शनिश्चरी अमावस्या

शनिश्चरी अमावस्या जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं-

  1. ग्रह दोष
  2. पितृदोष
  3. सहभागी कृत दोष

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष- आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

शनैश्चरी अमावस्या-

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री- इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य है, उन सभी के नाप की ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ प्राप्त कर लेनी चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित की गई हो। यह मुद्रिका ऐसी होनी चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

 

 

Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

janmashtami 2016

Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

आज जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के शुभअवसर पर आपके लिए प्रस्तुत है यह लेख।  सनातन दर्शन का यह मूलभूत सिद्धांत है कि जिस सत्चित् आनंद के आश्रय से यह दृश्यमान जगत अथवा यह धरातल संचालित हो रहा है, उसी के सहारे नियमित रूप से प्राणियों की आवश्यकता और रक्षा की व्यवस्था भी हो रही है।

भक्तों की धारणा है कि जब-जब विश्व व्यवस्था में अतिक्रमण होता है, तब-तब निराकार ईश्वर का एक अंश मूर्त साकार रूप ग्रहण करके व्यवस्था की पुनः स्थापना करने के लिये अवतीर्ण होता है, विश्व-व्यवस्था कि सुस्थिति, विश्वमंगल के लिये आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। इसलिये पूर्णब्रह्म परमेश्वर अवतार धारण कर अव्यवस्था जन्य भूमिभार का हरण करते हैं।

शास्त्रों ने ऐसे चैबीस अवतारों में श्रीराम और श्रीकृष्ण के अवतारों को विशेष महत्व दिया है। श्रीराम सोइ सच्चिदानंदघन रामा हैं और श्री कृष्ण भागवताकार के शब्दों में कृष्णस्तु भगवान स्वयम् हैं।

दोनों ने तत्कालीन अव्यवस्था एवं धर्मग्लानि को दूर करने के लिये अलौकिक शक्ति, अद्भुद् सौंदर्य और मर्यादा क्षमाशील विधान का आदर्श रूप उपस्थित कर विश्व व्यवस्था को सुचारूता दी। दोनों ने रावण, कंस आदि नृशंस राजाओं की उच्छृंखलता को परास्त कर साधु संरक्षण और लोक मंगल की विधायिनी व्यवस्था को संस्थापित किया।

यही कारण है कि इनकी अवतरण तिथियों को मनाये जाने वाले हमारे व्रत, उत्सव आदि में इनका प्रभाव अक्षुण्ण है और हम इनके आदर्श को समझने एवं व्यवहार में लाने के लिये इनकी जन्म जयंतियाँ प्रतिवर्ष व्रत के रूप में मनाते हैं। तथा लौकिक व परलौकिक लाभ उठाते हैं।

उसी परंपरा में हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रª के ये दो महान पर्व हैं- श्रीराम नवमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016)। श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण का आर्विभाव इसी तिथि को बुधवार के दिन रोहिणी नक्षत्र में अर्द्धरात्रि के समय हुआ था।

शास्त्रों में अष्टमी व्रत के दो भेद किये गये हैं- शुद्धा और विद्धा। सूर्योदय से सूर्योदय तक व्याप्त अष्टमी शुद्धा और सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच सप्तमी अथवा नवमी से युक्त होने पर विद्धा कही जाती है। फिर इनके तीन भेद किये जाते हैं:- समा, न्यूना और अधिका। इन भेदों के कारण अष्टमी अट्ठारह प्रकार की ही हो जाती है।

परंतु मान्यता की दृष्टि से तत्काल (अर्धरात्रि-व्यापिनी) अष्टमी ही ग्राह्य मानी गई है। ऐसी अष्टमी (Janmashtami) दो दिनों तक अथवा दोनों ही दिन न हो तो नवमी विद्धा ही ग्रहण करनी चाहिये।

इस वर्ष जन्माष्टमी का यह पर्व 25 अगस्त 2016 के दिन मनाया जाना शास्त्र सम्मत है, इस दिन सूर्याेदय के समय कृतिका नक्षत्र उदय होगा तदुपरांत दोपहर 12:10 से रोहिणी नक्षत्र आरम्भ होगा।

इस व्रत का महत्व शिव, विष्णु, ब्रह्मा भविष्य आदि पुराणों में तथा धर्मसिंधु, निर्णय-सिंधु आदि निबंध-ग्रंथों में प्रचूरता से वर्णित है। यह सर्वमान्य, पापघ्न तथा बाल, वृद्ध, कुमार, युवा अवस्था वाले नरों व नारियों के लिए अनुष्ठेय है।

कुछ शास्त्रों के अनुसार जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत नहीं करने वाले सक्षम नर-नारियों को पाप लगता है, और करने वालों के पापों की निवृत्ति एवं सुख की अभिवृद्धि होती है। इस व्रत में अष्टमी में उपवास और भगवत्पूजन का तथा नवमी में पारणा करने का विधान है।

अष्टमी (Janmashtami 2016) के एक दिन पहले लघु भोजन करना चाहिये। रात्रि में जितेंद्रिय रहना चाहिये। उपवास के दिन प्रातः स्नानादि नित्यकर्म करके सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि आकाष, आकाषचारी देवता और ब्रह्मा आदि को नमस्कार करके पूर्व या उत्तर मुख बैठें, हाथ में जल, फूल, कुष और गंध लेकर संकल्प करें-
ममाखिलपापप्रषमनपूर्वकं सर्वाभीष्टसिद्धये श्री कृष्णजन्माष्टमीव्रतमहं करिष्ये।

मध्याह्न समय में काले तिल डालकर उस जल से स्नान करके देवकी जी के लिये -सूतिकागृह नियत करें। उसे स्वच्छ व सुषोभित करके उसमें सूतिकोपयोगी सामग्री यथाक्रम रखें। गीतवाद्य का आयोजन करना और अधिक अच्छा होगा।

सूतिका गृह के सुःखद शोभन विभाग में सुंदर सुकोमल बिछौने के सुदृढ़ मंत्र पर अक्षतादि का मंडल बनवाकर उसपर शुभ कलष स्थापित करें एवं उसी पर सोना, चांदी, तांबा, पीतल, मणि, वृक्ष, मिट्टी या चित्ररूप भगवान की मूर्ति स्थापित करें।

मूर्ति में सद्यःप्रसूत श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और श्री लक्ष्मी जी उनके चरणस्पर्ष किये हुए हों- यह भाव प्रकाष्य होना चाहिए। फिर यथा समय भगवान के आर्विभाव की भावना कर वैदिक विधि पुरूष सुक्त से षोडशोपचार पूजन करना चाहिये।

यदि ऐसा करना संभव न हो तो पौराणिक अथवा संप्रदायानुसार दषोपचार या पंचोपचार आदि से पूजन करके आरती उतारनी चाहिये। इस पूजन में देवकी, वसुदेव, नंद, यषोदा और लक्ष्मीजी- इन सबका नाममंत्र से पूजन करना चाहिए।

अंत में निम्नांकित मंत्र से अध्र्य दें-
प्रणमे देवजननीं त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात्तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमोनमः।।
सपुत्राघ्र्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।।

फिर श्रीकृष्ण को पुष्पांजलि दें –
‘धर्माय धर्मेष्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’

इसके बाद जातकर्म-संस्कार, नालच्छेदन, षष्ठी पूजन और नामकरणादि करके चंद्रमा का भी पूजन करें-
‘सोमाय सोमेष्वराय सोमपतये सोमसम्भवाय सोमाय नमो नमः।’

फिर शंख में जल, कुष, कुसुम और गंध डालकर दोनों घुटने भूमि में टेककर प्रार्थना करते हुए अघ्र्य देवें-
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्र समुद्भव। गृहाणाध्र्यं शषांकेमं रोहिण्या सहितो मम।।
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषाम्पते। नमस्ते रोहिणीकान्त अघ्र्यं मे प्रतिगृह्यताम।।

रात्रि के शेष भाग को स्तोत्र-पाठादि अथवा संकीर्तन करते हुए व्यतीत करें। उसके बाद अगले दिन पूर्वार्द्ध में स्नानादिक नित्य क्रिया संपन्न कर जिस नक्षत्र तिथि या योग की प्रमुखता मानकर व्रत किया हो उसके अंत में भगवदर्पण पूर्वक अन्नादिक ग्रहण कर पारणा करें।

अष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत करने से प्रणत क्लेषहारी वृन्दावनबिहारी भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और अपनी भक्त्ति देते हैं। अष्टमी व्र्रत का महत्त्व अत्यधिक है, अतः यह व्रत प्रत्येक को श्रद्धा व निष्ठा पूर्वक करना चाहिये।

आगे की पक्तियों में साधकों के लिये कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर एक इच्छा पूर्ति प्रयोग दिया जा रहा है, आप चाहें तो यह प्रयोग आप भी संपन्न कर सकते हैं, यह विशेष श्रेणी का काम्य प्रयोग है- इतनी बात निश्चित है कि श्री कृष्ण साधना हेतु किया गया कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता।

साधक अपना निर्णय स्वयं लेते हुए श्री कृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के इस महान सिद्ध पर्व पर कोई न कोई साधना कर्म अवश्य संपन्न करें।

इच्छा पूर्ति गोविंद प्रयोग

इस साधना प्रयोग हेतु साधक 25 अगस्त 2016 रात्रि का प्रथम प्रहर बीत जाने के बाद साधना क्रम प्रारंभ करें। अर्द्ध रात्रि के साथ पूर्ण कर मंत्र जप संपन्न करे, इस साधना हेतु- श्री कृष्ण यंत्र तथा एक वैजयन्ती माला का होना आवश्यक हैं। अपने सामने सर्वप्रथम एक बाजोट पीले पुष्प बिछा दें और उन पुष्पों के बीचों बीच श्री कृष्ण यंत्र स्थापित करें, तथा इस यंत्र का पूजन केवल चंदन तथा केसर से ही संपन्न करें।
अपने सामने कृष्ण का एक सुंदर चित्र फ्रेम में मढ़वा कर स्थापित करें। चित्र को भी तिलक करें तथा प्रसाद स्वरूप पंचामृत साथ रख लें, जिसमें घी, दूध, दही, शक्कर तथा गंगाजल मिश्रित हो। इसके अतिरिक्त अन्य नैवेद्य भी अर्पित कर सकते हैं। इच्छा पूर्ति यंत्र के दोनों और दो-दो गोमती चक्र स्थापित करें, तथा उन्हें केसर का तिलक लगायें और दोनों हाथ जोड़ कर भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें, श्री कृष्ण का ध्यान कर उनकी आठ शक्तियाँ लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कांति, कीर्ति, तुष्टि एवं पुष्टि की मानसिक पूजा करें। प्रत्येक शक्ति के लिए निम्न मंत्र का उच्चारण करें-

ऊँ लक्ष्म्यै नमः।
ऊँ सरस्वत्ये नमः।
ऊँ रत्ये नमः।
ऊँ प्रीत्यै नमः।
ऊँ कान्त्ये नमः।
ऊँ कीत्र्ये नमः।
ऊँ तुष्टयै नमः।
ऊँ पुष्टये नमः।

शक्ति पूजन के पश्चात् इच्छापूर्ति मंत्र का जप प्रारंभ किया जाता है, इसकी भी विशेष विधि है, इसमें अपने दोनों हाथों में अक्षत् पुष्प और थोड़ा गंगाजल लें, और इच्छा पूर्ति मंत्र का उच्चारण करते हुए उसे अर्पित कर दें।
इच्छा पूर्ति मन्त्र- ऊँ श्रीं हृीं क्लीं कृष्णायै गोविन्दायै नमः।

इस प्रकार 108 बार इस मंत्र का उच्चारण इसी विधि से संपन्न करें यह प्रयोग पूर्ण हो जाने के बाद पहले से जलाकर रखे हुए दीपक, अगरबत्ती तथा धूप से आरती संपन्न कर प्रसाद ग्रहण करें। यदि कोई साधक 40 दिन तक प्रतिदिन एक माला मंत्र जप संपन्न करे तो उसका इच्छित कार्य अवश्य ही संपन्न हो जाता है।

अक्षय तृतीया – Akshaya Tritiya

अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya)

भारत वर्ष संस्कृति प्रधान देश है, सनातन संस्कृति में व्रत और त्यौहारों का विशेष महत्व है। व्रत और त्यौहार नयी प्रेरणा एवं स्फूर्ति का संवहन करते हैं। इससे मानवीय मूल्यों की वृद्धि बनी रहती है और संस्कृति का निरन्तर परिपोषण तथा संरक्षण होता रहता है। भारतीय मनीषियों ने व्रत-व्रर्तों का आयोजन कर व्यक्ति और समाज को पथ भ्रष्ट होने से बचाया है। भारतीय कालगणना के अनुसार चार स्वयं सिद्ध अभिजित् मुहूर्त हैं- चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडीपडवा), आखतीज (अक्षय तृतीया) दशहरा और दीपावती के पूर्व की प्रदोष-तिथि। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया या आखा तृतीया अथवा आखातीज भी कहते हैं।

‘अक्षय’ का अर्थ है- जिसका कभी नाश (क्षय) न हो, अथवा जो स्थायी रहे।

स्थायी वही रह सकता है जो सर्वदा सत्य है। सत्य केवल परमात्मा (ईश्वर) ही है जो अक्षय, अखण्ड और सर्वव्यापक है। यह अक्षय तृतीया तिथि ईश्वर तिथि है। यह अक्षय तिथि परशुरामजी का जन्मदिन होने के कारण ‘परशुराम-तिथि’ भी कही जाती है। परशुरामजी की गिनती चिरंजीवी महात्माओं में की जाती है। अतः यह तिथि चिरंजीवी तिथि भी कहलाती है। चारों युगों (सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग) में से त्रेतायुग का आरम्भ इसी आखातीज से हुआ है।

क्षयधर्मा वस्तुयें- असöावना, असद्विचार, अहंकार, स्वार्थ, काम, क्रोध तथा लोभ पैदा करती हैं जिन्हें भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता (16।18) में आसुरीवृत्ति कहा है। इससे हम त्याग, परोपकार, मैत्री, करूणा और प्रेम पाकर परम शांति पाते हैं, अर्थात् हमें दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है।
सामाजिक पर्व- आखातीज का दिन सामाजिक पर्व का दिन है। इस दिन कोई दूसरा मुहूर्त न देखकर स्वयंसिद्ध अभिजित् शुभ मुहूर्त के कारण विवाहोत्सव आदि मांगलिक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं।

अक्षय ग्रंथ गीता- गीता स्वयं एक अक्षय, अमरनिधि ग्रन्थ है जिसका पठन-पाठन, मनन एवं स्वाध्याय करके हम जीवन की पूर्णता को पा सकते हैं, जीवन की सार्थकता को समझ सकते हैं और अक्षय तत्व को प्राप्त कर सकते हैं। अक्षय तिथि के समान हमारा संकल्प दृढ़, श्रद्धापूर्ण और हमारी निष्ठा अटूट होनी चाहिये। तभी हमें व्रतोपवासों का समग्र आध्यात्मिक फल प्राप्त हो सकता है।

नवान्न का पर्व है, अक्षयतृतीया-

भारतीय लोक-मानस सदैव से ऋतु-पर्व मनाता रहा है। हर ऋतु के परिवर्तन को मंगल भाव के साथ मनाने के लिये व्रत, पर्व और त्यौहारों की एक श्रंृखला लोकजीवन को निरन्तर आबद्ध किये हुये है। इस श्रंृखला में अक्षय तृतीया का पर्व वसन्त और ग्रीष्म के सन्धि काल का महोत्सव है। वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह व्रत-पर्व लोक में बहुश्रुत और बहुमान्य है। विष्णुधर्म सूत्र, मत्स्यपुराण, नारदीय पुराण तथा भविश्यादि पुराणों में इसका विस्तृत उल्लेख है तथा इस व्रत की कई कथायें भी हैं। सनातन-धर्मी गृहस्थजन इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। अक्षय तृतीया को दिये गये दान और किये गये स्नान, जप, तप, हवन आदि कर्मों का शुभ और अनन्त फल मिलता है-
स्नात्वा हुत्वा च दत्त्वा च जप्त्वानन्तफलं लभेत्।

भविष्य पुराण के अनुसार सभी कर्मों का फल अक्षय हो जाता है, इसलिये इसका नाम ‘अक्षय’ पड़ा है।
यदि यह तृतीया कृत्तिका नक्षत्र से युक्त हो तो विशेष फलदायिनी होती है। भविष्य पुराण यह भी कहता है कि इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, क्योंकि कृतयुग (सत्ययुग) का (कल्पभेद से त्रेतायुग का) प्रारम्भ इसी तिथि से हुआ है। इसमें जल से भरे कलश, पंखे, चरणपादुकायें (खड़ाऊँ), पादत्राण (जूता), छाता, गौ, भूमि, स्वर्णपात्र आदि का दान पुण्यकारी माना गया है। इस दान के पीछे यह लोकविश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जायेगा वे समस्त वस्तुयें स्वर्ग मे गर्मी की ऋतु में प्राप्त होंगी। इस व्रत में घड़ा, कुल्हड़, सकोरा आदि रखकर पूजा की जाती है।

बुन्लेदखण्ड में यह व्रत अक्षय तृतीया से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। कुमारी कन्यायें अपने भाई, पिता, बाबा तथा गाँव-घर के, कुटुम्ब के लोगों को सगुन बाँटती हैं, और गीत गाती हैं, जिसमें एक दिन पीहर न जा पाने की कचोट व्यक्त होती है। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिये शकुन निकाला जाता है, और वर्षा की कामना की जाती है तथा लड़कियाँ झुण्ड बनाकर घर-घर जाकर शकुन गीत गाती हैं। लड़के पतंग उड़ाते हैं। ‘सतनजा’ (सात अन्न) से पूजा की जाती है। मालवा में नये घड़े के ऊपर खरबूजा और आम्रपत्र रखकर पूजा होती है। किसानों के लिये यह नववर्ष के प्रारम्भ का शुभ दिन माना जाता है। इस दिन कृषि कार्य का प्रारम्भ शुभ और समृद्धि देगा, ऐसा विश्वास किया जाता है। इसी दिन बदरिकाश्रम में भगवान् बद्रीनाथ के पट खुलते हैं। इसीलिये इस तिथि को श्रीबद्रीनाथजी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और लक्ष्मीनारायण के दर्शन किये जाते हैं। इस तिथि में गंगास्नान को अति पुण्यकारी माना गया है। मृत पित्तरों का तिल से तर्पण, जल से तर्पण और पिण्डदान भी इस दिन इस विश्वास से किया जाता है कि इसका फल अक्षय होगा।
इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था, इसीलिये इनकी जयन्तियाँ भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती हैं। श्रीपरशुराम जी प्रदोषकाल में प्रकट हुये थे इसलिये यदि द्वितीया को मध्याह्न से पहले तृतीया आ जाये तो उस दिन अक्षय तृतीया, नर- नारायण-जयंती, हयग्रीव जयन्ती सभी सम्पन्न की जाती है। इसे परशुराम तीज भी कहते हैं, अक्षय तृतीया बड़ी पवित्र और सुख-सौभाग्य देने वाली तिथि है।

इसी दिन गौरी की पूजा भी होती है। सधवा स्त्रियाँ और कन्यायें गौरी-पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुये चने बाँटती हैं, गौरी-पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न आदि भरकर दान करती हैं। गौरी-विनायकोपेता के अनुसार गौरी पुत्र गणेश की तिथि चतुर्थी का संयोग यदि तृतीया में होता है, तो वह अधिक शुभ फलदायिनी होती है। इस तिथि को सुख-समृद्धि और सफलता की कामना से व्रतोत्सव के साथ ही अस्त्र-शस्त्र, वस्त्र-आभूषण आदि बनवाये, खरीदे और धारण किये जाते हैं। नयी भूमि का क्रय, भवन, संस्था आदि का प्रवेश इस तिथि को शुभ फलदायी माना जाता है।

अक्षय तृतीया में तृतीया तिथि, सोमवार और रोहिणी नक्षत्र तीनों का सुयोग बहुत श्रेष्ठ माना जाता है। किसानों में यह लोकविश्वास है कि यदि इस तिथि को चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी आगे होगी तो फसल के लिये अच्छा होगा और यदि पीछे होगी तो उपज अच्छी नहीं होगी। इस सम्बंध में भड्डरी की कहावतें भी लोक में प्रचलित हैं –

अखै तीज रोहिणी न होई।
पौष अमावस मूल न जोई।।
राखी श्रवणो हीन बिचारो।
कातिक पूनो कृतिका टारो।।
महि माहीं खल बलहिं प्रकासै।
कहत भड्डरी सालि बिनासै।।

अर्थात् वैशाख की अक्षय तृतीया को यदि रोहिणी न हो, पौस की अमावास्या को मूल न हो, रक्षा बन्धन के दिन श्रवण और कार्तिक की पूर्णिमा को कृतिका न हो, तो पृथ्वी पर दुष्टों का बल बढ़ेगा और उस साल धान की उपज न होगी। इस तिथि पर ईख के रस से बने पदार्थ, दही, चावल, दूध से बने व्यंजन, खरबूज, तरबूज और लड्डू का भोग लगाकर दान करने का भी विधान है।

स्कन्द पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेेख है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान् विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम-मंदिरों में इस तिथि को परशुराम-जयंती बड़ी धूम-धाम से मनायी जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। परशुराम-जयंती होने के कारण इस तिथि में भगवान् परशुराम के आविर्भाव की कथा भी कही-सुनी जाती है।

Do Shri yantra pooja on Akshaya Tritiya
shri yantra pooja akshaya tritiya

युग बदला, आवश्यकतायें बदली और मान्यतायें भी बदल गई, आज मानव जीवन का केन्द्र बिन्दु केवल अर्थ और काम में ही सीमित हो गया है, और शेष दोनों धर्म और मोक्ष भी अर्थ पर ही आधारित हो गये हैं। आज व्यक्ति की सर्वप्रथम आवश्यकता केवल आर्थिक ही है, उसके पास धन का न होना, सुखद जीवन का अंत ही माना जाता है। यह पर्व लक्ष्मी-विष्णु की आराधना का विशेष पर्व है। हमारे शास्त्रों मे भी कहा गया है कि यदि लक्ष्मी जी, विष्णु जी के साथ मनुष्य के घर में स्थायी रूप से निवास करें, तो व्यक्ति के जीवन में किसी भी वस्तु तथा भौतिक सुखों का अभाव हो ही नही सकता। हमारे शास्त्रों में इस लिये इस दिन विशेष रूप से ‘श्री यंत्र’ (shri yantra) जो कि माँ लक्ष्मी जी का आधार एवं मनुष्य को जीवन में हर प्रकार का भौतिक सुख और ऐश्वर्य देने वाला है तथा दरिद्रता को जीवन से दूर करने वाला है, इस श्री यंत्र की घर में स्थापना विधान बतलाया गया है।

स्वयं गुरू गोरखनाथ जी ने भी एक स्थान पर कहा है भले ही अन्य सारे प्रयोग असफल हो जायंे, भले ही साधक नया हो, भले ही उसे स्पष्ट मंत्रो के उच्चारण का ज्ञान न हो, परन्तु अक्षय तृतिया के अवसर पर इनको सफलता अवश्य मिलती है। इस पर्व की पूर्णता के बारे में स्पष्ट करते हुये यहाँ तक कहा गया है कि कोई अभागा ही होगा जो इस पावन अवसर को गवायेगा। जिसके भाग्य में दरिद्रता ही लिखी हुई हो, वही ऐसा अवसर चूकेगा। अतः इस मुहूर्त का उपयोग करके व्यक्ति अपने दरिद्रता, अभाव, परेशानियों को हमेशा के लिये अपने जीवन से कोसों दूर भगा सकता है और उसके स्थान पर सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य व उन्नति को प्राप्त करता है। अक्षय तृतीया वाले दिन स्वर्ण-मुद्रा व स्वर्ण आभूषण खरीदने की भी प्रथा है, यह मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य के जीवन व घर-परिवार में सुख-समृद्धि और ऐश्वर्यता आती है।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer