Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

आज जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के शुभअवसर पर आपके लिए प्रस्तुत है यह लेख।  सनातन दर्शन का यह मूलभूत सिद्धांत है कि जिस सत्चित् आनंद के आश्रय से यह दृश्यमान जगत अथवा यह धरातल संचालित हो रहा है, उसी के सहारे नियमित रूप से प्राणियों की आवश्यकता और रक्षा की व्यवस्था भी हो रही है।

भक्तों की धारणा है कि जब-जब विश्व व्यवस्था में अतिक्रमण होता है, तब-तब निराकार ईश्वर का एक अंश मूर्त साकार रूप ग्रहण करके व्यवस्था की पुनः स्थापना करने के लिये अवतीर्ण होता है, विश्व-व्यवस्था कि सुस्थिति, विश्वमंगल के लिये आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। इसलिये पूर्णब्रह्म परमेश्वर अवतार धारण कर अव्यवस्था जन्य भूमिभार का हरण करते हैं।

शास्त्रों ने ऐसे चैबीस अवतारों में श्रीराम और श्रीकृष्ण के अवतारों को विशेष महत्व दिया है। श्रीराम सोइ सच्चिदानंदघन रामा हैं और श्री कृष्ण भागवताकार के शब्दों में कृष्णस्तु भगवान स्वयम् हैं।

दोनों ने तत्कालीन अव्यवस्था एवं धर्मग्लानि को दूर करने के लिये अलौकिक शक्ति, अद्भुद् सौंदर्य और मर्यादा क्षमाशील विधान का आदर्श रूप उपस्थित कर विश्व व्यवस्था को सुचारूता दी। दोनों ने रावण, कंस आदि नृशंस राजाओं की उच्छृंखलता को परास्त कर साधु संरक्षण और लोक मंगल की विधायिनी व्यवस्था को संस्थापित किया।

यही कारण है कि इनकी अवतरण तिथियों को मनाये जाने वाले हमारे व्रत, उत्सव आदि में इनका प्रभाव अक्षुण्ण है और हम इनके आदर्श को समझने एवं व्यवहार में लाने के लिये इनकी जन्म जयंतियाँ प्रतिवर्ष व्रत के रूप में मनाते हैं। तथा लौकिक व परलौकिक लाभ उठाते हैं।

उसी परंपरा में हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रª के ये दो महान पर्व हैं- श्रीराम नवमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016)। श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण का आर्विभाव इसी तिथि को बुधवार के दिन रोहिणी नक्षत्र में अर्द्धरात्रि के समय हुआ था।

शास्त्रों में अष्टमी व्रत के दो भेद किये गये हैं- शुद्धा और विद्धा। सूर्योदय से सूर्योदय तक व्याप्त अष्टमी शुद्धा और सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच सप्तमी अथवा नवमी से युक्त होने पर विद्धा कही जाती है। फिर इनके तीन भेद किये जाते हैं:- समा, न्यूना और अधिका। इन भेदों के कारण अष्टमी अट्ठारह प्रकार की ही हो जाती है।

परंतु मान्यता की दृष्टि से तत्काल (अर्धरात्रि-व्यापिनी) अष्टमी ही ग्राह्य मानी गई है। ऐसी अष्टमी (Janmashtami) दो दिनों तक अथवा दोनों ही दिन न हो तो नवमी विद्धा ही ग्रहण करनी चाहिये।

इस वर्ष जन्माष्टमी का यह पर्व 25 अगस्त 2016 के दिन मनाया जाना शास्त्र सम्मत है, इस दिन सूर्याेदय के समय कृतिका नक्षत्र उदय होगा तदुपरांत दोपहर 12:10 से रोहिणी नक्षत्र आरम्भ होगा।

इस व्रत का महत्व शिव, विष्णु, ब्रह्मा भविष्य आदि पुराणों में तथा धर्मसिंधु, निर्णय-सिंधु आदि निबंध-ग्रंथों में प्रचूरता से वर्णित है। यह सर्वमान्य, पापघ्न तथा बाल, वृद्ध, कुमार, युवा अवस्था वाले नरों व नारियों के लिए अनुष्ठेय है।

कुछ शास्त्रों के अनुसार जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत नहीं करने वाले सक्षम नर-नारियों को पाप लगता है, और करने वालों के पापों की निवृत्ति एवं सुख की अभिवृद्धि होती है। इस व्रत में अष्टमी में उपवास और भगवत्पूजन का तथा नवमी में पारणा करने का विधान है।

अष्टमी (Janmashtami 2016) के एक दिन पहले लघु भोजन करना चाहिये। रात्रि में जितेंद्रिय रहना चाहिये। उपवास के दिन प्रातः स्नानादि नित्यकर्म करके सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि आकाष, आकाषचारी देवता और ब्रह्मा आदि को नमस्कार करके पूर्व या उत्तर मुख बैठें, हाथ में जल, फूल, कुष और गंध लेकर संकल्प करें-
ममाखिलपापप्रषमनपूर्वकं सर्वाभीष्टसिद्धये श्री कृष्णजन्माष्टमीव्रतमहं करिष्ये।

मध्याह्न समय में काले तिल डालकर उस जल से स्नान करके देवकी जी के लिये -सूतिकागृह नियत करें। उसे स्वच्छ व सुषोभित करके उसमें सूतिकोपयोगी सामग्री यथाक्रम रखें। गीतवाद्य का आयोजन करना और अधिक अच्छा होगा।

सूतिका गृह के सुःखद शोभन विभाग में सुंदर सुकोमल बिछौने के सुदृढ़ मंत्र पर अक्षतादि का मंडल बनवाकर उसपर शुभ कलष स्थापित करें एवं उसी पर सोना, चांदी, तांबा, पीतल, मणि, वृक्ष, मिट्टी या चित्ररूप भगवान की मूर्ति स्थापित करें।

मूर्ति में सद्यःप्रसूत श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और श्री लक्ष्मी जी उनके चरणस्पर्ष किये हुए हों- यह भाव प्रकाष्य होना चाहिए। फिर यथा समय भगवान के आर्विभाव की भावना कर वैदिक विधि पुरूष सुक्त से षोडशोपचार पूजन करना चाहिये।

यदि ऐसा करना संभव न हो तो पौराणिक अथवा संप्रदायानुसार दषोपचार या पंचोपचार आदि से पूजन करके आरती उतारनी चाहिये। इस पूजन में देवकी, वसुदेव, नंद, यषोदा और लक्ष्मीजी- इन सबका नाममंत्र से पूजन करना चाहिए।

अंत में निम्नांकित मंत्र से अध्र्य दें-
प्रणमे देवजननीं त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात्तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमोनमः।।
सपुत्राघ्र्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।।

फिर श्रीकृष्ण को पुष्पांजलि दें –
‘धर्माय धर्मेष्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’

इसके बाद जातकर्म-संस्कार, नालच्छेदन, षष्ठी पूजन और नामकरणादि करके चंद्रमा का भी पूजन करें-
‘सोमाय सोमेष्वराय सोमपतये सोमसम्भवाय सोमाय नमो नमः।’

फिर शंख में जल, कुष, कुसुम और गंध डालकर दोनों घुटने भूमि में टेककर प्रार्थना करते हुए अघ्र्य देवें-
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्र समुद्भव। गृहाणाध्र्यं शषांकेमं रोहिण्या सहितो मम।।
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषाम्पते। नमस्ते रोहिणीकान्त अघ्र्यं मे प्रतिगृह्यताम।।

रात्रि के शेष भाग को स्तोत्र-पाठादि अथवा संकीर्तन करते हुए व्यतीत करें। उसके बाद अगले दिन पूर्वार्द्ध में स्नानादिक नित्य क्रिया संपन्न कर जिस नक्षत्र तिथि या योग की प्रमुखता मानकर व्रत किया हो उसके अंत में भगवदर्पण पूर्वक अन्नादिक ग्रहण कर पारणा करें।

अष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत करने से प्रणत क्लेषहारी वृन्दावनबिहारी भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और अपनी भक्त्ति देते हैं। अष्टमी व्र्रत का महत्त्व अत्यधिक है, अतः यह व्रत प्रत्येक को श्रद्धा व निष्ठा पूर्वक करना चाहिये।

आगे की पक्तियों में साधकों के लिये कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर एक इच्छा पूर्ति प्रयोग दिया जा रहा है, आप चाहें तो यह प्रयोग आप भी संपन्न कर सकते हैं, यह विशेष श्रेणी का काम्य प्रयोग है- इतनी बात निश्चित है कि श्री कृष्ण साधना हेतु किया गया कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता।

साधक अपना निर्णय स्वयं लेते हुए श्री कृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के इस महान सिद्ध पर्व पर कोई न कोई साधना कर्म अवश्य संपन्न करें।

इच्छा पूर्ति गोविंद प्रयोग

इस साधना प्रयोग हेतु साधक 25 अगस्त 2016 रात्रि का प्रथम प्रहर बीत जाने के बाद साधना क्रम प्रारंभ करें। अर्द्ध रात्रि के साथ पूर्ण कर मंत्र जप संपन्न करे, इस साधना हेतु- श्री कृष्ण यंत्र तथा एक वैजयन्ती माला का होना आवश्यक हैं। अपने सामने सर्वप्रथम एक बाजोट पीले पुष्प बिछा दें और उन पुष्पों के बीचों बीच श्री कृष्ण यंत्र स्थापित करें, तथा इस यंत्र का पूजन केवल चंदन तथा केसर से ही संपन्न करें।
अपने सामने कृष्ण का एक सुंदर चित्र फ्रेम में मढ़वा कर स्थापित करें। चित्र को भी तिलक करें तथा प्रसाद स्वरूप पंचामृत साथ रख लें, जिसमें घी, दूध, दही, शक्कर तथा गंगाजल मिश्रित हो। इसके अतिरिक्त अन्य नैवेद्य भी अर्पित कर सकते हैं। इच्छा पूर्ति यंत्र के दोनों और दो-दो गोमती चक्र स्थापित करें, तथा उन्हें केसर का तिलक लगायें और दोनों हाथ जोड़ कर भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें, श्री कृष्ण का ध्यान कर उनकी आठ शक्तियाँ लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कांति, कीर्ति, तुष्टि एवं पुष्टि की मानसिक पूजा करें। प्रत्येक शक्ति के लिए निम्न मंत्र का उच्चारण करें-

ऊँ लक्ष्म्यै नमः।
ऊँ सरस्वत्ये नमः।
ऊँ रत्ये नमः।
ऊँ प्रीत्यै नमः।
ऊँ कान्त्ये नमः।
ऊँ कीत्र्ये नमः।
ऊँ तुष्टयै नमः।
ऊँ पुष्टये नमः।

शक्ति पूजन के पश्चात् इच्छापूर्ति मंत्र का जप प्रारंभ किया जाता है, इसकी भी विशेष विधि है, इसमें अपने दोनों हाथों में अक्षत् पुष्प और थोड़ा गंगाजल लें, और इच्छा पूर्ति मंत्र का उच्चारण करते हुए उसे अर्पित कर दें।
इच्छा पूर्ति मन्त्र- ऊँ श्रीं हृीं क्लीं कृष्णायै गोविन्दायै नमः।

इस प्रकार 108 बार इस मंत्र का उच्चारण इसी विधि से संपन्न करें यह प्रयोग पूर्ण हो जाने के बाद पहले से जलाकर रखे हुए दीपक, अगरबत्ती तथा धूप से आरती संपन्न कर प्रसाद ग्रहण करें। यदि कोई साधक 40 दिन तक प्रतिदिन एक माला मंत्र जप संपन्न करे तो उसका इच्छित कार्य अवश्य ही संपन्न हो जाता है।