडता है।

* घर के पूर्वी भाग में कूडा-कर्कट, गन्दगी एवं पत्थर, मिट्टी इत्यादि के ढेर हों, तो गृहस्वामिनी में गर्भहानि का सामना करना पडता है।

* भवन के पश्चिम में नीचा या रिक्त स्थान हो, तो गृहस्वामी यकृत, गले, गाल ब्लैडर इत्यादि किसी बीमारी से परिवार को मंझधार में ही छोडकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

* यदि पूर्व की दिवार पश्चिम दिशा की दिवार से अधिक ऊँची हो, तो संतान हानि का सामना करना पडता है।

* अगर पूर्व दिशा में शौचालय का निर्माण किया जाए, तो घर की बहू-बेटियाँ अवश्य अस्वस्थ रहेंगीं।

बचाव के उपाय:-

* पूर्व दिशा में पानी, पानी की टंकी, नल, हैंडापम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा।

* पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है, जो कि कालपुरूष के मुख का प्रतीक है, इसके लिए घर के मुखिया को चांदी पर बना ‘सूर्य यन्त्र’ हमेशा धारण करना चाहिए, और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज (झंडा) लगायें।

* पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें, धन और वंश की वृद्धि होगी, तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढेगी।

• दूध, दही, घी, सिरका, अचार का स्थान रसोई के बगल में होना चाहिए। श्रृंगार एवं औषधि सामग्री शयनकक्ष के बगल में होना चाहिए। विद्यार्थियों के पढ़ने का कमरा देवालय के बगल में होना चाहिए।

• घर के आस-पास बड़, पीपल, इमली, कैथ, नींबू, कांटे वाले एवं दूध वाले वृक्ष नहीं होना चाहिए। इस वृक्षों के घर के आस-पास होने से धन की हानि होती है।

• कुआं एवं जल का स्थान मुख्य द्वार से पूर्व ईशान, उत्तर अथवा पश्चिम में होने से धन प्राप्त होता है। सौभाग्य में बढ़ोतरी होती है।

• अग्निकोण में संतान हानि, दक्षिण में गृहिणी का नाश, नैऋत्य कोण में गृह मालिक का नाश एवं वायु कोण में भय, चिंता बनी रहती है।

• भवन में स्तंभ लगाने की आवश्यकता हो, तो स्तंभ सम संख्या में लगवाना चाहिए। इनकी संख्या यदि विषम हो, तो अशुभ फल देते है।

• पूर्ण रूप से उपरोक्त विधि को ध्यान में रखते हुए भवन निर्माण करने से घर में सुख-समृद्धि, यश, वैभव एवं शांति प्राप्त होती है।

——————————————————————————–

अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

Astrological products and astrology course के लिए विजिट कीजिए :- www.shukracharya.com

मानसिक स्वास्थ्य

चिकित्सा ज्योतिष में मानसिक बीमारियों का अध्ययन:-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

आज के इस लेख में हम मानसिक स्वास्थ्य चर्चा करेंगे, मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाने के बहुत से कारण हो सकते हैं, परंतु इन कारणों का ज्योतिषीय आधार क्या है? इसकी चर्चा इस लेख के माध्यम से की जाएगी।

चिकित्सा ज्योतिष में शरीर में होने वाली सभी बीमारियों के योग बतायेगा गये हैं, और कुछ ग्रहों के परस्पर संबंध बनते हैं जिनके आधार पर यह पता चलता है कि जातक को किस तरह के रोग हो सकते हैं? लेकिन इसका निर्धारण किसी अनुभवी ज्योतिषी से ही कराना चाहिए अन्यथा बेकार का तनाव उत्पन्न हो सकता है, आइए कुंडली के उन योगों का अध्ययन करें जिनके आधार पर मानसिक रोगों का पता चलता है:-

मानसिक बीमारी में:- चंद्रमा, बुध, चतुर्थ भाव व पंचम भाव का आंकलन किया जाता है, चंद्रमा मन है, बुध से बुद्धि देखी जाती है और चतुर्थ भाव भी मन है, तथा पंचम भाव से बुद्धि देखी जाती है, जब व्यक्ति भावुकता में बहकर मानसिक संतुलन खोता है, तब उसमें पंचम भाव व चंद्रमा की भूमिका अहम मानी जाती है, सेजोफ्रेनिया बीमारी में चतुर्थ भाव की भूमिका मुख्य मानी जाती है, यह देखने के लिए अनुभवी ज्योतिषी शनि व चंद्रमा की युति भी मानसिक शांति के लिए शुभ नहीं मानते हैं, मानसिक परेशानी में चंद्रमा पीड़ित होना चाहिए।

जन्म कुंडली में चंद्रमा अगर राहु के साथ है, तब व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने की संभावना बनी रहती है क्योकि राहु मन को भ्रमित रखता है, और चंद्रमा मन है, मन के घोड़े बहुत ज्यादा दौड़ते हैं, व्यक्ति बहुत ज्यादा हवाई किले बनाता है,
यदि जन्म कुंडली में बुध, केतु और चतुर्थ भाव का संबंध बन रहा है, और यह तीनों अत्यधिक पीड़ित हैं, तब व्यक्ति में अत्यधिक जिद्दीपन हो सकती है,और वह सेजोफ्रेनिया का शिकार हो सकता है, इसके लिए बहुत से लोगों ने बुध व चतुर्थ भाव पर अधिक जोर दिया है।

जन्म कुंडली में गुरु लग्न में स्थित हो और मंगल सप्तम भाव में स्थित हो या मंगल लग्न में और सप्तम में गुरु स्थित हो तब मानसिक आघात लगने की संभावना बनती है।

जन्म कुंडली में शनि लग्न में और मंगल पंचम भाव या सप्तम भाव या नवम भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

कृष्ण पक्ष का बलहीन चंद्रमा हो और वह शनि के साथ 12वें भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग की संभावना बनती है।

शनि व चंद्र की युति में व्यक्ति मानसिक तनाव ज्यादा रखता है,
जन्म कुंडली में शनि लग्न में स्थित हो, सूर्य 12वें भाव में हो, मंगल व चंद्रमा त्रिकोण भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

जन्म कुंडली में मांदी सप्तम भाव में स्थित हो, और अशुभ ग्रह से पीड़ित हो रही हो, राहु व चंद्रमा लग्न में स्थित हो, और अशुभ ग्रह त्रिकोण में स्थित हों, तब भी मानसिक रोग की संभावना बनती है।

मंगल चतुर्थ भाव में शनि से दृष्ट हो या शनि चतुर्थ भाव में राहु/केतु अक्ष पर स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

जन्म कुंडली में शनि व मंगल की युति छठे भाव या आठवें भाव में हो रही हो, जन्म कुंडली में बुध पाप ग्रह के साथ तीसरे भाव में हो, या छठे भाव में हो, या आठवें भाव में हो, या बारहवें भाव में स्थित हो, तब भी मानसिक शांति नहीं मिलती, मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

यदि चंद्रमा की युति केतु व शनि के साथ हो रही हो तब यह अत्यधिक अशुभ माना गया है, और अगर यह अंशात्मक रुप से नजदीक हैं, तब मानसिक रोग होने की संभावना अधिक बनती है।

जन्म कुंडली में शनि और मंगल दोनो ही चंद्रमा या बुध से केन्द्र में स्थित हों तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

मिरगी होने के जन्म कुंडली में लक्षण :-

इसके लिए चंद्र तथा बुध की स्थिति मुख्य रुप से देखी जाती है, साथ ही अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जाती है, शनि व मंगल जन्म कुंडली में छठे या आठवें भाव में स्थित हो तब व्यक्ति को मिरगी संबंधित बीमारी का सामना करना पड़ सकता है।

कुंडली में शनि व चंद्रमा की युति हो, और यह दोनो मंगल से दृष्ट हों, जन्म कुंडली में राहु व चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हों, मानसिक रुप से कमजोर बच्चे अथवा मंदबुद्धि बच्चे जन्म के समय लग्न अशुभ प्रभाव में हो विशेष रुप से शनि का संबंध बन रहा हो, यह संबंध युति, दृष्टि व स्थिति किसी भी रुप से बन सकता है।

शनि पंचम से लग्नेश को देख रहा हो, तब व्यक्ति जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

जन्म के समय बच्चे की कुण्डली में शनि व राहु पंचम भाव में स्थित हो, बुध बारहवें भाव में स्थित हो, और पंचमेश पीड़ित अवस्था में हो, तब बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

पंचम भाव, पंचमेश, चंद्रमा व बुध सभी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तब भी बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

जन्म के समय चंद्रमा लग्न में स्थित हो और शनि व मंगल से दृष्ट हो तब भी व्यक्ति मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

पंचम भाव का राहु भी व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट करने का काम करता है, बुद्धि अच्छी नहीं रहती है।

——————————————————————————–

अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

Astrological products and astrology course के लिए विजिट कीजिए :- www.shukracharya.com

आत्महत्या का योग ( हस्तरेखा से)

हस्तरेखाओं के द्वारा हम जातक के जीवन में होने वाली प्रत्येक घटना Suicide का भी पूर्वानुमान लगा सकते हैं।

Dr.R.B.Dhawan (Top best astrologer in delhi)

मनुष्य के हाथ की प्रत्येक रेखा अपना विशेष महत्व रखती है, जैसे जीवन रेखा, भाग्य रेखा, मस्तिष्क रेखा, यश रेखा, स्वास्थ्य रेखा आदि। आगे की पंक्तियों में हम इन हस्तरेखाओं पर पाये जाने वाले चिन्हों और रेखाओं का विवरण लिखेंगे, जो चिन्ह यदि जातकों के हाथ में पाये जायें, तो वे मनुष्य अपनी प्रकृति के कारण अपने व्यक्तिगत चरित्र को प्रदर्शित करता है। शायद ही कभी ऐसा हो कि कोई चिन्ह या विशेषता हाथ पर किसी व्यक्ति की प्रकृति को नष्ट या धुंधला कर देती हो।

एक खतरनाक चिन्ह व्यक्ति की खतरनाक प्रकृति का पता इस तरह बता देता है। जिस प्रकार घड़ी समय की सूचना देती है, और घड़ी बनाने के लिये जैसे कई प्रकार के पुर्जों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार किसी व्यक्ति को अपराधी या सन्त बनाने के लिये भी हस्त विशिष्टताओं की आवश्यकता होेती है। जिन हाथों में आत्महत्या Suicide करने की प्रवृति होती है वे हाथ प्रायः लम्बे होते हैं। उस पर मस्तिष्क रेखा ढलवा होती है, तथा चन्द्र पर्वत अपने मूल स्थान पर उन्नत एवं विकसित होता है। वहाँ मस्तिष्क रेखा भी जीवन रेखा के साथ जुड़ी हुई होती है। जिसके कारण व्यक्ति की संवेदनशीलता में और अधिक वृद्धि हो जाती। ऐसे व्यक्ति आत्महत्या Suicide पर उतारू नहीं हो सकते, लेकिन अत्याधिक संवेदनशीलता एवं कल्पनाशीलता के कारण किसी कष्ट, दुख या कलंक का प्रभाव उन पर हजारों गुना अधिक होता है। तब शायद वह आत्महत्या करके अपने को शहीद बनाना चाहें। उन्नत शनि पर्वत क्षेत्र भी इस प्रकार की सूचना देता है, तब भी व्यक्ति संवेदनशील होता है, और मानसिक स्थिति से तंग आकर यह निश्चिय कर सकता है कि जीवन जीने योग्य नहीं है। ऐेसे में थोडी सी उकसाहट अथवा निराशा के कारण वह आत्महत्या Suicide कर सकता है।

किसी नुकीले या अधिक नुकीले हाथ में ढलवां मस्तिष्क रेखा का भी यही परिणाम होता है। लेकिन ऐसा व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप क्षणिक आवेश में आकर आत्महत्या Suicide कर सकता है, तथा कोई गहरा आघात अथवा मुसीबत ऐसे व्यक्ति को उत्तेजित करने के लिये काफी होती है। ऐसा व्यक्ति आत्महत्या करने के लिये पहले कुछ सोचता विचारता नहीं है। इसके विपरीत मस्तिष्क रेखा के अस्वाभाविक रूप से झुके हुये न होने पर भी व्यक्ति आत्महत्या Suicide कर लेता है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा जीवन रेखा के साथ जुड़ी होनी चाहिये

बृहस्पति (गुरू) पर्वत क्षेत्र धंसा हुआ तथा शनि पर्वत क्षेत्र पूर्ण उन्नत होना चाहिये। ऐसा व्यक्ति जीवन के संघर्ष में निराश एवं निरूत्साहित हो जाता है, और उसकी सहनशक्ति जबाब दे जाती है, और तब वह आत्महत्या Suicide कर बैठता है। लेकिन ऐसा वह सहसा नहीं करता, बल्कि परिस्थितियों पर पूर्ण रूप से विचार करने के बाद जब उसे आशा की कोई भी किरण दिखाई नहीं देती तब वह आत्महत्या Suicide कर लेता है।

आत्महत्या Suicide की प्रवृत्ति वालों को हत्या के विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है, तथा हाथ को देखकर अपराध करने की असाधारण प्रवृत्ति का पता लगाया जा सकता है। हाथ की बनावट देखकर यह भी पता लगाया जा सकता है कि अपराध का क्या रूप होगा। कुछ लोगों की अपराध करने की सहज प्रवृत्ति होती है, और इस पर संदेह नहीं किया जा सकता, पर कुछ व्यक्ति जन्मजात अपराधी भी होते हैं, जैसे जन्मजात संत। अपराधी प्रवृत्तियों का विकसित होना उस वातावरण और परिस्थिति पर निर्भर करता है, जिनमें व्यक्ति रहता है। आपने प्रायः देखा होगा कि कुछ बच्चों में हर वस्तु को नष्ट करने की प्रवृत्ति होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनमें बुद्धि की कमी होती है, बल्कि यह है कि नष्ट करने की प्रवृत्ति उनमें जन्मजात होती है। ऐसी प्रवृत्तियों को सुधारा जा सकता है, लेकिन कुछ लोगों में इस प्रकार की प्रवृत्ति इतनी अधिक होती है कि, यदि वे दूषित वातावरण अथवा परिस्थितियों में रहने लगें तो दुर्बल मानसिक शक्ति के कारण अथवा आवेश में आकर या प्रलोभन के शिकार होकर अपराधी बन जाते हैं। जहाँ तक हाथ का सम्बंध है, हत्या के अनुसार उसे तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

1. वे हत्या जो आवेश में आने पर क्रोधित होने पर या प्रतिशोध की भावना से की जा सकती है।

2. धन सम्पत्ति अथवा अन्य किसी लाभ के लिये की गई हत्या। ऐसी हत्या व्यक्ति द्वारा अपनी लालची प्रवृत्ति की संतुष्टी के लिये की जा सकती है।

3. जब हत्या करने वाला अपने शिकार के साथ भी मित्रतापूर्ण सम्बंध बनाये रखता है, ऐसी हत्या करने वालों को दूसरों को यातनायें देकर प्रसन्नता होती है, तथा काम की अपेक्षा हत्यारे की पैशाचिक वृत्तियों का पोषण होता है।

पहली श्रेणी साधारण होती है। व्यक्ति केवल परिस्थितिवश हत्यारा बन जाता है, ऐसे व्यक्ति सज्जन एवं भले मानस होते हैं, लेकिन किसी विशेष परिस्थिति में क्रोध से पागल होकर हत्या कर बैठते हैं। होश आने पर जब उन्हें अपने इस हिंसक कृत्य का आभास होता है, तो वे पश्चाताप के कारण टूटकर बिखर जाते हैं। इस प्रकार हत्या करने वाले व्यक्तियों के हाथ में अनियंत्रित क्रोध एवं पाश्विक उत्तेजना के अतिरिक्त दूसरा कोई अशुभ लक्षण नहीं होता है। इस प्रकार के व्यक्तियों के हाथ अविकसित अथवा वैसे होते हैं, ऐसे हाथों में मस्तिष्क रेखा छोटी-मोटी व लाल होती है, तथा नाखून छोटे व लाल व हाथ मारी व सख्त होते हैं। ऐसे हाथों का अंगूठा अति विशिष्ट यानी काफी नीचा छोटा अपने दूसरे पर्व पर मोटा व पहले पर्व पर गदामुखी होता है, ऐसा अंगूठा अत्यंत छोटा चैड़ा वर्गाकार व चपटा होता है, ऐसे व्यक्तियों के हाथों में शुक्र पर्वत क्षेत्र भी असाधारण रूप से उन्नत व विस्तृत होता है, उनमें काम वासना की अधिकता होती है, जिसके कारण वे इस प्रकार के कृत्य कर बैठते हैं।

दूसरी श्रेणी में कुछ भी असाधारण नहीं होता। ऐसे व्यक्तियों के हाथों की मस्तिष्क रेखा में ही विशेषता दिखाई पड़ती है, ऐसे हाथों पर मस्तिष्क रेखा गहरी बुध पर्वत क्षेत्र की ओर ऊपर को उठती हुई अथवा बुध पर्वत क्षेत्र पर पहुँचने से पहले दाँये हाथ में अपने स्थान से हटी हुई होगी। जैसे-जैसे व्यक्ति की प्रवृत्तियों में वृद्धि होती जाती है, वे हृदय रेखा पर अधिकार जमा लेती है। ऐसे हाथ प्रायः सख्त लेकिन अंगूठा असाधारण रूप से मोटा नहीं परंतु सख्त व अन्दर को सिकुड़ा हुआ होता है। अंगूठे की ऐसी बनावट व्यक्ति में लालची प्रवृत्ति की द्योतक होती है, ऐसे व्यक्ति अपने लाभ के लिये अपने अन्तर ज्ञान को भी खत्म कर देते हैं।

तीसरी श्रेणी सर्वाधिक दिलचस्प व सबसे अधिक भयावह भी हो सकती है, ऐसे हाथ में कोई भी असाधारण चिन्ह दिखाई नहीं देता लेकिन सभी विशेषताओं का पूर्ण निरीक्षण करने के बाद व्यक्ति की प्रवृत्ति उसके स्वभाव और छल कपट को देखा जा सकता है, ऐसे व्यक्ति का हाथ पतला लम्बा व सख्त होता है। अंगुलियाँ थोडी-थोड़ी भीतर को मुड़ी हुई तथा अंगूठा लम्बा और उसके दोनों पर्व पूर्ण विकसित होते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति में दृढ़ इच्छा शक्ति योजना बनाने व उसके क्रियान्वित करने की क्षमता होती है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा अपने स्थान पर भी हो सकती है, तथा उससे कुछ हटकर हाथ को पार करती हुई अपने सामान्य स्थान से कुछ ऊपर को भी स्थित होती है। यह व्यक्ति की कपटपूर्ण भावनाओं को व्यक्त करती है। ऐसी मस्तिष्क रेखा लम्बी व महान होगी तथा हाथ में शुक्र पर्वत क्षेत्र या तो धंसा हुआ होगा या बहुत उन्नत होगा।

यदि शुक्र पर्वत हस्त क्षेत्र में धंसा हुआ हो, तो व्यक्ति केवल अपराध करने के लिये ही अपराध करता है, लेकिन यदि शुक्र पर्वत क्षेत्र अत्याधिक उन्नत हो, तो हत्या या अपराध किसी पाश्विक वासना पूर्ति के लिये किया जाता है। अपराध जगत के दक्ष व्यक्तियों के हाथ ऐसे ही होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिये हत्या करना एक कला होती है, जिसे पूरा करने हेतु वह एक-एक विवरण का सूक्ष्म अध्ययन करते हैं। ऐसे व्यक्ति कभी भी हिंसापूर्ण ढंग से हत्या नहीं करते, क्योंकि इसे वे अश्लील समझते हैं। ऐसे व्यक्ति विष का सहारा लेते हैं, व उसका प्रयोग इतनी कुशलता के साथ करते हैं, कि हत्या नहीं बल्कि स्वाभाविक कारणों से हुई मृत्यु जान पड़ती है।

मेरे और लेख देखें :- rbdhawan@wordpress.com, shukracharya.com, astroguruji.in, vaidhraj.com, aapkabhavishya.in

प्रसिद्धि के योग

जीवन में प्रसिद्धि Fame पाने वाले मनुष्य भाग्यशाली होते हैं, क्योंकि प्रसिद्धि पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों के कारण ही इस जन्म में प्राप्त होती है, और इस जन्म में प्रसिद्धि मिलेगी या नहीं, मिलेगी तो किस स्तर तक मिलेगी? इस की सूचना जन्म कुंडली में ग्रह स्थिति से मिलती है। इस लेख के द्वारा प्रसिद्धि fame के ज्योतिषीय योगों की चर्चा की जा रही है :-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

वेदों को संसार का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना गया है। ज्योतिष शास्त्र भी वेद का ही एक अंग है। इसे सम्पूर्ण शास्त्र भी माना जाता है। इसलिये इसका प्रमाणिक ज्ञान प्राप्त कर उसे व्यावहारिक अर्थात प्रायोगिक तौर पर परखकर जगत का कल्याण करना प्रत्येक के वश की बात नहीं है। ज्योतिष शास्त्र द्वारा तीनों काल की जानकारी प्राप्त की जा सकती है, जबकि अन्य शास्त्र वर्तमान तक ही सीमित हैं। इसीलिये ज्योतिष रूपी महासागर में गोता लगाकर कल्याण करने हेतु विशेष बुद्धि की आवश्यकता रहती है। इसी के कारण जातक ज्योतिष के नियमों को सुनकर समझकर परिस्थितियों के अनुसार सामंजस्य बिठाकर विकल्प ढूँढना एवं अन्तिम सत्य का निर्माण करना संभव हो पाता है। प्राचीन काल में ज्योतिष ज्ञान एक वर्ग विशेष तक ही सीमित था लेकिन वर्तमान में ज्योतिष वर्ग विशेष तक सीमित न रहकर प्रत्येक वर्ग के लोग इसे सीख रहे हैं। विभिन्न संस्थायें भी ज्योतिष विषय के पाठ्यक्रम चलाकर डिप्लोमा एवं डिग्री स्तर के कोर्स करवा रही हैं। इन कोर्सों को करने के पश्चात ज्योतिष का ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन इस ज्ञान के द्वारा उसे धन, मान एवं सम्मान की प्राप्ति भी हो यह आवश्यक नहीं है।

वर्तमान में कम्प्यूटर के चलन के कारण वास्तविक ज्योतिषीय ज्ञाता पिछड़ रहे हैं। ये तथाकथित कम्प्यूटर ज्योतिषी कम्प्यूटर की भाषा में ही फलित बता देते है लेकिन फलित घटित होता नहीं है। तब ज्योतिष से मोह भंग होना भी स्वाभाविक है। ज्योतिषीय गणना हेतु कम्प्यूटर का प्रयोग सटीक है। लेकिन प्रयोग किये जाने वाले साॅफ्टवेयर की शुद्ध गणना की परख भी आवश्यक है। फलित एवं उपाय हेतु भी ज्योतिषी की बुद्धि का समावेश अति आवश्यक है। केवल गणित के सहारे ही कोई ज्योतिषी प्रसिद्धि fame प्राप्त नहीं कर सकता। प्रसिद्धि हेतु गणितीय ज्ञान के साथ-साथ फलित एवं उपाय ज्योतिष का ज्ञान अति आवश्यक है। किसी एक के अभाव में उसको पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती है। इन सबके पश्चात जन्मांग में ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त होने के योगों का होना भी अति आवश्यक है। इन योगों की जन्मांग में उपस्थिति ही उसकी प्रसिद्धि fame का स्तर निर्धारित करती है। भविष्य कथन के साथ-साथ ज्योतिषी स्वर्णिम भविष्य हेतु उपाय भी बताता है। इस कारण इसे भाग्यवाद का समर्थक शास्त्र माना जाता है लेकिन यह पूर्णतया कर्मवाद से प्रेरित है। पूर्व जन्म के शुभ अशुभ कर्मों के परिणाम स्वरूप ही इस जन्म में किसी जातक को प्रसिद्ध प्राप्त हो सकती है। इसलिये ज्योतिष शास्त्र हमेशा शुभ कर्म करने को प्रेरित कर मनुष्य का जीवन सुधारता है। उपरोक्त गुणों के होने पर ही कोई जातक ज्योतिष से प्रसिद्धि fame प्राप्त कर सकता है। यवन के मतानुसार –

चन्द्रा र जीवासुर पूजिताङा नरं प्रकुर्वान्ति सदा धनस्थाः।
विद्या विनितं गणक प्रधानं मेधाविनं ब्राह्मण वल्लभं च।।

अर्थात द्वितीय भाव में चंद्र, मंगल, बृहस्पति व शुक्र की युति हो तो जातक विद्या व विनय से सम्पन्न ज्योतिष में प्रवीण बुद्धिमान एवं ब्राह्मणों का प्यारा होता है। उदाहरणार्थ एक उभरते हुये युवा ज्योतिषी की कुण्डली दी जा रही है जिसने सामान्य मार्गदर्शन से ज्योतिष विद्या आत्मसात कर ली है एवं प्रसिद्धि भी दिनों दिन बढ़ती जा रही है जो कुंडली में स्थित ग्रह योगों के कारण ही सम्भव है –

प्रस्तुत कुंडली में द्वितीय भाव में चंद्र मंगल, बृहस्पति व शुक्र की युति ज्योतिष में प्रवीणता लाकर प्रसिद्ध fame का योग बना रही है। दशम भाव पर शनि, बुध, राहु व बृहस्पति की दृष्टि ज्योतिष में प्रसिद्धि दिला रही है। बृहस्पति की नीच दृष्टि के कारण संघर्ष की स्थिति भी बना रही है। पंचमेश सूर्य तृतीय भाव में एवं तृतीयेश बुध चतुर्थ में होने के कारण इनकी लेखनी शक्ति अच्छी बन रही है। चतुर्थेश उच्च राशि में, द्वितीयेश स्वराशि, लग्नेश व अष्टमेश उच्च नवांश में होने के कारण परम्परा से प्राप्त ज्ञान के अलावा स्वयं के शोध कार्य से प्रसिद्धि का योग भी बन रहा है। जातक तत्व के अनुसार –

जीवे स्वांशे मृदुवंशे त्रिकालज्ञः। जीवे गोपुरे शुभदृष्टे त्रिकालज्ञः।।

अर्थात बृहस्पति अपने नवांश, मृदु षष्टयंश या गोपुरांश में होकर शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक प्रसिद्ध ज्योतिषी होता है। यदि इस योग के साथ त्रिकोणेश भी बलवान हो तो प्रसिद्धि स्थायी रहती है।

दशम भाव पर एवं सप्तम भाव पर शनि मंगल राहु बृहस्पति व बुध, शुक्र का प्रभाव होने पर जातक प्रसिद्ध ज्योतिषी होता है। ये ग्रह जितने बली एवं योगकारक होकर स्थित होंगे उतनी ही प्रसिद्धि अधिक होती है।

प्रस्तुत कुण्डली प्रसिद्ध ज्योतिषि बी.वी. रमण की है। इनकी कुंडली में दशम भाव पर मंगल, शनि, राहु व चंद्र का दृष्टि प्रभाव है जो इन्हें गणित ज्योतिष में कुशल बना रहा है। एवं पूर्वाभास की शक्ति दे रहा है। सप्तम भाव एवं दशम भाव पर मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र की स्थिति प्रभाव इन्हें फलित ज्योतिष एवं उपाय ज्योतिष में प्रवीणता दे रहा है। इसी योग के कारण इन्हें धन मान सम्मान एवं प्रसिद्धि भी प्राप्त हुई। लग्न, दशम एवं द्वितीय भाव पर भावेशों का दृष्टि प्रभाव इसे प्रबल बना रहा है।

कारकांश कुंडली में द्वितीय, तृतीय व पंचम भाव पर बली केतु व बृहस्पति का स्थिति दृष्टि प्रभाव ज्योतिष में प्रसिद्धि प्राप्त करवाता है। जन्मांग चक्र में धन भाव में चंद्र मंगल की युति हो व अष्टम में बुध स्थित हो या सप्तम में मंगल हो तो जातक धन मान सम्मान की प्राप्ति ज्योतिष के द्वारा प्राप्त होती है। धन भाव में चंद्र मंगल की युति जातक को धन की प्राप्ति करवाता है तो अष्टम भाव में बुध की स्थिति ज्योतिष में गुढ ज्ञान या शोध कार्य में सहायता देती है। लेकिन बुध की चंद्र पर दृष्टि के कारण ऐसे जातक प्रसिद्धि fame तो इस ज्ञान के कारण प्राप्त कर सकते हैं लेकिन धन की प्राप्ति कमजोर ही रहेगी। यदि धन भाव में चंद्र बुध की युति बन जाये तब धनमान व सम्मान की प्राप्ति भी होती है। जन्मांग चक्र में बुध व बृहस्पति की बली स्थिति होने पर ही ज्योतिष की पूर्ण जानकारी सम्भव है। इसी प्रकार धनेश लाभेश शुक्र की बलवान स्थिति धन मान सम्मान की प्राप्ति हेतु आवश्यक है। बुध व मंगल शनि की राशि में हों एवं उस पर शनि की दृष्टि भी हो तो उसे ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त होती है।

चंद्र को ज्योतिष में मन का कारक माना है। इससे त्रिकोण में बृहस्पति व बुध से त्रिकोण में मंगल स्थित हो तो जातक त्रिकालज्ञ होता है। बृहस्पति को ज्ञान, बुध बुद्धि व ज्योतिष का, मंगल गणित व तर्क शक्ति का कारक है। तो शुक्र लक्ष्मी रूप है। अतः ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि हेतु मंगल बुध बृहस्पति व शुक्र का बलवान होकर शुभ स्थिति में होना आवश्यक है। जो ग्रह जन्मांग में अशुभ स्थिति में रहेगा उसके कारक सम्बंधी ज्योतिषी में गुणों की कमी होगी। यदि बुध व मंगल कमजोर हुआ तो उसे गणित ज्योतिष में असुविधा महसूस होगी। बुध एवं बृहस्पति कमजोर होने पर उसे ज्योतिषीय ज्ञान का सही समय पर सही उपयोग करने की असुविधा महसूस होगी। शुक्र की निर्बल स्थिति ज्योतिषी के लिये धन प्राप्ति में कमी कराती है। उसकी प्रसिद्धि एवं लोगों को आकर्षित करने की क्षमता भी कम रहती है। इसके लिये जन्मांग चक्र में ज्योतिष में प्रसिद्ध होने के योगों के साथ शुक्र का बलवान होना आवश्यक है। अतः किसी ज्योतिषी को प्रसिद्धि हेतु बुध, बृहस्पति व शुक्र का बलवान होना एवं शनि राहु का योगकारक होना आवश्यक है।

मेरे और लेख देखें :- rbdhawan.wordpress.com, astroguruji.in, shukracharya.com, guruji ke totke.com, vaidhraj.com पर।