सरकारी नौकरी का योग

Dr.R.B.Dhawan

पराशरी ज्योतिष के सिद्धांत अनुसार सूर्य को ग्रहों का राजा कहा गया है, राजा अनेक प्रकार से सिद्ध होता है जैसे :- शरीर में सिर और मस्तिष्क जिनका कारक सूर्य है, अर्थात- शरीर पर सिर और मस्तिष्क शासन करते हैं। और सिर व मस्तिष्क पर आत्मा का शासन है। ठीक इसी प्रकार शहर पर विधायक, जिले पर सांसद और सांसदों पर मंत्री, मंत्रीमंडल पर प्रधानमंत्री का शासन होता है, इन सब का सहयोग करते हैं प्रशासनिक अधिकारी। इस प्रकार सूर्य को सौर परिवार का राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। जन्म कुंडली में सरकारी नोकरी के मामले में सूर्य की विभिन्न स्थितियां इस प्रकार फलदायी होती है :–

1- लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य स्थित हो तो व्यक्ति शाोषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है।

2- सूर्य की दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाती है। यहां चंन्द्रमा हो तो, चंद्रमा चंचल तथा अस्थिर ग्रह है, जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार-बार गुजरते हैं।

3- सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते हैं। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप-चुप तरीके से कार्य करने वाले होते हैं।

4-सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा भी प्राप्त होता है।

5- यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध सी.ए., एकाऊंट, गुरु- शिक्षा, बैंक या इंश्योरेंस, शुक्र फाइनेंस सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है।

6-सूर्य का चतुर्थ प्रभाव भी जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते हैं।

7- सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। ऐसे योग राजनीति में भी सफलता दिलाने वाले होते हैं। दशम स्थान कर्म का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है।

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जन्म कुंडली के विशेष योग

यूं तो एक जातक की जन्मकुंडली में सैकड़ों योग बनते हैं, इनमें से कुछ योग बलवान होते हैं, और कुछ निर्बल। निर्बल योगों का फल कब फलित हुआ यह पता ही नहीं चलता, और बलवान योग अपना फलित प्रकट करते हुए स्पष्ट दिखाई देते हैं। इस लेख में कुंडली के कुछ विशेष योग बताए ज रहे हैं, जो अपना न्यूनाधिक फल देते हैं।

द्विभार्या योग :-

राहू लग्न में पुरुष राशि (सिंह के अलावा) में हो अथवा 7वें भाव में सूर्य, शनि, मंगल, केतु या राहू में से कोर्इ भी दो ग्रह (युति दृष्टि द्वारा) जुड़ जाएं तो द्विभार्या योग बनता है। (ऐसे में सप्तमेष व द्वादशेश की स्थिति भी विचारनी चाहिए)। अष्टमेश सप्तमस्थ हो तो द्विभार्या योग होता है।

राजयोग :-

नवमेश तथा दशमेश एकसाथ हो तो राजयोग बनता है। दशमेश गुरू यदि त्रिकोण में हो तो राजयोग होता है। एकादशेश, नवमेश व चन्द्र एकसाथ हो (एकादश स्थान में) तथा लग्नेश की उन पर पूर्ण दृष्ट हो तो राजयोग बनता है। ( राजयोग में धन, यश, वैभव, अधिकार बढ़ते है)

विपरीत राजयोग :-

6ठें भाव से 8वें भाव का सम्बन्ध हो जाएं। अथवा दशम भाव में 4 से अधिक ग्रह एक हो जाएं। या फिर सारे पापग्रह प्राय: एक ही भाव में आ जाए तो विपरित योग बनता है। इस राजयोग के भांति यदा तरक्की नही होती जाती। किन्तु बिना प्रयास के ही आकस्मिक रूप से सफलता, तरक्की धन या अधिकार की प्राप्ति हो जाती है।

आडम्बरी राजयोग :-

कुंडली में समस्त ग्रह अकेले बैठें हो तो भी जातक को राजयोग के समान ही फल मिलता है। किन्तु यह आडम्बरी होता है।

विद्युत योग :-

लाभेश परमोच्च होकर शुक्र के साथ हो या लग्नेश केन्द्र में हो तो विधुत योग होता है। इसमें जातक का भाग्योदय विधुतगति से अर्थात अति द्रुतगामी होता है।

नागयोग :-

पंचमेश नवमस्थ हो तथा एकादशेश चन्द्र के साथ धनभाव में हो तो नागयोग होता है। यह योग जातक को धनवान तथा भाग्यवान बनाता है।

नदी योग :-

पंचम तथा एकादश भाव पापग्रह युक्त हों किन्तु द्वितीय व अष्टम भाव पापग्रह से मुक्त हों तो नदी योग बनता है, जो जातक का उच्च पदाधिकारी बनाता है।

विश्वविख्यात योग :-

लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, दशम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक विश्व में विख्यात होता है। इसे विश्वविख्याति योग कहते है।

अधेन्द्र योग :-

लग्नकुंडली में सभी ग्रह यदि पांच से ग्यारह भाव के बीच ही हों तो अधेन्द्र योग होता है। ऐसी जातक सर्वप्रिय, सुन्दर देहवाला व समाज में प्रधान होता है।

दरिद्र योग :-

केन्द्र के चारों भाव खाली हों अथवा सूर्य द्वितीय भाव में तथा द्वितियेश शनि वक्री हों और 2, 8, 6, 12 या 3 भाव में हों तो लाख प्रयास करने पर भी जातक दरिद्र ही रहता है।

बालारिष्ट योग :-

चन्द्रमा 5, 7, 8, 12 भाव में हो तथा लग्न पापग्रहों से युत हो तो बालारिष्ट योग बनता है। अथवा चन्द्रमा 12वें भाव में क्षीण हो तथा लग्न व अष्टम में पापग्रह हों, केन्द्र में भी कोर्इ शुभ ग्रह न हो तो भी बालारिष्ट योग बनता है। बालारिष्ट योग में जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है। अथवा बाल्यवस्था में उसे मृत्यु तुल्य कष्ट झेलना पड़ता है।

मृतवत्सा योग :-

पंचमेश षष्ठ भाव में गुरू व सूर्य से युक्त हो तो जातक की पत्नी का गर्भ गिरता रहता है। अथवा मृत संतान पैदा होती है। अत: इसे मृतवत्सा योग कहते है।

छत्रभंग योग :-

राहू, शनि व सूर्य में से कोर्इ भी दो ग्रह यदि दशम भाव पर निज प्रभाव ड़ालते है। और दशमेश सबल न हो तो छत्रंभग योग बनता है। जातक यदि राजा है तो राज्य से पृथक हो जाता है। अन्यथा कार्यक्षेत्र व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयां व विघ्न आते है, तरक्की नही हो पाती।

चाण्डाल योग :-

क्रूर व सौम्य ग्रह एक ही भाव में साथ हों तो चाण्डाल योग बनता है। विशेषकर गुरू-मंगल, गुरू-शनि, या गुरू-राहू साथ हों तो। इससे योग के बुरे फल मिलते है। तथा जातक की संगति व सोच दूषित हो जाते है।

सुनफा योग :-

कुंडली में चन्द्रमा जहां हो उससे अगले भाव में (सूर्य को छोड़कर) यदि कोर्इ भी ग्रह बैठा हो तो सुनफा योग बनता है। इससे जातक का लाभ बढ़ता है। (यदि आगे बैठने वाला ग्रह सौम्य या चन्द्रमा का मित्र है तो शुभ लाभ व फल बढ़ते है। अन्यथा कुछ अपेक्षाकृत कमी आ जाती है)।

महाभाग योग :-

यदि जातक दिन में जन्मा है। (प्रात: से साय: तक) तथा लग्न, सूर्य व चन्द्र विषम राशि में है। तो महाभाग योग बनता है। यदि रात में जन्मा है। (साय: के बाद प्रात: से पूर्व) तथा लग्न, सूर्य व चंद्र समराशि में है। तो भी महाभाग योग बनता है। यह सौभाग्य को बढ़ाता है।

प्रेम विवाह योग :-

तृतीय, पंचम व सप्तम भाव व उनके भावेषों का परस्पर दृष्टि युति राशि से संबध हो जाए तो जातकों (स्त्री-पुरूष) में प्रेम हो जाता है। लेकिन यदि गुरू भी इन संबधो में शामिल हो जाए तो उनका प्रेम ‘प्रेम विवाह’ में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन तृतीय भाव व तृतीयेश न हो, केवल पंचम, सप्तम भाव व भावेश का ही दृष्टि, युति, राशि संबंध हों और गुरू भी साथ हो तो जातक प्रेम तो करता है, लेकिन जिससे प्रेम करता हेै। उससे विवाह नही करता। भले ही जातक स्त्री हो या पुरूष।

गजकेसरी योग :-

लग्न या चन्द्र से गुरू केन्द्र में हो तथा केवल शुभग्रहों से दृष्टयुत हो, अस्त, नीच व शत्रु राशि में न हो तो गजकेसरी योग होता है। जो जातक को अच्छी पहचान प्रतिष्ठा दिलाता है।

बुधादित्य योग :-

10वें भाव में बुध व सूर्य का योग हो। पर बुध अस्त न हो तथा सूर्य मित्र या उच्च का हो तो व्यापार में सफलता दिलाने वाला यह योग बुधादित्य योग के नाम से जाना जाता है।

पापकर्तरी योग :-

शुभ ग्रह जिस भाव में हो उसके पहले व बाद के भाव में क्रूरपापग्रह हों तो पापकर्तरी योग बनता है। इससे बीच के भाव में बैठा हुआ ग्रह पाप प्रभाव तथा दबाव में आकर पीड़ित होता है। अत: शुभ फल कम दे पाता है, उसी भाव में शुभ ग्रह दो पापग्रहों या दो से अधिक पापग्रहों के साथ बैठे तो पापमध्य योग बनता है।

सरकारी नौकरी/व्यवसाय का योग :-

जन्मकुंडली में बाएं हाथ पर ग्रहों की संख्या अधिक हो तो जातक नौकरी करता है। दाएं हाथ पर अधिक हों तो व्यापार करता है। सूर्य दाएं हाथ पर हों तो सरकारी नौकरी कराता है। शनि बाएं हाथ पर हो तो नौकरी कराता है। 10 वें घर से शनि व सूर्य का सम्बन्ध हो जाए (दृष्टियुतिराशि से) तो जातक प्राय: सरकारी नौकरी करता है। गुरू व बुध बैंक की नौकरी कराते है। बुध व्यापार भी कराते है। गुरू सुनार का अध्यापन कार्य भी कराता है।

विजातीय विवाह योग :-

राहू 7वें भाव में हो तो जातक का विवाह प्राय: विजातीय विवाह होता है। (पुरूष राशि में हो तो और भी प्रबल सम्भावनाएं होती है।

चक्रयोग :-

यदि किसी कुंडली में एक राशि से छ: राशि के बीच सभी ग्रह हों तो चक्रयोग होता है। यह जातक को मंत्री पद प्राप्त करने वाला होता है।

अनफा योग :-

यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा से पिछले भाव में कोर्इ शुभ ग्रह हों तो अनफा योग बनता है। इससे चुनाव में सफलता तथा अपने भुजाबल से यश, धन प्राप्त होता है।

भास्कर योग :-

सूर्य से दूसरे भाव में बुध, बुध से 11वें भाव में चन्द्र और चन्द्र से त्रिकोण में गुरू हो तो भास्कर योग होता है। ऐसा जातक प्रखरबुद्वि, धन, यश, रूप, पराक्रम, शास्त्र ज्ञान, गणित व गंधर्व विधा का जानकार होता है।

चक्रवती योग :-

यदि कुंडली के नीच /पाप ग्रह की राशि का स्वामी या उसकी उच्च राशि का स्वामी लग्न में हो या चन्द्रमा से केन्द्र (1,4,7,10) में हो तो जातक चक्रवती सम्राट या बड़ी धार्मिक गुरूनेता होता है।

कुबेर योग :-

गुरू, चन्द्र, सूर्य पंचमस्थ, तृतीयस्थ व नवमस्थ हो और बलवान स्थिति में भी हो तो जातक कुबेर के समान धनी व वैभवयुक्त होता है।

अविवाहित/विवाह प्रतिबंधक योग :-

चन्द्र पंचमस्थ हो या बलहीन अस्त पाप पीडित हो तथा 7वें व 12वें भाव में पापग्रह हो तो जातक कुंआरा ही रहता है। शुक्र व बुुध 7वें भाव में शुभग्रहों से दृष्ट न हों तो जातक कुंआरा रहता है। अथवा राहू व चन्द्र द्वादशस्थ हों तथा शनि व मंगल से दृष्ट हों तो जातक आजीवन कुंआरा रहता है। इसी प्रकार सप्तमेष त्रिकस्थान में हो और 6, 8, 12 के स्वामियों में से कोर्इ सप्तम भाव में हो तब भी जातक कुंआरा रहता है। शनि व मंगल, शुक्र व चन्द्र से 180° पर कुंडली में हो तो भी जातक कुंआरा रहता है।

पतिव्रता योग :-

यदि गुरू व शुक्र, सूर्य या मंगल के नवमांश में हो तो जातक एक पत्नीव्रत तथा महिला जातक पतिव्रता होती है। यदि द्वितीयेश व सप्तमेश नीच राशि में हो परन्तु सभी शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हो तो स्त्री जातक पतिव्रता तथा जातक एक पत्नीव्रत वाला होता है। बुध यदि गुरू के नवमांश में हों तो भी पतिव्रता योग होता है चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हो (महिला कुंडली) पाप प्रभाव में न हो तों भी स्त्री पति के लिए कुछ भी कर सकने वाली होती है।

अरिष्ट योग :-

शुक्लपक्ष की रात्रि का जन्म हो और छठे या 8वें भाव में चन्द्र हो तो सर्वारिष्ट नाशक योग होता है। जन्म राशि का स्वामी 1, 4, 7, 10 में स्थित हों तो भी अरिश्टनाशक योग होता है। चन्द्रमा, स्वराशि, उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो सर्वारिष्ट नष्ट होते है। चन्द्रमा के 10वें भाग में गुरू, 12वें में बुध, शुक्र व कुंडली के 12वें में पापग्रह हों तो भी अरिष्ट नष्ट होते है।

मूक योग :-

गुरू व षष्ठेश लग्न में हो अथवा बुध व षष्ठेश की युति किसी भी भाव (विशेषकर दूसरे) में हो। अथवा क्रूर ग्रह सनिध में और चन्द्रमा पापग्रहों से युक्त हो। या कर्क, वृश्चिक व मीन राशि के बुध को अमावस्य का चन्द्र सम्बन्ध है। तो मूक योग बनता है। इस योग में जातक गूंगा होता है।

विशेष योग :-

8 व 12 राशि पापग्रहों से युक्त हो तथा किसी भी राशि के अंतिम अंशो में वृष राशि का चन्द्र हो तथा चंद्र पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो जातक जीवन भर गूंगा रहता है।

बधिर योग :-

शनि से चौथे स्थान में बुध हो तथा षष्ठेश त्रिक भावों में हो तो बधिर योग होता है। अथवा पूर्ण चन्द्र व शुक्र साथ बैठे हो तो बधिर योग बनता है। 12वें भाव में बुध-शुक्र की युति हो अथवा 3, 5, 9, 11 भावों में पापग्रह बिना शुभ ग्रहों से दृष्ट हों अथवा 6,12 भाव में बैठे षष्ठेश पर शनि की दृष्टि न हो तो भी बधिर योग होता है।

सौभाग्य को चमका देती है ~ सूर्य रेखा

Surya Rekha

मनुष्य के हाथ में- सूर्य-रेखा को ‘रविरेखा’ या ‘तेजस्वी-रेखा’ भी कहा जाता हैं, कारण यह भाग्य-रेखा से होने वाले उज्जवल भविष्य या सौभाग्य को ठीक उसी प्रकार चमका देती हैं जिस प्रकार सूर्य अपने प्रखर प्रकाश से रात्रि के अंधकार को दूर करता है। जिस प्रकार से हिम के ढके हुई पर्वत श्रृंखलाओं को विशेष चमकाता हैं। इससे यह न समझ लेना चाहिये कि सूर्य-रेखा के अभाव में हाथ में पड़ी शुभ भाग्य-रेखा का कोई मूल्य ही नहीं होता या उसका प्रभाव ही मध्यम हो जाता हैं समझने के लिए उपर्युक्त शिखर-श्रृंखलाओं को ही ले लीजिये। वे बर्फ से ढंकी रहती हैं बर्फ का गुण हैं चमकना, चाहे रात्रि हो या दिन; उसके स्वाभाविक गुण चमकने में कोई अन्तर नहीं आता- वह सदा एक सा चमकता ही रहता हैं। सूर्य की किरणों से अन्तर केवल इतना ही होता हैं कि वे अपने सहयोग से उसमें एक विशेष प्रकार की चमक उत्पन्न कर देती है। और वह पहले की अपेक्षा और अधिक चमकने लग जाता है। यही बात रेखाओं के सम्बन्ध में भी है। यदि भाग्यरेखा के साथ सूर्यरेखा भी अधिक बलवान् होकर पड़ी हो तो वह सोने में सुगन्ध का काम करती हैं, अर्थात् यों कहिये कि एक राजा को चक्रवर्ती समा्रट बनाने का काम करती है, यही भाव है।

Surya Rekha
Surya Rekha

यदि किसी के हाथ में भाग्य-रेखा निर्बल हो या उसका सर्वथा ही अभाव हो तो सुन्दर, छोटी सी सूर्य-रेखा के प्रभाव से वह व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) वैसा प्रभावशाली न हो, फिर भी रजोगुणी अवश्य होगा। ऐसे व्यक्ति में सदैव धनाढय होने की, जनता में सम्मान पाने की या कोई बड़ा नेता बनने की अभिलाषाएँ बनी रहती हैं। वह दस्तकार न होकर भी दस्तकारों से प्रेम रखता हैं किसी विषय में पूर्ण ज्ञान रखते हुए भी वह अपनी योग्यता दूसरों पर प्रकट नहीं कर पाता। साधारण शुभ भाग्यरेखा के साथ भी सूर्य-रेखा अधिक उपयोगी समझी जाती है। इसमें संदेह नहीं कि जिस समय यह रेखा (सूर्य-रेखा) मनुष्य के हाथ में आरम्भ होती है उसी समय से उसके भाग्य में कुछ विशेष सुधार होने लग जाता है। यह रेखा निम्नलिखित सात स्थानों से आरम्भ होती है-

(1) मणिबन्ध या उसके समीप से।
(2) चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होकर सूर्यागुंलि की ओर
(3) जीवन-रेखा से।
(4) भाग्य-रेखा से प्रारम्भ होती है।
(5) मंगलक्षेत्र या हथेली के मध्य-भाग से।
(6) मस्तक-रेखा को स्पर्शकर
(7) हृदय-रेखा को स्पर्श करती (सूर्य के स्थान पर जाती है)।

 

इन सात स्थानों से प्रारम्भ होने वाली सूर्य-रेखा हमें समय समय पर हमारी दुर्घटनाओं या हमारे भाग्यसम्बन्धी अनेक अनेक जटिल प्रश्नों को हल करती है। यहां पृथक्-पृथक् सातों प्रकारों का विस्तृत विचार किया जा रहा है।

(1) यदि सूर्य-रेखा मणिबन्ध या उसके समीप से आरम्भ होकर भाग्य-रेखा के निकट समानान्तर अपने स्थान को जा रही हो तो यह सबसे उत्तम मानी गयी है। ऐसी रेखावाला व्यक्ति स्त्री या पुरूष प्रतिभा ओर भाग्य का मेल होने से, जिस काम को हाथ लगाता या आरंभ करता हैं उसमें पूर्णतः सफल होता है।

(2) इसके विपरीत यदि सूर्य-रेखा चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होती हो तो इसमें संदेह नहीं कि उसका भाग्य चमकेगा, पर उसकी यह उन्नति निजी परिश्रम द्वारा न होकर दूसरों की इच्छा ओर सहायता पर अधिक निर्भर करती हैं संभव है, उसे उसके मित्र सहायता करें, या इस सम्बन्ध में अपनी कोई शुभ सम्मति दें जिससे वह उन्नति के पथ पर अग्रसर हो।
चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होकर अनामिकांगुलि तक पहुंचने वाली गहरी सूर्यरेखा के सम्बन्ध में यह बात अवश्य ध्यान में रखने की है। ऐसे व्यक्ति का जीवन अनेक घटनाओं से भरा और संदेह पूर्ण होता है। उसमें बहुुत से परिवर्तन भी होते हें किन्तु यदि रेखा चन्द्रस्थान से निकलकर भाग्य-रेखा के समानान्तर जा रही हो तो भविष्य सुखमय हो सकता है। यदि प्रेम बाधक न हो, और विचारों में दृढ़ता होने के साथ ही साथ मस्तकरेखा भी अपना फल शुभ दे रही हो। निश्चय ही ऐसा व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) तेजस्वी और प्रसन्नचित्त होता है।, फिर भी उसमें एक बड़ा भारी दोष यह पाया जाता है कि उसके विचार कभी स्थिर नहीं रहते। सर्वसारण स्त्री या पुरूषों का उस पर अधिक प्रभाव पड़ता है। और अनायास ही वह अपने पूर्वनिश्चित विचारों को बदल देता हैं वह यश पाने की इच्छा करता है, किन्तु अपने संकल्प पर दृढ़ न रह सकने के कारण अपने प्रयत्नों अधिक सफल नहीं होता।

(3) जीवन-रेखा से आरम्भ होने वाली स्पष्ट सूर्य-रेखा भविष्य में उन्नति और यश बढाने वाली मानी गयी हैं किन्तु यह उन्नति उसके निजी परिश्रम और योग्यता से ही होती है। एक व्यावसायिक हाथ को छोड़कर शेष सभी हाथों में इसके प्रभाव से मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी कला में पूरी उन्नति कर सकता है। यह रेखा उपर्युक्त दशा में स्त्री या पुरूष के शीघ्र ग्राही होने का भी एक अचूक प्रमाण है ऐसे व्यक्ति सुन्दरता के पुजारी होते हैं ओर अपने जीवन का एक बड़ा भाग सौन्दर्य-उपासना में ही बिताते हैं यही कारण हैं कि वे उन स्त्री-पुरूषों की अपेक्षा, जिनकी सूर्य-रेखा स्वयं भाग्यरेखा से आरंभ हो रही हो, जीवन का अधिक उपभोग नहीं कर पाते।

(4) यदि यह रेखा भाग्य-रेखा से आरम्भ होती हो तो भाग्यरेखा के गुणों में वृद्धिकर उसकी शक्ति दूगनी कर देती है, प्रायः देखा गया है कि यह रेखा जिस स्थान से भाग्य-रेखा से ऊपर उठती है वहीं से किसी विशेष उत्कर्ष या उन्नति का आरम्भ होता है। रेखा जितनी ही अधिक स्पष्ट और सुन्दर होगी, उन्नति का क्षेत्र उतना ही विस्तृत और उन्नति भी अधिक होगी। ऐसी सूर्य-रेखा प्रायः ऐसे हाथों में भी दिख पड़ती है जो चित्रकार होना तो दूर रहा, एक सीधी रेखा भी नहीं खीच सकते। वे रंगों के अनुभवी भी इतने होते हैं कि पीले और गुलाबी रंग का अन्तर जानना भी उनकी शक्ति से बाहर की बात होती हैं अतः स्पष्ट है कि ऐसी रेखा वाला व्यक्ति कुशल कलाकार या दस्तकार नहीं हो सकता। हाँ, वह सुन्दरता का पुजारी और प्राकृतिक दृश्यों का प्रेमी अवश्य होता हैं दूसरे शब्दों में सुन्दरता तथा प्रकृति से प्रेम करना उनका एक स्वाभाविक गुण ही हो जाता हैं।

(5) मंगलक्षेत्र या हथेली के मध्यभाग से प्रारभ होने वाली सूर्य-रेखा अनेक अपत्ति और बाधाओं के बाद उन्नति सूचित करती है इसका सहायक मंगलक्षेत्र होता है यदि किसी के हाथ का मंगलक्षेत्र उच्च हो तो वह बहुत उन्नति करता है किन्तु मंगलकृत कष्ट भोग लेने के पश्चात् ही वह अपनी उन्नति कर पाता है।

(6) यदि यह रेखा मस्तकरेखा से आरंभ होती हो और स्पष्ट हो तो वह मानव के जीवन के मध्यकाल में (करीब 35 वें वर्ष) तक उन्नति करता है उसकी यह उन्नति जातीय योग्यता और मस्तिष्क शक्ति के अुनसार होती है।

(7) हृदय-रेखा से आरम्भ होने वाली सूर्य-रेखा जीवन के उत्तरकाल में मानव की उन्नति करती है। यह अवस्था लगभग 56 वर्ष की होगी, किन्तु एतदर्थ हृदयरेखा से ऊपर सूर्यरेखा का स्पष्ट होना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में उस स्त्री या पुरूष के जीवन का चैथा चरण सुखमय या कम से कम निरापदा बीतता है। इसके विपरीत यदि हृदय-रेखा से ऊपर सूर्य-रेखा का सर्वथा अभाव हो या वह छोटे-छोटे टुकडों से बनी या टूटी-फूटी हो तो जीवन का चैथाकाल चिन्ताओं से भरा और अन्धकारमय व्यतीत होगा, विशेषतः तब जब कि भाग्य रेखा निराशाजनक हो।

यदि सूर्य-रेखा और भाग्यरेखा दोनों ही शुभफल देने वाली होकर एक दूसरी के समानान्तर जा रही हों, साथ ही मस्तक-रेखा भी स्पष्ट और सीधी हो तो वह धनाढ़य और ऐश्वर्यपूर्ण होने का सबसे बड़ा लक्षण है। ऐसे योगवाला व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) बुद्धिमान् और दूरदर्शी होने के कारण जिस काम को हाथ लगाता हैं उसी में सफल होता है।

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यदि हाथ में सूर्य की अंगुली पहली अंगुली तर्जनी से अधिक लम्बी और बीच की मध्यमांगुलि के बराबर हो, साथ ही सूर्य-रेखा से अधिक बलवान् हो तो उस मनुष्य की प्रवृत्ति जुआ खेलने की ओर अधिक पायी जाती है, किन्तु उसमें धन या गुणों का अभाव नहीं होता। हाँ, कभी-कभी यदि मस्तक-रेखा नीचे की ओर झुकी हो तो उसका और भी अधिक बुरा प्रभाव पड़ता हैं जैसे-सदा सट्टा, लाटरी या जुआ खेलना, शर्त लगाना आदि।

यदि सूर्य-रेखा सूर्यक्षेत्र की ओर न जाकर शनि की अंगुली की ओर जा रही हो तो उस व्यक्ति की उन्नति या सफलता शोक और कठिनाइयों से मिली होती हैं। ऐसे व्यक्ति धनवान और उन्नतिशील होकर भी प्रायः सुखी नहीं रह पाते। यदि यह रेखा शनिक्षेत्र को काट रही हो या अपनी कोई शाखा गुरूक्षेत्र की ओर भेज रही हो तो उसकी उन्नति या सफलता कोई शासन-अधिकार अथवा राज्य द्वारा उच्च पद्वी पाने के रूप में होगी। परन्तु रेखा का यह लक्षण किसी भी दशा में इतना प्रभाव पूर्ण नहीं हो सकता जितना भाग्य-रेखा के गुरू अंगुली की ओर जाने के सम्बन्ध में हो सकता है।

प्रायः देखा गया है कि छोटी-छोटी एक या एक से अधिक रेखाएँ एक दूसरी के समानान्तर में सूर्यक्षेत्र पर दौड़ती पायी जाती हैं। ऐसे योगवाले व्यक्ति के विचार बिखरे होते हैं वह कभी कुछ करना चाहता है तो कभी कुछ। अतएव वह व्यापार, चित्रकारी या कला-कौशल किसी भी विशेष काम में कभी उन्नति नहीं कर पाता। सूर्यरेखा के साथ कुछ ऐसे चिन्ह भी पाये जाते हैं जो भाग्योन्नति में बाधा डालते हैं उदाहरणार्थ-हथेली यदि अधिक गहरी हो तो वह अशुभ लक्षण हैं।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer