रूद्राक्ष में अलौकिक गुण

रूद्राक्ष : आसाम, नेपाल और हिमालय के कई क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाला एक सुपरिचित बीज है, जिसे पिरोकर मालाएं बनाई जाती हैं किन्तु इसके अलौकिक गुणों की जानकारी हर एक को नहीं है। जन सामान्य की धारणा है कि रूद्राक्ष पवित्र होता है इसलिए इसे पहनना चाहिए बस इससे अधिक जानने की चेष्टा कोई नहीं करता।

वस्तुतः रूद्राक्ष पवित्र तो होता ही है इसके अतिरिक्त इसमें अलौकिक गुण भी हैं इसके चुम्बकिय प्रभाव को तथा स्पर्ष-षक्ति को आधुनिक विज्ञानवेत्ता भी स्वीकार करते हैं यह रोग-षमन और अदृष्य बाधाओं के निवारण में अत्यंत प्रभावशाली होता है। स्वास्थ्य, शान्ति और श्री-समृद्धि देने में भी रूद्राक्ष का प्रभाव अद्वितीय है। रूद्राक्ष के खुरदरे बीज धारियाँ लिए होते हैं, इन धारियों की संख्या एक से ग्यारह तक पाई जाती है इन धारियों को ही ‘मुख’ कहते हैं।

मुख की संख्या के आधार पर रूद्राक्ष के गुण, प्रभाव और मूल्य में अन्तर होता है। एकमुखी रूद्राक्ष दुर्लभ होता है और दो से लेकर सातमुखी तक सरलता से मिल जाते हैं पर आठ से चौदह तक मुख वाले कदाचित ही मिल पाते हैं फिर 15 से 21 धारी वाले नितान्त दुर्लभ हैं सर्वसुलभ दाना पंचमुखी है, सामान्यतः प्रयास करने पर 2 से 13 मुखी तक के दाने भी मिल जाते हैं। इन सभी के अलग-अलग देवता हैं प्रत्येक दाने में धारियों के क्रम से उसके देवता की शक्ति समाहित रहती है और उसके धारक को उस देवता की कृपा सुलभ होती है। यों तो सभी रूद्राक्ष शिवजी को प्रिय हैं और उनमें से किसी को भी धारण करने से साधक शिव-कृपा का पात्र हो जाता है।

रूद्राक्ष का दाना अथवा माला जो भी सुलभ हो उसे गंगाजल या अन्य पवित्र जल से स्नान कराकर धूप-दीप से पूजन करें, पूजनोपरान्त  नमः शिवाय मन्त्र का 1100 पाठ कर 108 मंत्र का हवन करना चाहिए तत्पष्चात् रूद्राक्ष को शिवलिंग से स्पर्ष कराकर उपरोक्त मंत्र जपते हुए पूर्व या उत्तर की और मुख करके धारण कर लेना चाहिए, धारण करने के पश्चात् हवन-कुण्ड की भस्म का तिलक लगाकर षिव-प्रतिमा को प्रणाम करें। इस विधि से धारण किया गया रूद्राक्ष निष्चित रूप से प्रभावशाली होता है यह रूद्राक्ष धारण करने की सरलतम पद्धति है।

वैसे समर्थ साधक रूद्राक्ष को पंचामृत से स्नान कराकर अष्टगन्ध अथवा पंचगन्ध से भी नहलायें फिर पूर्ववत् पूजा करके उसे सम्बन्धित मन्त्र विषेष का 1100 जाप कर 108 मंत्र का हवन करें तथा भस्म लेपन के पष्चात् शिव-प्रतिमा को प्रणाम कर धारण कर लें। धर्म शास्त्रों में एक-मुखी से लेकर चौदह मुखी तक रूद्राक्ष की धारण विधि एवं मंत्र महर्षियों ने निर्धारित किये हैं।

रूद्राक्ष की माला 108 मनकों की अधिक प्रभावशाली होती है जिसमें पंचमुखी का कम से कम एक दाना और शेष अन्य मुख वाले दाने हो सकते हैं। इसे बाहु या कण्ठ पर धारण करने से भी पूर्ण लाभ होता है। ये समस्त रूद्राक्ष व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक कष्टों का शमन करके उसमें आस्था, शुचिता और देवत्व के भाव को जागृत करते हैं भूत-बाधा, अकाल-मृत्यु, आकस्मिक-दुर्घटना, मिर्गी, उन्माद, हृदय-रोग, रक्तचाप, आदि में रूद्राक्ष धारण करने से चमत्कारी लाभ दृष्टिगोचर होता है। रूद्राक्ष को लाल धागे में पिरोकर धारण करना चाहिए।

पितृ-दोष

Dr.R.B.Dhawan

पितृ-दोष होता क्या है? –

हमारे ही पूर्वज सूक्ष्म लोक से अपने सूक्ष्म शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं, और महसूस करते हैं कि, हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति कोई श्रद्धा रखते हैं, और न ही इन्हें हमसे कोई प्यार या स्नेह है, और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं, ना ही अपने पूर्वजों के ऋण चुकाने का प्रयास करते हैं, तो ये आत्माएं दु:खी होकर अपने ही वंशजों को श्राप दे देती हैं, जिसे ‘पितृ-दोष’ कहा जाता है।

पितृ-दोष एक ऐसी बाधा है जो अदृश्य रहकर भी बहुत कष्ट देती है। ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण उत्पन्न होती है । पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं, जैसे :- आपके आचरण से, किसी परिजन द्वारा जानबूझ कर की गयी गलती से, श्राद्ध आदि कर्म ना करने से, अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण ऐसा हो सकता है।

पितृ-दोष के दुष्प्रभाव :-  मानसिक पीड़ा (टेंशन) अवसाद, व्यापार में हानि, परिश्रम के अनुसार फल न मिलना, वैवाहिक जीवन में समस्याएं, कैरिअर में समस्याएं, या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है। पितृ-दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति, गोचर, दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते, कितना भी पूजा पाठ, देवी, देवताओं की अर्चना की जाए, उसका शुभ फल नहीं मिल पाता।

पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है:-

1. अधोगति वाले पितरों के कारण।

2. उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण।

अधोगति वाले पितर :- इनके दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, और अतृप्त इच्छाएं, जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत उपभोग होने पर, विवाहादि में परिजनों द्वारा गलत निर्णय लिए जाने पर, परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं, ऐसे में पितर परिवार जनों को श्राप दे देते हैं, और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।

उर्ध्व गति वाले पितर :- सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।

इनके द्वारा उत्पन्न श्राप (पितृदोष) से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बाधित हो जाती है, फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जायें, कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जायें, उनका कोई भी कार्य पितृदोष के कारण सफल नहीं होता। पितृ-दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि, किस कोनसा ग्रह पितृदोष की सूचना दे रहा है? और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?

जन्म पत्रिका और पितृ-दोष :- जन्म पत्रिका में लग्न, पंचम, अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ-दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि, और राहू-केतु की स्थितियों से विचार किया जाता है।

इनमें से भी गुरु, शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ-दोष में महत्वपूर्ण होती है, इनमें सूर्य से पिता या पितामह, चन्द्रमा से माता या मातामह, मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।

अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु, शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है, इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ-साथ व्यक्ति यदि अपनी  कुंडली के अनुसार रुद्राक्ष भी धारण कर ले, तो पितृ-दोष का शीघ्र निवारण हो जाता है।

पितृ-दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है।

हर मनुष्य पर मुख्य रूप से 5 ऋण होते हैं, जिनका कर्म न करने (फर्ज पूरा नहीं करने पर) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है, ये ऋण (फर्ज) हैं :-  1. मातृ-ऋण, 2. पितृ-ऋण, 3. मनुष्य-ऋण, 4. देव-ऋण और 5. ऋषि-ऋण।

माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमें, मामी, नाना, नानी, मौसा, मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं, क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है, अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है, अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है, तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है।

पिता पक्ष के लोग जैसे बाबा, ताऊ, चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है, पिता हमें आकाश की तरह छत्र-छाया देता है, हमारा जिंदगी भर पालन-पोषण करता है, और अंतिम समय तक हमारे सारे दु:खों को खुद झेलता रहता है। पर आज के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ? पितृ-भक्ति करना मनुष्य का धर्म है, इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को ही झेलना पड़ता है, इससे घर में आर्थिक अभाव, दरिद्रता, संतान हीनता,ब संतान को विबिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि। माता-पिता प्रथम देवता हैं, जिसके कारण भगवान गणेश महान बने। इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी, दुर्गा माँ, भगवान विष्णु आदि आते हैं, जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है, हमारे पूर्वज भी अपने-अपने कुल देवताओं को मानते थे, लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है, इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं। जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए, वंश वृद्धि की, उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है, उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य संपन्न नहीं होते हैं, इसलिए उनका श्राप पीडी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है।

ऐसे परिवार को पितृ-दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है ।रामायण में श्रवण कुमार के माता-पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा, ये जग-ज़ाहिर है इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ-दोषों का निवारण करना बहुत आवश्यक है।

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Shivpuran & Rudraksha – शिवपुराण में रूद्राक्ष

14 Mukhi Rudraksha

रूद्राक्षोपनिषद्वैद्यं महा्रयद्रत्योज्ज्वलम्।
प्रतियोगिविनिर्मुक्तं शिवमात्रपदं भजे।।

‘रूद्राक्ष-उपनिषद् से जानने योग्य, महारूद्ररूप से उज्जवल, प्रतियोगीरहित, शिवषदवाच्य तत्त्व की मैं शरण लेता हूँ। हरिः ओम्।
भुसुण्ड नाम के ऋषि ने कालाग्निरूद्र से पूछा कि, ‘रूद्राक्ष की उत्पत्ति किस प्रकार हुई तथा उसके धारण करने से क्या फल मिलता है – इसे आप लोकहित के लिए कृपा करके कहिये।’ कालाग्निरूद्र भगवान् ने कहा कि ‘त्रिपुरासुर नामक दैत्य का नाश करने के लिये मैंने नेत्रों को बंद कर लिया था। उस समय मेरी आंखों में से जल के बिन्दु पृथ्वी पर गिरे और वही रूद्राक्ष रूप में परिणत हो गये। सर्वलोक के अनुग्रह के लिये मैं यह बतलाता हूँ कि उनके नामोच्चारण मात्र से गो-दान का फल, और दर्शन तथा स्पर्श से दुगुने फल प्राप्त होता है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता।’ इस संबंध में नीचे लिखी उक्ति है-
भुसुण्ड ऋषि ने पूछा कि ‘वह रूद्राक्ष कहाँ स्थित है, उसका क्या नाम है, वह किस प्रकार मनुष्यों के द्वारा धारण किया जाता है, कितने प्रकार के इसके मुख हैं और किन मन्त्रों से इसे धारण किया जाता है- आदि सब बातें कृपा करके कहिये।’

14 Mukhi Rudraksha
14 Mukhi Rudraksha

श्रीकालाग्निरूद्र बोले – ‘देवताओं के हजारों वर्षों तक मैने अपनी आँखे खुली रखीं। उस समय मेरी आँखों से जल की बूंदें पृथ्वी पर गिर पड़ी। वे आंसू की बूंदे भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने के लिये स्थावरत्व को प्राप्तकर महारूद्राक्ष नामक वृक्ष हो गये। रूद्राक्ष धारण करने से भक्तों के रात-दिन के पाप नष्ट होते हैं, उसका दर्शन करने से लाखों गुना पुण्य मिलता है। जो मनुष्य रूद्राक्ष धारण कर रूद्राक्ष की माला से इष्टदेव का जप करता है उसे अनन्तगुने पुण्य की प्राप्ति होती है। आंवले के फल के समान आकार वाला रूद्राक्ष उत्तम होता है, बेर के समान आकार वाला मध्यम और चने के समान आकार वाला कनिष्ठ होता है। अब उसके धारण करने की प्रक्रिया कहता हूँ सुनो। श्रीशंकर भगवान् की आज्ञा से पथ्वी पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र चार जाति के रूद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए। प्रत्येक जाति के मनुष्य को अपनी-अपनी जाति के रूद्राक्ष ही फलदायक होते हैं। श्वेत रूद्राक्ष को ब्राह्मण, लाल को क्षत्रिय, पीले को वैश्य और काले को शुद्र जानना चाहिये और ब्राह्मण को श्वेत रूद्राक्ष धारण करना चाहिये, क्षत्रिय को लाल, वैश्य को पीला और शुद्र को काला रूद्राक्ष पहनना चाहिये। आकार में एक समान, चिकने, पक्के (मजबूत) मोटे तथा कांटोंवाले रूद्राक्ष के दाने शुभ होते हैं। कीड़ा लगे हुए, टूटे-फूटे, बिना कांटों के, छिद्रयुक्त तथा बिना जुड़े हुए- इन छः प्रकार के रूद्राक्षों का त्याग करना चाहिये। जिस रूद्राक्ष में स्वयंमेव बना हुआ छिद्र किया हुआ हो उसे मध्यम जानना चाहिये। शास्त्र में लिखे अनुसार एक समान, चिकने, पक्के एवं मोटे दानों को रेशम के धागे में पिरोकर शरीर के तत्तद् अवयव में धारण करें। जिस रूद्राक्ष की माला कसौटी के पत्थर सुवर्ण की रेखा के समान जान पड़े वह रूद्राक्ष उत्तम है, ऐसे रूद्राक्ष को शिव-भक्त धारण करें। शिखा में एक रूद्राक्ष, सिर पर तीस, गले में छत्तीस, दोनो बाहुओं में सोलह, कलाई में बारह और कन्धे पर पचास दाने धारण करें और एक सौ आठ रूद्राक्षों की माला का यज्ञोपवीत बनावंे। दो, पांच अथवा सात लड़ो की माला कण्ठ-प्रदेश-में धारण करें। मुकुट में, कुण्डल में, कर्णफूल में तथा हार में भी रूद्राक्ष धारण करें। बाजूबन्द में, कड़े में, विशेष कर कर धनी में, सोते-जागते, खाते-पीते सर्वदा मनुष्य को रूद्राक्ष धारण करना चाहिये। तीन सौ रूद्राक्ष धारण करना अधम, पांच सौ मध्यम और एक हजार उत्तम है। बुद्धिमान पुरूष-

ऊँ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः ब्रह्माधिपतिब्र्रह्मणः शिवो में अस्तु सदाशिवोम्।
– इस मन्त्र से मस्तक में,

ऊँ तत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूदः प्रचोदयात्।
– इस मन्त्र से कण्ठ में,

ऊँ अधोरेम्योऽथ घोरेभ्यो घोरधोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रूद्ररूपेभ्यः।
इस मन्त्र से गले, हृदय और हाथों में धारण करे।

गूंथे हुए पचास रूद्राक्षों को चतुर मनुष्य आकाश के समान व्यापक पेटपर धारण करें और मूल मन्त्रों से तीन, पांच अथवा सात लड़ों में गूंथी हुई माला को धारण करें। इसके बाद भुसुण्ड ऋषिः ने महाकालाग्निरूद्र भगवान् से पूछा कि, ‘रूद्राक्ष के भेद से जो रूद्राक्ष जिस स्वरूप वाला और जिस फल को देने वाला, मुखयुक्त, दुष्ट का नाश करने वाला और इच्छामात्र से शुभ फल को देने वाला है वह स्वरूप मुझे कहिये।’ इस विषय पर निम्नलिखित उक्ति है-

‘हे मुनिश्रेष्ठ! एक मुखवाला रूद्राक्ष परब्रह्मस्वरूप है और जितेन्द्रिय पुरूष उसको धारण कर परब्रह्मस्वरूप में लीन हो जाता है। दो मुखवाला रूद्राक्ष अर्धनारीश्वर भगवान् का स्वरूप है, उसको जो नित्य धारण करता है उस पर अर्धनारीश्वर भगवान् सदा प्रसन्न रहते हैं। तीन मुखवाला रूद्राक्ष त्रिविध अग्नि का स्वरूप है, उसके पहनने वालों पर अग्निदेव सदा प्रसन्न रहते हैं। चार मुखवाला रूद्राक्ष चतुर्मख ब्रह्मा का स्वरूप है और उसको धारण करने वाले पर चतुर्मुख ब्रह्मदेव सदा प्रसन्न रहते हैं। पांच मुखवाला रूद्राक्ष पाँच ब्रह्ममन्त्रों का स्वरूप हैं और उसके धारण करने वाले को पंचमुख भगवान् शिव, जो स्वयं ब्रह्मरूप हैं, नरहत्या से भी मुक्त कर देते हैं। छः मुखवाला रूद्राक्ष कार्तिकेय स्वामी का स्वरूप हैं, उसके धारण करने से महान् ऐश्वर्य एवं उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है। बुद्धिमान् एवं ज्ञानी पुरूष ज्ञान और सम्पत्ति की शुद्धि के लिये इस रूद्राक्ष को धारण करें। इसे विद्वान् लोग विनायकदेव का स्वरूप भी कहते हैं। उसके धारण करने से अटूट लक्ष्मी तथा पूर्ण आरोग्य की प्राप्ति का स्वरूप है और आठ वसुदेवताओं को तथा गंगाजी को प्रिय है। उसके धारण करनेवाले पर ये सत्यवादी अष्टवसु प्रसन्न होते हैं। नव मुखवाला रूद्राक्ष नवदुर्गा का स्वरूप हैं, उसके धारण करने मात्र से नवदुर्गायें प्रसन्न होती हैं। इस मुखवाले रूद्राक्ष को यम का स्वरूप कहते हैं। यह दर्शनमात्र से शांति प्रदान करने वाला है, तो फिर उसके धारण करने से शांति मिलने में कोई संदेह ही नहीं है। ग्यारह मुखवाला रूद्राक्ष एकादश रूद्र का स्वरूप है, उसे धारण करने वाले को वह तद्रूप करने वाला ओर सौभाग्य प्रदान करने वाला है। बाहर मुखवाला रूद्राक्ष महाविष्णु का स्वरूप है, वह बारह आदित्य के समान स्वरूप प्रदान करने वाला है। तेरह मुखवाला रूद्राक्ष इच्छित फल तथा सिद्धि प्रदान करने वाला है, इसके धारण मात्र से परमेश्वर प्रसन्न होते हैं।

‘चैदह’ मुखवाला रूद्राक्ष (14 mukhi Rudraksha) रूद्र के नेत्र से उत्पन्न हुआ है, वह सर्व व्याधि को हरने वाला तथा सदा आरोग्य प्रदान करने वाला है। रूद्राक्ष धारण करने वाले पुरूष को मद्य, मांस, लहसुन, प्याज, सहिंजन, बहुयार (लहटोर), विड्वराह (ग्राम्यशूकर)-इन अभक्ष्यों का त्याग करना चाहिये। ग्रहण के समय, मेष-संक्रान्ति, उत्तरायण, अन्य संक्रान्ति, अमावास्या, पूर्णिमा तथा पूर्ण दिनों में रूद्राक्ष धारण करने से तत्काल, मनुष्य सर्व पापों से छूट जाता है। रूद्राक्ष का मूल ब्रह्मा, विष्णु मध्यभाग और उसका मुख रूद्र है और उसके बिन्दु सब देवता कहे गये हैं।

अनन्तर अनत्कुमारी ने कालाग्निरूद्र भगवान् से रूद्राक्ष धारण करने की विधि पूछी। उसी समय निशाद, जड़भरत, दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिल, वशिष्ठ, पिप्लाद आदि ऋषि भी उनके समीप आ गये। भगवान् कालिग्नरूद्र ने उनके आने का प्रयोजन पूछा, तब उन्होंने यही कहा कि हम सब रूद्राक्ष-धारण विधि को सुनना चाहते हैं। तत्पश्चात् भगवान् कालाग्निरूद्र ने कहा कि, ‘रूद्र के नयनों से उत्पन्न होने के कारण ही इनकी रूद्राक्ष-संज्ञा हुई है। भगवान् सदशिव संहारकाल में संहार करके अपने संहार नेत्र को बंद कर लेते हैं, उस नेत्र में से रूद्राक्ष के उत्पन्न होने के कारण उसका नाम ‘रूद्राक्ष’ प्रसिद्ध हुआ है। रूद्राक्ष का नाम उच्चारण करने से दस गो-दान का फल मिलता है। वही यह ‘भस्मज्योति’ रूद्राक्ष है। उस रूद्राक्ष को हाथ से स्पर्शकर धारण करने से दो हजार गो-दान का फल मिलता है तथा एकादश रूद्रत्य की प्राप्ति होती है। उस रूद्राक्ष को सिर पर धारण करने से कोटि गो-दान का फल मिलता है। जो मनुष्य इस रूद्राक्ष जाबालोपनिषद्का नित्य पाठ करता है अथवा उसके रहस्य को जानता है यह बालक या युवा, महान् हो जाता है, वह सबका गुरू और मन्त्रों का उपदोश करने वाला हो जाता है। रूद्राक्ष को पहनकर होम करना चाहिए, इन्हीं का धारण करके पूजन करना चाहिए, इसी प्रकार यह रूद्राख राक्षसों का नाश करने वाला तथा मृत्यु से तारने वाला है। रूद्राक्ष को गुरू से लेकर कण्ठ, बाँह और शिखा में बाँधें। रूद्राक्ष के दाता गुरू को गुरूदक्षिणा में सप्तद्वीप वाली पृथ्वी का दान भी अपूर्ण ही है, इसलिये उसे श्रद्धापूर्वक कम-से-कम एक गाय का दान करें यह गो-दान ही शिष्य को फल देता है। जो ब्राह्मण इस उपनिषद का सांयकाल में पाठ करता है। उसके दिन के पाप नष्ट हो जाते हैं, मध्याह्न में पाठ करने से छः जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा प्रातःकाल पाठ करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और छः अरब गायत्री जप का फल मिलता है। ब्रह्महत्या, मदिरापान, सुवर्ण की चोरी, गुरू-स्त्री गमन तथा संसर्ग-दोष से हुए अनेक पाप भी इसे नष्ट हो जाते हैं और वह पवित्र हो जाता हैं वह सब तीर्थों का फल भोगता है, पतित के संग भाषण करने से लगे हुए पाप से मुक्त हो जाता है, अपनी पंक्ति मंे भोजन करने वाले सैकड़ो-हजारों पवित्र करने वाला हो जाता है और अन्त में शिवलोक में सायुज्य-मुक्ति पाता है, इससे उसका पुर्नजन्म नहीं होता।