​राहु

कैसे प्रभावित करता है, राहु मनुष्य के स्वभाव को:-

Dr.R.B.Dhawan

राहु ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में एक छाया ग्रह कहा गया है, अर्थात इस ग्रह का कोई अपना पिंड नहीं है, वस्तुत: यह दो ग्रहों के भ्रमण मार्ग का कटाव बिंदु मात्र है, परंतु फिर भी कभी-कभी इस ग्रह (कटाव बिंदु) का मनुष्य के मन मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। राहु की प्रवृति राक्षसी होने के कारण ये मनुष्य को तामसिक प्रवृति का अपना गुण प्रदान कर ही देता है, कुंडली में नकारात्मक राहु से प्रभावित व्यक्ति अक्सर भ्रमित रहता है।

पौराणिक धारणा

कैसे बना राहू ग्रह? क्या है राहू ?:-

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हिरन्यकश्यप की सिंहिका नामक पुत्री का विवाह विप्रचिति नामक दानव के साथ हुआ था उसी के गर्भ से राहु ने जन्म लिया। विप्रचिति हमेशा दानवी शक्तियों, आसुरी शक्तियों से दूर रहे और साथ ही समुद्र मंथन के समय अमृतपान के कारण राहु को अमरत्व एवं देवत्व की प्राप्ति हुई। तभी से शिव भक्त राहु अन्य ग्रहों के साथ ब्रह्मा जी की सभा में विराजमान रहते हैं इसलिए इन्हें ग्रह के रूप में मान्यता मिली।

क्या है राहू ?

जन्मकुंडली में राहु पूर्व जन्म के कर्मों के बारे में बताता है, राहु परिवर्तनशील, अस्थिर प्रकृति का ग्रह माना जाता है। राहु में अंतर्दृष्टि भी होती है ताकि वह काल की रचनाओं के बारे में सोच सके बता सके। भौतिक दृष्टि से इसका कोई रंग, रूप, आकार नहीं है, इसकी कोई राशि, वार नहीं होता। वैदिक ज्योतिषियों ने इसकी स्वराशि, उच्च राशि और मूलत्रिकोण राशियों की कल्पना की है। जातक परिजात में राहु की उच्च राशि मिथुन, मूलत्रिकोण कुंभ और स्वराशि कन्या मानी गई है। राहु का व्यवहार अत्यंत प्रभावशाली देखा गया है। राहु पूर्वाभास की योग्यता भी विकसित करता है। विशेषकर जब राहु जल राशियों कर्क, वृश्चिक, मीन में हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि हो।

राहु छुपे हुए रहस्यों, तंत्र, मंत्र, काला जादू व भूत प्रेत का कारक भी है। राहु की तामसिक प्रवृत्ति के कारण वह चालाक है और व्यक्ति को भौतिकता की ओर पूर्णतया अग्रसर करता है, बहुत महत्वाकांक्षी व लालची बनाता है, जिसके लिए व्यक्ति साम-दाम-दंड-भेद की नीतियां अपनाकर जीवन में आगे बढ़ता है।

 इसी तरह यह व्यक्ति को भ्रमित भी रखता है। एक के बाद दूसरी इच्छाओं को जागृत करता है। इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह विभिन्न धार्मिक कार्य व यात्राएं भी करता है। राहु प्रधान व्यक्ति में दिखावा करने की प्रवृत्ति विशेष रूप से पायी जाती है। राहु कार्य जाल में फंसाता है, जीवन में आकर्षण को बनाये रखता है, हार नहीं मानता अर्थात इच्छा शक्ति को जागृत रखता है।

 राहु का योग जन्म पत्रिका में जिस ग्रह के साथ होगा उसी में विकार उत्पन्न हो जायेगा और केतु का योग जिस ग्रह के साथ होगा उसकी काट होगी। उसका दोष कम हो जायेगा। कोई भी ग्रह राहु के मुख में होगा उस व्यक्ति का व्यवहार उस भाव से संबंधित असंयमित हो जायेगा।

 सूर्य के निकट रहने पर राहु सूर्य का सारा बल ग्रहण कर लेता है । इस प्रकार राहु चंद्र के साथ मन की स्थिति बहुत अव्यवस्थित करके मन में उथल-पुथल मचा देता है। विचारों और भावनाओं में विकार उत्पन्न हो जाता है। ऐसा देखने में आया है कि जिन जातकों की जन्मपत्रिका में राहु और चंद्रमा की युति हो वे बहुत परेशान देखे गये हैं, मानसिक सामंजस्यता की बेहद कमी देखी गयी है। अन्य पाप ग्रहों का भी दृष्टि या युति संबंध हो तो मानसिक रोगी व पागलपन की स्थिति भी देखी गयी है।

 राहु गुरु के साथ मिलकर गुरु चांडाल योग का निर्माण करता है जो विवाह व ज्ञान प्राप्ति में बाधा बन जाता है। इस प्रकार राहु सभी ग्रहों के साथ युति करके किसी न किसी प्रकार का विकार उत्पन्न करता है। किंतु यह सब फल राहु की दशा अंतर्दशा आने पर ही मिलते हैं। मित्र राशियों में शुभ व शत्रु राशियों में अशुभ फल देते हैं। राहु के परिणाम शुभ मिलेंगे या अशुभ यह मूलतः नक्षत्रों द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।राहु के अपने नक्षत्र हैं आद्रा, स्वाति एवं शतभिषा। इन नक्षत्रों में राहु रहने पर शुभ परिणाम देता है।

ज्योतिष शास्त्रों में राहु पीड़ा को भूत, प्रेत, पिशाच, मसान आदि भी कहा गया है, आयुर्वेद के ग्रंथों में भूत-बाधा को एक विशेष प्रकार की मानसिक बीमारी बताया गया है। आगे की पंक्तियों में कुछ ग्रह योग दे रहा हूं, जो कुंडली में हों तो जातक को अपना प्रभाव दिखाते हैं:-

— लग्न में राहु तथा चंद्र और त्रिकोण में मंगल व शनि हों, तो जातक को प्रेत पीड़ा होती है।

— चंद्र राहु से युक्त अथवा पाप ग्रह से दृष्ट हो, शनि सप्तम में हो तथा कोई शुभ ग्रह चर राशि में हो, तो भूत पीड़ा होती है।

— शनि तथा राहु लग्न में हो, तो जातक को भूत सताता है।

— लग्नेश या चंद्र से युक्त राहु लग्न में हो, तो प्रेत पीड़ा होता है।

— यदि दशम भाव का स्वामी आठवें या एकादश भाव में हो और उस भाव के स्वामी से दृष्ट हो, तो ऐसी स्थिति में प्रेत पीड़ा होता है।

— नीच राशि में स्थित राहु के साथ लग्नेश हो तथा वह लग्नेश सूर्य, शनि व अष्टमेश से दृष्ट हो तो जातक को भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

— पंचम भाव में सूर्य तथा शनि हो, निर्बल अथवा राहु युक्त चन्द्रमा सप्तम भाव में हो तथा बृहस्पति बारहवें भाव में हो, तो भी भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

— जन्म समय चन्द्र ग्रहण हो और लग्न, पंचम तथा नवम भाव में पाप ग्रह हों तो जन्मकाल से ही पिशाच बाधा का भय होता है।

— षष्ठ भाव में पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट राहु या केतु की स्थिति भी पैशाचिक बाधा उत्पन्न करती है।

— लग्न में शनि, राहु की युति हो अथवा दोनों में से कोई भी एक ग्रह स्थिति हो अथवा लग्नस्थ राहु पर शनि की दृष्टि हो, भ्रम होता है।

— लग्नस्थ केतु पर कई पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो, पैशाचिक बाधा होती है।

— निर्बल चन्द्रमा शनि के साथ अष्टम में हो तो पिशाच, भूत-प्रेत मशान आदि का भय।

— निर्बल चन्द्रमा षष्ठ अथवा बाहरहवें में मंगल, राहु या केतु के साथ हो तो भी पिशाच भय।

— चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) के लग्न में राहु और लग्नेश पर यदि षष्ठेश की दृष्टि हो।

— एकादश भाव में मंगल राहु हो तथा नवम भाव में स्थिर राशि (वृष, सिंह,वृश्चिक, कुंभ) और सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु मीन) हो।

— लग्न भाव मंगल से दृष्ट हो तथा षष्ठेश, दशम, सप्तम या लग्न भाव में राहु की स्थिति हों।

— मंगल यदि लग्नेश और राहु के साथ केंद्र या लग्न भाव में स्थिति हो तथा छठे भाव का स्वामी लग्नस्त हो।

— पापग्रहों से युक्त या दृष्ट केतु लग्नगत हो।

— शनि राहु केतु या मंगल में से कोई भी एक ग्रह सप्तम स्थान में हो।

— जब लग्न में चन्द्रमा के साथ राहु हो और त्रिकोण भावों में क्रूर ग्रह हों तो, मानसिक व्याधियां कष्ट देती हैं।

— राहु शनि से युक्त होकर लग्न में स्थित हो तो, मानसिक व्याधियां होती हैं।

— लग्नेश एवं राहु अपनी नीच राशि का होकर अष्टम भाव या अष्टमेश से संबंध करे।

— राहु अष्टम भाव में हो तथा लग्नेश शनि के साथ द्वादश भाव में स्थित हो, तो प्रेत बाधा का प्रभाव संभव होता है।

— द्वितीय में राहु द्वादश में शनि षष्ठ मं चंद्र तथा लग्नेश भी अशुभ भावों में हो।

— चन्द्रमा तथा राहु दोनों ही नीच राशि के होकर अष्टम भाव में हो।

— चतुर्थ भाव में राहु हो वक्री मंगल द्वादश भाव में हो तथा अमावस्या तिथि का जन्म हो तो, नकारात्मक ऊर्जा परेशान करती हैं।

— नीचस्थ सूर्य के साथ केतु हो तथा उस पर शनि की दृष्टि हो तथा लग्नेश भी नीच राशि का हो तो, नकारात्मक ऊर्जा पीड़ित करती है।

— जिन जातकों की कुण्डली में उपरोक्त योग हों, उन्हें विशेष सावधानी पूर्वक रहना चाहिए तथा संयमित जीवन शैली को ग्रहण करना चाहिए। जिन परिस्थितियों के कारण भ्रम अथवा प्रेत बाधा का प्रकोप हो सकता है उनसे बचें। जातक को भ्रम, नकारात्मक ऊर्जा अथवा प्रेतबाधा से मुक्त रखने में यह उपाय सहायक सिद्ध हो सकते हैं:-

— शारीरिक सुचिता के साथ-साथ मानसिक पवित्रता का ध्यान रखें।

— नित्य हनुमान चालीसा तथा बजरंग बाण का पाठ करें।

— मंगलवार का व्रत रखें तथा सुन्दरकांड का पाठ करें।

— पुखराज रत्न से प्रेतात्माएं दूर रहती हैं, पुखराज रत्न धारण करें।

— घर में नित्य शंख बजाये, इससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।

— नित्य गायत्री मंत्र की तीन माला जाप करें।

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Diwali muhurat 2017

2015 Diwali Muhurat

Diwali Pooja muhurat 2017

by :-​Dr.R.B.Dhawan

diwali 2017 का पर्व 19 अक्टूबर 2017 बृहस्पिवार के दिन है। कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि प्रदोषकाल, स्थिर लग्न में अथवा  महानिशीथ काल, स्थिर लग्न में अनुकूल चौघडिया के समय गणेश सहित देवी महालक्ष्मी-महाकाली-महासरस्वती diwali Pooja की पूजा-आराधना Laxmi pooja करने से यह देवीयां भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं।

इस वर्ष दीपावली depawli pooja, Laxmi Pooja का पर्व 19 अक्तूबर 2017 बृहस्पतिवार के दिन होगा। दिल्ली की समय गणना अनुसार इस दिन अमावस्या रात्रि 24:44 तक रहेगी, चित्रा नक्षत्र 19:28 से आरंभ होगा, वृष (स्थिर लग्न) 19:11 से 21:06 तक रहेगी। निशीथ काल nishith kaal 20:20 से 22:54 तक, प्रदोष काल pradosh kaal 17:46 से 20:20 तक रहेगा। दीपावली की शाम प्रदोष काल में स्नान के उपरांत वस्त्राभूषण धारण करके धर्मस्थल पर श्रद्धापूर्वक दीपदान करके शुभ मुहूर्त अनुकूल चौघडिया में अपने निवास स्थान पर श्री गणेश सहित देवी महालक्ष्मी महाकाली महासरस्वती और कुबेर की पूजा diwali pooja करनी चाहिए।

महालक्ष्मी Laxmi Pooja पूजन विशेष मुहूर्त diwali muhurat 2017, :-   (1). सायं 19 : 11 से 20 : 20 तक। (2). रात्रि 20 : 20 से 20 : 59 तक। यह दोनों मुहूर्त वृष लग्न के हैं।

Diwali Special muhurt 2017, मध्य रात्रि महानिशीथ काल सिंह लग्न : 25 : 39 से 25 : 48 तक है।

Diwali muhurat by:- Dr.R.B.Dhawan, Top astrologer in Delhi, Best astrologer in India 


कर्ज की समस्या

कर्ज की समस्या और ज्योतिषीय कारण:-

Dr.R.B.Dhawan:-

       जन्म होते ही हम अपने प्रारब्ध के चक्र से बंधे होते हैं, और जन्मकुंडली हमारे इसी प्रारब्ध को सूचित करती है। हमारे जीवन में सभी घटनाएं नवग्रह द्वारा ही सूचित होती हैं। आज के समय में जहाँ आर्थिक असंतुलन हमारी चिंता का एक मुख्य कारण है, वहीँ एक दूसरी स्थिति जिसके कारण अधिकांश लोग चिंतित और परेशान रहते हैं वह है “कर्ज की स्थिति” धन चाहे व्यक्तिगत लिया गया हो, या सरकारी लोन के रूप में, ये दोनों ही स्थितियां व्यक्ति के ऊपर एक बोझ के समान बनी रहती हैं, कई बार ना चाहते हुये भी परिस्थितिवश व्यक्ति को कर्ज रुपी बोझ का सामना करना ही पड़ता है, वैसे तो आज के समय में अपने कार्यो की पूर्ती के लिए अधिकांश लोग कर्ज लेते हैं, परन्तु जब जीवन पर्यन्त बनी रहे या बार-बार यह स्थिति सामने आये तो वास्तव में यह भी हमारी कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोगों के द्वारा ही सूचित होती है।कुंडली में “छटा भाव” कर्ज का भाव माना गया है, अर्थात कुंडली का छटा भाव ही व्यक्ति के जीवन में कर्ज की स्थिति को सूचित करता है, जब कुंडली के :-

छटे भाव में कोई पाप योग बना हो, या षष्टेश ग्रह बहुत पीड़ित हो तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है जैसे – 

यदि छटे भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में भावस्थ हो, छठ्ठेे भाव में राहु-चन्द्रमाँ की युति हो, राहु-सूर्य के साथ होने से ग्रहण योग बन रहा हो, छठ्ठेे भाव में राहु मंगल का योग हो, छठ्ठे भाव में गुरु-चाण्डाल योग बना हो, शनि-मंगल या केतु-मंगल की युति छठ्ठे भाव में हो तो …ऐसे पाप या क्रूर योग जब कुंडली के छटे भाव में बनते हैं तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या बहुत परेशान करती है और री-पेमेंट में बहुत समस्यायें आती हैं। 

छठ्ठे भाव का स्वामी ग्रह भी जब नीच राशि में हो अष्टम भाव में हो या बहुत पीड़ित हो तो कर्ज की समस्या होती है । इसके अलावा “मंगल” को कर्ज का नैसर्गिक नियंत्रक ग्रह माना गया है ! अतः यहाँ मंगल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है यदि कुंडली में मंगल अपनी नीच राशि (कर्क) में हो आठवें भाव में बैठा हो, या अन्य प्रकार से अति पीड़ित हो तो भी कर्ज की समस्या बड़ा रूप ले लेती है”   

विशेष: – यदि छठ्ठे भाव में बने पाप योग पर बलवान बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो कर्ज का रीपेमेंट संघर्ष के बाद हो जाता है या व्यक्ति को कर्ज की समस्या का समाधान मिल जाता है परन्तु बृहस्पति की शुभ दृष्टि के आभाव में समस्या बनी रहती है।

छठ्ठे भाव में पाप योग जितने अधिक होंगे उतनी समस्या अधिक होगी, अतः कुंडली का छठा भाव पीड़ित होने पर लोन आदि लेने में भी बहुत सतर्कता बरतनी चाहिये।

बहुत बार व्यक्ति की कुंडली अच्छी होने पर भी व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है, जिसका कारण उस समय कुंडली में चल रही अकारक ग्रहों की दशाएं या गोचर ग्रहों का प्रभाव होता है, जिससे अस्थाई रूप से व्यक्ति उस विशेष समय काल के लिए कर्ज के बोझ से घिर जाता है।

उदाहरणार्थ : अकारक षष्टेश और द्वादशेश की दशा व्यक्ति को कर्ज की समस्या देती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में अलग-अलग ग्रह-स्थिति और अलग-अलग दशाओं के कारण व्यक्तिगत रूप से तो कुण्डली विश्लेषण के बाद ही किसी व्यक्ति के लिए चल रही कर्ज की समस्या के लिए सटीक ज्योतिषीय उपाय निश्चित किये जा सकते हैं। अतः यहाँ हम कर्जमुक्ति के लिए ऐसे कुछ मुख्य उपाय बता रहे हैं, जिन्हें कोई भी व्यक्ति कर सकता है:-

उपाय :- 
1. मंगल यन्त्र को घर के मंदिर में लाल वस्त्र पर स्थापित करें, और प्रतिदिन इस मंत्र का एक माला जाप करें :- ॐ क्राम क्रीम क्रोम सः भौमाय नमः।

2. प्रति दिन *ऋणमोचन मंगल स्तोत्र* का पाठ करें। 

3. *हनुमान चालीसा* का पाठ करें। 

जन्म कुंडली के विशेष योग

यूं तो एक जातक की जन्मकुंडली में सैकड़ों योग बनते हैं, इनमें से कुछ योग बलवान होते हैं, और कुछ निर्बल। निर्बल योगों का फल कब फलित हुआ यह पता ही नहीं चलता, और बलवान योग अपना फलित प्रकट करते हुए स्पष्ट दिखाई देते हैं। इस लेख में कुंडली के कुछ विशेष योग बताए ज रहे हैं, जो अपना न्यूनाधिक फल देते हैं।

द्विभार्या योग :-

राहू लग्न में पुरुष राशि (सिंह के अलावा) में हो अथवा 7वें भाव में सूर्य, शनि, मंगल, केतु या राहू में से कोर्इ भी दो ग्रह (युति दृष्टि द्वारा) जुड़ जाएं तो द्विभार्या योग बनता है। (ऐसे में सप्तमेष व द्वादशेश की स्थिति भी विचारनी चाहिए)। अष्टमेश सप्तमस्थ हो तो द्विभार्या योग होता है।

राजयोग :-

नवमेश तथा दशमेश एकसाथ हो तो राजयोग बनता है। दशमेश गुरू यदि त्रिकोण में हो तो राजयोग होता है। एकादशेश, नवमेश व चन्द्र एकसाथ हो (एकादश स्थान में) तथा लग्नेश की उन पर पूर्ण दृष्ट हो तो राजयोग बनता है। ( राजयोग में धन, यश, वैभव, अधिकार बढ़ते है)

विपरीत राजयोग :-

6ठें भाव से 8वें भाव का सम्बन्ध हो जाएं। अथवा दशम भाव में 4 से अधिक ग्रह एक हो जाएं। या फिर सारे पापग्रह प्राय: एक ही भाव में आ जाए तो विपरित योग बनता है। इस राजयोग के भांति यदा तरक्की नही होती जाती। किन्तु बिना प्रयास के ही आकस्मिक रूप से सफलता, तरक्की धन या अधिकार की प्राप्ति हो जाती है।

आडम्बरी राजयोग :-

कुंडली में समस्त ग्रह अकेले बैठें हो तो भी जातक को राजयोग के समान ही फल मिलता है। किन्तु यह आडम्बरी होता है।

विद्युत योग :-

लाभेश परमोच्च होकर शुक्र के साथ हो या लग्नेश केन्द्र में हो तो विधुत योग होता है। इसमें जातक का भाग्योदय विधुतगति से अर्थात अति द्रुतगामी होता है।

नागयोग :-

पंचमेश नवमस्थ हो तथा एकादशेश चन्द्र के साथ धनभाव में हो तो नागयोग होता है। यह योग जातक को धनवान तथा भाग्यवान बनाता है।

नदी योग :-

पंचम तथा एकादश भाव पापग्रह युक्त हों किन्तु द्वितीय व अष्टम भाव पापग्रह से मुक्त हों तो नदी योग बनता है, जो जातक का उच्च पदाधिकारी बनाता है।

विश्वविख्यात योग :-

लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, दशम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक विश्व में विख्यात होता है। इसे विश्वविख्याति योग कहते है।

अधेन्द्र योग :-

लग्नकुंडली में सभी ग्रह यदि पांच से ग्यारह भाव के बीच ही हों तो अधेन्द्र योग होता है। ऐसी जातक सर्वप्रिय, सुन्दर देहवाला व समाज में प्रधान होता है।

दरिद्र योग :-

केन्द्र के चारों भाव खाली हों अथवा सूर्य द्वितीय भाव में तथा द्वितियेश शनि वक्री हों और 2, 8, 6, 12 या 3 भाव में हों तो लाख प्रयास करने पर भी जातक दरिद्र ही रहता है।

बालारिष्ट योग :-

चन्द्रमा 5, 7, 8, 12 भाव में हो तथा लग्न पापग्रहों से युत हो तो बालारिष्ट योग बनता है। अथवा चन्द्रमा 12वें भाव में क्षीण हो तथा लग्न व अष्टम में पापग्रह हों, केन्द्र में भी कोर्इ शुभ ग्रह न हो तो भी बालारिष्ट योग बनता है। बालारिष्ट योग में जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है। अथवा बाल्यवस्था में उसे मृत्यु तुल्य कष्ट झेलना पड़ता है।

मृतवत्सा योग :-

पंचमेश षष्ठ भाव में गुरू व सूर्य से युक्त हो तो जातक की पत्नी का गर्भ गिरता रहता है। अथवा मृत संतान पैदा होती है। अत: इसे मृतवत्सा योग कहते है।

छत्रभंग योग :-

राहू, शनि व सूर्य में से कोर्इ भी दो ग्रह यदि दशम भाव पर निज प्रभाव ड़ालते है। और दशमेश सबल न हो तो छत्रंभग योग बनता है। जातक यदि राजा है तो राज्य से पृथक हो जाता है। अन्यथा कार्यक्षेत्र व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयां व विघ्न आते है, तरक्की नही हो पाती।

चाण्डाल योग :-

क्रूर व सौम्य ग्रह एक ही भाव में साथ हों तो चाण्डाल योग बनता है। विशेषकर गुरू-मंगल, गुरू-शनि, या गुरू-राहू साथ हों तो। इससे योग के बुरे फल मिलते है। तथा जातक की संगति व सोच दूषित हो जाते है।

सुनफा योग :-

कुंडली में चन्द्रमा जहां हो उससे अगले भाव में (सूर्य को छोड़कर) यदि कोर्इ भी ग्रह बैठा हो तो सुनफा योग बनता है। इससे जातक का लाभ बढ़ता है। (यदि आगे बैठने वाला ग्रह सौम्य या चन्द्रमा का मित्र है तो शुभ लाभ व फल बढ़ते है। अन्यथा कुछ अपेक्षाकृत कमी आ जाती है)।

महाभाग योग :-

यदि जातक दिन में जन्मा है। (प्रात: से साय: तक) तथा लग्न, सूर्य व चन्द्र विषम राशि में है। तो महाभाग योग बनता है। यदि रात में जन्मा है। (साय: के बाद प्रात: से पूर्व) तथा लग्न, सूर्य व चंद्र समराशि में है। तो भी महाभाग योग बनता है। यह सौभाग्य को बढ़ाता है।

प्रेम विवाह योग :-

तृतीय, पंचम व सप्तम भाव व उनके भावेषों का परस्पर दृष्टि युति राशि से संबध हो जाए तो जातकों (स्त्री-पुरूष) में प्रेम हो जाता है। लेकिन यदि गुरू भी इन संबधो में शामिल हो जाए तो उनका प्रेम ‘प्रेम विवाह’ में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन तृतीय भाव व तृतीयेश न हो, केवल पंचम, सप्तम भाव व भावेश का ही दृष्टि, युति, राशि संबंध हों और गुरू भी साथ हो तो जातक प्रेम तो करता है, लेकिन जिससे प्रेम करता हेै। उससे विवाह नही करता। भले ही जातक स्त्री हो या पुरूष।

गजकेसरी योग :-

लग्न या चन्द्र से गुरू केन्द्र में हो तथा केवल शुभग्रहों से दृष्टयुत हो, अस्त, नीच व शत्रु राशि में न हो तो गजकेसरी योग होता है। जो जातक को अच्छी पहचान प्रतिष्ठा दिलाता है।

बुधादित्य योग :-

10वें भाव में बुध व सूर्य का योग हो। पर बुध अस्त न हो तथा सूर्य मित्र या उच्च का हो तो व्यापार में सफलता दिलाने वाला यह योग बुधादित्य योग के नाम से जाना जाता है।

पापकर्तरी योग :-

शुभ ग्रह जिस भाव में हो उसके पहले व बाद के भाव में क्रूरपापग्रह हों तो पापकर्तरी योग बनता है। इससे बीच के भाव में बैठा हुआ ग्रह पाप प्रभाव तथा दबाव में आकर पीड़ित होता है। अत: शुभ फल कम दे पाता है, उसी भाव में शुभ ग्रह दो पापग्रहों या दो से अधिक पापग्रहों के साथ बैठे तो पापमध्य योग बनता है।

सरकारी नौकरी/व्यवसाय का योग :-

जन्मकुंडली में बाएं हाथ पर ग्रहों की संख्या अधिक हो तो जातक नौकरी करता है। दाएं हाथ पर अधिक हों तो व्यापार करता है। सूर्य दाएं हाथ पर हों तो सरकारी नौकरी कराता है। शनि बाएं हाथ पर हो तो नौकरी कराता है। 10 वें घर से शनि व सूर्य का सम्बन्ध हो जाए (दृष्टियुतिराशि से) तो जातक प्राय: सरकारी नौकरी करता है। गुरू व बुध बैंक की नौकरी कराते है। बुध व्यापार भी कराते है। गुरू सुनार का अध्यापन कार्य भी कराता है।

विजातीय विवाह योग :-

राहू 7वें भाव में हो तो जातक का विवाह प्राय: विजातीय विवाह होता है। (पुरूष राशि में हो तो और भी प्रबल सम्भावनाएं होती है।

चक्रयोग :-

यदि किसी कुंडली में एक राशि से छ: राशि के बीच सभी ग्रह हों तो चक्रयोग होता है। यह जातक को मंत्री पद प्राप्त करने वाला होता है।

अनफा योग :-

यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा से पिछले भाव में कोर्इ शुभ ग्रह हों तो अनफा योग बनता है। इससे चुनाव में सफलता तथा अपने भुजाबल से यश, धन प्राप्त होता है।

भास्कर योग :-

सूर्य से दूसरे भाव में बुध, बुध से 11वें भाव में चन्द्र और चन्द्र से त्रिकोण में गुरू हो तो भास्कर योग होता है। ऐसा जातक प्रखरबुद्वि, धन, यश, रूप, पराक्रम, शास्त्र ज्ञान, गणित व गंधर्व विधा का जानकार होता है।

चक्रवती योग :-

यदि कुंडली के नीच /पाप ग्रह की राशि का स्वामी या उसकी उच्च राशि का स्वामी लग्न में हो या चन्द्रमा से केन्द्र (1,4,7,10) में हो तो जातक चक्रवती सम्राट या बड़ी धार्मिक गुरूनेता होता है।

कुबेर योग :-

गुरू, चन्द्र, सूर्य पंचमस्थ, तृतीयस्थ व नवमस्थ हो और बलवान स्थिति में भी हो तो जातक कुबेर के समान धनी व वैभवयुक्त होता है।

अविवाहित/विवाह प्रतिबंधक योग :-

चन्द्र पंचमस्थ हो या बलहीन अस्त पाप पीडित हो तथा 7वें व 12वें भाव में पापग्रह हो तो जातक कुंआरा ही रहता है। शुक्र व बुुध 7वें भाव में शुभग्रहों से दृष्ट न हों तो जातक कुंआरा रहता है। अथवा राहू व चन्द्र द्वादशस्थ हों तथा शनि व मंगल से दृष्ट हों तो जातक आजीवन कुंआरा रहता है। इसी प्रकार सप्तमेष त्रिकस्थान में हो और 6, 8, 12 के स्वामियों में से कोर्इ सप्तम भाव में हो तब भी जातक कुंआरा रहता है। शनि व मंगल, शुक्र व चन्द्र से 180° पर कुंडली में हो तो भी जातक कुंआरा रहता है।

पतिव्रता योग :-

यदि गुरू व शुक्र, सूर्य या मंगल के नवमांश में हो तो जातक एक पत्नीव्रत तथा महिला जातक पतिव्रता होती है। यदि द्वितीयेश व सप्तमेश नीच राशि में हो परन्तु सभी शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हो तो स्त्री जातक पतिव्रता तथा जातक एक पत्नीव्रत वाला होता है। बुध यदि गुरू के नवमांश में हों तो भी पतिव्रता योग होता है चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हो (महिला कुंडली) पाप प्रभाव में न हो तों भी स्त्री पति के लिए कुछ भी कर सकने वाली होती है।

अरिष्ट योग :-

शुक्लपक्ष की रात्रि का जन्म हो और छठे या 8वें भाव में चन्द्र हो तो सर्वारिष्ट नाशक योग होता है। जन्म राशि का स्वामी 1, 4, 7, 10 में स्थित हों तो भी अरिश्टनाशक योग होता है। चन्द्रमा, स्वराशि, उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो सर्वारिष्ट नष्ट होते है। चन्द्रमा के 10वें भाग में गुरू, 12वें में बुध, शुक्र व कुंडली के 12वें में पापग्रह हों तो भी अरिष्ट नष्ट होते है।

मूक योग :-

गुरू व षष्ठेश लग्न में हो अथवा बुध व षष्ठेश की युति किसी भी भाव (विशेषकर दूसरे) में हो। अथवा क्रूर ग्रह सनिध में और चन्द्रमा पापग्रहों से युक्त हो। या कर्क, वृश्चिक व मीन राशि के बुध को अमावस्य का चन्द्र सम्बन्ध है। तो मूक योग बनता है। इस योग में जातक गूंगा होता है।

विशेष योग :-

8 व 12 राशि पापग्रहों से युक्त हो तथा किसी भी राशि के अंतिम अंशो में वृष राशि का चन्द्र हो तथा चंद्र पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो जातक जीवन भर गूंगा रहता है।

बधिर योग :-

शनि से चौथे स्थान में बुध हो तथा षष्ठेश त्रिक भावों में हो तो बधिर योग होता है। अथवा पूर्ण चन्द्र व शुक्र साथ बैठे हो तो बधिर योग बनता है। 12वें भाव में बुध-शुक्र की युति हो अथवा 3, 5, 9, 11 भावों में पापग्रह बिना शुभ ग्रहों से दृष्ट हों अथवा 6,12 भाव में बैठे षष्ठेश पर शनि की दृष्टि न हो तो भी बधिर योग होता है।

पितृ-दोष

Dr.R.B.Dhawan

पितृ-दोष होता क्या है? –

हमारे ही पूर्वज सूक्ष्म लोक से अपने सूक्ष्म शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं, और महसूस करते हैं कि, हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति कोई श्रद्धा रखते हैं, और न ही इन्हें हमसे कोई प्यार या स्नेह है, और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं, ना ही अपने पूर्वजों के ऋण चुकाने का प्रयास करते हैं, तो ये आत्माएं दु:खी होकर अपने ही वंशजों को श्राप दे देती हैं, जिसे ‘पितृ-दोष’ कहा जाता है।

पितृ-दोष एक ऐसी बाधा है जो अदृश्य रहकर भी बहुत कष्ट देती है। ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण उत्पन्न होती है । पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं, जैसे :- आपके आचरण से, किसी परिजन द्वारा जानबूझ कर की गयी गलती से, श्राद्ध आदि कर्म ना करने से, अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण ऐसा हो सकता है।

पितृ-दोष के दुष्प्रभाव :-  मानसिक पीड़ा (टेंशन) अवसाद, व्यापार में हानि, परिश्रम के अनुसार फल न मिलना, वैवाहिक जीवन में समस्याएं, कैरिअर में समस्याएं, या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है। पितृ-दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति, गोचर, दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते, कितना भी पूजा पाठ, देवी, देवताओं की अर्चना की जाए, उसका शुभ फल नहीं मिल पाता।

पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है:-

1. अधोगति वाले पितरों के कारण।

2. उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण।

अधोगति वाले पितर :- इनके दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, और अतृप्त इच्छाएं, जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत उपभोग होने पर, विवाहादि में परिजनों द्वारा गलत निर्णय लिए जाने पर, परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं, ऐसे में पितर परिवार जनों को श्राप दे देते हैं, और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।

उर्ध्व गति वाले पितर :- सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।

इनके द्वारा उत्पन्न श्राप (पितृदोष) से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बाधित हो जाती है, फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जायें, कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जायें, उनका कोई भी कार्य पितृदोष के कारण सफल नहीं होता। पितृ-दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि, किस कोनसा ग्रह पितृदोष की सूचना दे रहा है? और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?

जन्म पत्रिका और पितृ-दोष :- जन्म पत्रिका में लग्न, पंचम, अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ-दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि, और राहू-केतु की स्थितियों से विचार किया जाता है।

इनमें से भी गुरु, शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ-दोष में महत्वपूर्ण होती है, इनमें सूर्य से पिता या पितामह, चन्द्रमा से माता या मातामह, मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।

अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु, शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है, इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ-साथ व्यक्ति यदि अपनी  कुंडली के अनुसार रुद्राक्ष भी धारण कर ले, तो पितृ-दोष का शीघ्र निवारण हो जाता है।

पितृ-दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है।

हर मनुष्य पर मुख्य रूप से 5 ऋण होते हैं, जिनका कर्म न करने (फर्ज पूरा नहीं करने पर) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है, ये ऋण (फर्ज) हैं :-  1. मातृ-ऋण, 2. पितृ-ऋण, 3. मनुष्य-ऋण, 4. देव-ऋण और 5. ऋषि-ऋण।

माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमें, मामी, नाना, नानी, मौसा, मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं, क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है, अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है, अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है, तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है।

पिता पक्ष के लोग जैसे बाबा, ताऊ, चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है, पिता हमें आकाश की तरह छत्र-छाया देता है, हमारा जिंदगी भर पालन-पोषण करता है, और अंतिम समय तक हमारे सारे दु:खों को खुद झेलता रहता है। पर आज के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ? पितृ-भक्ति करना मनुष्य का धर्म है, इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को ही झेलना पड़ता है, इससे घर में आर्थिक अभाव, दरिद्रता, संतान हीनता,ब संतान को विबिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि। माता-पिता प्रथम देवता हैं, जिसके कारण भगवान गणेश महान बने। इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी, दुर्गा माँ, भगवान विष्णु आदि आते हैं, जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है, हमारे पूर्वज भी अपने-अपने कुल देवताओं को मानते थे, लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है, इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं। जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए, वंश वृद्धि की, उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है, उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य संपन्न नहीं होते हैं, इसलिए उनका श्राप पीडी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है।

ऐसे परिवार को पितृ-दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है ।रामायण में श्रवण कुमार के माता-पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा, ये जग-ज़ाहिर है इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ-दोषों का निवारण करना बहुत आवश्यक है।

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शकुन शास्त्र Shakun Apshakun

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शकुन शास्त्र और Shakun Apshakun शकुन अपशकुन

शकुन शास्त्र को अंधविश्वास की श्रेणी में रखा जाये अथवा भविष्य बताने वाली एक विद्या के रूप में माना जाये? वस्तुतः यह विद्या (Shakun Apshakun) भी ज्योतिष की तरह ही वैज्ञानिक (Scientific) विद्या है। अष्टांग ज्योतिष का एक भाग होने के अतिरिक्त ज्योतिष की तरह इसका भी एक आधार है, इसका मूल आधार प्रकृति विज्ञान है।

जो घटना घट रही है, उसके प्रारम्भ की स्थूल प्रक्रिया भले ही हमारे सामने आज प्रारम्भ हो रही है। किन्तु प्राकृतिक वातावरण में उसके प्रारम्भ की सूक्ष्म प्रक्रिया बहुत पहले प्रारम्भ हो चुकी होती है। उस सूक्ष्म प्रक्रिया का प्रभाव प्रकृति के वातावरण में रहने वाले प्राणियों द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है, या पहचान लिया जाता है।

वे अपनी अंग चेष्टाओं से उस प्रभाव की अभिव्यक्ति प्रकट करते हैं। प्राचीन महर्षियों ने प्रकृति की सूक्ष्म प्रक्रिया से प्रभावित प्राणियों की उन अंग-चेष्टाओं को अभिव्यक्त प्राणियों को सूक्ष्म दृष्टि से देखा, पहचाना और फिर परीक्षण भी किया हैं। प्राचीन महर्षियों ने सूक्ष्म प्रक्रिया से प्रभावित प्राणियों की उनकी चेष्टाओं का सूक्ष्म अध्ययन कर जो फलादेशों का संग्रह किया, वह कदापि अवैज्ञानिक नहीं हो सकता।

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‘शकुन, पक्षी का पर्यायवाची है। शकुन शास्त्र (Shakun Apshakun) का सर्व प्रथम संकलन जिस समय हुआ होगा, उस समय केवल शकुन अर्थात् पक्षियों के दर्शन तथा शब्द श्रवण के आधार पर ही शुभाशुभ के निर्णय संकलित किये गये होंगे। क्योंकि प्राकृतिक वातावरण में पले पौधे, पक्षियों पर सूक्ष्म प्राकृतिक परिवर्तनों का प्रभाव शीघ्रतिशीघ्र पड़ता है। वे अत्यधिक संवेदनशील होते हैं।

आहार अन्वेषण की कठिनाई तथा शीत और तुफानी मौसम से बचने के लिये उत्तरी गोलार्द्ध के लाखों पक्षी हजारो मील की यात्रा करके दक्षिण गोलार्द्ध के गर्म देशों में पहुंच जाते हैं। खंजन पक्षी भी भारत में केवल शीत काल में ही रहता है। चिड़ियों का रज-स्नान वर्षा का सूचक होता है। सारस और चक्रवाक गीष्म के प्रारंभ में उत्तरी प्रदेशों में चले जाते हैं।

ज्यों-ज्यों इस निमित्त (Shakun Apshakun) शास्त्र की ओर सर्व साधारण की रूचि जागृत हुई त्यों-त्यों शुभाशुभ सूचक शकुनों के साथ पशुओं की चेष्टाओं तथा शब्दों की शुभाशुभता का संकलन भी होता चला गया।

इस प्रकार उत्तरोत्तर संकलनों में बादल, वायु, विद्युत, उल्कापात, गान्धर्वनगर, ग्रहण आदि आन्तरिक्ष; अंगस्फुरण, पल्लीपतन, छींक विचार आदि कायिक और श्रृगाल, श्वान, सिंह, मार्जार आदि श्वापद; हाथी, ऊँट, वृषभ, गाय, भैंस आदि चतुष्पद; सर्प, नकुल, मूषक आदि सरिसृप; भुजगादि सरिसृप जन्तुओं की चेष्टाओं तथा शब्दों का शुभाशुभ भी जोड़ दिया गया होगा।

शकुन विद्या (Shakun Apshakun) विशारदों का यह अनुभव है कि, शुभाशुभ कार्यों के विपाक से प्रतिक्षण प्रत्येक मानव जो शुभाशुभ फल भोगते हैं, वे शकुन द्वारा पहले जाने जा सकते हैं।

तत् पश्चात् धार्मिक अनुष्ठानों से अशुभ का प्रतिकार और शुभ का परिश्कार कर सुख सम्पत्ति से समृद्ध हो सकते हैं। विपत्ति से बचने की और सम्पत्ति प्राप्त करने की कामना सांसारिक जीवों को सर्वदा रही है। सभी प्राणी सुख के इच्छुक देखे गये हैं, किन्तु किसी को दुःख का इच्छुक कभी नहीं देखा गया।

इसलिये शकुन विद्या (Shakun Apshakun) का अतीत में जितना महत्व था, वर्तमान में भी इसका इतना ही महत्व हैं। शकुन विद्या आज भी प्रकाश स्तम्भ बनी हुई है। आधुनिक जीवन में भी यदि इसका उपयोग किया जाये तो सुख-दुःख का ज्ञान अविलम्ब एवं स्पष्ट हो सकता है।

पक्षियों की पहचान और उनकी ध्वनियों का विज्ञान कुशाग्र बुद्धि के अतिरिक्त कौन प्राप्त कर सकता है? अंग चेष्टाओं का विश्लेषण करके शुभाशुभ भविष्य का क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त करने की यदि इच्छा हो तो, मनुष्य को इस विद्या का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त हो सकता है।

शकुन विद्या का प्रचार-प्रसार शिक्षित वर्ण की अपेक्षा अशिक्षित लोगों में अधिक पाया जाता है। जंगलों में रहने वाले भील मेना, कंजर, वागरी, नायक, बावरी, सांसी आदि अनेक लोग इस शकुन विद्या के जानकार होते हैं। यह ज्ञान उन्हें अपने पूर्वजों की परम्परा से प्राप्त होता रहा है। अनपढ़ होने के कारण अपने ज्ञान को लिपिबद्ध करने में वे अब तक भी असमर्थ रहे हैं। इसलिये यह ज्ञान शनैः क्षीण होता जा रहा है।

शिक्षित वर्ग से यह ज्ञान अशिक्षित वर्ग में कैसे पहुंचेगा? यह प्रश्न है। इसका समाधान यह है कि जिस प्रकार इस विद्या (Shakun Apshakun Shastra) के महान् आचार्यों का निवास अतीत में प्रायः तपोवनों में था। वहां वनवासी जातियों के बाल, वृद्ध, युवा, स्त्री पुरूषों को उन महान् पुरूषों की सेवा व सत्संग का लाभ मिलता रहता था।

पक्षियों की ध्वनियों का श्रवण व उनका विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करना वनवासियों के लिये जितना सरल व सुगम हो सकता है, उतना ग्राम व नगर में भी। जिन का शकुन ज्ञान महान् चमत्कार पूर्ण है, वे अशुभ शकुन देख कर भावी विगत्तियों से सावधान हो जाते हैं, और सुरक्षा के लिये हर संभव प्रयत्न करके सफलता प्राप्त कर लेते हैं, और शुभ शकुन देखकर अपने इष्ट कार्य में सफलता प्राप्त कर लेते हैं, तथा वे जीवन सुखमय बनाने में संलग्न रहते हैं।

शकुनों (Shakun Apshakun) की वैज्ञानिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण भूकंप उत्पात के सम्बंध में उद्धृत ये पंक्तियां हैं- प्रतिवर्ष विश्व के किसी न किसी कोने में भीषण उत्पात की संभावना रहती है। अभी तक न कोई ऐसा यंत्र आविष्कृत हुआ है, और न ही किसी ऐसी विधि का पता चला है कि भूकम्प की पूर्व सूचना दे सके।

अनेक भूकम्पीय घटनाओं से एक मनोरंजक बात का पता लगा है कि पशुओं को इन दैवी आपत्तियों की पूर्व सूचना मिल जाती है, तथा वे सबको सावधान करने का प्रयत्न करते हैं। समुद्र का पानी भयंकर गति से जब चढ़ता है तो, उसके एक दिन पहले सीगाल नामक पक्षी सुरक्षित स्थल पर चले जाते हैं।

तथा अनेक मामलों में देखा गया कि भयंकर भूकम्प के समय कुत्ते भौंकते हुये, बिल्लियां और गायें इतनी जोर से चिल्लाये कि सारा नगर जाग गया, तथा उसके कुछ क्षणों बाद भूचाल आया, इस लिये शकुन विद्या को अवैज्ञानिक या अविश्वस्त मानना या कहना कोई बुद्धिमत्ता नहीं हैं।

जिस प्रकार गणित की सूक्ष्म प्रक्रिया में सामान्य भूल होने पर आधुनिक यंत्रों का निर्माण एवं उनकी कार्य प्रणाली यथेष्ट नहीं हो पाती है, उसी प्रकार शुभाशुभ शकुनों (Shakun Apshakun) के फलादेशों में कभी-कभी जो वैपरीत्य दिखाई देता है, उसका एकमात्र कारण यह है कि हमारा निमित्त ज्ञान परिपूर्ण नहीं है।

अतः दृष्ट तथा श्रृत शुभाशुभ शकुनों (Shakun Apshakun) के अनुसन्धानों में रही हुई त्रुटियों का हमें बोध नहीं हो पाता। इसलिये फलादेश हमें विपरीत मालुम देता है। यह सत्य है, किन्तु हम अपने अज्ञान का दोष विद्या पर मढ़ कर उस विद्या को अवैज्ञानिक या अस्तित्वहीन कहें यह अनुचित है। श्रीमद्भागवत का शकुनशास्त्र से विशेष परिचय जान पड़ता है।

उसमें उत्पातों के तीन भेद बतलाए गये है। वे भेद दिव्य, भौम तथा आन्तरिक्ष उत्पात के रूप में हैं। ये अपने-अपने क्षेत्र में घटित होने के कारण इन नामों से अभिहित किये गये है। (श्री. भा. 3. 17. 3; 11. 30. 4) एक अन्य स्थल में उत्पातों के तीन भेदों में अन्तरिक्ष के स्थान पर दैहिक की गणना की गई है (श्री. भा. 1. 14. 10)।

अर्जुन के द्धारका से नहीं लौटने पर युधिष्ठिर ने घोर रूप वाले विविध अपशकुनों को देखा। काल की गति रौद्र हो गयी थी। प्रकृति में ऋतु के विपरीत लक्षण दीखने लगे थे। अतिशय भय कारक निमित्तों को देख कर युधिष्ठर को मनुष्यों के प्रलयकाल की आशंका होने लगी थी (श्री. भा. 1. 14. 2-5) । उन्होंने भीम को उन दिव्य, भौम और दैहिक उत्पातों की ओर संकेत किया। बुद्धि को मोहित करने वाले उत्पातों को देखकर आने वाले अनर्थ को वे जान गये थे।

उनकी जंघा, आँखे एवं बाहु बार-बार फड़कने लगे। हृदय में कम्पन होने लगा। अग्नि के समान लाल मुख वाली शिवा (मियारनी) उगते हुये सूर्य की और मुख करके रोने लगी। कुत्ते निडर होकर उनकी ओर मुख करके रो रहे थे। अच्छे पशु बाँयी ओर से तथा बुरे पशु दहिनी ओर से गुजरने लगे। वाहन के पशु हाथी घोडे आदि रोने लगे।

मृत्युदूत पेडुखी, उल्लू और कौये रात को कठोर शब्द करने लगे। दिशाएं धुंधली हो गयी थी। सूर्य और चन्द्र की चारों और बार-बार परिवेष मण्डल लगने लगे थे। पृथ्वी एवं पर्वतों में कम्पन होने लगे। बादल जोर-जोर से गरजने लगे। यत्र-तत्र विजली गिरने लगी। शरीर को छेदने वाली तथा धूल से अन्धकार फैलाने वाली आंधी चलने लगी।

बादलों में भयानक दृश्य बनने लगे, और उनसे शोणित की वर्षा होने लगी। आकाश में ग्रह-युद्ध होने लगे। दिशाओं में दाह होने लगे। नदी, नद, तालाब और लोगों के मन क्षुब्ध हो गये। घी से भी आग नहीं जलती थी। बछड़ों ने दूध पीना छोड दिया। गौयें दूहने नहीं देती थीं।

गोशाला में गौंयें रो रही थीं। बैल सब उदास थे। देवताओं की मूर्तियाँ रोने लगी थीं। उनसे पसीना चूने लगा था। उनमें कम्पन भी होने लगा। देश, गाँव, शहर, बगीचे, धर्मशालायें और आश्रम शोभाहीन और आनन्दरहित लगने लगे (श्री. भा. 1. 14. 10-21)।

इसी प्रकार हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के जन्म के समय विविध उत्पातों (Shakun Apshakun) के घटित होने का उल्लेख भी है। इस समय तीनों प्रकार के उत्पात हुये। पृथ्वी एवं पर्वत में कम्पन, उल्कापात वज्रपात और धूमकेतु के उदय होने लग गये। भयानक शब्द के साथ वृक्षों को उखाड़ने वाली विकट एवं असह्म आंधी आयी।

धूलों से सम्पूर्ण पृथ्वी एवं आकाश व्याप्त हो गये। बिजली की चमक भयानक हो गयी थी। मेघों की सधन घटाओं से सूर्य-चन्द्र लुप्त हो गये और अंधकार छा गया। समुद्र मे दुःखी मनुष्य की तरह कोलाहल होने लगा। उसमें ऊंची तरंगें उडने लगीं। समुद्री जीवों में हलचल मच गयी। नदियों तथा तालाबों मे भी खलबली मच गयी।

अनेक कमल सूख गये। सूर्य चन्द्र के बारबार ग्रहण होने गले। उनके आमंगल सूचक परिवेष भी लगने लगे। बिना बादलों के गर्जना सुनायी देने लगी। गुफाओं में रथ की आवाज-सी सुनाई देने लगी। गांवों में गीदड़ और उल्लुओं के भयानक शब्द के साथ गीदड़नियां मुख से आग उगल कर अमगंल शब्द करने लगीं।

कुत्ते गरदन ऊपर उठाकर कभी गाने तथा कभी रोने का शब्द करने लगे। झुण्ड के झुण्ड गधे पृथ्वी खोदते और कठोर शब्दों के साथ रेंगते हुये इधर-उधर दौडने गले। पक्षीगण गधों के शब्द से डर कर घोसलों को छोडकर रोने-चिल्लाने लगे। बंधे और बन में चरते पशु डर कर मलमूत्र त्यागने लगे।

गौयें ऐसी डर गयीं कि दूहने पर उनके थन से खून निकलने लगा। बादलों से पीब की वर्षा होने लगी। देवमूर्तियाँ रोने लगीं। तथा बिना वायु के ही वृक्ष हिलने लगे। शनि, राहु आदि क्रूर ग्रह प्रबल होकर चन्द्र बृहस्पति आदि सौम्य ग्रहों तथा अनेक नक्षत्रों का अतिक्रमण कर वक्रगति हो गये। ग्रहों के युद्ध होने लगें। इन उत्पातों को देखकर सनक आदि ऋषियों को छोडकर शेष सभी जीव भयभीत हो गये (श्री. भा. 3. 17. 3-15)।

हिरण्यकशिपु की तपस्या के समय भी ऐसे ही उत्पात हुए थे। ग्रह और तारे टूट-टूट कर गिरने लगे थे। तथा दिग्दाह होने लगे थे। (श्री. भा. 7. 3. 5) इस प्रकार श्रीमद्भागवत में दित्य, भौम, एवं आन्तरिक्ष एवं दैहिक उत्पातों का विशद वर्णन मिलता है।

कंस की मृत्यु निकट आने पर उसने जो अशुभ निमित्त देखे उनका विशद वर्णन भी श्री मदूभागवत में प्राप्त होता है- जाग्रित अवस्था में कंस को जल या दर्पण में छापा पड़ने पर भी शिर नहीं दीखता था। चन्द्र तारे, सूर्य एवं दीप दो-दो दिखाई पड़ते थे। अपनी छाया में छेद दीखता था।

कानों में अंगुली डालकर सुनने पर प्राणों का धूं-धूं शब्द नहीं सुनाई पड़ता था। वृक्ष सुनहरे प्रतीत होते थे। घूल आदि में चलने पर अपने पैरों के चिह्न नहीं दीखते थे। वह स्वप्न में प्रेतों से लिपटता था। गधे की सवारी करता था। विष का भक्षण करता था। अड़हुल की माला पहनता था। तेल की मालिश करता था और नंगे शरीर होकर यात्रा करता था। इन अपशकुनों (Shakun Apshakun) को देख कर कंस अपनी निकट मृत्यु के आभास से भयभीत हो गया था। (श्री. भा. 10. 42. 28-30)।