शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा और स्वास्थ्यवर्धक खीर :-

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शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागिरी पूर्णिमा भी कहा जाता है, को हिंदू चंद्र पक्ष अश्विन महीने (सितंबर-अक्टूबर) के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन के रूप में इसे कुमुड़ी (चांदनी) के रूप में भी जाना जाता है, जैसा कि इस दिन, पृथ्वी पर चंद्रमा की बौछार ‘अमृत किरणें’ या जीवन के अमृत उसके किरणों के माध्यम से है पूर्णिमा की चमक विशेष आनन्द लेती है, यह बदलते मौसम का प्रतीक है, मानसून के अंत में शरद पूर्णिमा की रात्रि चन्द्रमा की किरणों में औषधीय गुण रहते हैं।

5000 वर्ष पहले भी इस रात में भगवान श्रीकृष्ण और राधाजी ने वृन्दावन में अनगिनत गोपी को दिव्य आनंद प्रकट किया था। यह माना जाता है कि चंद्रमा और पृथ्वी शरद पूर्णिमा रात्रि पर सबसे करीब दूरी पर हैं। इस वजह से, चंद्रमा की किरणों में कई अमृत किरणें (उपचारात्मक गुण) हैं, चांदनी के नीचे खीर रखना शरीर और आत्मा दोनों को पोषण करता है, निम्नलिखित कुछ स्वास्थ्य युक्तियां दी गई हैं, जिन्हें अपनाने पर हम सभी को शरद पूर्णिमा का लाभ मिल सकता है।

शरद पूर्णिमा पर, शाम को चावल, दूध और मिश्री की खीर बनायें, खीर बनाने के दौरान कुछ समय के लिए इस में सोने या चांदी की वस्तु रखें, बनने के बाद उसे निकाल कर लगभग 9 बजे से करीब 12 बजे तक इसे चाँदनी में रखें। उस रात के लिए कोई भी अन्य खाना न पकाया जाए, केवल खीर ही खानी चाहिए। देर रात में हमें अत्यधिक आहार नहीं लेना चाहिए, इसलिए खीर को तदनुसार खाना चाहिए। शरद पूर्णिमा ‌की रात में रखी खीर को दूसरे दिन प्रातःकाल भी खाया जा सकता है। क्योंकि इसे प्रसाद के रूप में भगवान को देने के बाद बनाया जाता है। रात में 15-20 मिनट के लिए चंद्रमा की ओर देखे । ध्यान रहे आप आँखों को नहीं झपका रहे हों।

आँखों की परेशानियों से मुक्त होने के लिए और आंखें पूरी तरह ठीक से काम करने के लिए, शरद पूर्णिमा चाँद की चांदनी में ही में एक सुई में धागा लगाने का प्रयास करें। (कोई अन्य प्रकाश पास नहीं होना चाहिए)। शरद पूर्णिमा पर पूरी रात यदि आप जागरण कर सकते हैं, तो यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा होगा।

शरद पूनम रात आध्यात्मिक उत्थान के लिए बहुत फायदेमंद है, इसलिए इस रात को जागने का प्रयास करना चाहिए, यदि संभव है, तो इस पवित्र रात को जप ध्यान कीर्तन करें, जिससे की आप अपने भाग्य को भी जगा सकते है! शरद पूर्णिमा वर्ष में एक बार आती है, और कहा जाता है की इस दिन भगवान् श्रीकृष्ण सभी की मनोकामना पूर्ण करते हैं, इसलिए जैसे आप खीर बनाए उसे भगवान् विष्णु के भोग लगा कर चांदनी में रख दें, जिससे की इसकी मिठास आपके जीवन में सुखो की भरमार कर देगी, और आप अपना जीवन सुखमय जी सकेंगे !यदि आप खुद खीर नहीं बना सकते हैं, तो आप किसी मंदिर से प्रसाद भी ला सकते हैं !

एेसी मान्यता है कि गाय के दूध से! किशमिश और केसर डालकर चावल मिश्रित खीर बनाकर शाम को चंद्रोदय के समय बाहर खुले में रखने से उसमें पुष्टिकारक औषधीय गुणों का समावेश हो जाता है, यह खीर आध्यात्मिक उत्थान के लिए श्रेष्ठ है, जब अगले दिन प्रातः काल उसका सेवन करते हैं, तो वह हमारे आरोग्य के लिए मानसिक स्वास्थ्य अत्यंत लाभकारी हो जाती है, एक अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है, यह तत्व चंद्र किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का अवशोषण करता है, चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है, इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है, जोकि विज्ञान पर आधारित है।

आयुर्वेद के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन खीर को चन्द्रमा की किरणों में रखने से उसमे औषधीय गुण पैदा हो जाते है, और इससे कई असाध्य रोग दूर किये जा सकते है, खीर खाने का अपना औषधीय महत्त्व भी है, इस समय दिन में गर्मी होती है, और रात को सर्दी होती है, ऋतु परिवर्तन के कारण पित्त प्रकोप हो सकता है, खीर खाने से पित्त शांत रहता है, इस प्रकार शारीरिक परेशानी से बचा जा सकता है, शरद पूर्णिमा की रात में खीर का सेवन करने से जीवनदायिनी ऊर्जा प्राप्त होती है।

आयुर्वेद में उल्लेखित है कि यदि यह खीर मिटटी की हंडिया में रखी जाये, और प्रातः बच्चे उसका सेवन करें, तो छोटे बच्चों के मानसिक विकास में अतिशय योगदान करती है .!

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कार्तिक

कार्तिक मास का महत्व, कार्तिक में क्या करें, और क्या न करें?

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इस वर्ष 2018 में कार्तिक मास 23 अक्टूबर से आरम्भ हो रहा है। तथा कार्तिक पूर्णिमा 23 नवम्बर 2018 के दिन है। पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक मास के समान पुण्य प्रदायक कोई मास नहीं है, सतयुग के समान कोई युग नहीं है। वेदों के समान कोई शास्त्र नहीं, और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है। स्कन्द पुराण में भी कार्तिक मास को सबसे उत्तम मास माना गया है। इसी तरह सभी देवताओं में श्रीहरि, सभी तीर्थों में बद्रीनारायण को सबसे श्रेष्ठ माना है।

इस मास में ऐसा क्या किया जाता है, जिस से यह मास पुण्य प्रदायक है :-
कार्तिक मास में जो लोग संकल्प लेकर प्रतिदिन प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी तीर्थ स्थान, किसी नदी अथवा पोखर पर जाकर कार्तिक स्नान करते हैं, या घर में ही गंगाजल युक्त जल से स्नान करते हुए भगवान का ध्यान करते हैं, उन पर प्रभु प्रसन्न होते हैं। कार्तिक स्नान के पश्चात पहले भगवान विष्णु एवं शिव और बाद में सूर्य भगवान को अर्ध्य प्रदान करते हुए विधिपूर्वक अन्य दिव्यात्माओं को अर्ध्य देते हुए पितरों का तर्पण करना चाहिए। पितृ तर्पण के समय हाथ में तिल अवश्य लेने चाहिये क्योंकि मान्यता है कि जितने तिलों को हाथ में लेकर कोई अपने पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण करता है, उतने ही वर्षों तक उनके पितर स्वर्गलोक में वास करते हैं। इस मास अधिक से अधिक प्रभु नाम का चिंतन करना चाहिए।

स्नान के पश्चात नए एवं पवित्र वस्त्र धारण करें, तथा भगवान विष्णु जी का धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प एवं मौसम के फलों के साथ विधिवत सच्चे मन से पूजन करें, भगवान को मस्तक झुकाकर बारम्बार प्रणाम करते हुए किसी भी गलती के लिए क्षमा याचना करें। कार्तिक मास की कथा स्वयं सुनें तथा दूसरों को भी सुनाएं। कुछ लोग कार्तिक मास में व्रत करने का भी संकल्प करते हैं, तथा केवल फलाहार करते हैं, जबकि कुछ लोग पूरा मास एक समय भोजन करके कार्तिक मास के नियम का पालन करते हैं। इस मास में श्रीमद्भागवत कथा, श्री रामायण, श्रीमद्भगवदगीता, श्री विष्णुसहस्रनाम आदि स्रोत्रों का पाठ करना उत्तम है।

कार्तिक मास में दीपदान की महिमा :- वैसे तो भगवान के मंदिर में दीप दान करने वालों के घर सदा खुशहाल रहते हैं, परंतु कार्तिक मास में दीपदान की असीम महिमा है। इस मास में वैसे तो किसी भी देव मंदिर में जाकर रात्रि जागरण किया जा सकता है, परंतु यदि किसी कारण वश मंदिर में जाना सम्भव न हो तो किसी पीपल व वट वृक्ष के नीचे बैठकर अथवा तुलसी के पास दीपक जलाकर प्रभु नाम की महिमा का गुणगान किया जा सकता है। इस मास में भूमि शयन करना भी उत्तम है । पितरों के लिए आकाश में दीपदान करने की अत्यधिक महिमा है, जो लोग भगवान विष्णु के लिए आकाश दीप का दान करते हैं, उन्हें कभी क्रूर मुख वाले यमराज का दर्शन नहीं करना पड़ता, और जो लोग अपने पितरों के निमित्त आकाश में दीपदान करते हैं, उनके नरक में पड़े पितर भी उत्तम गति को प्राप्त करते हैं। जो लोग नदी किनारे, देवालय, सड़क के चौराहे पर दीपदान करते हैं, उन्हें सर्वतोमुखी लक्ष्मी प्राप्त होती है।

दान की महिमा :- कार्तिक मास में दान अति श्रेष्ठ कर्म है। स्कंदपुराण के अनुसार दानों में श्रेष्ठ कन्यादान है। कन्यादान से बड़ा विद्या दान, विद्यादान से बड़ा गौदान, गौदान से बड़ा अन्न दान माना गया है। अपनी सामर्थ्यानुसार धन, वस्त्र, कंबल, रजाई, जूता, गद्दा, छाता व किसी भी वस्तु का दान करना चाहिए तथा कार्तिक में केला और आंवले के फल का दान करना भी श्रेयस्कर है। कलियुग में कार्तिक मास को मोक्ष के साधन के रूप में दर्शाया गया है। पुराणों के मतानुसार इस मास में कार्तिक स्नान व दान चारों पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को देने वाला माना गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार नारायण ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने नारद को और नारद ने महाराज पृथु ने कार्तिक मास के सर्वगुणसंपन्न माहात्मय के संदर्भ में बताया गया है।

कार्तिक मास में जो कार्य प्रधान माने गए हैं :-
1- धर्म शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास में सबसे प्रधान कार्य दीपदान करना बताया गया है। इस मास में नदी, पोखर, तालाब आदि में दीपदान किया जाता है। इससे अतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है।
2- इस मास में तुलसी पूजन करने तथा सेवन करने का विशेष महत्व बताया गया है। वैसे तो हर मास में तुलसी का सेवन व आराधना करना श्रेयस्कर होता है, लेकिन कार्तिक में तुलसी पूजा का महत्व कई गुना माना गया है।
3- भूमि पर शयन करना कार्तिक मास का तीसरा प्रधान कार्य माना गया है। भूमि पर शयन करने से मन में सात्विकता का भाव आता है, तथा अन्य विकार भी समाप्त हो जाते हैं।
4- कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है।
5- कार्तिक मास में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई, बैंगन आदि का सेवन निषेध है।

कार्तिक व्रत के नियम :-
1- कार्तिक व्रती (कार्तिक मास में व्रत रखने वाला) को तामसिक एवं उत्तेजक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
2- किसी दूसरे के अन्न का भक्षण, किसी से द्रोह तथा परदेश गमन भी निषेध है।
3- दिन के चौथे पहर में एक समय पत्तल पर भोजन करना चाहिए।
4- कार्तिकव्रती को ब्रह्मचर्य का पालन करना तथा भूमि पर शयन करना आवश्यक होता है।
5- पूरे मास में केवल एक बार नरक चतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) को ही शरीर पर तेल लगाना चाहिए। शेष दिनों में तेल लगाना वर्जित है।
6- व्रती को लौकी, गाजर, कैथ, बैंगन आदि तथा बासी अन्न, पराया अन्न व दूषित अन्न नहीं खाना चाहिए।
7- व्रती को चाहिए कि वह तपस्वियों के समान व्यवहार करे। अर्थात कम बोले, किसी की निंदा या विवाद न करे, मन पर संयम रखें आदि !

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दशहरा और शमी

दशहरा और शमी, का सम्बन्ध उत्तर भारत में प्रचलित है:-

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उत्तर भारत में यह विश्वास किया जाता है, की दशहरा के दिन शमी का पौधा घर पर लायें, उसको खाद-पानी देकर उसकी सेवा करें, और हर शनिवार को शाम में तिल तेल का दीपक शमी के पौधे के नीचे जलायें, ऐसा करने से जीवन में कभी धन की कमी नहीं होगी, तथा हर छेत्र में सफलता मिलेगी, दशहरा के दिन माता के मंदिर में लाल कपड़ा या लाल चुनरी भी अर्पित करें, या मंदिर के बाहर बैठे निर्धन को दान करें, तथा मंदिर में प्रकाश दान करें तो जीवन में कभी धन का अभाव नहीं रहेगा। शमी को खेजड़ी, जण्ड या सांगरी नाम से भी जाना जाता है, मूलतः यह रेगिस्तान में पाया जाने वाला वृक्ष है, जो थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों पर भी पाया जाता है। अंग्रेजी में यह प्रोसोपिस सिनेरेरिया नाम से जाना जाता है

विजया-दशमी या दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की प्रथा है। कहा जाता है ये भगवान श्री राम का प्रिय वृक्ष था और लंका पर आक्रमण से पहले उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा कर के उससे विजयी होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था। आज भी कई जगहों पर लोग रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते धन-संपदा के प्रतीक के रूप में एक दूसरे को बाँटते हैं, और उनके कार्यों में सफलता मिलने कि कामना करते हैं। शमी वृक्ष का वर्णन महाभारत काल में भी मिलता है, अपने 12 वर्ष के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने सारे अस्त्र इसी पेड़ पर छुपाये थे जिसमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी था। कुरुक्षेत्र में कौरवों के साथ युद्ध के लिये जाने से पहले भी पांडवों ने शमी के वृक्ष की पूजा की थी, और उससे शक्ति और विजय की कामना की थी, तब से ही ये माना जाने लगा जो भी इस वृक्ष कि पूजा करता है, उसे शक्ति और विजय मिलती है

शमी शमयते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया । तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता

हे शमी, आप पापों का क्षय करने वाली और दुश्मनों को पराजित करने वाली हैं। आप अर्जुन का धनुष धारण करने वाली हैं, और श्री राम को प्रिय हैं, जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा की थी, मैं भी करता हूँ। मेरी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर करके उसे सुखमय बना दीजिये, एक और कथा के अनुसार कवि कालिदास ने शमी के वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या कर के ही ज्ञान कि प्राप्ति की थी, शमी वृक्ष की लकड़ी शनि ग्रह की शांति के लिए किसे जाने वाले यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। शनिवार को शनि शांति के लिए शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है। शनि देव को शान्त रखने के लिये शमी वृक्ष की पूजा की जाती है, शमी को गणेश जी का प्रिय वृक्ष भी माना जाता है, और इसकी पत्तियाँ गणेश जी की पूजा में भी चढ़ाई जाती हैं। बिहार और झारखण्ड समेत आसपास के कई राज्यों में इस वृक्ष की पूजा की जाती है, और इसे लगभग हर घर के दरवाज़े के दाहिनी ओर लगा देखा जा सकता है। किसी भी काम पर जाने से पहले इसके दर्शन को शुभ मना जाता है। आश्विन शुक्ल दशमी को विजय दशमी कहा जाता है, विजय के संदर्भ में दशहरा के दिन शास्त्रों में बताया गया है, की विजय प्राप्ति के लिए शस्त्र (हथियार) की पूजा अवश्य करें

आज के दिन नवीन हथियार खरीद कर घर की दक्षिण दिशा में टांगना चाहिए, साथ ही शमी और अपराजिता वृक्ष की पूजा करें और दोनों की जड़ दाहिने हाँथ में बांधने से समाज में यश और कीर्ति बढती है, क्यों‌ की दशहरा के दिन ही नौ दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा-आराधना करने के बाद भगवान श्री राम ने अभिमानी रावण का वध कर के इस संसार को असत्य पर सत्य की जीत का सन्देश दिया था

शमीपूजन:
निम्न श्लोकोंसे शमी की प्रार्थना की जाती है :-
शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका । धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी ।। करिष्यमाणयात्रायां यथाकाल सुखं मया।तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वंभवश्रीरामपूजिते।।

श्लोक के उच्चारण के साथ ही मानसिक रूप से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि ‘शमी सभी पापों को नष्ट करती है। शमी शत्रुओं का समूल विनाश करती है। शमी के कांटे हत्या इत्यादि के पापों से भी रक्षा करते हैं। अर्जुन के धनुष को धारण करने वाली और भगवान श्रीराम को भी प्रिय लगने वाली शमी मेरा कल्याण करे।

अपराजिता पूजन मंत्र :- हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनक मेखला। अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम।।

पूजा के समय वृक्ष के नीचे चावल, सुपारी हल्दी की गांठ और मुद्रा रखते हैं । फिर वृक्ष की प्रदक्षिणा कर उसके मूल (जड़) के पास की थोड़ी मिट्टी व उस वृक्ष के पत्ते घर लाते हैं । ऐसा जो आज के दिन करता है, यह साल भर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। अपराजिता देवी सकल सिद्धियों की प्रदात्री साक्षात् माता दुर्गा का ही अवतार हैं। यात्रा प्रारंभ करने के समय माता अपराजिता की यह स्तुति अनिवार्य रूप से करनी चाहिए, जिससे यात्रा में कोई विघ्न उपस्थित नहीं होता।

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बगलामुखी साधना

बगलामुखी दश महाविद्याओं में ये एक अतिउग्र महाविद्या है, यह ब्रह्मास्त्रविद्या मानी जाती है, इस साधना के साधक मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन एवं विद्वेषण प्रयोग करने में समर्थ होते हैं, यह तंत्र विद्या प्रचण्ड तूफान की तरह शत्रु का मान-मर्दन करने में पूरी तरह से सक्षम है:-

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भारतीय तंत्र-शास्त्र अपने आप में अद्भुत आश्चर्य जनक एवं रहस्यमय रहा है। ज्यों-ज्यों हम इसके रहस्य की गहराई में जाते हैं। त्यों-त्यों हमें विलक्षण अनुभव होते हैं। कुछ तंत्र-मंत्र तो बलशाली एवं शीघ्र फलदायी हैं, ऐसे ही मंत्रों में एक मंत्र है – बगलामुखी मंत्र यह मंत्र तो प्रचण्ड तूफान से भी टक्कर लेने में समर्थ है, इसी लिए इस मंत्र विद्या (साधना) को ब्रह्मास्त्रविद्या कहा गया है। एक तरफ जहाँ यह मंत्र शीघ्र ही सफलता दायक है, वहीं दूसरी ओर विशेष अनुष्ठान एवं मंत्र जप के द्वारा जो बगलामुखी यंत्र सिद्ध किया जाता है, वह भी तुरन्त कार्य सिद्ध में सहायता प्रदान करता है। बहुत से तांत्रिक तो यह कहते हैं कि पूरे विश्व की ताकत भी इस मंत्र से टक्कर लेने में असमर्थ है। मंत्रमहाणर्व में इसके बारे में लिखा है:-

बृह्मस्त्रं च प्रवक्ष्यामि स्दयः प्रत्यय कारण्।
मस्य स्मरणमात्रेण पवनोडपि स्थिरावते।।

इस मंत्र को सिद्ध करने के बाद मात्र इच्छा शक्ति से ही प्रचण्ड पवन भी स्थिर हो जाती है। व्यक्ति के घर में इस मंत्र से सिद्ध यंत्र हो, या फिर जिस व्यक्ति ने अपनी भुजा पर इस यंत्र को बाँध रखा हो, उस की कभी भी शत्रु हानि नहीं कर सकते। अनेक तांत्रिकों का मत है कि आज के युग में जब पग-पग पर शत्रु हावी होने की चेष्टा करते हैं, और इस प्रकार से चारों तरफ शत्रु नीचा दिखाने का प्रयत्न करते हैैं, तब प्रत्येक उन्नति चाहने वाले व्यक्ति के लिये यह तांत्रिक साधना या यह यंत्र धारण करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य समझा जा सकता है। सारे शत्रु निवारण यंत्रों में बगलामुखी यंत्र सर्वश्रेष्ठ है यह सिद्ध तांत्रिक यंत्र अद्भुत व प्रभावशाली है, तथा किसी भी प्रकार के मुकद्दमें में सफलता देने में सहायक है। यह कह सकते हैं कि यह सिद्ध यंत्र शत्रुओं का मान-मर्दन करने में पूरी तरह से सक्षम है। जो अपने जीवन में बिना किसी शत्रुबाधा के उन्नति चाहता है, प्रगति से सर्वाेच्य शिखर पर पहुँचना चाहता है, उसके लिये बगलामुखी साधना आवश्यक है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस यंत्र का उपयोग जहाँ हिन्दू राजाओं ने अपने शत्रु के मर्दन के लिये किया था, वहीं कुछ विदेशी शासकों ने भी इसका प्रयोग कर अनेक कार्यों में सफलता प्राप्त की। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने भी अपने शत्रुओं को परास्त करने के लिये बगलामुखी साधना कराई और सफलता प्राप्त की हिन्दू शासकों में तो चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, समुंद्रगुप्त ने भी बगलामुखी साधना अपने तांत्रिकों से कराकर शत्रुओं पर विजय एवं सफलता प्राप्त की।

इस साधना से मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन एवं विद्वेषण प्रयोग भली-भाँति सफलता पूर्वक सम्पन्न किये जाते हैं। जहाँ तक मेरा अनुभव है, उस मंत्र की साधना से बांझ स्त्री को भी मनचाही संतान प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है। इसके साथ ही साथ शत्रुओं का मान मर्दन कर अपार विजय प्राप्त की जा सकती है। दरिद्र व्यक्ति को सम्पन्न बनाने के लिये मार्ग प्रशस्त किय जा सकता है, और प्रतिकूल मुकद्दमें में भी पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है। परन्तु भूल करके भी सामान्य व्यक्ति को इस प्रकार की साधना में नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि यह साधना तलवार की धार के समान है। अतः यदि थोड़ी सी भी गलती हो जाये तो साधना करने वाला व्यक्ति ही कष्ट में आ जाता है, मेरे अपने अनुभव से तो यही कहूंगा कि बिना पूरा ज्ञान प्राप्त किये जिन लोगों ने यह साधना को प्रारम्भ किया वे साधना काल में ही पागल होते देखे गये हैं, और बड़ी कठिनाई से उन्हें सामान्य अवस्था में लाया गया। अतः सामान्य पण्डित भी इस प्रकार की साधना करने में हिचकिचाते हैं, जो भी व्यक्ति इस साधना को सम्पन्न करना चाहे, उन्हें चाहिये कि वह योग्य गुरू के निर्देशन में ही कार्य सम्पन्न करें, और यदि यंत्र सिद्धकर यंत्र धारण करना चाहे तो उन्हें चाहिये कि वह बगलामुखी सिद्धि किसे हुए विद्वान की देखरेख में यह साधना सम्पन्न करें। साधना काल में प्रत्येक साधक को दृढ़ता के साथ इनसे सम्बंधित नियमों का पालन करना चाहिये।

साधना काल में ध्यान रखने योग्य बातें:-
1. बगलामुखी साधना में साधक को पूर्ण पवित्रता के साथ मंत्र जप करना चाहिये और उसे पूरी तरह ब्रह्माचर्य व्रत का पालन करना चाहिये।

2. साधक को पीले वस्त्र धारण करना चाहिये, धोती तथा ऊपर ओढ़ने वाली चादर दोनों ही पीले रंग में रंगी हो।

3. साधक एक समय में भोजन करें और भोजन में बेसन से बनी हुई वस्तु का प्रयोग अवश्य करें।

4. साधक को दिन में नींद नहीं लेना चाहिये न व्यर्थ की बातचीत करें, और न किसी स्त्री से किसी प्रकार का सम्पर्क स्थापित करें।

5. साधना काल में साधक बगलामुखी यंत्र बनाकर उसे स्थापित कर उसके मंत्र जाप करें।

6. साधना काल में साधक बाल न कटवायें और न क्षौर कर्म ही करें।

7. यह साधना या मंत्र जाप रात्रि को होता है। अतः यह साधना रात के समय 10 बजे से प्रातः 4 बजे के बीच करें, परन्तु जो साधना सिद्धि कर चुके हैं, वे साधक या ब्राह्मण दिन को भी मंत्र जाप कर सकते हैं।

8. साधना काल में पीली गौ का घी प्रयोग में लें तथा दीपक में जिस रूई का प्रयोग करें उसे पहले पीले रंग में रंग कर सुखा लें और उसके बाद ही उस रूई को दीपक के लिये प्रयोग करें।

9. साधना में 36 अक्षर वाला मंत्र प्रयोग करना ही उचित है और यही मंत्र शीघ्र सफलता देने में सहायक है।

10. साधना घर के एकांत कमरे में देवी मंदिर में, पर्वत शिखर पर शिवालय में या गुरू के समीप बैठकर की जानी चाहिये।

11. इसके मारण, मोहन वंशीकरण, उच्चाटन कई प्रयोग हैं। अतः गुरू से आज्ञा प्राप्त कर उसके बताये हुये रास्ते से ही साधना करना चाहिये।

13. मोक्ष प्राप्ति के लिये क्रोध का स्तम्भन आवश्यक है, और यह इस प्रयोग से संभव है। अतः मोक्ष प्राप्ति के लिये भी इसका प्रयोग साधक और वैष्णव लोग करते हैं।

14. साधना में कुलाचार का पूजन, वीर साधना, चक्रानुष्ठान अवश्य ही करना चाहिये जिससे कि कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हो सकें। महान शत्रुओं पर विजय आसुरी तत्वों पर विजय, शत्रुभय निवारण और शत्रु संहारक तथा राजकीय महाभय, कोर्ट केस और बंधन से मुक्ति के लिये यह अमोघ और शत्रुदमन ब्रह्मास्त्रविद्या कवच है।

इस मंत्र से सिद्ध साधक को बगलामुखी महायंत्र को सोने पर उत्कीर्ण करवा कर या भोजपत्र के ऊपर केशर, अष्टगंध से लिखकर प्रतिष्ठा पुरश्चरण विधान करके प्राण-प्रतिष्ठा पूर्वक सोने के कवच में बंद कर देना चाहिए, बाद में ब्रह्मास्त्र बगलामुखी सवालक्ष मंत्र से सिद्ध करके धारण करने से शत्रु का दमन होता है। राजकीय केस में भी सफलता मिलती है। इस ब्रह्मास्त्र प्रयोग से सर्वकार्य में विजय, यश प्राप्त होता है। तथा मारण-मोहन, वशीकरण, स्तंभन, उच्चाटन, मूठ-चोट आदि तमाम शत्रु द्वारा उत्पन्न संकट दूर होते हैं। भूत-प्रेतादि महाभय नष्ट होते हैं, तथा सर्व प्रकार से सर्व दिशाओं से विजय प्राप्त होती है। ऐसा अमोघ ब्रह्मास्त्रविद्या कवच जो जगत में सर्वोपरि है, उससे ऊँचा कोई यंत्र, मंत्र या तंत्र जगत में नहीं है।

श्री ब्रह्मास्त्र महाविद्या मंत्र – तंत्र शास्त्र में दशमहाविद्या की महिमा अतिविशिष्ठ है। उसमें सर्वोपरि बगला उपासना जो सर्वसिद्ध है। परन्तु वह गुरूगम्य होने से योग्य गुरू के पास मंत्र दीक्षा ग्रहण करने के बाद उपासना करने से सिद्धि प्राप्त होती है। पुरश्चरण सिद्धि करने से या योग्य विद्वान के पास करवाने से सिद्ध होता है। क्योंकि क्रिया शुद्धि के बिना मंत्र सिद्धि नहीं होती है।

पुरश्चरण:-

पीताम्बरधरो भूत्वा पूर्वाशाभिमुखः स्थितः। लक्षमेकं जपेन्मत्रं हरिद्रा ग्रन्थि मालया।।
ब्रह्मचर्य स्तो नित्यं प्रयतो ध्यान तत्परः। पियंगुकुसमे नापि पीतयपुष्येन होमयेत्।।

बगलामुखी पुरश्चरण के लिये एकान्त जगह, जमीन गाय के गोबर से लीपी हुई, पीला आसन, पीला पीताम्बर, पीली हल्दी की माला, पीला पात्र, सुवर्ण प्रतिमा यंत्र तथा पीले फूल, केसर, हल्दी, अष्टगंध से अर्चन फिर अंगन्यास, करन्यास आदि करके आह्वान ध्यान फिर सवालक्ष मंत्र अनुष्ठान, दशांश पीत पुष्प से हवन, तर्पण, मार्जन, ब्रह्मभोजन, कुमारी पूजन, भोजन से अनुष्ठान सिद्ध होता है।

श्री बगलामुखी मंत्र –
ॐ हृीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदंस्तम्भ्यजिह्वां। कीलय बुद्धिं विनाशाय हृीं ऊँ स्वाहा।।

यह महामंत्र मूल मंत्र है जिसका पुरश्चरण करने से पहले निम्न मंत्रों से पूजा करनी चाहिये।

बगलामुखी गायत्री मंत्र –
ॐ बगलामुख्यैच विद्नहे स्तम्भिन्यै च धीमहि तन्नौदेवी प्रचोदयात्।।

बगलामुखी देवी यंत्र मूर्ति, न्यास, प्राण प्रतिष्ठा, महापूजन करके निम्न मंत्र से ध्यान करके पुरश्चरण करना चाहिये।

विनियोग:-
ॐ अस्य श्री बगलामुखी मन्त्रस्य नारद ऋषिः त्रिष्टुप छन्दः बगलामुखी देवता हृीं बीजम स्वाहा शक्तिः ममाअभीष्ट सिध्यर्थेजपे विनियोगः।

ध्यानम:-
मध्ये सुधाब्धिमणि मण्डय रतन्वेधां। सिंहा सनोपरि गतां पर पीतवर्णाम।।
पीताम्बरा भरण-मालय- विभूषितांगी। देवी स्मरामि धृत-मुदगर वैरि जिह्वाम।।
जिह्यग्र मादाय करेण देवी वामेन शत्रुन परिपीडयन्तीम्। गदाभिधातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढयां द्विभुजां नमामि।।

उपरोक्त ध्यानादि के बाद पूर्व दिशा में मुख रखकर सरसों तेल का दीपक जलाकर कलश स्नापनादि करके एक ही आसन पर नियमित रूप से हर रोज 41 माला 31 दिन तक करें। और सवालक्ष पूर्ण करके दशांश क्रम से महापुरश्चरण सिद्ध होता है, तथा बगलामुखी कवच ब्रह्मस्त्र गले में या भुजा में धारण करने से त्रैलोक्य विजयी भवेत् हर जगह से विजय प्राप्त होती है।

बगला साधना से किस-किस प्रकार की समस्या का समाधान संभव है :-
बगलामुखी उपासना से मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, अनिष्ट ग्रहों के आवरणों से मुक्ति, मन इच्छित व्यक्ति का मिलन, शत्रु पर विजय, कोर्ट केस में विजय, बंधन, जेल से मुक्ति होती है, तथा शत्रु के अलावा पर बुद्धि, देव, दानव, सर्प और हिंसक प्राणियों पर भी स्तंभन होता है।

देवी के प्रमुख मंदिर:- बगलामुखी का मन्दिर दतिया गोहाटी आसाम में है। गोहाटी जयपुर से डायरेक्ट वायुयान द्वारा जाया जा सकता है।

बगलामुखी साधना में प्रयोग होने वाली सामग्री :-
आकर्षण:- शहद, घी, मिश्री के साथ नमक का हवन करने से सभी का आकर्षण होता है।

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कुबेर साधना

इस वर्ष दीपावली पर्व व धन त्रयोदशी के पर्व पर आप भी करें – धन कुबेर साधना।

Dr.R.B.Dhawan (Top best astrologer in delhi)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवलोक के धनाध्यक्ष कुबेर हैं। कुबेर न केवल देवताओं के धनाध्यक्ष हैं, बल्कि समस्त यक्षों, गुह्यकों, किन्नरों और मानवों के अधिपति भी कहे गये हैं। ये नवनिधियों में पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और वर्चस् के स्वामी भी हैं। जब एक निधि भी अनन्त वैभवों को देने वाली मानी गयी है, और धनाध्यक्ष कुबेर तो गुप्त या प्रकट समस्त संसार के वैभवों के अधिष्ठाता देव हैं। यह देव उत्तर दिशा के अधिपति हैं, इसी लिये प्रायः सभी यज्ञ, पूजा उत्सवों तथा दस दिक्पालों के पूजन में उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में कुबेर का पूजन किया जाता है।

धनकुबेर और धन त्रयोदशी :- धन त्रयोदशी तथा दीपावली के दिन कुबेर की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। देवताओं के धनाध्यक्ष महाराज कुबेर राजाओं के भी अधिपति हैं, क्योकि सभी निधियों, धनों के स्वामी यही देव हैं, अतः सभी प्रकार की निधियों या सुख, वैभव तथा वर्चस्व की कामना पूर्ति, फल की वृष्टि करने में वैश्रवण कुबेर समर्थ हैं। सारांश में कहा जा सकता है कि धनाध्यक्ष कुबेर की साधना ध्यान करने से मनुष्य का दुःख-दारिद्रय दूर होता है और अनन्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में गहरा विश्वास रखने वालों का अटल विश्वास है कि शिव के अभिन्न मित्र होने से कुबेर अपने भक्त की सभी विपत्तियों से रक्षा करते हैं, और उनकी कृपा से साधक में आध्यात्मिक ज्ञान, वैराग्य आदि के साथ-साथ उदारता, सौम्यता, शांति तथा तृप्ति आदि सात्त्विक गुण भी स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाते हैं।

राजाधिराज कुबेर की साधना-
इस वर्ष धन त्रयोदशी विशेष योगों के साथ उदित हो रही है। आगामी पंक्तियों में एक अत्यन्त गोपनीय और दुर्लभ प्रयोग दिया जा रहा है जिसे धन त्रयोदशी के दिन रात्रि में ही सम्पन्न किया जाना है। इस ‘धन कुबेर साधना’ को जिस-जिस ने भी सम्पन्न किया है, उन सभी को अनायास धन प्राप्त हुआ है। यही नहीं अपितु इसके फलस्वरूप रोग, कर्ज़ व मुकद्दमें की परेशानी, विवाह बाधा, भवन का आभाव, पारिवारिक झंझट, ग्रह बाधा और आर्थिक आभाव भी दूर हुए हैं, और आज वे सभी साधक समाज में सम्माननीय तथा सम्पन्न जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस साधना को सम्पन्न करने वाले प्रत्येक साधक का यह अनुभव है, कि इस साधना को सम्पन्न करने से आर्थिक बाधा तो रहती ही नहीं, और घर की गरीबी पूर्ण रूप से लुप्त हो जाती है। इस साधना को सम्पन्न करने से धन, वैभव, सुख तथा भाग्योदय का योग शीघ्र प्राप्त होने लगता है। ‘आप का भविष्य’ के पाठकों के लिए और विशेष कर साधकों के लिए यह गोपनीय साधना प्रयोग आगे की पक्तियों में दिया जा रहा है, मेरा पूर्ण विश्वास है कि इस साधना को सम्पन्न कर निश्चय ही आप साधक मेरे कथन से सहमत होगें।

महाराज वैश्रवण कुबेर की उपासना से संबंधित मंत्र, यंत्र, ध्यान एवं उपासना आदि की सारी प्रक्रियायें श्रीविद्यार्णव, मंत्रमहार्णव, मंत्रमहोदधि, श्रीतत्त्वनिधि तथा विष्णुधर्मोत्तरादि पुराणों में विस्तार से निर्दिष्ट हैं। तदनुसार इनके अष्टाक्षर, षोडशाक्षर तथा पंचत्रिंशदक्षरात्मक छोटे-बड़े अनेक मंत्र प्राप्त होते हैं। मंत्रों के अलग-अलग ध्यान भी निर्दिष्ट हैं। मंत्र साधना में गहन रूची रखने वाले साधक उपरोक्त ग्रन्थों का अवलोकन करें। यहाँ पाठकों के लिये धनाध्यक्ष कुबेर की एक सहज व सरल साधना पद्धति दी जा रही है। यह साधना धनत्रयोदशी के दिन की जानी चाहिये यदि कोई साधक इस साधना को दीपावली की रात्रि में करना चाहे तो उस महापर्व पर भी यह साधना कर सकते हैं। अथवा दोनो ही दिन (धनत्रयोदशी तथा दीपावली) यह साधना सम्पन्न की जा सकती है। इस वर्ष धनत्रयोदशी 5 नवम्बर 2018 तथा दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है। यह साधना स्थिर लग्न में ही सम्पन्न की जाती है। क्योंकि स्थिर लग्न में जिस कार्य को किया जाता है वह स्थिरता को प्राप्त होता है, और लक्ष्मी को तो सभी स्थिर ही रखना चाहते हैं। अतः यह साधना तो अवश्य स्थिर लग्न में ही करनी चाहिये। ‘स्थिर लग्न’ इन दिनों में वृष तथा सिंह लग्न ही पढ रही हैं। वृषभ लग्न 5 नवम्बर 2018 धनत्रयोदशी के दिन सांयकाल 18 बजकर 05 मिनट से रात्रि 20 बजकर 00 मिनट तक रहेगी। तथा सिंह लग्न मध्य रात्रि में ठीक 24 बजकर 35 मिनट से 02 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। इसी प्रकार दीपावली 7 नवम्बर 2018 के दिन वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। तथा सिंह लग्न 7 नवम्बर की मध्य रात्रि को 00 बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। इस साधना के लिये यह स्थिर लग्न का मुहूर्त सर्वोत्तम महूर्त माना गया है। इस दिन स्थिर लग्न में शुद्ध रजत (चांदी) पर निर्मित कुबेर यंत्र तथा जप के लिये कमलबीज की 108 दाने की माला का प्रयोग किया जाना चाहिये। इसमें भी कुबेर यंत्र विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठित होना आवश्यक है, तथा माला नई व शुद्ध होनी चाहिये।

साधना पद्धति:- धनत्रयोदशी की रात्रि में उत्तर दिशा की ओर मुख करके पुरूष साधक पीले वस्त्र तथा महिलायें पीली साड़ी पहनकर बैठें सामने एक लकड़ी के पटरे पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर प्राण प्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र स्थापित करें और साथ ही शुद्ध घी का दीपक जलाकर पंचोपचार पूजा करें मिठाई का भोग लगावें तथा विनियोगादि क्रिया करके 11 माला कमलबीज की माला से कुबेर मंत्र का जप करें। जप सम्पूर्ण होने पर प्रसादरूप में मिठाई का परिजनों को वितरण करें और फिर रात्रि में उसी पूजा स्थल में ही निद्रा विश्राम करें। प्रातः शेष फूलादि सामग्री जल में विसर्जित कर दें तथा शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण श्री कुबेर यंत्र को पीले आसन सहित अपनी तिजोरी कैश बाॅक्स या अलमारी अथवा संदूक में रख दें। तथा कमलबीज की जप माला को गले में धारण करें।

विनियोग:-
सर्वप्रथम हाथ में जल लेकर निम्नलिखित विनियोग करें-
अस्य श्रीकुबेरमंत्रस्य विश्रवा ऋषिः बृहती छन्दः धनेश्वरः कुबेरो देवता ममाभीष्टसिद्धयथे जपे विनियोगः।

करन्यासः-
विनियोग के उपरांत करन्यास करें-
यक्षाय अंगुष्ठाभ्यां नमः।
कुबेराय तर्जनीभ्यां नमः।
वैश्रवणाय मध्यमाभ्यां नमः।
धनधान्याधिपतये अनामिकाभ्यां नमः।
धनधान्य समृद्धिं में कनिष्ठकाभ्यां नमः।
देहि दापय स्वाहा करतल करपृष्ठाभ्यां नमः।

षडंगन्यासः-
करन्यास के उपरांत षडंगन्यास करें-
यक्षाय हृदयाय नमः।
कुबेराय शिरसे स्वाहा।
वैश्रवणाय शिखायै वषट्।
धनधान्याधिपतये कवचाय हुम्।
धनधान्य समृद्धि में नेत्रत्रयाय वौषट्।
देहि दापय स्वाहा अस्त्राय फट्।

कुबेर का ध्यानः-
इनके मुख्य ध्यान श्लोक में इन्हें मनुष्यों के द्वारा पालकी पर अथवा श्रेष्ठ पुष्पक विमान पर विराजित दिखाया गया है। इनका वर्ण गारुडमणि या गरुडरत्न के समान दीप्तिमान् पीतवर्णयुक्त बतलाया गया है, और समस्त निधियां इनके साथ मूर्तिमान् होकर इनके पार्श्रवभाग में निर्दिष्ट हैं। ये किरीट मुकुटादि आभूषणों से विभूषित हैं। इनके एक हाथ में श्रेष्ठ गदा तथा दूसरे हाथ में धन प्रदान करने की वरमुद्रा सुशोभित है। ये उन्नत उदरयुक्त स्थूल शरीर वाले हैं। ऐसे भगवान् शिव के परम सुहृद् भगवान् कुबेर का ध्यान करना चाहिए-

मनुजवाह्यविमानवरस्थितं गरुडरत्ननिभं निधिनायकम्।
शिवसखं कमुकुरादिविभूषितं वरगदे दधतं भज तुन्दिलम्।।

सम्पन्नता के लिये कुबेर मंत्र-
यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय स्वाहा।

वैसे तो इस मंत्र की जप संख्या एक लक्ष (एक लाख) कही गयी है। परंतु धनत्रयोदशी अथवा दीपावली की रात्रि में जितना हो सके विधि-विधान से इस मंत्र का जप करना ही पर्याप्त होता है। मंत्र का जप सम्पन्न होने पर तिल एवं शुद्ध घी से दशांश हवन करना चाहिये। यह साधना कार्तिक कृष्ण 13 अर्थात् धन त्रयोदशी पर की जाती है, पूरे भारतवर्ष के लोग धन त्रयोदशी के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ महालक्ष्मी तथा आरोग्य प्रदान करने वाले देव धनवंतरि की पूजा-आराधना एवं साधना करते हैं, और सुख संपदा के अभिलाषी तो इस दिन कुछ विशेष प्रयोग सम्पन्न करते हैं जिससे कि अगले पूरे वर्ष तक घर के सभी सदस्य प्रसन्न व निरोगी रहें, और उनके घर में श्रीलक्ष्मी का निवास और प्रसन्नता बनी रहे।

साधना कब सम्पन्न करें?-
इस साधना या प्रयोग को केवल धन त्रयोदशी की रात्रि में ही सम्पन्न किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त किसी भी मुहूर्त में नहीं सम्पन्न किया जा सकता है। यह केवल एक रात्रि की साधना है और इस साधना को सम्पन्न करने से साधक का धनाभाव दूर होकर सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।

अनुष्ठान विधि-
सबसे पहले साधक पूजा स्थान में पीला रेशमी आसन बिछा कर उत्तर दिशा की ओर मुख कर के बैठ जाये और पूजा तथा साधना सामग्री की व्यवस्था पहले से ही कर लें। पूजा सामग्री में- 1. जल के लिये ताम्र पात्र, 2. गंगाजल या गुलाब जल, 3. दीपक के लिये शुद्ध घी, 4. प्रसाद के लिये 100 ग्रा. बताशे, 5. सफेद गुलाब के 4-5 पुष्प तथा पीले पुष्पों की दो माला, 6. नैवेद्य (मिठाई), 7. गूगल का धूप या अगरबत्ती, 8. दीपक, 9. पानी वाला नारियल, 10. पाँच प्रकार के फल, 11. रोली, 12. कलावा, 13. ग्यारह साबुत सुपारी तथा 14. पांच पान के साबुत डन्डी वाले पत्ते। साधक को यह पूजन सामग्री पूजा स्थान में एक थाल में स्वास्तिक बनाकर रख लेनी चाहिये। साथ ही साधना हेतु प्रमुख रूप से श्री शुद्ध चांदी पर बना और प्राणप्रतिष्ठित ‘कुबेर यंत्र’ तथा शुद्ध अष्टगन्ध को भी किसी प्रतिष्ठित संस्थान से मंगवाकर पहले ही रख लेना चाहिए। इसके अलावा साधक को चाहिये, धनत्रयोदशी वाले दिन सात्विक आचार विहार करें, ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करें, दिन में एक-दो बार फलाहार या दुग्धाहार करें तथा रात्रि में साधना के उपरांत भूमि शयन करें। इसके अतिरिक्त इस बात का पूरा ध्यान रखें कि इस प्रयोग या अनुष्ठान की किसी से चर्चा न की जाये अर्थात् इसे गोपनीय ही रखें।

श्री कुबेर यंत्र की विशेषता –
इस यंत्र को भली प्रकार से अष्टगंध के द्वारा आलेपित करके इस के बाद इस यंत्र के ऊपर एक सुपारी स्थापित कर दें, यह यंत्र रजत-पत्र (चांदी) पर अंकित होता है यह विशेष रूप से ध्यान में रखें, और फिर इस यंत्र को प्राण प्रतिष्ठित अवश्य किया गया हो। तभी इस का चमत्कारी प्रभाव देखने में आता है। सही विधि-विधान से सिद्ध किया गया श्री कुबेर यंत्र दुर्लभ होता है। और सिद्ध होने के बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए यह यंत्र एक ‘सौभाग्यशाली धरोहर’ बना रहता है। इस यंत्र को सिद्ध करने के उपरांत साधक को इसे शुद्ध पीले रेशमी कपडे में लपेटकर ऊपर कलावा बांधकर अपनी तिजोरी अथवा कैश बाॅक्स मे रखना चाहियेे। कभी भी इस का प्रदर्शन किसी के सामने न करें। प्रदर्शन करने से इसकी शक्ति क्षीण होती है। यदि ठीक प्रकार से सिद्ध करके रखा रहेगा तभी यह अपने आप में पूर्ण भाग्योदय कारक, धनप्रदायक तथा सौभाग्यशाली प्रभाव प्रकट करेगा। शास्त्रों में वर्णित इस प्रकार के यंत्र को आप किसी सिद्ध पुरूष से भी प्राप्त कर सकते हैं। आप यदि चाहते हैं तो समय रहते गुरूजी से भी सिद्ध करके मंगवा सकते हैं, इसके लिए shukracharya कार्यालय में पहले से अपना आर्डर बुक करवा सकते हैं।

प्रयोग विधि-
इस वर्ष 2018 में धन त्रयोदशी 5 अक्तूबर 2018 सोमवार के दिन है। सोमवार की रात्रि में साधक स्नान कर पीली धोती पहन कर रात्रि सूर्यास्त से 2 घन्टे पश्चात् उत्तर दिशा की ओर मुख करके शुद्ध रेशमी आसन पर बैठ जायें और सामने एक कुबेर देवता का चित्र तथा एक श्री कुबेर यंत्र जो कि शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण किया गया हो, तथा धन कुबेर के मंत्र से अभिमंत्रित किया गया हो सामने लकड़ी के एक बाजोट पर स्थापित कर लें। स्थापित करने से पहले उस बजोट पर पीला रेशमी कपड़ा अवश्य बिछा दें। इसके ऊपर एक थाली रखें जो कि स्टील की न हो, चांदी की या पीतल की हो, उस थाली के बीचो-बीच रोली से स्वास्तिक बनाकर स्वास्तिक के बीचो-बीच थोड़े चावल रखें उनके उपर एक साबुत सुपारी जिस पर पहले कलावा लपेट लें। फिर इस थाली के एक भाग में अष्टगन्ध, अनार की लकड़ी से बनी कलम रखें। अनार की लकड़ी का प्रबन्ध पहले से ही करके रखना चाहिये। इसके बाद फूल, अक्षत्, कलावा, रोली, पान के पत्ते साबुत सुपारी, तथा थोड़ी मिठाई भी रखें। कुबेर देवता के चित्र तथा यंत्र को पुष्प अर्पित करें, पुष्प माला पहिनायें सामने एक छोटी स्टील की प्लेट में धूप तथा दीपक लगायें, स्वयं तथा परिवार के सदस्यों को कलावा बांध कर रोली से चावल लगाकर तिलक करें। इस के बाद अष्टगंध को गुलाबजल या फिर गंगाजल से गीला कर लें और धन कुबेर के यंत्र पर अनार की कलम की सहायता से लेप कर दें। और फिर थाली में रखकर इस पर नारियल अर्पित करें, तथा मिठाई से भोग लगायें। इस प्रकार का प्रत्येक कार्य करते समय साधक ॐ यक्षराज कुबेराय नमः। मंत्र का उच्चारण करते रहें, सम्पूर्ण पूजन इसी मंत्र के उच्चारण से किया जाता है। इसके बाद 7 मुखी रूद्राक्ष की माला (जिसे लक्ष्मी माला कहा गया है) जो की 108 दाने वाली नई माला होनी चाहिये इस रूद्राक्ष माला से इस कुबेर देवता के मंत्र- ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय स्वाहा। मंत्र की 11 माला जप करें, जप पूर्ण होने पर कुबेर देवता के चित्र तथा श्री कुबेर यंत्र को प्रणाम करें तथा यंत्र व चित्र की सात प्रदक्षिणा करें, और फिर श्री कुबेर यंत्र तथा यक्षराज कुबेर के चित्र को अपने दोनों हाथों में लेकर सम्मान के साथ (आसन के साथ) तिजोरी या कैशबाॅक्स में स्थान दे दें। अनेक साधकों का अनुभव है कि इस साधना का लाभ कुछ ही दिनों में प्रभावशाली ढंग से प्रकट होने लग गया। कुछ साधकों के द्वारा यह भी अनुभव किया गया है कि दूसरे ही दिन से साधक को आर्थिक-व्यापारिक दृष्टि से चमत्कारिक लाभ अनुभव होने लगे। प्रयोग सम्पन्न करने के इच्छुक साधकों से अनुरोध है कि यह साधना पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से सम्पन्न करें।

विशेष- इस साधना के लिये साधना सामग्री की व्यवस्था समय से पूर्व ही कर लें। यह सामग्री shukracharya संस्थान में उपलब्ध है। इसमें 1. श्री कुबेर यंत्र जो कि ‘शुद्ध चांदी’ पर उत्कीर्ण तथा धन कुबेर के मंत्र से अभिमंत्रित किया गया होगा, 2. अष्टगन्ध, 3. कुबेर देवता का चित्र, 4. सप्त मुखी रूद्राक्ष की 108 दाने की माला, तथा 5. अनार की लकड़ी से बनी कलम होगी। इस सारी सामग्री के लिये न्यौछावर राशि केवल 5100/-रू है। आप का भविष्य के पाठकों के लिये गुरूजी ने विशेष रूप से यह सामग्री प्राणप्रतिष्ठा की है, राशि आपको अग्रिम भेजनी होगी। यह राशि आप कम से कम एक माह पूर्व भेज दें, जिससे की समय पर यह सामग्री आपको प्राप्त हो सके और आप निश्चिंत हो सकें। इसके लिए आप shukracharya कार्यालय में फोन द्वारा अपना आर्डर 15-20 दिन पहले ही बुक करवा लें।

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श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष साधना

श्री महालक्ष्मी कल्पवृक्ष दीपावली सिद्धि प्रयोग :-

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वैसे तो श्रीमहालक्ष्मीजी की साधना अनेक अवसरों पर की जाती है, परंतु दीपावली पर्व श्रीमहालक्ष्मीजी की विशेष कृपा प्राप्ति का ऐसा पर्व है, जिस पर्व को साधक वर्ग तथा तंत्र के ज्ञाता महासिद्धिपर्व के नाम से पुकारते हैं, कारण यह है, कि प्रत्येक वर्ष में साधारण पर्व तो कम-से-कम 8 (1. चैत्र नवरात्र। 2. दो गुप्त नवरात्र। 3. शारदीय नवरात्र। यह चार नवरात्र पर्व हैं, तथा 4. होली। 5. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी। 6. महाशिवरात्रि। और 7. कम से कम दो ग्रहणकाल।) यह सभी 8 सिद्धिपर्व हर वर्ष साधकों के लिये उपलब्ध होते हैं। परंतु इसके अतिरिक्त महासिद्धिपर्व केवल एक ही उपलब्ध रहता है, और वह है- श्रीमहालक्ष्मीपर्व महासिद्धिपर्व ‘दीपावली पर्व’ जो सभी साधकवर्ग को प्रिय होता है, तथा इस विशेष अवसर की प्रतीक्षा हर एक को रहती है। चाहे वे तांत्रिक हो या साधक अथवा साधारण गृहस्थ ही हो। यहाँ आगे की पंक्तियों में इसी महासिद्धिपर्व (दीपावली) पर की जाने वाली एक विशेष साधना का उल्लेख किया जा रहा है, जिसे कोई भी साधक या गृहस्थ चाहे वे स्त्री हो या पुरूष सिद्ध कर सकता है, आवश्यकता है तो केवल दृढ़ इच्छाशक्ति की।

प्रस्तुत साधना “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” सिद्धि ऐसी महत्वपूर्ण साधना है, जिसमें कमलधारणी महालक्ष्मी के एक ऐसे यंत्र को सिद्ध किया जाता है, जिसमें एक ओर लक्ष्मी जी का यंत्र तथा दूसरी ओर श्रीलक्ष्मी का चित्र उत्कीर्ण हुआ हो, तथा वह यंत्र ऐसे आकार में बनाया गया हो, जो कि गले में धारण किया जा सके इसके लिए एक चांदी के ऐसे लाकेट को सिद्धि किया जाता है, जिसके एक ओर लक्ष्मी जी का यंत्र तथा दूसरी ओर श्री लक्ष्मी का चित्र उत्कीर्ण हुआ हो, यह साधना केवल दीपावली पर्व की मध्यरात्रि में ही सम्पन्न की जाती है। कमल धारिणी महालक्ष्मी की यह चांदी पर उत्कीर्ण लॉकेट “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” कहलाती है। इस सिद्ध लघु प्रतिमा को सिद्ध करने के उपरांत साधक या साधिका इसे गले में धारण कर सकते हैं। अर्थात सिद्ध श्री महालक्ष्मी कल्पवृक्ष हमेशा अपने ही निकट प्रकाशित होता रहता है। इस साधना को सम्पन्न करने वाले साधक या गृहस्थ को कभी भी किसी भौतिक वस्तु की कमी नही रहती। जब भी आवश्यकता हो मां लक्ष्मी के चरणों में बैठकर सच्चे मन से उसे याद करें श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष की तरह साधक की हर मुराद पूर्ण करती हैं, यदि साधक ने यह साधना सिद्ध कर ली है, और उसके पास अपना भवन नहीं, या वाहन नहीं या फिर विवाह अथवा संतान बाधा है, तो कल्पवृक्ष की तरह साधक सिद्ध श्रीमहालक्षमी कल्पवृक्ष प्रतिमा के समक्ष अपनी कामना रखे, वास्तव में ही वह कामना चाहे विवाह की हो या संतान के लिये अथवा भवन, वाहन के लिये हो अवश्य साधक इनका स्वामी होता है। इसी लिये तो इस साधना को तंत्र क्षेत्र के विद्वानों ने अति गोपनीय साधनाओं की श्रेणी में रखा है। साधना के उपरांत अपने गले में यह सिद्ध कल्पवृक्ष रखने मात्र से ही साधक को धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह साधना अन्धकार में प्रकाश की तरह है, जो साधक इस अद्वितीय साधना को दीपावली की रात्रि में सिद्ध करता है, (अपने घर या व्यापार स्थान में अथवा दोनो ही स्थानों में साधना द्वारा “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष”) धारण करता है, वह वास्तव में ही सौभाग्यशाली माना जाता है, वास्तव में ही उसके घर तथा व्यापार स्थल में समृद्धि के देव निवास करते हैं, वास्तव में ही उसके घर में कल्पवृक्ष स्थापित रहता है। और जब तक वह “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” गले में धारण किये रहता है, तब तक उस के घर में महालक्ष्मी का निवास सदा बना रहता है। देखा गया है कि इस साधना की सिद्धि करने वाले साधक के घर में जब से “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” स्थापित हुआ, कुछ ही दिनों में उसका कर्ज उतर गया, आर्थिक तंगी के कारण होने वाले घर के लड़ाई-झगड़े समाप्त हो गये, व्यापार में वृद्धि होने लगी, आर्थिक उन्नति और राज्य में सम्मान प्राप्ति होने लगी है, और उसके जन्म-जन्म के दुःख और दर्द समाप्त होने लगे हैं। वास्तव में ही इस सिद्धि की जितनी प्रशंसा उपनिषदों में की है, और आगे के ऋषियों ने भी इस साधना की विशेषताएं बतलाई हैं, वे अपने आप में अन्यतम हैं। इस सिद्धि से प्राप्त ऊर्जा के प्रभाव से श्रीमहालक्ष्मी का असीम भण्डार प्राप्त कर जीवन की पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। इस सकारात्मक ऊर्जा में तांत्रिक और मांत्रिक दोनों शक्तियों का पूर्ण समावेश है, यह सिद्धि अपने आप में अद्वितीय है।

साधना प्रयोग-
यद्यपि शास्त्रों में बताया गया है, कि ऐसी महासाधना हर मनुष्य को सिद्ध करना आवश्यक है, क्योंकि यदि साधक को सदा एक जैसी ऊर्जा बनाये रखनी है, तो जीवन में एक बार इस श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष साधना को अवश्य सिद्ध करना चाहिए, जिस की सकारात्मक ऊर्जा वर्षो तक साधक के शरीर में प्रभावशाली बनी रहती है।

इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन अमावस्या तिथि दिल्ली की गणना अनुसार लगभग 20:32 तक रहेगी। महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। इन दोनो महूर्त में स्वाती नक्षत्र 19 बजकर 37 मिनट तक, इसके पश्चात विशाखा नक्षत्र पढेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन दोनो लग्नों का यह समय दिल्ली प्रदेश के लिये है। शेष भारत अथवा विदेशों में रहने वाले पाठक अपने देश या प्रदेश के लिये उपरोक्त स्थिर लग्नों का समय shukracharya कार्यालय से फोन द्वारा पता कर सकते हैं। इन्हीं दो स्थिर लग्न में से किसी लग्न में जब अनुकूल चौघड़िया भी हो तब महालक्ष्मी पूजन किया जा सकता है।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़िया मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग। 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चौघड़िया
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चौघड़िया पूजन के समय होनी चाहियें। इस प्रकार शुद्ध ज्योतिषीय गणनाओं तथा विशेष दृष्टिकोंण से यह स्पष्ट होता है, कि साधना व पूजन के लिये 7 नवम्बर 2018 की रात्रि 19:00 से 19:52 वृषभ लग्न के साथ साथ शुभ का चौघडिया भी अत्यन्त विशेष फलदायक तथा सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त हैं। अतः सभी गृहस्थ तथा साधक-साधिकाओं से मेरा यही आग्रह है की वे इस वर्ष इसी मुहूर्त में दीपावली पूजन अथवा तंत्र-मंत्र सम्बंधी साधनायें सम्पन्न करें।

विनियोग- अस्य श्री महालक्ष्मी हृदयमाला मंत्रस्य भार्गव ऋषिः आद्यादि श्री महालक्ष्मी देवता, अनुष्टुपादिनाना छन्दांसि, श्री बीजम् हृीं शक्तिः, ऐं कीलकम् श्री महालक्ष्मी प्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

इसके बाद साधक हाथ में जल ले कर संकल्प करें कि मैं अमुक गौत्र अमुक पिता का पुत्र, अमुक नाम का साधक दीपावली के पर्व पर भगवती लक्ष्मी को नवनिधियों के साथ अपने घर में स्थापित करने के लिये यह प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूँ। ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल भूमि पर छोड़ दें, और फिर “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” (चांदी पर उत्कीर्ण लॉकेट) के सामने शुद्ध घृत के पांच दीपक लगावें (यह दीपक पूरी रात्रि जलते रहें इतना घी इनमें डाल देना चाहिये।) सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करें, और दूध के बने हुये प्रसाद का नैवेद्य समर्पित करें, इसके बाद हाथ जोड़ कर ध्यान करें।

ध्यान- हस्तद्वयेन कमले धारयन्तीं स्वलीलया। हारनूपुरसंयुक्तां लक्ष्मीं देवी विचिन्तये।।

इसके बाद साधक स्फटिक की सिद्धलक्ष्मी माला से निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप करें, इसमें सिद्धलक्ष्मी माला का ही प्रयोग होता है, यह विशेष ध्यान रखें।

महामंत्र- ॐ श्रीं हृीं ऐं महालक्ष्म्यै कमल धारिण्यै पुष्पसिंहासन्यै स्वाहा।

इसके बाद साधक लक्ष्मीजी की आरती करें और “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” को अपने पूजास्थान तथा सिद्धलक्ष्मी माला को पीले वस्त्र में लपेटकर अपनी तिजोरी में रख दें या पूजा स्थान में रहने दें, प्रसाद को घर के सभी सदस्यों में वितरित कर दें, इस प्रकार यह साधना सम्पन्न होती है जो कि इस वर्ष की श्रेष्ठतम और अद्वितीय साधना कही जा सकती है।

साधना सामग्री :- स्फटिक की सिद्धलक्ष्मी माला, तथा “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” (चांदी पर उत्कीर्ण लॉकेट)। इस साधना सामग्री के लिए न्यौक्षावर राशि 3600/-रू मात्र है। जो कि विशेष मुहर्त में निर्मित करवाकर श्रीमहालक्ष्मी के सिद्ध मंत्रों से प्राणप्रतिष्ठित है, साधना सामग्री का पैकिट आप भी कार्यालय से मंगवा सकते हैं। इस पैकिट को जितना जल्दी हो सके मंगवा लें। दीपावली से कम से कम 20-25 दिन पहले तो अवश्य ही कार्यालय से सम्पर्क करके यह साधना सामग्री मंगवा लेना उचित होगा। क्योंकि पार्सल डाक द्वारा भेजा जाता है। पार्सल पहुँचने में कभी-कभी 10 से 15 दिन या अधिक का समय भी लग जाता है। अतः आपकी साधना समग्री सही समय पर आपके पास पहुँच जाये, इस बात का विशेष ध्यान रखें।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

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महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र

इस दीपावली पर्व पर दीपावली की रात्रि यह प्रयोग सिद्ध करें- ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

इस ‘महायंत्र’ की साधना केवल दीपावली पर्व पर ही सम्पन्न की जाती है। कमल धारिणी महालक्ष्मी का यह सिद्ध यंत्र यदि साधक के पास रहता है, तो अवश्य ही वह अपने जीवन में आर्थिक परेशानी से उबर कर भू-सम्पदा का स्वामी होता है, केवल मात्र घर में इस यंत्र के रखने से ही उसे धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यह यंत्र तो अन्धकार में प्रकाश की तरह है, जो साधक इस अद्वितीय महायंत्र की स्थापना दीपावली की रात्रि में अपने घर या व्यापार स्थान में अथवा दोनो ही स्थानों में करता है, वह वास्तव में ही सौभाग्यशाली माना जाता है, वास्तव में ही उसके घर में समृद्धि के देव निवास करते हैं, वास्तव में ही उसके घर में लक्ष्मी को बरसना पड़ता है, और जब तक वह ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ घर में स्थापित रहता है, तब तक उस घर में लक्ष्मी का निवास बराबर बना रहता है। ऐसा महायंत्र घर में स्थापित होने पर कर्ज, उतर जाता है, आर्थिक परेशानी के कारण होने वाले घर के लड़ाई झगड़े कुछ ही समय में समाप्त हो जाते हैं, व्यापार की समस्या दूर होती हैं, क्योंकि व्यापार में वृद्धि होने लगती है, आर्थिक उन्नति और राज्य में सम्मान प्राप्ति होती है, और उसके जन्म-जन्म के दुःख और दर्द समाप्त होने लगते हैं।

वास्तव में ही इस ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ की जितनी प्रशंसा उपनिषदों में की है, और आगे के ऋषियों ने इस महायंत्र की जितनी विशेषताएं बतलाई है, वे अपने आप में अन्यतम हैं। वशिष्ठ, विश्वामित्र, आदि ऋषियों ने इस प्रकार के महायंत्र को ‘कामधेनु’ की संज्ञा दी है। कुबेर ने भी इस महायंत्र को फलप्रदायक बताया है। इस ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ को स्थापित कर, इससे संबंधित मंत्र के जप से असीम लक्ष्मी का भण्डार प्राप्त कर जीवन में भरपूर आर्थिक उन्नति प्राप्त की जा सकती है। इस यंत्र को तांत्रिक और मांत्रिक दोनों शक्तियों से सिद्ध व सम्पन्न किया जाता है, सिद्ध अवस्था में यह महायंत्र अपने आप में अद्वितीय है।

सिद्धि-साधना प्रयोग :-
यह महायंत्र वर्ष में केवल एक दिन ‘दीपावली की रात्रि’ में स्थिर लग्न में, महालक्ष्मी पूजन के साथ ही सिद्ध हो सकता है, और दीपावली के दिन महालक्ष्मी का पूजन केवल स्थिर लग्न में ही सम्पन्न किया जाना चाहिये, और अमावस्या की रात्रि को वृषभ और सिंह मात्र दो ही स्थिर लग्न कहते हैं, अतः इन लग्न-मुहर्त में ही सिद्धि-साधना प्रयोग सम्पन्न होना चाहिये। इस वर्ष दीपवाली का पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, तथा दीपावली के दिन वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इन दोनो महूर्त में स्वाती नक्षत्र 19 बजकर 37 मिनट तक, इसके पश्चात विशाखा नक्षत्र पढेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन दोनो लग्नों का यह समय दिल्ली प्रदेश के लिये है। शेष भारत अथवा विदेशों में रहने वाले पाठक अपने देश या प्रदेश के लिये उपरोक्त स्थिर लग्नों का समय shukracharya कार्यालय से फोन द्वारा पता लगा लें। क्योंकि ज्योतिष की दृष्टि से विचार करने पर यह स्पष्ट होता है, कि यंत्र-मंत्रों की सिद्धि के लिये यह दोनों लग्न (वृष तथा सिंह) अत्यन्त विशेष फलकारक तथा प्रभावशाली हैं। यद्यपि शास्त्रों में बताया गया है, कि ऐसा महायंत्र स्थापित करने के समय की जाने वाली साधना के पश्चात् इस के अतिरिक्त किसी भी प्रकार की महालक्ष्मी साधना करना आवश्यक नहीं है, परन्तु फिर भी यदि साधक एक माह में एक बार इस ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ को गूगल का धूआँ (धूप) देता रहे तो यह वर्षो तक प्रभावशाली बना रहता है।

सबसे पहले साधक दीपावली की रात्रि में शुभ लग्न मुहर्त से पूर्व स्नानादि करके पवित्र होकर शुभ मुहूर्त में अपने पूजा स्थान में बैठ जाये यदि विवाहित हैं, तो अपनी गृहलक्ष्मी के साथ अपने पूजा स्थान में बैठ जायें और सामने एक लकड़ी के तख्ते पर पीला रेशमी वस्त्र बिछा कर उस पर इस ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ को स्थापित कर दें, इसके बाद फूल, चावल, रोली, कलावा तथा सुपारी समर्पित करके यंत्र की पंचोपचार पूजा करनी चाहिये तथा फिर शुद्ध केशर से इस ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ पर चारों कोनों पर एक-एक बिन्दियां लगायें जो सिद्धि-समृद्धि की प्रतीक है। इसके बाद सीधे हाथ में जल ले कर विनियोग करें-

विनियोग-
अस्य श्री महालक्ष्मी हृदयमालामंत्रस्य भार्गव ऋषिः आद्यादि श्री महालक्ष्मी देवता,अनुष्टुपादिनानाछन्दांसि, श्री बीजम् हृीं शक्तिः, ऐं कीलकम् श्री महालक्ष्मी प्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

इसके बाद साधक हाथ में जल ले कर यह संकल्प करें कि मैं अमुक गौत्र अमुक पिता का पुत्र, अमुक नाम का साधक दीपावली के पर्व पर शुभ लग्न मुहर्त में भगवती महालक्ष्मी को नवनिधियों के साथ अपने घर में स्थापित करने के लिए यह प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूँ। ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल भूमि पर छोड़ दें, और फिर ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ के सामने शुद्ध घृत के पांच दीपक लगावें (यह दीपक पूरी रात्रि जलते रहें इतना घी इनमें डाल देना चाहिये।) सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करें, और दूध के बने हुए प्रसाद का नैवेद्य समर्पित करें, इसके बाद हाथ जोड़ कर ध्यान करें।

ध्यान-
हस्तद्वयेन कमले धारयन्तीं स्वलीलया।
हारनूपुरसंयुक्तां लक्ष्मीं देवी विचिन्तये।।

इसके बाद साधक स्फटिक की ‘सिद्धलक्ष्मी माला’ से निम्न मंत्र की 21 माला मंत्र जप करें, इसमें ‘सिद्धलक्ष्मी माला’ का ही प्रयोग होता है, यह विशेष ध्यान रखें।

महामंत्र-
ॐ श्रीं हृीं ऐं महालक्ष्म्यै कमल धारिण्यै सिंहवाहिन्यै स्वाहा।

इसके बाद साधक लक्ष्मीजी की आरती करे और ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ को तथा ‘सिद्धलक्ष्मी माला’ को उसी आसन वाले पीले वस्त्र से लपेट कर अपनी तिजोरी में रख दें, या फिर आसन पर ही पूजा स्थान में रहने दें, तथा प्रसाद को घर के सभी सदस्यों में वितरित कर दे, इस प्रकार यह साधना सम्पन्न होती है, जो कि इस पर्व की श्रेष्ठतम और अद्वितीय साधना कही जा सकती है।

दीपावली साधना सामग्री :-
इस साधना को सम्पन्न करने के लिए कुछ प्राणप्रतिष्ठित आवश्यक सामग्री की आवश्यकता होती है :- 1. शुद्ध चांदी पर विशेष मुहर्त में निर्मित ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’। 2. स्फटिक की ‘सिद्धलक्ष्मी माला’ । 3. शुद्ध केशर। यह सामग्री आप हमारे कार्यालय से मंगवा सकते हैं। परंतु इस ‘दीपावली साधना सामग्री’ का पैकिट आपको दीपावली से 15-20 दिन पहले आर्डर करना चाहिए।

यदि आप साधना नहीं कर सकते-

यदि आप ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र साधना’ सम्पन्न नहीं कर सकते, अथवा आप को साधना पद्धति जटिल लगती है, तब एेसी स्थिति में आप दीपावली की रात्रि सिद्ध मुहूर्त में सिद्ध किया गया ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ हमारे कार्यालय में सम्पर्क करके आर्डर कर सकते हैं। (कार्यालय से मंगवा सकते हैं।) इस शुद्ध चांदी पर निर्मित ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ तथा स्फटिक की ‘सिद्धलक्ष्मी माला’ के लिये न्यौक्षावर राशि मात्र 5100/-रू है।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

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शाबर मंत्र साधना shabar mantra

Shabar mantra :- मंत्र तीन प्रकार के होते हैं – वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक।

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka bhavishya.in), Astrological consultant, shukracharya

विद्वानों की धारणा है कि कलियुग में तांत्रिक मंत्र सफल होते हैं, कलियुग के लिये तांत्रिक मंत्र ही शक्तिशाली हैं। तांत्रिक मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं – शाबर मंत्र, Shabar mantra डामर मंत्र और बीजाक्षर मंत्र। इन तीनों प्रकार के तांत्रिक मंत्रों का अपना-अपना विज्ञान है। जो लोग उसके वैज्ञानिक रहस्य को समझते हैं, वे ही मंत्रों का प्रयोग कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। शास्त्रों में हमें स्थान-स्थान पर शाबर मंत्रों के विषय में वर्णन मिलता है। यह एक प्रकार के तांत्रिक उपाय ही होते हैं, Dr.R.B.Dhawan, shukracharya के अनुसार इन की साधना करना थोड़ा जटिल कार्य होता है, परन्तु यदि सही ढंग से इन्हें सिद्ध कर लिया जाये तो लाभ भी अवश्य ही मिलता है। यहाँ मैं आपको कुछ शाबर मंत्रों के बारे में बताने जा रहा हूँ :-

1. दरिद्रता दूर करने के लिये धनदा मंत्र:- गरीबी और अभावों से मुक्ति के लिये धनदा मंत्र अत्यंत प्रभावकारी है।

मंत्र:- नमः विष्णवे सुरपतये महाबलाय स्वाहा।।

2. पदोन्नति के लिये भद्रकाली मंत्रः- भद्रकाली यंत्र को महाकाली यंत्र भी कहा जाता है। इसे स्वर्ण पर अंकित करायें। पैंतालिस दिनों तक प्रति दिन एक हजार बार मंत्र का जाप करें।
त्रयाणां देवानां त्रिगुण जनितानां तव शिवं मवेत् पूजा, पूजा तव चरणयोर्या विराचेता। महानिशा में शाबर मंत्रों की साधना- शाबर मंत्र किसी वेद, शास्त्र पुराण या अन्य ग्रन्थ में एक जगह संकलित नहीं मिलता। ये मंत्र लोक भाषा में प्रचलित हैं तो अपने से स्वयं सिद्ध हैं। यह तो साधक पर निर्भर करता है, कि वह मंत्रों का कब और कैसे प्रयोग करें।

3. रक्षा कवच मंत्र:- साधक हो या सामान्य व्यक्ति हर किसी को सर्वप्रथम अपनी रक्षा करनी चाहिये। हो सकता है आपके ऊपर ही कोई दूसरा तांत्रिक प्रयोग कर दे तो आप दूसरों की रक्षा करने से पहले ही स्वयं कष्ट में पड़ जायेंगे। ऐसी स्थिति में सर्वप्रथम अपनी रक्षा और बचाव करना चाहिये :-

मंत्र:- ॐ नमो आदेश गुरून को ईश्वरी वाचा, अजरी बजरी बाड़ा बजरी मैं बांधा दसो दुवार छवा और के घालो तो पलट हनुमंत वीर उसी को मारे पहली चैकी गनपती, दूजी चैकी हनुमंत, तीजो चैकी से भैरों चैथी, देह रक्षा करन को आवे श्री नरसिंह देवजी, शब्द सांचा पिंड सांचा चले मंत्र ईश्वरी वाचा।।

उक्त मंत्र शारीरिक पीड़ा से छटपटाते व्यक्ति पर भी प्रयोग किया जा सकता है। यदि किसी को भी मूर्छा आ जाये और कष्ट से घिर जाये तो इस मंत्र से झाड़ देने से वह व्यक्ति अच्छा हो जाता है, और शीघ्र स्वस्थ प्रसन्न जो जाता है। उक्त शाबर मंत्र Shabar mantra का प्रयोग किसी उपद्रव ग्रासित घर को शुद्ध करने में भी किया जाता है।

4. शत्रु एवं प्रतिद्वंदी को परास्त करने के लिये:- यह मंत्र अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को परास्त करने के लिये प्रयोग में लाया जाता है। महानिशा में इसे 108 बार पढ़कर हवन करके सिद्ध कर लिया जाता है। फिर जब चाहें अपने लिये प्रयोग करें। दूसरों के लिये इसका प्रयोग गंडा या ताबीज के रूप में किया जाता है –

मंत्र:- हाथ बसे हनुमान भैरों बसे लिलार, जो हनुमंत को टीका करे मोरे जग संसार। जो आवे छाती पांव धरे बजरंग बीर रक्षा करें, महम्मदा वीर छाती टोर जुगुनियाँ, बीर शिर फोर उगुनिया बीर मार-मार भास्वत करे भैरों बीर की आन फिरती रहे बजरंग बीर रक्षा करे, जो हमरे ऊपर घाव छाले तो पलट हनुमान बीर उसी को मारे जल बाँधे थल बाँधे आर्या आसमान बाँधे कुदवा और कलवा बांधे चक चक्की आसमान बाँधे वाचा साहिब साहिब के पूत धर्म के नाती आसरा तुम्हारा है।

5. सुख पूर्वक प्रसव का मंत्र:– इस मंत्र को 108 बार हवन करके सिद्ध कर लेने पर जब प्रयोग करना हो तब 11 बार पढ़कर जल अभिमंत्रित करके गार्भिणी को पिला दें। तुरंत सुख पूर्ण प्रसव हो जायेगा।

मंत्र:- ॐ मुक्ताः पाशा विमुक्ताः मुक्ताः सुर्येणरश्मयः। मुक्ताः सर्वभयापूर्व ऐहि माचिर-माचिर स्वाहा।।

6. चिंतित कार्य की सफलता के लिये:- जब किसी कार्य के होने न होने की चिंता बनी हो अथवा शत्रु भय या राज भय हो अथवा कोई कामना जो पूर्ण न हो रही हो तो निम्न मंत्र की एक माला नित्य जप लें। कुछ दिनों में ही चिंता समाप्त हो जायेगी और मंत्र सिद्ध हो जायेगा।

मंत्र:- ॐ हर त्रिपुर भवानी बाला, राजा प्रजा मोहिनी सर्व शत्रु। विध्यवासिनी मम चिंतित फलं, देहि-देहि भुवनेश्वरी स्वाहा।।

7. रोग हरण के लिये:- निम्न मंत्र की 21 माला महानिशा (काली रात) में जपकर सिद्ध कर लें। फिर जब कोई बीमार हो तब किसी बर्तन में शुद्ध जल लेकर इसे 21 बार पढ़कर जल को फूँककर मंत्रित करके रोगी को पिला दें। रोगी पहले से, ठीक होने लगेगा। रोग एवं रोगी की स्थिति के अनुसार इस तरह का अभिमंत्रित जल 3, 5, 7, 11, 21 दिन तक देना चाहिये।

मंत्र:- ॐ सं सां सिं सीं सुं सूं सें सैं सों सौं सं सः वं वां विं वीं वुं वूं वें वैं वों वौं वं वः सह अमृत वरचे स्वाहा।

शाबर मंत्र की विश्वश्नीयता पर कभी भी शक नहीं किया जा सकता है। परन्तु इनकी सिद्ध के लिये साधना का ढंग एकदम सही व सटीक होना चाहिये। (Top best astrologer in Delhi), marriage and after marriage problems salutations.

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Diwali muhurat 2017

2015 Diwali Muhurat

Diwali Pooja muhurat 2017

by :-​Dr.R.B.Dhawan

diwali 2017 का पर्व 19 अक्टूबर 2017 बृहस्पिवार के दिन है। कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि प्रदोषकाल, स्थिर लग्न में अथवा  महानिशीथ काल, स्थिर लग्न में अनुकूल चौघडिया के समय गणेश सहित देवी महालक्ष्मी-महाकाली-महासरस्वती diwali Pooja की पूजा-आराधना Laxmi pooja करने से यह देवीयां भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं।

इस वर्ष दीपावली depawli pooja, Laxmi Pooja का पर्व 19 अक्तूबर 2017 बृहस्पतिवार के दिन होगा। दिल्ली की समय गणना अनुसार इस दिन अमावस्या रात्रि 24:44 तक रहेगी, चित्रा नक्षत्र 19:28 से आरंभ होगा, वृष (स्थिर लग्न) 19:11 से 21:06 तक रहेगी। निशीथ काल nishith kaal 20:20 से 22:54 तक, प्रदोष काल pradosh kaal 17:46 से 20:20 तक रहेगा। दीपावली की शाम प्रदोष काल में स्नान के उपरांत वस्त्राभूषण धारण करके धर्मस्थल पर श्रद्धापूर्वक दीपदान करके शुभ मुहूर्त अनुकूल चौघडिया में अपने निवास स्थान पर श्री गणेश सहित देवी महालक्ष्मी महाकाली महासरस्वती और कुबेर की पूजा diwali pooja करनी चाहिए।

महालक्ष्मी Laxmi Pooja पूजन विशेष मुहूर्त diwali muhurat 2017, :-   (1). सायं 19 : 11 से 20 : 20 तक। (2). रात्रि 20 : 20 से 20 : 59 तक। यह दोनों मुहूर्त वृष लग्न के हैं।

Diwali Special muhurt 2017, मध्य रात्रि महानिशीथ काल सिंह लग्न : 25 : 39 से 25 : 48 तक है।

Diwali muhurat by:- Dr.R.B.Dhawan, Top astrologer in Delhi, Best astrologer in India 


Diwali Pooja Muhurat 2016

diwali pooja muhurat 2016

Diwali Pooja Muhurat 2016

30 अक्तूबर 2016 दीपावली पर्व है। दीपावली की रात्रि प्रदोषकाल में महालक्ष्मी पूजन (Diwali Pooja Muhurat 2016) की परम्परा आदिकाल से चली आ रही है। इस दिन सूर्य व चन्द्रमा तुला (शुक्र की राशि) में विचरण कर रहे होते हैं।

कार्तिक अमावस्या की रात्रि स्थिर लग्न (वृष या सिंह) में महानिशीथ काल में महालक्ष्मी का पूजन करने से माता लक्ष्मी साधक के घर स्थाई निवास करती हैं।

इस वर्ष महालक्ष्मी पूजन MahaLaxmi Diwali Pooja Muhurat 2016 का शुभ तथा विशेष मुहूर्त सॉय 18:28 से आरम्भ होकर 20:22 तक रहेगा।

इस दिन सॉय 18:28 से 20:22 तक के समय में अमावस्या तिथि अंतर्गत वृष लग्न तथा शुभ, अमृत तथा चर का चौघडिया का शुभ योग बना है।

स्थिर लग्न के मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन करने से धन-धान्य स्थिर रहता है। इस मुहूर्त में दीपदान, गणपति सहित महालक्ष्मी पूजन, कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन तथा धर्मस्थलों में और अपने घर में दीप प्रज्जवलित करना चाहिये।

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इस के अतिरिक्त AapKaBhavishya.in पर भी गुरूजी (डा. आर.बी.धवन) के ज्योतिषीय लेख भी आप पढ़ सकते हैं।