शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा और स्वास्थ्यवर्धक खीर :-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागिरी पूर्णिमा भी कहा जाता है, को हिंदू चंद्र पक्ष अश्विन महीने (सितंबर-अक्टूबर) के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन के रूप में इसे कुमुड़ी (चांदनी) के रूप में भी जाना जाता है, जैसा कि इस दिन, पृथ्वी पर चंद्रमा की बौछार ‘अमृत किरणें’ या जीवन के अमृत उसके किरणों के माध्यम से है पूर्णिमा की चमक विशेष आनन्द लेती है, यह बदलते मौसम का प्रतीक है, मानसून के अंत में शरद पूर्णिमा की रात्रि चन्द्रमा की किरणों में औषधीय गुण रहते हैं।

5000 वर्ष पहले भी इस रात में भगवान श्रीकृष्ण और राधाजी ने वृन्दावन में अनगिनत गोपी को दिव्य आनंद प्रकट किया था। यह माना जाता है कि चंद्रमा और पृथ्वी शरद पूर्णिमा रात्रि पर सबसे करीब दूरी पर हैं। इस वजह से, चंद्रमा की किरणों में कई अमृत किरणें (उपचारात्मक गुण) हैं, चांदनी के नीचे खीर रखना शरीर और आत्मा दोनों को पोषण करता है, निम्नलिखित कुछ स्वास्थ्य युक्तियां दी गई हैं, जिन्हें अपनाने पर हम सभी को शरद पूर्णिमा का लाभ मिल सकता है।

शरद पूर्णिमा पर, शाम को चावल, दूध और मिश्री की खीर बनायें, खीर बनाने के दौरान कुछ समय के लिए इस में सोने या चांदी की वस्तु रखें, बनने के बाद उसे निकाल कर लगभग 9 बजे से करीब 12 बजे तक इसे चाँदनी में रखें। उस रात के लिए कोई भी अन्य खाना न पकाया जाए, केवल खीर ही खानी चाहिए। देर रात में हमें अत्यधिक आहार नहीं लेना चाहिए, इसलिए खीर को तदनुसार खाना चाहिए। शरद पूर्णिमा ‌की रात में रखी खीर को दूसरे दिन प्रातःकाल भी खाया जा सकता है। क्योंकि इसे प्रसाद के रूप में भगवान को देने के बाद बनाया जाता है। रात में 15-20 मिनट के लिए चंद्रमा की ओर देखे । ध्यान रहे आप आँखों को नहीं झपका रहे हों।

आँखों की परेशानियों से मुक्त होने के लिए और आंखें पूरी तरह ठीक से काम करने के लिए, शरद पूर्णिमा चाँद की चांदनी में ही में एक सुई में धागा लगाने का प्रयास करें। (कोई अन्य प्रकाश पास नहीं होना चाहिए)। शरद पूर्णिमा पर पूरी रात यदि आप जागरण कर सकते हैं, तो यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा होगा।

शरद पूनम रात आध्यात्मिक उत्थान के लिए बहुत फायदेमंद है, इसलिए इस रात को जागने का प्रयास करना चाहिए, यदि संभव है, तो इस पवित्र रात को जप ध्यान कीर्तन करें, जिससे की आप अपने भाग्य को भी जगा सकते है! शरद पूर्णिमा वर्ष में एक बार आती है, और कहा जाता है की इस दिन भगवान् श्रीकृष्ण सभी की मनोकामना पूर्ण करते हैं, इसलिए जैसे आप खीर बनाए उसे भगवान् विष्णु के भोग लगा कर चांदनी में रख दें, जिससे की इसकी मिठास आपके जीवन में सुखो की भरमार कर देगी, और आप अपना जीवन सुखमय जी सकेंगे !यदि आप खुद खीर नहीं बना सकते हैं, तो आप किसी मंदिर से प्रसाद भी ला सकते हैं !

एेसी मान्यता है कि गाय के दूध से! किशमिश और केसर डालकर चावल मिश्रित खीर बनाकर शाम को चंद्रोदय के समय बाहर खुले में रखने से उसमें पुष्टिकारक औषधीय गुणों का समावेश हो जाता है, यह खीर आध्यात्मिक उत्थान के लिए श्रेष्ठ है, जब अगले दिन प्रातः काल उसका सेवन करते हैं, तो वह हमारे आरोग्य के लिए मानसिक स्वास्थ्य अत्यंत लाभकारी हो जाती है, एक अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है, यह तत्व चंद्र किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का अवशोषण करता है, चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है, इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है, जोकि विज्ञान पर आधारित है।

आयुर्वेद के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन खीर को चन्द्रमा की किरणों में रखने से उसमे औषधीय गुण पैदा हो जाते है, और इससे कई असाध्य रोग दूर किये जा सकते है, खीर खाने का अपना औषधीय महत्त्व भी है, इस समय दिन में गर्मी होती है, और रात को सर्दी होती है, ऋतु परिवर्तन के कारण पित्त प्रकोप हो सकता है, खीर खाने से पित्त शांत रहता है, इस प्रकार शारीरिक परेशानी से बचा जा सकता है, शरद पूर्णिमा की रात में खीर का सेवन करने से जीवनदायिनी ऊर्जा प्राप्त होती है।

आयुर्वेद में उल्लेखित है कि यदि यह खीर मिटटी की हंडिया में रखी जाये, और प्रातः बच्चे उसका सेवन करें, तो छोटे बच्चों के मानसिक विकास में अतिशय योगदान करती है .!

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जीवनोपयोगी सूत्र

सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः कीर्तिस्त्यागानुसारिणी।
अभ्याससारिणी विद्या बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥

भावार्थ- लक्ष्मी सत्य का अनुसरण करती हैं, कीर्ति त्याग का अनुसरण करती हैं, विद्या अभ्यास का अनुसरण करती है, और बुद्धि कर्म का अनुसरण करती है।

चित्तमन्तर्गतं दुष्टं तीर्थस्नानान्न शुद्धयति ।
शतशोऽपि जलै: र्धौतं सुराभाण्डमिवा शुचि: ।।

स्कन्द पुराण में कहा गया है कि – चित्त के भीतर यदि दोष भरा है तो वह तीर्थ-स्नान से भी शुद्ध नहीं होता है । जैसे मदिरा से भरे हुए घड़े को ऊपर से जल द्वारा सैकड़ों बार धोया जाय तो भी वह पवित्र नहीं होता है। उसी प्रकार दूषित अन्त:करण वाला मनुष्य भी तीर्थ-स्नान से शुद्ध नहीं होता है । इसलिए शास्त्र कहते हैं, कि चित्त की शुद्धि ही सबसे बड़ा तीर्थ-स्नान है।

श्लोक:-
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्।जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।

अर्थ :-
ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ और सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही कराए।

सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः, सुशासिता स्री नृपति: सुसेवितः।
सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं,सुदीर्घकालेsपि न याति विक्रियाम्।।

अच्छी रीति से पका हुआ भोजन, विद्यावान पुत्र, सुशिक्षित अर्थात आज्ञाकारिणी स्री, अच्छे प्रकार से प्रजा की सेवा करने वाला राजा, सोच कर कहा हुआ वचन, और विचार कर किया हुआ कार्य ये बहुत काल तक भी नहीं भूलते हैं।

दुर्जनम् प्रथमं वन्दे, सज्जनं तदनन्तरम्।
मुख प्रक्षालनत् पूर्वे गुदा प्रक्षालनम् यथा ॥

पहले कुटिल व्यक्तियों को प्रणाम करना चाहिये, सज्जनों को उसके बाद; जैसे मुँह धोने से पहले, गुदा धोयी जाती है।

निषेवते प्रशस्तानीनिन्दितानी न सेवते।अनास्तिकःश्रद्धानएतत् पण्डितलक्षणम्।।

अर्थ :-
जो अच्छे कर्म करता है, और बुरे कर्मों से दूर रहता है, साथ ही जो ईश्वर में भरोसा रखता है, और श्रद्धालु है, उसके ये सद्गुण पंडित (विद्वान) होने के लक्षण हैं।

सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः, सुशासिता स्री नृपति: सुसेवितः।
सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं,सुदीर्घकालेsपि न याति विक्रियाम्।।

अच्छी रीति से पका हुआ भोजन, विद्यावान संतान, सुशिक्षित अर्थात आज्ञाकारिणी स्री, अच्छे प्रकार से प्रजा की सेवा करने वाला राजा, सोच कर कहा हुआ वचन, और विचार कर किया हुआ कार्य ये बहुत काल तक भी नहीं भूलते हैं।

संसार में कुछ लोग सात्विक हैं । वे स्वयं सुखी रहते हैं, और दूसरों को भी सुख देते हैं। जैसे सत्यवादी परोपकारी वेदों के आचरणशील विद्वान सज्जन महात्मा लोग।

कुछ लोग राजसिक हैं, वे दूसरों को थोड़ा थोड़ा दुख देते हैं । जैसे स्वार्थी कामी लोभी क्रोधी मनुष्य आदि ।

और तीसरे प्रकार के लोग तामसिक हैं जो बहुत अधिक दु:ख देते हैं। जैसे चोर डाकू लुटेरे हत्यारे आतंकवादी आदि ।

सात्विक लोगों के साथ संबंध बनाकर रखें । बाकी राजसिक और तामसिक लोगों से तो बहुत ही सावधान रहें । न तो वे स्वयं सुख से जिएंगे, और न ही आपको जीने देंगे।

ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता शौर्यस्य वाक् संयमो
ज्ञानस्योपशमः कुलस्य विनयो वित्तस्य पात्रे व्ययः ।
अक्रोधस्तपसः क्षमा बलवतां धर्मस्य निर्व्याजता
सर्वेषामपि सर्वकारणमिदं शीलं परं भूषणम् ॥

ऐश्वर्य का विभूषण सुजनता, शौर्य का वाणी व संयम, ज्ञान का उपाशम, कुल का विनय, वित्त का सत्पात्र पे व्यय, तप का अक्रोध, बलवान का क्षमा, और धर्म का भूषण निखालसता है। पर इन सब गुणों का मूल कारण शील, परं भूषण है ।

व्यक्ति के जीवन में महत्त्व :-
ये प्रतिस्पर्धा का दौर है, यहां हर कोई आगे निकलना चाहता है। ऐसे में अक्सर संस्थानों में ये होता है, कि कुछ चतुर लोग अपना काम तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन अपने साथी को उसी काम को टालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, या काम के प्रति उसके मन में लापरवाही का भाव भर देते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है, जो अपने काम से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। संस्थान में उसी का भविष्य सबसे ज्यादा उज्जवल भी होता है। भौतिक सम्पदाओं में आनन्द नहीं है, आनन्द तो चित्त की दशा पर निर्भर करता है। जिसका चित्त शान्त है, वही भौतिक सम्पदाओं का आनन्द ले सकता है, और जिसका चित्त अशान्त है, उसके पास सारे ब्रह्माण्ड की सम्पदा भी हो तो भी वह उसका आनन्द नहीं ले सकता। जो ध्यानी है, जो होशपूर्ण है, उसका चित्त ही शान्त हो सकता, उसके पास कुछ भी हो वह उसी से आनन्दित होगा, महल हो या झोपडी, वह जहाँ भी होगा वहीं स्वर्ग होगा। असल चीज ध्यान है, असली सम्पदा ध्यान है, होश है, भौतिक सम्पदा का मूल्य भी तभी होता है, जब व्यक्ति होश पूर्ण हो I

वास्तु शास्त्र

वास्तु शास्त्र से करें गृह निर्माण :-

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प्रत्येक परिवार की पहली आवश्यकता होती है- अपना घर। मध्यम वर्ग इस सपने को संजोने के लिए जीवन भर संघर्ष करता है। जिस समय यह सपना सच होने जा रहा हो, तो हमें वह घर पूर्ण रूप से समृद्धि दें, इसका ध्यान रखना चाहिए। अत: वास्तु के अनुसार गृह निर्माण करवाना चाहिए।

किसी भी प्लॉट या भूमि पर गृह निर्माण करते समय यह ध्यान रखें कि भूमि (प्लॉट) के अग्नि कोण में खाना बनाने का स्थान (रसोई घर), दक्षिण-पश्चिम में शयन गृह, अस्त्र-शस्त्रागार, पश्चिम में भोजन करने का स्थान, वायव्य कोण में मेहमान का कमरा, ईशान में देवालय एवं उत्तर में भारी वस्तुयें रखने का स्थान होना चाहिए, तथा उत्तर-पूर्व के मध्य बाथरूम होना अच्छा है।

जल स्थान एवं वास्तुशास्त्र :-

मकान में पानी का स्थान सभी मतों से ईशान से प्राप्त करने को कहा जाता है, और घर के पानी को उत्तर दिशा में घर के पानी को निकालने के लिये कहा जाता है। लेकिन जिनके घर पश्चिम दिशा की तरफ़ अपनी फ़ेसिंग किये होते हैं, और पानी आने का मुख्य स्तोत्र या तो वायव्य से होता है, या फ़िर दक्षिण पश्चिम से होता है, उन घरों के लिये पानी को ईशान से कैसे प्राप्त किया जा सकता है? इसके लिये वास्तुशास्त्री अपनी अपनी राय के अनुसार कहते हैं, कि पानी को पहले ईशान में ले जायें।
मेरा मानना है कि घर के अन्दर पानी का इन्टरेन्स कहीं से भी हो, लेकिन पानी को ईशान में ले जाने से पानी की घर के अन्दर प्रवेश की क्रिया से तो वास्तुदोष दूर नही किया जा सकता है, लेकिन ईशान में रख कर उसका ख़राब इफ़ेक्ट तो हम कम कर सकते ही हैं।

पानी के प्रवेश के लिये अगर घर का फ़ेस साउथ में है, तो और भी जटिल समस्या पैदा हो जाती है, नैऋत्य दिशा से आता है तो कीटाणुओं और रसायनिक जांच से उसमे किसी न किसी प्रकार की गंदगी जरूर मिलेगी, और अगर वह अग्नि दिशा से प्रवेश करता है, तो घर के अन्दर पानी की कमी ही रहेगी, और जितना पानी घर के अन्दर प्रवेश करेगा, उससे कहीं अधिक महिलाओं सम्बन्धी बीमारियां मिलेंगी।

पानी को उत्तर दिशा वाले मकानों के अन्दर ईशान और वायव्य से घर के अन्दर प्रवेश दिया जा सकता है, लेकिन मकान के बनाते समय अगर पानी को ईशान में नैऋत्य से ऊंचाई से घर के अन्दर प्रवेश करवा दिया गया तो भी पानी अपनी वही स्थिति रखेगा जो नैऋत्य से पानी को घर के अन्दर लाने से माना जा सकता है।

पानी को ईशान से लाते समय जमीनी सतह से नीचे लाकर एक टंकी पानी की अण्डर ग्राउंड बनवानी चाहिए, फ़िर पानी को घर के प्रयोग के लिये लाना चाहिये। बरसात के पानी को निकालने के लिये जहां तक हो उत्तर दिशा से ही निकालें, फ़िर देखें घर के अन्दर धन की आवक में कितना इजाफ़ा होता है, लेकिन उत्तर से पानी निकालने के बाद आपका मनमुटाव सामने वाले पडौसी से हो सकता है, इसके लिये उससे भी मधुर सम्बन्ध बनाने की कोशिश करते रहे।

वास्तुशास्त्र में भवन का निर्माण करते समय जल का भंडारण किस दिशा में हो यह एक महत्वपूर्ण विषय है शास्त्रों के अनुसार भवन में जल का स्थान ईशान कोण (नॉर्थ ईस्ट) में होना चाहिए परन्तु उतर दिशा, पूर्व दिशा और पश्चिम दिशा में भी जल का स्थान हो सकता है, परन्तु आग्नेय कोण में यदि जल का स्थान होगा तो पुत्र नाश, शत्रु भय और बाधा का सामना होता है, दक्षिण पश्चिम दिशा में जल का स्थान पुत्र की हानि,दक्षिण दिशा में पत्नी की हानि, वायव्य दिशा में शत्रु पीड़ा और घर का मध्य में धन का नाश होता है।

वास्तु शास्त्र में भूखंड के या भवन के दक्षिण और पश्चिम दिशा की और कोई नदी या नाला या कोई नहर भवन या भूखंड के समानंतर नहीं होनी चाहिए परन्तु यदि जल का बहाव पश्चिम से पूर्व की और हो या फिर दक्षिण से उतर की और तो उत्तम होता है, भवन में जल का भंडारण आग्नेय, दक्षिण पश्चिम, वायव्य कोण, दक्षिण दिशा में ना हो, जल भंडारण की सबसे उत्तम दिशा पूर्व, उत्तर या ईशान कोण है।

अग्नि कोण के गेट वाले घर :-

अग्नि कोण के गेट वाले घरों में और उत्तर की तरफ़ सीढियों वाले मकान कभी भी कर्जे से मुक्त नही हो पाते हैं। जिन घरों के दरवाजे नैऋत्य में होते हैं, और उनके नैऋत्य में ही अगर पानी के टेंक अन्डरग्राउंड बना दिये गये हैं, तो उस मकान में रहने वाले जीवन भर कोर्ट केस और सरकारी कर्जों से मुक्त नही हो पाते हैं। अक्सर इस दिशा के दरवाजे वालों के दो ही पुत्र होते हैं, जिनमें बडे पुत्र के कारण पूरे घर की सम्पत्ति का विनाश हो जाता है,और अंत में वह भी एक पुत्री के होने के बाद अपनी लीला किसी तामसी कारण से समाप्त कर लेता है।

ईशान दिशा :-

यदि ईशान क्षेत्र की उत्तरी या पूर्वी दीवार कटी हो, तो उस कटे हुए भाग पर एक बड़ा शीशा लगाएं। इससे भवन का ईशान क्षेत्र प्रतीकात्मक रूप से बढ़ जाता है। यदि ईशान कटा हो, अथवा किसी अन्य कोण की दिशा बढ़ी हो, तो किसी साधु पुरुष अथवा अपने गुरु या बृहस्पति ग्रह या फिर ब्रह्मा जी का कोई चित्र अथवा मूर्ति या कोई अन्य प्रतीक चिह्न ईशान में रखें। गुरु की सेवा करना सर्वोत्तम उपाय है। बृहस्पति ईशान के स्वामी और देवताओं के गुरु हैं। कटे ईशान के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए साधु पुरुषों को बेसन की बनी बर्फी या लड्डुओं का प्रसाद बांटना चाहिए। यह क्षेत्र जलकुंड, कुआं अथवा पेयजल के किसी अन्य स्रोत हेतु सर्वोत्तम स्थान है। यदि यहां जल हो, तो चीनी मिट्टी के एक पात्र में जल और तुलसीदल या फिर गुलदस्ता अथवा एक पात्र में फूलों की पंखुड़ियां और जल रखें। शुभ फल की प्राप्ति के लिए इस जल और फूलों को नित्य प्रति बदलते रहें। अपने शयन कक्ष की ईशान दिशा की दीवार पर भोजन की तलाश में उड़ते शुभ पक्षियों का एक सुंदर चित्र लगाएं। कमाने हेतु बाहर निकलने से हिचकने वाले लोगों पर इसका चमत्कारी प्रभाव होता है। यह अकर्मण्य लोगों में नवीन उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है। बर्फ से ढके कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ योगी की मुद्रा में बैठे महादेव शिव का ऐसा फोटो, चित्र अथवा मूर्ति स्थापित करें, जिसमें उनके भाल पर चंद्रमा हो और लंबी जटाओं से गंगा जी निकल रही हों।
ईशान में विधि पूर्वक बृहस्पति यंत्र की स्थापना करें।

पूर्व दिशा में दोष /बचाव के उपाय :-

* यदि भवन में पूर्व दिशा का स्थान ऊँचा हो, तो व्यक्ति का सारा जीवन आर्थिक अभावों, परेशानियों में ही व्यतीत होता रहेगा, और उसकी सन्तान अस्वस्थ, कमजोर स्मरणशक्ति वाली, पढाई-लिखाई में जी चुराने तथा पेट और यकृत के रोगों से पीडित रहेगी।

* यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान न हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर हो, तो परिवार के मुखिया को आँखों की बीमारी, स्नायु अथवा ह्रदय रोग की स्मस्या का सामना करना पडता है।

* घर के पूर्वी भाग में कूडा-कर्कट, गन्दगी एवं पत्थर, मिट्टी इत्यादि के ढेर हों, तो गृहस्वामिनी में गर्भहानि का सामना करना पडता है।

* भवन के पश्चिम में नीचा या रिक्त स्थान हो, तो गृहस्वामी यकृत, गले, गाल ब्लैडर इत्यादि किसी बीमारी से परिवार को मंझधार में ही छोडकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

* यदि पूर्व की दिवार पश्चिम दिशा की दिवार से अधिक ऊँची हो, तो संतान हानि का सामना करना पडता है।

* अगर पूर्व दिशा में शौचालय का निर्माण किया जाए, तो घर की बहू-बेटियाँ अवश्य अस्वस्थ रहेंगीं।

बचाव के उपाय:-

* पूर्व दिशा में पानी, पानी की टंकी, नल, हैंडापम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा।

* पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है, जो कि कालपुरूष के मुख का प्रतीक है, इसके लिए घर के मुखिया को चांदी पर बना ‘सूर्य यन्त्र’ हमेशा धारण करना चाहिए, और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज (झंडा) लगायें।

* पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें, धन और वंश की वृद्धि होगी, तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढेगी।

• दूध, दही, घी, सिरका, अचार का स्थान रसोई के बगल में होना चाहिए। श्रृंगार एवं औषधि सामग्री शयनकक्ष के बगल में होना चाहिए। विद्यार्थियों के पढ़ने का कमरा देवालय के बगल में होना चाहिए।

• घर के आस-पास बड़, पीपल, इमली, कैथ, नींबू, कांटे वाले एवं दूध वाले वृक्ष नहीं होना चाहिए। इस वृक्षों के घर के आस-पास होने से धन की हानि होती है।

• कुआं एवं जल का स्थान मुख्य द्वार से पूर्व ईशान, उत्तर अथवा पश्चिम में होने से धन प्राप्त होता है। सौभाग्य में बढ़ोतरी होती है।

• अग्निकोण में संतान हानि, दक्षिण में गृहिणी का नाश, नैऋत्य कोण में गृह मालिक का नाश एवं वायु कोण में भय, चिंता बनी रहती है।

• भवन में स्तंभ लगाने की आवश्यकता हो, तो स्तंभ सम संख्या में लगवाना चाहिए। इनकी संख्या यदि विषम हो, तो अशुभ फल देते है।

• पूर्ण रूप से उपरोक्त विधि को ध्यान में रखते हुए भवन निर्माण करने से घर में सुख-समृद्धि, यश, वैभव एवं शांति प्राप्त होती है।

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कार्तिक

कार्तिक मास का महत्व, कार्तिक में क्या करें, और क्या न करें?

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इस वर्ष 2018 में कार्तिक मास 23 अक्टूबर से आरम्भ हो रहा है। तथा कार्तिक पूर्णिमा 23 नवम्बर 2018 के दिन है। पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक मास के समान पुण्य प्रदायक कोई मास नहीं है, सतयुग के समान कोई युग नहीं है। वेदों के समान कोई शास्त्र नहीं, और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है। स्कन्द पुराण में भी कार्तिक मास को सबसे उत्तम मास माना गया है। इसी तरह सभी देवताओं में श्रीहरि, सभी तीर्थों में बद्रीनारायण को सबसे श्रेष्ठ माना है।

इस मास में ऐसा क्या किया जाता है, जिस से यह मास पुण्य प्रदायक है :-
कार्तिक मास में जो लोग संकल्प लेकर प्रतिदिन प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी तीर्थ स्थान, किसी नदी अथवा पोखर पर जाकर कार्तिक स्नान करते हैं, या घर में ही गंगाजल युक्त जल से स्नान करते हुए भगवान का ध्यान करते हैं, उन पर प्रभु प्रसन्न होते हैं। कार्तिक स्नान के पश्चात पहले भगवान विष्णु एवं शिव और बाद में सूर्य भगवान को अर्ध्य प्रदान करते हुए विधिपूर्वक अन्य दिव्यात्माओं को अर्ध्य देते हुए पितरों का तर्पण करना चाहिए। पितृ तर्पण के समय हाथ में तिल अवश्य लेने चाहिये क्योंकि मान्यता है कि जितने तिलों को हाथ में लेकर कोई अपने पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण करता है, उतने ही वर्षों तक उनके पितर स्वर्गलोक में वास करते हैं। इस मास अधिक से अधिक प्रभु नाम का चिंतन करना चाहिए।

स्नान के पश्चात नए एवं पवित्र वस्त्र धारण करें, तथा भगवान विष्णु जी का धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प एवं मौसम के फलों के साथ विधिवत सच्चे मन से पूजन करें, भगवान को मस्तक झुकाकर बारम्बार प्रणाम करते हुए किसी भी गलती के लिए क्षमा याचना करें। कार्तिक मास की कथा स्वयं सुनें तथा दूसरों को भी सुनाएं। कुछ लोग कार्तिक मास में व्रत करने का भी संकल्प करते हैं, तथा केवल फलाहार करते हैं, जबकि कुछ लोग पूरा मास एक समय भोजन करके कार्तिक मास के नियम का पालन करते हैं। इस मास में श्रीमद्भागवत कथा, श्री रामायण, श्रीमद्भगवदगीता, श्री विष्णुसहस्रनाम आदि स्रोत्रों का पाठ करना उत्तम है।

कार्तिक मास में दीपदान की महिमा :- वैसे तो भगवान के मंदिर में दीप दान करने वालों के घर सदा खुशहाल रहते हैं, परंतु कार्तिक मास में दीपदान की असीम महिमा है। इस मास में वैसे तो किसी भी देव मंदिर में जाकर रात्रि जागरण किया जा सकता है, परंतु यदि किसी कारण वश मंदिर में जाना सम्भव न हो तो किसी पीपल व वट वृक्ष के नीचे बैठकर अथवा तुलसी के पास दीपक जलाकर प्रभु नाम की महिमा का गुणगान किया जा सकता है। इस मास में भूमि शयन करना भी उत्तम है । पितरों के लिए आकाश में दीपदान करने की अत्यधिक महिमा है, जो लोग भगवान विष्णु के लिए आकाश दीप का दान करते हैं, उन्हें कभी क्रूर मुख वाले यमराज का दर्शन नहीं करना पड़ता, और जो लोग अपने पितरों के निमित्त आकाश में दीपदान करते हैं, उनके नरक में पड़े पितर भी उत्तम गति को प्राप्त करते हैं। जो लोग नदी किनारे, देवालय, सड़क के चौराहे पर दीपदान करते हैं, उन्हें सर्वतोमुखी लक्ष्मी प्राप्त होती है।

दान की महिमा :- कार्तिक मास में दान अति श्रेष्ठ कर्म है। स्कंदपुराण के अनुसार दानों में श्रेष्ठ कन्यादान है। कन्यादान से बड़ा विद्या दान, विद्यादान से बड़ा गौदान, गौदान से बड़ा अन्न दान माना गया है। अपनी सामर्थ्यानुसार धन, वस्त्र, कंबल, रजाई, जूता, गद्दा, छाता व किसी भी वस्तु का दान करना चाहिए तथा कार्तिक में केला और आंवले के फल का दान करना भी श्रेयस्कर है। कलियुग में कार्तिक मास को मोक्ष के साधन के रूप में दर्शाया गया है। पुराणों के मतानुसार इस मास में कार्तिक स्नान व दान चारों पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को देने वाला माना गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार नारायण ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने नारद को और नारद ने महाराज पृथु ने कार्तिक मास के सर्वगुणसंपन्न माहात्मय के संदर्भ में बताया गया है।

कार्तिक मास में जो कार्य प्रधान माने गए हैं :-
1- धर्म शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास में सबसे प्रधान कार्य दीपदान करना बताया गया है। इस मास में नदी, पोखर, तालाब आदि में दीपदान किया जाता है। इससे अतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है।
2- इस मास में तुलसी पूजन करने तथा सेवन करने का विशेष महत्व बताया गया है। वैसे तो हर मास में तुलसी का सेवन व आराधना करना श्रेयस्कर होता है, लेकिन कार्तिक में तुलसी पूजा का महत्व कई गुना माना गया है।
3- भूमि पर शयन करना कार्तिक मास का तीसरा प्रधान कार्य माना गया है। भूमि पर शयन करने से मन में सात्विकता का भाव आता है, तथा अन्य विकार भी समाप्त हो जाते हैं।
4- कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है।
5- कार्तिक मास में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई, बैंगन आदि का सेवन निषेध है।

कार्तिक व्रत के नियम :-
1- कार्तिक व्रती (कार्तिक मास में व्रत रखने वाला) को तामसिक एवं उत्तेजक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
2- किसी दूसरे के अन्न का भक्षण, किसी से द्रोह तथा परदेश गमन भी निषेध है।
3- दिन के चौथे पहर में एक समय पत्तल पर भोजन करना चाहिए।
4- कार्तिकव्रती को ब्रह्मचर्य का पालन करना तथा भूमि पर शयन करना आवश्यक होता है।
5- पूरे मास में केवल एक बार नरक चतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) को ही शरीर पर तेल लगाना चाहिए। शेष दिनों में तेल लगाना वर्जित है।
6- व्रती को लौकी, गाजर, कैथ, बैंगन आदि तथा बासी अन्न, पराया अन्न व दूषित अन्न नहीं खाना चाहिए।
7- व्रती को चाहिए कि वह तपस्वियों के समान व्यवहार करे। अर्थात कम बोले, किसी की निंदा या विवाद न करे, मन पर संयम रखें आदि !

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दशहरा और शमी

दशहरा और शमी, का सम्बन्ध उत्तर भारत में प्रचलित है:-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

उत्तर भारत में यह विश्वास किया जाता है, की दशहरा के दिन शमी का पौधा घर पर लायें, उसको खाद-पानी देकर उसकी सेवा करें, और हर शनिवार को शाम में तिल तेल का दीपक शमी के पौधे के नीचे जलायें, ऐसा करने से जीवन में कभी धन की कमी नहीं होगी, तथा हर छेत्र में सफलता मिलेगी, दशहरा के दिन माता के मंदिर में लाल कपड़ा या लाल चुनरी भी अर्पित करें, या मंदिर के बाहर बैठे निर्धन को दान करें, तथा मंदिर में प्रकाश दान करें तो जीवन में कभी धन का अभाव नहीं रहेगा। शमी को खेजड़ी, जण्ड या सांगरी नाम से भी जाना जाता है, मूलतः यह रेगिस्तान में पाया जाने वाला वृक्ष है, जो थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों पर भी पाया जाता है। अंग्रेजी में यह प्रोसोपिस सिनेरेरिया नाम से जाना जाता है

विजया-दशमी या दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की प्रथा है। कहा जाता है ये भगवान श्री राम का प्रिय वृक्ष था और लंका पर आक्रमण से पहले उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा कर के उससे विजयी होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था। आज भी कई जगहों पर लोग रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते धन-संपदा के प्रतीक के रूप में एक दूसरे को बाँटते हैं, और उनके कार्यों में सफलता मिलने कि कामना करते हैं। शमी वृक्ष का वर्णन महाभारत काल में भी मिलता है, अपने 12 वर्ष के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने सारे अस्त्र इसी पेड़ पर छुपाये थे जिसमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी था। कुरुक्षेत्र में कौरवों के साथ युद्ध के लिये जाने से पहले भी पांडवों ने शमी के वृक्ष की पूजा की थी, और उससे शक्ति और विजय की कामना की थी, तब से ही ये माना जाने लगा जो भी इस वृक्ष कि पूजा करता है, उसे शक्ति और विजय मिलती है

शमी शमयते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया । तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता

हे शमी, आप पापों का क्षय करने वाली और दुश्मनों को पराजित करने वाली हैं। आप अर्जुन का धनुष धारण करने वाली हैं, और श्री राम को प्रिय हैं, जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा की थी, मैं भी करता हूँ। मेरी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर करके उसे सुखमय बना दीजिये, एक और कथा के अनुसार कवि कालिदास ने शमी के वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या कर के ही ज्ञान कि प्राप्ति की थी, शमी वृक्ष की लकड़ी शनि ग्रह की शांति के लिए किसे जाने वाले यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। शनिवार को शनि शांति के लिए शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है। शनि देव को शान्त रखने के लिये शमी वृक्ष की पूजा की जाती है, शमी को गणेश जी का प्रिय वृक्ष भी माना जाता है, और इसकी पत्तियाँ गणेश जी की पूजा में भी चढ़ाई जाती हैं। बिहार और झारखण्ड समेत आसपास के कई राज्यों में इस वृक्ष की पूजा की जाती है, और इसे लगभग हर घर के दरवाज़े के दाहिनी ओर लगा देखा जा सकता है। किसी भी काम पर जाने से पहले इसके दर्शन को शुभ मना जाता है। आश्विन शुक्ल दशमी को विजय दशमी कहा जाता है, विजय के संदर्भ में दशहरा के दिन शास्त्रों में बताया गया है, की विजय प्राप्ति के लिए शस्त्र (हथियार) की पूजा अवश्य करें

आज के दिन नवीन हथियार खरीद कर घर की दक्षिण दिशा में टांगना चाहिए, साथ ही शमी और अपराजिता वृक्ष की पूजा करें और दोनों की जड़ दाहिने हाँथ में बांधने से समाज में यश और कीर्ति बढती है, क्यों‌ की दशहरा के दिन ही नौ दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा-आराधना करने के बाद भगवान श्री राम ने अभिमानी रावण का वध कर के इस संसार को असत्य पर सत्य की जीत का सन्देश दिया था

शमीपूजन:
निम्न श्लोकोंसे शमी की प्रार्थना की जाती है :-
शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका । धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी ।। करिष्यमाणयात्रायां यथाकाल सुखं मया।तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वंभवश्रीरामपूजिते।।

श्लोक के उच्चारण के साथ ही मानसिक रूप से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि ‘शमी सभी पापों को नष्ट करती है। शमी शत्रुओं का समूल विनाश करती है। शमी के कांटे हत्या इत्यादि के पापों से भी रक्षा करते हैं। अर्जुन के धनुष को धारण करने वाली और भगवान श्रीराम को भी प्रिय लगने वाली शमी मेरा कल्याण करे।

अपराजिता पूजन मंत्र :- हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनक मेखला। अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम।।

पूजा के समय वृक्ष के नीचे चावल, सुपारी हल्दी की गांठ और मुद्रा रखते हैं । फिर वृक्ष की प्रदक्षिणा कर उसके मूल (जड़) के पास की थोड़ी मिट्टी व उस वृक्ष के पत्ते घर लाते हैं । ऐसा जो आज के दिन करता है, यह साल भर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। अपराजिता देवी सकल सिद्धियों की प्रदात्री साक्षात् माता दुर्गा का ही अवतार हैं। यात्रा प्रारंभ करने के समय माता अपराजिता की यह स्तुति अनिवार्य रूप से करनी चाहिए, जिससे यात्रा में कोई विघ्न उपस्थित नहीं होता।

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बगलामुखी साधना

बगलामुखी दश महाविद्याओं में ये एक अतिउग्र महाविद्या है, यह ब्रह्मास्त्रविद्या मानी जाती है, इस साधना के साधक मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन एवं विद्वेषण प्रयोग करने में समर्थ होते हैं, यह तंत्र विद्या प्रचण्ड तूफान की तरह शत्रु का मान-मर्दन करने में पूरी तरह से सक्षम है:-

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भारतीय तंत्र-शास्त्र अपने आप में अद्भुत आश्चर्य जनक एवं रहस्यमय रहा है। ज्यों-ज्यों हम इसके रहस्य की गहराई में जाते हैं। त्यों-त्यों हमें विलक्षण अनुभव होते हैं। कुछ तंत्र-मंत्र तो बलशाली एवं शीघ्र फलदायी हैं, ऐसे ही मंत्रों में एक मंत्र है – बगलामुखी मंत्र यह मंत्र तो प्रचण्ड तूफान से भी टक्कर लेने में समर्थ है, इसी लिए इस मंत्र विद्या (साधना) को ब्रह्मास्त्रविद्या कहा गया है। एक तरफ जहाँ यह मंत्र शीघ्र ही सफलता दायक है, वहीं दूसरी ओर विशेष अनुष्ठान एवं मंत्र जप के द्वारा जो बगलामुखी यंत्र सिद्ध किया जाता है, वह भी तुरन्त कार्य सिद्ध में सहायता प्रदान करता है। बहुत से तांत्रिक तो यह कहते हैं कि पूरे विश्व की ताकत भी इस मंत्र से टक्कर लेने में असमर्थ है। मंत्रमहाणर्व में इसके बारे में लिखा है:-

बृह्मस्त्रं च प्रवक्ष्यामि स्दयः प्रत्यय कारण्।
मस्य स्मरणमात्रेण पवनोडपि स्थिरावते।।

इस मंत्र को सिद्ध करने के बाद मात्र इच्छा शक्ति से ही प्रचण्ड पवन भी स्थिर हो जाती है। व्यक्ति के घर में इस मंत्र से सिद्ध यंत्र हो, या फिर जिस व्यक्ति ने अपनी भुजा पर इस यंत्र को बाँध रखा हो, उस की कभी भी शत्रु हानि नहीं कर सकते। अनेक तांत्रिकों का मत है कि आज के युग में जब पग-पग पर शत्रु हावी होने की चेष्टा करते हैं, और इस प्रकार से चारों तरफ शत्रु नीचा दिखाने का प्रयत्न करते हैैं, तब प्रत्येक उन्नति चाहने वाले व्यक्ति के लिये यह तांत्रिक साधना या यह यंत्र धारण करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य समझा जा सकता है। सारे शत्रु निवारण यंत्रों में बगलामुखी यंत्र सर्वश्रेष्ठ है यह सिद्ध तांत्रिक यंत्र अद्भुत व प्रभावशाली है, तथा किसी भी प्रकार के मुकद्दमें में सफलता देने में सहायक है। यह कह सकते हैं कि यह सिद्ध यंत्र शत्रुओं का मान-मर्दन करने में पूरी तरह से सक्षम है। जो अपने जीवन में बिना किसी शत्रुबाधा के उन्नति चाहता है, प्रगति से सर्वाेच्य शिखर पर पहुँचना चाहता है, उसके लिये बगलामुखी साधना आवश्यक है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस यंत्र का उपयोग जहाँ हिन्दू राजाओं ने अपने शत्रु के मर्दन के लिये किया था, वहीं कुछ विदेशी शासकों ने भी इसका प्रयोग कर अनेक कार्यों में सफलता प्राप्त की। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने भी अपने शत्रुओं को परास्त करने के लिये बगलामुखी साधना कराई और सफलता प्राप्त की हिन्दू शासकों में तो चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, समुंद्रगुप्त ने भी बगलामुखी साधना अपने तांत्रिकों से कराकर शत्रुओं पर विजय एवं सफलता प्राप्त की।

इस साधना से मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन एवं विद्वेषण प्रयोग भली-भाँति सफलता पूर्वक सम्पन्न किये जाते हैं। जहाँ तक मेरा अनुभव है, उस मंत्र की साधना से बांझ स्त्री को भी मनचाही संतान प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है। इसके साथ ही साथ शत्रुओं का मान मर्दन कर अपार विजय प्राप्त की जा सकती है। दरिद्र व्यक्ति को सम्पन्न बनाने के लिये मार्ग प्रशस्त किय जा सकता है, और प्रतिकूल मुकद्दमें में भी पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है। परन्तु भूल करके भी सामान्य व्यक्ति को इस प्रकार की साधना में नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि यह साधना तलवार की धार के समान है। अतः यदि थोड़ी सी भी गलती हो जाये तो साधना करने वाला व्यक्ति ही कष्ट में आ जाता है, मेरे अपने अनुभव से तो यही कहूंगा कि बिना पूरा ज्ञान प्राप्त किये जिन लोगों ने यह साधना को प्रारम्भ किया वे साधना काल में ही पागल होते देखे गये हैं, और बड़ी कठिनाई से उन्हें सामान्य अवस्था में लाया गया। अतः सामान्य पण्डित भी इस प्रकार की साधना करने में हिचकिचाते हैं, जो भी व्यक्ति इस साधना को सम्पन्न करना चाहे, उन्हें चाहिये कि वह योग्य गुरू के निर्देशन में ही कार्य सम्पन्न करें, और यदि यंत्र सिद्धकर यंत्र धारण करना चाहे तो उन्हें चाहिये कि वह बगलामुखी सिद्धि किसे हुए विद्वान की देखरेख में यह साधना सम्पन्न करें। साधना काल में प्रत्येक साधक को दृढ़ता के साथ इनसे सम्बंधित नियमों का पालन करना चाहिये।

साधना काल में ध्यान रखने योग्य बातें:-
1. बगलामुखी साधना में साधक को पूर्ण पवित्रता के साथ मंत्र जप करना चाहिये और उसे पूरी तरह ब्रह्माचर्य व्रत का पालन करना चाहिये।

2. साधक को पीले वस्त्र धारण करना चाहिये, धोती तथा ऊपर ओढ़ने वाली चादर दोनों ही पीले रंग में रंगी हो।

3. साधक एक समय में भोजन करें और भोजन में बेसन से बनी हुई वस्तु का प्रयोग अवश्य करें।

4. साधक को दिन में नींद नहीं लेना चाहिये न व्यर्थ की बातचीत करें, और न किसी स्त्री से किसी प्रकार का सम्पर्क स्थापित करें।

5. साधना काल में साधक बगलामुखी यंत्र बनाकर उसे स्थापित कर उसके मंत्र जाप करें।

6. साधना काल में साधक बाल न कटवायें और न क्षौर कर्म ही करें।

7. यह साधना या मंत्र जाप रात्रि को होता है। अतः यह साधना रात के समय 10 बजे से प्रातः 4 बजे के बीच करें, परन्तु जो साधना सिद्धि कर चुके हैं, वे साधक या ब्राह्मण दिन को भी मंत्र जाप कर सकते हैं।

8. साधना काल में पीली गौ का घी प्रयोग में लें तथा दीपक में जिस रूई का प्रयोग करें उसे पहले पीले रंग में रंग कर सुखा लें और उसके बाद ही उस रूई को दीपक के लिये प्रयोग करें।

9. साधना में 36 अक्षर वाला मंत्र प्रयोग करना ही उचित है और यही मंत्र शीघ्र सफलता देने में सहायक है।

10. साधना घर के एकांत कमरे में देवी मंदिर में, पर्वत शिखर पर शिवालय में या गुरू के समीप बैठकर की जानी चाहिये।

11. इसके मारण, मोहन वंशीकरण, उच्चाटन कई प्रयोग हैं। अतः गुरू से आज्ञा प्राप्त कर उसके बताये हुये रास्ते से ही साधना करना चाहिये।

13. मोक्ष प्राप्ति के लिये क्रोध का स्तम्भन आवश्यक है, और यह इस प्रयोग से संभव है। अतः मोक्ष प्राप्ति के लिये भी इसका प्रयोग साधक और वैष्णव लोग करते हैं।

14. साधना में कुलाचार का पूजन, वीर साधना, चक्रानुष्ठान अवश्य ही करना चाहिये जिससे कि कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हो सकें। महान शत्रुओं पर विजय आसुरी तत्वों पर विजय, शत्रुभय निवारण और शत्रु संहारक तथा राजकीय महाभय, कोर्ट केस और बंधन से मुक्ति के लिये यह अमोघ और शत्रुदमन ब्रह्मास्त्रविद्या कवच है।

इस मंत्र से सिद्ध साधक को बगलामुखी महायंत्र को सोने पर उत्कीर्ण करवा कर या भोजपत्र के ऊपर केशर, अष्टगंध से लिखकर प्रतिष्ठा पुरश्चरण विधान करके प्राण-प्रतिष्ठा पूर्वक सोने के कवच में बंद कर देना चाहिए, बाद में ब्रह्मास्त्र बगलामुखी सवालक्ष मंत्र से सिद्ध करके धारण करने से शत्रु का दमन होता है। राजकीय केस में भी सफलता मिलती है। इस ब्रह्मास्त्र प्रयोग से सर्वकार्य में विजय, यश प्राप्त होता है। तथा मारण-मोहन, वशीकरण, स्तंभन, उच्चाटन, मूठ-चोट आदि तमाम शत्रु द्वारा उत्पन्न संकट दूर होते हैं। भूत-प्रेतादि महाभय नष्ट होते हैं, तथा सर्व प्रकार से सर्व दिशाओं से विजय प्राप्त होती है। ऐसा अमोघ ब्रह्मास्त्रविद्या कवच जो जगत में सर्वोपरि है, उससे ऊँचा कोई यंत्र, मंत्र या तंत्र जगत में नहीं है।

श्री ब्रह्मास्त्र महाविद्या मंत्र – तंत्र शास्त्र में दशमहाविद्या की महिमा अतिविशिष्ठ है। उसमें सर्वोपरि बगला उपासना जो सर्वसिद्ध है। परन्तु वह गुरूगम्य होने से योग्य गुरू के पास मंत्र दीक्षा ग्रहण करने के बाद उपासना करने से सिद्धि प्राप्त होती है। पुरश्चरण सिद्धि करने से या योग्य विद्वान के पास करवाने से सिद्ध होता है। क्योंकि क्रिया शुद्धि के बिना मंत्र सिद्धि नहीं होती है।

पुरश्चरण:-

पीताम्बरधरो भूत्वा पूर्वाशाभिमुखः स्थितः। लक्षमेकं जपेन्मत्रं हरिद्रा ग्रन्थि मालया।।
ब्रह्मचर्य स्तो नित्यं प्रयतो ध्यान तत्परः। पियंगुकुसमे नापि पीतयपुष्येन होमयेत्।।

बगलामुखी पुरश्चरण के लिये एकान्त जगह, जमीन गाय के गोबर से लीपी हुई, पीला आसन, पीला पीताम्बर, पीली हल्दी की माला, पीला पात्र, सुवर्ण प्रतिमा यंत्र तथा पीले फूल, केसर, हल्दी, अष्टगंध से अर्चन फिर अंगन्यास, करन्यास आदि करके आह्वान ध्यान फिर सवालक्ष मंत्र अनुष्ठान, दशांश पीत पुष्प से हवन, तर्पण, मार्जन, ब्रह्मभोजन, कुमारी पूजन, भोजन से अनुष्ठान सिद्ध होता है।

श्री बगलामुखी मंत्र –
ॐ हृीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदंस्तम्भ्यजिह्वां। कीलय बुद्धिं विनाशाय हृीं ऊँ स्वाहा।।

यह महामंत्र मूल मंत्र है जिसका पुरश्चरण करने से पहले निम्न मंत्रों से पूजा करनी चाहिये।

बगलामुखी गायत्री मंत्र –
ॐ बगलामुख्यैच विद्नहे स्तम्भिन्यै च धीमहि तन्नौदेवी प्रचोदयात्।।

बगलामुखी देवी यंत्र मूर्ति, न्यास, प्राण प्रतिष्ठा, महापूजन करके निम्न मंत्र से ध्यान करके पुरश्चरण करना चाहिये।

विनियोग:-
ॐ अस्य श्री बगलामुखी मन्त्रस्य नारद ऋषिः त्रिष्टुप छन्दः बगलामुखी देवता हृीं बीजम स्वाहा शक्तिः ममाअभीष्ट सिध्यर्थेजपे विनियोगः।

ध्यानम:-
मध्ये सुधाब्धिमणि मण्डय रतन्वेधां। सिंहा सनोपरि गतां पर पीतवर्णाम।।
पीताम्बरा भरण-मालय- विभूषितांगी। देवी स्मरामि धृत-मुदगर वैरि जिह्वाम।।
जिह्यग्र मादाय करेण देवी वामेन शत्रुन परिपीडयन्तीम्। गदाभिधातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढयां द्विभुजां नमामि।।

उपरोक्त ध्यानादि के बाद पूर्व दिशा में मुख रखकर सरसों तेल का दीपक जलाकर कलश स्नापनादि करके एक ही आसन पर नियमित रूप से हर रोज 41 माला 31 दिन तक करें। और सवालक्ष पूर्ण करके दशांश क्रम से महापुरश्चरण सिद्ध होता है, तथा बगलामुखी कवच ब्रह्मस्त्र गले में या भुजा में धारण करने से त्रैलोक्य विजयी भवेत् हर जगह से विजय प्राप्त होती है।

बगला साधना से किस-किस प्रकार की समस्या का समाधान संभव है :-
बगलामुखी उपासना से मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, अनिष्ट ग्रहों के आवरणों से मुक्ति, मन इच्छित व्यक्ति का मिलन, शत्रु पर विजय, कोर्ट केस में विजय, बंधन, जेल से मुक्ति होती है, तथा शत्रु के अलावा पर बुद्धि, देव, दानव, सर्प और हिंसक प्राणियों पर भी स्तंभन होता है।

देवी के प्रमुख मंदिर:- बगलामुखी का मन्दिर दतिया गोहाटी आसाम में है। गोहाटी जयपुर से डायरेक्ट वायुयान द्वारा जाया जा सकता है।

बगलामुखी साधना में प्रयोग होने वाली सामग्री :-
आकर्षण:- शहद, घी, मिश्री के साथ नमक का हवन करने से सभी का आकर्षण होता है।

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कुबेर साधना

इस वर्ष दीपावली पर्व व धन त्रयोदशी के पर्व पर आप भी करें – धन कुबेर साधना।

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवलोक के धनाध्यक्ष कुबेर हैं। कुबेर न केवल देवताओं के धनाध्यक्ष हैं, बल्कि समस्त यक्षों, गुह्यकों, किन्नरों और मानवों के अधिपति भी कहे गये हैं। ये नवनिधियों में पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और वर्चस् के स्वामी भी हैं। जब एक निधि भी अनन्त वैभवों को देने वाली मानी गयी है, और धनाध्यक्ष कुबेर तो गुप्त या प्रकट समस्त संसार के वैभवों के अधिष्ठाता देव हैं। यह देव उत्तर दिशा के अधिपति हैं, इसी लिये प्रायः सभी यज्ञ, पूजा उत्सवों तथा दस दिक्पालों के पूजन में उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में कुबेर का पूजन किया जाता है।

धनकुबेर और धन त्रयोदशी :- धन त्रयोदशी तथा दीपावली के दिन कुबेर की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। देवताओं के धनाध्यक्ष महाराज कुबेर राजाओं के भी अधिपति हैं, क्योकि सभी निधियों, धनों के स्वामी यही देव हैं, अतः सभी प्रकार की निधियों या सुख, वैभव तथा वर्चस्व की कामना पूर्ति, फल की वृष्टि करने में वैश्रवण कुबेर समर्थ हैं। सारांश में कहा जा सकता है कि धनाध्यक्ष कुबेर की साधना ध्यान करने से मनुष्य का दुःख-दारिद्रय दूर होता है और अनन्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में गहरा विश्वास रखने वालों का अटल विश्वास है कि शिव के अभिन्न मित्र होने से कुबेर अपने भक्त की सभी विपत्तियों से रक्षा करते हैं, और उनकी कृपा से साधक में आध्यात्मिक ज्ञान, वैराग्य आदि के साथ-साथ उदारता, सौम्यता, शांति तथा तृप्ति आदि सात्त्विक गुण भी स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाते हैं।

राजाधिराज कुबेर की साधना-
इस वर्ष धन त्रयोदशी विशेष योगों के साथ उदित हो रही है। आगामी पंक्तियों में एक अत्यन्त गोपनीय और दुर्लभ प्रयोग दिया जा रहा है जिसे धन त्रयोदशी के दिन रात्रि में ही सम्पन्न किया जाना है। इस ‘धन कुबेर साधना’ को जिस-जिस ने भी सम्पन्न किया है, उन सभी को अनायास धन प्राप्त हुआ है। यही नहीं अपितु इसके फलस्वरूप रोग, कर्ज़ व मुकद्दमें की परेशानी, विवाह बाधा, भवन का आभाव, पारिवारिक झंझट, ग्रह बाधा और आर्थिक आभाव भी दूर हुए हैं, और आज वे सभी साधक समाज में सम्माननीय तथा सम्पन्न जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस साधना को सम्पन्न करने वाले प्रत्येक साधक का यह अनुभव है, कि इस साधना को सम्पन्न करने से आर्थिक बाधा तो रहती ही नहीं, और घर की गरीबी पूर्ण रूप से लुप्त हो जाती है। इस साधना को सम्पन्न करने से धन, वैभव, सुख तथा भाग्योदय का योग शीघ्र प्राप्त होने लगता है। ‘आप का भविष्य’ के पाठकों के लिए और विशेष कर साधकों के लिए यह गोपनीय साधना प्रयोग आगे की पक्तियों में दिया जा रहा है, मेरा पूर्ण विश्वास है कि इस साधना को सम्पन्न कर निश्चय ही आप साधक मेरे कथन से सहमत होगें।

महाराज वैश्रवण कुबेर की उपासना से संबंधित मंत्र, यंत्र, ध्यान एवं उपासना आदि की सारी प्रक्रियायें श्रीविद्यार्णव, मंत्रमहार्णव, मंत्रमहोदधि, श्रीतत्त्वनिधि तथा विष्णुधर्मोत्तरादि पुराणों में विस्तार से निर्दिष्ट हैं। तदनुसार इनके अष्टाक्षर, षोडशाक्षर तथा पंचत्रिंशदक्षरात्मक छोटे-बड़े अनेक मंत्र प्राप्त होते हैं। मंत्रों के अलग-अलग ध्यान भी निर्दिष्ट हैं। मंत्र साधना में गहन रूची रखने वाले साधक उपरोक्त ग्रन्थों का अवलोकन करें। यहाँ पाठकों के लिये धनाध्यक्ष कुबेर की एक सहज व सरल साधना पद्धति दी जा रही है। यह साधना धनत्रयोदशी के दिन की जानी चाहिये यदि कोई साधक इस साधना को दीपावली की रात्रि में करना चाहे तो उस महापर्व पर भी यह साधना कर सकते हैं। अथवा दोनो ही दिन (धनत्रयोदशी तथा दीपावली) यह साधना सम्पन्न की जा सकती है। इस वर्ष धनत्रयोदशी 5 नवम्बर 2018 तथा दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है। यह साधना स्थिर लग्न में ही सम्पन्न की जाती है। क्योंकि स्थिर लग्न में जिस कार्य को किया जाता है वह स्थिरता को प्राप्त होता है, और लक्ष्मी को तो सभी स्थिर ही रखना चाहते हैं। अतः यह साधना तो अवश्य स्थिर लग्न में ही करनी चाहिये। ‘स्थिर लग्न’ इन दिनों में वृष तथा सिंह लग्न ही पढ रही हैं। वृषभ लग्न 5 नवम्बर 2018 धनत्रयोदशी के दिन सांयकाल 18 बजकर 05 मिनट से रात्रि 20 बजकर 00 मिनट तक रहेगी। तथा सिंह लग्न मध्य रात्रि में ठीक 24 बजकर 35 मिनट से 02 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। इसी प्रकार दीपावली 7 नवम्बर 2018 के दिन वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। तथा सिंह लग्न 7 नवम्बर की मध्य रात्रि को 00 बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। इस साधना के लिये यह स्थिर लग्न का मुहूर्त सर्वोत्तम महूर्त माना गया है। इस दिन स्थिर लग्न में शुद्ध रजत (चांदी) पर निर्मित कुबेर यंत्र तथा जप के लिये कमलबीज की 108 दाने की माला का प्रयोग किया जाना चाहिये। इसमें भी कुबेर यंत्र विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठित होना आवश्यक है, तथा माला नई व शुद्ध होनी चाहिये।

साधना पद्धति:- धनत्रयोदशी की रात्रि में उत्तर दिशा की ओर मुख करके पुरूष साधक पीले वस्त्र तथा महिलायें पीली साड़ी पहनकर बैठें सामने एक लकड़ी के पटरे पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर प्राण प्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र स्थापित करें और साथ ही शुद्ध घी का दीपक जलाकर पंचोपचार पूजा करें मिठाई का भोग लगावें तथा विनियोगादि क्रिया करके 11 माला कमलबीज की माला से कुबेर मंत्र का जप करें। जप सम्पूर्ण होने पर प्रसादरूप में मिठाई का परिजनों को वितरण करें और फिर रात्रि में उसी पूजा स्थल में ही निद्रा विश्राम करें। प्रातः शेष फूलादि सामग्री जल में विसर्जित कर दें तथा शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण श्री कुबेर यंत्र को पीले आसन सहित अपनी तिजोरी कैश बाॅक्स या अलमारी अथवा संदूक में रख दें। तथा कमलबीज की जप माला को गले में धारण करें।

विनियोग:-
सर्वप्रथम हाथ में जल लेकर निम्नलिखित विनियोग करें-
अस्य श्रीकुबेरमंत्रस्य विश्रवा ऋषिः बृहती छन्दः धनेश्वरः कुबेरो देवता ममाभीष्टसिद्धयथे जपे विनियोगः।

करन्यासः-
विनियोग के उपरांत करन्यास करें-
यक्षाय अंगुष्ठाभ्यां नमः।
कुबेराय तर्जनीभ्यां नमः।
वैश्रवणाय मध्यमाभ्यां नमः।
धनधान्याधिपतये अनामिकाभ्यां नमः।
धनधान्य समृद्धिं में कनिष्ठकाभ्यां नमः।
देहि दापय स्वाहा करतल करपृष्ठाभ्यां नमः।

षडंगन्यासः-
करन्यास के उपरांत षडंगन्यास करें-
यक्षाय हृदयाय नमः।
कुबेराय शिरसे स्वाहा।
वैश्रवणाय शिखायै वषट्।
धनधान्याधिपतये कवचाय हुम्।
धनधान्य समृद्धि में नेत्रत्रयाय वौषट्।
देहि दापय स्वाहा अस्त्राय फट्।

कुबेर का ध्यानः-
इनके मुख्य ध्यान श्लोक में इन्हें मनुष्यों के द्वारा पालकी पर अथवा श्रेष्ठ पुष्पक विमान पर विराजित दिखाया गया है। इनका वर्ण गारुडमणि या गरुडरत्न के समान दीप्तिमान् पीतवर्णयुक्त बतलाया गया है, और समस्त निधियां इनके साथ मूर्तिमान् होकर इनके पार्श्रवभाग में निर्दिष्ट हैं। ये किरीट मुकुटादि आभूषणों से विभूषित हैं। इनके एक हाथ में श्रेष्ठ गदा तथा दूसरे हाथ में धन प्रदान करने की वरमुद्रा सुशोभित है। ये उन्नत उदरयुक्त स्थूल शरीर वाले हैं। ऐसे भगवान् शिव के परम सुहृद् भगवान् कुबेर का ध्यान करना चाहिए-

मनुजवाह्यविमानवरस्थितं गरुडरत्ननिभं निधिनायकम्।
शिवसखं कमुकुरादिविभूषितं वरगदे दधतं भज तुन्दिलम्।।

सम्पन्नता के लिये कुबेर मंत्र-
यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय स्वाहा।

वैसे तो इस मंत्र की जप संख्या एक लक्ष (एक लाख) कही गयी है। परंतु धनत्रयोदशी अथवा दीपावली की रात्रि में जितना हो सके विधि-विधान से इस मंत्र का जप करना ही पर्याप्त होता है। मंत्र का जप सम्पन्न होने पर तिल एवं शुद्ध घी से दशांश हवन करना चाहिये। यह साधना कार्तिक कृष्ण 13 अर्थात् धन त्रयोदशी पर की जाती है, पूरे भारतवर्ष के लोग धन त्रयोदशी के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ महालक्ष्मी तथा आरोग्य प्रदान करने वाले देव धनवंतरि की पूजा-आराधना एवं साधना करते हैं, और सुख संपदा के अभिलाषी तो इस दिन कुछ विशेष प्रयोग सम्पन्न करते हैं जिससे कि अगले पूरे वर्ष तक घर के सभी सदस्य प्रसन्न व निरोगी रहें, और उनके घर में श्रीलक्ष्मी का निवास और प्रसन्नता बनी रहे।

साधना कब सम्पन्न करें?-
इस साधना या प्रयोग को केवल धन त्रयोदशी की रात्रि में ही सम्पन्न किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त किसी भी मुहूर्त में नहीं सम्पन्न किया जा सकता है। यह केवल एक रात्रि की साधना है और इस साधना को सम्पन्न करने से साधक का धनाभाव दूर होकर सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।

अनुष्ठान विधि-
सबसे पहले साधक पूजा स्थान में पीला रेशमी आसन बिछा कर उत्तर दिशा की ओर मुख कर के बैठ जाये और पूजा तथा साधना सामग्री की व्यवस्था पहले से ही कर लें। पूजा सामग्री में- 1. जल के लिये ताम्र पात्र, 2. गंगाजल या गुलाब जल, 3. दीपक के लिये शुद्ध घी, 4. प्रसाद के लिये 100 ग्रा. बताशे, 5. सफेद गुलाब के 4-5 पुष्प तथा पीले पुष्पों की दो माला, 6. नैवेद्य (मिठाई), 7. गूगल का धूप या अगरबत्ती, 8. दीपक, 9. पानी वाला नारियल, 10. पाँच प्रकार के फल, 11. रोली, 12. कलावा, 13. ग्यारह साबुत सुपारी तथा 14. पांच पान के साबुत डन्डी वाले पत्ते। साधक को यह पूजन सामग्री पूजा स्थान में एक थाल में स्वास्तिक बनाकर रख लेनी चाहिये। साथ ही साधना हेतु प्रमुख रूप से श्री शुद्ध चांदी पर बना और प्राणप्रतिष्ठित ‘कुबेर यंत्र’ तथा शुद्ध अष्टगन्ध को भी किसी प्रतिष्ठित संस्थान से मंगवाकर पहले ही रख लेना चाहिए। इसके अलावा साधक को चाहिये, धनत्रयोदशी वाले दिन सात्विक आचार विहार करें, ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करें, दिन में एक-दो बार फलाहार या दुग्धाहार करें तथा रात्रि में साधना के उपरांत भूमि शयन करें। इसके अतिरिक्त इस बात का पूरा ध्यान रखें कि इस प्रयोग या अनुष्ठान की किसी से चर्चा न की जाये अर्थात् इसे गोपनीय ही रखें।

श्री कुबेर यंत्र की विशेषता –
इस यंत्र को भली प्रकार से अष्टगंध के द्वारा आलेपित करके इस के बाद इस यंत्र के ऊपर एक सुपारी स्थापित कर दें, यह यंत्र रजत-पत्र (चांदी) पर अंकित होता है यह विशेष रूप से ध्यान में रखें, और फिर इस यंत्र को प्राण प्रतिष्ठित अवश्य किया गया हो। तभी इस का चमत्कारी प्रभाव देखने में आता है। सही विधि-विधान से सिद्ध किया गया श्री कुबेर यंत्र दुर्लभ होता है। और सिद्ध होने के बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए यह यंत्र एक ‘सौभाग्यशाली धरोहर’ बना रहता है। इस यंत्र को सिद्ध करने के उपरांत साधक को इसे शुद्ध पीले रेशमी कपडे में लपेटकर ऊपर कलावा बांधकर अपनी तिजोरी अथवा कैश बाॅक्स मे रखना चाहियेे। कभी भी इस का प्रदर्शन किसी के सामने न करें। प्रदर्शन करने से इसकी शक्ति क्षीण होती है। यदि ठीक प्रकार से सिद्ध करके रखा रहेगा तभी यह अपने आप में पूर्ण भाग्योदय कारक, धनप्रदायक तथा सौभाग्यशाली प्रभाव प्रकट करेगा। शास्त्रों में वर्णित इस प्रकार के यंत्र को आप किसी सिद्ध पुरूष से भी प्राप्त कर सकते हैं। आप यदि चाहते हैं तो समय रहते गुरूजी से भी सिद्ध करके मंगवा सकते हैं, इसके लिए shukracharya कार्यालय में पहले से अपना आर्डर बुक करवा सकते हैं।

प्रयोग विधि-
इस वर्ष 2018 में धन त्रयोदशी 5 अक्तूबर 2018 सोमवार के दिन है। सोमवार की रात्रि में साधक स्नान कर पीली धोती पहन कर रात्रि सूर्यास्त से 2 घन्टे पश्चात् उत्तर दिशा की ओर मुख करके शुद्ध रेशमी आसन पर बैठ जायें और सामने एक कुबेर देवता का चित्र तथा एक श्री कुबेर यंत्र जो कि शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण किया गया हो, तथा धन कुबेर के मंत्र से अभिमंत्रित किया गया हो सामने लकड़ी के एक बाजोट पर स्थापित कर लें। स्थापित करने से पहले उस बजोट पर पीला रेशमी कपड़ा अवश्य बिछा दें। इसके ऊपर एक थाली रखें जो कि स्टील की न हो, चांदी की या पीतल की हो, उस थाली के बीचो-बीच रोली से स्वास्तिक बनाकर स्वास्तिक के बीचो-बीच थोड़े चावल रखें उनके उपर एक साबुत सुपारी जिस पर पहले कलावा लपेट लें। फिर इस थाली के एक भाग में अष्टगन्ध, अनार की लकड़ी से बनी कलम रखें। अनार की लकड़ी का प्रबन्ध पहले से ही करके रखना चाहिये। इसके बाद फूल, अक्षत्, कलावा, रोली, पान के पत्ते साबुत सुपारी, तथा थोड़ी मिठाई भी रखें। कुबेर देवता के चित्र तथा यंत्र को पुष्प अर्पित करें, पुष्प माला पहिनायें सामने एक छोटी स्टील की प्लेट में धूप तथा दीपक लगायें, स्वयं तथा परिवार के सदस्यों को कलावा बांध कर रोली से चावल लगाकर तिलक करें। इस के बाद अष्टगंध को गुलाबजल या फिर गंगाजल से गीला कर लें और धन कुबेर के यंत्र पर अनार की कलम की सहायता से लेप कर दें। और फिर थाली में रखकर इस पर नारियल अर्पित करें, तथा मिठाई से भोग लगायें। इस प्रकार का प्रत्येक कार्य करते समय साधक ॐ यक्षराज कुबेराय नमः। मंत्र का उच्चारण करते रहें, सम्पूर्ण पूजन इसी मंत्र के उच्चारण से किया जाता है। इसके बाद 7 मुखी रूद्राक्ष की माला (जिसे लक्ष्मी माला कहा गया है) जो की 108 दाने वाली नई माला होनी चाहिये इस रूद्राक्ष माला से इस कुबेर देवता के मंत्र- ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय स्वाहा। मंत्र की 11 माला जप करें, जप पूर्ण होने पर कुबेर देवता के चित्र तथा श्री कुबेर यंत्र को प्रणाम करें तथा यंत्र व चित्र की सात प्रदक्षिणा करें, और फिर श्री कुबेर यंत्र तथा यक्षराज कुबेर के चित्र को अपने दोनों हाथों में लेकर सम्मान के साथ (आसन के साथ) तिजोरी या कैशबाॅक्स में स्थान दे दें। अनेक साधकों का अनुभव है कि इस साधना का लाभ कुछ ही दिनों में प्रभावशाली ढंग से प्रकट होने लग गया। कुछ साधकों के द्वारा यह भी अनुभव किया गया है कि दूसरे ही दिन से साधक को आर्थिक-व्यापारिक दृष्टि से चमत्कारिक लाभ अनुभव होने लगे। प्रयोग सम्पन्न करने के इच्छुक साधकों से अनुरोध है कि यह साधना पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से सम्पन्न करें।

विशेष- इस साधना के लिये साधना सामग्री की व्यवस्था समय से पूर्व ही कर लें। यह सामग्री shukracharya संस्थान में उपलब्ध है। इसमें 1. श्री कुबेर यंत्र जो कि ‘शुद्ध चांदी’ पर उत्कीर्ण तथा धन कुबेर के मंत्र से अभिमंत्रित किया गया होगा, 2. अष्टगन्ध, 3. कुबेर देवता का चित्र, 4. सप्त मुखी रूद्राक्ष की 108 दाने की माला, तथा 5. अनार की लकड़ी से बनी कलम होगी। इस सारी सामग्री के लिये न्यौछावर राशि केवल 5100/-रू है। आप का भविष्य के पाठकों के लिये गुरूजी ने विशेष रूप से यह सामग्री प्राणप्रतिष्ठा की है, राशि आपको अग्रिम भेजनी होगी। यह राशि आप कम से कम एक माह पूर्व भेज दें, जिससे की समय पर यह सामग्री आपको प्राप्त हो सके और आप निश्चिंत हो सकें। इसके लिए आप shukracharya कार्यालय में फोन द्वारा अपना आर्डर 15-20 दिन पहले ही बुक करवा लें।

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आत्महत्या का योग ( हस्तरेखा से)

हस्तरेखाओं के द्वारा हम जातक के जीवन में होने वाली प्रत्येक घटना Suicide का भी पूर्वानुमान लगा सकते हैं।

Dr.R.B.Dhawan (Top best astrologer in delhi)

मनुष्य के हाथ की प्रत्येक रेखा अपना विशेष महत्व रखती है, जैसे जीवन रेखा, भाग्य रेखा, मस्तिष्क रेखा, यश रेखा, स्वास्थ्य रेखा आदि। आगे की पंक्तियों में हम इन हस्तरेखाओं पर पाये जाने वाले चिन्हों और रेखाओं का विवरण लिखेंगे, जो चिन्ह यदि जातकों के हाथ में पाये जायें, तो वे मनुष्य अपनी प्रकृति के कारण अपने व्यक्तिगत चरित्र को प्रदर्शित करता है। शायद ही कभी ऐसा हो कि कोई चिन्ह या विशेषता हाथ पर किसी व्यक्ति की प्रकृति को नष्ट या धुंधला कर देती हो।

एक खतरनाक चिन्ह व्यक्ति की खतरनाक प्रकृति का पता इस तरह बता देता है। जिस प्रकार घड़ी समय की सूचना देती है, और घड़ी बनाने के लिये जैसे कई प्रकार के पुर्जों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार किसी व्यक्ति को अपराधी या सन्त बनाने के लिये भी हस्त विशिष्टताओं की आवश्यकता होेती है। जिन हाथों में आत्महत्या Suicide करने की प्रवृति होती है वे हाथ प्रायः लम्बे होते हैं। उस पर मस्तिष्क रेखा ढलवा होती है, तथा चन्द्र पर्वत अपने मूल स्थान पर उन्नत एवं विकसित होता है। वहाँ मस्तिष्क रेखा भी जीवन रेखा के साथ जुड़ी हुई होती है। जिसके कारण व्यक्ति की संवेदनशीलता में और अधिक वृद्धि हो जाती। ऐसे व्यक्ति आत्महत्या Suicide पर उतारू नहीं हो सकते, लेकिन अत्याधिक संवेदनशीलता एवं कल्पनाशीलता के कारण किसी कष्ट, दुख या कलंक का प्रभाव उन पर हजारों गुना अधिक होता है। तब शायद वह आत्महत्या करके अपने को शहीद बनाना चाहें। उन्नत शनि पर्वत क्षेत्र भी इस प्रकार की सूचना देता है, तब भी व्यक्ति संवेदनशील होता है, और मानसिक स्थिति से तंग आकर यह निश्चिय कर सकता है कि जीवन जीने योग्य नहीं है। ऐेसे में थोडी सी उकसाहट अथवा निराशा के कारण वह आत्महत्या Suicide कर सकता है।

किसी नुकीले या अधिक नुकीले हाथ में ढलवां मस्तिष्क रेखा का भी यही परिणाम होता है। लेकिन ऐसा व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप क्षणिक आवेश में आकर आत्महत्या Suicide कर सकता है, तथा कोई गहरा आघात अथवा मुसीबत ऐसे व्यक्ति को उत्तेजित करने के लिये काफी होती है। ऐसा व्यक्ति आत्महत्या करने के लिये पहले कुछ सोचता विचारता नहीं है। इसके विपरीत मस्तिष्क रेखा के अस्वाभाविक रूप से झुके हुये न होने पर भी व्यक्ति आत्महत्या Suicide कर लेता है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा जीवन रेखा के साथ जुड़ी होनी चाहिये

बृहस्पति (गुरू) पर्वत क्षेत्र धंसा हुआ तथा शनि पर्वत क्षेत्र पूर्ण उन्नत होना चाहिये। ऐसा व्यक्ति जीवन के संघर्ष में निराश एवं निरूत्साहित हो जाता है, और उसकी सहनशक्ति जबाब दे जाती है, और तब वह आत्महत्या Suicide कर बैठता है। लेकिन ऐसा वह सहसा नहीं करता, बल्कि परिस्थितियों पर पूर्ण रूप से विचार करने के बाद जब उसे आशा की कोई भी किरण दिखाई नहीं देती तब वह आत्महत्या Suicide कर लेता है।

आत्महत्या Suicide की प्रवृत्ति वालों को हत्या के विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है, तथा हाथ को देखकर अपराध करने की असाधारण प्रवृत्ति का पता लगाया जा सकता है। हाथ की बनावट देखकर यह भी पता लगाया जा सकता है कि अपराध का क्या रूप होगा। कुछ लोगों की अपराध करने की सहज प्रवृत्ति होती है, और इस पर संदेह नहीं किया जा सकता, पर कुछ व्यक्ति जन्मजात अपराधी भी होते हैं, जैसे जन्मजात संत। अपराधी प्रवृत्तियों का विकसित होना उस वातावरण और परिस्थिति पर निर्भर करता है, जिनमें व्यक्ति रहता है। आपने प्रायः देखा होगा कि कुछ बच्चों में हर वस्तु को नष्ट करने की प्रवृत्ति होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनमें बुद्धि की कमी होती है, बल्कि यह है कि नष्ट करने की प्रवृत्ति उनमें जन्मजात होती है। ऐसी प्रवृत्तियों को सुधारा जा सकता है, लेकिन कुछ लोगों में इस प्रकार की प्रवृत्ति इतनी अधिक होती है कि, यदि वे दूषित वातावरण अथवा परिस्थितियों में रहने लगें तो दुर्बल मानसिक शक्ति के कारण अथवा आवेश में आकर या प्रलोभन के शिकार होकर अपराधी बन जाते हैं। जहाँ तक हाथ का सम्बंध है, हत्या के अनुसार उसे तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

1. वे हत्या जो आवेश में आने पर क्रोधित होने पर या प्रतिशोध की भावना से की जा सकती है।

2. धन सम्पत्ति अथवा अन्य किसी लाभ के लिये की गई हत्या। ऐसी हत्या व्यक्ति द्वारा अपनी लालची प्रवृत्ति की संतुष्टी के लिये की जा सकती है।

3. जब हत्या करने वाला अपने शिकार के साथ भी मित्रतापूर्ण सम्बंध बनाये रखता है, ऐसी हत्या करने वालों को दूसरों को यातनायें देकर प्रसन्नता होती है, तथा काम की अपेक्षा हत्यारे की पैशाचिक वृत्तियों का पोषण होता है।

पहली श्रेणी साधारण होती है। व्यक्ति केवल परिस्थितिवश हत्यारा बन जाता है, ऐसे व्यक्ति सज्जन एवं भले मानस होते हैं, लेकिन किसी विशेष परिस्थिति में क्रोध से पागल होकर हत्या कर बैठते हैं। होश आने पर जब उन्हें अपने इस हिंसक कृत्य का आभास होता है, तो वे पश्चाताप के कारण टूटकर बिखर जाते हैं। इस प्रकार हत्या करने वाले व्यक्तियों के हाथ में अनियंत्रित क्रोध एवं पाश्विक उत्तेजना के अतिरिक्त दूसरा कोई अशुभ लक्षण नहीं होता है। इस प्रकार के व्यक्तियों के हाथ अविकसित अथवा वैसे होते हैं, ऐसे हाथों में मस्तिष्क रेखा छोटी-मोटी व लाल होती है, तथा नाखून छोटे व लाल व हाथ मारी व सख्त होते हैं। ऐसे हाथों का अंगूठा अति विशिष्ट यानी काफी नीचा छोटा अपने दूसरे पर्व पर मोटा व पहले पर्व पर गदामुखी होता है, ऐसा अंगूठा अत्यंत छोटा चैड़ा वर्गाकार व चपटा होता है, ऐसे व्यक्तियों के हाथों में शुक्र पर्वत क्षेत्र भी असाधारण रूप से उन्नत व विस्तृत होता है, उनमें काम वासना की अधिकता होती है, जिसके कारण वे इस प्रकार के कृत्य कर बैठते हैं।

दूसरी श्रेणी में कुछ भी असाधारण नहीं होता। ऐसे व्यक्तियों के हाथों की मस्तिष्क रेखा में ही विशेषता दिखाई पड़ती है, ऐसे हाथों पर मस्तिष्क रेखा गहरी बुध पर्वत क्षेत्र की ओर ऊपर को उठती हुई अथवा बुध पर्वत क्षेत्र पर पहुँचने से पहले दाँये हाथ में अपने स्थान से हटी हुई होगी। जैसे-जैसे व्यक्ति की प्रवृत्तियों में वृद्धि होती जाती है, वे हृदय रेखा पर अधिकार जमा लेती है। ऐसे हाथ प्रायः सख्त लेकिन अंगूठा असाधारण रूप से मोटा नहीं परंतु सख्त व अन्दर को सिकुड़ा हुआ होता है। अंगूठे की ऐसी बनावट व्यक्ति में लालची प्रवृत्ति की द्योतक होती है, ऐसे व्यक्ति अपने लाभ के लिये अपने अन्तर ज्ञान को भी खत्म कर देते हैं।

तीसरी श्रेणी सर्वाधिक दिलचस्प व सबसे अधिक भयावह भी हो सकती है, ऐसे हाथ में कोई भी असाधारण चिन्ह दिखाई नहीं देता लेकिन सभी विशेषताओं का पूर्ण निरीक्षण करने के बाद व्यक्ति की प्रवृत्ति उसके स्वभाव और छल कपट को देखा जा सकता है, ऐसे व्यक्ति का हाथ पतला लम्बा व सख्त होता है। अंगुलियाँ थोडी-थोड़ी भीतर को मुड़ी हुई तथा अंगूठा लम्बा और उसके दोनों पर्व पूर्ण विकसित होते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति में दृढ़ इच्छा शक्ति योजना बनाने व उसके क्रियान्वित करने की क्षमता होती है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा अपने स्थान पर भी हो सकती है, तथा उससे कुछ हटकर हाथ को पार करती हुई अपने सामान्य स्थान से कुछ ऊपर को भी स्थित होती है। यह व्यक्ति की कपटपूर्ण भावनाओं को व्यक्त करती है। ऐसी मस्तिष्क रेखा लम्बी व महान होगी तथा हाथ में शुक्र पर्वत क्षेत्र या तो धंसा हुआ होगा या बहुत उन्नत होगा।

यदि शुक्र पर्वत हस्त क्षेत्र में धंसा हुआ हो, तो व्यक्ति केवल अपराध करने के लिये ही अपराध करता है, लेकिन यदि शुक्र पर्वत क्षेत्र अत्याधिक उन्नत हो, तो हत्या या अपराध किसी पाश्विक वासना पूर्ति के लिये किया जाता है। अपराध जगत के दक्ष व्यक्तियों के हाथ ऐसे ही होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिये हत्या करना एक कला होती है, जिसे पूरा करने हेतु वह एक-एक विवरण का सूक्ष्म अध्ययन करते हैं। ऐसे व्यक्ति कभी भी हिंसापूर्ण ढंग से हत्या नहीं करते, क्योंकि इसे वे अश्लील समझते हैं। ऐसे व्यक्ति विष का सहारा लेते हैं, व उसका प्रयोग इतनी कुशलता के साथ करते हैं, कि हत्या नहीं बल्कि स्वाभाविक कारणों से हुई मृत्यु जान पड़ती है।

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शनि देव

ग्रहों में यदि शनिदेव न होते …

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ज्योतिषाचार्य जब कुण्डली में उन ग्रहों की महादशा व अन्तर्दशा के संदर्भ में ग्रहों के प्रभावों का विचार करते हैं, तब शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार के परिणाम की सूचना मिलती है, किन्तु शनि के प्रभाव का निरूपण करते समय वे इन्हें नितांत दु:ख व शोक-कारक ग्रह के रूप में स्वीकार करते हैं। शनिदेव की महादशा के विषय में कहा गया है कि- शनिदेव की महादशा सदैव मनुष्य के लिए दु:ख, शोक, नैराश्य तथा असफलता आदि के रूप में ही आती है, तथा उस समय मनुष्य को सब कुछ शून्य दिखाई देता है। आलस्य का प्रभाव शरीर पर बहुत हो जाता है, मनुष्य की विवेक शक्ति क्षीण हो जाती है, उसे अपने ही परिश्रम का पूर्ण फल नहीं मिलता, वे बार-बार अपनों की निंदा का पात्र बनता रहता है। आप पाठक भी विचारकों के इस तथ्य से सहमत होंगे कि शनिदेव की महादशा के बारे में ऊपर जो कुछ कहा गया है वह अधिकाशतः सत्य है।

वस्तुतः शनिदेव के पास वह सब अधिकार हैं, जो एक न्यायाधीश अथवा दण्डनायक के पास होते हैं। किन्तु प्रत्येक कुण्डली वाले जातक के लिये वे ऐसा नहीं करते दण्ड वा न्याय के अतिरिक्त भी बहुत कुछ करते हैं। उदाहरणार्थ- यदि शनिदेव वृषभ या तुला राशि में होकर केन्द्र में हैं, अथवा कुण्डली में योगकारक होकर केन्द्र या त्रिकोंण में हैं, अथवा केन्द्रेश होकर त्रिकोणेश के साथ या त्रिकोणेश में होकर केन्द्रेश के साथ हैं, तो इनकी महादशा में निम्नलिखित शुभ परिणाम होते हैं :-

कृषि कार्य में सफलता तथा लाभ, पशुओं की समृद्धि, बहुत आय, नौकर-चाकरों से सुख, मूल्यवान वस्तुओं की प्राप्ति, कार्यों में सफलता, व्यापार व्यवसाय में लाभ, राज्य से सम्मान, राजनैतिक सफलता, स्पष्ट है कि शनिदेव केेवल शोक-दुःखप्रद ग्रह नहीं हैं अपितु परिस्थिति विशेष में वह अन्य सौम्य ग्रहों की तरह, तथा कभी-कभी उनसे भी अधिक सुख तथा सौभाग्य की सूचना देने वाले ग्रह हैं। शनिदेव को केवल शोकमय ग्रह बताना जनमानस तथा विद्वजनों का भ्रम है, यह पूर्ण सत्य नहीं है। सत्य तो यह है कि शनिदेव सबसे अधिक सत्य का ज्ञान करवाने वाले एवं न्याय-प्रिय ग्रह हैं। एक सत्यप्रिय एव न्यायनिष्ठ न्यायाधीश में जो गुण होने चाहिए वे सभी गुण ग्रहों में न्यायाधीश के पद पर विराजमान शनिदेव में भरपूर मात्रा में हैं। अतः प्रकृति ने इन्हें इस संसार के सर्वशक्ति सम्पन्न दण्डाधिकारी के रूप में नियुक्त किया है। एक सच्चे न्यायाधीश की तरह शनिदेव मनुष्य को न केवल उसके द्वारा कुकृत्यों का दण्ड देते हैं, अपितु प्राणियों को सुकर्मो का पुरस्कार भी देते हैं। ‘न्यायाधीश’ के व्यापक अर्थ में शनिदेव शिक्षक भी हैं, और दण्डाधिकारी भी हैं, यह कार्य शनिदेव अपनी महादशा, अंतरदशा अथवा साढेसाती में मनुष्य को तपा कर शुद्ध सोने की तरह (खोट रहित) बना देने के लिये ही करते हैं। इन की महादशा, अंतरदशा या शनि साढ़ेसाती के समाप्त होने पर मनुष्य अच्छी तरह समझ जाता है, कि यह सब उसके अपने ही बुरे कर्मो का फल था, और अब आगे उसे ऐसे कुकृत्यों से बचकर रहना है। इस लिये शनिदेव से मनुष्य अपने जीवन को सही ढंग से जीने की कला भी सीखता है। वे दार्शनिक भी हैं, धर्मगुरु भी हैं, मन में वैराग्य भाव पैदा कर मनुष्य को संन्यासी भी बनाने वाले यह शनिदेव हैं; क्योकि आत्म जागरण व सच्ची शिक्षा ही संसार की समस्त व्याधियों से बचने का एक मात्र सार्वभौम उपचार है। अतः संसार में शुभ या अशुभ फल प्रदान करने के लिए जितने शक्ति सम्पन्न शनिदेव हैं उतना अन्य कोई ग्रह नहीं है। जातक पारिजातकार ने ठीक ही कहा है :- आयुर्जीवन, मृत्युकारण, विपत्, सम्पत्, प्रदाता शनिः।

शनिदेव प्राणीयों को सब कुछ देते हैं, केवल पात्रता चाहिए। यह बात और है, कि इस कलियुग में मनुष्य सुकर्मों की अपेक्षा कुकृत्य अधिक करता है। अतः इसे पुरस्कार की अपेक्षा दण्ड ही अधिक भुगताना पड़ता है। यही कारण है कि इस ग्रह को शुभकारक की अपेक्षा अशुभकारक (दण्ड देने वाला) अधिक माना जाता है। पारम्परिक रूप से शनिदेव के स्वरूप की इस प्रकार वंदना की जाती है :-

नीलान्जनं समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड-सम्मूतं तं नमामि शनेश्चरम्।।

शनिदेव का यह स्वरूप हमें याद दिलाता है :- न्यायाधीश की वर्तमान वेशभूषा तथा उसके चारों ओर घिरे हुए काले कोट पहने हुए वकीलों से युक्त परिवार की। उक्त श्लोक का अर्थ इस प्रकार है। ‘मैं ऐसे स्वरूप वाले शनिदेव की वंदना करता हूं जो- नीली आभा लिये हुये काले काजल के समान कांति वाले हैं। (सभी न्यायाधीश काले कोट पहन कर काजल के समान कांतिवाले लगते हैं)। सूर्य के पुत्र हैं, (सूर्य ग्रहों में राजा या अधिकारी हैं, उन्होंने ही शनिदेव को जन्म दिया है)। यमराज के बड़े भाई हैं (यमराज जेलर अथवा जल्लाद का प्रतीक है)। छाया एवं मार्तण्ड से उत्पन्न है (सूर्य शासन, प्रकाश एवं छाया-अंधकार के प्रतीक हैं। कहीं प्रकाश कहीं अपराध या अंधकार है, इसी कारण जिनका जन्म हुआ है)। धीमे चलने वाले हैं, (अदालतों में अनेक तारीखों अथवा लम्बी प्रतीक्षा के बाद जाकर न्याय मिलता है। इसी लिये कहा भी जाता है :- भगवान के घर देर है, परंतु अंधेर नहीं।) निलम्बित प्रकरणों के लिए लोग व्यर्थ ही न्याय व्यवस्था को दोष देते हैं। इस प्रकार न्यायाधीश के पक्ष में भी उक्त श्लोक का अर्थ एकदम युक्तियुक्त हो जाता है :- मैं ऐसे न्यायाधीश की वंदना करता हूं जो काजल के समान कांति वाले हैं, शासन के कर्म-पुत्र हैं, शासन के द्वारा नियुक्त वरिष्ठ अधिकारी हैं, अंधकार जन्य कृत्यों के प्रति शासन की चिंता के कारण ही इनका जन्म हुआ है, तथा जो मंदगति से चलने वाले बहुत सोच विचार के पश्चात बेशक अधिक समय लग जाये परंतु सच्चा न्याय करने वाले हैं।

न्यायाधीश से शनिदेव का साम्य तो बाह्य वैचित्र्य है किन्तु अधिक महत्वपूर्ण तो आंतरिक साम्य है। न्यायाधीश, सिविल, सर्वेण्टस, दार्शनिक, खोजकर्ता वैज्ञानिक आदि की जन्म पत्रिकाओं में उनको उच्चपद दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका शनिदेव की ही रहती हैं। जब प्राणी को अपने बुरे कर्मो का फल मिलने का समय आ जाता है, तब उस समय किसी न किसी रूप में शनिदेव का प्रभाव उस पर होता ही है। चाहे वे प्रभाव महादशा के रूप में हो, चाहे अंतरदशा के रूप में अथवा साढेसाती के रूप में ही क्यो न हो, परंतु यह प्रभाव होता मनुष्य की आशा के विपरीत ही है। वैपरीत्य की स्थिति में सामान्य रूप में शनिदेव निम्नलिखित परिणाम देने वाले होते हैं :-

रोग, धनहानि, पर बंधन अर्थात जेल यात्रा, वियोग, प्रियजन की मृत्यु, मृत्यु अथवा मृत्युतुल्य कष्ट, क्रान्ति (प्रबल विरोध) अथवा गृहयुद्ध, क्षत्र-भंग। यदि किसी व्यक्ति का आहार-व्यवहार असंयमित है, तो उसके शरीर में किसी न किसी प्रकार का विकार हो जाना निश्चित है। शरीर की इस विकृति को दूर करने के लिए अपनी दशा-अन्तर्दशा में अथवा साढे़साती की अवधि में शनिदेव व्यक्ति को रोगी बना देते हैं, ताकि वह औषधि से संयमित बने। ऐसा करके वे उसका रेचन करते हैं, तथा संयम के रास्ते पर लाने के लिए एक संकेत देते हैं। हममें से अधिकांश को यह मालूम होगा कि साढ़ेसाती के तत्काल बाद की अवधि में मनुष्य अपने आपको तरो-ताजा तथा नया महसूस करता है। हर मनुष्य पर, प्रत्येक 30 वर्ष की अवधि में एक बार शनिदेव यह उपकार करते हैं। जब शरीर अत्यंत जीर्ण हो जाता है, तब अपने तृतीय उपकार के समय शनिदेव सदा के लिए ही इस कष्ट को दूर कर देते हैं। इस रूप में शनिदेव उस कठोर-डाक्टर की तरह हैं, जो रोगी की व्याधिनाश के लिए आॅपरेशन के समय रोगी के चिल्लाने की परवाह नहीं करता क्योंकि वास्तविकता कल्याण (निरोगता) में निहित है। मनुष्य का शनिदेव को दोष देना उसी प्रकार अनुचित है, जैसे बच्चों का, डाॅक्टर के हाथ में इंजेक्शन को देखकर भयभीत होना।
इसी प्रकार जब मनुष्य अवैध तरीके से आपार धन सम्पत्ति एकत्रित कर लेता है तो शनिदेव अपनी दशा, अन्तर्दशा में उसका वह धननाश अवश्य करते हैं। अत्याचारी या अपराधी प्रवृति वाले अधिकारी से प्रजा को होने वाले कष्ट से बेखबर राजा को वह निर्ममता पूर्वक धूल में मिला देते हैं। समाज में यदि शोषण अत्यधिक बढ़ जाये तो क्रांतिकारियों के रूप में शनिदेव पुनः व्यवस्था कायम कराते हैं। शनिदेव हर प्रकार से हारे हुये मानव का मार्गदर्शन भी करते हैं, तथा प्रतिनिधित्व भी करते हैं, अतः प्रत्येक विचार क्रांति में शनिदेव की प्रेरणा ही रहती है। अन्यायी कोई भी वर्ग हो, शनिदेव के दण्ड से बच नहीं सकता। शनिदेव का अपना जीवन अत्यंत सादा है, जो उसे सार्वभौम न्याय प्रशासक के लिये उपयुक्त बनाता है। अपनी इच्छाओं तथा आवश्यकताओं से व्यक्ति मार्ग से विचलित होता है। शनिदेव ने स्वेच्छा से राजकुमार होते हुए भी सेवक होना स्वीकार किया, किसी प्रकार की राजकीय ठाटबाट स्वीकार नहीं की, हाथी घोड़ों को छोड़कर उसने ‘महिष से ही संतोष’ किया। सोना-चांदी आदि आभूषणों, मूल्यवान वस्तुओं को छोड़कर लोहा ही स्वीकार किया। उड़द तथा तेल ही इन्हें संतोष देते हैं। इन्हें रंग-बिरंगे रेशमी वस्त्र भी पसंद नहीं- काला कपड़ा ही अभीष्ट है। राजमंत्री, न्यायाधीश, दार्शनिक आदि महान व्यक्तियों को बनाने वाले यह ग्रह रूप शनिदेव जो किसी को इन्द्र के समान वैभवशाली जीवन प्रदान करते हैं, तथा अपराधी, अत्याचारी होने पर इन्द्र जैसे वैभवशाली को भिखारी बनाकर धूल में भी मिला सकते हैं, परंतु इनका अपना जीवन सादा तथा आडम्बरहीन है। हम कह सकते हैं, कि शनिदेव साक्षात शिव के अवतार हैं, जो अमृत पिलाने के लिए स्वयं विषपान करते हैं। अब आप स्वयं ही विचार करें कि :- ग्रहों में यदि शनिदेव न होते…? तो संसार में कितना अंधकार होता? ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नमः।

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शाबर मंत्र साधना shabar mantra

Shabar mantra :- मंत्र तीन प्रकार के होते हैं – वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक।

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka bhavishya.in), Astrological consultant, shukracharya

विद्वानों की धारणा है कि कलियुग में तांत्रिक मंत्र सफल होते हैं, कलियुग के लिये तांत्रिक मंत्र ही शक्तिशाली हैं। तांत्रिक मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं – शाबर मंत्र, Shabar mantra डामर मंत्र और बीजाक्षर मंत्र। इन तीनों प्रकार के तांत्रिक मंत्रों का अपना-अपना विज्ञान है। जो लोग उसके वैज्ञानिक रहस्य को समझते हैं, वे ही मंत्रों का प्रयोग कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। शास्त्रों में हमें स्थान-स्थान पर शाबर मंत्रों के विषय में वर्णन मिलता है। यह एक प्रकार के तांत्रिक उपाय ही होते हैं, Dr.R.B.Dhawan, shukracharya के अनुसार इन की साधना करना थोड़ा जटिल कार्य होता है, परन्तु यदि सही ढंग से इन्हें सिद्ध कर लिया जाये तो लाभ भी अवश्य ही मिलता है। यहाँ मैं आपको कुछ शाबर मंत्रों के बारे में बताने जा रहा हूँ :-

1. दरिद्रता दूर करने के लिये धनदा मंत्र:- गरीबी और अभावों से मुक्ति के लिये धनदा मंत्र अत्यंत प्रभावकारी है।

मंत्र:- नमः विष्णवे सुरपतये महाबलाय स्वाहा।।

2. पदोन्नति के लिये भद्रकाली मंत्रः- भद्रकाली यंत्र को महाकाली यंत्र भी कहा जाता है। इसे स्वर्ण पर अंकित करायें। पैंतालिस दिनों तक प्रति दिन एक हजार बार मंत्र का जाप करें।
त्रयाणां देवानां त्रिगुण जनितानां तव शिवं मवेत् पूजा, पूजा तव चरणयोर्या विराचेता। महानिशा में शाबर मंत्रों की साधना- शाबर मंत्र किसी वेद, शास्त्र पुराण या अन्य ग्रन्थ में एक जगह संकलित नहीं मिलता। ये मंत्र लोक भाषा में प्रचलित हैं तो अपने से स्वयं सिद्ध हैं। यह तो साधक पर निर्भर करता है, कि वह मंत्रों का कब और कैसे प्रयोग करें।

3. रक्षा कवच मंत्र:- साधक हो या सामान्य व्यक्ति हर किसी को सर्वप्रथम अपनी रक्षा करनी चाहिये। हो सकता है आपके ऊपर ही कोई दूसरा तांत्रिक प्रयोग कर दे तो आप दूसरों की रक्षा करने से पहले ही स्वयं कष्ट में पड़ जायेंगे। ऐसी स्थिति में सर्वप्रथम अपनी रक्षा और बचाव करना चाहिये :-

मंत्र:- ॐ नमो आदेश गुरून को ईश्वरी वाचा, अजरी बजरी बाड़ा बजरी मैं बांधा दसो दुवार छवा और के घालो तो पलट हनुमंत वीर उसी को मारे पहली चैकी गनपती, दूजी चैकी हनुमंत, तीजो चैकी से भैरों चैथी, देह रक्षा करन को आवे श्री नरसिंह देवजी, शब्द सांचा पिंड सांचा चले मंत्र ईश्वरी वाचा।।

उक्त मंत्र शारीरिक पीड़ा से छटपटाते व्यक्ति पर भी प्रयोग किया जा सकता है। यदि किसी को भी मूर्छा आ जाये और कष्ट से घिर जाये तो इस मंत्र से झाड़ देने से वह व्यक्ति अच्छा हो जाता है, और शीघ्र स्वस्थ प्रसन्न जो जाता है। उक्त शाबर मंत्र Shabar mantra का प्रयोग किसी उपद्रव ग्रासित घर को शुद्ध करने में भी किया जाता है।

4. शत्रु एवं प्रतिद्वंदी को परास्त करने के लिये:- यह मंत्र अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को परास्त करने के लिये प्रयोग में लाया जाता है। महानिशा में इसे 108 बार पढ़कर हवन करके सिद्ध कर लिया जाता है। फिर जब चाहें अपने लिये प्रयोग करें। दूसरों के लिये इसका प्रयोग गंडा या ताबीज के रूप में किया जाता है –

मंत्र:- हाथ बसे हनुमान भैरों बसे लिलार, जो हनुमंत को टीका करे मोरे जग संसार। जो आवे छाती पांव धरे बजरंग बीर रक्षा करें, महम्मदा वीर छाती टोर जुगुनियाँ, बीर शिर फोर उगुनिया बीर मार-मार भास्वत करे भैरों बीर की आन फिरती रहे बजरंग बीर रक्षा करे, जो हमरे ऊपर घाव छाले तो पलट हनुमान बीर उसी को मारे जल बाँधे थल बाँधे आर्या आसमान बाँधे कुदवा और कलवा बांधे चक चक्की आसमान बाँधे वाचा साहिब साहिब के पूत धर्म के नाती आसरा तुम्हारा है।

5. सुख पूर्वक प्रसव का मंत्र:– इस मंत्र को 108 बार हवन करके सिद्ध कर लेने पर जब प्रयोग करना हो तब 11 बार पढ़कर जल अभिमंत्रित करके गार्भिणी को पिला दें। तुरंत सुख पूर्ण प्रसव हो जायेगा।

मंत्र:- ॐ मुक्ताः पाशा विमुक्ताः मुक्ताः सुर्येणरश्मयः। मुक्ताः सर्वभयापूर्व ऐहि माचिर-माचिर स्वाहा।।

6. चिंतित कार्य की सफलता के लिये:- जब किसी कार्य के होने न होने की चिंता बनी हो अथवा शत्रु भय या राज भय हो अथवा कोई कामना जो पूर्ण न हो रही हो तो निम्न मंत्र की एक माला नित्य जप लें। कुछ दिनों में ही चिंता समाप्त हो जायेगी और मंत्र सिद्ध हो जायेगा।

मंत्र:- ॐ हर त्रिपुर भवानी बाला, राजा प्रजा मोहिनी सर्व शत्रु। विध्यवासिनी मम चिंतित फलं, देहि-देहि भुवनेश्वरी स्वाहा।।

7. रोग हरण के लिये:- निम्न मंत्र की 21 माला महानिशा (काली रात) में जपकर सिद्ध कर लें। फिर जब कोई बीमार हो तब किसी बर्तन में शुद्ध जल लेकर इसे 21 बार पढ़कर जल को फूँककर मंत्रित करके रोगी को पिला दें। रोगी पहले से, ठीक होने लगेगा। रोग एवं रोगी की स्थिति के अनुसार इस तरह का अभिमंत्रित जल 3, 5, 7, 11, 21 दिन तक देना चाहिये।

मंत्र:- ॐ सं सां सिं सीं सुं सूं सें सैं सों सौं सं सः वं वां विं वीं वुं वूं वें वैं वों वौं वं वः सह अमृत वरचे स्वाहा।

शाबर मंत्र की विश्वश्नीयता पर कभी भी शक नहीं किया जा सकता है। परन्तु इनकी सिद्ध के लिये साधना का ढंग एकदम सही व सटीक होना चाहिये। (Top best astrologer in Delhi), marriage and after marriage problems salutations.

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