Santaan Prapti Upaya for Diwali – इस दीपावली करें संतान प्राप्ति उपाय

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Santaan Prapti Upaya संतान प्राप्ति उपाय (एक दिवसीय दीपावली साधना प्रयोग)

कुण्डली में संतानोत्पत्ति योग न हो अथवा अनेक बार गर्भ हानि होती रही हो या संतान दीघार्यु नहीं होती हो तो उसके लिए यह संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya महत्वपूर्ण है। इस साधना प्रयोग को दीपावली की रात्रि में संतान की इच्छा करने वाली महिला के संपन्न करने से संतान का योग प्रबल होकर एक वर्ष में संतानोत्पत्ति अवश्य होती है। और वह संतान आज्ञाकारी होती है। इस प्रकार के प्रयोग से गृहस्थ जीवन अनुकूल एवं सुखदायी बन जाता है।

संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya के लिए साधिका को चाहिए कि वह दीपावली की रात्रि में स्नानादि कर पीले वस्त्र धारण कर पूर्व की तरफ मुख कर के पीले आसन पर बैठ जाएं सामने लकड़ी की चौकी पर एक थाली में चावल से त्रिकोण बनाकर उसके मध्य में मोती पर बने अभिमंत्रित मुक्ता गणपति की स्थापना करें और फिर पंचोपचार (फूल, चावल, रोली, कलावा तथा धूप-दीप) से पूजा करके पुत्रजीवा की 108 दानों वाली माला से 51 माला अग्रलिखित मंत्र जप पूर्ण करें।

यही प्रयोग प्रत्येक माह शुक्ल पंचमी के दिन गर्भवती होने तक पुत्र की इच्छा रखने वाली महिला को दोहराना चाहिये। निश्चय ही उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। यही संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya उस महिला का पति या घर का कोई अन्य सदस्य भी कर सकता है, परंतु उसको उस महिला के नाम का संकल्प अवष्य लेना होगा। यदि कोई साधक-साधिका किसी दूसरे के लिए प्रयोग करना चाहे तो संकल्प ले लें कि ‘मैं यह प्रयोग अमुक व्यक्ति के लिए संपन्न कर रहा/रही हूँ।

मंत्र- ऊँ नमो नारायणाय पुत्र सन्तानं देही देहि ठः ठः स्वाहा।

जप पूर्ण होने पर गणपति जी को मिष्ठान का भोग लगवाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें। वह माला जल में विसर्जित कर दें। मुक्ता गणपति का चांदी में लॉकेट बनवाकर महिला को गले में धारण करना चाहिये।

साधना सामग्री– अभिमंत्रित मुक्ता गणपति (मोती पर बने गणपति), 108 दाने की पुत्रजीवा माला।

न्यौछावर राशि रू. 3100

संपर्क : Sukracharya, F-265, Street No. 22, Laxmi Nagar, Delhi-110092, Mob: 09810143516

Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

janmashtami 2016

Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

आज जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के शुभअवसर पर आपके लिए प्रस्तुत है यह लेख।  सनातन दर्शन का यह मूलभूत सिद्धांत है कि जिस सत्चित् आनंद के आश्रय से यह दृश्यमान जगत अथवा यह धरातल संचालित हो रहा है, उसी के सहारे नियमित रूप से प्राणियों की आवश्यकता और रक्षा की व्यवस्था भी हो रही है।

भक्तों की धारणा है कि जब-जब विश्व व्यवस्था में अतिक्रमण होता है, तब-तब निराकार ईश्वर का एक अंश मूर्त साकार रूप ग्रहण करके व्यवस्था की पुनः स्थापना करने के लिये अवतीर्ण होता है, विश्व-व्यवस्था कि सुस्थिति, विश्वमंगल के लिये आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। इसलिये पूर्णब्रह्म परमेश्वर अवतार धारण कर अव्यवस्था जन्य भूमिभार का हरण करते हैं।

शास्त्रों ने ऐसे चैबीस अवतारों में श्रीराम और श्रीकृष्ण के अवतारों को विशेष महत्व दिया है। श्रीराम सोइ सच्चिदानंदघन रामा हैं और श्री कृष्ण भागवताकार के शब्दों में कृष्णस्तु भगवान स्वयम् हैं।

दोनों ने तत्कालीन अव्यवस्था एवं धर्मग्लानि को दूर करने के लिये अलौकिक शक्ति, अद्भुद् सौंदर्य और मर्यादा क्षमाशील विधान का आदर्श रूप उपस्थित कर विश्व व्यवस्था को सुचारूता दी। दोनों ने रावण, कंस आदि नृशंस राजाओं की उच्छृंखलता को परास्त कर साधु संरक्षण और लोक मंगल की विधायिनी व्यवस्था को संस्थापित किया।

यही कारण है कि इनकी अवतरण तिथियों को मनाये जाने वाले हमारे व्रत, उत्सव आदि में इनका प्रभाव अक्षुण्ण है और हम इनके आदर्श को समझने एवं व्यवहार में लाने के लिये इनकी जन्म जयंतियाँ प्रतिवर्ष व्रत के रूप में मनाते हैं। तथा लौकिक व परलौकिक लाभ उठाते हैं।

उसी परंपरा में हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रª के ये दो महान पर्व हैं- श्रीराम नवमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016)। श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण का आर्विभाव इसी तिथि को बुधवार के दिन रोहिणी नक्षत्र में अर्द्धरात्रि के समय हुआ था।

शास्त्रों में अष्टमी व्रत के दो भेद किये गये हैं- शुद्धा और विद्धा। सूर्योदय से सूर्योदय तक व्याप्त अष्टमी शुद्धा और सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच सप्तमी अथवा नवमी से युक्त होने पर विद्धा कही जाती है। फिर इनके तीन भेद किये जाते हैं:- समा, न्यूना और अधिका। इन भेदों के कारण अष्टमी अट्ठारह प्रकार की ही हो जाती है।

परंतु मान्यता की दृष्टि से तत्काल (अर्धरात्रि-व्यापिनी) अष्टमी ही ग्राह्य मानी गई है। ऐसी अष्टमी (Janmashtami) दो दिनों तक अथवा दोनों ही दिन न हो तो नवमी विद्धा ही ग्रहण करनी चाहिये।

इस वर्ष जन्माष्टमी का यह पर्व 25 अगस्त 2016 के दिन मनाया जाना शास्त्र सम्मत है, इस दिन सूर्याेदय के समय कृतिका नक्षत्र उदय होगा तदुपरांत दोपहर 12:10 से रोहिणी नक्षत्र आरम्भ होगा।

इस व्रत का महत्व शिव, विष्णु, ब्रह्मा भविष्य आदि पुराणों में तथा धर्मसिंधु, निर्णय-सिंधु आदि निबंध-ग्रंथों में प्रचूरता से वर्णित है। यह सर्वमान्य, पापघ्न तथा बाल, वृद्ध, कुमार, युवा अवस्था वाले नरों व नारियों के लिए अनुष्ठेय है।

कुछ शास्त्रों के अनुसार जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत नहीं करने वाले सक्षम नर-नारियों को पाप लगता है, और करने वालों के पापों की निवृत्ति एवं सुख की अभिवृद्धि होती है। इस व्रत में अष्टमी में उपवास और भगवत्पूजन का तथा नवमी में पारणा करने का विधान है।

अष्टमी (Janmashtami 2016) के एक दिन पहले लघु भोजन करना चाहिये। रात्रि में जितेंद्रिय रहना चाहिये। उपवास के दिन प्रातः स्नानादि नित्यकर्म करके सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि आकाष, आकाषचारी देवता और ब्रह्मा आदि को नमस्कार करके पूर्व या उत्तर मुख बैठें, हाथ में जल, फूल, कुष और गंध लेकर संकल्प करें-
ममाखिलपापप्रषमनपूर्वकं सर्वाभीष्टसिद्धये श्री कृष्णजन्माष्टमीव्रतमहं करिष्ये।

मध्याह्न समय में काले तिल डालकर उस जल से स्नान करके देवकी जी के लिये -सूतिकागृह नियत करें। उसे स्वच्छ व सुषोभित करके उसमें सूतिकोपयोगी सामग्री यथाक्रम रखें। गीतवाद्य का आयोजन करना और अधिक अच्छा होगा।

सूतिका गृह के सुःखद शोभन विभाग में सुंदर सुकोमल बिछौने के सुदृढ़ मंत्र पर अक्षतादि का मंडल बनवाकर उसपर शुभ कलष स्थापित करें एवं उसी पर सोना, चांदी, तांबा, पीतल, मणि, वृक्ष, मिट्टी या चित्ररूप भगवान की मूर्ति स्थापित करें।

मूर्ति में सद्यःप्रसूत श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और श्री लक्ष्मी जी उनके चरणस्पर्ष किये हुए हों- यह भाव प्रकाष्य होना चाहिए। फिर यथा समय भगवान के आर्विभाव की भावना कर वैदिक विधि पुरूष सुक्त से षोडशोपचार पूजन करना चाहिये।

यदि ऐसा करना संभव न हो तो पौराणिक अथवा संप्रदायानुसार दषोपचार या पंचोपचार आदि से पूजन करके आरती उतारनी चाहिये। इस पूजन में देवकी, वसुदेव, नंद, यषोदा और लक्ष्मीजी- इन सबका नाममंत्र से पूजन करना चाहिए।

अंत में निम्नांकित मंत्र से अध्र्य दें-
प्रणमे देवजननीं त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात्तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमोनमः।।
सपुत्राघ्र्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।।

फिर श्रीकृष्ण को पुष्पांजलि दें –
‘धर्माय धर्मेष्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’

इसके बाद जातकर्म-संस्कार, नालच्छेदन, षष्ठी पूजन और नामकरणादि करके चंद्रमा का भी पूजन करें-
‘सोमाय सोमेष्वराय सोमपतये सोमसम्भवाय सोमाय नमो नमः।’

फिर शंख में जल, कुष, कुसुम और गंध डालकर दोनों घुटने भूमि में टेककर प्रार्थना करते हुए अघ्र्य देवें-
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्र समुद्भव। गृहाणाध्र्यं शषांकेमं रोहिण्या सहितो मम।।
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषाम्पते। नमस्ते रोहिणीकान्त अघ्र्यं मे प्रतिगृह्यताम।।

रात्रि के शेष भाग को स्तोत्र-पाठादि अथवा संकीर्तन करते हुए व्यतीत करें। उसके बाद अगले दिन पूर्वार्द्ध में स्नानादिक नित्य क्रिया संपन्न कर जिस नक्षत्र तिथि या योग की प्रमुखता मानकर व्रत किया हो उसके अंत में भगवदर्पण पूर्वक अन्नादिक ग्रहण कर पारणा करें।

अष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत करने से प्रणत क्लेषहारी वृन्दावनबिहारी भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और अपनी भक्त्ति देते हैं। अष्टमी व्र्रत का महत्त्व अत्यधिक है, अतः यह व्रत प्रत्येक को श्रद्धा व निष्ठा पूर्वक करना चाहिये।

आगे की पक्तियों में साधकों के लिये कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर एक इच्छा पूर्ति प्रयोग दिया जा रहा है, आप चाहें तो यह प्रयोग आप भी संपन्न कर सकते हैं, यह विशेष श्रेणी का काम्य प्रयोग है- इतनी बात निश्चित है कि श्री कृष्ण साधना हेतु किया गया कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता।

साधक अपना निर्णय स्वयं लेते हुए श्री कृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के इस महान सिद्ध पर्व पर कोई न कोई साधना कर्म अवश्य संपन्न करें।

इच्छा पूर्ति गोविंद प्रयोग

इस साधना प्रयोग हेतु साधक 25 अगस्त 2016 रात्रि का प्रथम प्रहर बीत जाने के बाद साधना क्रम प्रारंभ करें। अर्द्ध रात्रि के साथ पूर्ण कर मंत्र जप संपन्न करे, इस साधना हेतु- श्री कृष्ण यंत्र तथा एक वैजयन्ती माला का होना आवश्यक हैं। अपने सामने सर्वप्रथम एक बाजोट पीले पुष्प बिछा दें और उन पुष्पों के बीचों बीच श्री कृष्ण यंत्र स्थापित करें, तथा इस यंत्र का पूजन केवल चंदन तथा केसर से ही संपन्न करें।
अपने सामने कृष्ण का एक सुंदर चित्र फ्रेम में मढ़वा कर स्थापित करें। चित्र को भी तिलक करें तथा प्रसाद स्वरूप पंचामृत साथ रख लें, जिसमें घी, दूध, दही, शक्कर तथा गंगाजल मिश्रित हो। इसके अतिरिक्त अन्य नैवेद्य भी अर्पित कर सकते हैं। इच्छा पूर्ति यंत्र के दोनों और दो-दो गोमती चक्र स्थापित करें, तथा उन्हें केसर का तिलक लगायें और दोनों हाथ जोड़ कर भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें, श्री कृष्ण का ध्यान कर उनकी आठ शक्तियाँ लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कांति, कीर्ति, तुष्टि एवं पुष्टि की मानसिक पूजा करें। प्रत्येक शक्ति के लिए निम्न मंत्र का उच्चारण करें-

ऊँ लक्ष्म्यै नमः।
ऊँ सरस्वत्ये नमः।
ऊँ रत्ये नमः।
ऊँ प्रीत्यै नमः।
ऊँ कान्त्ये नमः।
ऊँ कीत्र्ये नमः।
ऊँ तुष्टयै नमः।
ऊँ पुष्टये नमः।

शक्ति पूजन के पश्चात् इच्छापूर्ति मंत्र का जप प्रारंभ किया जाता है, इसकी भी विशेष विधि है, इसमें अपने दोनों हाथों में अक्षत् पुष्प और थोड़ा गंगाजल लें, और इच्छा पूर्ति मंत्र का उच्चारण करते हुए उसे अर्पित कर दें।
इच्छा पूर्ति मन्त्र- ऊँ श्रीं हृीं क्लीं कृष्णायै गोविन्दायै नमः।

इस प्रकार 108 बार इस मंत्र का उच्चारण इसी विधि से संपन्न करें यह प्रयोग पूर्ण हो जाने के बाद पहले से जलाकर रखे हुए दीपक, अगरबत्ती तथा धूप से आरती संपन्न कर प्रसाद ग्रहण करें। यदि कोई साधक 40 दिन तक प्रतिदिन एक माला मंत्र जप संपन्न करे तो उसका इच्छित कार्य अवश्य ही संपन्न हो जाता है।

नाग पंचमी उपाय Nag Panchami Muhurat & Upaya 2016

Nag Panchami Muhurat & Upaya 2016

Nag Panchami Muhurat & Upaya नाग पंचमी 7 अगस्त 2016

हमारे धर्म ग्रन्थों में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पूजा Nag Panchami Muhurat & Upaya का विधान है। पुराणें के अनुसार नागों की अनेक जातियाँ और प्रजातियाँ हैं। भविष्य पुराण में नागों के लक्षण, नाम, स्वरूप एवं जातियों का विस्तार से वर्णन मिलता है। मणिधारी तथा इच्छाधारी नागों का भी उल्लेख मिलता है।

श्रावणमास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) का त्यौहार नागों को समर्पित है। इस त्यौहार पर व्रत पूर्वक नागों का अर्चन-पूजन होता है। व्रत के साथ एक बार भोजन करने का नियम है। पूजा में पृथ्वी पर नागों का चित्रांकन किया जाता है। स्वर्ण, रजत, काष्ठ या मृत्तिका से नाग बनाकर पुष्प, गंध, धूप-दीप एवं विविध नैवेद्यों से नागों का पूजन होता है।

नाग अथवा सर्प पूजा की परम्परा पूरे भारतवर्ष में प्राचीनकाल से रही है, प्रत्येक गाँव में ऐसा स्थान अवश्य होता है, जिसमें नाग देव की प्रतिमा बनी होती है, और उसका पूजन किया जाता है।

नागपंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) के दिन को तो एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, इसके पीछे भी विशेष कारण है जिस का वर्णन आगे इसी लेख में करेंगे। समय के अनुसार मूल स्वरूप को अवश्य भुला दिया गया है।

क्या नाग देवता हैं?

जिस प्रकार मनुष्य योनि है, उसी प्रकार नाग भी योनि भी है, प्राचीन कथाओं में उल्लेख मिलता है कि पहले नागों का स्वरूप मनुष्य की भांति होता था, लेकिन नागों को विष्णु की अनन्य भक्ति के कारण वरदान प्राप्त होकर इनका स्वरूप बदल दिया गया, और इनका स्थान विष्णु की शय्या के रूप में हो गया, नाग ही ऐसे देव हैं, जिन्हें विष्णु का साथ हर समय मिलता है, और भगवान शंकर के गले में शोभा पाते हैं, भगवान भास्कर (सूर्य) के रथ के अश्व भी नाग का ही स्वरूप हैं।

भय एक ऐसा भाव है, जिससे कि बली से बली व्यक्ति, बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति, भी अपने को शक्तिहीन समझता है। कोई अपने शत्रुओं से भय खाता है, कोई अपने अधिकारी से भय खाता है, कोई भूत-प्रेत से भयभीत रहता है, भयभीत व्यक्ति उन्नति की राह पर कदम नहीं बढ़ा सकता है, भय का नाश, और भय पर विजय प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है, और नाग, सर्प देवता भय के प्रतीक हैं, इसलिए इनकी पूजा का विधान हर जगह मिलता है।

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नाग पंचमी रक्षात्मक प्रार्थना का पर्व-

आमतौर पर नागपंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) के पर्व को महिलाओं का ही पर्व माना जाता है, जो कि बिल्कुल गलत है, ‘‘नाग’’ वास्तव में कुण्डलिनी शक्ति के स्वरूप हैं, यह विशेष पर्व कुण्डलिनी शक्ति की उपासना का पर्व है। इस पर्व पर छोटा-मोटा कुण्डलिनी जागरण प्रयोग कर व्यक्ति किसी भी प्रकार की भय बाधा से मुक्ति पा सकता है।

इसका विधान भी अत्यंत सरल है-
नागपंचमी के दिन प्रातः जल्दी उठकर सूर्योदय के साथ सबसे पहले शिव पूजा संपन्न करनी चाहिए, शिव पूजा में शिवजी जी का ध्यान कर शिवलिंग पर दूध मिश्रित जल चढ़ायें और एक माला ‘ऊँ नमः शिवाय’ मंत्र का जप अवश्य करें। नाग पूजा में साधक अपने स्थान पर भी पूजा संपन्न कर सकता है, और किसी देवालय में भी।

किसी धातु का बना छोटा सा नाग का स्वरूप ले लें या फिर एक सफेद कागज पर नाग देवता का चित्र बना लें। इसे अपने पूजा स्थान में सामने सिंदूर से रंगे चावलों पर स्थापित करें, और एक पात्र में दूध नैवेद्य स्वरूप रखें। सर्वप्रथम अपने सदगुरू का ध्यान कर, सर्प भय निवृति हेतु प्रार्थना करें, तत्पश्चात नागदेवता का ध्यान करें कि-

हे नागदेव! मेरे समस्त भय, मेरी समस्त पीड़ाओं का नाश करें, मेरे शरीर में अहंकार रूपी विष को दूर करें, मेरे शरीर में व्याप्त क्रोध रूपी विष से मेरी रक्षा करें, इसके बाद नागदेव के चित्र पर सिंदूर का लेप करें, तथा इसी सिंदूर से अपने स्वयं के तिलक लगायें। इस के बाद अग्र लिखित मंत्र का 21 बार पाठ करते हुये नाग देवता तथा कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करें।

मंत्र-
जरत्कारूर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी। वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा ।।
जरत्कारूप्रिया स्तीकमाता विषहरेति च। महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता।।
द्वादशैतानि नमानि पूजाकाले तु यः पठेत्। तस्य नागभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

थोड़ी देर शांत होकर बैठ जायें तथा ऊँ नमः शिवाय का जप करते रहें, इससे भय का नाश होता है और बड़ी से बड़ी बाधा से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।

पूजन के बाद नागदेव के सम्मुख रखे दूध को प्रसाद स्वरूप स्वयं ग्रहण करें, यदि यह दूध किसी अस्वस्थ व्यक्ति को पिलाया जाये, तो उसे दिन-प्रतिदिन स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होगा। यदि कोई किसी पुराने रोग से पीड़ित हो तो यह प्रयोग 7 दिन तक करें, लेकिन पूजन से पहले अस्वस्थ व्यक्ति के नाम से संकल्प अवश्य लें। इस पूजा का प्रभाव इतना अनुकूल रहता है कि विशेष कार्य पर जाते समय नागदेव का ध्यान कर, यदि आप प्रबल से प्रबल शत्रु के पास भी चले जाते हैं, तो वह शत्रु आप से सत व्यवहार ही करेगा, हानि देने की बात ही दूर रही।

संतान प्राप्ति का नाग शान्ति प्रयोग-

जो स्त्रियाँ नागपंचमी के दिन नागदेव का विधि-विधान सहित पूजन करती हैं, उनकी संतान प्राप्ति की कामना अवश्य पूर्ण होती है। स्त्रियों को अपनी संतान रक्षा हेतु भी नाग शान्ति प्रयोग करना चाहिये। नागपंचमी के दिन सांयकाल शिव का ध्यान करते हुए नाग देव का पूजन करना चाहिए, इसमें पूजन तो ऊपर दी गई विधि के अनुसार ही करना है किंतु अंतर केवल इतना ही है, कि संतान प्राप्ति तथा रक्षा हेतु आगे दिये मंत्र का 51 बार जप करें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पùनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
संतान प्राप्यते संतान रक्षा तथा।
सर्वबाधा नास्ति सर्वत्र सिद्धि भवेत्।।

यह प्रयोग नागपंचमी से लेकर सात दिन तक संपन्न करें। इस प्रयोग को करने से भयबाधा व संतान की कामना पूर्ति अवश्य होती है।

शकुन शास्त्र Shakun Apshakun

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शकुन शास्त्र और Shakun Apshakun शकुन अपशकुन

शकुन शास्त्र को अंधविश्वास की श्रेणी में रखा जाये अथवा भविष्य बताने वाली एक विद्या के रूप में माना जाये? वस्तुतः यह विद्या (Shakun Apshakun) भी ज्योतिष की तरह ही वैज्ञानिक (Scientific) विद्या है। अष्टांग ज्योतिष का एक भाग होने के अतिरिक्त ज्योतिष की तरह इसका भी एक आधार है, इसका मूल आधार प्रकृति विज्ञान है।

जो घटना घट रही है, उसके प्रारम्भ की स्थूल प्रक्रिया भले ही हमारे सामने आज प्रारम्भ हो रही है। किन्तु प्राकृतिक वातावरण में उसके प्रारम्भ की सूक्ष्म प्रक्रिया बहुत पहले प्रारम्भ हो चुकी होती है। उस सूक्ष्म प्रक्रिया का प्रभाव प्रकृति के वातावरण में रहने वाले प्राणियों द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है, या पहचान लिया जाता है।

वे अपनी अंग चेष्टाओं से उस प्रभाव की अभिव्यक्ति प्रकट करते हैं। प्राचीन महर्षियों ने प्रकृति की सूक्ष्म प्रक्रिया से प्रभावित प्राणियों की उन अंग-चेष्टाओं को अभिव्यक्त प्राणियों को सूक्ष्म दृष्टि से देखा, पहचाना और फिर परीक्षण भी किया हैं। प्राचीन महर्षियों ने सूक्ष्म प्रक्रिया से प्रभावित प्राणियों की उनकी चेष्टाओं का सूक्ष्म अध्ययन कर जो फलादेशों का संग्रह किया, वह कदापि अवैज्ञानिक नहीं हो सकता।

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‘शकुन, पक्षी का पर्यायवाची है। शकुन शास्त्र (Shakun Apshakun) का सर्व प्रथम संकलन जिस समय हुआ होगा, उस समय केवल शकुन अर्थात् पक्षियों के दर्शन तथा शब्द श्रवण के आधार पर ही शुभाशुभ के निर्णय संकलित किये गये होंगे। क्योंकि प्राकृतिक वातावरण में पले पौधे, पक्षियों पर सूक्ष्म प्राकृतिक परिवर्तनों का प्रभाव शीघ्रतिशीघ्र पड़ता है। वे अत्यधिक संवेदनशील होते हैं।

आहार अन्वेषण की कठिनाई तथा शीत और तुफानी मौसम से बचने के लिये उत्तरी गोलार्द्ध के लाखों पक्षी हजारो मील की यात्रा करके दक्षिण गोलार्द्ध के गर्म देशों में पहुंच जाते हैं। खंजन पक्षी भी भारत में केवल शीत काल में ही रहता है। चिड़ियों का रज-स्नान वर्षा का सूचक होता है। सारस और चक्रवाक गीष्म के प्रारंभ में उत्तरी प्रदेशों में चले जाते हैं।

ज्यों-ज्यों इस निमित्त (Shakun Apshakun) शास्त्र की ओर सर्व साधारण की रूचि जागृत हुई त्यों-त्यों शुभाशुभ सूचक शकुनों के साथ पशुओं की चेष्टाओं तथा शब्दों की शुभाशुभता का संकलन भी होता चला गया।

इस प्रकार उत्तरोत्तर संकलनों में बादल, वायु, विद्युत, उल्कापात, गान्धर्वनगर, ग्रहण आदि आन्तरिक्ष; अंगस्फुरण, पल्लीपतन, छींक विचार आदि कायिक और श्रृगाल, श्वान, सिंह, मार्जार आदि श्वापद; हाथी, ऊँट, वृषभ, गाय, भैंस आदि चतुष्पद; सर्प, नकुल, मूषक आदि सरिसृप; भुजगादि सरिसृप जन्तुओं की चेष्टाओं तथा शब्दों का शुभाशुभ भी जोड़ दिया गया होगा।

शकुन विद्या (Shakun Apshakun) विशारदों का यह अनुभव है कि, शुभाशुभ कार्यों के विपाक से प्रतिक्षण प्रत्येक मानव जो शुभाशुभ फल भोगते हैं, वे शकुन द्वारा पहले जाने जा सकते हैं।

तत् पश्चात् धार्मिक अनुष्ठानों से अशुभ का प्रतिकार और शुभ का परिश्कार कर सुख सम्पत्ति से समृद्ध हो सकते हैं। विपत्ति से बचने की और सम्पत्ति प्राप्त करने की कामना सांसारिक जीवों को सर्वदा रही है। सभी प्राणी सुख के इच्छुक देखे गये हैं, किन्तु किसी को दुःख का इच्छुक कभी नहीं देखा गया।

इसलिये शकुन विद्या (Shakun Apshakun) का अतीत में जितना महत्व था, वर्तमान में भी इसका इतना ही महत्व हैं। शकुन विद्या आज भी प्रकाश स्तम्भ बनी हुई है। आधुनिक जीवन में भी यदि इसका उपयोग किया जाये तो सुख-दुःख का ज्ञान अविलम्ब एवं स्पष्ट हो सकता है।

पक्षियों की पहचान और उनकी ध्वनियों का विज्ञान कुशाग्र बुद्धि के अतिरिक्त कौन प्राप्त कर सकता है? अंग चेष्टाओं का विश्लेषण करके शुभाशुभ भविष्य का क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त करने की यदि इच्छा हो तो, मनुष्य को इस विद्या का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त हो सकता है।

शकुन विद्या का प्रचार-प्रसार शिक्षित वर्ण की अपेक्षा अशिक्षित लोगों में अधिक पाया जाता है। जंगलों में रहने वाले भील मेना, कंजर, वागरी, नायक, बावरी, सांसी आदि अनेक लोग इस शकुन विद्या के जानकार होते हैं। यह ज्ञान उन्हें अपने पूर्वजों की परम्परा से प्राप्त होता रहा है। अनपढ़ होने के कारण अपने ज्ञान को लिपिबद्ध करने में वे अब तक भी असमर्थ रहे हैं। इसलिये यह ज्ञान शनैः क्षीण होता जा रहा है।

शिक्षित वर्ग से यह ज्ञान अशिक्षित वर्ग में कैसे पहुंचेगा? यह प्रश्न है। इसका समाधान यह है कि जिस प्रकार इस विद्या (Shakun Apshakun Shastra) के महान् आचार्यों का निवास अतीत में प्रायः तपोवनों में था। वहां वनवासी जातियों के बाल, वृद्ध, युवा, स्त्री पुरूषों को उन महान् पुरूषों की सेवा व सत्संग का लाभ मिलता रहता था।

पक्षियों की ध्वनियों का श्रवण व उनका विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करना वनवासियों के लिये जितना सरल व सुगम हो सकता है, उतना ग्राम व नगर में भी। जिन का शकुन ज्ञान महान् चमत्कार पूर्ण है, वे अशुभ शकुन देख कर भावी विगत्तियों से सावधान हो जाते हैं, और सुरक्षा के लिये हर संभव प्रयत्न करके सफलता प्राप्त कर लेते हैं, और शुभ शकुन देखकर अपने इष्ट कार्य में सफलता प्राप्त कर लेते हैं, तथा वे जीवन सुखमय बनाने में संलग्न रहते हैं।

शकुनों (Shakun Apshakun) की वैज्ञानिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण भूकंप उत्पात के सम्बंध में उद्धृत ये पंक्तियां हैं- प्रतिवर्ष विश्व के किसी न किसी कोने में भीषण उत्पात की संभावना रहती है। अभी तक न कोई ऐसा यंत्र आविष्कृत हुआ है, और न ही किसी ऐसी विधि का पता चला है कि भूकम्प की पूर्व सूचना दे सके।

अनेक भूकम्पीय घटनाओं से एक मनोरंजक बात का पता लगा है कि पशुओं को इन दैवी आपत्तियों की पूर्व सूचना मिल जाती है, तथा वे सबको सावधान करने का प्रयत्न करते हैं। समुद्र का पानी भयंकर गति से जब चढ़ता है तो, उसके एक दिन पहले सीगाल नामक पक्षी सुरक्षित स्थल पर चले जाते हैं।

तथा अनेक मामलों में देखा गया कि भयंकर भूकम्प के समय कुत्ते भौंकते हुये, बिल्लियां और गायें इतनी जोर से चिल्लाये कि सारा नगर जाग गया, तथा उसके कुछ क्षणों बाद भूचाल आया, इस लिये शकुन विद्या को अवैज्ञानिक या अविश्वस्त मानना या कहना कोई बुद्धिमत्ता नहीं हैं।

जिस प्रकार गणित की सूक्ष्म प्रक्रिया में सामान्य भूल होने पर आधुनिक यंत्रों का निर्माण एवं उनकी कार्य प्रणाली यथेष्ट नहीं हो पाती है, उसी प्रकार शुभाशुभ शकुनों (Shakun Apshakun) के फलादेशों में कभी-कभी जो वैपरीत्य दिखाई देता है, उसका एकमात्र कारण यह है कि हमारा निमित्त ज्ञान परिपूर्ण नहीं है।

अतः दृष्ट तथा श्रृत शुभाशुभ शकुनों (Shakun Apshakun) के अनुसन्धानों में रही हुई त्रुटियों का हमें बोध नहीं हो पाता। इसलिये फलादेश हमें विपरीत मालुम देता है। यह सत्य है, किन्तु हम अपने अज्ञान का दोष विद्या पर मढ़ कर उस विद्या को अवैज्ञानिक या अस्तित्वहीन कहें यह अनुचित है। श्रीमद्भागवत का शकुनशास्त्र से विशेष परिचय जान पड़ता है।

उसमें उत्पातों के तीन भेद बतलाए गये है। वे भेद दिव्य, भौम तथा आन्तरिक्ष उत्पात के रूप में हैं। ये अपने-अपने क्षेत्र में घटित होने के कारण इन नामों से अभिहित किये गये है। (श्री. भा. 3. 17. 3; 11. 30. 4) एक अन्य स्थल में उत्पातों के तीन भेदों में अन्तरिक्ष के स्थान पर दैहिक की गणना की गई है (श्री. भा. 1. 14. 10)।

अर्जुन के द्धारका से नहीं लौटने पर युधिष्ठिर ने घोर रूप वाले विविध अपशकुनों को देखा। काल की गति रौद्र हो गयी थी। प्रकृति में ऋतु के विपरीत लक्षण दीखने लगे थे। अतिशय भय कारक निमित्तों को देख कर युधिष्ठर को मनुष्यों के प्रलयकाल की आशंका होने लगी थी (श्री. भा. 1. 14. 2-5) । उन्होंने भीम को उन दिव्य, भौम और दैहिक उत्पातों की ओर संकेत किया। बुद्धि को मोहित करने वाले उत्पातों को देखकर आने वाले अनर्थ को वे जान गये थे।

उनकी जंघा, आँखे एवं बाहु बार-बार फड़कने लगे। हृदय में कम्पन होने लगा। अग्नि के समान लाल मुख वाली शिवा (मियारनी) उगते हुये सूर्य की और मुख करके रोने लगी। कुत्ते निडर होकर उनकी ओर मुख करके रो रहे थे। अच्छे पशु बाँयी ओर से तथा बुरे पशु दहिनी ओर से गुजरने लगे। वाहन के पशु हाथी घोडे आदि रोने लगे।

मृत्युदूत पेडुखी, उल्लू और कौये रात को कठोर शब्द करने लगे। दिशाएं धुंधली हो गयी थी। सूर्य और चन्द्र की चारों और बार-बार परिवेष मण्डल लगने लगे थे। पृथ्वी एवं पर्वतों में कम्पन होने लगे। बादल जोर-जोर से गरजने लगे। यत्र-तत्र विजली गिरने लगी। शरीर को छेदने वाली तथा धूल से अन्धकार फैलाने वाली आंधी चलने लगी।

बादलों में भयानक दृश्य बनने लगे, और उनसे शोणित की वर्षा होने लगी। आकाश में ग्रह-युद्ध होने लगे। दिशाओं में दाह होने लगे। नदी, नद, तालाब और लोगों के मन क्षुब्ध हो गये। घी से भी आग नहीं जलती थी। बछड़ों ने दूध पीना छोड दिया। गौयें दूहने नहीं देती थीं।

गोशाला में गौंयें रो रही थीं। बैल सब उदास थे। देवताओं की मूर्तियाँ रोने लगी थीं। उनसे पसीना चूने लगा था। उनमें कम्पन भी होने लगा। देश, गाँव, शहर, बगीचे, धर्मशालायें और आश्रम शोभाहीन और आनन्दरहित लगने लगे (श्री. भा. 1. 14. 10-21)।

इसी प्रकार हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के जन्म के समय विविध उत्पातों (Shakun Apshakun) के घटित होने का उल्लेख भी है। इस समय तीनों प्रकार के उत्पात हुये। पृथ्वी एवं पर्वत में कम्पन, उल्कापात वज्रपात और धूमकेतु के उदय होने लग गये। भयानक शब्द के साथ वृक्षों को उखाड़ने वाली विकट एवं असह्म आंधी आयी।

धूलों से सम्पूर्ण पृथ्वी एवं आकाश व्याप्त हो गये। बिजली की चमक भयानक हो गयी थी। मेघों की सधन घटाओं से सूर्य-चन्द्र लुप्त हो गये और अंधकार छा गया। समुद्र मे दुःखी मनुष्य की तरह कोलाहल होने लगा। उसमें ऊंची तरंगें उडने लगीं। समुद्री जीवों में हलचल मच गयी। नदियों तथा तालाबों मे भी खलबली मच गयी।

अनेक कमल सूख गये। सूर्य चन्द्र के बारबार ग्रहण होने गले। उनके आमंगल सूचक परिवेष भी लगने लगे। बिना बादलों के गर्जना सुनायी देने लगी। गुफाओं में रथ की आवाज-सी सुनाई देने लगी। गांवों में गीदड़ और उल्लुओं के भयानक शब्द के साथ गीदड़नियां मुख से आग उगल कर अमगंल शब्द करने लगीं।

कुत्ते गरदन ऊपर उठाकर कभी गाने तथा कभी रोने का शब्द करने लगे। झुण्ड के झुण्ड गधे पृथ्वी खोदते और कठोर शब्दों के साथ रेंगते हुये इधर-उधर दौडने गले। पक्षीगण गधों के शब्द से डर कर घोसलों को छोडकर रोने-चिल्लाने लगे। बंधे और बन में चरते पशु डर कर मलमूत्र त्यागने लगे।

गौयें ऐसी डर गयीं कि दूहने पर उनके थन से खून निकलने लगा। बादलों से पीब की वर्षा होने लगी। देवमूर्तियाँ रोने लगीं। तथा बिना वायु के ही वृक्ष हिलने लगे। शनि, राहु आदि क्रूर ग्रह प्रबल होकर चन्द्र बृहस्पति आदि सौम्य ग्रहों तथा अनेक नक्षत्रों का अतिक्रमण कर वक्रगति हो गये। ग्रहों के युद्ध होने लगें। इन उत्पातों को देखकर सनक आदि ऋषियों को छोडकर शेष सभी जीव भयभीत हो गये (श्री. भा. 3. 17. 3-15)।

हिरण्यकशिपु की तपस्या के समय भी ऐसे ही उत्पात हुए थे। ग्रह और तारे टूट-टूट कर गिरने लगे थे। तथा दिग्दाह होने लगे थे। (श्री. भा. 7. 3. 5) इस प्रकार श्रीमद्भागवत में दित्य, भौम, एवं आन्तरिक्ष एवं दैहिक उत्पातों का विशद वर्णन मिलता है।

कंस की मृत्यु निकट आने पर उसने जो अशुभ निमित्त देखे उनका विशद वर्णन भी श्री मदूभागवत में प्राप्त होता है- जाग्रित अवस्था में कंस को जल या दर्पण में छापा पड़ने पर भी शिर नहीं दीखता था। चन्द्र तारे, सूर्य एवं दीप दो-दो दिखाई पड़ते थे। अपनी छाया में छेद दीखता था।

कानों में अंगुली डालकर सुनने पर प्राणों का धूं-धूं शब्द नहीं सुनाई पड़ता था। वृक्ष सुनहरे प्रतीत होते थे। घूल आदि में चलने पर अपने पैरों के चिह्न नहीं दीखते थे। वह स्वप्न में प्रेतों से लिपटता था। गधे की सवारी करता था। विष का भक्षण करता था। अड़हुल की माला पहनता था। तेल की मालिश करता था और नंगे शरीर होकर यात्रा करता था। इन अपशकुनों (Shakun Apshakun) को देख कर कंस अपनी निकट मृत्यु के आभास से भयभीत हो गया था। (श्री. भा. 10. 42. 28-30)।

Depawli Muhurat 2018

2015 Diwali Muhurat

दीपावली के दिन महालक्ष्मी पूजन कब करें, Depawli Muhurat 2018 :-

Dr.R.B.Dhawan (Top best Astrologer in Delhi)

सनातन मान्यता के अनुसार एश्वर्यवाली जीवन यापन एवं सफलता व उन्नति, सुख-समृद्धि के लिये शास्त्रों में महालक्ष्मी को प्रसन्न करने का विधान बताया गया है, महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए दीपावली से शुभ दूसरा कोई मुहुर्त muhurat नहीं है। इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन निशीथ काल और महानिशीथ काल, स्थिर लग्न, शुभ चौघड़िया के दुर्लभ तथा सिद्ध मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन करके कोई भी साधक दुर्लभ देवी शक्तियों का आशिर्वाद प्राप्त कर सकता है।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस इस वर्ष 2018 में वृष एवं सिंह (स्थिर लग्न ) के मुहूर्त में महालक्ष्मी दीपावली पूजा मुहूर्त Diwali Muhurat में महालक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व है, इस दिन कि विशेषता यह है कि इस दिन वातावरण में अलौकिक सकारात्मक तथा समृद्धि प्रदान करने वाली ऊर्जा बहुतायत मात्रा में उपस्थित होगी। इस शुभ समय में महालक्ष्मी की पूजा करके कोई भी मनुष्य सर्व भौतिक सुखों का साक्षात्कार कर सकता है। यह रहस्य हर कोई नहीं जानता।

इस वर्ष “आप का भविष्य” के पाठकों के लिए महालक्ष्मी पूजा के विशेष महूर्त की गणना की है, इसी मुहूर्त में समृद्धि प्रदान करने वाले अनेक यंत्रों का निर्माण और अनेक यंत्रों की प्राण-प्रतिष्ठा भी करने का निश्चय किया गया है। (यह दीपावली पर सिद्ध यंत्र आप दीपावली से पूर्व Shukracharya संस्थान में बुक करवा सकते हैं)

दीपावली (महालक्ष्मी) पूजन मुहूर्त 2018

महालक्ष्मी का पूजन केवल स्थिर लग्न में ही सम्पन्न किया जाना चाहिये, क्योंकि हर एक मनुष्य की यही इच्छा होती है कि, लक्ष्मी को स्थिर रखना है। इस वर्ष अमावस्या की रात्रि को वृष और सिंह मात्र दो ही स्थिर लग्न हैं, अतः इन लग्न-मुहूर्त में ही लक्ष्मी पूजन सम्पन्न होना चाहिये।

श्री महालक्ष्मी पूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल से आधी रात तक रहने वाली अमावस श्रेष्ठ होती है। यदि अर्धरात्रि काल में अमावस्या तिथि का आभाव हो, तो प्रदोषकाल में ही दीप प्रज्वलन, महालक्ष्मी पूजन, श्रीगणेश एवं कुबेर आदि पूजन करने का विधान है।

प्रदोषे दीपदानए लक्ष्मी पूजनादि विहितम्।
कार्तिक कृष्ण पक्षे च प्रदोषे भूतदर्शर्योः,
नरः प्रदोष समये दीपदान् दद्यात् मनोरमान्।।

इस वर्ष 2018 ई. कार्तिक अमावस 7 नवम्बर, बुधवार को प्रदोष व्यापिनी तथा रात्रि 21:22 तक निशीथ व्यापिनी होने से दीपावली पर्व इसी दिन होगा। इस वर्ष दीपावली स्वाती तथा विशाखा नक्षत्र आयुष्मान तथा सौभाग्य योग एवं तुला के चन्द्रमा के समय होगी।

सांयकाल सूर्यास्त (प्रदोषकाल प्रारम्भ) के बाद मेष व वृष लग्न एवं स्वाती नक्षत्र विद्यमान होने से यह समयावधि श्रीगणेश, महालक्ष्मी पूजन आदि आरम्भ करने के लिये विशेष रूप से शुभ रहेगी। बही खातों एवं नवीन शुभ कार्यों के लिये भी यह मुहूर्त अत्यंत शुभ होगा। इस वर्ष बुधवार की दीपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रूप से शुभ मानी जायेगी। लक्ष्मीपूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल ही विशेषतया प्रशस्त माना गया है-

कार्तिके प्रदोषे तु विशेषण अमावस्या निशावर्धके।
तस्यां सम्पूज्येत् देवी भोगमोक्ष प्रदायिनीम्।।

दीपावली के दिन घर में प्रदोषकाल से महालक्ष्मी पूजन प्रारम्भ करके अर्धरात्रि तक जप अनुष्ठानादि करने का विशेष महात्मय होता है। प्रदोषकाल से कुछ समय पहले स्नानादि उपरांत धर्मस्थल पर मंत्रपूर्वक दीपदान करके अपने निवास स्थान पर श्रीगणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर पूजनादि करके अल्पाहार करना चाहिये। तदुपरांत यथोपलब्ध निशीथादि शुभ मुहूर्त में मंत्र-जप, यंत्र-सिद्धि आदि अनुष्ठान सम्पादित करने चाहियें।
दीपावली वास्तव में पांच पर्वों का महोत्सव है, जिसका आरम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) से लेकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई-दूज) तक रहती है। दीपावली के पर्व पर धन की भरपूर प्राप्ति के लिये धन की अधिष्ठात्री भगवती लक्ष्मी का समारोह पूर्वक आवाहन, षोडशोपचार सहित पूजन किया जाता है। आगे दिये गये निर्दिष्ट शुभ मुहूर्तों में किसी पवित्र स्थान पर आटा, हल्दी, अक्षत एवं पुष्पादि से अष्टदल कमल बनाकर श्रीलक्ष्मी का आवाहन एवं स्थापन करके देवों की विधिवत् पूजा अर्चना करनी चाहिये।

आवाहन का मंत्र-
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्र्रां ज्वलंती तृप्तां तर्पयंतीम।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप हव्ये श्रियम्। (श्रीसूक्तम्)।

पूजा मंत्र-
ॐ गं गणपतये नमः।। लक्ष्म्यै नमः।। नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात्।। से लक्ष्मी की, एरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नमः। अग्रलिखित मंत्र से इन्द्र की और कुबेर की निम्न मंत्र से पूजा करें- कुबेराय नमःए धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्मधिपाय च। भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादि सम्पदः।।
पूजन सामग्री में विभिन्न प्रकार की मिठाई, फल पुष्पादि, धूप, दीपादि सुगंधित वस्तुयें सम्मलित करनी चाहियें। दीपावली पूजन में प्रदोष, निशीथ एवं महानिशीथ काल के अतिरिक्त चैघड़िया मुहूर्त भी पूजन, बही-खाता पूजन, कुबेर पूजा, जपादि अनुष्ठान की दृष्टि से विशेष प्रशस्त एवं शुभ माने जाते हैं।

प्रदोषकाल-
7 नवम्बर 2018 को दिल्ली एवं निकटवर्ती नगरों में सूर्यास्त 17:30 से 02 घ. 41 मि. के लिये 20:11 तक प्रदोषकाल रहेगा। सांय 17:57 तक मेष (चर) लग्न तथा सांय 17:57 से 19:52 तक वृष (स्थिर) लग्न विशेष रहेगा। प्रदोषकाल में मेष व वृष लग्न स्वाती नक्षत्र 19:37 तक तथा तुला का चन्द्रमा होने से महालक्ष्मी पूजानादि के लिये शुभ समय होगा। प्रदोषकाल में ही 19:00 से 20:41 तक शुभ की चौघड़ियां रहने से इस योग में दीपदान, महालक्ष्मी, गणेश-कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन, धर्मस्थल एवं घर पर दीप प्रज्वलित करना, ब्राह्मणों तथा आश्रितों को भेंट, मिठाई बांटना शुभ होगा।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़ियां मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चैघडिया
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चैघड़िया पूजन में होनी चाहियें।

निशीथ काल- 7 नवम्बर 2018 को दिल्ली व समीपस्थ नगरों में निशीथकाल रात्रि 20:01 से 22:41 तक रहेगा। इसी निशीथकाल में 19:43 से 21:57 तक मिथुन लग्न मध्यम मुहूर्तए तदुपरांत कर्क लग्न विशेष प्रशस्थ रहेगा। 19:00 से 20:41 तक शुभ की चैघडिया भी शुभ रहेगी। तदुपरांत अमृत की चैघडिया 20:41 से 22:22 तक भी शुभ रहेगी। इस अवधि तक पूजन समाप्त कर श्रीसूक्त, कनकधारा स्त्रोत्र तथा लक्ष्मी स्त्रोत्रादि का जप पाठ करना चाहिये।

महानिशीथ काल- रात्रि 22:41 से 24:20 तक महानिशीथ काल रहेगा। इस अवधि में 21:57 से 24:20 तक कर्क लग्न तदुपरांत सिंह लग्न विशेष शुभ रहेगा। 22:22 से 24:02 तक चर की चौघड़ियां भी शुभ, परंतु तदुपरांत रोग की चौघड़ियां अशुभ रहेगी। इस लिये 24:02 तक श्री गणेश-लक्ष्मी पूजन अवश्य कर लेना चाहिये। महानिशीथ काल में श्री महालक्ष्मी, काली उपासना, यंत्र मंत्र तंत्रादि की क्रियायें व काम्य प्रयोग, तंत्रानुष्ठान, साधनायें एवं यज्ञादि किये जाते हैं।

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श्रीयंत्र की साधना | Shri Yantra for Money

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श्रीयंत्र की साधना (Shri Yantra for Money)

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मानव जीवन का संचालन धन के बिना संभव नहीं हैं, मनुष्य को अपनी आवश्यकता पूर्ति हेतु पग-पग पर धन की आवश्यकता पड़ती हैं दरिद्रता को सबसे बड़ा अभिशाप माना गया है। यदि धन न हो तो जीवन नरक तुल्य बन जाता है। ऐसे व्यक्ति को भाई-बंधु, मित्रा, रिश्तेदार सब छोड़ देते हैं। व्यक्ति को कितना धन मिलेगा, वह कैसा जीवन जियेगा यह सब उसके पूर्व जन्म कर्मानुसार माँ के गर्भ में ही तय हो जाता है-
आयु कर्म वित च विद्या निधनमेव च।
प चैतानि सृजयन्ते गर्भस्थयैव देहिनः।।

पूर्वजन्मदुष्कर्मानुसार ही व्यक्ति की कुंडली में केमद्रुम, हृद योग, काक योग, दरिद्र योग, हुताशन योग, रेका योग, शकट योग, ऋण योग, मृति योग, दुर्याेग, निर्भाग्य योग, निःस्व योग एवं ऋण ग्रस्त योग आदि अशुभ योग आते हैं। ये योग व्यक्ति के जीवन को धन एवं ऐश्वर्यहीन बनाते हैं। इन कुयोगों को दूर करने हेतु हमें जप, पूजा, अनुष्ठान एवं यंत्र-मंत्र-तंत्रादि का सहारा लेना पड़ता हैं। इन कुयोगों को दूर कर व्यक्ति को धन एवेश्वर्य देने वाले यंत्र राज श्री यंत्र(shri yantra) की महत्ता प्रस्तुत हैं। यंत्र मंत्र मय हैं जिस प्रकार आत्मा और शरीर में भेद नहीं होता उसी प्रकार यंत्र एवं देवता में कोई भेद नहीं होता है। यंत्रादेवता का निवास स्थान माना गया है-
यन्त्रमन्त्रमयं प्रोक्तं मंत्रात्मा देवतैवहि। देहात्मनोर्यथा भेदो यन्त्र देवयोस्तथा।

यंत्र और मंत्र मिलकर शीघ्र फलदायी होते हैं। मंत्रों में शक्ति शब्दों में निहित होती है, वहीं यह शक्ति यंत्रों के रेखा एवं बिन्दुओं में रहती है। श्री यंत्र में लक्ष्मी का निवास रहता है। इस यंत्र की रचना के बारे में कहा गया है-
बिंदुत्रिकोण वसुकोण दशारयुग्म, मन्वस्व नागदल षोडसपंचयुक्तम्।
वृत्तत्रायं च धरणी सदनत्रायं च, श्री चक्रमेतदुदितं परदेवतायाः।।

अर्थात् श्री यंत्र बिंदु, त्रिकोण, वसुकोण, दशारयुग्म, चतुर्दशार, अष्टदल, षोडसार, तीनवृत तथा भूपुर से निर्मित है। इसमें चार ऊपर मुख वाले त्रिकोण शिव त्रिकोण, पाँच नीचे मुख वाले शक्ति त्रिकोण होते हैं। इस तरह त्रिकोण, अष्टकोण, दो दशार, पाँच शक्ति तथा बिंदु, अष्टकमल षोडस दल कमल तथा चतुरस्र हैं। ये इसकी कृपा से व्यक्ति को अष्टसिद्धि एवं नौ विधियों की कृपा प्राप्त होती है। इस यंत्र के पूजन अनुष्ठान से व्यक्ति को दश महाविद्याओं की भी कृपा प्राप्त होती हैं-
काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी, भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या घुमावती तथा।
मातंगी सिद्ध विद्या च कथिता बगलामुखी, एतादश महाविद्या सर्वतंत्रोषु गोपिता।।

काली, तारा, शोडषी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, मातंगी, कमला और बगलामुखी ये दश महाविद्यायें हैं।

श्री यंत्र(shri yantra) का निर्माण स्वर्ण, चाँदी, स्फटिक, भोजपत्र आदि पर किया जाता है। भोज पत्र पर निर्मित यंत्र साधारण फलदायी रहता हैं। यह ताम्र पत्र पर श्रेष्ठ, चाँदी पर श्रेष्ठता तथा स्वर्ण पर निर्मित होने पर श्रेष्ठतम फल देता है। स्फटिक एवं मणि आदि पर निर्मित श्री यंत्र(sphatik shri yantra) भी अत्यंत शुभ फलप्रद रहता हैं। विभिन्न प्रसिद्ध तीर्थस्थलों पर स्थापित इन यंत्रों की महिमा सर्वविदित हैं। तिरूपति के बालाजी मंदिर में स्थापित श्री यंत्र (षोडश यंत्र), जगन्नाथ जी के मंदिर में भैरवी चक्र तथा श्री नाम मंदिर में सुदर्शन चक्र स्थापित हैं, जो यंत्रो की महत्ता का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इन तीर्थ स्थलों पर अपार संपत्ति है। विभिन्न तांत्रिक गंथों में श्री यंत्र की महिमा को अपार बताया गया है। इसमें सभी देवी देवताओं का निवास बताया गया है। यंत्र का निर्माण शुभ मुहुर्त जैसे- सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, रविपुष्य, गुरू पुष्य योग, चारों नवरात्र, दीपावली, शिवरात्रि आदि दिनों में किया जाना चाहिये या कराया जाना चाहिये। यह कार्य जटिल एवं श्रमसाध्य हैं। हर कोई इस कार्य को नहीं कर सकता है। कर्मकांड जानने वाले विद्वान पंडितों से यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा करवा लेना चाहिये। प्राण प्रतिष्ठा युक्त यंत्र शीघ्र फलदायी होते हैं। यदि ऐसा कराया जाना संभव न हो तो किसी विश्वसनीय प्रतिष्ठान, संस्थान से प्राण प्रतिष्ठा युक्त यंत्र प्राप्त कर अपनी पूजा में शुभ मुहूर्त में किसी पंडित से अनुष्ठान पूर्वक स्थापित करा लेना चाहिये। फिर प्रतिदिन पवित्र होकर इस यंत्र की पूजा करनी चाहिये, पवित्रता का ध्यान रखना अत्यावाश्यक हैं। यथा-देवोभूत्वा यजे देवं ना देवो देवमर्चयेत्। देवार्चा योग्यता प्राप्त्यैभूतिशुद्धि समाचरेत्।। इस यंत्र की प्रतिदिन पूजा करें तथा श्री सूक्त के 12 पाठ करें एवं निम्नलिखित लक्ष्मी मंत्रों में से किसी एक मंत्र का नियमित एक माला जप करने मात्र से ही धन संकट दूर होता है। व्यक्ति संपन्न एवं ऐश्वर्यशाली बन जाता है, जप के लिये ‘‘माला कमल गट्टे’’ की श्रेष्ठ है। रूद्राक्ष की माला का भी उपयोग किया जा सकता है। इस साधना से लक्ष्मी जी के साथ सभी देवी देवताओं की कृपा बनी रहती है। लेकिन व्यक्ति को सदाचरण नहीं छोड़ना चाहिये। चरित्र बल बनाये रखना एवं मांस मदिरा से दूर रहना चाहिये। यंत्र, मंत्र, तंत्र, देवी, देवता, यज्ञ, औषधि, तीर्थ, एवं गुरू में श्रद्धा अनिवार्य शर्त है, तभी ये चीजें फलदायी होती हैं। श्री यंत्र में तो इतना आकर्षण है कि, इसका दर्शन मात्र ही लाभ दे देता हैं।

मंत्र:-
(1) ऊँ श्रीं हृीं श्रीं कमले कमलालेय प्रसीद प्रसीद श्रीं हृीं ऊँ महालक्ष्मयै नमः।
(2) ऊँ हृीं श्रीं लक्ष्मीं महालक्ष्मी सर्वकामप्रदे सर्व-सौभाग्यदायिनी अभिमत्ं प्रयच्छ सर्वसर्वगत सुरूपे सर्वदुर्जयविमोचनी हृीं सः स्वाहा।
(3) ऊँ महालक्ष्मर्य च विद्महे विष्णु पत्नीम् च धीमहि तन्नों लक्ष्मी प्रचोदयात्।
(4) ऊँ श्रीं हृीं क्लीं श्रीं लक्ष्मी रागच्छागच्छमममन्दिरे तिष्ठ स्वाहा।
(5) ऊँ श्रीं दृीं श्रीं नमः।
(6) ऊँ दृीं श्रीं लक्ष्मी दुर्भाग्यनाशिनी सौभाग्यप्रदायिनी श्रीं हृीं ऊँ।
(7) ऐं दृीं श्रीं क्लीं सौं जगत्प्रसूत्यै नमः।
(8) ऊँ नमः कमलवासिन्यै स्वाहा।
(9) ऊँ श्री हृीं जयलक्ष्मी प्रियाय नित्यप्रदितचेत से लक्ष्मी सिद्धां देहाय श्रीं हृीं नमः।

संतान प्राप्ति मंत्र | Santaan Prapti Mantra – दीपावली विशेष साधना

जब जन्म कुण्डली में संतानोत्पत्ति योग न हो, अथवा अनेक बार गर्भ हानि होती रहे, या संतान दीघार्यु नहीं होती हो तो, उसके लिये यह प्रयोग महत्वपूर्ण है। इस साधना प्रयोग को दीपावली की रात्रि में संतान की इच्छा करने वाली महिला के संपन्न करने से संतान का योग प्रबल होकर संतानोत्पत्ति का योग बनता है। और वह संतान आज्ञाकारी होती है। इस प्रकार के प्रयोग से गृहस्थ जीवन अनुकूल एवं सुखदायक बन जाता है।

साधना विधि– साधिक को चाहिये कि वह दीपावली की रात्रि में स्नानादि कर पीले वस्त्र धारण कर पूर्व की तरफ मुख कर के पीले आसन पर बैठ जाये, सामने लकड़ी के तख्ते पर एक थाली में चावल से त्रिकोण बनाकर उसके मध्य में मोती पर बने अभिमंत्रित मुक्ता गणपति की स्थापना करें, और फिर पंचोपचार (फूल, चावल, रोली, कलावा तथा धूप-दीप) से पूजा करके पुत्रजीवा की 108 दानों वाली माला से 21 माला अग्रलिखित मंत्र जप पूर्ण करें।

यही प्रयोग प्रत्येक माह गर्भवती होने तक संतान की इच्छा रखने वाली महिला को दोहराना चाहिये। निश्चय ही उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। यही प्रयोग उस महिला का पति भी सम्पन्न कर सकता है, या घर का कोई अन्य सदस्य भी कर सकता है, परंतु उसको उस महिला के नाम का पहले संकल्प अवश्य लेना होगा। यदि कोई साधक-साधिका किसी दूसरे के लिये प्रयोग करना चाहे तो संकल्प ले लें कि ‘मैं यह प्रयोग अमुक व्यक्ति के लिये संपन्न कर रहा हूँ।

Santaan prapti mantra मंत्र – ऊँ नमो नारायणाय पुत्र सन्तानं देही देहि ठः ठः स्वाहा।

जप पूर्ण होने पर गणपति जी को मिष्ठान का भोग लगवाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें। वह माला जल में विसर्जित कर दें। मुक्ता गणपति का लॉकेट महिला को गले में धारण करना होगा।

साधना सामग्री – अभिमंत्रित मुक्ता गणपति (मोती पर बने गणपति), 108 दाने की पुत्रजीवा माला (putrajeeva mala)

न्यौछावर राषि – रू. 2000 रू

संपर्क – Shukracharya Delhi, 09810143516

Shivpuran & Rudraksha – शिवपुराण में रूद्राक्ष

14 Mukhi Rudraksha

रूद्राक्षोपनिषद्वैद्यं महा्रयद्रत्योज्ज्वलम्।
प्रतियोगिविनिर्मुक्तं शिवमात्रपदं भजे।।

‘रूद्राक्ष-उपनिषद् से जानने योग्य, महारूद्ररूप से उज्जवल, प्रतियोगीरहित, शिवषदवाच्य तत्त्व की मैं शरण लेता हूँ। हरिः ओम्।
भुसुण्ड नाम के ऋषि ने कालाग्निरूद्र से पूछा कि, ‘रूद्राक्ष की उत्पत्ति किस प्रकार हुई तथा उसके धारण करने से क्या फल मिलता है – इसे आप लोकहित के लिए कृपा करके कहिये।’ कालाग्निरूद्र भगवान् ने कहा कि ‘त्रिपुरासुर नामक दैत्य का नाश करने के लिये मैंने नेत्रों को बंद कर लिया था। उस समय मेरी आंखों में से जल के बिन्दु पृथ्वी पर गिरे और वही रूद्राक्ष रूप में परिणत हो गये। सर्वलोक के अनुग्रह के लिये मैं यह बतलाता हूँ कि उनके नामोच्चारण मात्र से गो-दान का फल, और दर्शन तथा स्पर्श से दुगुने फल प्राप्त होता है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता।’ इस संबंध में नीचे लिखी उक्ति है-
भुसुण्ड ऋषि ने पूछा कि ‘वह रूद्राक्ष कहाँ स्थित है, उसका क्या नाम है, वह किस प्रकार मनुष्यों के द्वारा धारण किया जाता है, कितने प्रकार के इसके मुख हैं और किन मन्त्रों से इसे धारण किया जाता है- आदि सब बातें कृपा करके कहिये।’

14 Mukhi Rudraksha
14 Mukhi Rudraksha

श्रीकालाग्निरूद्र बोले – ‘देवताओं के हजारों वर्षों तक मैने अपनी आँखे खुली रखीं। उस समय मेरी आँखों से जल की बूंदें पृथ्वी पर गिर पड़ी। वे आंसू की बूंदे भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने के लिये स्थावरत्व को प्राप्तकर महारूद्राक्ष नामक वृक्ष हो गये। रूद्राक्ष धारण करने से भक्तों के रात-दिन के पाप नष्ट होते हैं, उसका दर्शन करने से लाखों गुना पुण्य मिलता है। जो मनुष्य रूद्राक्ष धारण कर रूद्राक्ष की माला से इष्टदेव का जप करता है उसे अनन्तगुने पुण्य की प्राप्ति होती है। आंवले के फल के समान आकार वाला रूद्राक्ष उत्तम होता है, बेर के समान आकार वाला मध्यम और चने के समान आकार वाला कनिष्ठ होता है। अब उसके धारण करने की प्रक्रिया कहता हूँ सुनो। श्रीशंकर भगवान् की आज्ञा से पथ्वी पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र चार जाति के रूद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए। प्रत्येक जाति के मनुष्य को अपनी-अपनी जाति के रूद्राक्ष ही फलदायक होते हैं। श्वेत रूद्राक्ष को ब्राह्मण, लाल को क्षत्रिय, पीले को वैश्य और काले को शुद्र जानना चाहिये और ब्राह्मण को श्वेत रूद्राक्ष धारण करना चाहिये, क्षत्रिय को लाल, वैश्य को पीला और शुद्र को काला रूद्राक्ष पहनना चाहिये। आकार में एक समान, चिकने, पक्के (मजबूत) मोटे तथा कांटोंवाले रूद्राक्ष के दाने शुभ होते हैं। कीड़ा लगे हुए, टूटे-फूटे, बिना कांटों के, छिद्रयुक्त तथा बिना जुड़े हुए- इन छः प्रकार के रूद्राक्षों का त्याग करना चाहिये। जिस रूद्राक्ष में स्वयंमेव बना हुआ छिद्र किया हुआ हो उसे मध्यम जानना चाहिये। शास्त्र में लिखे अनुसार एक समान, चिकने, पक्के एवं मोटे दानों को रेशम के धागे में पिरोकर शरीर के तत्तद् अवयव में धारण करें। जिस रूद्राक्ष की माला कसौटी के पत्थर सुवर्ण की रेखा के समान जान पड़े वह रूद्राक्ष उत्तम है, ऐसे रूद्राक्ष को शिव-भक्त धारण करें। शिखा में एक रूद्राक्ष, सिर पर तीस, गले में छत्तीस, दोनो बाहुओं में सोलह, कलाई में बारह और कन्धे पर पचास दाने धारण करें और एक सौ आठ रूद्राक्षों की माला का यज्ञोपवीत बनावंे। दो, पांच अथवा सात लड़ो की माला कण्ठ-प्रदेश-में धारण करें। मुकुट में, कुण्डल में, कर्णफूल में तथा हार में भी रूद्राक्ष धारण करें। बाजूबन्द में, कड़े में, विशेष कर कर धनी में, सोते-जागते, खाते-पीते सर्वदा मनुष्य को रूद्राक्ष धारण करना चाहिये। तीन सौ रूद्राक्ष धारण करना अधम, पांच सौ मध्यम और एक हजार उत्तम है। बुद्धिमान पुरूष-

ऊँ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः ब्रह्माधिपतिब्र्रह्मणः शिवो में अस्तु सदाशिवोम्।
– इस मन्त्र से मस्तक में,

ऊँ तत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूदः प्रचोदयात्।
– इस मन्त्र से कण्ठ में,

ऊँ अधोरेम्योऽथ घोरेभ्यो घोरधोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रूद्ररूपेभ्यः।
इस मन्त्र से गले, हृदय और हाथों में धारण करे।

गूंथे हुए पचास रूद्राक्षों को चतुर मनुष्य आकाश के समान व्यापक पेटपर धारण करें और मूल मन्त्रों से तीन, पांच अथवा सात लड़ों में गूंथी हुई माला को धारण करें। इसके बाद भुसुण्ड ऋषिः ने महाकालाग्निरूद्र भगवान् से पूछा कि, ‘रूद्राक्ष के भेद से जो रूद्राक्ष जिस स्वरूप वाला और जिस फल को देने वाला, मुखयुक्त, दुष्ट का नाश करने वाला और इच्छामात्र से शुभ फल को देने वाला है वह स्वरूप मुझे कहिये।’ इस विषय पर निम्नलिखित उक्ति है-

‘हे मुनिश्रेष्ठ! एक मुखवाला रूद्राक्ष परब्रह्मस्वरूप है और जितेन्द्रिय पुरूष उसको धारण कर परब्रह्मस्वरूप में लीन हो जाता है। दो मुखवाला रूद्राक्ष अर्धनारीश्वर भगवान् का स्वरूप है, उसको जो नित्य धारण करता है उस पर अर्धनारीश्वर भगवान् सदा प्रसन्न रहते हैं। तीन मुखवाला रूद्राक्ष त्रिविध अग्नि का स्वरूप है, उसके पहनने वालों पर अग्निदेव सदा प्रसन्न रहते हैं। चार मुखवाला रूद्राक्ष चतुर्मख ब्रह्मा का स्वरूप है और उसको धारण करने वाले पर चतुर्मुख ब्रह्मदेव सदा प्रसन्न रहते हैं। पांच मुखवाला रूद्राक्ष पाँच ब्रह्ममन्त्रों का स्वरूप हैं और उसके धारण करने वाले को पंचमुख भगवान् शिव, जो स्वयं ब्रह्मरूप हैं, नरहत्या से भी मुक्त कर देते हैं। छः मुखवाला रूद्राक्ष कार्तिकेय स्वामी का स्वरूप हैं, उसके धारण करने से महान् ऐश्वर्य एवं उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है। बुद्धिमान् एवं ज्ञानी पुरूष ज्ञान और सम्पत्ति की शुद्धि के लिये इस रूद्राक्ष को धारण करें। इसे विद्वान् लोग विनायकदेव का स्वरूप भी कहते हैं। उसके धारण करने से अटूट लक्ष्मी तथा पूर्ण आरोग्य की प्राप्ति का स्वरूप है और आठ वसुदेवताओं को तथा गंगाजी को प्रिय है। उसके धारण करनेवाले पर ये सत्यवादी अष्टवसु प्रसन्न होते हैं। नव मुखवाला रूद्राक्ष नवदुर्गा का स्वरूप हैं, उसके धारण करने मात्र से नवदुर्गायें प्रसन्न होती हैं। इस मुखवाले रूद्राक्ष को यम का स्वरूप कहते हैं। यह दर्शनमात्र से शांति प्रदान करने वाला है, तो फिर उसके धारण करने से शांति मिलने में कोई संदेह ही नहीं है। ग्यारह मुखवाला रूद्राक्ष एकादश रूद्र का स्वरूप है, उसे धारण करने वाले को वह तद्रूप करने वाला ओर सौभाग्य प्रदान करने वाला है। बाहर मुखवाला रूद्राक्ष महाविष्णु का स्वरूप है, वह बारह आदित्य के समान स्वरूप प्रदान करने वाला है। तेरह मुखवाला रूद्राक्ष इच्छित फल तथा सिद्धि प्रदान करने वाला है, इसके धारण मात्र से परमेश्वर प्रसन्न होते हैं।

‘चैदह’ मुखवाला रूद्राक्ष (14 mukhi Rudraksha) रूद्र के नेत्र से उत्पन्न हुआ है, वह सर्व व्याधि को हरने वाला तथा सदा आरोग्य प्रदान करने वाला है। रूद्राक्ष धारण करने वाले पुरूष को मद्य, मांस, लहसुन, प्याज, सहिंजन, बहुयार (लहटोर), विड्वराह (ग्राम्यशूकर)-इन अभक्ष्यों का त्याग करना चाहिये। ग्रहण के समय, मेष-संक्रान्ति, उत्तरायण, अन्य संक्रान्ति, अमावास्या, पूर्णिमा तथा पूर्ण दिनों में रूद्राक्ष धारण करने से तत्काल, मनुष्य सर्व पापों से छूट जाता है। रूद्राक्ष का मूल ब्रह्मा, विष्णु मध्यभाग और उसका मुख रूद्र है और उसके बिन्दु सब देवता कहे गये हैं।

अनन्तर अनत्कुमारी ने कालाग्निरूद्र भगवान् से रूद्राक्ष धारण करने की विधि पूछी। उसी समय निशाद, जड़भरत, दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिल, वशिष्ठ, पिप्लाद आदि ऋषि भी उनके समीप आ गये। भगवान् कालिग्नरूद्र ने उनके आने का प्रयोजन पूछा, तब उन्होंने यही कहा कि हम सब रूद्राक्ष-धारण विधि को सुनना चाहते हैं। तत्पश्चात् भगवान् कालाग्निरूद्र ने कहा कि, ‘रूद्र के नयनों से उत्पन्न होने के कारण ही इनकी रूद्राक्ष-संज्ञा हुई है। भगवान् सदशिव संहारकाल में संहार करके अपने संहार नेत्र को बंद कर लेते हैं, उस नेत्र में से रूद्राक्ष के उत्पन्न होने के कारण उसका नाम ‘रूद्राक्ष’ प्रसिद्ध हुआ है। रूद्राक्ष का नाम उच्चारण करने से दस गो-दान का फल मिलता है। वही यह ‘भस्मज्योति’ रूद्राक्ष है। उस रूद्राक्ष को हाथ से स्पर्शकर धारण करने से दो हजार गो-दान का फल मिलता है तथा एकादश रूद्रत्य की प्राप्ति होती है। उस रूद्राक्ष को सिर पर धारण करने से कोटि गो-दान का फल मिलता है। जो मनुष्य इस रूद्राक्ष जाबालोपनिषद्का नित्य पाठ करता है अथवा उसके रहस्य को जानता है यह बालक या युवा, महान् हो जाता है, वह सबका गुरू और मन्त्रों का उपदोश करने वाला हो जाता है। रूद्राक्ष को पहनकर होम करना चाहिए, इन्हीं का धारण करके पूजन करना चाहिए, इसी प्रकार यह रूद्राख राक्षसों का नाश करने वाला तथा मृत्यु से तारने वाला है। रूद्राक्ष को गुरू से लेकर कण्ठ, बाँह और शिखा में बाँधें। रूद्राक्ष के दाता गुरू को गुरूदक्षिणा में सप्तद्वीप वाली पृथ्वी का दान भी अपूर्ण ही है, इसलिये उसे श्रद्धापूर्वक कम-से-कम एक गाय का दान करें यह गो-दान ही शिष्य को फल देता है। जो ब्राह्मण इस उपनिषद का सांयकाल में पाठ करता है। उसके दिन के पाप नष्ट हो जाते हैं, मध्याह्न में पाठ करने से छः जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा प्रातःकाल पाठ करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और छः अरब गायत्री जप का फल मिलता है। ब्रह्महत्या, मदिरापान, सुवर्ण की चोरी, गुरू-स्त्री गमन तथा संसर्ग-दोष से हुए अनेक पाप भी इसे नष्ट हो जाते हैं और वह पवित्र हो जाता हैं वह सब तीर्थों का फल भोगता है, पतित के संग भाषण करने से लगे हुए पाप से मुक्त हो जाता है, अपनी पंक्ति मंे भोजन करने वाले सैकड़ो-हजारों पवित्र करने वाला हो जाता है और अन्त में शिवलोक में सायुज्य-मुक्ति पाता है, इससे उसका पुर्नजन्म नहीं होता।

अक्षय तृतीया – Akshaya Tritiya

अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya)

भारत वर्ष संस्कृति प्रधान देश है, सनातन संस्कृति में व्रत और त्यौहारों का विशेष महत्व है। व्रत और त्यौहार नयी प्रेरणा एवं स्फूर्ति का संवहन करते हैं। इससे मानवीय मूल्यों की वृद्धि बनी रहती है और संस्कृति का निरन्तर परिपोषण तथा संरक्षण होता रहता है। भारतीय मनीषियों ने व्रत-व्रर्तों का आयोजन कर व्यक्ति और समाज को पथ भ्रष्ट होने से बचाया है। भारतीय कालगणना के अनुसार चार स्वयं सिद्ध अभिजित् मुहूर्त हैं- चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडीपडवा), आखतीज (अक्षय तृतीया) दशहरा और दीपावती के पूर्व की प्रदोष-तिथि। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया या आखा तृतीया अथवा आखातीज भी कहते हैं।

‘अक्षय’ का अर्थ है- जिसका कभी नाश (क्षय) न हो, अथवा जो स्थायी रहे।

स्थायी वही रह सकता है जो सर्वदा सत्य है। सत्य केवल परमात्मा (ईश्वर) ही है जो अक्षय, अखण्ड और सर्वव्यापक है। यह अक्षय तृतीया तिथि ईश्वर तिथि है। यह अक्षय तिथि परशुरामजी का जन्मदिन होने के कारण ‘परशुराम-तिथि’ भी कही जाती है। परशुरामजी की गिनती चिरंजीवी महात्माओं में की जाती है। अतः यह तिथि चिरंजीवी तिथि भी कहलाती है। चारों युगों (सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग) में से त्रेतायुग का आरम्भ इसी आखातीज से हुआ है।

क्षयधर्मा वस्तुयें- असöावना, असद्विचार, अहंकार, स्वार्थ, काम, क्रोध तथा लोभ पैदा करती हैं जिन्हें भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता (16।18) में आसुरीवृत्ति कहा है। इससे हम त्याग, परोपकार, मैत्री, करूणा और प्रेम पाकर परम शांति पाते हैं, अर्थात् हमें दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है।
सामाजिक पर्व- आखातीज का दिन सामाजिक पर्व का दिन है। इस दिन कोई दूसरा मुहूर्त न देखकर स्वयंसिद्ध अभिजित् शुभ मुहूर्त के कारण विवाहोत्सव आदि मांगलिक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं।

अक्षय ग्रंथ गीता- गीता स्वयं एक अक्षय, अमरनिधि ग्रन्थ है जिसका पठन-पाठन, मनन एवं स्वाध्याय करके हम जीवन की पूर्णता को पा सकते हैं, जीवन की सार्थकता को समझ सकते हैं और अक्षय तत्व को प्राप्त कर सकते हैं। अक्षय तिथि के समान हमारा संकल्प दृढ़, श्रद्धापूर्ण और हमारी निष्ठा अटूट होनी चाहिये। तभी हमें व्रतोपवासों का समग्र आध्यात्मिक फल प्राप्त हो सकता है।

नवान्न का पर्व है, अक्षयतृतीया-

भारतीय लोक-मानस सदैव से ऋतु-पर्व मनाता रहा है। हर ऋतु के परिवर्तन को मंगल भाव के साथ मनाने के लिये व्रत, पर्व और त्यौहारों की एक श्रंृखला लोकजीवन को निरन्तर आबद्ध किये हुये है। इस श्रंृखला में अक्षय तृतीया का पर्व वसन्त और ग्रीष्म के सन्धि काल का महोत्सव है। वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह व्रत-पर्व लोक में बहुश्रुत और बहुमान्य है। विष्णुधर्म सूत्र, मत्स्यपुराण, नारदीय पुराण तथा भविश्यादि पुराणों में इसका विस्तृत उल्लेख है तथा इस व्रत की कई कथायें भी हैं। सनातन-धर्मी गृहस्थजन इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। अक्षय तृतीया को दिये गये दान और किये गये स्नान, जप, तप, हवन आदि कर्मों का शुभ और अनन्त फल मिलता है-
स्नात्वा हुत्वा च दत्त्वा च जप्त्वानन्तफलं लभेत्।

भविष्य पुराण के अनुसार सभी कर्मों का फल अक्षय हो जाता है, इसलिये इसका नाम ‘अक्षय’ पड़ा है।
यदि यह तृतीया कृत्तिका नक्षत्र से युक्त हो तो विशेष फलदायिनी होती है। भविष्य पुराण यह भी कहता है कि इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, क्योंकि कृतयुग (सत्ययुग) का (कल्पभेद से त्रेतायुग का) प्रारम्भ इसी तिथि से हुआ है। इसमें जल से भरे कलश, पंखे, चरणपादुकायें (खड़ाऊँ), पादत्राण (जूता), छाता, गौ, भूमि, स्वर्णपात्र आदि का दान पुण्यकारी माना गया है। इस दान के पीछे यह लोकविश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जायेगा वे समस्त वस्तुयें स्वर्ग मे गर्मी की ऋतु में प्राप्त होंगी। इस व्रत में घड़ा, कुल्हड़, सकोरा आदि रखकर पूजा की जाती है।

बुन्लेदखण्ड में यह व्रत अक्षय तृतीया से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। कुमारी कन्यायें अपने भाई, पिता, बाबा तथा गाँव-घर के, कुटुम्ब के लोगों को सगुन बाँटती हैं, और गीत गाती हैं, जिसमें एक दिन पीहर न जा पाने की कचोट व्यक्त होती है। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिये शकुन निकाला जाता है, और वर्षा की कामना की जाती है तथा लड़कियाँ झुण्ड बनाकर घर-घर जाकर शकुन गीत गाती हैं। लड़के पतंग उड़ाते हैं। ‘सतनजा’ (सात अन्न) से पूजा की जाती है। मालवा में नये घड़े के ऊपर खरबूजा और आम्रपत्र रखकर पूजा होती है। किसानों के लिये यह नववर्ष के प्रारम्भ का शुभ दिन माना जाता है। इस दिन कृषि कार्य का प्रारम्भ शुभ और समृद्धि देगा, ऐसा विश्वास किया जाता है। इसी दिन बदरिकाश्रम में भगवान् बद्रीनाथ के पट खुलते हैं। इसीलिये इस तिथि को श्रीबद्रीनाथजी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और लक्ष्मीनारायण के दर्शन किये जाते हैं। इस तिथि में गंगास्नान को अति पुण्यकारी माना गया है। मृत पित्तरों का तिल से तर्पण, जल से तर्पण और पिण्डदान भी इस दिन इस विश्वास से किया जाता है कि इसका फल अक्षय होगा।
इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था, इसीलिये इनकी जयन्तियाँ भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती हैं। श्रीपरशुराम जी प्रदोषकाल में प्रकट हुये थे इसलिये यदि द्वितीया को मध्याह्न से पहले तृतीया आ जाये तो उस दिन अक्षय तृतीया, नर- नारायण-जयंती, हयग्रीव जयन्ती सभी सम्पन्न की जाती है। इसे परशुराम तीज भी कहते हैं, अक्षय तृतीया बड़ी पवित्र और सुख-सौभाग्य देने वाली तिथि है।

इसी दिन गौरी की पूजा भी होती है। सधवा स्त्रियाँ और कन्यायें गौरी-पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुये चने बाँटती हैं, गौरी-पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न आदि भरकर दान करती हैं। गौरी-विनायकोपेता के अनुसार गौरी पुत्र गणेश की तिथि चतुर्थी का संयोग यदि तृतीया में होता है, तो वह अधिक शुभ फलदायिनी होती है। इस तिथि को सुख-समृद्धि और सफलता की कामना से व्रतोत्सव के साथ ही अस्त्र-शस्त्र, वस्त्र-आभूषण आदि बनवाये, खरीदे और धारण किये जाते हैं। नयी भूमि का क्रय, भवन, संस्था आदि का प्रवेश इस तिथि को शुभ फलदायी माना जाता है।

अक्षय तृतीया में तृतीया तिथि, सोमवार और रोहिणी नक्षत्र तीनों का सुयोग बहुत श्रेष्ठ माना जाता है। किसानों में यह लोकविश्वास है कि यदि इस तिथि को चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी आगे होगी तो फसल के लिये अच्छा होगा और यदि पीछे होगी तो उपज अच्छी नहीं होगी। इस सम्बंध में भड्डरी की कहावतें भी लोक में प्रचलित हैं –

अखै तीज रोहिणी न होई।
पौष अमावस मूल न जोई।।
राखी श्रवणो हीन बिचारो।
कातिक पूनो कृतिका टारो।।
महि माहीं खल बलहिं प्रकासै।
कहत भड्डरी सालि बिनासै।।

अर्थात् वैशाख की अक्षय तृतीया को यदि रोहिणी न हो, पौस की अमावास्या को मूल न हो, रक्षा बन्धन के दिन श्रवण और कार्तिक की पूर्णिमा को कृतिका न हो, तो पृथ्वी पर दुष्टों का बल बढ़ेगा और उस साल धान की उपज न होगी। इस तिथि पर ईख के रस से बने पदार्थ, दही, चावल, दूध से बने व्यंजन, खरबूज, तरबूज और लड्डू का भोग लगाकर दान करने का भी विधान है।

स्कन्द पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेेख है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान् विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम-मंदिरों में इस तिथि को परशुराम-जयंती बड़ी धूम-धाम से मनायी जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। परशुराम-जयंती होने के कारण इस तिथि में भगवान् परशुराम के आविर्भाव की कथा भी कही-सुनी जाती है।

Do Shri yantra pooja on Akshaya Tritiya
shri yantra pooja akshaya tritiya

युग बदला, आवश्यकतायें बदली और मान्यतायें भी बदल गई, आज मानव जीवन का केन्द्र बिन्दु केवल अर्थ और काम में ही सीमित हो गया है, और शेष दोनों धर्म और मोक्ष भी अर्थ पर ही आधारित हो गये हैं। आज व्यक्ति की सर्वप्रथम आवश्यकता केवल आर्थिक ही है, उसके पास धन का न होना, सुखद जीवन का अंत ही माना जाता है। यह पर्व लक्ष्मी-विष्णु की आराधना का विशेष पर्व है। हमारे शास्त्रों मे भी कहा गया है कि यदि लक्ष्मी जी, विष्णु जी के साथ मनुष्य के घर में स्थायी रूप से निवास करें, तो व्यक्ति के जीवन में किसी भी वस्तु तथा भौतिक सुखों का अभाव हो ही नही सकता। हमारे शास्त्रों में इस लिये इस दिन विशेष रूप से ‘श्री यंत्र’ (shri yantra) जो कि माँ लक्ष्मी जी का आधार एवं मनुष्य को जीवन में हर प्रकार का भौतिक सुख और ऐश्वर्य देने वाला है तथा दरिद्रता को जीवन से दूर करने वाला है, इस श्री यंत्र की घर में स्थापना विधान बतलाया गया है।

स्वयं गुरू गोरखनाथ जी ने भी एक स्थान पर कहा है भले ही अन्य सारे प्रयोग असफल हो जायंे, भले ही साधक नया हो, भले ही उसे स्पष्ट मंत्रो के उच्चारण का ज्ञान न हो, परन्तु अक्षय तृतिया के अवसर पर इनको सफलता अवश्य मिलती है। इस पर्व की पूर्णता के बारे में स्पष्ट करते हुये यहाँ तक कहा गया है कि कोई अभागा ही होगा जो इस पावन अवसर को गवायेगा। जिसके भाग्य में दरिद्रता ही लिखी हुई हो, वही ऐसा अवसर चूकेगा। अतः इस मुहूर्त का उपयोग करके व्यक्ति अपने दरिद्रता, अभाव, परेशानियों को हमेशा के लिये अपने जीवन से कोसों दूर भगा सकता है और उसके स्थान पर सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य व उन्नति को प्राप्त करता है। अक्षय तृतीया वाले दिन स्वर्ण-मुद्रा व स्वर्ण आभूषण खरीदने की भी प्रथा है, यह मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य के जीवन व घर-परिवार में सुख-समृद्धि और ऐश्वर्यता आती है।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer

मां दुर्गा महाशक्ति – नवरात्रि पर्व

मां दुर्गा महाशक्ति – नवरात्रि पर्व

सर्व स्वस्ये सर्वेश सर्व शक्ति समन्विते।
भयेस्य स्त्राही नो देवी दुर्गे माॅ नमोस्तुते।।

shubh navratri aapkabhavishya.in
Shubh Navratri aapkabhavishya.in

आज के अर्थ प्रधन युग में मानव का लक्ष्य यश, मान प्राप्त करने के साथ धन भवन, वाहन आदि को प्राप्त कर परिपूर्ण होना है। अतः मानव अपने प्रयत्नों से सब कुछ प्राप्ति करने का करता रहता है क्योंकि क्रियाशील मानव का जीवन ही वास्तविक, जीवन है। जीवन में प्राप्ति तब तक संभव नही जब तक समय क्षण योग का ज्ञान नही होगा। क्योंकि प्रत्येक क्षण अपने आप में अलग-अलग महत्व लिये होता है। भक्ति, साधना आराधना कर्म से जुड़ी है। इनका समन्वय किसी पूर्व योग मुहुर्त में होता है तो मानव जीवन का निर्माण स्वतः ही संभव हो जाता है।

नवरात्रि पर्व याने जीवन में व्याप्त अंधकार कर समाप्त कर प्रकाश की ओर अग्रसर कर जीवन को सामर्थ बनाता है। साथ ही आने वाली विपदाओं से छुटकारा दिलवाता है, नवरात्रि पर्व मानव में अपनी प्रकृति के अनुसार सात्विक, राजस, तामस, त्रिगुणात्म गुण प्रकट करते हैं।

साधक जो गुरू के सानिध्य में मंत्रो द्वारा साधना कर शक्ति प्राप्त करता है। आराधक जो आत्मा से लीन होकर आराधना करता है एवं मोक्ष चाहता है। भक्त जो निष्ठा एवं भाव से समर्पित होता है एवं परिस्थितियों से संघर्ष कर सुयोग का लाभ उठा लेता है।

इस विशेष क्षण में माँ-दुर्गा की भक्ति आराधक को प्रकृल्लित विकसित करके सौभाग्य प्रदान करती है, जिस महाशक्ति की उपासना तीनो लोको के स्वामी ब्रह्मा-विष्णु-महेश एवं सभी देवता गण करते हैं, जो तीनो देवों से बढकर है, जो सूक्ष्म एवं स्थूल शरीर से परे महाप्राण आदि शक्ति है, वह स्वयं पर ब्रह्म स्वरूप है, जो केवल अपनी इच्छा मात्र से ही सृष्टि की रचना चल-अचल भौतिक प्राणिज वस्तुओं को पालन, रचना व संहार करने में समर्थ है। यद्यपि वह निगुर्ण स्वरूप है किन्तु धर्म की रक्षा व दुष्टों के नाश हेतु शक्ति ने अवतार धारण किये हैं।

श्रीमद्भागवत में स्वयं देवी ने ब्रह्मा जी से कहा है कि एक ही वास्तविकता है वह है सत्य, में ही सत्य हूँ, मैं न तो नर हूँ, न नारी! एवं न ही प्राणी लेकिन कोई वस्तु ऐसी नही जिसमें में, विधमान नही हूँ। प्रत्येक वस्तु में शक्ति रूप में रहती हूँ देवीपुराण में स्वयं भगवान विष्णु स्वीकार करते हैं। कि वे भी शक्ति से मुक्त नही हैं। वो कठपुतली की भांति कार्यरत है, कठपुतनी संचालन की डोर तो महादेवी के हाथ में है। ब्रह्माजी सृष्टि की रचना करते हैं तो विष्णु जी पालन करते हैं एवं शिवजी संहार करते हैं जो केवल यंत्र की भांति कार्यरत हैं, जो शक्ति की कठपुतली मात्र हैं।
महादानव दैत्यराज के अत्याचार से तंग आकर समस्त देवतागण ब्रह्माजी के पास एवं दैत्यराज से मुक्ति दिलाने की अर्चना की। तब ब्रह्माजी ने बताया कि दैत्यराज की मृत्यु कुवांरी कन्या के हाथ से होगी। तब सभी देवाताओं ने मिलकर अपने सम्मिलित तेज से देवी के इस शक्ति रूप को प्रकट किया। भगवान शंकर के तेज से देवी का मुंह, यमराज के तेज से केश, भगवान विष्णु के तेज से भुजायें, इन्द्र के तेज से स्तन, पवन के तेज से कमर, वरूण के तेज से जांघे, पृथ्वी के तेज से नितम्ब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से पैरों की उगलियाँ, वस्तुओं के तेज से भौहें, वायु के तेज से काल एवं अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने। देवी का शक्ति रूप प्रकट होने पर शिवजी ने शक्ति व बाणों का तरकस, यमराज ने दण्ड, काल ने तलवार, विश्वकर्मा ने परसा, प्रजापति न मणियों की माला, वरूण न दिव्य शंख, हनुमान जी ने गदा, शेषनाग ने मणियों से सुभोभिति नाग, इन्द्र ने वज्र, भगवान श्री नारायण ने धनुष, वरूण के पाश व तीर ब्रह्मा ने चारों वेद, हिमालय सवारी के लिये सिंह, समुद्र ने दिव्य वस्त्र एवं आभूषण दिये। जिससे शक्ति देवी 18 भुजाओं वाली प्रकट हुई। सभी के द्वारा देवी की स्तुति की गई कि शक्ति सदैव अजन्मी और अविनाशी है, यही आदि यही अंत है तो ब्रह्मा-विष्णु महेश सहित देवताओं व मनुष्यों द्वारा पूज्य हैं। शक्ति के नौ अवतार हैं जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं-

1. शैलपुत्री।
2. ब्रहमचारिणी।
3. चन्द्रघंटा।
4. कुष्माडा।
5. स्कन्दमाता।
6. कात्यानी।
7. कालरात्रि।
8. महागौरी।
9. सिद्धियात्री आदि।

श्री दुर्गा सप्तशती में देवी के नौ अवतारों का वर्णन है।

माँ की शक्ति वह शस्त्र है, जिसके माध्यम से किसी महा संग्राम को आसानी से जीता जा सकता है-
शक्ति की प्राप्ति माँ दुर्गा से गतिशील भक्त को होती है। भाग्य का रोना रोने वाले या असहाय का नहीं सृष्टि की अनन्त शक्ति प्राणी मात्र के सत्कर्म पुरूषार्थ एवं कर्तव्य परायणता में निहित है कर्म ही शक्ति का मूलाधार है वह परम शक्ति प्राप्त करने का मार्ग है। अतः शक्ति प्राप्त कर जीवन को आनन्दमयी, सुखी बनाकर विकास करना है, जो शक्ति पूजन करना चाहिये। क्योंकि शक्ति स्वरूप माँ दुर्गा की आराधना कर्म, निष्ठा और कर्तव्य परायण बनाकर जीवन को शक्ति प्रदान करती है।

माँ देवी के 108 नाम हैं, जिनका योग 9 है, माँ ने नौ अवतार धारण किये हैं। साधना में ली जाने वाली माला के मणियों की संख्या 108 है, जिनका योग 9 है, आकाशीय सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं। नवरात्रि का योग नौ है अंको की संख्या भी नौ है, जो शक्ति की साधना एवं भक्ति का योग हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से अणुबम, बिजली, बेतार, यान वायुयान आदि शक्ति ऊर्जा पर आधारित है। शक्ति बिना प्राणी निर्जिव है। अतः सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देवी का प्रतिबिम्ब छाया मात्र है। समस्त भौतिक पदार्थो एवं जीवों में शक्ति देवी द्वारा ही चेतना व प्राण का संचार होता है। इस नश्वर संसार में चेतना के रूप में प्रकट होने से देवी की चित स्वरूप मणी माना जाता है। प्रत्येक मानव में भी शक्ति अर्थात ऊर्जा है, जैसे इंजन से फालतू भाप निकाली जाती है, उसी प्रकार मानव भी व्यर्थ में अपनी ऊर्जा नष्ट करता है, किन्तु जिनकी शक्ति संगीत, खेलकूद, लिखने पढ़ने में शोध में विज्ञान की खोज में साधना, समाधि में खर्च होती है, वह व्यर्थ नही जाती।

सामान्य से सामान्य गृहस्थी मानव द्वारा माँ की आराधना कर शक्ति प्राप्त की जा सकती है। जिससे जीवन में पूर्ण प्रज्ञावान चेतन्य तथा सोलह कला पूर्ण व्यक्तित्व बन सकता है। इसके लिये कही भटकने या सन्यास लेने की आवश्यकता भक्ति साधनों की जिनका सीधा संबंध मन से, श्रद्धा से, विश्वास से है। अतः माॅ की शरण में जाना ही मानव कल्याण है।

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सर्व मंगल मांगल्ये शिवे स्वार्थ साधिके।
शरण्ये अम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।

भगवती दुर्गा आप मंगल हैं। समस्त भक्तों का कल्याण करने वाली हैं। मैं आपकी शरण में हूँ आप मेरी रक्षा करें।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer