कार्तिक

कार्तिक मास का महत्व, कार्तिक में क्या करें, और क्या न करें?

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

इस वर्ष 2018 में कार्तिक मास 23 अक्टूबर से आरम्भ हो रहा है। तथा कार्तिक पूर्णिमा 23 नवम्बर 2018 के दिन है। पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक मास के समान पुण्य प्रदायक कोई मास नहीं है, सतयुग के समान कोई युग नहीं है। वेदों के समान कोई शास्त्र नहीं, और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है। स्कन्द पुराण में भी कार्तिक मास को सबसे उत्तम मास माना गया है। इसी तरह सभी देवताओं में श्रीहरि, सभी तीर्थों में बद्रीनारायण को सबसे श्रेष्ठ माना है।

इस मास में ऐसा क्या किया जाता है, जिस से यह मास पुण्य प्रदायक है :-
कार्तिक मास में जो लोग संकल्प लेकर प्रतिदिन प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी तीर्थ स्थान, किसी नदी अथवा पोखर पर जाकर कार्तिक स्नान करते हैं, या घर में ही गंगाजल युक्त जल से स्नान करते हुए भगवान का ध्यान करते हैं, उन पर प्रभु प्रसन्न होते हैं। कार्तिक स्नान के पश्चात पहले भगवान विष्णु एवं शिव और बाद में सूर्य भगवान को अर्ध्य प्रदान करते हुए विधिपूर्वक अन्य दिव्यात्माओं को अर्ध्य देते हुए पितरों का तर्पण करना चाहिए। पितृ तर्पण के समय हाथ में तिल अवश्य लेने चाहिये क्योंकि मान्यता है कि जितने तिलों को हाथ में लेकर कोई अपने पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण करता है, उतने ही वर्षों तक उनके पितर स्वर्गलोक में वास करते हैं। इस मास अधिक से अधिक प्रभु नाम का चिंतन करना चाहिए।

स्नान के पश्चात नए एवं पवित्र वस्त्र धारण करें, तथा भगवान विष्णु जी का धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प एवं मौसम के फलों के साथ विधिवत सच्चे मन से पूजन करें, भगवान को मस्तक झुकाकर बारम्बार प्रणाम करते हुए किसी भी गलती के लिए क्षमा याचना करें। कार्तिक मास की कथा स्वयं सुनें तथा दूसरों को भी सुनाएं। कुछ लोग कार्तिक मास में व्रत करने का भी संकल्प करते हैं, तथा केवल फलाहार करते हैं, जबकि कुछ लोग पूरा मास एक समय भोजन करके कार्तिक मास के नियम का पालन करते हैं। इस मास में श्रीमद्भागवत कथा, श्री रामायण, श्रीमद्भगवदगीता, श्री विष्णुसहस्रनाम आदि स्रोत्रों का पाठ करना उत्तम है।

कार्तिक मास में दीपदान की महिमा :- वैसे तो भगवान के मंदिर में दीप दान करने वालों के घर सदा खुशहाल रहते हैं, परंतु कार्तिक मास में दीपदान की असीम महिमा है। इस मास में वैसे तो किसी भी देव मंदिर में जाकर रात्रि जागरण किया जा सकता है, परंतु यदि किसी कारण वश मंदिर में जाना सम्भव न हो तो किसी पीपल व वट वृक्ष के नीचे बैठकर अथवा तुलसी के पास दीपक जलाकर प्रभु नाम की महिमा का गुणगान किया जा सकता है। इस मास में भूमि शयन करना भी उत्तम है । पितरों के लिए आकाश में दीपदान करने की अत्यधिक महिमा है, जो लोग भगवान विष्णु के लिए आकाश दीप का दान करते हैं, उन्हें कभी क्रूर मुख वाले यमराज का दर्शन नहीं करना पड़ता, और जो लोग अपने पितरों के निमित्त आकाश में दीपदान करते हैं, उनके नरक में पड़े पितर भी उत्तम गति को प्राप्त करते हैं। जो लोग नदी किनारे, देवालय, सड़क के चौराहे पर दीपदान करते हैं, उन्हें सर्वतोमुखी लक्ष्मी प्राप्त होती है।

दान की महिमा :- कार्तिक मास में दान अति श्रेष्ठ कर्म है। स्कंदपुराण के अनुसार दानों में श्रेष्ठ कन्यादान है। कन्यादान से बड़ा विद्या दान, विद्यादान से बड़ा गौदान, गौदान से बड़ा अन्न दान माना गया है। अपनी सामर्थ्यानुसार धन, वस्त्र, कंबल, रजाई, जूता, गद्दा, छाता व किसी भी वस्तु का दान करना चाहिए तथा कार्तिक में केला और आंवले के फल का दान करना भी श्रेयस्कर है। कलियुग में कार्तिक मास को मोक्ष के साधन के रूप में दर्शाया गया है। पुराणों के मतानुसार इस मास में कार्तिक स्नान व दान चारों पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को देने वाला माना गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार नारायण ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने नारद को और नारद ने महाराज पृथु ने कार्तिक मास के सर्वगुणसंपन्न माहात्मय के संदर्भ में बताया गया है।

कार्तिक मास में जो कार्य प्रधान माने गए हैं :-
1- धर्म शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास में सबसे प्रधान कार्य दीपदान करना बताया गया है। इस मास में नदी, पोखर, तालाब आदि में दीपदान किया जाता है। इससे अतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है।
2- इस मास में तुलसी पूजन करने तथा सेवन करने का विशेष महत्व बताया गया है। वैसे तो हर मास में तुलसी का सेवन व आराधना करना श्रेयस्कर होता है, लेकिन कार्तिक में तुलसी पूजा का महत्व कई गुना माना गया है।
3- भूमि पर शयन करना कार्तिक मास का तीसरा प्रधान कार्य माना गया है। भूमि पर शयन करने से मन में सात्विकता का भाव आता है, तथा अन्य विकार भी समाप्त हो जाते हैं।
4- कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है।
5- कार्तिक मास में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई, बैंगन आदि का सेवन निषेध है।

कार्तिक व्रत के नियम :-
1- कार्तिक व्रती (कार्तिक मास में व्रत रखने वाला) को तामसिक एवं उत्तेजक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
2- किसी दूसरे के अन्न का भक्षण, किसी से द्रोह तथा परदेश गमन भी निषेध है।
3- दिन के चौथे पहर में एक समय पत्तल पर भोजन करना चाहिए।
4- कार्तिकव्रती को ब्रह्मचर्य का पालन करना तथा भूमि पर शयन करना आवश्यक होता है।
5- पूरे मास में केवल एक बार नरक चतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) को ही शरीर पर तेल लगाना चाहिए। शेष दिनों में तेल लगाना वर्जित है।
6- व्रती को लौकी, गाजर, कैथ, बैंगन आदि तथा बासी अन्न, पराया अन्न व दूषित अन्न नहीं खाना चाहिए।
7- व्रती को चाहिए कि वह तपस्वियों के समान व्यवहार करे। अर्थात कम बोले, किसी की निंदा या विवाद न करे, मन पर संयम रखें आदि !

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बगलामुखी साधना

बगलामुखी दश महाविद्याओं में ये एक अतिउग्र महाविद्या है, यह ब्रह्मास्त्रविद्या मानी जाती है, इस साधना के साधक मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन एवं विद्वेषण प्रयोग करने में समर्थ होते हैं, यह तंत्र विद्या प्रचण्ड तूफान की तरह शत्रु का मान-मर्दन करने में पूरी तरह से सक्षम है:-

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भारतीय तंत्र-शास्त्र अपने आप में अद्भुत आश्चर्य जनक एवं रहस्यमय रहा है। ज्यों-ज्यों हम इसके रहस्य की गहराई में जाते हैं। त्यों-त्यों हमें विलक्षण अनुभव होते हैं। कुछ तंत्र-मंत्र तो बलशाली एवं शीघ्र फलदायी हैं, ऐसे ही मंत्रों में एक मंत्र है – बगलामुखी मंत्र यह मंत्र तो प्रचण्ड तूफान से भी टक्कर लेने में समर्थ है, इसी लिए इस मंत्र विद्या (साधना) को ब्रह्मास्त्रविद्या कहा गया है। एक तरफ जहाँ यह मंत्र शीघ्र ही सफलता दायक है, वहीं दूसरी ओर विशेष अनुष्ठान एवं मंत्र जप के द्वारा जो बगलामुखी यंत्र सिद्ध किया जाता है, वह भी तुरन्त कार्य सिद्ध में सहायता प्रदान करता है। बहुत से तांत्रिक तो यह कहते हैं कि पूरे विश्व की ताकत भी इस मंत्र से टक्कर लेने में असमर्थ है। मंत्रमहाणर्व में इसके बारे में लिखा है:-

बृह्मस्त्रं च प्रवक्ष्यामि स्दयः प्रत्यय कारण्।
मस्य स्मरणमात्रेण पवनोडपि स्थिरावते।।

इस मंत्र को सिद्ध करने के बाद मात्र इच्छा शक्ति से ही प्रचण्ड पवन भी स्थिर हो जाती है। व्यक्ति के घर में इस मंत्र से सिद्ध यंत्र हो, या फिर जिस व्यक्ति ने अपनी भुजा पर इस यंत्र को बाँध रखा हो, उस की कभी भी शत्रु हानि नहीं कर सकते। अनेक तांत्रिकों का मत है कि आज के युग में जब पग-पग पर शत्रु हावी होने की चेष्टा करते हैं, और इस प्रकार से चारों तरफ शत्रु नीचा दिखाने का प्रयत्न करते हैैं, तब प्रत्येक उन्नति चाहने वाले व्यक्ति के लिये यह तांत्रिक साधना या यह यंत्र धारण करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य समझा जा सकता है। सारे शत्रु निवारण यंत्रों में बगलामुखी यंत्र सर्वश्रेष्ठ है यह सिद्ध तांत्रिक यंत्र अद्भुत व प्रभावशाली है, तथा किसी भी प्रकार के मुकद्दमें में सफलता देने में सहायक है। यह कह सकते हैं कि यह सिद्ध यंत्र शत्रुओं का मान-मर्दन करने में पूरी तरह से सक्षम है। जो अपने जीवन में बिना किसी शत्रुबाधा के उन्नति चाहता है, प्रगति से सर्वाेच्य शिखर पर पहुँचना चाहता है, उसके लिये बगलामुखी साधना आवश्यक है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस यंत्र का उपयोग जहाँ हिन्दू राजाओं ने अपने शत्रु के मर्दन के लिये किया था, वहीं कुछ विदेशी शासकों ने भी इसका प्रयोग कर अनेक कार्यों में सफलता प्राप्त की। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने भी अपने शत्रुओं को परास्त करने के लिये बगलामुखी साधना कराई और सफलता प्राप्त की हिन्दू शासकों में तो चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, समुंद्रगुप्त ने भी बगलामुखी साधना अपने तांत्रिकों से कराकर शत्रुओं पर विजय एवं सफलता प्राप्त की।

इस साधना से मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन एवं विद्वेषण प्रयोग भली-भाँति सफलता पूर्वक सम्पन्न किये जाते हैं। जहाँ तक मेरा अनुभव है, उस मंत्र की साधना से बांझ स्त्री को भी मनचाही संतान प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है। इसके साथ ही साथ शत्रुओं का मान मर्दन कर अपार विजय प्राप्त की जा सकती है। दरिद्र व्यक्ति को सम्पन्न बनाने के लिये मार्ग प्रशस्त किय जा सकता है, और प्रतिकूल मुकद्दमें में भी पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है। परन्तु भूल करके भी सामान्य व्यक्ति को इस प्रकार की साधना में नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि यह साधना तलवार की धार के समान है। अतः यदि थोड़ी सी भी गलती हो जाये तो साधना करने वाला व्यक्ति ही कष्ट में आ जाता है, मेरे अपने अनुभव से तो यही कहूंगा कि बिना पूरा ज्ञान प्राप्त किये जिन लोगों ने यह साधना को प्रारम्भ किया वे साधना काल में ही पागल होते देखे गये हैं, और बड़ी कठिनाई से उन्हें सामान्य अवस्था में लाया गया। अतः सामान्य पण्डित भी इस प्रकार की साधना करने में हिचकिचाते हैं, जो भी व्यक्ति इस साधना को सम्पन्न करना चाहे, उन्हें चाहिये कि वह योग्य गुरू के निर्देशन में ही कार्य सम्पन्न करें, और यदि यंत्र सिद्धकर यंत्र धारण करना चाहे तो उन्हें चाहिये कि वह बगलामुखी सिद्धि किसे हुए विद्वान की देखरेख में यह साधना सम्पन्न करें। साधना काल में प्रत्येक साधक को दृढ़ता के साथ इनसे सम्बंधित नियमों का पालन करना चाहिये।

साधना काल में ध्यान रखने योग्य बातें:-
1. बगलामुखी साधना में साधक को पूर्ण पवित्रता के साथ मंत्र जप करना चाहिये और उसे पूरी तरह ब्रह्माचर्य व्रत का पालन करना चाहिये।

2. साधक को पीले वस्त्र धारण करना चाहिये, धोती तथा ऊपर ओढ़ने वाली चादर दोनों ही पीले रंग में रंगी हो।

3. साधक एक समय में भोजन करें और भोजन में बेसन से बनी हुई वस्तु का प्रयोग अवश्य करें।

4. साधक को दिन में नींद नहीं लेना चाहिये न व्यर्थ की बातचीत करें, और न किसी स्त्री से किसी प्रकार का सम्पर्क स्थापित करें।

5. साधना काल में साधक बगलामुखी यंत्र बनाकर उसे स्थापित कर उसके मंत्र जाप करें।

6. साधना काल में साधक बाल न कटवायें और न क्षौर कर्म ही करें।

7. यह साधना या मंत्र जाप रात्रि को होता है। अतः यह साधना रात के समय 10 बजे से प्रातः 4 बजे के बीच करें, परन्तु जो साधना सिद्धि कर चुके हैं, वे साधक या ब्राह्मण दिन को भी मंत्र जाप कर सकते हैं।

8. साधना काल में पीली गौ का घी प्रयोग में लें तथा दीपक में जिस रूई का प्रयोग करें उसे पहले पीले रंग में रंग कर सुखा लें और उसके बाद ही उस रूई को दीपक के लिये प्रयोग करें।

9. साधना में 36 अक्षर वाला मंत्र प्रयोग करना ही उचित है और यही मंत्र शीघ्र सफलता देने में सहायक है।

10. साधना घर के एकांत कमरे में देवी मंदिर में, पर्वत शिखर पर शिवालय में या गुरू के समीप बैठकर की जानी चाहिये।

11. इसके मारण, मोहन वंशीकरण, उच्चाटन कई प्रयोग हैं। अतः गुरू से आज्ञा प्राप्त कर उसके बताये हुये रास्ते से ही साधना करना चाहिये।

13. मोक्ष प्राप्ति के लिये क्रोध का स्तम्भन आवश्यक है, और यह इस प्रयोग से संभव है। अतः मोक्ष प्राप्ति के लिये भी इसका प्रयोग साधक और वैष्णव लोग करते हैं।

14. साधना में कुलाचार का पूजन, वीर साधना, चक्रानुष्ठान अवश्य ही करना चाहिये जिससे कि कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हो सकें। महान शत्रुओं पर विजय आसुरी तत्वों पर विजय, शत्रुभय निवारण और शत्रु संहारक तथा राजकीय महाभय, कोर्ट केस और बंधन से मुक्ति के लिये यह अमोघ और शत्रुदमन ब्रह्मास्त्रविद्या कवच है।

इस मंत्र से सिद्ध साधक को बगलामुखी महायंत्र को सोने पर उत्कीर्ण करवा कर या भोजपत्र के ऊपर केशर, अष्टगंध से लिखकर प्रतिष्ठा पुरश्चरण विधान करके प्राण-प्रतिष्ठा पूर्वक सोने के कवच में बंद कर देना चाहिए, बाद में ब्रह्मास्त्र बगलामुखी सवालक्ष मंत्र से सिद्ध करके धारण करने से शत्रु का दमन होता है। राजकीय केस में भी सफलता मिलती है। इस ब्रह्मास्त्र प्रयोग से सर्वकार्य में विजय, यश प्राप्त होता है। तथा मारण-मोहन, वशीकरण, स्तंभन, उच्चाटन, मूठ-चोट आदि तमाम शत्रु द्वारा उत्पन्न संकट दूर होते हैं। भूत-प्रेतादि महाभय नष्ट होते हैं, तथा सर्व प्रकार से सर्व दिशाओं से विजय प्राप्त होती है। ऐसा अमोघ ब्रह्मास्त्रविद्या कवच जो जगत में सर्वोपरि है, उससे ऊँचा कोई यंत्र, मंत्र या तंत्र जगत में नहीं है।

श्री ब्रह्मास्त्र महाविद्या मंत्र – तंत्र शास्त्र में दशमहाविद्या की महिमा अतिविशिष्ठ है। उसमें सर्वोपरि बगला उपासना जो सर्वसिद्ध है। परन्तु वह गुरूगम्य होने से योग्य गुरू के पास मंत्र दीक्षा ग्रहण करने के बाद उपासना करने से सिद्धि प्राप्त होती है। पुरश्चरण सिद्धि करने से या योग्य विद्वान के पास करवाने से सिद्ध होता है। क्योंकि क्रिया शुद्धि के बिना मंत्र सिद्धि नहीं होती है।

पुरश्चरण:-

पीताम्बरधरो भूत्वा पूर्वाशाभिमुखः स्थितः। लक्षमेकं जपेन्मत्रं हरिद्रा ग्रन्थि मालया।।
ब्रह्मचर्य स्तो नित्यं प्रयतो ध्यान तत्परः। पियंगुकुसमे नापि पीतयपुष्येन होमयेत्।।

बगलामुखी पुरश्चरण के लिये एकान्त जगह, जमीन गाय के गोबर से लीपी हुई, पीला आसन, पीला पीताम्बर, पीली हल्दी की माला, पीला पात्र, सुवर्ण प्रतिमा यंत्र तथा पीले फूल, केसर, हल्दी, अष्टगंध से अर्चन फिर अंगन्यास, करन्यास आदि करके आह्वान ध्यान फिर सवालक्ष मंत्र अनुष्ठान, दशांश पीत पुष्प से हवन, तर्पण, मार्जन, ब्रह्मभोजन, कुमारी पूजन, भोजन से अनुष्ठान सिद्ध होता है।

श्री बगलामुखी मंत्र –
ॐ हृीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदंस्तम्भ्यजिह्वां। कीलय बुद्धिं विनाशाय हृीं ऊँ स्वाहा।।

यह महामंत्र मूल मंत्र है जिसका पुरश्चरण करने से पहले निम्न मंत्रों से पूजा करनी चाहिये।

बगलामुखी गायत्री मंत्र –
ॐ बगलामुख्यैच विद्नहे स्तम्भिन्यै च धीमहि तन्नौदेवी प्रचोदयात्।।

बगलामुखी देवी यंत्र मूर्ति, न्यास, प्राण प्रतिष्ठा, महापूजन करके निम्न मंत्र से ध्यान करके पुरश्चरण करना चाहिये।

विनियोग:-
ॐ अस्य श्री बगलामुखी मन्त्रस्य नारद ऋषिः त्रिष्टुप छन्दः बगलामुखी देवता हृीं बीजम स्वाहा शक्तिः ममाअभीष्ट सिध्यर्थेजपे विनियोगः।

ध्यानम:-
मध्ये सुधाब्धिमणि मण्डय रतन्वेधां। सिंहा सनोपरि गतां पर पीतवर्णाम।।
पीताम्बरा भरण-मालय- विभूषितांगी। देवी स्मरामि धृत-मुदगर वैरि जिह्वाम।।
जिह्यग्र मादाय करेण देवी वामेन शत्रुन परिपीडयन्तीम्। गदाभिधातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढयां द्विभुजां नमामि।।

उपरोक्त ध्यानादि के बाद पूर्व दिशा में मुख रखकर सरसों तेल का दीपक जलाकर कलश स्नापनादि करके एक ही आसन पर नियमित रूप से हर रोज 41 माला 31 दिन तक करें। और सवालक्ष पूर्ण करके दशांश क्रम से महापुरश्चरण सिद्ध होता है, तथा बगलामुखी कवच ब्रह्मस्त्र गले में या भुजा में धारण करने से त्रैलोक्य विजयी भवेत् हर जगह से विजय प्राप्त होती है।

बगला साधना से किस-किस प्रकार की समस्या का समाधान संभव है :-
बगलामुखी उपासना से मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, अनिष्ट ग्रहों के आवरणों से मुक्ति, मन इच्छित व्यक्ति का मिलन, शत्रु पर विजय, कोर्ट केस में विजय, बंधन, जेल से मुक्ति होती है, तथा शत्रु के अलावा पर बुद्धि, देव, दानव, सर्प और हिंसक प्राणियों पर भी स्तंभन होता है।

देवी के प्रमुख मंदिर:- बगलामुखी का मन्दिर दतिया गोहाटी आसाम में है। गोहाटी जयपुर से डायरेक्ट वायुयान द्वारा जाया जा सकता है।

बगलामुखी साधना में प्रयोग होने वाली सामग्री :-
आकर्षण:- शहद, घी, मिश्री के साथ नमक का हवन करने से सभी का आकर्षण होता है।

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श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष साधना

श्री महालक्ष्मी कल्पवृक्ष दीपावली सिद्धि प्रयोग :-

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वैसे तो श्रीमहालक्ष्मीजी की साधना अनेक अवसरों पर की जाती है, परंतु दीपावली पर्व श्रीमहालक्ष्मीजी की विशेष कृपा प्राप्ति का ऐसा पर्व है, जिस पर्व को साधक वर्ग तथा तंत्र के ज्ञाता महासिद्धिपर्व के नाम से पुकारते हैं, कारण यह है, कि प्रत्येक वर्ष में साधारण पर्व तो कम-से-कम 8 (1. चैत्र नवरात्र। 2. दो गुप्त नवरात्र। 3. शारदीय नवरात्र। यह चार नवरात्र पर्व हैं, तथा 4. होली। 5. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी। 6. महाशिवरात्रि। और 7. कम से कम दो ग्रहणकाल।) यह सभी 8 सिद्धिपर्व हर वर्ष साधकों के लिये उपलब्ध होते हैं। परंतु इसके अतिरिक्त महासिद्धिपर्व केवल एक ही उपलब्ध रहता है, और वह है- श्रीमहालक्ष्मीपर्व महासिद्धिपर्व ‘दीपावली पर्व’ जो सभी साधकवर्ग को प्रिय होता है, तथा इस विशेष अवसर की प्रतीक्षा हर एक को रहती है। चाहे वे तांत्रिक हो या साधक अथवा साधारण गृहस्थ ही हो। यहाँ आगे की पंक्तियों में इसी महासिद्धिपर्व (दीपावली) पर की जाने वाली एक विशेष साधना का उल्लेख किया जा रहा है, जिसे कोई भी साधक या गृहस्थ चाहे वे स्त्री हो या पुरूष सिद्ध कर सकता है, आवश्यकता है तो केवल दृढ़ इच्छाशक्ति की।

प्रस्तुत साधना “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” सिद्धि ऐसी महत्वपूर्ण साधना है, जिसमें कमलधारणी महालक्ष्मी के एक ऐसे यंत्र को सिद्ध किया जाता है, जिसमें एक ओर लक्ष्मी जी का यंत्र तथा दूसरी ओर श्रीलक्ष्मी का चित्र उत्कीर्ण हुआ हो, तथा वह यंत्र ऐसे आकार में बनाया गया हो, जो कि गले में धारण किया जा सके इसके लिए एक चांदी के ऐसे लाकेट को सिद्धि किया जाता है, जिसके एक ओर लक्ष्मी जी का यंत्र तथा दूसरी ओर श्री लक्ष्मी का चित्र उत्कीर्ण हुआ हो, यह साधना केवल दीपावली पर्व की मध्यरात्रि में ही सम्पन्न की जाती है। कमल धारिणी महालक्ष्मी की यह चांदी पर उत्कीर्ण लॉकेट “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” कहलाती है। इस सिद्ध लघु प्रतिमा को सिद्ध करने के उपरांत साधक या साधिका इसे गले में धारण कर सकते हैं। अर्थात सिद्ध श्री महालक्ष्मी कल्पवृक्ष हमेशा अपने ही निकट प्रकाशित होता रहता है। इस साधना को सम्पन्न करने वाले साधक या गृहस्थ को कभी भी किसी भौतिक वस्तु की कमी नही रहती। जब भी आवश्यकता हो मां लक्ष्मी के चरणों में बैठकर सच्चे मन से उसे याद करें श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष की तरह साधक की हर मुराद पूर्ण करती हैं, यदि साधक ने यह साधना सिद्ध कर ली है, और उसके पास अपना भवन नहीं, या वाहन नहीं या फिर विवाह अथवा संतान बाधा है, तो कल्पवृक्ष की तरह साधक सिद्ध श्रीमहालक्षमी कल्पवृक्ष प्रतिमा के समक्ष अपनी कामना रखे, वास्तव में ही वह कामना चाहे विवाह की हो या संतान के लिये अथवा भवन, वाहन के लिये हो अवश्य साधक इनका स्वामी होता है। इसी लिये तो इस साधना को तंत्र क्षेत्र के विद्वानों ने अति गोपनीय साधनाओं की श्रेणी में रखा है। साधना के उपरांत अपने गले में यह सिद्ध कल्पवृक्ष रखने मात्र से ही साधक को धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह साधना अन्धकार में प्रकाश की तरह है, जो साधक इस अद्वितीय साधना को दीपावली की रात्रि में सिद्ध करता है, (अपने घर या व्यापार स्थान में अथवा दोनो ही स्थानों में साधना द्वारा “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष”) धारण करता है, वह वास्तव में ही सौभाग्यशाली माना जाता है, वास्तव में ही उसके घर तथा व्यापार स्थल में समृद्धि के देव निवास करते हैं, वास्तव में ही उसके घर में कल्पवृक्ष स्थापित रहता है। और जब तक वह “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” गले में धारण किये रहता है, तब तक उस के घर में महालक्ष्मी का निवास सदा बना रहता है। देखा गया है कि इस साधना की सिद्धि करने वाले साधक के घर में जब से “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” स्थापित हुआ, कुछ ही दिनों में उसका कर्ज उतर गया, आर्थिक तंगी के कारण होने वाले घर के लड़ाई-झगड़े समाप्त हो गये, व्यापार में वृद्धि होने लगी, आर्थिक उन्नति और राज्य में सम्मान प्राप्ति होने लगी है, और उसके जन्म-जन्म के दुःख और दर्द समाप्त होने लगे हैं। वास्तव में ही इस सिद्धि की जितनी प्रशंसा उपनिषदों में की है, और आगे के ऋषियों ने भी इस साधना की विशेषताएं बतलाई हैं, वे अपने आप में अन्यतम हैं। इस सिद्धि से प्राप्त ऊर्जा के प्रभाव से श्रीमहालक्ष्मी का असीम भण्डार प्राप्त कर जीवन की पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। इस सकारात्मक ऊर्जा में तांत्रिक और मांत्रिक दोनों शक्तियों का पूर्ण समावेश है, यह सिद्धि अपने आप में अद्वितीय है।

साधना प्रयोग-
यद्यपि शास्त्रों में बताया गया है, कि ऐसी महासाधना हर मनुष्य को सिद्ध करना आवश्यक है, क्योंकि यदि साधक को सदा एक जैसी ऊर्जा बनाये रखनी है, तो जीवन में एक बार इस श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष साधना को अवश्य सिद्ध करना चाहिए, जिस की सकारात्मक ऊर्जा वर्षो तक साधक के शरीर में प्रभावशाली बनी रहती है।

इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन अमावस्या तिथि दिल्ली की गणना अनुसार लगभग 20:32 तक रहेगी। महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। इन दोनो महूर्त में स्वाती नक्षत्र 19 बजकर 37 मिनट तक, इसके पश्चात विशाखा नक्षत्र पढेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन दोनो लग्नों का यह समय दिल्ली प्रदेश के लिये है। शेष भारत अथवा विदेशों में रहने वाले पाठक अपने देश या प्रदेश के लिये उपरोक्त स्थिर लग्नों का समय shukracharya कार्यालय से फोन द्वारा पता कर सकते हैं। इन्हीं दो स्थिर लग्न में से किसी लग्न में जब अनुकूल चौघड़िया भी हो तब महालक्ष्मी पूजन किया जा सकता है।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़िया मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग। 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चौघड़िया
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चौघड़िया पूजन के समय होनी चाहियें। इस प्रकार शुद्ध ज्योतिषीय गणनाओं तथा विशेष दृष्टिकोंण से यह स्पष्ट होता है, कि साधना व पूजन के लिये 7 नवम्बर 2018 की रात्रि 19:00 से 19:52 वृषभ लग्न के साथ साथ शुभ का चौघडिया भी अत्यन्त विशेष फलदायक तथा सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त हैं। अतः सभी गृहस्थ तथा साधक-साधिकाओं से मेरा यही आग्रह है की वे इस वर्ष इसी मुहूर्त में दीपावली पूजन अथवा तंत्र-मंत्र सम्बंधी साधनायें सम्पन्न करें।

विनियोग- अस्य श्री महालक्ष्मी हृदयमाला मंत्रस्य भार्गव ऋषिः आद्यादि श्री महालक्ष्मी देवता, अनुष्टुपादिनाना छन्दांसि, श्री बीजम् हृीं शक्तिः, ऐं कीलकम् श्री महालक्ष्मी प्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

इसके बाद साधक हाथ में जल ले कर संकल्प करें कि मैं अमुक गौत्र अमुक पिता का पुत्र, अमुक नाम का साधक दीपावली के पर्व पर भगवती लक्ष्मी को नवनिधियों के साथ अपने घर में स्थापित करने के लिये यह प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूँ। ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल भूमि पर छोड़ दें, और फिर “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” (चांदी पर उत्कीर्ण लॉकेट) के सामने शुद्ध घृत के पांच दीपक लगावें (यह दीपक पूरी रात्रि जलते रहें इतना घी इनमें डाल देना चाहिये।) सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करें, और दूध के बने हुये प्रसाद का नैवेद्य समर्पित करें, इसके बाद हाथ जोड़ कर ध्यान करें।

ध्यान- हस्तद्वयेन कमले धारयन्तीं स्वलीलया। हारनूपुरसंयुक्तां लक्ष्मीं देवी विचिन्तये।।

इसके बाद साधक स्फटिक की सिद्धलक्ष्मी माला से निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप करें, इसमें सिद्धलक्ष्मी माला का ही प्रयोग होता है, यह विशेष ध्यान रखें।

महामंत्र- ॐ श्रीं हृीं ऐं महालक्ष्म्यै कमल धारिण्यै पुष्पसिंहासन्यै स्वाहा।

इसके बाद साधक लक्ष्मीजी की आरती करें और “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” को अपने पूजास्थान तथा सिद्धलक्ष्मी माला को पीले वस्त्र में लपेटकर अपनी तिजोरी में रख दें या पूजा स्थान में रहने दें, प्रसाद को घर के सभी सदस्यों में वितरित कर दें, इस प्रकार यह साधना सम्पन्न होती है जो कि इस वर्ष की श्रेष्ठतम और अद्वितीय साधना कही जा सकती है।

साधना सामग्री :- स्फटिक की सिद्धलक्ष्मी माला, तथा “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” (चांदी पर उत्कीर्ण लॉकेट)। इस साधना सामग्री के लिए न्यौक्षावर राशि 3600/-रू मात्र है। जो कि विशेष मुहर्त में निर्मित करवाकर श्रीमहालक्ष्मी के सिद्ध मंत्रों से प्राणप्रतिष्ठित है, साधना सामग्री का पैकिट आप भी कार्यालय से मंगवा सकते हैं। इस पैकिट को जितना जल्दी हो सके मंगवा लें। दीपावली से कम से कम 20-25 दिन पहले तो अवश्य ही कार्यालय से सम्पर्क करके यह साधना सामग्री मंगवा लेना उचित होगा। क्योंकि पार्सल डाक द्वारा भेजा जाता है। पार्सल पहुँचने में कभी-कभी 10 से 15 दिन या अधिक का समय भी लग जाता है। अतः आपकी साधना समग्री सही समय पर आपके पास पहुँच जाये, इस बात का विशेष ध्यान रखें।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

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महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र

इस दीपावली पर्व पर दीपावली की रात्रि यह प्रयोग सिद्ध करें- ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

इस ‘महायंत्र’ की साधना केवल दीपावली पर्व पर ही सम्पन्न की जाती है। कमल धारिणी महालक्ष्मी का यह सिद्ध यंत्र यदि साधक के पास रहता है, तो अवश्य ही वह अपने जीवन में आर्थिक परेशानी से उबर कर भू-सम्पदा का स्वामी होता है, केवल मात्र घर में इस यंत्र के रखने से ही उसे धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यह यंत्र तो अन्धकार में प्रकाश की तरह है, जो साधक इस अद्वितीय महायंत्र की स्थापना दीपावली की रात्रि में अपने घर या व्यापार स्थान में अथवा दोनो ही स्थानों में करता है, वह वास्तव में ही सौभाग्यशाली माना जाता है, वास्तव में ही उसके घर में समृद्धि के देव निवास करते हैं, वास्तव में ही उसके घर में लक्ष्मी को बरसना पड़ता है, और जब तक वह ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ घर में स्थापित रहता है, तब तक उस घर में लक्ष्मी का निवास बराबर बना रहता है। ऐसा महायंत्र घर में स्थापित होने पर कर्ज, उतर जाता है, आर्थिक परेशानी के कारण होने वाले घर के लड़ाई झगड़े कुछ ही समय में समाप्त हो जाते हैं, व्यापार की समस्या दूर होती हैं, क्योंकि व्यापार में वृद्धि होने लगती है, आर्थिक उन्नति और राज्य में सम्मान प्राप्ति होती है, और उसके जन्म-जन्म के दुःख और दर्द समाप्त होने लगते हैं।

वास्तव में ही इस ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ की जितनी प्रशंसा उपनिषदों में की है, और आगे के ऋषियों ने इस महायंत्र की जितनी विशेषताएं बतलाई है, वे अपने आप में अन्यतम हैं। वशिष्ठ, विश्वामित्र, आदि ऋषियों ने इस प्रकार के महायंत्र को ‘कामधेनु’ की संज्ञा दी है। कुबेर ने भी इस महायंत्र को फलप्रदायक बताया है। इस ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ को स्थापित कर, इससे संबंधित मंत्र के जप से असीम लक्ष्मी का भण्डार प्राप्त कर जीवन में भरपूर आर्थिक उन्नति प्राप्त की जा सकती है। इस यंत्र को तांत्रिक और मांत्रिक दोनों शक्तियों से सिद्ध व सम्पन्न किया जाता है, सिद्ध अवस्था में यह महायंत्र अपने आप में अद्वितीय है।

सिद्धि-साधना प्रयोग :-
यह महायंत्र वर्ष में केवल एक दिन ‘दीपावली की रात्रि’ में स्थिर लग्न में, महालक्ष्मी पूजन के साथ ही सिद्ध हो सकता है, और दीपावली के दिन महालक्ष्मी का पूजन केवल स्थिर लग्न में ही सम्पन्न किया जाना चाहिये, और अमावस्या की रात्रि को वृषभ और सिंह मात्र दो ही स्थिर लग्न कहते हैं, अतः इन लग्न-मुहर्त में ही सिद्धि-साधना प्रयोग सम्पन्न होना चाहिये। इस वर्ष दीपवाली का पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, तथा दीपावली के दिन वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इन दोनो महूर्त में स्वाती नक्षत्र 19 बजकर 37 मिनट तक, इसके पश्चात विशाखा नक्षत्र पढेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन दोनो लग्नों का यह समय दिल्ली प्रदेश के लिये है। शेष भारत अथवा विदेशों में रहने वाले पाठक अपने देश या प्रदेश के लिये उपरोक्त स्थिर लग्नों का समय shukracharya कार्यालय से फोन द्वारा पता लगा लें। क्योंकि ज्योतिष की दृष्टि से विचार करने पर यह स्पष्ट होता है, कि यंत्र-मंत्रों की सिद्धि के लिये यह दोनों लग्न (वृष तथा सिंह) अत्यन्त विशेष फलकारक तथा प्रभावशाली हैं। यद्यपि शास्त्रों में बताया गया है, कि ऐसा महायंत्र स्थापित करने के समय की जाने वाली साधना के पश्चात् इस के अतिरिक्त किसी भी प्रकार की महालक्ष्मी साधना करना आवश्यक नहीं है, परन्तु फिर भी यदि साधक एक माह में एक बार इस ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ को गूगल का धूआँ (धूप) देता रहे तो यह वर्षो तक प्रभावशाली बना रहता है।

सबसे पहले साधक दीपावली की रात्रि में शुभ लग्न मुहर्त से पूर्व स्नानादि करके पवित्र होकर शुभ मुहूर्त में अपने पूजा स्थान में बैठ जाये यदि विवाहित हैं, तो अपनी गृहलक्ष्मी के साथ अपने पूजा स्थान में बैठ जायें और सामने एक लकड़ी के तख्ते पर पीला रेशमी वस्त्र बिछा कर उस पर इस ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ को स्थापित कर दें, इसके बाद फूल, चावल, रोली, कलावा तथा सुपारी समर्पित करके यंत्र की पंचोपचार पूजा करनी चाहिये तथा फिर शुद्ध केशर से इस ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ पर चारों कोनों पर एक-एक बिन्दियां लगायें जो सिद्धि-समृद्धि की प्रतीक है। इसके बाद सीधे हाथ में जल ले कर विनियोग करें-

विनियोग-
अस्य श्री महालक्ष्मी हृदयमालामंत्रस्य भार्गव ऋषिः आद्यादि श्री महालक्ष्मी देवता,अनुष्टुपादिनानाछन्दांसि, श्री बीजम् हृीं शक्तिः, ऐं कीलकम् श्री महालक्ष्मी प्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

इसके बाद साधक हाथ में जल ले कर यह संकल्प करें कि मैं अमुक गौत्र अमुक पिता का पुत्र, अमुक नाम का साधक दीपावली के पर्व पर शुभ लग्न मुहर्त में भगवती महालक्ष्मी को नवनिधियों के साथ अपने घर में स्थापित करने के लिए यह प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूँ। ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल भूमि पर छोड़ दें, और फिर ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ के सामने शुद्ध घृत के पांच दीपक लगावें (यह दीपक पूरी रात्रि जलते रहें इतना घी इनमें डाल देना चाहिये।) सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करें, और दूध के बने हुए प्रसाद का नैवेद्य समर्पित करें, इसके बाद हाथ जोड़ कर ध्यान करें।

ध्यान-
हस्तद्वयेन कमले धारयन्तीं स्वलीलया।
हारनूपुरसंयुक्तां लक्ष्मीं देवी विचिन्तये।।

इसके बाद साधक स्फटिक की ‘सिद्धलक्ष्मी माला’ से निम्न मंत्र की 21 माला मंत्र जप करें, इसमें ‘सिद्धलक्ष्मी माला’ का ही प्रयोग होता है, यह विशेष ध्यान रखें।

महामंत्र-
ॐ श्रीं हृीं ऐं महालक्ष्म्यै कमल धारिण्यै सिंहवाहिन्यै स्वाहा।

इसके बाद साधक लक्ष्मीजी की आरती करे और ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ को तथा ‘सिद्धलक्ष्मी माला’ को उसी आसन वाले पीले वस्त्र से लपेट कर अपनी तिजोरी में रख दें, या फिर आसन पर ही पूजा स्थान में रहने दें, तथा प्रसाद को घर के सभी सदस्यों में वितरित कर दे, इस प्रकार यह साधना सम्पन्न होती है, जो कि इस पर्व की श्रेष्ठतम और अद्वितीय साधना कही जा सकती है।

दीपावली साधना सामग्री :-
इस साधना को सम्पन्न करने के लिए कुछ प्राणप्रतिष्ठित आवश्यक सामग्री की आवश्यकता होती है :- 1. शुद्ध चांदी पर विशेष मुहर्त में निर्मित ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’। 2. स्फटिक की ‘सिद्धलक्ष्मी माला’ । 3. शुद्ध केशर। यह सामग्री आप हमारे कार्यालय से मंगवा सकते हैं। परंतु इस ‘दीपावली साधना सामग्री’ का पैकिट आपको दीपावली से 15-20 दिन पहले आर्डर करना चाहिए।

यदि आप साधना नहीं कर सकते-

यदि आप ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र साधना’ सम्पन्न नहीं कर सकते, अथवा आप को साधना पद्धति जटिल लगती है, तब एेसी स्थिति में आप दीपावली की रात्रि सिद्ध मुहूर्त में सिद्ध किया गया ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ हमारे कार्यालय में सम्पर्क करके आर्डर कर सकते हैं। (कार्यालय से मंगवा सकते हैं।) इस शुद्ध चांदी पर निर्मित ‘महालक्ष्मी सिद्ध महायंत्र’ तथा स्फटिक की ‘सिद्धलक्ष्मी माला’ के लिये न्यौक्षावर राशि मात्र 5100/-रू है।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

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शाबर मंत्र साधना shabar mantra

Shabar mantra :- मंत्र तीन प्रकार के होते हैं – वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक।

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka bhavishya.in), Astrological consultant, shukracharya

विद्वानों की धारणा है कि कलियुग में तांत्रिक मंत्र सफल होते हैं, कलियुग के लिये तांत्रिक मंत्र ही शक्तिशाली हैं। तांत्रिक मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं – शाबर मंत्र, Shabar mantra डामर मंत्र और बीजाक्षर मंत्र। इन तीनों प्रकार के तांत्रिक मंत्रों का अपना-अपना विज्ञान है। जो लोग उसके वैज्ञानिक रहस्य को समझते हैं, वे ही मंत्रों का प्रयोग कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। शास्त्रों में हमें स्थान-स्थान पर शाबर मंत्रों के विषय में वर्णन मिलता है। यह एक प्रकार के तांत्रिक उपाय ही होते हैं, Dr.R.B.Dhawan, shukracharya के अनुसार इन की साधना करना थोड़ा जटिल कार्य होता है, परन्तु यदि सही ढंग से इन्हें सिद्ध कर लिया जाये तो लाभ भी अवश्य ही मिलता है। यहाँ मैं आपको कुछ शाबर मंत्रों के बारे में बताने जा रहा हूँ :-

1. दरिद्रता दूर करने के लिये धनदा मंत्र:- गरीबी और अभावों से मुक्ति के लिये धनदा मंत्र अत्यंत प्रभावकारी है।

मंत्र:- नमः विष्णवे सुरपतये महाबलाय स्वाहा।।

2. पदोन्नति के लिये भद्रकाली मंत्रः- भद्रकाली यंत्र को महाकाली यंत्र भी कहा जाता है। इसे स्वर्ण पर अंकित करायें। पैंतालिस दिनों तक प्रति दिन एक हजार बार मंत्र का जाप करें।
त्रयाणां देवानां त्रिगुण जनितानां तव शिवं मवेत् पूजा, पूजा तव चरणयोर्या विराचेता। महानिशा में शाबर मंत्रों की साधना- शाबर मंत्र किसी वेद, शास्त्र पुराण या अन्य ग्रन्थ में एक जगह संकलित नहीं मिलता। ये मंत्र लोक भाषा में प्रचलित हैं तो अपने से स्वयं सिद्ध हैं। यह तो साधक पर निर्भर करता है, कि वह मंत्रों का कब और कैसे प्रयोग करें।

3. रक्षा कवच मंत्र:- साधक हो या सामान्य व्यक्ति हर किसी को सर्वप्रथम अपनी रक्षा करनी चाहिये। हो सकता है आपके ऊपर ही कोई दूसरा तांत्रिक प्रयोग कर दे तो आप दूसरों की रक्षा करने से पहले ही स्वयं कष्ट में पड़ जायेंगे। ऐसी स्थिति में सर्वप्रथम अपनी रक्षा और बचाव करना चाहिये :-

मंत्र:- ॐ नमो आदेश गुरून को ईश्वरी वाचा, अजरी बजरी बाड़ा बजरी मैं बांधा दसो दुवार छवा और के घालो तो पलट हनुमंत वीर उसी को मारे पहली चैकी गनपती, दूजी चैकी हनुमंत, तीजो चैकी से भैरों चैथी, देह रक्षा करन को आवे श्री नरसिंह देवजी, शब्द सांचा पिंड सांचा चले मंत्र ईश्वरी वाचा।।

उक्त मंत्र शारीरिक पीड़ा से छटपटाते व्यक्ति पर भी प्रयोग किया जा सकता है। यदि किसी को भी मूर्छा आ जाये और कष्ट से घिर जाये तो इस मंत्र से झाड़ देने से वह व्यक्ति अच्छा हो जाता है, और शीघ्र स्वस्थ प्रसन्न जो जाता है। उक्त शाबर मंत्र Shabar mantra का प्रयोग किसी उपद्रव ग्रासित घर को शुद्ध करने में भी किया जाता है।

4. शत्रु एवं प्रतिद्वंदी को परास्त करने के लिये:- यह मंत्र अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को परास्त करने के लिये प्रयोग में लाया जाता है। महानिशा में इसे 108 बार पढ़कर हवन करके सिद्ध कर लिया जाता है। फिर जब चाहें अपने लिये प्रयोग करें। दूसरों के लिये इसका प्रयोग गंडा या ताबीज के रूप में किया जाता है –

मंत्र:- हाथ बसे हनुमान भैरों बसे लिलार, जो हनुमंत को टीका करे मोरे जग संसार। जो आवे छाती पांव धरे बजरंग बीर रक्षा करें, महम्मदा वीर छाती टोर जुगुनियाँ, बीर शिर फोर उगुनिया बीर मार-मार भास्वत करे भैरों बीर की आन फिरती रहे बजरंग बीर रक्षा करे, जो हमरे ऊपर घाव छाले तो पलट हनुमान बीर उसी को मारे जल बाँधे थल बाँधे आर्या आसमान बाँधे कुदवा और कलवा बांधे चक चक्की आसमान बाँधे वाचा साहिब साहिब के पूत धर्म के नाती आसरा तुम्हारा है।

5. सुख पूर्वक प्रसव का मंत्र:– इस मंत्र को 108 बार हवन करके सिद्ध कर लेने पर जब प्रयोग करना हो तब 11 बार पढ़कर जल अभिमंत्रित करके गार्भिणी को पिला दें। तुरंत सुख पूर्ण प्रसव हो जायेगा।

मंत्र:- ॐ मुक्ताः पाशा विमुक्ताः मुक्ताः सुर्येणरश्मयः। मुक्ताः सर्वभयापूर्व ऐहि माचिर-माचिर स्वाहा।।

6. चिंतित कार्य की सफलता के लिये:- जब किसी कार्य के होने न होने की चिंता बनी हो अथवा शत्रु भय या राज भय हो अथवा कोई कामना जो पूर्ण न हो रही हो तो निम्न मंत्र की एक माला नित्य जप लें। कुछ दिनों में ही चिंता समाप्त हो जायेगी और मंत्र सिद्ध हो जायेगा।

मंत्र:- ॐ हर त्रिपुर भवानी बाला, राजा प्रजा मोहिनी सर्व शत्रु। विध्यवासिनी मम चिंतित फलं, देहि-देहि भुवनेश्वरी स्वाहा।।

7. रोग हरण के लिये:- निम्न मंत्र की 21 माला महानिशा (काली रात) में जपकर सिद्ध कर लें। फिर जब कोई बीमार हो तब किसी बर्तन में शुद्ध जल लेकर इसे 21 बार पढ़कर जल को फूँककर मंत्रित करके रोगी को पिला दें। रोगी पहले से, ठीक होने लगेगा। रोग एवं रोगी की स्थिति के अनुसार इस तरह का अभिमंत्रित जल 3, 5, 7, 11, 21 दिन तक देना चाहिये।

मंत्र:- ॐ सं सां सिं सीं सुं सूं सें सैं सों सौं सं सः वं वां विं वीं वुं वूं वें वैं वों वौं वं वः सह अमृत वरचे स्वाहा।

शाबर मंत्र की विश्वश्नीयता पर कभी भी शक नहीं किया जा सकता है। परन्तु इनकी सिद्ध के लिये साधना का ढंग एकदम सही व सटीक होना चाहिये। (Top best astrologer in Delhi), marriage and after marriage problems salutations.

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मंत्र सिद्धि Mantra Siddhi

Mantra Siddhi :- मंत्र सिद्धि और मंत्रों में विद्युत शक्ति कैसे कार्य करती है? :-

Dr.R.B.Dhawan (editor – AAP ka Bhavishya), top best astrologer in delhi,shukracharya

यह अटूट सत्य है कि मंत्रों में अपार शक्ति है, परन्तु मंत्र साधना Mantra Siddhi क्यों और कैसे होती है ? हमारे इस भौतिक शरीर में दो और शरीर हैं – 1. वैद्युतिक (सूक्ष्म शरीर) और 2. मानसिक (कारण शरीर)। हम जो खाते हैं उससे उक्त तीनों शरीरों को पोषण प्राप्त होता है, और तीनों का प्रथक-प्रथक एवं संयुक्त कार्य है। हमारे स्थूल शरीर के प्रश्न के उत्तर में हमें यह भली प्रकार जान और मान लेना चाहिये कि आकाश में सूक्ष्म रूप में अन्य तत्व भी तो हैं। इस अन्यान्य तत्वों में आकाश भी गौण रूप में विद्यमान है। guruji shukracharya के संस्थापक जी का कथन है कि यह समस्त संसार जो भिन्न-भिन्न रूप और प्रकृति में दिखायी पड़ता है, वह मूलभूत इन्हीं पाँच तत्वों की माया है। उनका अनुपात विभिन्न प्रकार की आकृतियों स्वभाव और गुण धर्म का कारण बनता है। इन तथ्यों के प्रतीक अथवा तन्मात्रा जिस स्थूल में प्रजनन और संहार, आकर्षण और विकर्षण का कारण बनती है।

भारतीय संस्कृति ज्ञान या भारतीय वाङ्मय में शब्द को ब्रह्म का प्रतीक माना जाता है। यहाँ तक कि ब्रह्म का गुणात्मक शरीर शब्द ही तो है। इस संसार में यदि शब्द को हटा दिया जाये तो मानव समाज मूक ही नहीं अपितु सम्पूर्ण जड़-चेतन और चैतन्यता स्थिर हो जायेगा, और स्थिरता से उपक्रांति होगी जो महाविनाश का प्रतीक है। मंत्र मार्ग भी है, और लक्ष्य भी। यह गुणात्मक सत्ता से चलकर गुणात्मक तीन अवस्थाओं में पहुँच जाता है, और उस समय शब्द का सुस्पष्ट और प्रत्यक्ष दर्शन होता है।

जागतिक सफलता और चमत्कार के लिये मंत्र का प्रयोग किया जाता है। हमारा शरीर ही नहीं, मन-मस्तिष्क भी इन तत्वों का अनुपात हमारे शरीरों फिजिकल, अष्ट्रल, और साइकोलोजिकल रूप को भी प्रभावित करता है। मंत्रों में इन तत्वों को उत्कृष्ट और शांति करने की सूक्ष्म व्यवस्था है (जैसी विधि आयुर्वेद में वात, पित्त कफ के शमन उद्दीयन के द्वारा रोग निवारण में प्रचलित है। मंत्र मशीन से अधिक निर्दोष सबल और सरल है। एक बार सिद्ध करने पर इसे जहाँ चाहें प्रयोग में लाया जा सकता है। मंत्र की शुद्ध भावना शब्द है, इससे शब्द की ऊर्जा और भावना शक्ति परस्पर गणित होकर कार्य करती है। शब्द किंवा ध्वनि को अनुप्रष्ठ एवं अनुरदेध्य तरंगें विद्युत की प्रतिरोध गामिनी तरंगों के साथ जब एक रूप हो जाती हैं तो मंत्र जागृत और सिद्ध हो जाता है। मंत्र को सतत् जपने से यही स्थिति आती हैं मंत्र साधना से मंत्र का जप पहले साधक को मन, व्यवहार में नितान्त निर्मल करता है, और निर्मल तन-मन वाले व्यक्ति की तरंगें सबल, दीर्घ और इच्छित दिशा में शमन करने लगती है। इसलिये उसका मंत्र सभी भौतिक कार्यों को सिद्ध Mantra Siddhi कर देता है।

वैज्ञानिक विश्लेषणः- आप कल्पना कीजिये कि संसार में कुल तीन अरब प्राणी हैं, जिनमें आधे तो दिन के प्रकाश में कार्य व्यस्त हैं, और आधे रात्रि में आनन्द से सो रहे हैं। आधे, यानी डेढ़ अरब प्राणी जागरण काल में यदि तीन घंटे बातचीत करते हों, तब क्या आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि वे बातचीत द्वारा कितनी विद्युत शक्ति उत्पन्न करते हैं। विद्युत ध्वनि शास्त्र तथा इंजीनियरिंग द्वारा गणना करके देखा जाये तो लोग उक्त तीन घंटों में कम से कम 6,000 खरब वाट विद्युत शक्ति केवल अपने शब्दों और ध्वनियों से उत्पन्न करते हैं। यह विद्युत ऊर्जा दामोदर घाटी, रिहृंध बांध, तथा भाखड़ा नांगल एवं बम्बई के ट्रांबे परमाणु प्रतिवर्तक की सम्मिलित शक्ति से कहीं अधिक है तथा भारत में उत्पन्न होने वाली कुल बिजली से लगभग आठ गुनी अधिक है। इस विद्युत ऊर्जा से सम्पूर्ण विश्व में घंटों प्रकाश किया जा सकता है। यदि इस ऊर्जा की एक यूनिट की कीमत केवल पचास पैसे रखी जाये तो उसकी कीमत एक खरब रूपये होगी।

Dr.R.B.Dhawan (संस्थापक shukracharya) शब्द शक्ति के सम्बंध में कहते हैं कि- वैज्ञानिक डाॅ. बोएड ने एक ऐसा विचित्र यंत्र बनाया है, जिसके सम्मुख बोलने से हिलोरे और कंपन स्पष्ट देखे तथा आंके जा सकते हैं। यदि उसके सामने कोई जोर-जोर से बोले तो यंत्र टूटकर बिखर सकता है।

शब्दों का प्रभाव:- उच्चादित शब्दों का ठीक इसी प्रकार का प्रभाव हमारी त्वचा व कानों की त्वचा पर पड़ता है। इस सम्बंध में कान और त्वचा की संवेदना की प्रक्रिया लगभग एक ही प्रकार की है। शब्दों के लिये कानों की त्वचा की संवेदनशीलता सबसे अधिक होती है, जबकि त्वचा की संवेदना प्रायः नगण्य भी होती है। कान-विद्युत घट ‘वाई मारकस पीजो इलैक्ट्रिक साउंड सेल’ का भी काम करते हैं। इस प्रकार का विद्युत घट अर्ध-चालक पत्थरों के बचाव द्वारा उत्पन्न बिजली के सिद्धांत पर बनता है। साधारण तौर पर इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। कि कान को एक प्रकार का ‘माइक्रोफोन’ कह सकते हैं। इसकी विशेषता यह होती है कि उसमें 02 से 20,000 आवर्तन का कोई सुनायी पड़ने योग्य शब्द प्रवेश करते ही विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है और वह सीधे मस्तिष्क तक पहुँचती है। तद्नन्तर विविध क्रिया प्रक्रियाओं को जन्म देते हुये शरीर के सभी भागों एवं ग्रन्थियों को क्रियाशील और विद्युत धारावर्ती बना देती हैै।

चमड़ी से इसी प्रकार का काम एक माध्यम द्वारा होता है। त्वचा पर सर्वप्रथम ध्वनि-चाप ‘प्रैशर’ का प्रभाव पड़ता है। फिर ग्राहक स्नायु-तंतुओं में बिजली का संचरण होता है। बिजली की यह धारा तदनंतर अपनी दीर्घ यात्रा के पश्चात मस्तिष्क के स्नायु तन्तुओं को अल्प मात्रा में विद्युन्मयी करती है। शब्दों का सर्वाधिक प्रभाव उनका आलोड़न-विलोड़न क्रमशः कर्ण-स्नायु, मस्तिष्क, अन्य स्नायु सूत्र हृदय, अंतस्रावी ग्रन्थियों, पेट, वृक्क, यकृत, रक्त तथा प्रस्वेद ग्रन्थियों पर पड़ता है।

शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ावः- उच्चारित शब्दों का श्रोता के मस्तिष्क पर दो प्रकार से प्रभाव पड़ता है। पहला, मुख से शब्द निकलने से पूर्व वक्ता के मस्तिष्क से उसी प्रकार की विद्युत-चुम्बकीय तरंगें निकलती हैं, जिन्हें श्रोता का मस्तिष्क ग्रहण करने की चेष्टा करता है। दूसरा उच्चारित शब्द वायु के माध्यम से विद्युत संचार के रूप में कर्ण रंध्रों से होते हुये मस्तिष्क में पहुँचते हैं। तब वे हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा आदि आवेगों को मस्तिष्क में उत्पन्न करते हैं। इसी से शरीरांगों में प्रस्फुरण और संदीपन होते हैं। शब्द इस प्रकार प्रेरणा, प्रास्फुरण, स्फूर्ति उत्पन्न कर प्रायः शरीर के अवयवों में साधारण अवस्था से अधिक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। वे कभी-कभी निष्क्रियता और शिथिलता भी उत्पन्न करते हैं।
स्नायु मंडल पर भी शब्दों के विविध प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं। अद्विग्नता, क्लांति, विषाद, शरीर कम्पन, चित्त की चंचलता भयानक स्वप्न आदि उन प्रभावों की स्पष्ट विकृतियाँ होती हैं। मूर्छा, स्मृति, भ्रम और विक्षिप्तता का भी आक्रमण हो सकता है। शब्दों के काम, क्रोध, मोह, लोभ तथा भय उत्पन्न होने पर दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं, और रक्त का प्रवाह भी ऊँचा उठने लगता है। रक्त में विशेष प्रकार का विष टाक्सिन पैदा होने लगता है। इसी प्रकार हर्षोत्पादक व आशाजनक शब्द मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत तुल्य काम करते हैं।

शब्दों से रहस्योद्घाटन:- प्रिय, अप्रिय शब्दों के अनुसार पेट में भी प्रतिक्रियायें होती हैं। उनसे भूख और पाचन क्रियायें घट या बढ़ जाती हैं। इन्हीं सब तथ्यों को सामने रखकर शब्दों और प्रश्नों के माध्यम से उत्तेजित कर अपराधों का पता लगाने के लिये मिथ्यान्वेषी (लाइ-डिटेक्टर) यंत्र का आविष्कार किया गया है। शब्दों की बौछार से अपराधी के शरीरांगों में होने वाली क्रिया-प्रतिक्रियाओं को विद्युत धारा द्वारा ग्रहण कर रहस्य की मंत्र-मन् धातु के उत्तर उ – प्रत्यायत – त्रै – धातु जोड़ने से ‘मंत्र’ शब्द साधित Mantra Siddhi होता है। (मन् + त्रं = उ मंत्र’ मननात जायते यस्मात् मंत्र उदाहतः।’) जिसके मनन, चिंतन ओर ध्यान द्वारा लौकिक, परालौकिक सुख की उपलब्धि होती है। उसी का नाम मंत्र है।

गुत्थी को सुलझाने में मदद मिलती है :- क्रोध, घृणा और भयजनक शब्द को सुनकर व्यक्ति की ‘एड्रीनलग्लैंड’ से ‘एड्रोलिन’ नामक स्राव काफी वेग से निकल-निकल कर रक्त में मिलने लगता है और मस्तिष्क तथा अन्य अंगों को असाधारण रूप से जागरूक और शक्तिशाली बना देता है, पर केवल अल्पकाल के लिये। एड्रेलिन के निकलते समय यकृत (लीवर) से एक विशेष प्रकार की पहले से ही जमा हुई शर्करा (ग्लाइकोजिन) स्वयं निःसृत होने लगती है। इसी क्रम में बार-बार मूत्र आने की शिकायत होती है।

शब्द-प्रक्रियाओं का महत्व:- भारतीय संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों में शब्दों की इन्हीं सब प्रक्रियाओं को ध्यान में रखकर कल्याण, मनोकामना सिद्धि, शत्रुनाशन, शत्रु मारण, उच्चाटन आदि के लिये विविध शब्द प्रक्रियाओं का विधान किया गया है। आज के वैज्ञानिक युग में यह सब मनोवैज्ञानिक युद्ध यानी साइकोलाॅजिकल वार या स्नायविक युद्ध (वार आॅफ नवर््ज) के अंतर्गत आता है।

मंत्र शक्ति के मूल में मूल भावना :- मंत्र शक्ति के मूल में यही भावना काम करती है। गाली-गलौज, मखौल, व्यंग्य, धमकियाँ आदि इन्हीं उपर्युक्त कार्यों की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। पाश्चात्य देशों में इन्हीं के एक रूप को सम्मोहन (हिप्नोटिज्म) और आत्म परामर्श (आॅटो सजेशन) की संज्ञा प्रदान की गई है। प्रसिद्ध रूसी विद्वान पावलाव ने शब्दों को अत्यंत शक्तिशाली अनुकूलित प्रतिवर्त (उत्तेजन) कंडीशंड रेप्लेक्स कहा है। इस प्रकार उपर्युक्त विवरणों से स्पष्ट हो जाता है कि मंत्रों में सुनिश्चित रूप से शक्ति होती है और उनसे कार्यों की सिद्धि भी प्राप्त की जा सकती है। मंत्र तीन प्रकार के होते हैं – वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक। विद्वत समाज की धारणा है कि कलियुग में प्रथम दो प्रकार के मंत्र सफल नहीं होते। कलियुग के लिये तांत्रिक मंत्र ही शक्तिशाली है। तांत्रिक मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं – साबरी मंत्र, डामरी मंत्र, बीजाक्षर मंत्र। इन तीनों प्रकार के तांत्रिक मंत्रों का अपना-अपना विज्ञान है। जो लोग उसके वैज्ञानिक रहस्य को समझते हैं, वे ही मंत्रों का प्रयोग कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। तांत्रिक मंत्रों की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे बिना दीक्षा के न तो सिद्ध होते हैं, और न ही काम करते हैं। मंत्रों का पुरश्चरण भी है। पुरश्चरण से मंत्र की शक्ति एकत्र होकर संकल्प शक्ति और विचार शक्ति के साथ तादात्म्य स्थापित करती है। इसी को ‘मंत्र जागरण’ कहते हैं।

जप में मन का एकाग्र होना आवश्यक है। बिना होठ हिलाये मंत्र का जप करना चाहिये। तभी सिद्धि मिलती है। इस प्रकार मंत्र का जप करने से मंत्र शक्ति सूक्ष्मतम प्राण वायु ‘ईथर’ में अपने अधिष्ठान्न देवता का आकार प्रकार और रूप की रचना करने लग जाती है। जब रचना पूर्ण हो जाती है तब देवता उसमें प्रविष्ट होकर साधक से तादात्म्य स्थापित कर इच्छा अथवा संकल्प को पूर्ण करते हैं। इसीलिये सामान्य व्यक्ति को मंत्र-प्रणेता नहीं कहा गया है, वरन् ऋषियों को ही मंत्र द्रष्टा (ऋषयों मंत्र द्रष्टारः) कहा गया है।

पशु – पक्षी, पेड़ पौधे आदि सभी में बिजली होती है। वे सभी वैसे ही हमारी शब्दोत्पन्न शारीरिक और मानसिक बिजली से अत्यंत सूक्ष्म रूप से ही प्रभावित होते हैं। इतना ही नहीं पत्थरों पर भी शब्दों का प्रभाव पड़ता है। विल्लौर, टूरमेलीन, रोचीसाल्ट तथा अमोनियम के सम्मुख बोलने पर वे सक्रिय हो उठते हैं तथा उनमें से विद्युत धारा निकलती है। उसी सिद्धांत का लाभ उठाकर ‘ध्वनि- विद्युत घटक’ का निर्माण किया गया है। तानसेन के राग से दीपक का जल उठना और बैजू-बावरा के संगीत से हिरणों का आना प्रसिद्ध है। इन सबकी पृष्ठभूमि में शब्द शक्ति का अपूर्वसामंजस्य ही है, तांत्रिक मंत्रों में ऐसा ही सामंजस्य रहता है।

तंत्र शास्त्र के अनुसार प्रत्येक वर्ण की अपनी स्वतंत्र शक्ति है जिसे ‘वर्ण मातृका’ कहते हैं। प्रत्येक वर्णमातृ का अपना रंग, रूप और गति है। मनुष्य के तीन शरीर हैं – स्थूल, सूक्षम और कारण शरीर। प्रत्येक शरीर में तीन-तीन वर्णमातृका शक्ति केन्द्र हैं। कारण शरीर से उच्चारित शब्द को ‘पश्यंती’ और मध्यमा तथा स्थूल शरीर से उच्चारित शब्द को ‘वैखरी’ कहते हैं। पहले और दूसरे केन्द्र में बहिर्मुखी मन काम करता है। इसी प्रकार तीसरे केन्द्र में अन्तर्मुखी मन काम करता है। इसलिये जप से मन का अंतर्मुखी होना आवश्यक है। मन को अन्तर्मुखी करने के लिये ‘ध्यान’ का विधान है। ध्यान कई प्रकार का होता है, मगर उनमें निराकार ध्यान ही सर्वोत्तम है। उससे मन अंतर्मुखी होकर पराकेन्द्र से तादात्म्य स्थापित करता है।

शब्दों की शक्ति:- हमारी अंगुलियों के बीच घूमनेवाले माला के दाने उनको एकत्र करते रहते हैं। जप करते समय उन पर ध्यान रखना आवश्यक है। इससे मंत्र शक्ति को गति मिलती है जिससे मंत्र शीघ्र ही सिद्ध होते हैं। शब्दों में सुनिश्चित शक्ति है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। प्राचीन भारतीय वाङमय में इसलिये शब्दों को साक्षात् सर्वशक्तिमान ईश्वर, ब्रह्म या शब्द ब्रह्म की संज्ञा प्रदान की गई है।

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पुष्प चिकित्सा

कैसे करें पुष्पों से चिकित्सा –

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka Bhavishya), top best astrologer in Delhi

पुष्प, जहाँ अपनी सुन्दरता से मन को आह्लादित एवं प्रफुल्लित करते है, वहीं वे अपनी सुगन्धि से सम्पूर्ण परिवेश को आप्यायित का सुवासित भी कर देते है। अपने आराध्य के चरणों में प्रेमी भक्त की पुष्पांजलि प्रेमास्पद का सहसा प्राकट्य करा देती है। पुष्पों की अनन्त महिमा है। पुष्प के सभी अवयव उपयोगी होते हैं। इनके यथाविधि उपयोग से अनेक रोगों का शमन किया जा सकता है।

फूलों के रस से तैयार किया गया लेप बाह्य रूप से त्वचा पर लगाने से उसकी सुगन्धि हृदय तथा नासिका तक अपना प्रभाव दिखाकर मन को आनन्दित कर देती है। सबसे अच्छी बात यह है कि पुष्प-चिकित्सा के कोई दुष्प्रभाव नहीं होते। फूलों को शरीर पर धारण करने से शरीर की शोभा, कान्ति, सौंदर्य और श्री की वृद्धि होती है। उनकी सुगन्धि रोगनाशक भी है। फूल के सुगन्धित परमाणु वातावरण में घुलकर नासिका की झिल्ली में पहुँचकर अपनी सुगन्धि का मस्तिष्क, हृदय, आँख, कान तथा पाचन क्रिया आदि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। ये थकान को तुरंत दूर करते हैं। इनकी सुगन्धि से की गयी उपचार प्रणाली को एरोमा थेरेपी कहा जाता है। यहाँ कुछ पुष्पों के संक्षेप में औषधीय प्रयोग दिये जा रहे हैं, सम्यक् जानकारी प्राप्त करके उनसे लाभ उठाया जा सकता है –

कमल:- कमल और लक्ष्मी का सम्बंध अविभाज्य है। कमल सृष्टि की वृद्धि का द्योतक है। इसके पराग से मधुमक्खी शहद तो बनाती ही है, इनके फूलों से तैयार किये गये गुलकन्द का उपयोग प्रत्येक प्रकार के रोगों में तथा कब्ज के निवारण हेतु किया जाता है। कमल के फूल के अंदर हरे रंग के दाने से निकलते है, जिन्हें भूनकर मखाने बनाये जाते हैं, परंतु उनको कच्चा छीलकर खाने से ओज एवं बल की वृद्धि होती है। इनका गुण शीत है। इसका सबसे अधिक प्रयोग अंजन की भाँति नेत्रों में ज्योति बढ़ाने के लिये शहद में मिलाकर किया जाता है। पंखुड़ियों को पीसकर उबटन में मिलाकर चेहरे पर मलने से चेहरे की सुन्दरता बढ़ती है।

केवड़ा:- इसकी गंध कस्तूरी जैसी मोहक होती है। इसके पुष्प दुर्गन्धनाशक तथा उन्मादक है। केवड़े का तेल उत्तेजक श्वासविकार में लाभकारी है। इसका इत्र सिरदर्द और गठिया में उपयोगी है। इसकी मंजरी का उपयोग पानी में उबालकर कुष्ठ, चेचक, खुजली तथा हृदय रोगों में स्नान करके किया जा सकता है। इसका अर्क पानी में डालकर पीने से सिरदर्द तथा थकान दूर होती है। बुखार में एक बूँद देने से पसीना बाहर आता है। इसका इत्र दो बूँद कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है।

गुलाब:- गुलाब का पुष्प सौंदर्य, स्नेह एवं प्रेम का प्रतीक है। इसका गुलकंद रेचक है, जो पेट और आँतों की गर्मी शांत करके हृदय को प्रसन्नता प्रदान करता है। गुलाब जल से आँखें धोने से आँखों की लाली तथा सूजन कम होती है। गुलाब का इत्र उत्तेजक होता है तथा इसका तेल मस्तिष्क को ठंडा रखता है। गुलाब के अर्क का भी मधुर भोज्य पदार्थों में प्रयोग किया जाता है। गर्मी में इसका प्रयोग शीतवर्धक होता है।

चंपा:- चंपा के फूलों को पीसकर कुष्ठरोग के घाव में लगाया जा सकता है। इसका अर्क रक्त-कृमि को नष्ट करता है। इसके फूलों को सुखाकर बनाया गया चूर्ण खुजली में उपयोगी है। यह उत्सर्जक, नेत्रज्योति वर्धक तथा पुरूषों को शक्ति एवं उत्तेजना प्रदान करता है।

सौंफ (शतपुष्पा):- सौंफ अत्यंत गुणकारी है। सौंफ के पुष्पों को पानी में डालकर उबाल लें, साथ में एक बड़ी इलायची तथा कुछ पुदीना के पत्ते भी डाल दें। अच्छा यह रहे कि मिट्टी के बर्तन में उबाले पानी को ठंडा करके दाँत निकलने वाले बच्चे या छोटे बच्चे जो गर्मी से पीड़ित हों, उन्हें एक-एक चम्मच कई बार दें। इससे उनके पेट की पीड़ा शांत होगी तथा दाँत भी ठीक प्रकार से निकलेंगे।

गेंदा:- मलेरिया के मच्छरों का प्रकोप दूर करने के लिये यदि गेंदे की खेती गंदे नालों और घर के आस-पास की जाये तो इसकी गंध से मच्छर दूर भाग जाते हैं। लीवर के रोगी के लीवर की सूजन, पथरी एवं चर्मरोगों में इसका प्रयोग किया जा सकता है।

बेला:- यह अत्याधिक सुगंधयुक्त प्रदाहनाशक है। उसकी कलियों को चबाने से स्त्रियों के मासिक धर्म का अवरोध दूर हो जाता है।

रात-रानी:- इसकी गंध इतनी तीव्र होती है कि यह दूर-दूर तक के स्थानों को मुग्ध कर देती है। इसका पुष्प प्रायः सांयकाल से लेकर अर्धरात्रि के कुछ पूर्व तक सुगन्ध अधिक देता है। पंरतु इसके बाद धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है इसकी गंध से मच्छर नहीं आते। इसकी गंध मादक और निद्रादायक है

सूरजमुखी:- इसमें विटामिन ए तथा डी होता है। यह सूर्य का प्रकाश न मिलने के कारण होने वाले रोगों को रोकता है। इसका तेल हृदय रोगों में कोलेस्ट्राॅल को कम करता है।

चमेली:- चर्मरोगों, पायरिया, दंतशूल घाव, नेत्ररोगों और फोड़े-फुंसियों में चमेली का तेल बनाकर उपयोग किया जाता है। यह शरीर में रक्तसंचार की मात्रा बढ़ाकर उसे स्फूर्ति प्रदान करता है। इसके पत्ते चबाने से मुँह के छाले तुरंत दूर हो जाते हैं। मानसिक प्रसन्नता देने में चमेली का अद्भुत योगदान है।

केसर:- यह मन को प्रसन्न करता तथा चेहरे को कान्तिमान बनाता है। यह शक्तिवर्धक, वमन को रोकने वाला तथा वात, पित्त एवं कफ (त्रिदोषों) का नाशक है। तन्त्रिकाओं में व्याप्त उद्विन्नता एवं तनाव को केसर शांत रखता है। इसलिये इसे प्रकृति-प्रदन्त टैंकुलाइजर, भी कहा जाता है। दूध या पान के साथ इसका सेवन करने से यह अत्यंत ओज, बल, शक्ति एवं स्फूर्ति को बढ़ाता है।

अशोक:- यह मदन-वृक्ष भी कहलाता है। इसके फूल, छाल तथा पत्तियाँ स्त्रियों के अनेक रोगों में औषधि के रूप में उपयोगी है। इसकी छाल का आसव सेवन कराकर स्त्रियों की अधिकांश शोक (मानसिक पीड़ा) को ठीक किया जा सकता है।

ढाक (पलाश):- ढाक को अप्रतिम सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि इसके गुच्छेदार फूल बहुत दूर से ही आकर्षित करते हैं। इसी आकर्षण के कारण इसे वन की ज्योति भी कहते हैं। इसका चूर्ण पेट के किसी भी प्रकार के कृमिका नाश करने में सहायक है। इसके पुष्पों को पानी के साथ पीसकर लुगदी पेडू पर रखने से पथरी के कारण दर्द होने पर या नाम उतरने पर लाभ होता है।

गुड़हल (जवा):- गुड़हल के पुष्प का सम्बंध गर्भाशय से ऋतुकाल के बाद यदि फूल को घी में भूनकर सेवन करें तो गर्भ स्थिर होता है। गुड़हल के फूल चबाने से मुँह के छाले दूर हो जाते है। इसके फूलों को पीसकर बालों में लेप करने से बालों का गंजापन मिटता है। यह उन्माद को दूर करने वाला एकमात्र पुष्प है। गुड़हल शीतवर्धक, वाजीकरण तथा रक्तशोधक है। इसे सुजाक के रोग में गुलकंद या शर्बत बनाकर दिया जा सकता है। इसका शर्बत हृदय को फूल की भाँति प्रफुल्लित करने वाला तथा रूचिकर होता है।

शंखपुष्पी (विष्णुकांता):- शंखपुष्पी गर्मियों में अधिक खिलता है। यह घास की तरह होता है। इसके फूल-पत्ते तथा डंठल तीनों को उखाड़कर पीसकर पानी में मिलाकर छान लेने तथा इसमें शहद या मिश्री मिलाकर पीने से पूरे दिन मस्तिष्क में ताजगी रहती है। सुस्ती नहीं आती। इसका सेवन विद्यार्थियों को अवश्य करना चाहिये।

बबूल (कीकर):- बबूल के फूलों को पीसकर सिर में लगाने से सिरदर्द गायब हो जाता है। इसका लेप दाद और एग्जिमा पर करने से चर्मरोग दूर होता है। इसके अर्क के सेवन से रक्तविकार दूर हो जाता है। यह खाँसी और श्वांस के रोग में लाभकारी है। इसके कुल्ले दंतक्षय को रोकते हैं।

नीम:- इसके फूलों को पीसकर लुगदी बनाकर फोड़े-फुंसी पर लगाने से जलन तथा गर्मी दूर होती है। शरीर पर मलकर स्नान करने से दाद दूर होता है। यदि फूलों को पीसकर पानी में घोलकर छान लें और इसमें शहद मिलाकर पीयें तो वजन कम होता है तथा रक्त साफ होता है। यह संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाला है। नीम हर प्रकार से उपयोगी है, इसे घर का वैद्य कहा जाता है।

लौंग:- यह आमाशय और आँतों में रहने वाले उन सूक्ष्म कीटाणुओं को नष्ट करती है। जिनके कारण मनुष्य का पेट फूलता है। यह रक्त के श्वेत कणों में वृद्धि करके शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि करती है। शरीर तथा मुँह के दुर्गन्ध नाश करती है। शरीर के किसी भी हिस्से पर इसे घिसकर लगाने से दर्दनाशक औषधि का काम करती है। दाढ़ या दंतशूल में मुँह में डालकर चूसने से लाभ होता है। इसके धूम्र सेवन से शरीर में उत्पन्न अनावश्यक तत्वों को पसीने द्वारा बाहर निकाल देता है।

जूही:- जूही के फूलों का चूर्ण या गुलकंद अम्लपित्त को नष्ट करके पेट के अल्सर तथा छाले को दूर करता है। इसके सांन्ध्यि में निरन्तर रहने से क्षयरोग नहीं होता।

माधवी:- चर्मरोगों के निवारण के लिये इसके चूर्ण का लेप किया जाता है। गठिया-रोग में प्रातःकाल फूलों को चबाने से आराम मिलता है। इसके फूल श्वांसरोग को भी दूर करते हैं।
हारसिंगार (परिजात):- यह गठिया-रोगों का नाशक है। इसका लेप चेहरे की कांति को बढ़ाता है। इसकी मधुर सुगंध मन को प्रफुल्लित कर देती है।

आक:- इसका फूल कफनाशक है, यह प्रदाहकारक भी है। यदि पीलिया-रोग में पान में रखकर एक या दो कली तीन दिन तक दी जाये तो काफी हद तक आराम होता है।

कदम्ब:- यम मदन-वृक्ष भी कहलाता है। बीमारी में फूल एवं पत्तों वाली इसकी टहनी लेकर गोशाला में लगा देने से बीमारी दूर होती है। वर्षा ऋतु में पल्लवित होने वाला यह गोपीप्रिय वृक्ष है।

कचनार:- इसकी कली शरद्-ऋतु में प्रस्फुटित होती है। इसकी कलियाँ बार-बार मल-त्याग की प्रवृत्ति को रोकती हैं। कचनार की छाल एवं फूल को जल के साथ मिलाकर तैयार की गई पुलटिस जले घाव एवं फोड़े के उपचार में उपयोगी है।

शिरीष:- यह तेज सुगन्ध वाला जंगली वृक्ष है। इसकी सुगन्ध जब तेज हवा के साथ आती है तो मानव झूम सा जाता है। खुजली में इसके फूल पीसकर लगाने चाहिये, इसके फूलों के काढ़े से नेत्र धोने पर किसी भी प्रकार के नेत्र-विकारों में लाभ होगा।

नागकेसर:- यह खुजली नाशक है और लौंग जैसा लम्बा तथा डंडी में लगा रहता है। इसके फूलों का चूर्ण बनाकर मक्खन के साथ या दही के साथ खाने से रक्तार्श में लाभ होता है। इसका चूर्ण गर्भधारण में भी सहायक है।

मौलसिरी (बकुल):- इसके फूलों को तेल में मिलाकर इत्र बनता है। मौलसिरी के फूलांे का चूर्ण बनाकर त्वचा पर लेप करने से त्वचा अधिक कोमल हो जाती है। इसके फूलों का शर्बत स्त्रियों के बाँझपन को दूर करने में समर्थ है।

अमलतास:- ग्रीष्म ऋतु में फूलने वाला गहरे पीले रंग के गुच्छेदार पुष्पों का यह पेड़ दूर से देेखने में ही आँखों को प्रिय लगता है। इसके फूलों का गुलकंद बनाकर खाने से कब्ज दूर होता है पंरतु अधिक मात्रा में सेवन करने से यह दस्तावर होता है जी मिचलाता है एवं पेट में ऐंठन उत्पन्न करता है।

अनार:- शरीर में पित्ती होने पर अनार के फूलों का रस मिश्री मिलाकर पीना चाहिये। मुँह के छालों में फल रखकर चूसना चाहिये। आँख आने पर कली का रस आँख में डालना चाहिये। अनार के फूल खाने से शराब छूट जाती है। फूलों के पौधों की भीतरी कोशिकाओं में विशेष प्रकार के प्रद्रवी झिल्लियों के आवरण वाले कण होते हैं। इन्हें लवक (प्लास्टिड्स) कहते है। ये कण जब तक फूलों का रंग समाप्त न हो जाये तब तक जीवित रहते हैं।

ये लवक दो प्रकार के होते हैं – 1 वर्णिक लवक और 2 हरित लवक इनमें रंगीन लवकों को वर्णी लवक कहते हैं। वर्णीलवक ही फूल-पौधों को विभिन्न रंग प्रदान करते हैं। वर्णी लवक का आकार निश्चित नहीं होता, बल्कि लवक अलग-अलग पौधों में अलग-अलग रचना वाले होते हैं। पौधें में सबसे महत्वपूर्ण लवक है हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट)। हरित लवक पौधों में हरा रंग ही नहीं देता, बल्कि पौधों में भोजन का निर्माण भी करता है। हरित लवक कार्बन-डाइआॅक्साइड गैस, जल और सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में ग्लूकोज कार्बोहाइडेट पदार्थ का निर्माण करता है।

पुष्प सूर्य के प्रकाश में सूर्य की किरणों से सम्पर्क स्थापित करके अपनी रंगीन किरणें हमारी आँखों तक पहुँचाते हैं। जिससे शरीर को ऋणात्मक, धनात्मक तथा कुछ न्यूट्रल प्रकाश की किरणें मिलती है जो शरीर के अंदर पहुँचकर विभिन्न प्रकार के रोगों को रोकने में सहायता प्रदान करती हैं। इस प्रकार हम कलर थैरेपी द्वारा भी चिकित्सा के लाभ ले सकते हैं।

नोट- किसी भी औषधी को वैद्य की सलाह से ही सेवन करें।

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नवरात्रि पूजन

नवरात्रि में अवश्य करें, कुमारी पूजन:-

Dr.R.B.Dhawan (Top Best Astrologer in Delhi)

नवरात्रि पर्व वर्ष में दो बार आता है। 1. ‘चैत्र नवरात्रि’ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक, तथा 2. ‘आश्विन नवरात्रि’ आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक। चैत्र नवरात्र के दिन से ही नया विक्रमी संवत आरम्भ होता है, और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नक्षत्रों की गणना आश्विन नक्षत्र से आरम्भ होती है। इस आधार पर आश्विन मास ज्योतिषीय वर्ष का प्रथम मास माना जाता है। इस प्रकार दोनों नवरात्र पर्वों के साथ नये शुभारम्भ की भावना जुड़ी हुई है। यह दोनो नवरात्र ऋतुओं के संधिकाल पर पड़ते हैं। संधिकाल की उपासना की दृष्टि से भी इन्हें सर्वाधिक महत्व दिया गया है। इस प्रकार ऋतु-संधिकाल के नौ-नौ दिन दोनों नवरात्रों में विशिष्ट रूप से कुमारी पूजा व साधना अनुष्ठान के लिये महत्वपूर्ण माने गये हैं। नवरात्र पर्व के साथ दुर्गावतरण की कथा तथा कुमारी-पूजा का विधान जुड़ा हुआ है।

कन्या पूजन क्यों आवश्यक :-

आज के युग (कलयुग) की भयावह पारिवारिक, आर्थिक, मानसिक अथवा सामाजिक समस्या से मुक्ति के लिये तथा शक्ति के उद्भव की कामना के लिये कुमारी-पूजा का विधान आवश्यक बताया गया है। इसलिये शास्त्रों में सभी जाति की बालिकाओं के पूजन का महत्व बताया गया है। अतः कुमारी-पूजन में जाति-भेद का विचार करना उचित नहीं है। जाति-भेद करने से मनुष्य नरक से छुटकारा नहीं पाता। जैसे संशय में पड़ा हुआ मंत्र साधक अवश्य पातकी होता है। इसलिये साधक को चाहिये कि वे देवी आज्ञा से नवरात्रों में सभी जाति की बालिकाओं का पूजन करें, क्योंकि कुमारी सर्वविद्या स्वरूपिणी है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

वर्ष के दोनो मुख्य नवरात्रों में वस्त्र, आभूषण और भोजन आदि से कुमारी महापूजा करके मन्द भाग्य वाला मनुष्य भी सर्वत्र विजय और मांगल्य प्राप्त करता है। कलियुग में नवरात्रों में की जाने वाली कन्या पूजा ही समृद्धि हेतु सबसे बड़ी उपासना और सबसे उत्तम तपस्या है। भाग्यवान मनुष्य, नवरात्रों में कुमारी-पूजन से कोटि गुना फल प्राप्त करता है। कुमारी-पूजा से मनुष्य सम्मान, लक्ष्मी, धन, पृथ्वी, श्री सरस्वती और महान् तेज को सरलता पूर्वक प्राप्त कर लेता है। उसके ऊपर दसों महाविद्याएें और देवगण प्रसन्न होते हैं- इसमें कोई भी सन्देह नहीं। कुमारी-पूजन मात्र से मनुष्य त्रिभुवन को वश में कर सकता है, और उसे परम शान्ति मिलती है; इस प्रकार कुमारी-पूजन समस्त पुण्य-फलों को देने वाली है।

कठिनाइयों में कन्या-पूजन :-
महान् भय, दुर्भिक्ष आदि उत्पात, दुःस्वप्न, दुर्मृत्यु तथा अन्य जो भी दुःखदायी समय की आशंकाएं हैं तो, वे सभी कुमारी-पूजन से टल जाते हैं। प्रतिदिन क्रमानुसार विधि-विधान पूर्वक, कुमारी पूजन करना चाहिये। कुमारी साक्षात् योगिनी और श्रेष्ठ देवी हैं, विधियुक्त कुमारियों को भोजन कराना चाहिये। कुमारी को पाद्य, आर्घ्य, धूप, कुमकुम और सफ़ेद चंदन आदि अर्पण करके भक्ति-भाव से उनकी पूजा करें। जो मनुष्य इस प्रकार कन्याओं की पूजा करता है, पूजित हुई कुमारियां उसके विघ्न, भय और अत्यन्त उत्कृट शत्रुओं को नष्ट कर डालती हैं। पूजा करने वाले के ग्रह, रोग, भूत, बेताल और सर्पादि से होने वाले अनेक भय नष्ट हो जाते हैं। उस पर असुर, दुष्ट नाग, दुष्ट ग्रह, भूत, बेताल, गंधर्व, डाकिनी, यक्ष, राक्षस तथा अन्य सभी देवता, भूः भुवः, स्वः, भैरव गण, पृथ्वी आदि के सब भूत, चराचर ब्रह्माण्ड, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव-ये सभी प्रसन्न होते हैं।

कन्या की आयु :-

कुमारी पूजन हेतु कन्या की आयु विभिन्न ग्रन्थों के मतानुसार-
रुद्रयामलतंत्र के उत्तराखण्ड, छठे पटल में कुमारी पूजन के लिये कन्या की आयु के अनुसार उसे अलग-अलग देवियों का नाम व महत्व देते हुए कहा गया है कि- एक वर्ष की आयुवाली बालिका ‘सन्ध्या’ कहलाती है, दो वर्षवाली ‘सरस्वती’, तीन वर्ष वाली ‘त्रिधामूर्ति, चार वर्ष वाली ‘कालिका’, पाँच वर्ष की होने पर ‘सुभगा’, छः वर्ष की ‘उमा’, सात वर्ष की ‘मालिनी’, आठ वर्ष की ‘कुब्जा’, नौ वर्ष की ‘कालसन्दर्भा’, दसवें में ‘अपराजिता’, ग्यारहवें में ‘रुद्राणी’, बारहवें में ‘भैरवी’, तेरहवें में ‘महालक्ष्मी’, चैदह पूर्ण होने पर ‘पीठनायिका’, पन्द्रहवें में ‘क्षेत्रज्ञा’ और सोलहवें में ‘अम्बिका’ मानी जाती है।

बृहन्नीतंत्र आदि ग्रन्थों में उपर्युक्त नामों से कुछ विभिन्नता पायी जाती है। कुब्जिका-तंत्र के सातवें पटल में इसी विषय का इस प्रकार वर्णन है- पाँच वर्ष से लेकर बारह वर्ष की अवस्था तक की बालिका अपने स्वरूप को प्रकाशित करने वाली ‘कुमारी’ कहलाती है। छः वर्ष की अवस्था से आरंभ कर नवें तक की कुमारी साधकों का ‘अभीष्ट साधन’ करती है। आठ वर्ष से लेकर तेरह की अवस्था होने तक उसे ‘कुलजा’ समझें और उसका पूजन करें। दस वर्ष से शुरू कर जब तक वह सोलह वर्ष की हो, उसे युवती जानें और देवी की भाँति उसका चिन्तन करें।

विश्व सार तंत्र में कहा गया है कि- आठ वर्ष की बालिका ‘गौरी’, नौ वर्ष की ‘रोहिणी’ और दस वर्ष की कन्या ‘कन्या’ कहलाती है। इसके बाद वही ‘महामाया’ और ‘रजस्वला’ भी कहीं गयी हैं। बारहवें वर्ष से लेकर बीसवें तक वह सभी तंत्र ग्रन्थों में सुकुमारी कही गयी हैं।

मंत्रमहोदधि के अठारहवें तरंग में इस प्रकार वर्णन है- यजमान को चाहिये कि वे नवरात्रों में दस कन्याओं का पूजन करे। उनमें भी दो वर्ष की अवस्था से लेकर दस वर्ष तक की कुमारियों का ही पूजन करना चाहिये। जो दो वर्ष की उम्रवाली है वह ‘कुमारी’, तीन वर्ष की ‘त्रिमूर्ति’, चार वर्ष की ‘कल्याणी’, पाँच वर्ष की ‘रोहिणी’, छः वर्ष की ‘कालिका’, सात वर्ष की ‘चण्डिका’, आठ वर्ष की ‘शांभवी’, नौ वर्ष की ‘दुर्गा’ और दस वर्ष की कन्या ‘सुभद्रा’ कही गयी है। इनका मंत्रों द्वारा पूजन करना चाहिये। एक वर्ष वाली कन्या की पूजा से प्रसन्नता नहीं होगी, अतः उसका ग्रहण नहीं है, और ग्यारह वर्ष से ऊपर वाली कन्याओं का भी पूजा में ग्रहण वर्जित है।

कुमारी-पूजन का फल-

कुब्जिकातंत्र में वर्णन मिलता है कि- जो नवरात्रों में विधि-विधान सहित कुमारी-पूजन करता है, तथा कुमारी को अन्न, वस्त्र तथा जल अर्पण करता है उसका वह अन्न मेरु के समान और जल समुद्र के सदृश अक्षुण्ण तथा अनन्त होता है। अर्पण किये हुए वस्त्रों द्वारा वह करोड़ों-अरबों वर्षों तक शिवलोक में पूजित होता है। जो कुमारी के लिये पूजा के उपकरणों को देता है, उसके ऊपर देवगण प्रसन्न होकर उसी के पुत्र रूप से प्रकट होते हैं। कलिकाल आज के युग की देन भयावह पारिवारिक, आर्थिक, मानसिक अथवा सामाजिक समस्याओं से मुक्ति के लिये तथा शक्ति के उद्भव की कामना के लिये कुमारी-पूजा का विधान आवश्यक बताया गया है। अतः प्रत्येक देवी उपासक वर्ष के दोनो नवरात्र में कन्या पूजन अवश्य करें।

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गंडमूल नक्षत्र

गंडमूल नक्षत्र और गण्डमूल नक्षत्र का जातक पर प्रभाव :-

Dr.R.B.Dhawan

इस लेख में बताया गया है कि, जातक का जन्म यदि गण्डमूल नक्षत्र में हो तो, उस गंडमूल का जातक या जातक के परिजनों के जीवन पर क्या प्रभाव रहता है? और इसके उपाय क्या हैं :-

गंडमूलक नक्षत्रों के अंतर्गत- 1. अश्विनी, 2. अश्लेषा, 3. मघा, 4. ज्येष्ठा, 5. मूल और 6. रेवती नक्षत्र को रखा गया है।

गंडमूल नक्षत्र :- (Gandmool Nakshtra) ज्योतिषीय गणना के अनुसार नक्षत्र 27 होते हैं, उनमे से छह- 1. अश्विनी, 2. अश्लेषा, 3. मघा, 4. ज्येष्ठा, 5. मूल और 6. रेवती नक्षत्र की गणना गंडमूलक नक्षत्रों में जाती है। राशि और नक्षत्र की समाप्ति जब एक ही स्थान पर होती है, तब यह स्थिति गण्ड या गंडमूल नक्षत्र कहलाती है। राशि और नक्षत्र की समाप्ति से ही नई राशि और नक्षत्र के प्रारम्भ होने को गंडमूल कहते हैं।

गंडमूल नक्षत्र के समय जन्म लेने वाले जातक स्वयं तथा अपने माता-पिता, मामा आदि के लिए कष्ट सूचक होते हैं। यही कारण है कि घर के लोगों को जैसे ही यह पता चलता है कि बालक मूल में हुआ है, वैसे ही वे चिंतिंत हो जाते हैं और नकारात्मक विचारों से ग्रसित भी हो जाते हैं, परिणाम यह कि इसका प्रभाव बच्चे के ऊपर पड़ना आरम्भ हो जाता है, चुंकि बच्चा अपने जन्म के बारह वर्ष तक अपने माता-पिता के कर्मो से प्रभावित होता है। ऐसी स्थिति में माता-पिता के नकारात्मक विचारों का परिणाम यह होता है कि, परिवार कष्टमय जीवन व्यतीत करने लगता है। इसलिए यदि परिवार में कोई बच्चा मूल में जन्म ले लिया है तो, घबराने की आवश्यकता नहीं, और न ही नकारात्मक विचार लायें। शास्त्र में निर्धारित उपाय करायें परिवार के लिए और बच्चे के लिए यह ही शुभ होगा।

गण्डमूल नक्षत्र में जन्म लेने वाला बालक शुभ प्रभाव में है तो वह अवश्य सामान्य बालक से कुछ अलग विशेष विचारों वाला होता है, यदि उसे सामाजिक तथा पारिवारिक बंधन से मुक्त कर दिया जाए तो, ऐसा बालक जिस भी क्षेत्र में जायेगा, अपनी एक अलग पहचान बनायेगा। ऐसे बालक तेजस्वी, यशस्वी, और कला अन्वेषी होते हैं। यह इसके अच्छे प्रभाव भी हैं। अगर वह अशुभ प्रभाव में है तो, इन्हीं नक्षत्रों में जन्मा बालक क्रोधी, रोगी, र्इष्यावान, लम्पट होगा। इस अशुभता को दूर करने के लिए गण्डमूल दोष की विधिवत शांति करा लेना चाहिए।

गण्डमूल नक्षत्र :-

जैसे कि राशि और नक्षत्र के एक ही स्थान पर उदय और मिलन के आधार पर गण्डमूल नक्षत्रों का निर्माण बताया गया है। इसके निर्माण में कुल छह 6 स्थितियां बनती हैं। इसमें से तीन नक्षत्र गण्ड के होते हैं, और तीन मूल के होते हैं।

कर्क राशि तथा आश्लेषा नक्षत्र की समाप्ति साथ-साथ होती है, वही सिंह राशि का समापन और मघा राशि का उदय एक साथ होता है। इसी लिए अश्लेषा को गण्ड संज्ञक और मघा को मूल संज्ञक नक्षत्र कहा जाता है।

इसी प्रकार वृश्चिक राशि और ज्येष्ठा नक्षत्र की समाप्ति एक साथ होती है, तथा धनु राशि और मूल नक्षत्र का आरम्भ यहीं से होता है। इसलिए इस स्थिति को ज्येष्ठा गण्ड और ‘मूल’ मूल नक्षत्र कहा जाता है।

मीन राशि और रेवती नक्षत्र एक साथ समाप्त होते हैं। तथा मेष राशि व अश्विनी नक्षत्र की शुरुआत एक साथ होती है। इसलिए इस स्थिति को रेवती गण्ड और अश्विनी मूल नक्षत्र कहा जाता है।

ऊपर कहे गए तीन गण्ड नक्षत्र अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती का स्वामी ग्रह बुध और तीन नक्षत्र मघा, मूल तथा अश्विनि का स्वामी केतु ग्रह है। जन्म दिन से सत्ताइसवें दिन जन्म नक्षत्र की पुनः आवृति होती है, उस समय मूल और गण्ड नक्षत्रों के अशुभ फल की निवृति और शुभ फल की प्राप्ति के लिए गण्डमूल का उपाय कराया जाता है।

मूल शांति के लिए गण्डवास का महत्त्व :-

मूल शांति के समय सर्वप्रथम गण्डवास देखना आवश्यक है कि गण्ड का वास जन्म काल में कहाँ है?

मुहूर्तचिंतामणि के अनुसार —

स्वर्गेशुचि प्रौष्ठपदेशमाघे भूमौ नभः कार्तिकचैत्रपौषे।

मूलं हि अधस्तास्तु तपस्यमार्गवैशाख शुक्रेष्वशुभं च तत्र।।

अर्थात्:- आषाढ़, भाद्रपद, आश्विन व माघ में गण्ड का वास स्वर्ग लोक में, श्रावण, कार्तिक, चैत्र व पौष मास में गण्डवास मृत्युलोक अथवा पृथ्वी पर, तथा ज्येष्ठ, वैशाख, मार्गशीर्ष व फाल्गुन मास में पाताल अर्थात नरक लोक में गण्ड का वास होता है। जन्म काल में मूल का जिस लोक में वास होता है, उसी लोक का अनिष्ट करता है अतः मृत्यलोक अर्थात धरातल पर वास होने की स्थिति में ही अनिष्ट है।

गण्डमूल नक्षत्र का चरण के अनुसार प्रभाव :-

मुलामघाश्विचरणे प्रथमे पितुश्च पौष्णेन्द्रयोश्च फणिनस्तु चतुर्थपादे।

मातुः पितुः सववपुषो स्ववपुष: अपि करोति नाशं जातो यथा निशि दिनेप्यथ सन्धयोश्च।।

मूल, मघा और अश्विनी के प्रथम चरण का जातक पिता के लिए, रेवती के चौथे चरण और रात्रि में जन्मा जातक माता के लिए, ज्येष्ठ के चतुर्थ चरण और दिन का जन्म जातक पिता तथा अश्लेषा के चौथे चरण संधिकाल (दिन से रात, व रात से दिन की संधि) में जन्म हो तो, स्वयं के लिए जातक अरिष्ट कारक होता है।

अश्विनी नक्षत्र का प्रभाव :-

मेष राशि में अश्विनी नक्षत्र शून्य अंश से प्रारम्भ होकर 13:20 अंश तक तक रहता है, जन्म के समय यदि चंद्रमा मेष राशि में शून्य से 2 : 30 अंशों के मध्य अर्थात प्रथम चरण में ही स्थित हो तो, अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर जातक को अपने जीवन काल में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस नक्षत्र में जन्म लेने पर बच्चा पिता के लिए कष्टकारी होता है, परन्तु हमेशा एेसा नहीं होता।

अश्विनी नक्षत्र :-

प्रथम चरण – पिता को शारीरिक कष्ट एवं हानि।

दूसरा चरण — परिवार में सुख शांति ।

तीसरा चरण — सरकार से लाभ तथा मंत्री पद का लाभ ।

चतुर्थ चरण — परिवार एवं जातक को राज सम्मान तथा ख्याति।

आश्लेषा नक्षत्र का प्रभाव :-

जब चंद्रमा जन्म के समय कर्क राशि में 16 अंश और 40 कला से 30 अंश के मध्य स्थित होता है, तब आश्लेषा नक्षत्र कहलाता है। परन्तु जब चन्द्रमा कर्क के 26 अंश 40 कला से 30 अंश के मध्य हो, अर्थात आश्लेषा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में हो तो, जातक गण्डमूल में उत्पन्न कहलाता है।

आश्लेषा नक्षत्र :-

प्रथम चरण — शांति और सुख मिलेगा।

दूसरा चरण – धन नाश, बहन-भाईयों को कष्ट।

तृतीय चरण — माता को कष्ट।

चतुर्थ चरण — पिता को कष्ट, आर्थिक हानि।

मघा नक्षत्र का प्रभाव :-

सिंह राशि के आरम्भ के साथ ही मघा नक्षत्र शुरु होता है। परन्तु सिंह राशि में जब चंद्रमा शून्य से लेकर दो अंश और बीस कला अर्थात प्रथम चरण में रहता है, तब ही गंडमूल नक्षत्र माना गया है।

मघा नक्षत्र :-

प्रथम चरण — माता को कष्ट होता है।

दूसरा चरण – पिता को कोई कष्ट या हानि होता है।

तीसरा चरण – जातक सुखी जीवन व्यतीत करता है।

चौथा चरण – जातक को धन विद्या का लाभ, कार्य क्षेत्र में स्थायित्व प्राप्त होता है।

ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रभाव :-

जब चंद्रमा जन्म के समय वृश्चिक राशि में 16 अंश और 40 कला से 30 अंश के मध्य स्थित होता है, तब ज्येष्ठा नक्षत्र कहलाता है। परन्तु जब चन्द्रमा वृश्चिक में 26 अंश और 40 कला अर्थात ज्येष्ठा के चतुर्थ चरण में प्रवेश कर चुका हो, तो जातक गण्डमूल में उत्पन्न कहलाता है।

ज्येष्ठा नक्षत्र :-

प्रथम चरण – बड़े भाई-बहनों को कष्ट।

दूसरा चरण – छोटे भाई – बहनों के लिए अशुभ।

तीसरा चरण – माता को कष्ट।

चतुर्थ चरण – स्वयं का नाश।

मूल नक्षत्र का प्रभाव :-

जब चंद्रमा धनु राशि में शून्य से तेरह अंश और बीस मिनट के मध्य स्थित होता है तब यह मूल नक्षत्र में आता है परन्तु जव चन्द्रमा शून्य अंश से तीस मिनट अर्थात प्रथम चरण में हो तो गण्ड मूल में उत्पन्न जातक कहलाता है।

मूल नक्षत्र :-

प्रथम चरण – पिता के जीवन के लिए घातक।

दूसरा चरण – माता के लिए अशुभ, को कष्ट।

तीसरा चरण – धन नाश।

चतुर्थ चरण – जातक सुखी तथा समृद्ध जीवन व्यतीत करता है।

रेवती नक्षत्र का प्रभाव :-

मीन राशि में 16 अंश 40 कला से 30 अंश तक रेवती नक्षत्र होता है। जिस समय चंद्रमा मीन राशि में 26 अंश और 40 कला से 30 अंश के मध्य रहता है, तो गंडमूल नक्षत्र वाला जातक कहलाता है।

रेवती नक्षत्र :-

प्रथम चरण – जीवन सुख और आराम में व्यतीत होगा।

दूसरा चरण – मेहनत एवं बुद्धि से नौकरी में उच्च पद प्राप्त।

तीसरा चरण – धन-संपत्ति का सुख के साथ धन हानि भी।

चतुर्थ चरण — स्वयं के लिए कष्टकारी होता है।

गण्डमूल नक्षत्र शान्ति के उपाय :-

यदि जातक का जन्म गंडमूल नक्षत्र में हुआ है तो, उसके पिता को चाहिए कि अपने बच्चे का चेहरा न देखे और तुरंत पिता कि जेब में फिटकड़ी का टुकड़ा रखवा देना चाहिए। तत्पश्चात् 27 दिन तक प्रतिदिन 27 मूली पत्तों वाली बच्चे के सिर कि तरफ रख देना चाहिए, और पुनः उसे दुसरे दिन चलते पानी में बहा देना चाहिए। यह क्रिया 27 दिनों तक नियमित करना चाहिए। इसके बाद 27 वें दिन विधिवत पूजा करके बच्चे को देखना चाहिए। जिस नक्षत्र में जन्म हुआ है, उससे सम्बन्धित देवता तथा ग्रह की पूजा करनी चाहिए। इससे नक्षत्रों के नकारात्मक प्रभाव में कमी आती है। अश्विनी, मघा, मूल नक्षत्र में जन्में जातकों को गणेशजी की पूजा अर्चना करने से लाभ मिलता है। आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र में जन्में जातकों के लिए बुध ग्रह की अराधना करना चाहिए। तथा बुधवार के दिन हरी वस्तुओं जैसे हरा धनिया, हरी सब्जी, हरा घास इत्यादि का दान करना चाहिए। मूल में जन्में बच्चे के जन्म के ठीक 27वें दिन गंडमूल शांति पूजा करवाई जानी चाहिए, इसके अलावा ब्राह्मणों को दान, दक्षिणा देने और उन्हें भोजन करवाना चाहिए। इसके लिए सम्बंधित नक्षत्र का मन्त्र जाप, 27 कुओं का जल, 27 तीर्थ स्थलों के कंकण, समुद्र का फेन, 27 छिद्र का घड़ा, 27 पेड़ के पत्ते, 07 निर्धारित अनाज 07 खेडो की मृतिका, आदि दिव्य जड़ी-बूटी औषधियों के द्वारा शांति प्रक्रिया सम्पन्न कराना चाहिए। यह क्रिया 27वें दिन तक जब तक वह नक्षत्र हो 27 माला का जप, हवन तर्पण मार्जन कर 27 लोगो को भोजन कराना चाहिए। पुनः दक्षिणा देकर अपने बालक का चेहरा देखना चाहिए।

ज्योतिष के ग्रंथों में अनेक स्थानों पर गंडांत अर्थात गण्डमूल नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है, रेवती नक्षत्र की अंतिम चार घड़ियाँ और अश्वनी नक्षत्र की पहली चार घड़ियाँ गंडांत कही जाती हैं, ज्योतिष शास्त्र में गण्डमूल नक्षत्र के विषय में विस्तार पूर्वक बताया गया है, जातक पारिजात, बृहत्पराशर होरा शास्त्र ,जातकभरणं इत्यादि सभी प्राचीन ग्रंथों में गण्डमूल नक्षत्रों तथा उनके प्रभावों का वर्णन दिया गया है, गण्डमूल नक्षत्रों के सभी चरणों का फल जातक पर क्या विशेष पड़ता है देखें :-

अश्विनी :-

केतु के पहले गण्डमूल नक्षत्र को अश्विनी नक्षत्र कहा जाता है, अश्विनी नक्षत्र मेष राशि में शून्य अंश से प्रारम्भ होकर तेरह अंश बीस कला तक रहता है। जन्म के समय यदि चंद्रमा इन अंशों के मध्य स्थित हो तो, गण्डमूल नक्षत्र में जन्म का समय माना जाता है, अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर जातक को जीवन में अनेक कठिन परिस्थितियों एवं परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, पूर्व जन्म के कर्मों का फल इस नक्षत्र चरण में जन्म लेने के रूप में तुरंत सामने आता है, इस नक्षत्र में जन्म होने पर वह बच्चा पिता के लिए थोड़ा कष्टकारी हो सकता है, लेकिन इस कष्ट को किसी भी नकारात्मकता के साथ नहीं जोड़ा जा सकता, इसके लिए जन्मकुंडली के बहुत से योगों को देखना आवश्यक है।

अश्विनी नक्षत्र के द्वितीय चरण में जन्म लेने वाले बच्चे को जीवन में सुख व आराम प्राप्त होते हैं, अश्विनी नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक को जीवन के किसी भी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त होने के अवसर प्राप्त होते हैं, जातक मित्रों से लाभ प्राप्त करता है, घूमने-फिरने में उसकी रूचि अधिक होती है, किसी एक स्थान पर टिके रहना उसे अच्छा नहीं लगता।

अश्विनी नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने पर जातक को राज सम्मान की प्राप्ति अथवा सरकार की ओर उपहार आदि की प्राप्ति होती है, इसके साथ ही कभी कभी जातक को स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों का सामना करना पडता है।

आश्लेषा :-

कर्क राशि में 16 अंश और 40 कला से 30 अंश तक आश्लेषा नक्षत्र रहता है, जब चंद्रमा जन्म के समय कर्क राशि के इन अंशों के मध्य स्थित होता है, तो यह गंडमूल नक्षत्र कहलाता है।

आश्लेषा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर किसी तरह का कोई विशेष अशुभ नहीं होता, परंतु धन की हानि उठानी पड़ती है, यदि इसकी शांति पूजा हो तो, यह शुभ फल प्रदान करता है।

आश्लेषा नक्षत्र के द्वितीय चरण में जन्म होने पर बच्चा अपने बहन-भाईयों के लिए कष्टकारी होता है, या जातक अपनी संपत्ति को नष्ट कर लेता है।

आश्लेषा नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म हुआ है तो, माता तथा पिता दोनों को ही कष्ट सहना पड़ता है।

आश्लेषा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म हुआ है तो, पिता को आर्थिक हानि तथा शारीरिक कष्ट सहना पड़ता है।

मघा :-

सिंह राशि के शून्य अंश के साथ मघा नक्षत्र का आरम्भ होता है, सिंह राशि में जब चंद्रमा शून्य से लेकर 13 अंश और 20 कला तक रहता है, तब वह गंडमूल नक्षत्र में कहलाता है।

मघा नक्षत्र के प्रथम चरण में यदि किसी बच्चे का जन्म होता है तो, माता को कष्ट होने की संभावना बनी रहती है। इस नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म लेने से पिता को कोई कष्ट या हानि का सामना करना पड़ सकता है।

मघा नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म लेने पर बच्चे को जीवन में सुखों की प्राप्ति होती है। यदि बच्चे का जन्म मघा नक्षत्र के चौथे चरण में होता है, तब उसे कार्य क्षेत्र में स्थायित्व प्राप्त होता है, इस नक्षत्र में जन्म होने के कारण बच्चा उच्च शिक्षा भी ग्रहण करने से पीछे नहीं रहता।

ज्येष्ठा :-

वृश्चिक राशि में 16 अंश 40 कला से 30 अंश तक ज्येष्ठा नक्षत्र होता है। इस समय जब चंद्रमा वृश्चिक राशि में उपरोक्त अंशों के मध्य स्थित हो तो, गंडमूल नक्षत्र होता है।

भारतीय ज्योतिष अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र को अशुभ नक्षत्रों की श्रेणी में रखा गया है, ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म लेने से बच्चे के बड़े भाई-बहनों को कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है।

ज्ये‌ष्ठा के द्वितीय चरण में जन्म होने पर छोटे भाई-बहनों के लिए अशुभ देखा गया है। उन्हें शारीरिक अथवा अन्य कई प्रकार के कष्ट होते हैं।

ज्ये‌ष्ठा के तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक की माता को स्वास्थ्य की दृष्टि से कष्ट बना रहता है।

इस नक्षत्र चरण में जन्म लेने से जातक स्वयं के भाग्य के लिए अच्छा नहीं रहता, उसे जीवन में कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। ज्येष्ठा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाले व्यक्तियों को जीवन में कठिन परिस्थितियों व जटिलताओं का सामना करना पडता है। मैंने देखा है इस चरण में जन्म होने के कारण जातक को जीवनभर दु:ख और पीड़ा का सामना ही करना पड़ता है।

मूल :-

जब चंद्रमा धनु राशि में शून्य से 13 अंश और 20 कला के मध्य स्थित होता है, तब यह गंडमूल नक्षत्र में आता है। बच्चे का जन्म मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में होने से पिता के जीवन में कई प्रकार के अच्छे-बुरे परिवर्तन होने लगते हैं।

मूल नक्षत्र के द्वितीय चरण में बच्चे का जन्म ज्योतिष में माता के लिए अशुभ माना गया है, इस चरण में बच्चे का जन्म होने से माता का जीवन कष्टपूर्ण रहने की संभावना बनती है।

मूल नक्षत्र के तीसरे चरण में हुआ हो, तब उसकी संपत्ति के नष्ट होने की संभावना बनती है, इस चरण में जन्म लेने वाले जातक का संपत्ति से वंचित रहना देखा जा सकता है।

मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने पर जातक सुखी तथा समृद्ध रहता है, परंतु यदि शांति कराई जाये तब ही शुभ फलों की प्राप्ति होती है। इस चरण में जन्म लेने पर बच्चे को अपने जीवन में एक बार भारी हानि उठानी पड़ती है।

रेवती :-

मीन राशि में 16 अंश 40 कला से 30 अंश तक रेवती नक्षत्र होता है। जिस समय चंद्रमा मीन राशि में इन अंशों से गुजर रहा हो तब यह समय गंडमूल नक्षत्र का होता है।

यदि जन्म रेवती नक्षत्र के प्रथम चरण में हुआ है तो, जीवन सुख और आराम से व्यतीत होता है। जातक आर्थिक रूप से सम्पन्न और सुखी रहता है।

रेवती नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म लेने वाले जातक अपनी मेहनत, बुद्धि एवं लगन से नौकरी में उच्च पद प्राप्त करते हैं, या व्यवसायिक रूप से कामयाब हो जाते हैं, परंतु फिर भी जातक को बड़े होकर कुछ भूमि की हानि होती है।

रेवती नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक को धन-संपत्ति का सुख तो प्राप्त होता है, परंतु साथ- साथ धन हानि की भी संभावना बनी रहती है।

रेवती नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाला जातक स्वयं के लिए कष्टकारी साबित होता है। परंतु मतातन्तर से इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति अपने माता-पिता दोनों के लिए ही कष्टकारी सिद्ध होते हैं। उनका जीवन काफी संघर्ष से गुजरता है।

गंडमूल नक्षत्रों का जीवन पर प्रभाव :-

गंडमूल दोष :- अपनी प्रचलित परिभाषा के अनुसार गंडमूल दोष लगभग हर चौथी-पांचवी कुंडली में उपस्थित पाया जाता है, तथा ज्योतिषियों की धारणा के अनुसार यह दोष कुंडली वाले जातक के जीवन में अड़चनें पैदा करने में सक्षम होता है।

गंडमूल दोष होता क्या है, किसी कुंडली में यह दोष बनता कैसे है, तथा इसके दुष्प्रभाव क्या हो सकते हैं? गंडमूल नक्षत्रों का विचार जन्म के समय की ग्रह स्थिति को देखकर किया जाता है। जैसा की पहले लिखा गया है- अश्वनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती गंडमूल नक्षत्र कहलाते हैं। इन नक्षत्रों में जन्मे बालक का 27 दिन तक उसके पिता द्वारा मुंह देखना वर्जित होता है। जन्म के ठीक 27वें दिन उसी नक्षत्र में इसकी मूल शांति करवाना अति आवश्यक होता है। ऐसा ग्रंथों में वर्णित है। सभी नक्षत्रों के चार-चार चरण होते हैं इन्हीं प्रत्येक चरणों के अनुसार माता, पिता, भाई, बहन या अपने कुल में किसी पर भी नक्षत्र अपना प्रभाव दिखाते हैं। प्रायः इन नक्षत्रों में जन्मे बालक-बालिका स्वयं के लिए भी कष्टप्रद हो सकते हैं।
अगर किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली का चन्द्रमा, रेवती, अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा तथा मूल नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में स्थित हो तो, कुंडली धारक का जन्म गंडमूल में हुआ माना जाता है, अर्थात उसकी कुंडली में गंडमूल दोष की उपस्थिति मानी जाती है। 27 नक्षत्रों में से उपर बताए गए 6 नक्षत्रों में चन्द्रमा के स्थित होने से यह दोष माना जाता है, जिसका अर्थ यह निकलता है कि यह दोष लगभग हर चौथी-पांचवी कुंडली में बन जाता है, किन्तु यह धारणा ठीक नहीं है। यह दोष हर चौथी-पांचवी कुंडली में नहीं बल्कि हर 18 वीं कुंडली में ही बनता है। आइए अब इस दोष की प्रचलित परिभाषा तथा इसके विशलेषण से निकली परिभाषा की आपस में तुलना करें। प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह दोष चन्द्रमा के उपर बताए गए 6 नक्षत्रों में से किसी भी एक चरण में स्थित होने से बन जाता है। जबकि वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार यह दोष चन्द्रमा के इन 6 नक्षत्रों के किसी एक नक्षत्र के किसी एक विशेष चरण में होने से ही बनता है। न कि उस नक्षत्र के चारों चरणो में से किसी भी चरण में स्थित होने से।

जैसे- चन्द्रमा रेवती नक्षत्र के चौथे चरण में स्थित हों या अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण में स्थित हो।

जैसे- चन्द्रमा अश्लेषा नक्षत्र के चौथे चरण में स्थित हो या मघा नक्षत्र के पहले चरण में स्थित हो।

जैसे- चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र के चौथे चरण में स्थित हों या मूल नक्षत्र के पहले चरण में स्थित हो।

इस दोष से जुड़े बुरे प्रभावों के बारे में भी जान लीजिए- गंड मूल दोष भिन्न-भिन्न कुंडलियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के बुरे प्रभाव देता है, जिन्हें ठीक से जानने के लिए यह जानना आवश्यक होगा कि कुंडली में चन्द्रमा इन 6 में से किस नक्षत्र में स्थित हैं, और कुंडली के किस भाव में स्थित है? कुंडली के दूसरे सकारात्मक या नकारात्मक ग्रहों का चन्द्रमा पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ रहा है, चन्द्रमा जातक की कुंडली में किस भाव का स्वामी है, तथा ऐसे ही कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य। इस प्रकार से अगर यह दोष कुछ कुंडलियों में बनता भी है तो, भी इसके बुरे प्रभाव अलग-अलग कुंडलियों में अलग-अलग तरह के होते हैं। तथा अन्य दोषों की तरह इस दोष के बुरे प्रभावों को भी किसी विशेष परिभाषा के बंधन में नहीं बांधना चाहिए। बल्कि इस दोष के कारण होने वाले बुरे प्रभावों को उस कुंडली के गहन अध्ययन के बाद ही निश्चित करना चाहिए।

मूल नक्षत्रों की शांति व उपाय :-
मूल नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों के सुखमय भविष्य के लिए इन नक्षत्रों की शांति करवानी आवश्यक मानी गई है, मूल शांति कराने से इनके कारण लगने वाले दोष शांत हो जाते हैं, अन्यथा इनके अनेक प्रभाव लक्षित होते है, जो इस प्रकार से प्रभावित कर सकते हैं :- इस दोष के निवारण का सबसे उत्तम उपाय इस दोष के निवारण के लिए पूजा करवाना ही है। यह पूजा सामान्य पूजा की तरह न होकर एक तकनीकी पूजा होती है।
जन्म नक्षत्र के अनुसार देवता का पूजन करने से अशुभ फलों में कमी आती है, तथा शुभ फलों की प्राप्ति में सहायता प्राप्त होती है, यदि जातक अश्विनी, मघा, मूल नक्षत्र में जन्मा है तो, आपको गणेश जी का पूजन करना चाहिए। इस नक्षत्र में जन्मे जातक को माह के किसी भी एक गुरुवार या बुधवार को हरे रंग के वस्त्र, लहसुनियां आदि में से किसी भी एक वस्तु का दान करना फलदायी रहता है, मंदिर में झंडा फहराने से भी लाभ मिलता है, यदि जातक अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र में जन्मा है तो, उसके लिये बुध ग्रह का पूजन करना फलदायी रहता है। इस नक्षत्र में जन्में जातक को माह के किसी भी एक बुधवार को हरी सब्जी, हरा धनिया, पन्ना, कांसे के बर्तन, आंवला आदि वस्तुओं में से किसी भी एक वस्तु का दान करना शुभकारी होता है।

मूल शांति पूजा :-
उपरोक्त उपायों के अतिरिक्त जो उपाय सबसे अधिक प्रचलन में है, उसके अनुसार यदि बच्चा गण्डमूल नक्षत्र में जन्मा है, तो उसके जन्म से ठीक 27वें दिन उसी जन्म नक्षत्र में चंद्रमा के आने पर गंडमूल शांति पूजा करानी चाहिए। ज्येष्ठा मूल या अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक के लिए उक्त नक्षत्रों से संबंधित मंत्रों का जाप करवाना चाहिये, तथा मूल नक्षत्र शान्ति पूजन करना चाहिए, ब्राह्मणों को दान दक्षिणा एवं भोजन कराना चाहिए, यदि किसी कारणवश 27वें दिन यह पूजा नहीं कराई जा सकती, तब माह में जिस दिन चंद्रमा जन्म नक्षत्र में होता है, तब इसकी शांति कराई जा सकती है।

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शिवलिंग पर क्या चढायें :-

Dr.R.B.Dhawan

शिवलिंग पर क्या चढ़ाने से, किस प्रकार का लाभ मिलता है ? यह शिवपुराण में विस्तार से वर्णित है। शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है, अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे हैं, उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए इस का उल्लेख शिव पुराण में विस्तार से किया गया है, उसका स-विस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हूं :-

श्लोक :-

जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै

दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै।

मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।

पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।।

बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा यांगना।

जवरप्रकोपशांत्यर्थम् जलधारा शिवप्रिया।।

घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्।

तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः।

प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम।

केवलं दुग्धधारा च वदा कार्या विशेषतः।

शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत्।

श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!!

सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह!

पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।।

जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै।

पुत्रार्थी शर्करायास्तु रसेनार्चेतिछवं तथा।

महलिंगाभिषेकेन सुप्रीतः शंकरो मुदा।

कुर्याद्विधानं रुद्राणां यजुर्वेद्विनिर्मितम्।

अर्थात :-

जल से रुद्राभिषेक करने पर — वृष्टि होती है।

कुशा जल से अभिषेक करने पर — रोग, दुःख से छुटकारा मिलता है।

दही से अभिषेक करने पर — पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।

गन्ने के रस से अभिषेक करने पर — लक्ष्मी प्राप्ति होती है।

मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर — धन वृद्धि होती है।

तीर्थ जल से अभिषेकक करने पर — मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इत्र मिले जल से अभिषेक करने से — रोग नष्ट होते हैं।

दूध से अभिषेक करने से — पुत्र प्राप्ति होगी, प्रमेह रोग की शान्ति तथा मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।

गंगाजल से अभिषेक करने से — ज्वर ठीक हो जाता है।

दूध शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से — सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है।

घी से अभिषेक करने से — वंश विस्तार होता है।

सरसों के तेल से अभिषेक करने से — रोग तथा शत्रुओं का नाश होता है।

शुद्ध शहद से रुद्राभिषेक करने से —- पाप क्षय होते हैं।

इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूजन और अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है, और साधक में शिवत्व रूप “सत्यं शिवम सुन्दरम्” का उदय हो जाता है। उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद से सुख-समृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति के साथ-साथ सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।

भूत भावन भगवान महादेव को विशेष वस्तुए अर्पण कर कृपा प्राप्त करें :-

भगवान शिव बहुत भोले हैं, वे अपने भक्तों के दु:ख और तकलीफों को देख नहीं पाते, भक्त के आंसू महादेव को बहुत ही जल्द पिघला भी देते हैं। महादेव की इसी खूबी की वजह से भक्त उन्हें भोलेनाथ भी कहते हैं। भोलेनाथ को सोमवार का दिन अत्यंत प्रिय है, सोमवार के दिन शिव पूजा का महत्व भी बहुत बढ़ जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर सोमवार और त्रयोदशी के दिन श्रद्धा भावना के साथ शिव आराधना की जाए तो जातक को महादेव की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।

हिन्दू धर्म में हर देवी-देवताओं की पूजा करने के कुछ विशिष्ट विधान बतायेगा गये हैं, जैसे माना जाता है कि, भगवान कृष्ण की पूजा में माखन-मिश्री का भोग अवश्य लगाना चाहिए, वैसे ही गणेश जी को मोदक अत्यंत प्रिय है, इसलिए उनकी पूजा में मोदक का भोग अवश्य लगता है। इष्ट देव को प्रसन्न करने के लिए ऐसी ही अनेक पूजा विधियां हैं।

ऐसे ही महादेव को प्रसन्न करने के भी अनेक उपाय मौजूद हैं, जिनका उल्लेख शिव पुराण में मिलता है :-

1- शिव पुराण के अनुसार जातक अगर धन लाभ या संपत्ति लाभ प्राप्त करना चाहता है तो, उसे शिवलिंग पर कच्चे चावल चढ़ाने चाहिए, इससे अवश्य ही शुभ फल प्राप्त होगा।

2- भगवान शिव को तिल अर्पित करने से समस्त पापों का नाश होता है, यह उपाय कर्मक्षय करने में बहुत लाभदायक है।

3- अगर लंबे समय से कोई परेशानी चल रही है, या घर में सुख-समृद्धि बाधित है तो, शिवलिंग पर जौ चढ़ाएं, इससे अवश्य ही परेशानी दूर होती है।

4- संतान की कामना करते हैं तो, शिवलिंग पर गेहूं चढ़ायें, इसके अलावा सुयोग्य पुत्र की प्राप्ति हेतु शिवलिंग पर धतूरे के फूल अर्पित करें, महादेव आपकी प्रार्थना अवश्य सुनेंगे।

5- अगर परिवार के किसी सदस्य को तेज बुखार अपनी चपेट में लिए हुए है तो, शिवलिंग पर जल अर्पित करें। इस समस्या से जल्द ही छुटकारा मिलेगा।

6- पढ़ाई में तेज होने के लिए या मस्तिष्क को मजबूत करने के लिए दूध में चीनी मिलाकर भगवान शिव को चढ़ायें

7- शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाना शुभदायी होता है, ऐसा करने से सभी सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है।

8- शिवलिंग पर गंगा जल अर्पित करने से मनुष्य को भौतिक सुखों के साथ-साथ मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

9- अगर किसी को टी. बी. या मधुमेह की समस्या परेशान कर रही है तो, उसे शिवलिंग पर शहद अर्पित करना चाहिये। अवश्य ही राहत मिलेगी।

10- शारीरिक दु:ख और दुर्बलता से मुक्ति पाने के लिये शिवलिंग पर गाय के दूध से बना शुद्ध देसी घी चढ़ावें लंबी उम्र की कामना हेतु दूर्वा से भगवान शिव की पूजा करें।

11- शिवलिंग पर आक के फूल चढ़ाने और शिव पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह सांसारिक बाधाओं को दूर करता है।

12- शमी के पेड़ के पत्तों को शिवलिंग पर चढ़ाने और शिव पूजा करने से मनुष्य जीवन के दुखों से मुक्ति प्राप्त करता है, और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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