अष्ट सिद्धियां

Dr.R.B.Dhawan

पुराणों में बार-बार अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का उल्लेख मिलता है, विशेषकर हनुमान चालीसा में सीताजी द्वारा हनुमान जी को दिए वरदान में इनके दिए जाने का विवरण है। आईये जानें कि क्या हैं ये आठ सिद्धियां? –

हर मनुष्य में बीजरूप (अति सूक्षम) कुछ विशेष नैसर्गिक गुण होते हैं। इन्हीं में ही धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य भी हैं। ऐश्वर्य का मतलब धन संपदा से नहीं है, वह श्री के अंतर्गत आती है। ये ऐश्वर्य अणिमादिक अष्ट सिद्धिंयाँ ही हैं। इन अष्ट सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सदाचार युक्त जीवन व्यतीत करना पडता है, और कहीं न कहीं वैराग्य भाव का भी इसमें योगदान है। वैराग्य detachment है। जितने भी अलौकिक शक्तियों से संपन्न देवी-देवता हुए हैं, उन्होंने सभी चमत्कारपूर्ण कार्य अष्ट सिद्धियों के बल पर ही किसे थे।

आठ प्रमुख सिद्धियाँ हैं, सिद्धि का अर्थ है पूर्णता की प्राप्ति होना व सफलता की अनुभूति मिलना, सिद्धि को प्राप्त करने का मार्ग एक कठिन मार्ग है, ओर जो इन सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है, वह जीवन की पूर्णता को पा लेता है। असामान्य कौशल या क्षमता अर्जित करने को ही ‘सिद्धि’ कहा गया है। चमत्कारिक साधनों द्वारा ‘अलौकिक शक्तियों को पाना जैसे – दिव्यदृष्टि, अपना आकार छोटा कर लेना, घटनाओं की स्मृति प्राप्त कर लेना इत्यादि. ‘सिद्धि’ यही होती है। शास्त्रों में अनेक सिद्धियों की चर्चा की गई है, और इन सिद्धियों को यदि नियमित और अनुशासनबद्ध रहकर किया जाए तो, अनेक प्रकार की परा और अपरा सिद्धियाँ चिन्हित कि जा सकती है। यह सिद्धियाँ भी दो प्रकार की होती हैं, एक परा और दूसरी अपरा, यह सिद्धियां इंद्रियों के नियंत्रण और व्यापकता को दर्शाती हैं। सब प्रकार की उत्तम, मध्यम और अधम सिद्धियाँ अपरा सिद्धियां कहलाती है। मुख्य सिद्धियाँ आठ प्रकार की कही गई हैं, इन सिद्धियों को पाने के उपरांत साधक के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। सिद्धियां क्या हैं? व इनसे क्या हो सकता है ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर मार्कंडेय पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में प्राप्त होता है जो इस प्रकार है:- 

अणिमा लघिमा गरिमा प्राप्ति: प्राकाम्यंमहिमा तथा।

ईशित्वं च वशित्वंच  सर्वकामावशायिता:।।

यह आठ मुख्य सिद्धियाँ इस प्रकार हैं:- अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता और वंशिका।

1. अणिमा सिद्धि –

अपने शरीर को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता ही अणिमा सिद्धि है, यह वह सिद्धि है, जिससे युक्त हो कर व्यक्ति सूक्ष्म रूप धर कर एक प्रकार से दूसरों के लिए अदृश्य हो जाता है. इसके द्वारा आकार में लघु होकर एक अणु रुप में परिवर्तित हो सकता है. अणु एवं परमाणुओं की शक्ति से सम्पन्न हो साधक वीर व बलवान हो जाता है. अणिमा की सिद्धि से सम्पन्न योगी अपनी शक्ति द्वारा अपार बल प्राप्त कर लेता है ।

2. महिमा सिद्धि –

अपने को बड़ा एवं विशाल बना लेने की क्षमता को महिमा सिद्धि कहा जाता है, यह शरीर के आकार को विस्तार देती है, विशालकाय स्वरुप को जन्म देने में सहायक है, इस सिद्धि से सम्पन्न होकर साधक प्रकृति को विस्तारित करने में भी सक्षम होता है, जिस प्रकार केवल ईश्वर ही अपनी इसी सिद्धि से ब्रह्माण्ड का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार साधक भी इस सिद्धि को पाकर वैसी शक्ति पाता है।

3. गरिमा सिद्धि –

इस सिद्धि से मनुष्य अपने शरीर को जितना चाहे, उतना भारी बना सकता है, यह सिद्धि साधक को अनुभव कराती है कि उसका वजन या भार उसके अनुसार बहुत अधिक बढ़ सकता है, जिसके द्वारा वह किसी के हटाए या हिलाए जाने पर भी नहीं हिल सकता ।

4. लघिमा सिद्धि –

स्वयं को हल्का बना लेने की क्षमता ही लघिमा सिद्धि होती है, लघिमा सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत हल्का अनुभव करता है, इस दिव्य महासिद्धि के प्रभाव से योगी सुदूर अनन्त तक फैले हुए ब्रह्माण्ड के किसी भी पदार्थ को अपने पास बुलाकर उस को लघु करके अपने हिसाब से उसमें परिवर्तन कर सकता है ।

5. प्राप्ति सिद्धि –

कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता इस सिद्धि के बल पर प्राप्त होती है, साधक कुछ भी पाना चाहें उसे प्राप्त कर सकता है, इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक जिस भी किसी वस्तु की इच्छा करता है, वह असंभव होने पर भी उसे प्राप्त हो जाती है, जैसे रेगिस्तान में प्यासे को पानी प्राप्त हो सकता है या अमृत की चाह को भी पूरा कर पाने में वह सक्षम हो जाता है, केवल इसी सिद्धि द्वारा ही वह असंभव को संभव कर सकता है।

6. प्राकाम्य सिद्धि –

कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता प्राकाम्य सिद्धि की उपलब्धि है, इसके सिद्ध हो जाने पर मन  के विचार आपके अनुरुप परिवर्तित होने लगते हैं, इस सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत शक्तिशाली अनुभव करता है, इस सिद्धि को पाने के बाद मनुष्य जिस वस्तु कि इच्छा करता है, उसे पाने में सफल होता है, व्यक्ति चाहे तो आसमान में उड़ भी सकता है, और यदि चाहे तो पानी पर चल भी सकता है।

7. ईशिता सिद्धि –

हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना ही इस सिद्धि की पूर्णता है, इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक समस्त प्रभुत्व और अधिकार प्राप्त करने में सफल हो जाता है, सिद्धि प्राप्त होने पर अपने आदेश के अनुसार किसी पर भी अधिकार जमाया जा सकता है, वह चाहे राज्यों से लेकर साम्राज्य ही क्यों न हो, इस सिद्धि को पाने पर साधक ईश रुप में परिवर्तित हो जाता है।

8. वशिता सिद्धि –

जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता को ही वशिता या वशिकरण सिद्धि कहा जाता है, इस सिद्धि के द्वारा जड़, चेतन, जीव-जन्तु, पदार्थ-प्रकृति, सभी को स्वयं के वश में किया जा सकता है।

इन अष्ट सिद्धियों को जो प्राप्त कर लेता है, उसे इस मृत्युलोक में ईश्वर मान लिया जाता है, बहुत से योगियों ने इन्हें प्राप्त किया होगा। लेकिन उपलब्ध ग्रंथों, कथाओं, रामायण, महाभारत के अनुसार केवल दो शरीर धारिओं अर्थात जिसने धरती पर जन्म लिया, उन्होंने इनका खुल के प्रयोग किया। कौन हैं ये दोनों? हनुमान और श्रीकृष्ण। इसीलिए इनका यश और कीर्ति अमर व् अक्शुण है। श्रीकृष्ण को साक्षात् ईश्वर माना गया है व जरंगबली की महिमा अपरम्पार है।

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काल को जीतने का उपाय

काल को जीतने का उपाय देवी पार्वती ने कहा- प्रभु! काल से आकाश का भी नाश होता है। वह भयंकर काल बडा विकराल है। वह स्वर्ग का भी एक मात्र स्वामी है। आपने उसे दग्ध कर दिया था, परंतु अनेक प्रकार के स्त्रोतो द्वारा जब उसने आपकी स्तुति कि तब आप फिर संतुष्ट हो गये और वह काल पुनः अपनी प्रकृति को प्राप्त हुआ- पूर्णतः स्वस्थ हो गया। आपने उससे बातचीत में कहा- ‘‘काल! तुम सर्वत्र विचरोगे, किंतु लोग तुम्हें देख नहीं सकेंगे।’’

आप प्रभु की कृपादृष्टि होने और वर मिलने से वह काल जी उठा तथा उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया। अतः महेश्वर! क्या यहां ऐसा कोई साधन है, जिससे वह काल को नष्ट किया जा सके? यदि हो तो मुझे बताईये; क्योकि आप योगियों में शिरोमणि और स्वतंत्र प्रभु हैं। आप परोपकार के लिये ही शरीर धारण करते हैं।

शिव बोले– देवी! श्रेष्ठ देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, नाग और मनुश्य- किसी के द्वारा भी काल का नाश नहीं किया जा सकता; परंतु जो ध्यान परायण योगी है, वे शरीर धारी होने पर भी सुख पूर्वक काल को नष्ट कर देते हैं। वरारोहे! ये पंचभौतिक शरीर सदा उन भूतों के गुणों से युक्त होता है और उन्हीं में इसका लय होता है। मिट्टी की देह मिट्टी में ही मिल जाती है।

आकाश से वायु उत्पन्न होती है, वायु से तेज तत्व प्रकट होता है, तेज से जल का प्रकाट्य बताया गया है और जल से पृथ्वी का आविर्भाव होता है। पृथ्वी आदि भूत क्रमशः अपने कारण में लीन होते हैं। पृथ्वी के पांच, जल के चार, तेज के तीन और वायु के दो गुण होते हैं। आकाश का एकमात्र शब्द ही गुण है। पृथ्वी आदि में जो गुण बताये गये हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं- शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। जब भूत अपने गुण को त्याग देता है, तब वह नष्ट हो जाता है और जब गुण को ग्रहण करता है, तब उसका प्रादुर्भाव हुआ बताया जाता है।

देवेश्वरी! इस प्रकार तुम पांचो भूतों के यथार्थ स्वरूप को समझो। देवी! इस कारण काल को जीतने की इच्छा वाले योगी को चाहिये की वे प्रतिदिन प्रयत्न पूर्वक अपने-अपने काल में उसके अंशभूत गुणों का चिंतन करे।

योगवेत्ता पुरूष को चाहिये कि सुखद आसन पर बैठकर विशुद्ध श्वास (प्राणायाम) द्वारा योगाम्यास करे। रात में जब सब लोग सो जायें, उस समय दीपक बुझाकर अंधकार में योगधारण करें। तर्जनी अंगुली से दोनो कानों को बंद करके दो घडी तक दबाये रखें। उस अवस्था में अग्निप्रेरित शब्द सुनाई देता है। इससे संध्या के बादका खाया हुआ अन्न क्षण भर में पच जाता है और सम्पूर्ण रोगों तथा ज्वर आदि बहुत से उपद्रवों का शीघ्र नाश कर देता है।

जो साधक प्रतिदिन इसी प्रकार दो घडी तक शब्द गृहण का साक्षात्कार करता है, वह मृत्यु तथा काम को जीतकर इस जगत में स्वछंद विचरता है और सर्वज्ञ एवं समदर्शी होकर सम्पूर्ण सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। जैसे आकाश में वर्षा से युक्त बादल गरजता है, उसी प्रकार उस शब्द को सुनकर योगी तत्काल संसार बंधन से मुक्त हो जाता है।

तदंतर योगियों द्वारा प्रतिदिन चिंतन किया जाता हुआ वह शब्द क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो जाता है। देवी! इस प्रकार मैने तुम्हें शब्द ब्रह्म के चिंतन का क्रम बताया है। जैसे ध्यान चाहने वाला पुरूष पुआलको छोड देता है, उसी तरह मोक्ष की इच्छा वाला योगी सारे बंधनों को त्याग देता है।

इस शब्द-ब्रह्म को पाकर भी जो दूसरी वस्तु की अभिलाषा करते हैं, वे मुक्के से आकाश को मारते और भूख-प्यास की कामना करते हैं। यह शब्द-ब्रह्म ही सुखद, मोक्ष का कारण, बाहर-भीतर के भेद से रहित, अविनाशी और स्मस्त उपाधियों से रहित परब्रह्म हैं। इसे जानकर मनुश्य मुक्त हो जाते हैं। जो लोग कालपाश से मोहित हो शब्दब्रह्म को नहीं जानते, वे पापी और कुबुद्धि मनुश्य मौत के फंदे में फंसे रहते हैं। मनुश्य तभी तक संसार में जन्म लेते हैं, जबतक सबके आश्रयभूत परम तत्व (परब्रह्म परमात्मा) की प्राप्ति नहीं होती।

परमतत्व का ज्ञान हो जाने पर मनुश्य जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है। निद्रा और आलस्य साधना का बहुत बड़ा विध्न है। इस शत्रु को यत्नपूर्वक जीतकर सुखद आसन पर आसीन हो प्रतिदिन शब्दब्रह्म का अभ्यास करना चाहिये। सौ वर्ष की अवस्था वाला वृद्ध पुरूष आजीवन इसका अभ्यास करे तो उसका शरीर रूपी स्तम्भ मृत्यु को जीतने वाला हो जाता है और उसे प्राणवायु की शक्ति को बढ़ाने वाला आरोग्य प्राप्त होता है।

वृद्ध पुरूष में भी शब्द ब्रह्म के अभ्यास से होने वाले लाभ का विश्वास देखा जाता है, फिर तरूण मनुश्य को इस साधना से पूर्ण लाभ हो, इसके लिये तो कहना ही क्या है। यह शब्द ब्रह्म न ओंकार है न मंत्र है, न बीज है, न अक्षर है। यह अनाहत्नाद (बिना आहत् के अथवा बिना बजाये ही प्रकट होने वाला शब्द) है। इसका उच्चारण किये बिना ही चिंतन होता है। यह शब्दब्रह्म परम कल्याणमय है। प्रिय! शुद्ध बुद्धि वाले पुरूष यत्न पूर्वक निरंतर इसका अनुसंधान करते हैं। अतः 9 प्रकार के शब्द बताये गये हैं। जिन्हें प्राणवेत्ता पुरूषों ने लक्षित किया है। मैं उन्हें प्रयत्न करके बता रहा हूँ। उन शब्दों को नाद्सिद्धि भी कहते हैं। वे शब्द क्रमशः इस प्रकार हैं-

घोष, कांस्य (झांझ आदि), शृंग (सिगा आदि), घंटा, वीणां आदि, बांसुरी, दुन्दु भी, शंख, नवां मेघ गर्जन- इन 9 प्रकार के शब्दों को त्याग कर तुंकार का अभ्यास करें। इस प्रकार सदा ही ध्यान करने वाले योगी पुण्य और पापों से लिप्त नहीं होते। देवी! योगाभ्यास के द्वारा सुनने का प्रयत्न करने पर भी जब योगी उन शब्दों को नहीं सुनता और अभ्यास करते-करते मरणासन्न हो जाता है, तब भी वह दिन-रात उस अभ्यास में ही लगा रहे। ऐसा करने से सात दिनों में वह शब्द प्रकट होता है, जो मृत्यु को जीतने वाला है। देवी! वह शब्द 9 प्रकार का है। उसका मैं यथार्थ रूप से वर्णन करता हूँ।

पहले तो घोषात्मक नाद् प्रकट होता है, जो आत्म शुद्धि का उत्कृष्ठ साधन है। वह उत्तम नाद् सब रोगों को हर लेने वाला तथा मन को वशीभूत करके अपनी और खींचने वाला है।

दूसरा कांस्य-नाद है, जो प्राणियों की गति को स्तम्भित् कर देता है। वह विष, भूत और ग्रह आदि सबको बांधता है- इसमें संशय नहीं है।

तीसरा श्रृग नाद् है, जो अभिचार से सम्बन्ध रखने वाला है। उसका शत्रु के उच्चाटन और मारण में नियोग एवं प्रयोग होता है।

चैथा घंटा नाद् है, जिसका साक्षात् परमेश्वर शिव उच्चारण करते हैं। वह नाद् सम्पूर्ण देवताओं को आकर्षित कर लेता है, फिर भूतल के मनुष्यों की तो बात ही क्या है। यक्षों और गंघर्वो की कन्यायें उस नाद् से आकर्षित हो योगी को उसकी इच्छा के अनुसार महासिद्धि प्रदान करती हैं तथा उसकी अन्य कामनायें भी पूर्ण करती हैं।

पांचवा नाद् वींणा है, जिसे योगी पुरूष ही सदा सुनते हैं। देवी! उस वींणा नाद् से दूर दर्शन की शक्ति प्राप्त होती है। वंशी नाद् का ध्यान करने वाले योगी को सम्पूर्ण तत्व प्राप्त हो जाता है।

दुंदुभी नाद् का चिंतन करने वाला साधक जरा और मृत्यु के कष्ट से छूट जाता है। देवेश्वरी्! शंख नाद् का अनुसंधान होने पर इच्छा अनुसार रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। मेघ नाद् के चिंतन से योगी को कभी विपत्ति का सामना नहीं करना पड़ता। वरानने! जो प्रतिदिन एकाग्र चित्त से ब्रह्म रूपी तुंकार का ध्यान करता है, उसके लिये कुछ भी असाध्य नहीं होता।

उसे मनोवांछित सिद्धि प्राप्त हो जाती है। वह सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और इच्छानुसार रूपधारी होकर सर्वत्र विचरण करता है, कभी विकारों के वशीभूत नहीं होता। वह साक्षात् शिव ही है- इसमें संशय नहीं है। परमेश्वरी! इस प्रकार मैने तुम्हारे समक्ष शब्दब्रह्म के नवधा स्वरूप का पूर्णतया वर्णन किया है।

 

आत्मा की सत्ता

आत्मा की सत्ता महर्षि पातांजलि के अनुसार वासनाओं के अनुसार ही अगले जन्म में नया शरीर प्राप्त होता है। डार्विन का कहना है कि कामनाओं की पूर्ति के निमित्त जीवधारियों के शरीर में परिवर्तन होता रहता है और एक पीढ़ी का परिवर्तन दूसरी पीढ़ी को उत्तराधिकार के रूप में मिलता है। इस प्रकार परिवर्तन होते-होते एक योनि दूसरी योनि में परिवर्तित हो जाती है। अपने मत की पुष्टि में अफ्रीका के पशु जिराफ का उदाहरण देते हैं, जिनकी गर्दन इसलिये बहुत लंबी हो गई है कि अफ्रीका के वृक्ष बहुत ऊंचे होते हैं और उसकी पत्तियाँ खाने के लिये उन्हें अपनी गर्दन बहुत अधिक उठानी पड़ती थी। प्रत्यक्ष भी देखने में आता है कि काम-क्रोध, भय, शोक, लोभादि का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ता है, जिसका एक सूक्ष्म अंश स्थायी परिवर्तन छोड़ देता है। यही कारण है कि अनुभवी लोग मनुश्य की आकृति को देखकर बहुत ऊँचे स्वभाव एवं चरित्र का पता लगा लेते हैं।

कामना और शरीर का संबंध एक प्रकार से समझ में आता है। जीवन में जो कुछ भी हमें अपनी कामनाओं के अनुकल प्राप्त होता है, उसे ही हम रखने का प्रयत्न करते हैं और जो कुछ ऐसा प्राप्त होता है जो हमारी कामनाओं में बाधक हो, उसे हटाने का प्रबंध करते हैं और जो कामनाओं की पूर्ति में न तो सहायक है न बाधक उसकी ओर हमारी दृष्टि तटस्थता की होती है अब शरीर को लीजिये इसे न तो हम त्यागना चाहते हैं और न इसकी ओर तटस्थ हैं। यही नही, इसके छूट जाने की कल्पना तक से हम सिहर उठते हैं। अतः सिद्ध हुआ कि हमारा शरीर हमारी कामनाओं के अनुरूप ही है। पातांजलि और डार्कवन दोनों के अनुसार कामना कारण है और शरीर कार्य। प्रत्यक्ष देखने में आता है कि मृत्युकाल तक हमारी वे कामनायें नष्ट नहीं होती, जो एक शरीर के बिना पूरी नही हो सकती तो फिर जिस प्रकार एक घर के नष्ट हो जाने पर यदि वे कामनायें नष्ट नहीं हुई, जिनकी पूर्ति एक घर के बिना असंभव है, एक वस्त्र के बिना असंभव है, तो हम अपनी आवश्यकता, सामथ्र्य और परिस्थितियों के अनुसार नया घर अथवा नये वस्त्र को प्राप्त होते हैं।

उसी प्रकार एक शरीर छूट जाने पर यदि हमारी कामनायें नहीं छूटी, जिनकी पूर्ति एक शरीर के बिना असंभव है, तो हम अपनी वासना, सामथ्र्य और परिस्थितियों के अनुसार एक नया शरीर धारण करते हैं। जब तक कारण नष्ट नहीं हुआ, कार्य नष्ट नहीं हो कर वह अपना रूप बदलता रहता है। शरीर और वासना का संबंध समझ लेने के पश्चात् हम यह भी जान सकते हैं कि अगले जन्म में किसे कौन सी योनि प्राप्त होगी। जो लोग अति कामुक हैं उन्हें बंदर या चिड़े की योनि प्राप्त होनी चाहिये; क्योकि मानव शरीर में इतने काम सेवन की क्षमता नहीं है। इसलिये अत्यंत क्रोध वालों के लिये हम सर्प योनि की भविष्यवाणी कर सकते हैं।

एक वस्त्र छूट जाने पर दूसरा वस्त्र धारण करने तक के बीच का जो समय निर्वस्त्रता का है, वैसा ही एक शरीर छूट जाने पर दूसरा शरीर प्राप्त होने के बीच का समय प्रेतावस्था का है। पर आजकल विकासवादी धूम है। शरीर रचना में वासना के महत्व को स्वीकार करते हुये भी विकासवाद पुनर्जन्म को नही मानता । विकासवादी शरीर से भिन्न आत्मा की सत्ता स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार जड़ के एक विशेष संयोग से चेतन उत्पन्न हो जाता है और शरीर के नष्ट होने के साथ-साथ वह भी नष्ट हो जाता है। अतः पुनर्जन्म या परलोक का भी कोई प्रश्न नहीं उठता। हम पुनर्जन्मवादी इसमें केवल इतना स्वीकार करते हैं कि जड़ के विशेष प्रकार के संयोग में विशेष प्रकार की आत्मा को आकर्षित करने की शक्ति आ जाती है परंतु वह संयोग आत्मा को उत्पन्न कर देता है-

हम यह स्वीकार नहीं कर सकते । गुड़ में मक्खी को आकर्षित करने की शक्ति है। वह मक्खी को उत्पन्न नही कर सकता । यदि चेतन की उत्पत्ति केवल जड़ और परिस्थितियों पर ही निर्भर है तो एक ही परिस्थिति में उसी जड़ का केवल एक अंश ही मनुश्य क्यों बना? दूसरा वनस्पति बनकर क्यों रूक गया ? तीसरा केवल मछली तक और चैथा केवल वानर तक ही क्यों पहुंच पाया और पांचवाँ आज भी क्यों जड़ है? एक उद्योगशाला में एक ही परिस्थिति में एक से कच्चे माल से जो पदार्थ निर्मित होते हैं, वे एक से होते हैं, जबकि क्रमिक विकास की सृष्टि में ऐसा नही है। यहाँ तक कि मानव योनि में भी कोई दो व्यक्ति ऐसे नही मिलेंगें, जिनके अंगूठों की छाप तक एक जैसी हो। अतः मानना पड़ेगा कि जीवधारियों के पारस्परिक भेद का कारण परिस्थिति विकासवाद और वंशानुक्रम के अतिरिक्त कुछ और भी है।

जिस क्षेत्र में मानव का अवतरण हो चुका है।, वहाँ बंदर अब भी रहते हैं। अतः मानना पड़ेगा कि जो वानर मनुश्य बन गये, वे विशेष प्रकार के वानर थे और इन वानरों से भिन्न थे, जो मानव नहीं बन पाये और जो आगे चलकर मानव बनने का कोई लक्षण उनमें आज भी पाया जाता है इसी प्रकार जो जड़ मछली बना और जो मछली वानर बनी, वह आज के जड़ और मछली से नितांत भिन्न थे। नही तो क्या कारण है कि हमारा वर्तमान जड़ मछली और आज की मछली वानर नहीं बन सकी। प्रकृति में इतनी विषमता क्यों हुई कि उसकी क्रमिक विकास की चेष्टा का कुछ तो प्रभाव हुआ और कुछ पर नही और जिन पर हुआ उन पर भी एक सा नही ? यदि सारा ही जड़ मानव बन जाये तो मानव क्या एक दूसरे को खायेगा? क्रमिक विकास के साथ साथ प्रकृति की यह चेष्टा भी देखने को मिलती है कि जड़ वनस्पति, जलचर, नभचर, वनचर और मानव में एक उचित संतुलन रखा जाये, नहीं तो विकास का अर्थ विनाश होगा। अतः मानना पड़ेगा कि इस क्रमिक विकास के पीछे भी किसी चेतन सत्ता का हाथ है जड़वादी यह बतलाने में असमर्थ हैं कि यदि पृथ्वी पर भी वे परिस्थितियाँ उत्पन्न न हुई होती जो क्रमिक विकास का कारण बनी और सारी पृथ्वी जड़ पड़ी रहती जैसा कि बहुत से ग्रह अब भी पड़े हुये हैं तो क्या हानि थी? मनुश्य का अवतरण जैसी एक भीषण क्रांति जो आगे चलकर सारी क्रान्तियों का कारण बनी -क्या एकमात्र संयोग की बात है? क्या इस विकास में मनुश्य का अपना कुछ कर्तव्य नहीं है? क्या यह सब निरूद्देश्य है? यदि ऐसा ही है तो फिर मनुश्य जीवन में ही उद्देश्य की स्थापना क्यों की जाये? जब मानव जड़ का ही एक रूप है तो मानव जीवन की महत्ता ही क्या रही? जब मानव को यह शरीर उसके पूर्वजन्मकृत सुकृत का फल न होकर केवल संयोगवश प्राप्त हुआ है तो उससे यह छीन लेने में कौन सा पाप है?

परलोकवाद को न मानने वाले और नैतिकता के समर्थक यह कहा करते हैं कि मनुश्य को अपने पाप पुण्यों का फल इसी जन्म में मिल जाता है। ऐसा भी हो तो इतना तो वे भी स्वीकार करेंगें कि हमें अपने पाप पुण्य का फल तत्काल नहीं मिलता। परिस्थिति व दूसरों की चेष्टा के अतिरिक्त इसमें हमारी चेष्टा भी एक बहुत बड़ा कारण होती है। प्रयत्न करने पर हम अपने पाप कर्मों के फल को कुछ और समय तक के लिये टाल सकते हैं तो जीवन पर्यंत भी टाल सकते हैं। केवल परलोकवादी ही धर्म पर स्थिर रह सकता है; क्योंकि वह समझता है कि यदि पाप कर्म का फल आजीवन टाल भी दिया तो उसे परलोक या अगलेे जन्म में भोगना पड़ेगा।

अतः वह पाप करने का और यदि पाप बन गया तो उसके फल को टालने का प्रयत्न नहीं करता जबकि जड़वादी की सारी चेष्टा यही रहती है कि जिन पापों से अपने स्वार्थ की पूर्ति होती है। उन्हें इस प्रकार करो कि जिससे उनका फल न भोगना पड़े। इसी प्रकार पुण्यकर्म करने के बाद उसका फल प्राप्त करने के लिये भी जड़वादी बहुत उतावला रहता है क्यो कि पुण्य कर्म का फल भी तत्काल नहीं मिलता। जड़वादी समझता है कि यदि इसी बीच में मेरी मृत्यु हो गई तो वह पुण्यकर्म निष्फल गया। परलोक वादी ऐसा नहीं मानता । वह समझता है कि इस जन्म में न सही अगले जन्म में फल अवश्य मिलेगा। नैतिक आचरण के पक्ष में जड़वादियों का कहना है कि हमंे जनता को यह समझाना चाहिये कि हमारे पाप पुण्यों के कर्मों का फल हमें भले ही न मिले, वह हमारे समाज, जाति, राष्ट्र, मानवता व भावी पीढि़यों को अवश्य प्राप्त होगा।

यह ठीक है कि कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति कर्म करते समय उसके परिणाम को न केवल व्यक्तिगत, अपितु पारिवारिक, सामाजिक जातीय, राष्ट्रीय व भावी पीढि़यों की दृष्टि से भी सोचता है; परंतु हमें यह नहीं भूल जाना चाहिये कि ये सारे पारिवारिक सामाजिक, जातीय, राष्ट्रीय व भावी पीढ़ीगत स्वः-व्यक्तिगत स्वः के ही विस्तार हैं और जब तक मनुश्य की समझ में यह न आ जाये कि उसके पाप पुण्य कर्मो का फल उसके व्यक्तिगत स्वः को भी अवश्य प्राप्त होगा, तब तक नैतिकता के लिये कोई भी सुदृढ़ आधार नहीं मिलता। जड़वाद नहीं, परलोकवाद ही व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक जातीय, राष्ट्रीय मानवतागत व भावी पीढ़ीगत सभी ‘स्व’ में समन्वय स्थापित करता है और बतलाता है जो बात विशाल से विशालतर सबके लिये लाभदायक है। इस प्रकार आत्मा और परलोक का अस्तित्व न मानने से नैतिकता की जड़ें हिल गयी हैं।

जब मानव जड़ का ही एक रूप है तो फिर जड़ से अधिक उसका महत्व क्यों? रही सुसंस्कृत मन की बात तो सुसंस्कृत मन तो वही कहा जायेगा जो सारे विश्व को ‘सीयाराममय’ जानकर युगपत नमस्कार करता है, न कि वह अपने को भी जड़वाद मानकर चलता है। एक विकासवादी भावी पीढ़ी की भी चिंता क्यों करें? जब हमारे पूर्वज जड़, मत्स्य और वानरों ने भावी पीडि़यों की कोई चिंता किये बिना और न इनमें इस प्रकार की चिंतन की कोई क्षमता ही थी, अपनी भावी पीढि़यों को मानव बनाकर दिखला दिया तो हम भावी पीढि़यों की चिंता कर इससे भी अधिक अच्छे परिणाम दिखला सकेगें? जीवन में सबसे महत्वपूर्ण घटना हमारा अपना जीवन है। व्यक्तिगत दृष्टि से और सामूहिक दृष्टि से मनुश्य का पृथ्वी पर अवतरण।

यदि जन्म नहीं तो, कुछ भी नही और यदि पृथ्वी पर मानव अवतरित न हुआ होता तो। और यही जन्म हमारे अपने पाप पुण्य का फल न होकर केवल संयोगमात्र है और यही पृथ्वी पर मानव का अवतरण उसके पूर्वजों की योजना तथा पुरूषार्थ का परिणाम न होकर प्रकृति की एक चेष्टा मात्र है तो हमारे सारे पुरूषार्थ एवं प्रयास का क्या मूल्य रह जाता है? इस प्रकार जड़वाद की पुरूषार्थ से संगति नही बैठती। फिर यह जड़वाद यह भी नहीं बतलाता कि जब अनादि काल से सृष्टि जड़ चली आ रही थी तो यकायक यह रचना क्यों आरंभ हो गई। क्या पहले भी ऐसी कोई रचना आरंभ होकर नष्ट हुई है? नष्ट नहीं हुई तो वह कहां है और यह विकास कब तक चलता रहेगा? इसकी कोई अंतिम परिणति है या नही, तो वह क्या है। विकासवाद अंतिम सत्य नहीं है। अधिक से अधिक वह एक देशीय सत्य हो सकता है। अंतिम दर्शन तो भारतीय दर्शन है। जिसमें उचित स्थान विकासवाद को भी मिला है और आत्मा एवं शरीर की पृथक सत्ता व पुनर्जन्म सभी भारतीय मनीषियों ने स्वीकार किया है और हमारे आचार्यो के अतिरिक्त अनेक महापुरूषों और जातियों ने, जिनमें से कुछ के नाम नीचे दिये जाते हैं-

 

  1. पाईथागोरस प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक एवं गणितज्ञ।
  2. हेनरी फार्ड प्रसिद्ध अमेरिकन धनकुबेर एवं उद्योगपति।
  3. गाल जाति वर्तमान आयरलैण्ड वासियों के पूर्वज। इनमें सती की प्रथा भी थी।
  4. इंग्लैण्ड के वेल्स प्रदेश के निवासियों के पूर्वज जो पुनर्जन्म, निर्वाण वेदांत, ज्योतिष और देवी देवताओं तथा यज्ञ में विश्वास रखते थे। इनका कहना था कि

ष् लवन सपअमक दक कपमक उंदल जपउमे नदजपस लवन मतम मक बसमंद व नउंद पससे दक उमदजंस पउचनतपजलण्ष्

जब तक मनुश्य पाप और वासनाओं से मुक्त नही हो जाता तब तक वह बार-बार जन्म मरण को प्राप्त होता रहता है। यह जाति बड़ी विद्याव्यसनी थी। इनके बड़े-बड़े पुस्तकालय एवं विद्यालय थे। लगभग 4000 वर्ष तक इस जाति की तूती बोली। जब रोमन लोगों ने (60 ई0 पू0 लगभग) इन पर आक्रमण करके इनके पुस्तकालय तथा विद्यालय फूक डाले और इनका हत्याकांड आरंभ कर दिया तो वे नार्वे तथा आइसलैंड भाग गये। ये लोग अब से 6000 वर्ष पूर्व दक्षिणी एशिया से चलकर मिश्र, यूनान, फ्रांस होते हुये इंग्लैंड पंहुचे थे।

संतान प्राप्ति के लिये शास्त्रीय उपाय ‘संतानगोपाल मंत्र

संतान प्राप्ति के लिये शास्त्रीय उपायों में ‘संतानगोपाल मंत्र’ की साधना अत्यंत प्रभावशाली है। अतः संतान की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस मंत्र का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये। इस मंत्र का जप दो प्रकार से किया जाता है। एक बीज सहित और दूसरे बिना बीज मंत्र के। बीज सहित मंत्र शीघ्र फलदायी होता है। किन्तु इसे गुरू से दीक्षा लिये हुये व्यक्ति को ही करना चाहिये, बिना बीजाक्षरों के कोई भी कर सकता है। आगे बीज सहित संतानगोपाल मंत्र के अनुष्ठान की विधि दी जा रही है। यदि पाठक स्वयं न कर सके तो किसी विद्वान ब्राह्मण से यह अनुष्ठान करवा सकते हैं। इस मंत्र की सम्पूर्ण जप संख्या 100000 (एक लाख मंत्र) है। उसका दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण और तर्पण का दशांश मार्जन करना चाहिये। यदि बिना बीज मंत्र के साधक स्वयं जप करता है तब चैगुना संख्या में जप करने का शास्त्र निर्देश है। सर्वप्रथम निम्नांकित वाक्य पढ़कर विनियोग करे- अस्य श्रीसंतान गोपाल मंत्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छंद्ः, श्रीकृष्णो देवता, ग्लौं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अंगन्यास- ‘देवकीसुत गोविंद’ हृदयाय नमः (इस वाक्य की बोलकर दाहिने हाथ की मध्यमा, अनामिका और तर्जनी अंगुलियों से हृदय का स्पर्श करें)। ‘वासुदेव जगत्पते’ शिरसे स्वाहा’ (इस वाक्य को बोलकर सिर का स्पर्श करें)। ‘देहि में तनयं कृष्ण’ शिखयै वषट् (इस वाक्य को बोलकर दाहिने हाथ के अंगुठे से सिर का स्पर्श करें)। ‘त्वामहं शरणं गतः’ ( इस वाक्य को बोलकर दाहिनी हाथ के पाँचों उंगलियों से बायीं भुजा का एवं बायीं हाथ की पाँचों उंगलियों से दाहिनी भुजा का स्पर्श करें)। ‘ऊँ नमः’ अस्त्राय फट् (इस वाक्य को बोलकर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से पीछे की ओर ले जाकर दाहिनी ओर से आगे कि ओर ले आय और तर्जनी तथा मध्यमा उंगुलियों से बाँय हाथ की हथेली पर बजायें।

इसके पश्चात् निम्नांकित रूप से ध्यान करें-

 

वैकुण्ठाद्गतं कृष्णं रथस्थं करूणानिधिम्।

किरीटिसारथि पुत्रमानयंत्र परात्परम्।। 1 ।।

आदाय तं जलस्थं च गुरूवे वैदिकाय च।

अर्पयंतं महाभागं ध्यायेत् पुत्रार्थमच्यृतम्।। 2 ।।

‘पार्थसारथि अच्युत भगवान् श्रीकृष्ण करूणा के सागर हैं। वे जल में डूबे हुए गुरू पुत्र को लेकर आ रहें है। वे वैकुण्ठ से अभी-अभी पधारे हैं और रथ पर विराजमान हैं। अपने वैदिक गुरू सांदीपनि को उनका पुत्र अर्पित कर रहें है- साधक पुत्र की प्राप्ति के लिए इस रूप में महाभाग भगवान् श्रीकृष्ण का चिंतन करें’।

मूल मंत्र (बीज सहित) –

ऊँ श्रीं ह्नीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः।।’

इस मंत्र का भावार्थ इस प्रकार है- सच्चिदानंद स्वरूप, ऐश्वर्यशाली, कामनापूरक, सौभाग्य स्वरूप, देवकीनंदन! गोविंद! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरण में आया हुँ, आप मुझे पुत्र प्रदान करें।

आगे संतान गोपाल मंत्र बिना बीज मंत्र के भी दिया जा रहा है जिसे कोई भी साधक संकल्प लेकर स्वयं ही कर सकता है।

संतानगोपाल मंत्र- 2

विनियोग

अस्त श्रीसंतानगोपालमंत्रमंत्रस्य ब्रह्म ऋषिर्गायत्रीच्छंदः, श्रीकृष्ण देवता, क्लीं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अंगन्यास-

ग्लौं हृदयाय नमः। क्लीं श्शिरसे स्वाहा। ह्नीं शिखायै वषट्। श्रीं कवचाय हुम्। ऊँ अस्त्राय फट्।

ध्यान-

यांखचक्रगदापह्मं दधानं सूतिकागृहे।

अंके शयानं देवक्याः कृष्णं वंदे विमुक्तये।।

जो सूतिकार गृह में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये माता देवकी की गोद में सो रहें हैं, उन भगवान् श्री कृष्ण की मैं (संतान रूप में ) मोक्ष की प्राप्ति के लिए वन्दना करता हूँ।

बिना बीज का मूल मंत्र इस प्रकार है-

ऊँ नमो भगवते जगदात्मसूतये नमः’

(सम्पूर्ण जगत् जिनकी अपनी संतान है, उन भगवान् श्री कृष्ण को नमस्कार है) इसका चार लाख जप करना चाहिए।

 

दण्डाधिकारी शनिदेव

दण्डाधिकारी शनिदेव शनिदेव की चित्र-विचित्र विशिष्टताओं की व्याख्या करने के लिये अनेकानेक प्रसंग प्राचीन भारतीय साहित्य में उपलब्ध होते हैं इनके द्वारा क्रूर तथा अनुकूल फल देने वाले शनि ग्रह की सामथ्र्य का पता चलता है। शनि के स्वरूप को यमझने के लिये इन पुराण के आख्यानों का उल्लेख आवश्यक है। इनसे ज्ञात होता है कि शनि ने ईश्वरीय अवतारों से लेकर चक्रवर्ती सम्राटों तक को अपनी विशेष ऊर्जा से विचलित किया है।

परब्रह्म के रूवरूप- ब्रह्मा-विष्णु-महेश में भूतभावन भगवान् शंकर ने सृष्टी के संहार अथवा विसर्जन का दायित्व ग्रहण किया है। सृर्ष्टि के समस्त जीवधारियों को आचरण के अनुरूप अनुशासित करना बहुत कठिन कार्य था। इस वृहत्तर कार्य में अपनी सहायता हेतु भगवान् शिव ने सहयोगी गणों को जब अपने साथ लिया था प्रायः इसी समय छाया के गर्भ से भगवान् भास्कर के 9 पुत्रों ने जन्म लिया था। इन 9 पुत्रों में शनि एवं यम की भयोत्पादक गतिविधियाँ विस्मयकारी थी। इनके प्रचण्ड बाहुबल से दैवी शक्तियाँ अत्यंत प्रभावित थीं। परिणामतः कल्याण तथा विध्वंस के देव भवान शंकर ने इन्हें अपनी सेवा में ग्रहण कर लिया। शनिदेव को शिव द्वारा कर्मानुसार दण्ड प्रदान करने का अधिकार प्राप्त हुआ। यम मृत्यु के निमित्त नियुक्त हुए। इस पुराणगाथा में शनि के कारकत्व से संबधित अनेक सूक्ष्म संकेत उपलब्ध होते हैं। साथ ही शनि-उपचार में शिवोपासना का माहात्म्य भी रेखांकित होता है।

भगवान् सूर्य के नौ पुत्रों में अपनी भीषणता के लिए शनि सर्वोपरि हैं। कृष्ण वर्ण यमुना शनि की सहोदरा और कालनियन्त्रक यम शनि के अनुज हैं। शनि की रूक्षता का कारण उनका विचित्र परिवार भी है। पुराण कथाओं के अनुसार सन्तानों के योग्य होने पर सूर्य ने प्रत्येक सन्तान हेतु एक-एक लोक की व्यवस्था की। किन्तु प्रकृति से पापप्रधान ग्रह शनि अपने एक लोक के अधिपत्य से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने समस्त लोकों पर आक्रमण करने की योजना तैयार की। सूर्य को शनि की भावना से अत्याधिक पीड़ा हुई। किन्तु उनके परामर्श का शनि पर कोई प्रभाव नहीं पडा। अन्ततः सूर्य ने भगवान् शिव से आतुर निवेदन किया। भक्तभयहारी शिव ने तब उद्दण्ड शनि को चेतावनी दी। शनि ने जब उपेक्षा की तो शिव-शनि युद्ध प्रारम्भ हुआ। शनि ने अदभुत पराक्रम से नन्दी तथा वीरभद्र सहित समस्त शिवगणों को परास्त कर दिया। अपने सैन्यबल का संहार देखकर शिव कुपित हो गये। उन्होंने प्रलयंकारी तृतीय नेत्र खोल दिया। शनि ने भी अपनी मारक दृष्टि का संधान किया। शिव और शनि की द्रिष्टियों से उत्पन्न एक अप्रतिम ज्योति ने शनि लोक को आच्छादित कर लिया।

तत्पश्चात भगवान् शंकर ने क्रोधित होकर शनि पर त्रिशूल से प्रहार किया। शनि यह आघात सहन नहीं कर सके। वह संज्ञासून्य हो गये। पुत्र की यह स्थिति देखकर सूर्य का पुत्रमोह जाग उठा। भगवान् आशुतोष से उन्होंने शनि के जीवन रक्षण हेतु भावभरा निवेदन किया आशुतोष ने प्रसन्न होकर शनि के संकट को हर लिया इस घटना से शनि ने भगवान् शिव की सर्वसमर्थता स्वीकार कर ली। उन्होंने शिव से पुनः पुनः क्षमायाचना की। शनि ने यह भी इच्छा व्यक्त की कि वह अपनी समस्त सेवायें शिव को समर्पित करना चाहते हैं। प्रचण्ड पराक्रमी शनि के रणकौशल से अभिभूत भूतभावन भगवान् भोले नाथ ने शनि को अपना सेवक बना लिया। शिव ने शनि को दण्डाधिकारी नियुक्त किया।

 

जन्म कुंडली के विशेष योग

यूं तो एक जातक की जन्मकुंडली में सैकड़ों योग बनते हैं, इनमें से कुछ योग बलवान होते हैं, और कुछ निर्बल। निर्बल योगों का फल कब फलित हुआ यह पता ही नहीं चलता, और बलवान योग अपना फलित प्रकट करते हुए स्पष्ट दिखाई देते हैं। इस लेख में कुंडली के कुछ विशेष योग बताए ज रहे हैं, जो अपना न्यूनाधिक फल देते हैं।

द्विभार्या योग :-

राहू लग्न में पुरुष राशि (सिंह के अलावा) में हो अथवा 7वें भाव में सूर्य, शनि, मंगल, केतु या राहू में से कोर्इ भी दो ग्रह (युति दृष्टि द्वारा) जुड़ जाएं तो द्विभार्या योग बनता है। (ऐसे में सप्तमेष व द्वादशेश की स्थिति भी विचारनी चाहिए)। अष्टमेश सप्तमस्थ हो तो द्विभार्या योग होता है।

राजयोग :-

नवमेश तथा दशमेश एकसाथ हो तो राजयोग बनता है। दशमेश गुरू यदि त्रिकोण में हो तो राजयोग होता है। एकादशेश, नवमेश व चन्द्र एकसाथ हो (एकादश स्थान में) तथा लग्नेश की उन पर पूर्ण दृष्ट हो तो राजयोग बनता है। ( राजयोग में धन, यश, वैभव, अधिकार बढ़ते है)

विपरीत राजयोग :-

6ठें भाव से 8वें भाव का सम्बन्ध हो जाएं। अथवा दशम भाव में 4 से अधिक ग्रह एक हो जाएं। या फिर सारे पापग्रह प्राय: एक ही भाव में आ जाए तो विपरित योग बनता है। इस राजयोग के भांति यदा तरक्की नही होती जाती। किन्तु बिना प्रयास के ही आकस्मिक रूप से सफलता, तरक्की धन या अधिकार की प्राप्ति हो जाती है।

आडम्बरी राजयोग :-

कुंडली में समस्त ग्रह अकेले बैठें हो तो भी जातक को राजयोग के समान ही फल मिलता है। किन्तु यह आडम्बरी होता है।

विद्युत योग :-

लाभेश परमोच्च होकर शुक्र के साथ हो या लग्नेश केन्द्र में हो तो विधुत योग होता है। इसमें जातक का भाग्योदय विधुतगति से अर्थात अति द्रुतगामी होता है।

नागयोग :-

पंचमेश नवमस्थ हो तथा एकादशेश चन्द्र के साथ धनभाव में हो तो नागयोग होता है। यह योग जातक को धनवान तथा भाग्यवान बनाता है।

नदी योग :-

पंचम तथा एकादश भाव पापग्रह युक्त हों किन्तु द्वितीय व अष्टम भाव पापग्रह से मुक्त हों तो नदी योग बनता है, जो जातक का उच्च पदाधिकारी बनाता है।

विश्वविख्यात योग :-

लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, दशम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक विश्व में विख्यात होता है। इसे विश्वविख्याति योग कहते है।

अधेन्द्र योग :-

लग्नकुंडली में सभी ग्रह यदि पांच से ग्यारह भाव के बीच ही हों तो अधेन्द्र योग होता है। ऐसी जातक सर्वप्रिय, सुन्दर देहवाला व समाज में प्रधान होता है।

दरिद्र योग :-

केन्द्र के चारों भाव खाली हों अथवा सूर्य द्वितीय भाव में तथा द्वितियेश शनि वक्री हों और 2, 8, 6, 12 या 3 भाव में हों तो लाख प्रयास करने पर भी जातक दरिद्र ही रहता है।

बालारिष्ट योग :-

चन्द्रमा 5, 7, 8, 12 भाव में हो तथा लग्न पापग्रहों से युत हो तो बालारिष्ट योग बनता है। अथवा चन्द्रमा 12वें भाव में क्षीण हो तथा लग्न व अष्टम में पापग्रह हों, केन्द्र में भी कोर्इ शुभ ग्रह न हो तो भी बालारिष्ट योग बनता है। बालारिष्ट योग में जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है। अथवा बाल्यवस्था में उसे मृत्यु तुल्य कष्ट झेलना पड़ता है।

मृतवत्सा योग :-

पंचमेश षष्ठ भाव में गुरू व सूर्य से युक्त हो तो जातक की पत्नी का गर्भ गिरता रहता है। अथवा मृत संतान पैदा होती है। अत: इसे मृतवत्सा योग कहते है।

छत्रभंग योग :-

राहू, शनि व सूर्य में से कोर्इ भी दो ग्रह यदि दशम भाव पर निज प्रभाव ड़ालते है। और दशमेश सबल न हो तो छत्रंभग योग बनता है। जातक यदि राजा है तो राज्य से पृथक हो जाता है। अन्यथा कार्यक्षेत्र व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयां व विघ्न आते है, तरक्की नही हो पाती।

चाण्डाल योग :-

क्रूर व सौम्य ग्रह एक ही भाव में साथ हों तो चाण्डाल योग बनता है। विशेषकर गुरू-मंगल, गुरू-शनि, या गुरू-राहू साथ हों तो। इससे योग के बुरे फल मिलते है। तथा जातक की संगति व सोच दूषित हो जाते है।

सुनफा योग :-

कुंडली में चन्द्रमा जहां हो उससे अगले भाव में (सूर्य को छोड़कर) यदि कोर्इ भी ग्रह बैठा हो तो सुनफा योग बनता है। इससे जातक का लाभ बढ़ता है। (यदि आगे बैठने वाला ग्रह सौम्य या चन्द्रमा का मित्र है तो शुभ लाभ व फल बढ़ते है। अन्यथा कुछ अपेक्षाकृत कमी आ जाती है)।

महाभाग योग :-

यदि जातक दिन में जन्मा है। (प्रात: से साय: तक) तथा लग्न, सूर्य व चन्द्र विषम राशि में है। तो महाभाग योग बनता है। यदि रात में जन्मा है। (साय: के बाद प्रात: से पूर्व) तथा लग्न, सूर्य व चंद्र समराशि में है। तो भी महाभाग योग बनता है। यह सौभाग्य को बढ़ाता है।

प्रेम विवाह योग :-

तृतीय, पंचम व सप्तम भाव व उनके भावेषों का परस्पर दृष्टि युति राशि से संबध हो जाए तो जातकों (स्त्री-पुरूष) में प्रेम हो जाता है। लेकिन यदि गुरू भी इन संबधो में शामिल हो जाए तो उनका प्रेम ‘प्रेम विवाह’ में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन तृतीय भाव व तृतीयेश न हो, केवल पंचम, सप्तम भाव व भावेश का ही दृष्टि, युति, राशि संबंध हों और गुरू भी साथ हो तो जातक प्रेम तो करता है, लेकिन जिससे प्रेम करता हेै। उससे विवाह नही करता। भले ही जातक स्त्री हो या पुरूष।

गजकेसरी योग :-

लग्न या चन्द्र से गुरू केन्द्र में हो तथा केवल शुभग्रहों से दृष्टयुत हो, अस्त, नीच व शत्रु राशि में न हो तो गजकेसरी योग होता है। जो जातक को अच्छी पहचान प्रतिष्ठा दिलाता है।

बुधादित्य योग :-

10वें भाव में बुध व सूर्य का योग हो। पर बुध अस्त न हो तथा सूर्य मित्र या उच्च का हो तो व्यापार में सफलता दिलाने वाला यह योग बुधादित्य योग के नाम से जाना जाता है।

पापकर्तरी योग :-

शुभ ग्रह जिस भाव में हो उसके पहले व बाद के भाव में क्रूरपापग्रह हों तो पापकर्तरी योग बनता है। इससे बीच के भाव में बैठा हुआ ग्रह पाप प्रभाव तथा दबाव में आकर पीड़ित होता है। अत: शुभ फल कम दे पाता है, उसी भाव में शुभ ग्रह दो पापग्रहों या दो से अधिक पापग्रहों के साथ बैठे तो पापमध्य योग बनता है।

सरकारी नौकरी/व्यवसाय का योग :-

जन्मकुंडली में बाएं हाथ पर ग्रहों की संख्या अधिक हो तो जातक नौकरी करता है। दाएं हाथ पर अधिक हों तो व्यापार करता है। सूर्य दाएं हाथ पर हों तो सरकारी नौकरी कराता है। शनि बाएं हाथ पर हो तो नौकरी कराता है। 10 वें घर से शनि व सूर्य का सम्बन्ध हो जाए (दृष्टियुतिराशि से) तो जातक प्राय: सरकारी नौकरी करता है। गुरू व बुध बैंक की नौकरी कराते है। बुध व्यापार भी कराते है। गुरू सुनार का अध्यापन कार्य भी कराता है।

विजातीय विवाह योग :-

राहू 7वें भाव में हो तो जातक का विवाह प्राय: विजातीय विवाह होता है। (पुरूष राशि में हो तो और भी प्रबल सम्भावनाएं होती है।

चक्रयोग :-

यदि किसी कुंडली में एक राशि से छ: राशि के बीच सभी ग्रह हों तो चक्रयोग होता है। यह जातक को मंत्री पद प्राप्त करने वाला होता है।

अनफा योग :-

यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा से पिछले भाव में कोर्इ शुभ ग्रह हों तो अनफा योग बनता है। इससे चुनाव में सफलता तथा अपने भुजाबल से यश, धन प्राप्त होता है।

भास्कर योग :-

सूर्य से दूसरे भाव में बुध, बुध से 11वें भाव में चन्द्र और चन्द्र से त्रिकोण में गुरू हो तो भास्कर योग होता है। ऐसा जातक प्रखरबुद्वि, धन, यश, रूप, पराक्रम, शास्त्र ज्ञान, गणित व गंधर्व विधा का जानकार होता है।

चक्रवती योग :-

यदि कुंडली के नीच /पाप ग्रह की राशि का स्वामी या उसकी उच्च राशि का स्वामी लग्न में हो या चन्द्रमा से केन्द्र (1,4,7,10) में हो तो जातक चक्रवती सम्राट या बड़ी धार्मिक गुरूनेता होता है।

कुबेर योग :-

गुरू, चन्द्र, सूर्य पंचमस्थ, तृतीयस्थ व नवमस्थ हो और बलवान स्थिति में भी हो तो जातक कुबेर के समान धनी व वैभवयुक्त होता है।

अविवाहित/विवाह प्रतिबंधक योग :-

चन्द्र पंचमस्थ हो या बलहीन अस्त पाप पीडित हो तथा 7वें व 12वें भाव में पापग्रह हो तो जातक कुंआरा ही रहता है। शुक्र व बुुध 7वें भाव में शुभग्रहों से दृष्ट न हों तो जातक कुंआरा रहता है। अथवा राहू व चन्द्र द्वादशस्थ हों तथा शनि व मंगल से दृष्ट हों तो जातक आजीवन कुंआरा रहता है। इसी प्रकार सप्तमेष त्रिकस्थान में हो और 6, 8, 12 के स्वामियों में से कोर्इ सप्तम भाव में हो तब भी जातक कुंआरा रहता है। शनि व मंगल, शुक्र व चन्द्र से 180° पर कुंडली में हो तो भी जातक कुंआरा रहता है।

पतिव्रता योग :-

यदि गुरू व शुक्र, सूर्य या मंगल के नवमांश में हो तो जातक एक पत्नीव्रत तथा महिला जातक पतिव्रता होती है। यदि द्वितीयेश व सप्तमेश नीच राशि में हो परन्तु सभी शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हो तो स्त्री जातक पतिव्रता तथा जातक एक पत्नीव्रत वाला होता है। बुध यदि गुरू के नवमांश में हों तो भी पतिव्रता योग होता है चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हो (महिला कुंडली) पाप प्रभाव में न हो तों भी स्त्री पति के लिए कुछ भी कर सकने वाली होती है।

अरिष्ट योग :-

शुक्लपक्ष की रात्रि का जन्म हो और छठे या 8वें भाव में चन्द्र हो तो सर्वारिष्ट नाशक योग होता है। जन्म राशि का स्वामी 1, 4, 7, 10 में स्थित हों तो भी अरिश्टनाशक योग होता है। चन्द्रमा, स्वराशि, उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो सर्वारिष्ट नष्ट होते है। चन्द्रमा के 10वें भाग में गुरू, 12वें में बुध, शुक्र व कुंडली के 12वें में पापग्रह हों तो भी अरिष्ट नष्ट होते है।

मूक योग :-

गुरू व षष्ठेश लग्न में हो अथवा बुध व षष्ठेश की युति किसी भी भाव (विशेषकर दूसरे) में हो। अथवा क्रूर ग्रह सनिध में और चन्द्रमा पापग्रहों से युक्त हो। या कर्क, वृश्चिक व मीन राशि के बुध को अमावस्य का चन्द्र सम्बन्ध है। तो मूक योग बनता है। इस योग में जातक गूंगा होता है।

विशेष योग :-

8 व 12 राशि पापग्रहों से युक्त हो तथा किसी भी राशि के अंतिम अंशो में वृष राशि का चन्द्र हो तथा चंद्र पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो जातक जीवन भर गूंगा रहता है।

बधिर योग :-

शनि से चौथे स्थान में बुध हो तथा षष्ठेश त्रिक भावों में हो तो बधिर योग होता है। अथवा पूर्ण चन्द्र व शुक्र साथ बैठे हो तो बधिर योग बनता है। 12वें भाव में बुध-शुक्र की युति हो अथवा 3, 5, 9, 11 भावों में पापग्रह बिना शुभ ग्रहों से दृष्ट हों अथवा 6,12 भाव में बैठे षष्ठेश पर शनि की दृष्टि न हो तो भी बधिर योग होता है।

पितृ-दोष

Dr.R.B.Dhawan

पितृ-दोष होता क्या है? –

हमारे ही पूर्वज सूक्ष्म लोक से अपने सूक्ष्म शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं, और महसूस करते हैं कि, हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति कोई श्रद्धा रखते हैं, और न ही इन्हें हमसे कोई प्यार या स्नेह है, और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं, ना ही अपने पूर्वजों के ऋण चुकाने का प्रयास करते हैं, तो ये आत्माएं दु:खी होकर अपने ही वंशजों को श्राप दे देती हैं, जिसे ‘पितृ-दोष’ कहा जाता है।

पितृ-दोष एक ऐसी बाधा है जो अदृश्य रहकर भी बहुत कष्ट देती है। ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण उत्पन्न होती है । पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं, जैसे :- आपके आचरण से, किसी परिजन द्वारा जानबूझ कर की गयी गलती से, श्राद्ध आदि कर्म ना करने से, अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण ऐसा हो सकता है।

पितृ-दोष के दुष्प्रभाव :-  मानसिक पीड़ा (टेंशन) अवसाद, व्यापार में हानि, परिश्रम के अनुसार फल न मिलना, वैवाहिक जीवन में समस्याएं, कैरिअर में समस्याएं, या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है। पितृ-दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति, गोचर, दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते, कितना भी पूजा पाठ, देवी, देवताओं की अर्चना की जाए, उसका शुभ फल नहीं मिल पाता।

पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है:-

1. अधोगति वाले पितरों के कारण।

2. उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण।

अधोगति वाले पितर :- इनके दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, और अतृप्त इच्छाएं, जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत उपभोग होने पर, विवाहादि में परिजनों द्वारा गलत निर्णय लिए जाने पर, परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं, ऐसे में पितर परिवार जनों को श्राप दे देते हैं, और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।

उर्ध्व गति वाले पितर :- सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।

इनके द्वारा उत्पन्न श्राप (पितृदोष) से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बाधित हो जाती है, फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जायें, कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जायें, उनका कोई भी कार्य पितृदोष के कारण सफल नहीं होता। पितृ-दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि, किस कोनसा ग्रह पितृदोष की सूचना दे रहा है? और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?

जन्म पत्रिका और पितृ-दोष :- जन्म पत्रिका में लग्न, पंचम, अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ-दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि, और राहू-केतु की स्थितियों से विचार किया जाता है।

इनमें से भी गुरु, शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ-दोष में महत्वपूर्ण होती है, इनमें सूर्य से पिता या पितामह, चन्द्रमा से माता या मातामह, मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।

अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु, शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है, इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ-साथ व्यक्ति यदि अपनी  कुंडली के अनुसार रुद्राक्ष भी धारण कर ले, तो पितृ-दोष का शीघ्र निवारण हो जाता है।

पितृ-दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है।

हर मनुष्य पर मुख्य रूप से 5 ऋण होते हैं, जिनका कर्म न करने (फर्ज पूरा नहीं करने पर) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है, ये ऋण (फर्ज) हैं :-  1. मातृ-ऋण, 2. पितृ-ऋण, 3. मनुष्य-ऋण, 4. देव-ऋण और 5. ऋषि-ऋण।

माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमें, मामी, नाना, नानी, मौसा, मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं, क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है, अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है, अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है, तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है।

पिता पक्ष के लोग जैसे बाबा, ताऊ, चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है, पिता हमें आकाश की तरह छत्र-छाया देता है, हमारा जिंदगी भर पालन-पोषण करता है, और अंतिम समय तक हमारे सारे दु:खों को खुद झेलता रहता है। पर आज के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ? पितृ-भक्ति करना मनुष्य का धर्म है, इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को ही झेलना पड़ता है, इससे घर में आर्थिक अभाव, दरिद्रता, संतान हीनता,ब संतान को विबिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि। माता-पिता प्रथम देवता हैं, जिसके कारण भगवान गणेश महान बने। इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी, दुर्गा माँ, भगवान विष्णु आदि आते हैं, जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है, हमारे पूर्वज भी अपने-अपने कुल देवताओं को मानते थे, लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है, इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं। जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए, वंश वृद्धि की, उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है, उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य संपन्न नहीं होते हैं, इसलिए उनका श्राप पीडी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है।

ऐसे परिवार को पितृ-दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है ।रामायण में श्रवण कुमार के माता-पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा, ये जग-ज़ाहिर है इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ-दोषों का निवारण करना बहुत आवश्यक है।

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Shivling Upasana शिवलिंगोपासना (Shivratri Special)

Maha Shivratri Special on Shivling

Shivling Upasana शिवलिंगोपासना

तैतीस करोड़ देवी-देवताओं में शिव ही ऐसे हैं जिनकी लिंग shivling के रूप में पूजा होती है जो देवलोक के ऐशो आराम से दूर एक फक्कड़ बाबा के रूप में माने जाते हैं। भांग-धतूरा खाकर, अंग विभूति लिपटा कर जहरीले नागों को गले में लिपटाये प्रसन्न घूमते हैं। शिव Shiv ही हैं जो अक्खड़ दानी हैं। शिवलिंग Shivling पर जल मात्र चढ़ाने से मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं।

भगवान शिव shiv सृष्टि के संहारक हैं। वे मानव के तन-मन की पीड़ा दूर करते हैं, वे आशुतोष है और अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते है। रूद्र उनका एक और नाम है जिसका अर्थ है रोगों को हरण करने वाला। भगवान शिव की उपासना में शिवलिंग shivling पूजा का सबसे अधिक प्रचलन है। लिंग पूजन से सभी मनोकामनायें पूर्ण होती है और सुख शांति की प्राप्ति होती है।

गरुड़ पुराण के अनुसार लिंग shivling अलग- अलग पदार्थों से अनेक प्रकार के बनाये जाते हैं जिस पदार्थ से लिंग बनाये जाते हैं वैसा ही फल प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अलग-अलग वस्तुओं से अभिषेक करने से भी भिन्न फल की प्राप्ति होती है।

जैसे-
श्री प्राप्ति के लिए गन्ने के रस में अभिषेक करना चाहिए।
ज्वर आदि प्रकोप से बचाव हेतु जलधारा से पूजन करें।
वंश वृद्धि हेतु धृत योग से अभिषेक करें।
पाप निवारण हेतु मधु से पूजन करना चाहिए।
समस्त व्याधियों के हरण हेतु पीली, सरसों के तेल से पूजन करें।
लम्बी आयु के लिए दुग्ध से पूजन करें।
एवं संतान प्राप्ति हेतु शर्करा से अभिषेक करना चाहिए।

मृत्युंजय साधना या रूद्राभिषेक दोनों ही मोक्ष और लम्बी आयु देने वाले हैं।

अठारहों पुराणों में शिव को श्रेष्ठ कहा गया है। शिव को उनकी श्रेष्ठता के कारण ही देवाधिदेव कहा गया है। इन्हीं शिव से संबंधित है महाशिवरात्रि-व्रत। देवों में श्रेष्ठ शिव हैं तो स्वभावतः शिव से सम्बद्ध महाशिवरात्रि व्रत व्रतों में सर्वश्रेष्ठ है यह सामान्य जन भी जानते हैं।

जिस व्रत को शिव की प्रियरात्रि में संपन्न किया जाता है वह व्रत शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है तो हर माह में कृष्ण पक्ष में शिवरात्रि व्रत पड़ता है। परन्तु महाशिवरात्रि व्रत फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को पड़ती हैं।

यह अर्थ, काम, मोक्ष तीनों की प्रदाता है अर्थात् मनोकामना पूर्ति हेतु महाशिवरात्रि व्रत करने योग्य है यह सद्या फलदाता है। भोले बाबा स्वयं तो दिगम्बर, श्मशान सेवी और वृषभ वाहन पर है परन्तु अपने भक्तों को अकल्पनीय ऐश्वर्य प्रदान करने में भी पीछे नहीं रहते है। कभी-कभी बाबा ऐसा वरदान दे देते हैं कि बाद में स्वयं परेशानी में पड़ जाते हैं।

रावण शिवभक्त ही था उसकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे इतना सशक्त बना दिया कि उसने सोने की लंका बना ली और विभिन्न देवताओं को बंदी बनाकर अपने अधीन कार्य लेने लगा। इन्द्र रावण के यहां पानी भरने लगे, अग्नि भोजन पकाने लगी, वायु पंखा झलने लगी।

इसी रावण को मारने के लिए रामावतार हुआ और राम भी रावण वध में तभी सफल हुए जब उन्होंने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना कर पूजा-अर्चना की। अतः आप दीन-हीन हो, पापी हो, पुण्यात्मा हो वैभवशाली हो। भगवान शिव की उपासना कीजिए आपकी आकांक्षाएं शीघ्रपूर्ण हो जाएंगी। शिवोपासन की सर्वथा सरल विधि महाशिवरात्रि व्रत का पालन है कहते हैं।

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपाप प्रणाशनम।
आचांडालमनुष्याणां मुक्तिमुति प्रदायकम्।।

संस्कृत भाषा में लिंग का अर्थ होता है चिन्ह और इसी अर्थ में यह शिवलिंग shivling के लिए प्रयुक्त होता है। शिवलिंग shivling का अर्थ है शिव का परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित चिह्न है।

त्रिगुण की जो अव्यक्तावस्था है, जिसके त्रिगुण उत्पन्न हुआ है, उसी में लीन हो जाता है, सारे संसार के उस उपादान कारण को, जो अनादि और अनन्त है, उसे लिंग कहते हैं। इसी से यह संपूर्ण संसार उत्पन्न होता है। इस प्रकार आधारसहित लिंग जगत का कारण है, माँ उमा, महेश्वर स्वरूप है। भगवान शिव स्वयं ज्योतिलिंग स्वरूप तमस से परे स्थित है। लिंग और वेदों के समायोग से वे अर्धनारीश्वर होते हैं।

भिन्न-भिन्न पदार्थो के बने शिवलिंग shivling –
» मिश्री से बनाये हुए शिवलिंग की पूजा से रोग आदि से छुटकारा मिलता है।
» तीनों का आटा समान भाग में गूंथ कर जो शिवलिंग पूजा जाता है, (गेहूं, चावल, जौ, आटा लें) इससे जातक को संतान, लक्ष्मी और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
» किसी से प्रेम प्यार बढ़ाने के लिए गुड़ की भेली में शिवलिंग बनाकर उस व्यक्ति का संकल्प और ध्यान करने से विशेष लाभ मिलता हैं
» यदि चीनी की चाशनी को जमा कर शिवलिंग बनाकर पूजा की जाए तो सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
» यदि किसी को वंश-वृद्धि में बाधा आ रही हो तो वह जातक बांस के अंकुर को शिवलिंग के समान काटकर पूजा करे तो लाभ होगा।
» आंवले को पीसकर बनाया गया शिवलिंग मुक्तिप्रदाता होता है। (आंवले के सीजन में 108 दिन लगातार शिवलिंग बनाकर पूजा करें तो मुक्ति पाओगे।)
» स्फटिक तथा अन्य रत्नों के बने शिवलिंगों जातकों की अभीष्ट कामनाएं पूरी करता है।
» शत्रुओं के नाश के लिए लहसुनिया के बने शिवलिंग की पूजा करने से विजय मिलती है।
» पीतल का शिवलिंग निर्धनता निवारक है। बृहस्पतिवार से पूजा शुरु करें।
» चांँदी का शिवलिंग धन-धान्य बढ़ाता है-सोमवार से पूजा शुरु करें।
» सोने से बना शिवलिंग समृद्धि का वर्द्धन करता है।
» यदि स्त्रियां मोती के शिवलिंग का पूजन करें तो भाग्य-वृद्धि होती है।
» यदि जातक कपूर से बने शिवलिंग का पूजन करता है तो उसको भक्ति और मुक्ति दोनों को प्राप्त करता है।
» यदि जिस जातक की पत्रिका में अकाल-मृत्यु का भय हो तो वह दूर्वा को शिवलिंग गुथकर उसकी आराधना करे तो विशेष लाभ होता है।
» गायत्री मंत्र का सवा लाख आहुति का यज्ञ करके उस भस्म से शिवलिंग बनाकर पूजा की जाए तो जातक की अभिलाषा बहुत शीघ्र पूर्ण होती है।
» वशीकरण के लिए सोंठ, मिर्च, पीपल के चूर्ण को सेंधा नमक के साथ गूंथ कर शिवलिंग बनाने पर पूजा करने पर लाभ मिलता है।
» चन्दन और कस्तूरी व गौलोचन के साथ गजमुक्ता को मिलाकर जो शिवलिंग की पूजा करेंगे तो वशीकरण, सम्मोहन आकर्षण के साथ शिव साम्राज्य की भी प्राप्ति होती है।
» यदि किसान जातक गुड़ की पिण्डी (लिंग) बनाकर उसमें गेहूं के दाने चिपका कर पूजा करने से उस को उत्पादन अधिक होगा।
» दही को बांधकर निचोड़ देने के बाद उससे जो शिवलिंग बन जाए उसकी पूजा करने से लक्ष्मी, सुख व काम सुख की प्राप्ति होती है।
» असली पारद से बनें शिवलिंग की शास्त्रों में बहुत ही प्रशंसा की गयी है। इस शिवलिंग को शास्त्रों में ज्योर्तिलिंग से भी बहुत श्रेष्ठ माना गया है। इसका पूजन सर्वकामनाप्रद, समस्त पापों का नाश करता है, यह जातक को जीवन के संपूर्ण सुख एवं मोक्षप्रद शिवस्वरूप प्रदान करता है। पारद शिवलिंग गारन्टी देने वाले से ही लें आजकल लैड के ऊपर पाॅलिश की जाती है। नकली पारद शिवलिंग की पूजा से कोई लाभ नहीं होगा।

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शिव-पूजन के लिए निम्न बातों पर विशेष ध्यान दिया जाए तो पूजा का फल कई गुणा ज्यादा मिलता है।
1. भगवान शिवजी की पूजा में तिल का प्रयोग नहीं होता और चम्पा के फूल भी नहीं चढ़ाया जाता।
2. शिवजी की पूजा में भी दूर्वा, तुलसी-दल चढ़ाया जाता है। इसमें संदेह नहीं किया जाना चाहिए। तुलसी की मंजरियों से पूजा बहुत श्रेष्ठ मानी जाती है।
3. शिवजी की पूजा में बिल्व पत्र प्रधान है और नीलकमल सर्वश्रेष्ठ पुष्प माना गया है। बिल्व-पत्र चढ़ाते समय बिल्व पत्र का चिकना भाग मूर्ति की ओर रखना चाहिए।
4. जितने अधिक बिल्व-पत्रों को चढ़ाया जाए उतना ही उत्तम होता है, खण्डित बिल्व पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए।
5. शिवजी के पूजन के समय करताल नहीं बजाना चाहिए।
6. विशेष शिवजी के पूजन (अनुष्ठान) कर भस्म त्रिपुण्ड और रूद्राक्ष माला जातक के शरीर पर जरूर होनी चाहिये।
7. शिवजी की परिक्रमा में संपूर्ण परक्रिमा नहीं की जाती।
8. चढ़े हुए जल वाली नाली का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। वहीं से परिक्रमा उल्टी की जाती है।