नवरात्रि में कन्या पूजन

नवरात्रि में अवश्य करें, कुमारी पूजन:-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Best Astrologer in Delhi)

नवरात्रि पर्व वर्ष में दो बार आता है। 1. ‘चैत्र नवरात्रि’ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक, तथा 2. ‘आश्विन नवरात्रि’ आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक। चैत्र नवरात्र के दिन से ही नया विक्रमी संवत आरम्भ होता है, और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नक्षत्रों की गणना आश्विन नक्षत्र से आरम्भ होती है। इस आधार पर आश्विन मास ज्योतिषीय वर्ष का प्रथम मास माना जाता है। इस प्रकार दोनों नवरात्र पर्वों के साथ नये शुभारम्भ की भावना जुड़ी हुई है। यह दोनो नवरात्र ऋतुओं के संधिकाल पर पड़ते हैं। संधिकाल की उपासना की दृष्टि से भी इन्हें सर्वाधिक महत्व दिया गया है। इस प्रकार ऋतु-संधिकाल के नौ-नौ दिन दोनों नवरात्रों में विशिष्ट रूप से कुमारी पूजा व साधना अनुष्ठान के लिये महत्वपूर्ण माने गये हैं। नवरात्र पर्व के साथ दुर्गावतरण की कथा तथा कुमारी-पूजा का विधान जुड़ा हुआ है।

कन्या पूजन क्यों आवश्यक :-

आज के युग (कलयुग) की भयावह पारिवारिक, आर्थिक, मानसिक अथवा सामाजिक समस्या से मुक्ति के लिये तथा शक्ति के उद्भव की कामना के लिये कुमारी-पूजा का विधान आवश्यक बताया गया है। इसलिये शास्त्रों में सभी जाति की बालिकाओं के पूजन का महत्व बताया गया है। अतः कुमारी-पूजन में जाति-भेद का विचार करना उचित नहीं है। जाति-भेद करने से मनुष्य नरक से छुटकारा नहीं पाता। जैसे संशय में पड़ा हुआ मंत्र साधक अवश्य पातकी होता है। इसलिये साधक को चाहिये कि वे देवी आज्ञा से नवरात्रों में सभी जाति की बालिकाओं का पूजन करें, क्योंकि कुमारी सर्वविद्या स्वरूपिणी है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

वर्ष के दोनो मुख्य नवरात्रों में वस्त्र, आभूषण और भोजन आदि से कुमारी महापूजा करके मन्द भाग्य वाला मनुष्य भी सर्वत्र विजय और मांगल्य प्राप्त करता है। कलियुग में नवरात्रों में की जाने वाली कन्या पूजा ही समृद्धि हेतु सबसे बड़ी उपासना और सबसे उत्तम तपस्या है। भाग्यवान मनुष्य, नवरात्रों में कुमारी-पूजन से कोटि गुना फल प्राप्त करता है। कुमारी-पूजा से मनुष्य सम्मान, लक्ष्मी, धन, पृथ्वी, श्री सरस्वती और महान् तेज को सरलता पूर्वक प्राप्त कर लेता है। उसके ऊपर दसों महाविद्याएें और देवगण प्रसन्न होते हैं- इसमें कोई भी सन्देह नहीं। कुमारी-पूजन मात्र से मनुष्य त्रिभुवन को वश में कर सकता है, और उसे परम शान्ति मिलती है; इस प्रकार कुमारी-पूजन समस्त पुण्य-फलों को देने वाली है।

कठिनाइयों में कन्या-पूजन :-
महान् भय, दुर्भिक्ष आदि उत्पात, दुःस्वप्न, दुर्मृत्यु तथा अन्य जो भी दुःखदायी समय की आशंकाएं हैं तो, वे सभी कुमारी-पूजन से टल जाते हैं। प्रतिदिन क्रमानुसार विधि-विधान पूर्वक, कुमारी पूजन करना चाहिये। कुमारी साक्षात् योगिनी और श्रेष्ठ देवी हैं, विधियुक्त कुमारियों को भोजन कराना चाहिये। कुमारी को पाद्य, आर्घ्य, धूप, कुमकुम और सफ़ेद चंदन आदि अर्पण करके भक्ति-भाव से उनकी पूजा करें। जो मनुष्य इस प्रकार कन्याओं की पूजा करता है, पूजित हुई कुमारियां उसके विघ्न, भय और अत्यन्त उत्कृट शत्रुओं को नष्ट कर डालती हैं। पूजा करने वाले के ग्रह, रोग, भूत, बेताल और सर्पादि से होने वाले अनेक भय नष्ट हो जाते हैं। उस पर असुर, दुष्ट नाग, दुष्ट ग्रह, भूत, बेताल, गंधर्व, डाकिनी, यक्ष, राक्षस तथा अन्य सभी देवता, भूः भुवः, स्वः, भैरव गण, पृथ्वी आदि के सब भूत, चराचर ब्रह्माण्ड, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव-ये सभी प्रसन्न होते हैं।

कन्या की आयु :-

कुमारी पूजन हेतु कन्या की आयु विभिन्न ग्रन्थों के मतानुसार-
रुद्रयामलतंत्र के उत्तराखण्ड, छठे पटल में कुमारी पूजन के लिये कन्या की आयु के अनुसार उसे अलग-अलग देवियों का नाम व महत्व देते हुए कहा गया है कि- एक वर्ष की आयुवाली बालिका ‘सन्ध्या’ कहलाती है, दो वर्षवाली ‘सरस्वती’, तीन वर्ष वाली ‘त्रिधामूर्ति, चार वर्ष वाली ‘कालिका’, पाँच वर्ष की होने पर ‘सुभगा’, छः वर्ष की ‘उमा’, सात वर्ष की ‘मालिनी’, आठ वर्ष की ‘कुब्जा’, नौ वर्ष की ‘कालसन्दर्भा’, दसवें में ‘अपराजिता’, ग्यारहवें में ‘रुद्राणी’, बारहवें में ‘भैरवी’, तेरहवें में ‘महालक्ष्मी’, चैदह पूर्ण होने पर ‘पीठनायिका’, पन्द्रहवें में ‘क्षेत्रज्ञा’ और सोलहवें में ‘अम्बिका’ मानी जाती है।

बृहन्नीतंत्र आदि ग्रन्थों में उपर्युक्त नामों से कुछ विभिन्नता पायी जाती है। कुब्जिका-तंत्र के सातवें पटल में इसी विषय का इस प्रकार वर्णन है- पाँच वर्ष से लेकर बारह वर्ष की अवस्था तक की बालिका अपने स्वरूप को प्रकाशित करने वाली ‘कुमारी’ कहलाती है। छः वर्ष की अवस्था से आरंभ कर नवें तक की कुमारी साधकों का ‘अभीष्ट साधन’ करती है। आठ वर्ष से लेकर तेरह की अवस्था होने तक उसे ‘कुलजा’ समझें और उसका पूजन करें। दस वर्ष से शुरू कर जब तक वह सोलह वर्ष की हो, उसे युवती जानें और देवी की भाँति उसका चिन्तन करें।

विश्व सार तंत्र में कहा गया है कि- आठ वर्ष की बालिका ‘गौरी’, नौ वर्ष की ‘रोहिणी’ और दस वर्ष की कन्या ‘कन्या’ कहलाती है। इसके बाद वही ‘महामाया’ और ‘रजस्वला’ भी कहीं गयी हैं। बारहवें वर्ष से लेकर बीसवें तक वह सभी तंत्र ग्रन्थों में सुकुमारी कही गयी हैं।

मंत्रमहोदधि के अठारहवें तरंग में इस प्रकार वर्णन है- यजमान को चाहिये कि वे नवरात्रों में दस कन्याओं का पूजन करे। उनमें भी दो वर्ष की अवस्था से लेकर दस वर्ष तक की कुमारियों का ही पूजन करना चाहिये। जो दो वर्ष की उम्रवाली है वह ‘कुमारी’, तीन वर्ष की ‘त्रिमूर्ति’, चार वर्ष की ‘कल्याणी’, पाँच वर्ष की ‘रोहिणी’, छः वर्ष की ‘कालिका’, सात वर्ष की ‘चण्डिका’, आठ वर्ष की ‘शांभवी’, नौ वर्ष की ‘दुर्गा’ और दस वर्ष की कन्या ‘सुभद्रा’ कही गयी है। इनका मंत्रों द्वारा पूजन करना चाहिये। एक वर्ष वाली कन्या की पूजा से प्रसन्नता नहीं होगी, अतः उसका ग्रहण नहीं है, और ग्यारह वर्ष से ऊपर वाली कन्याओं का भी पूजा में ग्रहण वर्जित है।

कुमारी-पूजन का फल-

कुब्जिकातंत्र में वर्णन मिलता है कि- जो नवरात्रों में विधि-विधान सहित कुमारी-पूजन करता है, तथा कुमारी को अन्न, वस्त्र तथा जल अर्पण करता है उसका वह अन्न मेरु के समान और जल समुद्र के सदृश अक्षुण्ण तथा अनन्त होता है। अर्पण किये हुए वस्त्रों द्वारा वह करोड़ों-अरबों वर्षों तक शिवलोक में पूजित होता है। जो कुमारी के लिये पूजा के उपकरणों को देता है, उसके ऊपर देवगण प्रसन्न होकर उसी के पुत्र रूप से प्रकट होते हैं। कलिकाल आज के युग की देन भयावह पारिवारिक, आर्थिक, मानसिक अथवा सामाजिक समस्याओं से मुक्ति के लिये तथा शक्ति के उद्भव की कामना के लिये कुमारी-पूजा का विधान आवश्यक बताया गया है। अतः प्रत्येक देवी उपासक वर्ष के दोनो नवरात्र में कन्या पूजन अवश्य करें।

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गंडमूल नक्षत्र

गंडमूल नक्षत्र और गण्डमूल नक्षत्र का जातक पर प्रभाव :-

Dr.R.B.Dhawan

इस लेख में बताया गया है कि, जातक का जन्म यदि गण्डमूल नक्षत्र में हो तो, उस गंडमूल का जातक या जातक के परिजनों के जीवन पर क्या प्रभाव रहता है? और इसके उपाय क्या हैं :-

गंडमूलक नक्षत्रों के अंतर्गत- 1. अश्विनी, 2. अश्लेषा, 3. मघा, 4. ज्येष्ठा, 5. मूल और 6. रेवती नक्षत्र को रखा गया है।

गंडमूल नक्षत्र :- (Gandmool Nakshtra) ज्योतिषीय गणना के अनुसार नक्षत्र 27 होते हैं, उनमे से छह- 1. अश्विनी, 2. अश्लेषा, 3. मघा, 4. ज्येष्ठा, 5. मूल और 6. रेवती नक्षत्र की गणना गंडमूलक नक्षत्रों में जाती है। राशि और नक्षत्र की समाप्ति जब एक ही स्थान पर होती है, तब यह स्थिति गण्ड या गंडमूल नक्षत्र कहलाती है। राशि और नक्षत्र की समाप्ति से ही नई राशि और नक्षत्र के प्रारम्भ होने को गंडमूल कहते हैं।

गंडमूल नक्षत्र के समय जन्म लेने वाले जातक स्वयं तथा अपने माता-पिता, मामा आदि के लिए कष्ट सूचक होते हैं। यही कारण है कि घर के लोगों को जैसे ही यह पता चलता है कि बालक मूल में हुआ है, वैसे ही वे चिंतिंत हो जाते हैं और नकारात्मक विचारों से ग्रसित भी हो जाते हैं, परिणाम यह कि इसका प्रभाव बच्चे के ऊपर पड़ना आरम्भ हो जाता है, चुंकि बच्चा अपने जन्म के बारह वर्ष तक अपने माता-पिता के कर्मो से प्रभावित होता है। ऐसी स्थिति में माता-पिता के नकारात्मक विचारों का परिणाम यह होता है कि, परिवार कष्टमय जीवन व्यतीत करने लगता है। इसलिए यदि परिवार में कोई बच्चा मूल में जन्म ले लिया है तो, घबराने की आवश्यकता नहीं, और न ही नकारात्मक विचार लायें। शास्त्र में निर्धारित उपाय करायें परिवार के लिए और बच्चे के लिए यह ही शुभ होगा।

गण्डमूल नक्षत्र में जन्म लेने वाला बालक शुभ प्रभाव में है तो वह अवश्य सामान्य बालक से कुछ अलग विशेष विचारों वाला होता है, यदि उसे सामाजिक तथा पारिवारिक बंधन से मुक्त कर दिया जाए तो, ऐसा बालक जिस भी क्षेत्र में जायेगा, अपनी एक अलग पहचान बनायेगा। ऐसे बालक तेजस्वी, यशस्वी, और कला अन्वेषी होते हैं। यह इसके अच्छे प्रभाव भी हैं। अगर वह अशुभ प्रभाव में है तो, इन्हीं नक्षत्रों में जन्मा बालक क्रोधी, रोगी, र्इष्यावान, लम्पट होगा। इस अशुभता को दूर करने के लिए गण्डमूल दोष की विधिवत शांति करा लेना चाहिए।

गण्डमूल नक्षत्र :-

जैसे कि राशि और नक्षत्र के एक ही स्थान पर उदय और मिलन के आधार पर गण्डमूल नक्षत्रों का निर्माण बताया गया है। इसके निर्माण में कुल छह 6 स्थितियां बनती हैं। इसमें से तीन नक्षत्र गण्ड के होते हैं, और तीन मूल के होते हैं।

कर्क राशि तथा आश्लेषा नक्षत्र की समाप्ति साथ-साथ होती है, वही सिंह राशि का समापन और मघा राशि का उदय एक साथ होता है। इसी लिए अश्लेषा को गण्ड संज्ञक और मघा को मूल संज्ञक नक्षत्र कहा जाता है।

इसी प्रकार वृश्चिक राशि और ज्येष्ठा नक्षत्र की समाप्ति एक साथ होती है, तथा धनु राशि और मूल नक्षत्र का आरम्भ यहीं से होता है। इसलिए इस स्थिति को ज्येष्ठा गण्ड और ‘मूल’ मूल नक्षत्र कहा जाता है।

मीन राशि और रेवती नक्षत्र एक साथ समाप्त होते हैं। तथा मेष राशि व अश्विनी नक्षत्र की शुरुआत एक साथ होती है। इसलिए इस स्थिति को रेवती गण्ड और अश्विनी मूल नक्षत्र कहा जाता है।

ऊपर कहे गए तीन गण्ड नक्षत्र अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती का स्वामी ग्रह बुध और तीन नक्षत्र मघा, मूल तथा अश्विनि का स्वामी केतु ग्रह है। जन्म दिन से सत्ताइसवें दिन जन्म नक्षत्र की पुनः आवृति होती है, उस समय मूल और गण्ड नक्षत्रों के अशुभ फल की निवृति और शुभ फल की प्राप्ति के लिए गण्डमूल का उपाय कराया जाता है।

मूल शांति के लिए गण्डवास का महत्त्व :-

मूल शांति के समय सर्वप्रथम गण्डवास देखना आवश्यक है कि गण्ड का वास जन्म काल में कहाँ है?

मुहूर्तचिंतामणि के अनुसार —

स्वर्गेशुचि प्रौष्ठपदेशमाघे भूमौ नभः कार्तिकचैत्रपौषे।

मूलं हि अधस्तास्तु तपस्यमार्गवैशाख शुक्रेष्वशुभं च तत्र।।

अर्थात्:- आषाढ़, भाद्रपद, आश्विन व माघ में गण्ड का वास स्वर्ग लोक में, श्रावण, कार्तिक, चैत्र व पौष मास में गण्डवास मृत्युलोक अथवा पृथ्वी पर, तथा ज्येष्ठ, वैशाख, मार्गशीर्ष व फाल्गुन मास में पाताल अर्थात नरक लोक में गण्ड का वास होता है। जन्म काल में मूल का जिस लोक में वास होता है, उसी लोक का अनिष्ट करता है अतः मृत्यलोक अर्थात धरातल पर वास होने की स्थिति में ही अनिष्ट है।

गण्डमूल नक्षत्र का चरण के अनुसार प्रभाव :-

मुलामघाश्विचरणे प्रथमे पितुश्च पौष्णेन्द्रयोश्च फणिनस्तु चतुर्थपादे।

मातुः पितुः सववपुषो स्ववपुष: अपि करोति नाशं जातो यथा निशि दिनेप्यथ सन्धयोश्च।।

मूल, मघा और अश्विनी के प्रथम चरण का जातक पिता के लिए, रेवती के चौथे चरण और रात्रि में जन्मा जातक माता के लिए, ज्येष्ठ के चतुर्थ चरण और दिन का जन्म जातक पिता तथा अश्लेषा के चौथे चरण संधिकाल (दिन से रात, व रात से दिन की संधि) में जन्म हो तो, स्वयं के लिए जातक अरिष्ट कारक होता है।

अश्विनी नक्षत्र का प्रभाव :-

मेष राशि में अश्विनी नक्षत्र शून्य अंश से प्रारम्भ होकर 13:20 अंश तक तक रहता है, जन्म के समय यदि चंद्रमा मेष राशि में शून्य से 2 : 30 अंशों के मध्य अर्थात प्रथम चरण में ही स्थित हो तो, अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर जातक को अपने जीवन काल में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस नक्षत्र में जन्म लेने पर बच्चा पिता के लिए कष्टकारी होता है, परन्तु हमेशा एेसा नहीं होता।

अश्विनी नक्षत्र :-

प्रथम चरण – पिता को शारीरिक कष्ट एवं हानि।

दूसरा चरण — परिवार में सुख शांति ।

तीसरा चरण — सरकार से लाभ तथा मंत्री पद का लाभ ।

चतुर्थ चरण — परिवार एवं जातक को राज सम्मान तथा ख्याति।

आश्लेषा नक्षत्र का प्रभाव :-

जब चंद्रमा जन्म के समय कर्क राशि में 16 अंश और 40 कला से 30 अंश के मध्य स्थित होता है, तब आश्लेषा नक्षत्र कहलाता है। परन्तु जब चन्द्रमा कर्क के 26 अंश 40 कला से 30 अंश के मध्य हो, अर्थात आश्लेषा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में हो तो, जातक गण्डमूल में उत्पन्न कहलाता है।

आश्लेषा नक्षत्र :-

प्रथम चरण — शांति और सुख मिलेगा।

दूसरा चरण – धन नाश, बहन-भाईयों को कष्ट।

तृतीय चरण — माता को कष्ट।

चतुर्थ चरण — पिता को कष्ट, आर्थिक हानि।

मघा नक्षत्र का प्रभाव :-

सिंह राशि के आरम्भ के साथ ही मघा नक्षत्र शुरु होता है। परन्तु सिंह राशि में जब चंद्रमा शून्य से लेकर दो अंश और बीस कला अर्थात प्रथम चरण में रहता है, तब ही गंडमूल नक्षत्र माना गया है।

मघा नक्षत्र :-

प्रथम चरण — माता को कष्ट होता है।

दूसरा चरण – पिता को कोई कष्ट या हानि होता है।

तीसरा चरण – जातक सुखी जीवन व्यतीत करता है।

चौथा चरण – जातक को धन विद्या का लाभ, कार्य क्षेत्र में स्थायित्व प्राप्त होता है।

ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रभाव :-

जब चंद्रमा जन्म के समय वृश्चिक राशि में 16 अंश और 40 कला से 30 अंश के मध्य स्थित होता है, तब ज्येष्ठा नक्षत्र कहलाता है। परन्तु जब चन्द्रमा वृश्चिक में 26 अंश और 40 कला अर्थात ज्येष्ठा के चतुर्थ चरण में प्रवेश कर चुका हो, तो जातक गण्डमूल में उत्पन्न कहलाता है।

ज्येष्ठा नक्षत्र :-

प्रथम चरण – बड़े भाई-बहनों को कष्ट।

दूसरा चरण – छोटे भाई – बहनों के लिए अशुभ।

तीसरा चरण – माता को कष्ट।

चतुर्थ चरण – स्वयं का नाश।

मूल नक्षत्र का प्रभाव :-

जब चंद्रमा धनु राशि में शून्य से तेरह अंश और बीस मिनट के मध्य स्थित होता है तब यह मूल नक्षत्र में आता है परन्तु जव चन्द्रमा शून्य अंश से तीस मिनट अर्थात प्रथम चरण में हो तो गण्ड मूल में उत्पन्न जातक कहलाता है।

मूल नक्षत्र :-

प्रथम चरण – पिता के जीवन के लिए घातक।

दूसरा चरण – माता के लिए अशुभ, को कष्ट।

तीसरा चरण – धन नाश।

चतुर्थ चरण – जातक सुखी तथा समृद्ध जीवन व्यतीत करता है।

रेवती नक्षत्र का प्रभाव :-

मीन राशि में 16 अंश 40 कला से 30 अंश तक रेवती नक्षत्र होता है। जिस समय चंद्रमा मीन राशि में 26 अंश और 40 कला से 30 अंश के मध्य रहता है, तो गंडमूल नक्षत्र वाला जातक कहलाता है।

रेवती नक्षत्र :-

प्रथम चरण – जीवन सुख और आराम में व्यतीत होगा।

दूसरा चरण – मेहनत एवं बुद्धि से नौकरी में उच्च पद प्राप्त।

तीसरा चरण – धन-संपत्ति का सुख के साथ धन हानि भी।

चतुर्थ चरण — स्वयं के लिए कष्टकारी होता है।

गण्डमूल नक्षत्र शान्ति के उपाय :-

यदि जातक का जन्म गंडमूल नक्षत्र में हुआ है तो, उसके पिता को चाहिए कि अपने बच्चे का चेहरा न देखे और तुरंत पिता कि जेब में फिटकड़ी का टुकड़ा रखवा देना चाहिए। तत्पश्चात् 27 दिन तक प्रतिदिन 27 मूली पत्तों वाली बच्चे के सिर कि तरफ रख देना चाहिए, और पुनः उसे दुसरे दिन चलते पानी में बहा देना चाहिए। यह क्रिया 27 दिनों तक नियमित करना चाहिए। इसके बाद 27 वें दिन विधिवत पूजा करके बच्चे को देखना चाहिए। जिस नक्षत्र में जन्म हुआ है, उससे सम्बन्धित देवता तथा ग्रह की पूजा करनी चाहिए। इससे नक्षत्रों के नकारात्मक प्रभाव में कमी आती है। अश्विनी, मघा, मूल नक्षत्र में जन्में जातकों को गणेशजी की पूजा अर्चना करने से लाभ मिलता है। आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र में जन्में जातकों के लिए बुध ग्रह की अराधना करना चाहिए। तथा बुधवार के दिन हरी वस्तुओं जैसे हरा धनिया, हरी सब्जी, हरा घास इत्यादि का दान करना चाहिए। मूल में जन्में बच्चे के जन्म के ठीक 27वें दिन गंडमूल शांति पूजा करवाई जानी चाहिए, इसके अलावा ब्राह्मणों को दान, दक्षिणा देने और उन्हें भोजन करवाना चाहिए। इसके लिए सम्बंधित नक्षत्र का मन्त्र जाप, 27 कुओं का जल, 27 तीर्थ स्थलों के कंकण, समुद्र का फेन, 27 छिद्र का घड़ा, 27 पेड़ के पत्ते, 07 निर्धारित अनाज 07 खेडो की मृतिका, आदि दिव्य जड़ी-बूटी औषधियों के द्वारा शांति प्रक्रिया सम्पन्न कराना चाहिए। यह क्रिया 27वें दिन तक जब तक वह नक्षत्र हो 27 माला का जप, हवन तर्पण मार्जन कर 27 लोगो को भोजन कराना चाहिए। पुनः दक्षिणा देकर अपने बालक का चेहरा देखना चाहिए।

ज्योतिष के ग्रंथों में अनेक स्थानों पर गंडांत अर्थात गण्डमूल नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है, रेवती नक्षत्र की अंतिम चार घड़ियाँ और अश्वनी नक्षत्र की पहली चार घड़ियाँ गंडांत कही जाती हैं, ज्योतिष शास्त्र में गण्डमूल नक्षत्र के विषय में विस्तार पूर्वक बताया गया है, जातक पारिजात, बृहत्पराशर होरा शास्त्र ,जातकभरणं इत्यादि सभी प्राचीन ग्रंथों में गण्डमूल नक्षत्रों तथा उनके प्रभावों का वर्णन दिया गया है, गण्डमूल नक्षत्रों के सभी चरणों का फल जातक पर क्या विशेष पड़ता है देखें :-

अश्विनी :-

केतु के पहले गण्डमूल नक्षत्र को अश्विनी नक्षत्र कहा जाता है, अश्विनी नक्षत्र मेष राशि में शून्य अंश से प्रारम्भ होकर तेरह अंश बीस कला तक रहता है। जन्म के समय यदि चंद्रमा इन अंशों के मध्य स्थित हो तो, गण्डमूल नक्षत्र में जन्म का समय माना जाता है, अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर जातक को जीवन में अनेक कठिन परिस्थितियों एवं परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, पूर्व जन्म के कर्मों का फल इस नक्षत्र चरण में जन्म लेने के रूप में तुरंत सामने आता है, इस नक्षत्र में जन्म होने पर वह बच्चा पिता के लिए थोड़ा कष्टकारी हो सकता है, लेकिन इस कष्ट को किसी भी नकारात्मकता के साथ नहीं जोड़ा जा सकता, इसके लिए जन्मकुंडली के बहुत से योगों को देखना आवश्यक है।

अश्विनी नक्षत्र के द्वितीय चरण में जन्म लेने वाले बच्चे को जीवन में सुख व आराम प्राप्त होते हैं, अश्विनी नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक को जीवन के किसी भी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त होने के अवसर प्राप्त होते हैं, जातक मित्रों से लाभ प्राप्त करता है, घूमने-फिरने में उसकी रूचि अधिक होती है, किसी एक स्थान पर टिके रहना उसे अच्छा नहीं लगता।

अश्विनी नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने पर जातक को राज सम्मान की प्राप्ति अथवा सरकार की ओर उपहार आदि की प्राप्ति होती है, इसके साथ ही कभी कभी जातक को स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों का सामना करना पडता है।

आश्लेषा :-

कर्क राशि में 16 अंश और 40 कला से 30 अंश तक आश्लेषा नक्षत्र रहता है, जब चंद्रमा जन्म के समय कर्क राशि के इन अंशों के मध्य स्थित होता है, तो यह गंडमूल नक्षत्र कहलाता है।

आश्लेषा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर किसी तरह का कोई विशेष अशुभ नहीं होता, परंतु धन की हानि उठानी पड़ती है, यदि इसकी शांति पूजा हो तो, यह शुभ फल प्रदान करता है।

आश्लेषा नक्षत्र के द्वितीय चरण में जन्म होने पर बच्चा अपने बहन-भाईयों के लिए कष्टकारी होता है, या जातक अपनी संपत्ति को नष्ट कर लेता है।

आश्लेषा नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म हुआ है तो, माता तथा पिता दोनों को ही कष्ट सहना पड़ता है।

आश्लेषा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म हुआ है तो, पिता को आर्थिक हानि तथा शारीरिक कष्ट सहना पड़ता है।

मघा :-

सिंह राशि के शून्य अंश के साथ मघा नक्षत्र का आरम्भ होता है, सिंह राशि में जब चंद्रमा शून्य से लेकर 13 अंश और 20 कला तक रहता है, तब वह गंडमूल नक्षत्र में कहलाता है।

मघा नक्षत्र के प्रथम चरण में यदि किसी बच्चे का जन्म होता है तो, माता को कष्ट होने की संभावना बनी रहती है। इस नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म लेने से पिता को कोई कष्ट या हानि का सामना करना पड़ सकता है।

मघा नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म लेने पर बच्चे को जीवन में सुखों की प्राप्ति होती है। यदि बच्चे का जन्म मघा नक्षत्र के चौथे चरण में होता है, तब उसे कार्य क्षेत्र में स्थायित्व प्राप्त होता है, इस नक्षत्र में जन्म होने के कारण बच्चा उच्च शिक्षा भी ग्रहण करने से पीछे नहीं रहता।

ज्येष्ठा :-

वृश्चिक राशि में 16 अंश 40 कला से 30 अंश तक ज्येष्ठा नक्षत्र होता है। इस समय जब चंद्रमा वृश्चिक राशि में उपरोक्त अंशों के मध्य स्थित हो तो, गंडमूल नक्षत्र होता है।

भारतीय ज्योतिष अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र को अशुभ नक्षत्रों की श्रेणी में रखा गया है, ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म लेने से बच्चे के बड़े भाई-बहनों को कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है।

ज्ये‌ष्ठा के द्वितीय चरण में जन्म होने पर छोटे भाई-बहनों के लिए अशुभ देखा गया है। उन्हें शारीरिक अथवा अन्य कई प्रकार के कष्ट होते हैं।

ज्ये‌ष्ठा के तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक की माता को स्वास्थ्य की दृष्टि से कष्ट बना रहता है।

इस नक्षत्र चरण में जन्म लेने से जातक स्वयं के भाग्य के लिए अच्छा नहीं रहता, उसे जीवन में कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। ज्येष्ठा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाले व्यक्तियों को जीवन में कठिन परिस्थितियों व जटिलताओं का सामना करना पडता है। मैंने देखा है इस चरण में जन्म होने के कारण जातक को जीवनभर दु:ख और पीड़ा का सामना ही करना पड़ता है।

मूल :-

जब चंद्रमा धनु राशि में शून्य से 13 अंश और 20 कला के मध्य स्थित होता है, तब यह गंडमूल नक्षत्र में आता है। बच्चे का जन्म मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में होने से पिता के जीवन में कई प्रकार के अच्छे-बुरे परिवर्तन होने लगते हैं।

मूल नक्षत्र के द्वितीय चरण में बच्चे का जन्म ज्योतिष में माता के लिए अशुभ माना गया है, इस चरण में बच्चे का जन्म होने से माता का जीवन कष्टपूर्ण रहने की संभावना बनती है।

मूल नक्षत्र के तीसरे चरण में हुआ हो, तब उसकी संपत्ति के नष्ट होने की संभावना बनती है, इस चरण में जन्म लेने वाले जातक का संपत्ति से वंचित रहना देखा जा सकता है।

मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने पर जातक सुखी तथा समृद्ध रहता है, परंतु यदि शांति कराई जाये तब ही शुभ फलों की प्राप्ति होती है। इस चरण में जन्म लेने पर बच्चे को अपने जीवन में एक बार भारी हानि उठानी पड़ती है।

रेवती :-

मीन राशि में 16 अंश 40 कला से 30 अंश तक रेवती नक्षत्र होता है। जिस समय चंद्रमा मीन राशि में इन अंशों से गुजर रहा हो तब यह समय गंडमूल नक्षत्र का होता है।

यदि जन्म रेवती नक्षत्र के प्रथम चरण में हुआ है तो, जीवन सुख और आराम से व्यतीत होता है। जातक आर्थिक रूप से सम्पन्न और सुखी रहता है।

रेवती नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म लेने वाले जातक अपनी मेहनत, बुद्धि एवं लगन से नौकरी में उच्च पद प्राप्त करते हैं, या व्यवसायिक रूप से कामयाब हो जाते हैं, परंतु फिर भी जातक को बड़े होकर कुछ भूमि की हानि होती है।

रेवती नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक को धन-संपत्ति का सुख तो प्राप्त होता है, परंतु साथ- साथ धन हानि की भी संभावना बनी रहती है।

रेवती नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाला जातक स्वयं के लिए कष्टकारी साबित होता है। परंतु मतातन्तर से इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति अपने माता-पिता दोनों के लिए ही कष्टकारी सिद्ध होते हैं। उनका जीवन काफी संघर्ष से गुजरता है।

गंडमूल नक्षत्रों का जीवन पर प्रभाव :-

गंडमूल दोष :- अपनी प्रचलित परिभाषा के अनुसार गंडमूल दोष लगभग हर चौथी-पांचवी कुंडली में उपस्थित पाया जाता है, तथा ज्योतिषियों की धारणा के अनुसार यह दोष कुंडली वाले जातक के जीवन में अड़चनें पैदा करने में सक्षम होता है।

गंडमूल दोष होता क्या है, किसी कुंडली में यह दोष बनता कैसे है, तथा इसके दुष्प्रभाव क्या हो सकते हैं? गंडमूल नक्षत्रों का विचार जन्म के समय की ग्रह स्थिति को देखकर किया जाता है। जैसा की पहले लिखा गया है- अश्वनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती गंडमूल नक्षत्र कहलाते हैं। इन नक्षत्रों में जन्मे बालक का 27 दिन तक उसके पिता द्वारा मुंह देखना वर्जित होता है। जन्म के ठीक 27वें दिन उसी नक्षत्र में इसकी मूल शांति करवाना अति आवश्यक होता है। ऐसा ग्रंथों में वर्णित है। सभी नक्षत्रों के चार-चार चरण होते हैं इन्हीं प्रत्येक चरणों के अनुसार माता, पिता, भाई, बहन या अपने कुल में किसी पर भी नक्षत्र अपना प्रभाव दिखाते हैं। प्रायः इन नक्षत्रों में जन्मे बालक-बालिका स्वयं के लिए भी कष्टप्रद हो सकते हैं।
अगर किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली का चन्द्रमा, रेवती, अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा तथा मूल नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में स्थित हो तो, कुंडली धारक का जन्म गंडमूल में हुआ माना जाता है, अर्थात उसकी कुंडली में गंडमूल दोष की उपस्थिति मानी जाती है। 27 नक्षत्रों में से उपर बताए गए 6 नक्षत्रों में चन्द्रमा के स्थित होने से यह दोष माना जाता है, जिसका अर्थ यह निकलता है कि यह दोष लगभग हर चौथी-पांचवी कुंडली में बन जाता है, किन्तु यह धारणा ठीक नहीं है। यह दोष हर चौथी-पांचवी कुंडली में नहीं बल्कि हर 18 वीं कुंडली में ही बनता है। आइए अब इस दोष की प्रचलित परिभाषा तथा इसके विशलेषण से निकली परिभाषा की आपस में तुलना करें। प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह दोष चन्द्रमा के उपर बताए गए 6 नक्षत्रों में से किसी भी एक चरण में स्थित होने से बन जाता है। जबकि वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार यह दोष चन्द्रमा के इन 6 नक्षत्रों के किसी एक नक्षत्र के किसी एक विशेष चरण में होने से ही बनता है। न कि उस नक्षत्र के चारों चरणो में से किसी भी चरण में स्थित होने से।

जैसे- चन्द्रमा रेवती नक्षत्र के चौथे चरण में स्थित हों या अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण में स्थित हो।

जैसे- चन्द्रमा अश्लेषा नक्षत्र के चौथे चरण में स्थित हो या मघा नक्षत्र के पहले चरण में स्थित हो।

जैसे- चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र के चौथे चरण में स्थित हों या मूल नक्षत्र के पहले चरण में स्थित हो।

इस दोष से जुड़े बुरे प्रभावों के बारे में भी जान लीजिए- गंड मूल दोष भिन्न-भिन्न कुंडलियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के बुरे प्रभाव देता है, जिन्हें ठीक से जानने के लिए यह जानना आवश्यक होगा कि कुंडली में चन्द्रमा इन 6 में से किस नक्षत्र में स्थित हैं, और कुंडली के किस भाव में स्थित है? कुंडली के दूसरे सकारात्मक या नकारात्मक ग्रहों का चन्द्रमा पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ रहा है, चन्द्रमा जातक की कुंडली में किस भाव का स्वामी है, तथा ऐसे ही कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य। इस प्रकार से अगर यह दोष कुछ कुंडलियों में बनता भी है तो, भी इसके बुरे प्रभाव अलग-अलग कुंडलियों में अलग-अलग तरह के होते हैं। तथा अन्य दोषों की तरह इस दोष के बुरे प्रभावों को भी किसी विशेष परिभाषा के बंधन में नहीं बांधना चाहिए। बल्कि इस दोष के कारण होने वाले बुरे प्रभावों को उस कुंडली के गहन अध्ययन के बाद ही निश्चित करना चाहिए।

मूल नक्षत्रों की शांति व उपाय :-
मूल नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों के सुखमय भविष्य के लिए इन नक्षत्रों की शांति करवानी आवश्यक मानी गई है, मूल शांति कराने से इनके कारण लगने वाले दोष शांत हो जाते हैं, अन्यथा इनके अनेक प्रभाव लक्षित होते है, जो इस प्रकार से प्रभावित कर सकते हैं :- इस दोष के निवारण का सबसे उत्तम उपाय इस दोष के निवारण के लिए पूजा करवाना ही है। यह पूजा सामान्य पूजा की तरह न होकर एक तकनीकी पूजा होती है।
जन्म नक्षत्र के अनुसार देवता का पूजन करने से अशुभ फलों में कमी आती है, तथा शुभ फलों की प्राप्ति में सहायता प्राप्त होती है, यदि जातक अश्विनी, मघा, मूल नक्षत्र में जन्मा है तो, आपको गणेश जी का पूजन करना चाहिए। इस नक्षत्र में जन्मे जातक को माह के किसी भी एक गुरुवार या बुधवार को हरे रंग के वस्त्र, लहसुनियां आदि में से किसी भी एक वस्तु का दान करना फलदायी रहता है, मंदिर में झंडा फहराने से भी लाभ मिलता है, यदि जातक अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र में जन्मा है तो, उसके लिये बुध ग्रह का पूजन करना फलदायी रहता है। इस नक्षत्र में जन्में जातक को माह के किसी भी एक बुधवार को हरी सब्जी, हरा धनिया, पन्ना, कांसे के बर्तन, आंवला आदि वस्तुओं में से किसी भी एक वस्तु का दान करना शुभकारी होता है।

मूल शांति पूजा :-
उपरोक्त उपायों के अतिरिक्त जो उपाय सबसे अधिक प्रचलन में है, उसके अनुसार यदि बच्चा गण्डमूल नक्षत्र में जन्मा है, तो उसके जन्म से ठीक 27वें दिन उसी जन्म नक्षत्र में चंद्रमा के आने पर गंडमूल शांति पूजा करानी चाहिए। ज्येष्ठा मूल या अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक के लिए उक्त नक्षत्रों से संबंधित मंत्रों का जाप करवाना चाहिये, तथा मूल नक्षत्र शान्ति पूजन करना चाहिए, ब्राह्मणों को दान दक्षिणा एवं भोजन कराना चाहिए, यदि किसी कारणवश 27वें दिन यह पूजा नहीं कराई जा सकती, तब माह में जिस दिन चंद्रमा जन्म नक्षत्र में होता है, तब इसकी शांति कराई जा सकती है।

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रूद्राभिषेक

शिवलिंग पर क्या चढायें :-

Dr.R.B.Dhawan

शिवलिंग पर क्या चढ़ाने से, किस प्रकार का लाभ मिलता है ? यह शिवपुराण में विस्तार से वर्णित है। शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है, अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे हैं, उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए इस का उल्लेख शिव पुराण में विस्तार से किया गया है, उसका स-विस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हूं :-

श्लोक :-

जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै

दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै।

मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।

पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।।

बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा यांगना।

जवरप्रकोपशांत्यर्थम् जलधारा शिवप्रिया।।

घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्।

तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः।

प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम।

केवलं दुग्धधारा च वदा कार्या विशेषतः।

शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत्।

श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!!

सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह!

पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।।

जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै।

पुत्रार्थी शर्करायास्तु रसेनार्चेतिछवं तथा।

महलिंगाभिषेकेन सुप्रीतः शंकरो मुदा।

कुर्याद्विधानं रुद्राणां यजुर्वेद्विनिर्मितम्।

अर्थात :-

जल से रुद्राभिषेक करने पर — वृष्टि होती है।

कुशा जल से अभिषेक करने पर — रोग, दुःख से छुटकारा मिलता है।

दही से अभिषेक करने पर — पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।

गन्ने के रस से अभिषेक करने पर — लक्ष्मी प्राप्ति होती है।

मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर — धन वृद्धि होती है।

तीर्थ जल से अभिषेकक करने पर — मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इत्र मिले जल से अभिषेक करने से — रोग नष्ट होते हैं।

दूध से अभिषेक करने से — पुत्र प्राप्ति होगी, प्रमेह रोग की शान्ति तथा मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।

गंगाजल से अभिषेक करने से — ज्वर ठीक हो जाता है।

दूध शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से — सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है।

घी से अभिषेक करने से — वंश विस्तार होता है।

सरसों के तेल से अभिषेक करने से — रोग तथा शत्रुओं का नाश होता है।

शुद्ध शहद से रुद्राभिषेक करने से —- पाप क्षय होते हैं।

इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूजन और अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है, और साधक में शिवत्व रूप “सत्यं शिवम सुन्दरम्” का उदय हो जाता है। उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद से सुख-समृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति के साथ-साथ सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।

भूत भावन भगवान महादेव को विशेष वस्तुए अर्पण कर कृपा प्राप्त करें :-

भगवान शिव बहुत भोले हैं, वे अपने भक्तों के दु:ख और तकलीफों को देख नहीं पाते, भक्त के आंसू महादेव को बहुत ही जल्द पिघला भी देते हैं। महादेव की इसी खूबी की वजह से भक्त उन्हें भोलेनाथ भी कहते हैं। भोलेनाथ को सोमवार का दिन अत्यंत प्रिय है, सोमवार के दिन शिव पूजा का महत्व भी बहुत बढ़ जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर सोमवार और त्रयोदशी के दिन श्रद्धा भावना के साथ शिव आराधना की जाए तो जातक को महादेव की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।

हिन्दू धर्म में हर देवी-देवताओं की पूजा करने के कुछ विशिष्ट विधान बतायेगा गये हैं, जैसे माना जाता है कि, भगवान कृष्ण की पूजा में माखन-मिश्री का भोग अवश्य लगाना चाहिए, वैसे ही गणेश जी को मोदक अत्यंत प्रिय है, इसलिए उनकी पूजा में मोदक का भोग अवश्य लगता है। इष्ट देव को प्रसन्न करने के लिए ऐसी ही अनेक पूजा विधियां हैं।

ऐसे ही महादेव को प्रसन्न करने के भी अनेक उपाय मौजूद हैं, जिनका उल्लेख शिव पुराण में मिलता है :-

1- शिव पुराण के अनुसार जातक अगर धन लाभ या संपत्ति लाभ प्राप्त करना चाहता है तो, उसे शिवलिंग पर कच्चे चावल चढ़ाने चाहिए, इससे अवश्य ही शुभ फल प्राप्त होगा।

2- भगवान शिव को तिल अर्पित करने से समस्त पापों का नाश होता है, यह उपाय कर्मक्षय करने में बहुत लाभदायक है।

3- अगर लंबे समय से कोई परेशानी चल रही है, या घर में सुख-समृद्धि बाधित है तो, शिवलिंग पर जौ चढ़ाएं, इससे अवश्य ही परेशानी दूर होती है।

4- संतान की कामना करते हैं तो, शिवलिंग पर गेहूं चढ़ायें, इसके अलावा सुयोग्य पुत्र की प्राप्ति हेतु शिवलिंग पर धतूरे के फूल अर्पित करें, महादेव आपकी प्रार्थना अवश्य सुनेंगे।

5- अगर परिवार के किसी सदस्य को तेज बुखार अपनी चपेट में लिए हुए है तो, शिवलिंग पर जल अर्पित करें। इस समस्या से जल्द ही छुटकारा मिलेगा।

6- पढ़ाई में तेज होने के लिए या मस्तिष्क को मजबूत करने के लिए दूध में चीनी मिलाकर भगवान शिव को चढ़ायें

7- शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाना शुभदायी होता है, ऐसा करने से सभी सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है।

8- शिवलिंग पर गंगा जल अर्पित करने से मनुष्य को भौतिक सुखों के साथ-साथ मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

9- अगर किसी को टी. बी. या मधुमेह की समस्या परेशान कर रही है तो, उसे शिवलिंग पर शहद अर्पित करना चाहिये। अवश्य ही राहत मिलेगी।

10- शारीरिक दु:ख और दुर्बलता से मुक्ति पाने के लिये शिवलिंग पर गाय के दूध से बना शुद्ध देसी घी चढ़ावें लंबी उम्र की कामना हेतु दूर्वा से भगवान शिव की पूजा करें।

11- शिवलिंग पर आक के फूल चढ़ाने और शिव पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह सांसारिक बाधाओं को दूर करता है।

12- शमी के पेड़ के पत्तों को शिवलिंग पर चढ़ाने और शिव पूजा करने से मनुष्य जीवन के दुखों से मुक्ति प्राप्त करता है, और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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राह दिखाती यह 6 बातें

जीवन को व्यवस्थित करने वाली यह 6 बातें :-

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श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों में जीवनोपयोगी अनेक शिक्षाएं हैं, जो आज के समय में हमें सही रास्ता दिखाती हैं, श्रीरामचरितमानस के अरण्यकांड में शूर्पणखा जब लक्ष्मण द्वारा नाक, कान काटे जाने के बाद रावण के पास जाती है, तब वह रावण को कहती है कि जीवन में कभी इन 6 बातों को कभी छोटा नहीं समझना :-

रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।

अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।

अर्थात :- शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। ऐसा कहकर शूर्पणखा अनेक प्रकार से विलाप करके रोने लगी।

1. शत्रु अर्थात् दुश्मन :- दुश्मन भले ही कितना ही छोटा क्यों न हो, उसे छोटा नहीं समझना चाहिए, उससे हमेशा सावधान रहना चाहिए। कई बार छोटे दुश्मन भी इतना बड़ा नुकसान कर देते हैं, जिसके कारण बाद में पछताना पड़ता है। यदि छोटे-छोटे राजा मिलकर किसी चक्रवर्ती राजा पर एक साथ हमला कर दें तो उसे भी हरा सकते हैं। इसलिए दुश्मन को कभी छोटा यानी कमजोर नहीं समझना चाहिए।

2. रोग-बीमारी :- छोटी से छोटी बीमारी को भी कभी नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। सर्दी, जुकाम या बुखार आदि भले ही साधारण लगते हों, लेकिन जब यह जब बढ़ जाते हैं तो, शरीर को खोखला कर देते हैं। कई बार ये बड़ी बीमारी का कारण भी बन जाते हैं। साधारण लगने वाली खांसी टी.बी. भी हो सकती है। इन छोटी लगने वाली बीमारियों के कारण ही कई बार मनुष्य को अपने प्राण गंवाने पड़ जाते हैं। इसलिए छोटी बीमारी में भी तुरंत इलाज करवाने में ही समझदारी है।

3. अग्नि अर्थात् आग :- आग में इतनी शक्ति है कि वह कुछ ही समय में बड़े से बड़े जंगल को भी जला कर राख कर सकती है। आग का सबसे छोटा रूप एक चिंगारी होती है, लेकिन जब यह विकराल रूप ले लेती है तो, इस पर नियंत्रण पाना किसी के बस में नहीं होता। इसलिए आग के साथ कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। ये कभी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है।

4. पाप कर्म अर्थात् बुरे काम :- धर्म ग्रंथों के अनुसार, मनुष्यों को उनके द्वारा किए गए कामों के आधार पर पाप व पुण्य की प्राप्ति होती है। कई बार मनुष्य सब कुछ जानकर भी छोटे-छोटे गलत कार्य करते हैं। इन कामों से प्राप्त होने वाला पाप भी कम ही होता है, लेकिन जब इन छोटे-छोटे पाप कर्मों का फल एकत्रित हो जाता है तो इसकी भयानक सजा मिलती है। इसलिए पाप कर्म भले ही छोटा है, लेकिन करने से बचना चाहिए।

5. स्वामी अर्थात् मालिक :- मालिक को कभी भी छोटा नहीं समझना चाहिए। क्योंकि अगर मालिक नाराज हो जाए तो, वह आपका बड़ा नुकसान कर सकता है। अगर आप नौकर हैं, और सोचते हैं कि मालिक को डरा-धमका कर या किसी भी तरीके से अपना काम निकाल लेंगे तो यह आपकी बहुत बड़ी भूल है। मालिक को जब भी मौका मिलेगा, वह आपका नुकसान करने से नहीं चूकेगा। इसलिए मालिक को कभी छोटा यानी कमजोर नहीं समझना चाहिए।

6. सर्प अर्थात् सांप :- सांप दिखने में भले ही कितना भी छोटा क्यों न हो, लेकिन यदि वह एक बार काट ले तो, मृत्यु का कारण बन सकता है। कई बार देखने में आता है कि सांप पकड़ने वाले ही सांप का शिकार बन जाते हैं, क्योंकि उन्हें यही लगता है कि हमेशा की तरह वे सांप को अपने वश में कर लेंगे। उनकी यही सोच कई बार उनकी जान की दुश्मन बन जाती है। इसलिए सांप को कभी छोटा (कमजोर) नहीं समझना चाहिए।

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प्रभावित करता है राहु

कैसे प्रभावित करता है, राहु मनुष्य के स्वभाव को:-

Dr.R.B.Dhawan

राहु ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में एक छाया ग्रह कहा गया है, अर्थात इस ग्रह का कोई अपना पिंड नहीं है, वस्तुत: यह दो ग्रहों के भ्रमण मार्ग का कटाव बिंदु मात्र है, परंतु फिर भी कभी-कभी इस ग्रह (कटाव बिंदु) का मनुष्य के मन मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। राहु की प्रवृति राक्षसी होने के कारण ये मनुष्य को तामसिक प्रवृति का अपना गुण प्रदान कर ही देता है, कुंडली में नकारात्मक राहु से प्रभावित व्यक्ति अक्सर भ्रमित रहता है।

पौराणिक धारणा

कैसे बना राहू ग्रह? क्या है राहू ?:-

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हिरन्यकश्यप की सिंहिका नामक पुत्री का विवाह विप्रचिति नामक दानव के साथ हुआ था उसी के गर्भ से राहु ने जन्म लिया। विप्रचिति हमेशा दानवी शक्तियों, आसुरी शक्तियों से दूर रहे और साथ ही समुद्र मंथन के समय अमृतपान के कारण राहु को अमरत्व एवं देवत्व की प्राप्ति हुई। तभी से शिव भक्त राहु अन्य ग्रहों के साथ ब्रह्मा जी की सभा में विराजमान रहते हैं इसलिए इन्हें ग्रह के रूप में मान्यता मिली।

क्या है राहू ?

जन्मकुंडली में राहु पूर्व जन्म के कर्मों के बारे में बताता है, राहु परिवर्तनशील, अस्थिर प्रकृति का ग्रह माना जाता है। राहु में अंतर्दृष्टि भी होती है ताकि वह काल की रचनाओं के बारे में सोच सके बता सके। भौतिक दृष्टि से इसका कोई रंग, रूप, आकार नहीं है, इसकी कोई राशि, वार नहीं होता। वैदिक ज्योतिषियों ने इसकी स्वराशि, उच्च राशि और मूलत्रिकोण राशियों की कल्पना की है। जातक परिजात में राहु की उच्च राशि मिथुन, मूलत्रिकोण कुंभ और स्वराशि कन्या मानी गई है। राहु का व्यवहार अत्यंत प्रभावशाली देखा गया है। राहु पूर्वाभास की योग्यता भी विकसित करता है। विशेषकर जब राहु जल राशियों कर्क, वृश्चिक, मीन में हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि हो।

राहु छुपे हुए रहस्यों, तंत्र, मंत्र, काला जादू व भूत प्रेत का कारक भी है। राहु की तामसिक प्रवृत्ति के कारण वह चालाक है और व्यक्ति को भौतिकता की ओर पूर्णतया अग्रसर करता है, बहुत महत्वाकांक्षी व लालची बनाता है, जिसके लिए व्यक्ति साम-दाम-दंड-भेद की नीतियां अपनाकर जीवन में आगे बढ़ता है।

इसी तरह यह व्यक्ति को भ्रमित भी रखता है। एक के बाद दूसरी इच्छाओं को जागृत करता है। इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह विभिन्न धार्मिक कार्य व यात्राएं भी करता है। राहु प्रधान व्यक्ति में दिखावा करने की प्रवृत्ति विशेष रूप से पायी जाती है। राहु कार्य जाल में फंसाता है, जीवन में आकर्षण को बनाये रखता है, हार नहीं मानता अर्थात इच्छा शक्ति को जागृत रखता है।

राहु का योग जन्म पत्रिका में जिस ग्रह के साथ होगा उसी में विकार उत्पन्न हो जायेगा और केतु का योग जिस ग्रह के साथ होगा उसकी काट होगी। उसका दोष कम हो जायेगा। कोई भी ग्रह राहु के मुख में होगा उस व्यक्ति का व्यवहार उस भाव से संबंधित असंयमित हो जायेगा।

सूर्य के निकट रहने पर राहु सूर्य का सारा बल ग्रहण कर लेता है । इस प्रकार राहु चंद्र के साथ मन की स्थिति बहुत अव्यवस्थित करके मन में उथल-पुथल मचा देता है। विचारों और भावनाओं में विकार उत्पन्न हो जाता है। ऐसा देखने में आया है कि जिन जातकों की जन्मपत्रिका में राहु और चंद्रमा की युति हो वे बहुत परेशान देखे गये हैं, मानसिक सामंजस्यता की बेहद कमी देखी गयी है। अन्य पाप ग्रहों का भी दृष्टि या युति संबंध हो तो मानसिक रोगी व पागलपन की स्थिति भी देखी गयी है।

राहु गुरु के साथ मिलकर गुरु चांडाल योग का निर्माण करता है जो विवाह व ज्ञान प्राप्ति में बाधा बन जाता है। इस प्रकार राहु सभी ग्रहों के साथ युति करके किसी न किसी प्रकार का विकार उत्पन्न करता है। किंतु यह सब फल राहु की दशा अंतर्दशा आने पर ही मिलते हैं। मित्र राशियों में शुभ व शत्रु राशियों में अशुभ फल देते हैं। राहु के परिणाम शुभ मिलेंगे या अशुभ यह मूलतः नक्षत्रों द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।राहु के अपने नक्षत्र हैं आद्रा, स्वाति एवं शतभिषा। इन नक्षत्रों में राहु रहने पर शुभ परिणाम देता है।

ज्योतिष शास्त्रों में राहु पीड़ा को भूत, प्रेत, पिशाच, मसान आदि भी कहा गया है, आयुर्वेद के ग्रंथों में भूत-बाधा को एक विशेष प्रकार की मानसिक बीमारी बताया गया है। आगे की पंक्तियों में कुछ ग्रह योग दे रहा हूं, जो कुंडली में हों तो जातक को अपना प्रभाव दिखाते हैं:-

— लग्न में राहु तथा चंद्र और त्रिकोण में मंगल व शनि हों, तो जातक को प्रेत पीड़ा होती है।

— चंद्र राहु से युक्त अथवा पाप ग्रह से दृष्ट हो, शनि सप्तम में हो तथा कोई शुभ ग्रह चर राशि में हो, तो भूत पीड़ा होती है।

— शनि तथा राहु लग्न में हो, तो जातक को भूत सताता है।

— लग्नेश या चंद्र से युक्त राहु लग्न में हो, तो प्रेत पीड़ा होता है।

— यदि दशम भाव का स्वामी आठवें या एकादश भाव में हो और उस भाव के स्वामी से दृष्ट हो, तो ऐसी स्थिति में प्रेत पीड़ा होता है।

— नीच राशि में स्थित राहु के साथ लग्नेश हो तथा वह लग्नेश सूर्य, शनि व अष्टमेश से दृष्ट हो तो जातक को भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

— पंचम भाव में सूर्य तथा शनि हो, निर्बल अथवा राहु युक्त चन्द्रमा सप्तम भाव में हो तथा बृहस्पति बारहवें भाव में हो, तो भी भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

— जन्म समय चन्द्र ग्रहण हो और लग्न, पंचम तथा नवम भाव में पाप ग्रह हों तो जन्मकाल से ही पिशाच बाधा का भय होता है।

— षष्ठ भाव में पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट राहु या केतु की स्थिति भी पैशाचिक बाधा उत्पन्न करती है।

— लग्न में शनि, राहु की युति हो अथवा दोनों में से कोई भी एक ग्रह स्थिति हो अथवा लग्नस्थ राहु पर शनि की दृष्टि हो, भ्रम होता है।

— लग्नस्थ केतु पर कई पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो, पैशाचिक बाधा होती है।

— निर्बल चन्द्रमा शनि के साथ अष्टम में हो तो पिशाच, भूत-प्रेत मशान आदि का भय।

— निर्बल चन्द्रमा षष्ठ अथवा बाहरहवें में मंगल, राहु या केतु के साथ हो तो भी पिशाच भय।

— चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) के लग्न में राहु और लग्नेश पर यदि षष्ठेश की दृष्टि हो।

— एकादश भाव में मंगल राहु हो तथा नवम भाव में स्थिर राशि (वृष, सिंह,वृश्चिक, कुंभ) और सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु मीन) हो।

— लग्न भाव मंगल से दृष्ट हो तथा षष्ठेश, दशम, सप्तम या लग्न भाव में राहु की स्थिति हों।

— मंगल यदि लग्नेश और राहु के साथ केंद्र या लग्न भाव में स्थिति हो तथा छठे भाव का स्वामी लग्नस्त हो।

— पापग्रहों से युक्त या दृष्ट केतु लग्नगत हो।

— शनि राहु केतु या मंगल में से कोई भी एक ग्रह सप्तम स्थान में हो।

— जब लग्न में चन्द्रमा के साथ राहु हो और त्रिकोण भावों में क्रूर ग्रह हों तो, मानसिक व्याधियां कष्ट देती हैं।

— राहु शनि से युक्त होकर लग्न में स्थित हो तो, मानसिक व्याधियां होती हैं।

— लग्नेश एवं राहु अपनी नीच राशि का होकर अष्टम भाव या अष्टमेश से संबंध करे।

— राहु अष्टम भाव में हो तथा लग्नेश शनि के साथ द्वादश भाव में स्थित हो, तो प्रेत बाधा का प्रभाव संभव होता है।

— द्वितीय में राहु द्वादश में शनि षष्ठ मं चंद्र तथा लग्नेश भी अशुभ भावों में हो।

— चन्द्रमा तथा राहु दोनों ही नीच राशि के होकर अष्टम भाव में हो।

— चतुर्थ भाव में राहु हो वक्री मंगल द्वादश भाव में हो तथा अमावस्या तिथि का जन्म हो तो, नकारात्मक ऊर्जा परेशान करती हैं।

— नीचस्थ सूर्य के साथ केतु हो तथा उस पर शनि की दृष्टि हो तथा लग्नेश भी नीच राशि का हो तो, नकारात्मक ऊर्जा पीड़ित करती है।

— जिन जातकों की कुण्डली में उपरोक्त योग हों, उन्हें विशेष सावधानी पूर्वक रहना चाहिए तथा संयमित जीवन शैली को ग्रहण करना चाहिए। जिन परिस्थितियों के कारण भ्रम अथवा प्रेत बाधा का प्रकोप हो सकता है उनसे बचें। जातक को भ्रम, नकारात्मक ऊर्जा अथवा प्रेतबाधा से मुक्त रखने में यह उपाय सहायक सिद्ध हो सकते हैं:-

— शारीरिक सुचिता के साथ-साथ मानसिक पवित्रता का ध्यान रखें।

— नित्य हनुमान चालीसा तथा बजरंग बाण का पाठ करें।

— मंगलवार का व्रत रखें तथा सुन्दरकांड का पाठ करें।

— पुखराज रत्न से प्रेतात्माएं दूर रहती हैं, पुखराज रत्न धारण करें।

— घर में नित्य शंख बजाये, इससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।

— नित्य गायत्री मंत्र की तीन माला जाप करें।

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Diwali muhurat 2017

2015 Diwali Muhurat

Diwali Pooja muhurat 2017

by :-​Dr.R.B.Dhawan

diwali 2017 का पर्व 19 अक्टूबर 2017 बृहस्पिवार के दिन है। कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि प्रदोषकाल, स्थिर लग्न में अथवा  महानिशीथ काल, स्थिर लग्न में अनुकूल चौघडिया के समय गणेश सहित देवी महालक्ष्मी-महाकाली-महासरस्वती diwali Pooja की पूजा-आराधना Laxmi pooja करने से यह देवीयां भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं।

इस वर्ष दीपावली depawli pooja, Laxmi Pooja का पर्व 19 अक्तूबर 2017 बृहस्पतिवार के दिन होगा। दिल्ली की समय गणना अनुसार इस दिन अमावस्या रात्रि 24:44 तक रहेगी, चित्रा नक्षत्र 19:28 से आरंभ होगा, वृष (स्थिर लग्न) 19:11 से 21:06 तक रहेगी। निशीथ काल nishith kaal 20:20 से 22:54 तक, प्रदोष काल pradosh kaal 17:46 से 20:20 तक रहेगा। दीपावली की शाम प्रदोष काल में स्नान के उपरांत वस्त्राभूषण धारण करके धर्मस्थल पर श्रद्धापूर्वक दीपदान करके शुभ मुहूर्त अनुकूल चौघडिया में अपने निवास स्थान पर श्री गणेश सहित देवी महालक्ष्मी महाकाली महासरस्वती और कुबेर की पूजा diwali pooja करनी चाहिए।

महालक्ष्मी Laxmi Pooja पूजन विशेष मुहूर्त diwali muhurat 2017, :-   (1). सायं 19 : 11 से 20 : 20 तक। (2). रात्रि 20 : 20 से 20 : 59 तक। यह दोनों मुहूर्त वृष लग्न के हैं।

Diwali Special muhurt 2017, मध्य रात्रि महानिशीथ काल सिंह लग्न : 25 : 39 से 25 : 48 तक है।

Diwali muhurat by:- Dr.R.B.Dhawan, Top astrologer in Delhi, Best astrologer in India 


कर्ज की समस्या

कर्ज की समस्या और ज्योतिषीय कारण:-

Dr.R.B.Dhawan:-

जन्म होते ही हम अपने प्रारब्ध के चक्र से बंधे होते हैं, और जन्मकुंडली हमारे इसी प्रारब्ध को सूचित करती है। हमारे जीवन में सभी घटनाएं नवग्रह द्वारा ही सूचित होती हैं। आज के समय में जहाँ आर्थिक असंतुलन हमारी चिंता का एक मुख्य कारण है, वहीँ एक दूसरी स्थिति जिसके कारण अधिकांश लोग चिंतित और परेशान रहते हैं वह है “कर्ज की स्थिति” धन चाहे व्यक्तिगत लिया गया हो, या सरकारी लोन के रूप में, ये दोनों ही स्थितियां व्यक्ति के ऊपर एक बोझ के समान बनी रहती हैं, कई बार ना चाहते हुये भी परिस्थितिवश व्यक्ति को कर्ज रुपी बोझ का सामना करना ही पड़ता है, वैसे तो आज के समय में अपने कार्यो की पूर्ती के लिए अधिकांश लोग कर्ज लेते हैं, परन्तु जब जीवन पर्यन्त बनी रहे या बार-बार यह स्थिति सामने आये तो वास्तव में यह भी हमारी कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोगों के द्वारा ही सूचित होती है।कुंडली में “छटा भाव” कर्ज का भाव माना गया है, अर्थात कुंडली का छटा भाव ही व्यक्ति के जीवन में कर्ज की स्थिति को सूचित करता है, जब कुंडली के :-

छटे भाव में कोई पाप योग बना हो, या षष्टेश ग्रह बहुत पीड़ित हो तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है जैसे –

यदि छटे भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में भावस्थ हो, छठ्ठेे भाव में राहु-चन्द्रमाँ की युति हो, राहु-सूर्य के साथ होने से ग्रहण योग बन रहा हो, छठ्ठेे भाव में राहु मंगल का योग हो, छठ्ठे भाव में गुरु-चाण्डाल योग बना हो, शनि-मंगल या केतु-मंगल की युति छठ्ठे भाव में हो तो …ऐसे पाप या क्रूर योग जब कुंडली के छटे भाव में बनते हैं तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या बहुत परेशान करती है और री-पेमेंट में बहुत समस्यायें आती हैं।

छठ्ठे भाव का स्वामी ग्रह भी जब नीच राशि में हो अष्टम भाव में हो या बहुत पीड़ित हो तो कर्ज की समस्या होती है । इसके अलावा “मंगल” को कर्ज का नैसर्गिक नियंत्रक ग्रह माना गया है ! अतः यहाँ मंगल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है यदि कुंडली में मंगल अपनी नीच राशि (कर्क) में हो आठवें भाव में बैठा हो, या अन्य प्रकार से अति पीड़ित हो तो भी कर्ज की समस्या बड़ा रूप ले लेती है”

विशेष: – यदि छठ्ठे भाव में बने पाप योग पर बलवान बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो कर्ज का रीपेमेंट संघर्ष के बाद हो जाता है या व्यक्ति को कर्ज की समस्या का समाधान मिल जाता है परन्तु बृहस्पति की शुभ दृष्टि के आभाव में समस्या बनी रहती है।

छठ्ठे भाव में पाप योग जितने अधिक होंगे उतनी समस्या अधिक होगी, अतः कुंडली का छठा भाव पीड़ित होने पर लोन आदि लेने में भी बहुत सतर्कता बरतनी चाहिये।

बहुत बार व्यक्ति की कुंडली अच्छी होने पर भी व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है, जिसका कारण उस समय कुंडली में चल रही अकारक ग्रहों की दशाएं या गोचर ग्रहों का प्रभाव होता है, जिससे अस्थाई रूप से व्यक्ति उस विशेष समय काल के लिए कर्ज के बोझ से घिर जाता है।

उदाहरणार्थ : अकारक षष्टेश और द्वादशेश की दशा व्यक्ति को कर्ज की समस्या देती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में अलग-अलग ग्रह-स्थिति और अलग-अलग दशाओं के कारण व्यक्तिगत रूप से तो कुण्डली विश्लेषण के बाद ही किसी व्यक्ति के लिए चल रही कर्ज की समस्या के लिए सटीक ज्योतिषीय उपाय निश्चित किये जा सकते हैं। अतः यहाँ हम कर्जमुक्ति के लिए ऐसे कुछ मुख्य उपाय बता रहे हैं, जिन्हें कोई भी व्यक्ति कर सकता है:-

उपाय :-
1. मंगल यन्त्र को घर के मंदिर में लाल वस्त्र पर स्थापित करें, और प्रतिदिन इस मंत्र का एक माला जाप करें :- ॐ क्राम क्रीम क्रोम सः भौमाय नमः।

2. प्रति दिन *ऋणमोचन मंगल स्तोत्र* का पाठ करें।

3. *हनुमान चालीसा* का पाठ करें।

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अष्ट सिद्धियां

सनातनी शास्त्रों में आठ प्रकार की सिद्धियों का वर्णन मिलता है, यह अष्टसिद्धियां किस प्रकार प्राप्त की जाती हैं, और उनकी विशेषतायें क्या हैं:-

Dr.R.B.Dhawan

पुराणों में बार-बार अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का उल्लेख मिलता है, विशेषकर हनुमान चालीसा में सीताजी द्वारा हनुमान जी को दिए वरदान में इनके दिए जाने का विवरण है। आईये जानें कि क्या हैं ये आठ सिद्धियां? –

हर मनुष्य में बीजरूप (अति सूक्षम) कुछ विशेष नैसर्गिक गुण होते हैं। इन्हीं में ही धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य भी हैं। ऐश्वर्य का मतलब धन संपदा से नहीं है, वह श्री के अंतर्गत आती है। ये ऐश्वर्य अणिमादिक अष्ट सिद्धिंयाँ ही हैं। इन अष्ट सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सदाचार युक्त जीवन व्यतीत करना पडता है, और कहीं न कहीं वैराग्य भाव का भी इसमें योगदान है। वैराग्य detachment है। जितने भी अलौकिक शक्तियों से संपन्न देवी-देवता हुए हैं, उन्होंने सभी चमत्कारपूर्ण कार्य अष्ट सिद्धियों के बल पर ही किसे थे।

आठ प्रमुख सिद्धियाँ हैं, सिद्धि का अर्थ है पूर्णता की प्राप्ति होना व सफलता की अनुभूति मिलना, सिद्धि को प्राप्त करने का मार्ग एक कठिन मार्ग है, ओर जो इन सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है, वह जीवन की पूर्णता को पा लेता है। असामान्य कौशल या क्षमता अर्जित करने को ही ‘सिद्धि’ कहा गया है। चमत्कारिक साधनों द्वारा ‘अलौकिक शक्तियों को पाना जैसे – दिव्यदृष्टि, अपना आकार छोटा कर लेना, घटनाओं की स्मृति प्राप्त कर लेना इत्यादि. ‘सिद्धि’ यही होती है। शास्त्रों में अनेक सिद्धियों की चर्चा की गई है, और इन सिद्धियों को यदि नियमित और अनुशासनबद्ध रहकर किया जाए तो, अनेक प्रकार की परा और अपरा सिद्धियाँ चिन्हित कि जा सकती है। यह सिद्धियाँ भी दो प्रकार की होती हैं, एक परा और दूसरी अपरा, यह सिद्धियां इंद्रियों के नियंत्रण और व्यापकता को दर्शाती हैं। सब प्रकार की उत्तम, मध्यम और अधम सिद्धियाँ अपरा सिद्धियां कहलाती है। मुख्य सिद्धियाँ आठ प्रकार की कही गई हैं, इन सिद्धियों को पाने के उपरांत साधक के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। सिद्धियां क्या हैं? व इनसे क्या हो सकता है ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर मार्कंडेय पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में प्राप्त होता है जो इस प्रकार है:-

अणिमा लघिमा गरिमा प्राप्ति: प्राकाम्यंमहिमा तथा।

ईशित्वं च वशित्वंच सर्वकामावशायिता:।।

यह आठ मुख्य सिद्धियाँ इस प्रकार हैं:- अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता और वंशिका।

1. अणिमा सिद्धि –

अपने शरीर को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता ही अणिमा सिद्धि है, यह वह सिद्धि है, जिससे युक्त हो कर व्यक्ति सूक्ष्म रूप धर कर एक प्रकार से दूसरों के लिए अदृश्य हो जाता है. इसके द्वारा आकार में लघु होकर एक अणु रुप में परिवर्तित हो सकता है. अणु एवं परमाणुओं की शक्ति से सम्पन्न हो साधक वीर व बलवान हो जाता है. अणिमा की सिद्धि से सम्पन्न योगी अपनी शक्ति द्वारा अपार बल प्राप्त कर लेता है ।

2. महिमा सिद्धि –

अपने को बड़ा एवं विशाल बना लेने की क्षमता को महिमा सिद्धि कहा जाता है, यह शरीर के आकार को विस्तार देती है, विशालकाय स्वरुप को जन्म देने में सहायक है, इस सिद्धि से सम्पन्न होकर साधक प्रकृति को विस्तारित करने में भी सक्षम होता है, जिस प्रकार केवल ईश्वर ही अपनी इसी सिद्धि से ब्रह्माण्ड का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार साधक भी इस सिद्धि को पाकर वैसी शक्ति पाता है।

3. गरिमा सिद्धि –

इस सिद्धि से मनुष्य अपने शरीर को जितना चाहे, उतना भारी बना सकता है, यह सिद्धि साधक को अनुभव कराती है कि उसका वजन या भार उसके अनुसार बहुत अधिक बढ़ सकता है, जिसके द्वारा वह किसी के हटाए या हिलाए जाने पर भी नहीं हिल सकता ।

4. लघिमा सिद्धि –

स्वयं को हल्का बना लेने की क्षमता ही लघिमा सिद्धि होती है, लघिमा सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत हल्का अनुभव करता है, इस दिव्य महासिद्धि के प्रभाव से योगी सुदूर अनन्त तक फैले हुए ब्रह्माण्ड के किसी भी पदार्थ को अपने पास बुलाकर उस को लघु करके अपने हिसाब से उसमें परिवर्तन कर सकता है ।

5. प्राप्ति सिद्धि –

कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता इस सिद्धि के बल पर प्राप्त होती है, साधक कुछ भी पाना चाहें उसे प्राप्त कर सकता है, इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक जिस भी किसी वस्तु की इच्छा करता है, वह असंभव होने पर भी उसे प्राप्त हो जाती है, जैसे रेगिस्तान में प्यासे को पानी प्राप्त हो सकता है या अमृत की चाह को भी पूरा कर पाने में वह सक्षम हो जाता है, केवल इसी सिद्धि द्वारा ही वह असंभव को संभव कर सकता है।

6. प्राकाम्य सिद्धि –

कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता प्राकाम्य सिद्धि की उपलब्धि है, इसके सिद्ध हो जाने पर मन के विचार आपके अनुरुप परिवर्तित होने लगते हैं, इस सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत शक्तिशाली अनुभव करता है, इस सिद्धि को पाने के बाद मनुष्य जिस वस्तु कि इच्छा करता है, उसे पाने में सफल होता है, व्यक्ति चाहे तो आसमान में उड़ भी सकता है, और यदि चाहे तो पानी पर चल भी सकता है।

7. ईशिता सिद्धि –

हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना ही इस सिद्धि की पूर्णता है, इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक समस्त प्रभुत्व और अधिकार प्राप्त करने में सफल हो जाता है, सिद्धि प्राप्त होने पर अपने आदेश के अनुसार किसी पर भी अधिकार जमाया जा सकता है, वह चाहे राज्यों से लेकर साम्राज्य ही क्यों न हो, इस सिद्धि को पाने पर साधक ईश रुप में परिवर्तित हो जाता है।

8. वशिता सिद्धि –

जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता को ही वशिता या वशिकरण सिद्धि कहा जाता है, इस सिद्धि के द्वारा जड़, चेतन, जीव-जन्तु, पदार्थ-प्रकृति, सभी को स्वयं के वश में किया जा सकता है।

इन अष्ट सिद्धियों को जो प्राप्त कर लेता है, उसे इस मृत्युलोक में ईश्वर मान लिया जाता है, बहुत से योगियों ने इन्हें प्राप्त किया होगा। लेकिन उपलब्ध ग्रंथों, कथाओं, रामायण, महाभारत के अनुसार केवल दो शरीर धारिओं अर्थात जिसने धरती पर जन्म लिया, उन्होंने इनका खुल के प्रयोग किया। कौन हैं ये दोनों? हनुमान और श्रीकृष्ण। इसीलिए इनका यश और कीर्ति अमर व् अक्शुण है। श्रीकृष्ण को साक्षात् ईश्वर माना गया है व जरंगबली की महिमा अपरम्पार है।

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रूद्राक्ष में अलौकिक गुण

Dr.R.B.Dhawan

रूद्राक्ष : आसाम, नेपाल और हिमालय के कई क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाला एक सुपरिचित बीज है, जिसे पिरोकर मालाएं बनाई जाती हैं किन्तु इसके अलौकिक गुणों की जानकारी हर एक को नहीं है। जन सामान्य की धारणा है कि रूद्राक्ष पवित्र होता है इसलिए इसे पहनना चाहिए बस इससे अधिक जानने की चेष्टा कोई नहीं करता।

वस्तुतः रूद्राक्ष पवित्र तो होता ही है इसके अतिरिक्त रूद्राक्ष में अलौकिक गुण भी हैं इसके चुम्बकिय प्रभाव को तथा स्पर्ष-षक्ति को आधुनिक विज्ञानवेत्ता भी स्वीकार करते हैं यह रोग-षमन और अदृष्य बाधाओं के निवारण में अत्यंत प्रभावशाली होता है। स्वास्थ्य, शान्ति और श्री-समृद्धि देने में भी रूद्राक्ष का प्रभाव अद्वितीय है। रूद्राक्ष के खुरदरे बीज धारियाँ लिए होते हैं, इन धारियों की संख्या एक से ग्यारह तक पाई जाती है इन धारियों को ही ‘मुख’ कहते हैं।

मुख की संख्या के आधार पर रूद्राक्ष के गुण, प्रभाव और मूल्य में अन्तर होता है। एकमुखी रूद्राक्ष दुर्लभ होता है और दो से लेकर सातमुखी तक सरलता से मिल जाते हैं पर आठ से चौदह तक मुख वाले कदाचित ही मिल पाते हैं फिर 15 से 21 धारी वाले नितान्त दुर्लभ हैं सर्वसुलभ दाना पंचमुखी है, सामान्यतः प्रयास करने पर 2 से 13 मुखी तक के दाने भी मिल जाते हैं। इन सभी के अलग-अलग देवता हैं प्रत्येक दाने में धारियों के क्रम से उसके देवता की शक्ति समाहित रहती है और उसके धारक को उस देवता की कृपा सुलभ होती है। यों तो सभी रूद्राक्ष शिवजी को प्रिय हैं और उनमें से किसी को भी धारण करने से साधक शिव-कृपा का पात्र हो जाता है।

रूद्राक्ष का दाना अथवा माला जो भी सुलभ हो उसे गंगाजल या अन्य पवित्र जल से स्नान कराकर धूप-दीप से पूजन करें, पूजनोपरान्त ॐ नमः शिवाय मन्त्र का 1100 पाठ कर 108 मंत्र का हवन करना चाहिए तत्पष्चात् रूद्राक्ष को शिवलिंग से स्पर्ष कराकर उपरोक्त मंत्र जपते हुए पूर्व या उत्तर की और मुख करके धारण कर लेना चाहिए, धारण करने के पश्चात् हवन-कुण्ड की भस्म का तिलक लगाकर षिव-प्रतिमा को प्रणाम करें। इस विधि से धारण किया गया रूद्राक्ष निष्चित रूप से प्रभावशाली होता है यह रूद्राक्ष धारण करने की सरलतम पद्धति है।

वैसे समर्थ साधक रूद्राक्ष को पंचामृत से स्नान कराकर अष्टगन्ध अथवा पंचगन्ध से भी नहलायें फिर पूर्ववत् पूजा करके उसे सम्बन्धित मन्त्र विषेष का 1100 जाप कर 108 मंत्र का हवन करें तथा भस्म लेपन के पष्चात् शिव-प्रतिमा को प्रणाम कर धारण कर लें। धर्म शास्त्रों में एक-मुखी से लेकर चौदह मुखी तक रूद्राक्ष की धारण विधि एवं मंत्र महर्षियों ने निर्धारित किये हैं।

रूद्राक्ष की माला 108 मनकों की अधिक प्रभावशाली होती है जिसमें पंचमुखी का कम से कम एक दाना और शेष अन्य मुख वाले दाने हो सकते हैं। इसे बाहु या कण्ठ पर धारण करने से भी पूर्ण लाभ होता है। ये समस्त रूद्राक्ष व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक कष्टों का शमन करके उसमें आस्था, शुचिता और देवत्व के भाव को जागृत करते हैं भूत-बाधा, अकाल-मृत्यु, आकस्मिक-दुर्घटना, मिर्गी, उन्माद, हृदय-रोग, रक्तचाप, आदि में रूद्राक्ष धारण करने से चमत्कारी लाभ दृष्टिगोचर होता है। रूद्राक्ष को लाल धागे में पिरोकर धारण करना चाहिए।

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शनिश्चरी अमावस्या

शनिश्चरी अमावस्या जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं-

  1. ग्रह दोष
  2. पितृदोष
  3. सहभागी कृत दोष

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष- आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

शनैश्चरी अमावस्या-

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री- इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य है, उन सभी के नाप की ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ प्राप्त कर लेनी चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित की गई हो। यह मुद्रिका ऐसी होनी चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।