Depawli Muhurat 2018

2015 Diwali Muhurat

दीपावली के दिन महालक्ष्मी पूजन कब करें, Depawli Muhurat 2018 :-

Dr.R.B.Dhawan (Top best Astrologer in Delhi)

सनातन मान्यता के अनुसार एश्वर्यवाली जीवन यापन एवं सफलता व उन्नति, सुख-समृद्धि के लिये शास्त्रों में महालक्ष्मी को प्रसन्न करने का विधान बताया गया है, महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए दीपावली से शुभ दूसरा कोई मुहुर्त muhurat नहीं है। इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन निशीथ काल और महानिशीथ काल, स्थिर लग्न, शुभ चौघड़िया के दुर्लभ तथा सिद्ध मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन करके कोई भी साधक दुर्लभ देवी शक्तियों का आशिर्वाद प्राप्त कर सकता है।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस इस वर्ष 2018 में वृष एवं सिंह (स्थिर लग्न ) के मुहूर्त में महालक्ष्मी दीपावली पूजा मुहूर्त Diwali Muhurat में महालक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व है, इस दिन कि विशेषता यह है कि इस दिन वातावरण में अलौकिक सकारात्मक तथा समृद्धि प्रदान करने वाली ऊर्जा बहुतायत मात्रा में उपस्थित होगी। इस शुभ समय में महालक्ष्मी की पूजा करके कोई भी मनुष्य सर्व भौतिक सुखों का साक्षात्कार कर सकता है। यह रहस्य हर कोई नहीं जानता।

इस वर्ष “आप का भविष्य” के पाठकों के लिए महालक्ष्मी पूजा के विशेष महूर्त की गणना की है, इसी मुहूर्त में समृद्धि प्रदान करने वाले अनेक यंत्रों का निर्माण और अनेक यंत्रों की प्राण-प्रतिष्ठा भी करने का निश्चय किया गया है। (यह दीपावली पर सिद्ध यंत्र आप दीपावली से पूर्व Shukracharya संस्थान में बुक करवा सकते हैं)

दीपावली (महालक्ष्मी) पूजन मुहूर्त 2018

महालक्ष्मी का पूजन केवल स्थिर लग्न में ही सम्पन्न किया जाना चाहिये, क्योंकि हर एक मनुष्य की यही इच्छा होती है कि, लक्ष्मी को स्थिर रखना है। इस वर्ष अमावस्या की रात्रि को वृष और सिंह मात्र दो ही स्थिर लग्न हैं, अतः इन लग्न-मुहूर्त में ही लक्ष्मी पूजन सम्पन्न होना चाहिये।

श्री महालक्ष्मी पूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल से आधी रात तक रहने वाली अमावस श्रेष्ठ होती है। यदि अर्धरात्रि काल में अमावस्या तिथि का आभाव हो, तो प्रदोषकाल में ही दीप प्रज्वलन, महालक्ष्मी पूजन, श्रीगणेश एवं कुबेर आदि पूजन करने का विधान है।

प्रदोषे दीपदानए लक्ष्मी पूजनादि विहितम्।
कार्तिक कृष्ण पक्षे च प्रदोषे भूतदर्शर्योः,
नरः प्रदोष समये दीपदान् दद्यात् मनोरमान्।।

इस वर्ष 2018 ई. कार्तिक अमावस 7 नवम्बर, बुधवार को प्रदोष व्यापिनी तथा रात्रि 21:22 तक निशीथ व्यापिनी होने से दीपावली पर्व इसी दिन होगा। इस वर्ष दीपावली स्वाती तथा विशाखा नक्षत्र आयुष्मान तथा सौभाग्य योग एवं तुला के चन्द्रमा के समय होगी।

सांयकाल सूर्यास्त (प्रदोषकाल प्रारम्भ) के बाद मेष व वृष लग्न एवं स्वाती नक्षत्र विद्यमान होने से यह समयावधि श्रीगणेश, महालक्ष्मी पूजन आदि आरम्भ करने के लिये विशेष रूप से शुभ रहेगी। बही खातों एवं नवीन शुभ कार्यों के लिये भी यह मुहूर्त अत्यंत शुभ होगा। इस वर्ष बुधवार की दीपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रूप से शुभ मानी जायेगी। लक्ष्मीपूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल ही विशेषतया प्रशस्त माना गया है-

कार्तिके प्रदोषे तु विशेषण अमावस्या निशावर्धके।
तस्यां सम्पूज्येत् देवी भोगमोक्ष प्रदायिनीम्।।

दीपावली के दिन घर में प्रदोषकाल से महालक्ष्मी पूजन प्रारम्भ करके अर्धरात्रि तक जप अनुष्ठानादि करने का विशेष महात्मय होता है। प्रदोषकाल से कुछ समय पहले स्नानादि उपरांत धर्मस्थल पर मंत्रपूर्वक दीपदान करके अपने निवास स्थान पर श्रीगणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर पूजनादि करके अल्पाहार करना चाहिये। तदुपरांत यथोपलब्ध निशीथादि शुभ मुहूर्त में मंत्र-जप, यंत्र-सिद्धि आदि अनुष्ठान सम्पादित करने चाहियें।
दीपावली वास्तव में पांच पर्वों का महोत्सव है, जिसका आरम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) से लेकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई-दूज) तक रहती है। दीपावली के पर्व पर धन की भरपूर प्राप्ति के लिये धन की अधिष्ठात्री भगवती लक्ष्मी का समारोह पूर्वक आवाहन, षोडशोपचार सहित पूजन किया जाता है। आगे दिये गये निर्दिष्ट शुभ मुहूर्तों में किसी पवित्र स्थान पर आटा, हल्दी, अक्षत एवं पुष्पादि से अष्टदल कमल बनाकर श्रीलक्ष्मी का आवाहन एवं स्थापन करके देवों की विधिवत् पूजा अर्चना करनी चाहिये।

आवाहन का मंत्र-
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्र्रां ज्वलंती तृप्तां तर्पयंतीम।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप हव्ये श्रियम्। (श्रीसूक्तम्)।

पूजा मंत्र-
ॐ गं गणपतये नमः।। लक्ष्म्यै नमः।। नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात्।। से लक्ष्मी की, एरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नमः। अग्रलिखित मंत्र से इन्द्र की और कुबेर की निम्न मंत्र से पूजा करें- कुबेराय नमःए धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्मधिपाय च। भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादि सम्पदः।।
पूजन सामग्री में विभिन्न प्रकार की मिठाई, फल पुष्पादि, धूप, दीपादि सुगंधित वस्तुयें सम्मलित करनी चाहियें। दीपावली पूजन में प्रदोष, निशीथ एवं महानिशीथ काल के अतिरिक्त चैघड़िया मुहूर्त भी पूजन, बही-खाता पूजन, कुबेर पूजा, जपादि अनुष्ठान की दृष्टि से विशेष प्रशस्त एवं शुभ माने जाते हैं।

प्रदोषकाल-
7 नवम्बर 2018 को दिल्ली एवं निकटवर्ती नगरों में सूर्यास्त 17:30 से 02 घ. 41 मि. के लिये 20:11 तक प्रदोषकाल रहेगा। सांय 17:57 तक मेष (चर) लग्न तथा सांय 17:57 से 19:52 तक वृष (स्थिर) लग्न विशेष रहेगा। प्रदोषकाल में मेष व वृष लग्न स्वाती नक्षत्र 19:37 तक तथा तुला का चन्द्रमा होने से महालक्ष्मी पूजानादि के लिये शुभ समय होगा। प्रदोषकाल में ही 19:00 से 20:41 तक शुभ की चौघड़ियां रहने से इस योग में दीपदान, महालक्ष्मी, गणेश-कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन, धर्मस्थल एवं घर पर दीप प्रज्वलित करना, ब्राह्मणों तथा आश्रितों को भेंट, मिठाई बांटना शुभ होगा।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़ियां मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चैघडिया
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चैघड़िया पूजन में होनी चाहियें।

निशीथ काल- 7 नवम्बर 2018 को दिल्ली व समीपस्थ नगरों में निशीथकाल रात्रि 20:01 से 22:41 तक रहेगा। इसी निशीथकाल में 19:43 से 21:57 तक मिथुन लग्न मध्यम मुहूर्तए तदुपरांत कर्क लग्न विशेष प्रशस्थ रहेगा। 19:00 से 20:41 तक शुभ की चैघडिया भी शुभ रहेगी। तदुपरांत अमृत की चैघडिया 20:41 से 22:22 तक भी शुभ रहेगी। इस अवधि तक पूजन समाप्त कर श्रीसूक्त, कनकधारा स्त्रोत्र तथा लक्ष्मी स्त्रोत्रादि का जप पाठ करना चाहिये।

महानिशीथ काल- रात्रि 22:41 से 24:20 तक महानिशीथ काल रहेगा। इस अवधि में 21:57 से 24:20 तक कर्क लग्न तदुपरांत सिंह लग्न विशेष शुभ रहेगा। 22:22 से 24:02 तक चर की चौघड़ियां भी शुभ, परंतु तदुपरांत रोग की चौघड़ियां अशुभ रहेगी। इस लिये 24:02 तक श्री गणेश-लक्ष्मी पूजन अवश्य कर लेना चाहिये। महानिशीथ काल में श्री महालक्ष्मी, काली उपासना, यंत्र मंत्र तंत्रादि की क्रियायें व काम्य प्रयोग, तंत्रानुष्ठान, साधनायें एवं यज्ञादि किये जाते हैं।

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श्रीयंत्र की साधना | Shri Yantra for Money

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श्रीयंत्र की साधना (Shri Yantra for Money)

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मानव जीवन का संचालन धन के बिना संभव नहीं हैं, मनुष्य को अपनी आवश्यकता पूर्ति हेतु पग-पग पर धन की आवश्यकता पड़ती हैं दरिद्रता को सबसे बड़ा अभिशाप माना गया है। यदि धन न हो तो जीवन नरक तुल्य बन जाता है। ऐसे व्यक्ति को भाई-बंधु, मित्रा, रिश्तेदार सब छोड़ देते हैं। व्यक्ति को कितना धन मिलेगा, वह कैसा जीवन जियेगा यह सब उसके पूर्व जन्म कर्मानुसार माँ के गर्भ में ही तय हो जाता है-
आयु कर्म वित च विद्या निधनमेव च।
प चैतानि सृजयन्ते गर्भस्थयैव देहिनः।।

पूर्वजन्मदुष्कर्मानुसार ही व्यक्ति की कुंडली में केमद्रुम, हृद योग, काक योग, दरिद्र योग, हुताशन योग, रेका योग, शकट योग, ऋण योग, मृति योग, दुर्याेग, निर्भाग्य योग, निःस्व योग एवं ऋण ग्रस्त योग आदि अशुभ योग आते हैं। ये योग व्यक्ति के जीवन को धन एवं ऐश्वर्यहीन बनाते हैं। इन कुयोगों को दूर करने हेतु हमें जप, पूजा, अनुष्ठान एवं यंत्र-मंत्र-तंत्रादि का सहारा लेना पड़ता हैं। इन कुयोगों को दूर कर व्यक्ति को धन एवेश्वर्य देने वाले यंत्र राज श्री यंत्र(shri yantra) की महत्ता प्रस्तुत हैं। यंत्र मंत्र मय हैं जिस प्रकार आत्मा और शरीर में भेद नहीं होता उसी प्रकार यंत्र एवं देवता में कोई भेद नहीं होता है। यंत्रादेवता का निवास स्थान माना गया है-
यन्त्रमन्त्रमयं प्रोक्तं मंत्रात्मा देवतैवहि। देहात्मनोर्यथा भेदो यन्त्र देवयोस्तथा।

यंत्र और मंत्र मिलकर शीघ्र फलदायी होते हैं। मंत्रों में शक्ति शब्दों में निहित होती है, वहीं यह शक्ति यंत्रों के रेखा एवं बिन्दुओं में रहती है। श्री यंत्र में लक्ष्मी का निवास रहता है। इस यंत्र की रचना के बारे में कहा गया है-
बिंदुत्रिकोण वसुकोण दशारयुग्म, मन्वस्व नागदल षोडसपंचयुक्तम्।
वृत्तत्रायं च धरणी सदनत्रायं च, श्री चक्रमेतदुदितं परदेवतायाः।।

अर्थात् श्री यंत्र बिंदु, त्रिकोण, वसुकोण, दशारयुग्म, चतुर्दशार, अष्टदल, षोडसार, तीनवृत तथा भूपुर से निर्मित है। इसमें चार ऊपर मुख वाले त्रिकोण शिव त्रिकोण, पाँच नीचे मुख वाले शक्ति त्रिकोण होते हैं। इस तरह त्रिकोण, अष्टकोण, दो दशार, पाँच शक्ति तथा बिंदु, अष्टकमल षोडस दल कमल तथा चतुरस्र हैं। ये इसकी कृपा से व्यक्ति को अष्टसिद्धि एवं नौ विधियों की कृपा प्राप्त होती है। इस यंत्र के पूजन अनुष्ठान से व्यक्ति को दश महाविद्याओं की भी कृपा प्राप्त होती हैं-
काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी, भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या घुमावती तथा।
मातंगी सिद्ध विद्या च कथिता बगलामुखी, एतादश महाविद्या सर्वतंत्रोषु गोपिता।।

काली, तारा, शोडषी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, मातंगी, कमला और बगलामुखी ये दश महाविद्यायें हैं।

श्री यंत्र(shri yantra) का निर्माण स्वर्ण, चाँदी, स्फटिक, भोजपत्र आदि पर किया जाता है। भोज पत्र पर निर्मित यंत्र साधारण फलदायी रहता हैं। यह ताम्र पत्र पर श्रेष्ठ, चाँदी पर श्रेष्ठता तथा स्वर्ण पर निर्मित होने पर श्रेष्ठतम फल देता है। स्फटिक एवं मणि आदि पर निर्मित श्री यंत्र(sphatik shri yantra) भी अत्यंत शुभ फलप्रद रहता हैं। विभिन्न प्रसिद्ध तीर्थस्थलों पर स्थापित इन यंत्रों की महिमा सर्वविदित हैं। तिरूपति के बालाजी मंदिर में स्थापित श्री यंत्र (षोडश यंत्र), जगन्नाथ जी के मंदिर में भैरवी चक्र तथा श्री नाम मंदिर में सुदर्शन चक्र स्थापित हैं, जो यंत्रो की महत्ता का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इन तीर्थ स्थलों पर अपार संपत्ति है। विभिन्न तांत्रिक गंथों में श्री यंत्र की महिमा को अपार बताया गया है। इसमें सभी देवी देवताओं का निवास बताया गया है। यंत्र का निर्माण शुभ मुहुर्त जैसे- सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, रविपुष्य, गुरू पुष्य योग, चारों नवरात्र, दीपावली, शिवरात्रि आदि दिनों में किया जाना चाहिये या कराया जाना चाहिये। यह कार्य जटिल एवं श्रमसाध्य हैं। हर कोई इस कार्य को नहीं कर सकता है। कर्मकांड जानने वाले विद्वान पंडितों से यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा करवा लेना चाहिये। प्राण प्रतिष्ठा युक्त यंत्र शीघ्र फलदायी होते हैं। यदि ऐसा कराया जाना संभव न हो तो किसी विश्वसनीय प्रतिष्ठान, संस्थान से प्राण प्रतिष्ठा युक्त यंत्र प्राप्त कर अपनी पूजा में शुभ मुहूर्त में किसी पंडित से अनुष्ठान पूर्वक स्थापित करा लेना चाहिये। फिर प्रतिदिन पवित्र होकर इस यंत्र की पूजा करनी चाहिये, पवित्रता का ध्यान रखना अत्यावाश्यक हैं। यथा-देवोभूत्वा यजे देवं ना देवो देवमर्चयेत्। देवार्चा योग्यता प्राप्त्यैभूतिशुद्धि समाचरेत्।। इस यंत्र की प्रतिदिन पूजा करें तथा श्री सूक्त के 12 पाठ करें एवं निम्नलिखित लक्ष्मी मंत्रों में से किसी एक मंत्र का नियमित एक माला जप करने मात्र से ही धन संकट दूर होता है। व्यक्ति संपन्न एवं ऐश्वर्यशाली बन जाता है, जप के लिये ‘‘माला कमल गट्टे’’ की श्रेष्ठ है। रूद्राक्ष की माला का भी उपयोग किया जा सकता है। इस साधना से लक्ष्मी जी के साथ सभी देवी देवताओं की कृपा बनी रहती है। लेकिन व्यक्ति को सदाचरण नहीं छोड़ना चाहिये। चरित्र बल बनाये रखना एवं मांस मदिरा से दूर रहना चाहिये। यंत्र, मंत्र, तंत्र, देवी, देवता, यज्ञ, औषधि, तीर्थ, एवं गुरू में श्रद्धा अनिवार्य शर्त है, तभी ये चीजें फलदायी होती हैं। श्री यंत्र में तो इतना आकर्षण है कि, इसका दर्शन मात्र ही लाभ दे देता हैं।

मंत्र:-
(1) ऊँ श्रीं हृीं श्रीं कमले कमलालेय प्रसीद प्रसीद श्रीं हृीं ऊँ महालक्ष्मयै नमः।
(2) ऊँ हृीं श्रीं लक्ष्मीं महालक्ष्मी सर्वकामप्रदे सर्व-सौभाग्यदायिनी अभिमत्ं प्रयच्छ सर्वसर्वगत सुरूपे सर्वदुर्जयविमोचनी हृीं सः स्वाहा।
(3) ऊँ महालक्ष्मर्य च विद्महे विष्णु पत्नीम् च धीमहि तन्नों लक्ष्मी प्रचोदयात्।
(4) ऊँ श्रीं हृीं क्लीं श्रीं लक्ष्मी रागच्छागच्छमममन्दिरे तिष्ठ स्वाहा।
(5) ऊँ श्रीं दृीं श्रीं नमः।
(6) ऊँ दृीं श्रीं लक्ष्मी दुर्भाग्यनाशिनी सौभाग्यप्रदायिनी श्रीं हृीं ऊँ।
(7) ऐं दृीं श्रीं क्लीं सौं जगत्प्रसूत्यै नमः।
(8) ऊँ नमः कमलवासिन्यै स्वाहा।
(9) ऊँ श्री हृीं जयलक्ष्मी प्रियाय नित्यप्रदितचेत से लक्ष्मी सिद्धां देहाय श्रीं हृीं नमः।

संतान प्राप्ति मंत्र | Santaan Prapti Mantra – दीपावली विशेष साधना

जब जन्म कुण्डली में संतानोत्पत्ति योग न हो, अथवा अनेक बार गर्भ हानि होती रहे, या संतान दीघार्यु नहीं होती हो तो, उसके लिये यह प्रयोग महत्वपूर्ण है। इस साधना प्रयोग को दीपावली की रात्रि में संतान की इच्छा करने वाली महिला के संपन्न करने से संतान का योग प्रबल होकर संतानोत्पत्ति का योग बनता है। और वह संतान आज्ञाकारी होती है। इस प्रकार के प्रयोग से गृहस्थ जीवन अनुकूल एवं सुखदायक बन जाता है।

साधना विधि– साधिक को चाहिये कि वह दीपावली की रात्रि में स्नानादि कर पीले वस्त्र धारण कर पूर्व की तरफ मुख कर के पीले आसन पर बैठ जाये, सामने लकड़ी के तख्ते पर एक थाली में चावल से त्रिकोण बनाकर उसके मध्य में मोती पर बने अभिमंत्रित मुक्ता गणपति की स्थापना करें, और फिर पंचोपचार (फूल, चावल, रोली, कलावा तथा धूप-दीप) से पूजा करके पुत्रजीवा की 108 दानों वाली माला से 21 माला अग्रलिखित मंत्र जप पूर्ण करें।

यही प्रयोग प्रत्येक माह गर्भवती होने तक संतान की इच्छा रखने वाली महिला को दोहराना चाहिये। निश्चय ही उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। यही प्रयोग उस महिला का पति भी सम्पन्न कर सकता है, या घर का कोई अन्य सदस्य भी कर सकता है, परंतु उसको उस महिला के नाम का पहले संकल्प अवश्य लेना होगा। यदि कोई साधक-साधिका किसी दूसरे के लिये प्रयोग करना चाहे तो संकल्प ले लें कि ‘मैं यह प्रयोग अमुक व्यक्ति के लिये संपन्न कर रहा हूँ।

Santaan prapti mantra मंत्र – ऊँ नमो नारायणाय पुत्र सन्तानं देही देहि ठः ठः स्वाहा।

जप पूर्ण होने पर गणपति जी को मिष्ठान का भोग लगवाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें। वह माला जल में विसर्जित कर दें। मुक्ता गणपति का लॉकेट महिला को गले में धारण करना होगा।

साधना सामग्री – अभिमंत्रित मुक्ता गणपति (मोती पर बने गणपति), 108 दाने की पुत्रजीवा माला (putrajeeva mala)

न्यौछावर राषि – रू. 2000 रू

संपर्क – Shukracharya Delhi, 09810143516

ज्योतिष की नजर में शेयर बाज़ार – July 2015

Share Market in July-2015 in Astrology

जुलाई में व्यापार का आरम्भ 1 तारीख को बुधवार के दिन होगा आरम्भ के समय सूर्यदेव मंगलदेव के साथ मिथुन राशी में होंगे, चन्द्रमा धनु में , बुधदेव वृषभ में, गुरुदेव शुक्रदेव के साथ कर्क में, शनिदेव वृश्चिक में, राहुदेव कन्या में और केतुदेव मीन राशि में होंगे|

ग्रहों के प्रभाव स्वरूप बाजार सकारात्मक रूप से खुलने की  प्रबल आशा रहेगी लेकिन प्रत्येक तेजी पर जिस भी सेक्टर में लाभ मिले  लाभ कमाना ठीक रहेगा तेल, तिलहन, चीनी-चावल, मिलो और F.M.C.G. उद्योग में बिकवाली को प्राथमिकता देना ठीक रहेगा UNITED SPIRIT, ITC, HIND UNI, BRITANNIA, RUCHI SOYA, MARICO., EMAMI में लाभ कमाना ठीक रहेगा, ऐश्वर्य विलासिता और रिटेल ,फेशन, होटल, रेस्टोरेंट, फ़ूड चेन आदि में FUTURE RETAIL, TITAN, ARVIND, TBJ, MONT CARLO, GEETANJALI GEMS, JUBILANT FOOD, SPECIALTY RESTAURANT में भी लाभ कमाना ठीक रहेगा क्यों की असंतुलित वर्षा और मौसम की अनियमितता के चलते इनमे  गिरावट कि प्रबल सम्भावना रहेगी पहली तिमाही के परिणामो के भी नकारात्मक रहने  के समाचारो से बाजार में निवेशकों का अभाव रहेगा विदेशी व्यापार में भी घाटे के संकेत नज़र आने से रूपये के अवमूल्य्न की भी आशा रहेगी इसलिए किसी भी नवीन निवेश से दूर ही रहना ठीक रहेगा।

सरकारी हस्तक्षेप और नियमो की सख्ती के चलते रियल्टी, इंफ्रास्टक्चर के प्रोजेक्ट में देरी की संभावना बनेगी जिसके चलते, सीमेंट और स्टील की मांग में भी कमी रहने की आशा रहेगी लेकिन प्रत्येक गिरावट पर ACC, AMBUJA, ULTRA TECH, SHREE CEMENT, SAIL, TATA STEEL, JSW STEEL में निवेश करना ठीक रहेगा अंतिम सप्ताह में हास्पिटल मेडिसन और फार्मा सेक्टर में गिरावट का रुख रहेगा ऐसे में GSK PHARMA, DR REDDY, BIOCON, APPOLO HOSPITAL में निवेश  के  लिए एक उचित   अवसर रहेगा माह के अंत में बाज़ार गिरावट  के साथ बंद होने की आशा रहेगी।

नोट: – उपरोक्त फलादेश गृह स्थिति पर आधारित हे, इसका उद्धेश्य पाठको का मार्ग दर्शन करना है। कोई भी निर्णय लेने से पहले बाज़ार को प्रभावित करने वाले अन्य कारणों पर भी ध्यान दे| सट्टा खेलने की प्रवर्ति, निर्णय में गलती एवं निजी भाग्यहीनता के कारण होने वाले किसी भी नुकसान के लिए लेखक, सम्पादक, समाचार पत्र, वेबसाइट आदि की कोई जिम्मेदारी नही होगी।

Shivpuran & Rudraksha – शिवपुराण में रूद्राक्ष

14 Mukhi Rudraksha

रूद्राक्षोपनिषद्वैद्यं महा्रयद्रत्योज्ज्वलम्।
प्रतियोगिविनिर्मुक्तं शिवमात्रपदं भजे।।

‘रूद्राक्ष-उपनिषद् से जानने योग्य, महारूद्ररूप से उज्जवल, प्रतियोगीरहित, शिवषदवाच्य तत्त्व की मैं शरण लेता हूँ। हरिः ओम्।
भुसुण्ड नाम के ऋषि ने कालाग्निरूद्र से पूछा कि, ‘रूद्राक्ष की उत्पत्ति किस प्रकार हुई तथा उसके धारण करने से क्या फल मिलता है – इसे आप लोकहित के लिए कृपा करके कहिये।’ कालाग्निरूद्र भगवान् ने कहा कि ‘त्रिपुरासुर नामक दैत्य का नाश करने के लिये मैंने नेत्रों को बंद कर लिया था। उस समय मेरी आंखों में से जल के बिन्दु पृथ्वी पर गिरे और वही रूद्राक्ष रूप में परिणत हो गये। सर्वलोक के अनुग्रह के लिये मैं यह बतलाता हूँ कि उनके नामोच्चारण मात्र से गो-दान का फल, और दर्शन तथा स्पर्श से दुगुने फल प्राप्त होता है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता।’ इस संबंध में नीचे लिखी उक्ति है-
भुसुण्ड ऋषि ने पूछा कि ‘वह रूद्राक्ष कहाँ स्थित है, उसका क्या नाम है, वह किस प्रकार मनुष्यों के द्वारा धारण किया जाता है, कितने प्रकार के इसके मुख हैं और किन मन्त्रों से इसे धारण किया जाता है- आदि सब बातें कृपा करके कहिये।’

14 Mukhi Rudraksha
14 Mukhi Rudraksha

श्रीकालाग्निरूद्र बोले – ‘देवताओं के हजारों वर्षों तक मैने अपनी आँखे खुली रखीं। उस समय मेरी आँखों से जल की बूंदें पृथ्वी पर गिर पड़ी। वे आंसू की बूंदे भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने के लिये स्थावरत्व को प्राप्तकर महारूद्राक्ष नामक वृक्ष हो गये। रूद्राक्ष धारण करने से भक्तों के रात-दिन के पाप नष्ट होते हैं, उसका दर्शन करने से लाखों गुना पुण्य मिलता है। जो मनुष्य रूद्राक्ष धारण कर रूद्राक्ष की माला से इष्टदेव का जप करता है उसे अनन्तगुने पुण्य की प्राप्ति होती है। आंवले के फल के समान आकार वाला रूद्राक्ष उत्तम होता है, बेर के समान आकार वाला मध्यम और चने के समान आकार वाला कनिष्ठ होता है। अब उसके धारण करने की प्रक्रिया कहता हूँ सुनो। श्रीशंकर भगवान् की आज्ञा से पथ्वी पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र चार जाति के रूद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए। प्रत्येक जाति के मनुष्य को अपनी-अपनी जाति के रूद्राक्ष ही फलदायक होते हैं। श्वेत रूद्राक्ष को ब्राह्मण, लाल को क्षत्रिय, पीले को वैश्य और काले को शुद्र जानना चाहिये और ब्राह्मण को श्वेत रूद्राक्ष धारण करना चाहिये, क्षत्रिय को लाल, वैश्य को पीला और शुद्र को काला रूद्राक्ष पहनना चाहिये। आकार में एक समान, चिकने, पक्के (मजबूत) मोटे तथा कांटोंवाले रूद्राक्ष के दाने शुभ होते हैं। कीड़ा लगे हुए, टूटे-फूटे, बिना कांटों के, छिद्रयुक्त तथा बिना जुड़े हुए- इन छः प्रकार के रूद्राक्षों का त्याग करना चाहिये। जिस रूद्राक्ष में स्वयंमेव बना हुआ छिद्र किया हुआ हो उसे मध्यम जानना चाहिये। शास्त्र में लिखे अनुसार एक समान, चिकने, पक्के एवं मोटे दानों को रेशम के धागे में पिरोकर शरीर के तत्तद् अवयव में धारण करें। जिस रूद्राक्ष की माला कसौटी के पत्थर सुवर्ण की रेखा के समान जान पड़े वह रूद्राक्ष उत्तम है, ऐसे रूद्राक्ष को शिव-भक्त धारण करें। शिखा में एक रूद्राक्ष, सिर पर तीस, गले में छत्तीस, दोनो बाहुओं में सोलह, कलाई में बारह और कन्धे पर पचास दाने धारण करें और एक सौ आठ रूद्राक्षों की माला का यज्ञोपवीत बनावंे। दो, पांच अथवा सात लड़ो की माला कण्ठ-प्रदेश-में धारण करें। मुकुट में, कुण्डल में, कर्णफूल में तथा हार में भी रूद्राक्ष धारण करें। बाजूबन्द में, कड़े में, विशेष कर कर धनी में, सोते-जागते, खाते-पीते सर्वदा मनुष्य को रूद्राक्ष धारण करना चाहिये। तीन सौ रूद्राक्ष धारण करना अधम, पांच सौ मध्यम और एक हजार उत्तम है। बुद्धिमान पुरूष-

ऊँ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः ब्रह्माधिपतिब्र्रह्मणः शिवो में अस्तु सदाशिवोम्।
– इस मन्त्र से मस्तक में,

ऊँ तत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूदः प्रचोदयात्।
– इस मन्त्र से कण्ठ में,

ऊँ अधोरेम्योऽथ घोरेभ्यो घोरधोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रूद्ररूपेभ्यः।
इस मन्त्र से गले, हृदय और हाथों में धारण करे।

गूंथे हुए पचास रूद्राक्षों को चतुर मनुष्य आकाश के समान व्यापक पेटपर धारण करें और मूल मन्त्रों से तीन, पांच अथवा सात लड़ों में गूंथी हुई माला को धारण करें। इसके बाद भुसुण्ड ऋषिः ने महाकालाग्निरूद्र भगवान् से पूछा कि, ‘रूद्राक्ष के भेद से जो रूद्राक्ष जिस स्वरूप वाला और जिस फल को देने वाला, मुखयुक्त, दुष्ट का नाश करने वाला और इच्छामात्र से शुभ फल को देने वाला है वह स्वरूप मुझे कहिये।’ इस विषय पर निम्नलिखित उक्ति है-

‘हे मुनिश्रेष्ठ! एक मुखवाला रूद्राक्ष परब्रह्मस्वरूप है और जितेन्द्रिय पुरूष उसको धारण कर परब्रह्मस्वरूप में लीन हो जाता है। दो मुखवाला रूद्राक्ष अर्धनारीश्वर भगवान् का स्वरूप है, उसको जो नित्य धारण करता है उस पर अर्धनारीश्वर भगवान् सदा प्रसन्न रहते हैं। तीन मुखवाला रूद्राक्ष त्रिविध अग्नि का स्वरूप है, उसके पहनने वालों पर अग्निदेव सदा प्रसन्न रहते हैं। चार मुखवाला रूद्राक्ष चतुर्मख ब्रह्मा का स्वरूप है और उसको धारण करने वाले पर चतुर्मुख ब्रह्मदेव सदा प्रसन्न रहते हैं। पांच मुखवाला रूद्राक्ष पाँच ब्रह्ममन्त्रों का स्वरूप हैं और उसके धारण करने वाले को पंचमुख भगवान् शिव, जो स्वयं ब्रह्मरूप हैं, नरहत्या से भी मुक्त कर देते हैं। छः मुखवाला रूद्राक्ष कार्तिकेय स्वामी का स्वरूप हैं, उसके धारण करने से महान् ऐश्वर्य एवं उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है। बुद्धिमान् एवं ज्ञानी पुरूष ज्ञान और सम्पत्ति की शुद्धि के लिये इस रूद्राक्ष को धारण करें। इसे विद्वान् लोग विनायकदेव का स्वरूप भी कहते हैं। उसके धारण करने से अटूट लक्ष्मी तथा पूर्ण आरोग्य की प्राप्ति का स्वरूप है और आठ वसुदेवताओं को तथा गंगाजी को प्रिय है। उसके धारण करनेवाले पर ये सत्यवादी अष्टवसु प्रसन्न होते हैं। नव मुखवाला रूद्राक्ष नवदुर्गा का स्वरूप हैं, उसके धारण करने मात्र से नवदुर्गायें प्रसन्न होती हैं। इस मुखवाले रूद्राक्ष को यम का स्वरूप कहते हैं। यह दर्शनमात्र से शांति प्रदान करने वाला है, तो फिर उसके धारण करने से शांति मिलने में कोई संदेह ही नहीं है। ग्यारह मुखवाला रूद्राक्ष एकादश रूद्र का स्वरूप है, उसे धारण करने वाले को वह तद्रूप करने वाला ओर सौभाग्य प्रदान करने वाला है। बाहर मुखवाला रूद्राक्ष महाविष्णु का स्वरूप है, वह बारह आदित्य के समान स्वरूप प्रदान करने वाला है। तेरह मुखवाला रूद्राक्ष इच्छित फल तथा सिद्धि प्रदान करने वाला है, इसके धारण मात्र से परमेश्वर प्रसन्न होते हैं।

‘चैदह’ मुखवाला रूद्राक्ष (14 mukhi Rudraksha) रूद्र के नेत्र से उत्पन्न हुआ है, वह सर्व व्याधि को हरने वाला तथा सदा आरोग्य प्रदान करने वाला है। रूद्राक्ष धारण करने वाले पुरूष को मद्य, मांस, लहसुन, प्याज, सहिंजन, बहुयार (लहटोर), विड्वराह (ग्राम्यशूकर)-इन अभक्ष्यों का त्याग करना चाहिये। ग्रहण के समय, मेष-संक्रान्ति, उत्तरायण, अन्य संक्रान्ति, अमावास्या, पूर्णिमा तथा पूर्ण दिनों में रूद्राक्ष धारण करने से तत्काल, मनुष्य सर्व पापों से छूट जाता है। रूद्राक्ष का मूल ब्रह्मा, विष्णु मध्यभाग और उसका मुख रूद्र है और उसके बिन्दु सब देवता कहे गये हैं।

अनन्तर अनत्कुमारी ने कालाग्निरूद्र भगवान् से रूद्राक्ष धारण करने की विधि पूछी। उसी समय निशाद, जड़भरत, दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिल, वशिष्ठ, पिप्लाद आदि ऋषि भी उनके समीप आ गये। भगवान् कालिग्नरूद्र ने उनके आने का प्रयोजन पूछा, तब उन्होंने यही कहा कि हम सब रूद्राक्ष-धारण विधि को सुनना चाहते हैं। तत्पश्चात् भगवान् कालाग्निरूद्र ने कहा कि, ‘रूद्र के नयनों से उत्पन्न होने के कारण ही इनकी रूद्राक्ष-संज्ञा हुई है। भगवान् सदशिव संहारकाल में संहार करके अपने संहार नेत्र को बंद कर लेते हैं, उस नेत्र में से रूद्राक्ष के उत्पन्न होने के कारण उसका नाम ‘रूद्राक्ष’ प्रसिद्ध हुआ है। रूद्राक्ष का नाम उच्चारण करने से दस गो-दान का फल मिलता है। वही यह ‘भस्मज्योति’ रूद्राक्ष है। उस रूद्राक्ष को हाथ से स्पर्शकर धारण करने से दो हजार गो-दान का फल मिलता है तथा एकादश रूद्रत्य की प्राप्ति होती है। उस रूद्राक्ष को सिर पर धारण करने से कोटि गो-दान का फल मिलता है। जो मनुष्य इस रूद्राक्ष जाबालोपनिषद्का नित्य पाठ करता है अथवा उसके रहस्य को जानता है यह बालक या युवा, महान् हो जाता है, वह सबका गुरू और मन्त्रों का उपदोश करने वाला हो जाता है। रूद्राक्ष को पहनकर होम करना चाहिए, इन्हीं का धारण करके पूजन करना चाहिए, इसी प्रकार यह रूद्राख राक्षसों का नाश करने वाला तथा मृत्यु से तारने वाला है। रूद्राक्ष को गुरू से लेकर कण्ठ, बाँह और शिखा में बाँधें। रूद्राक्ष के दाता गुरू को गुरूदक्षिणा में सप्तद्वीप वाली पृथ्वी का दान भी अपूर्ण ही है, इसलिये उसे श्रद्धापूर्वक कम-से-कम एक गाय का दान करें यह गो-दान ही शिष्य को फल देता है। जो ब्राह्मण इस उपनिषद का सांयकाल में पाठ करता है। उसके दिन के पाप नष्ट हो जाते हैं, मध्याह्न में पाठ करने से छः जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा प्रातःकाल पाठ करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और छः अरब गायत्री जप का फल मिलता है। ब्रह्महत्या, मदिरापान, सुवर्ण की चोरी, गुरू-स्त्री गमन तथा संसर्ग-दोष से हुए अनेक पाप भी इसे नष्ट हो जाते हैं और वह पवित्र हो जाता हैं वह सब तीर्थों का फल भोगता है, पतित के संग भाषण करने से लगे हुए पाप से मुक्त हो जाता है, अपनी पंक्ति मंे भोजन करने वाले सैकड़ो-हजारों पवित्र करने वाला हो जाता है और अन्त में शिवलोक में सायुज्य-मुक्ति पाता है, इससे उसका पुर्नजन्म नहीं होता।

शनैश्चरी अमावस्या – Shanaishchari Amavasya – 18 April 2015

Shani Amavasya 18 April 2015

 

Shani Amavasya 18 April 2015
Shani Amavasya 18 April 2015

जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं- 1. ग्रह दोष, 2. पितृदोष, 3. सहभागी कृत दोष।

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष– आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री– इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य शनि गृह से प्रभावित हैं , उन सभी के लिए ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ तथा “सिद्ध शनि गृह यंत्र लॉकेट (shani yantra locket)” प्राप्त कर लेना चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित किये गए हो। मुद्रिका तथा शनि गृह यंत्र लॉकेट ऐसे होने चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

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कालसर्प योग – KaalSarp Yog

KaalSarp Yog Kundli
KaalSarp Yog Kundli

कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है।

देश भर में हजारों की संख्या में हमारे पाठक वर्ग की ओर से निरंतर पत्र प्राप्त हो रहे थे की कालसर्प योग पर ‘आप का भविष्य’ मे एक विशेष लेख प्रकाशित किया जाये। अब जब ईष्ट की प्रेरणा और प्रभु की इच्छा हुई तब यह ‘कालसर्प योग विशेष’ लेख पाठकों से समक्ष प्रस्तुत है।

कालसर्प योग की शांति के लिए कालसर्प दोष निवारण यंत्र (kaalsarp dosh nivaran yantra) की आराधना करनी चाहिए।

पाठको कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है। पं. जवाहर लाल जी की कुण्डली में भी इसी प्रकार से अनेक राजयोग तथा एक कालसर्प योग बना है। इन दोनो का ही फल उनके जीवन में घटित भी हुआ है। वह लम्बे समय तक जेल में भी रहे थे। उन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति भी नहीं मिली थी। क्योकि उनके पिता ने सारी सम्पत्ति देश को दान दी थी। इस प्रकार वह अपनी पैतृक संपत्ति से वंचित हुये। परंतु कुण्डली में एक से अधिक राजयोगों का निर्माण होने के कारण उन्हें ‘‘शासक’’ का पद भी प्राप्त हुआ।

मैने अपने जीवन में अनेक ऐसे उच्चकोटी के संतों की कुण्डली में भी कालसर्प योग देखा है। परंतु उन सभी संतों का जीवन राष्ट्र के लिये आज भी समर्पित है। यह बिलकुल सत्य है कि वह सभी व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नही कर पाये परंतु जब वह समाज और देश के लिये समर्पित हुये तब उच्चकोटी का सम्मान आज भी उन्हें मिल रहा है। वह सभी किसी न किसी रूप से ट्रस्ट बनाकर संचित धन का राष्ट्र के लिये प्रयोग कर रहे हैं। अतः यह स्पष्ट है कि यह कालसर्प नामक योग व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नहीं करने देता। परंतु देश के लिये या समाज के लिये संकल्पित होने पर यह योग बहुविख्यात करता है।

मैं पाठकों को यह भी बताना चाहता हूँ कि प्रत्येक वह ‘कालसर्प योग’ कालसर्प योग नहीं होता जिस कुण्डली में राहु या केतु के साथ कोई अन्य ग्रह भी विराजमान हों। क्योंकि यदि वह अन्य ग्रह यदि राहु या केतु से डिग्रीयों में इनसे एक डिग्री भी बाहर है तब इस योग का वह प्रभाव मेरे अनुभव में कालसर्प योग जैसा कभी नहीं देखा गया। अतः पहले कुण्डली में इस प्रकार की ग्रहदशा होने पर राहु या केतु के साथ वाले ग्रहों को डिग्रीयों का अवश्य जांच लें।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer

अक्षय तृतीया – Akshaya Tritiya

अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya)

भारत वर्ष संस्कृति प्रधान देश है, सनातन संस्कृति में व्रत और त्यौहारों का विशेष महत्व है। व्रत और त्यौहार नयी प्रेरणा एवं स्फूर्ति का संवहन करते हैं। इससे मानवीय मूल्यों की वृद्धि बनी रहती है और संस्कृति का निरन्तर परिपोषण तथा संरक्षण होता रहता है। भारतीय मनीषियों ने व्रत-व्रर्तों का आयोजन कर व्यक्ति और समाज को पथ भ्रष्ट होने से बचाया है। भारतीय कालगणना के अनुसार चार स्वयं सिद्ध अभिजित् मुहूर्त हैं- चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडीपडवा), आखतीज (अक्षय तृतीया) दशहरा और दीपावती के पूर्व की प्रदोष-तिथि। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया या आखा तृतीया अथवा आखातीज भी कहते हैं।

‘अक्षय’ का अर्थ है- जिसका कभी नाश (क्षय) न हो, अथवा जो स्थायी रहे।

स्थायी वही रह सकता है जो सर्वदा सत्य है। सत्य केवल परमात्मा (ईश्वर) ही है जो अक्षय, अखण्ड और सर्वव्यापक है। यह अक्षय तृतीया तिथि ईश्वर तिथि है। यह अक्षय तिथि परशुरामजी का जन्मदिन होने के कारण ‘परशुराम-तिथि’ भी कही जाती है। परशुरामजी की गिनती चिरंजीवी महात्माओं में की जाती है। अतः यह तिथि चिरंजीवी तिथि भी कहलाती है। चारों युगों (सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग) में से त्रेतायुग का आरम्भ इसी आखातीज से हुआ है।

क्षयधर्मा वस्तुयें- असöावना, असद्विचार, अहंकार, स्वार्थ, काम, क्रोध तथा लोभ पैदा करती हैं जिन्हें भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता (16।18) में आसुरीवृत्ति कहा है। इससे हम त्याग, परोपकार, मैत्री, करूणा और प्रेम पाकर परम शांति पाते हैं, अर्थात् हमें दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है।
सामाजिक पर्व- आखातीज का दिन सामाजिक पर्व का दिन है। इस दिन कोई दूसरा मुहूर्त न देखकर स्वयंसिद्ध अभिजित् शुभ मुहूर्त के कारण विवाहोत्सव आदि मांगलिक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं।

अक्षय ग्रंथ गीता- गीता स्वयं एक अक्षय, अमरनिधि ग्रन्थ है जिसका पठन-पाठन, मनन एवं स्वाध्याय करके हम जीवन की पूर्णता को पा सकते हैं, जीवन की सार्थकता को समझ सकते हैं और अक्षय तत्व को प्राप्त कर सकते हैं। अक्षय तिथि के समान हमारा संकल्प दृढ़, श्रद्धापूर्ण और हमारी निष्ठा अटूट होनी चाहिये। तभी हमें व्रतोपवासों का समग्र आध्यात्मिक फल प्राप्त हो सकता है।

नवान्न का पर्व है, अक्षयतृतीया-

भारतीय लोक-मानस सदैव से ऋतु-पर्व मनाता रहा है। हर ऋतु के परिवर्तन को मंगल भाव के साथ मनाने के लिये व्रत, पर्व और त्यौहारों की एक श्रंृखला लोकजीवन को निरन्तर आबद्ध किये हुये है। इस श्रंृखला में अक्षय तृतीया का पर्व वसन्त और ग्रीष्म के सन्धि काल का महोत्सव है। वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह व्रत-पर्व लोक में बहुश्रुत और बहुमान्य है। विष्णुधर्म सूत्र, मत्स्यपुराण, नारदीय पुराण तथा भविश्यादि पुराणों में इसका विस्तृत उल्लेख है तथा इस व्रत की कई कथायें भी हैं। सनातन-धर्मी गृहस्थजन इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। अक्षय तृतीया को दिये गये दान और किये गये स्नान, जप, तप, हवन आदि कर्मों का शुभ और अनन्त फल मिलता है-
स्नात्वा हुत्वा च दत्त्वा च जप्त्वानन्तफलं लभेत्।

भविष्य पुराण के अनुसार सभी कर्मों का फल अक्षय हो जाता है, इसलिये इसका नाम ‘अक्षय’ पड़ा है।
यदि यह तृतीया कृत्तिका नक्षत्र से युक्त हो तो विशेष फलदायिनी होती है। भविष्य पुराण यह भी कहता है कि इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, क्योंकि कृतयुग (सत्ययुग) का (कल्पभेद से त्रेतायुग का) प्रारम्भ इसी तिथि से हुआ है। इसमें जल से भरे कलश, पंखे, चरणपादुकायें (खड़ाऊँ), पादत्राण (जूता), छाता, गौ, भूमि, स्वर्णपात्र आदि का दान पुण्यकारी माना गया है। इस दान के पीछे यह लोकविश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जायेगा वे समस्त वस्तुयें स्वर्ग मे गर्मी की ऋतु में प्राप्त होंगी। इस व्रत में घड़ा, कुल्हड़, सकोरा आदि रखकर पूजा की जाती है।

बुन्लेदखण्ड में यह व्रत अक्षय तृतीया से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। कुमारी कन्यायें अपने भाई, पिता, बाबा तथा गाँव-घर के, कुटुम्ब के लोगों को सगुन बाँटती हैं, और गीत गाती हैं, जिसमें एक दिन पीहर न जा पाने की कचोट व्यक्त होती है। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिये शकुन निकाला जाता है, और वर्षा की कामना की जाती है तथा लड़कियाँ झुण्ड बनाकर घर-घर जाकर शकुन गीत गाती हैं। लड़के पतंग उड़ाते हैं। ‘सतनजा’ (सात अन्न) से पूजा की जाती है। मालवा में नये घड़े के ऊपर खरबूजा और आम्रपत्र रखकर पूजा होती है। किसानों के लिये यह नववर्ष के प्रारम्भ का शुभ दिन माना जाता है। इस दिन कृषि कार्य का प्रारम्भ शुभ और समृद्धि देगा, ऐसा विश्वास किया जाता है। इसी दिन बदरिकाश्रम में भगवान् बद्रीनाथ के पट खुलते हैं। इसीलिये इस तिथि को श्रीबद्रीनाथजी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और लक्ष्मीनारायण के दर्शन किये जाते हैं। इस तिथि में गंगास्नान को अति पुण्यकारी माना गया है। मृत पित्तरों का तिल से तर्पण, जल से तर्पण और पिण्डदान भी इस दिन इस विश्वास से किया जाता है कि इसका फल अक्षय होगा।
इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था, इसीलिये इनकी जयन्तियाँ भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती हैं। श्रीपरशुराम जी प्रदोषकाल में प्रकट हुये थे इसलिये यदि द्वितीया को मध्याह्न से पहले तृतीया आ जाये तो उस दिन अक्षय तृतीया, नर- नारायण-जयंती, हयग्रीव जयन्ती सभी सम्पन्न की जाती है। इसे परशुराम तीज भी कहते हैं, अक्षय तृतीया बड़ी पवित्र और सुख-सौभाग्य देने वाली तिथि है।

इसी दिन गौरी की पूजा भी होती है। सधवा स्त्रियाँ और कन्यायें गौरी-पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुये चने बाँटती हैं, गौरी-पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न आदि भरकर दान करती हैं। गौरी-विनायकोपेता के अनुसार गौरी पुत्र गणेश की तिथि चतुर्थी का संयोग यदि तृतीया में होता है, तो वह अधिक शुभ फलदायिनी होती है। इस तिथि को सुख-समृद्धि और सफलता की कामना से व्रतोत्सव के साथ ही अस्त्र-शस्त्र, वस्त्र-आभूषण आदि बनवाये, खरीदे और धारण किये जाते हैं। नयी भूमि का क्रय, भवन, संस्था आदि का प्रवेश इस तिथि को शुभ फलदायी माना जाता है।

अक्षय तृतीया में तृतीया तिथि, सोमवार और रोहिणी नक्षत्र तीनों का सुयोग बहुत श्रेष्ठ माना जाता है। किसानों में यह लोकविश्वास है कि यदि इस तिथि को चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी आगे होगी तो फसल के लिये अच्छा होगा और यदि पीछे होगी तो उपज अच्छी नहीं होगी। इस सम्बंध में भड्डरी की कहावतें भी लोक में प्रचलित हैं –

अखै तीज रोहिणी न होई।
पौष अमावस मूल न जोई।।
राखी श्रवणो हीन बिचारो।
कातिक पूनो कृतिका टारो।।
महि माहीं खल बलहिं प्रकासै।
कहत भड्डरी सालि बिनासै।।

अर्थात् वैशाख की अक्षय तृतीया को यदि रोहिणी न हो, पौस की अमावास्या को मूल न हो, रक्षा बन्धन के दिन श्रवण और कार्तिक की पूर्णिमा को कृतिका न हो, तो पृथ्वी पर दुष्टों का बल बढ़ेगा और उस साल धान की उपज न होगी। इस तिथि पर ईख के रस से बने पदार्थ, दही, चावल, दूध से बने व्यंजन, खरबूज, तरबूज और लड्डू का भोग लगाकर दान करने का भी विधान है।

स्कन्द पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेेख है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान् विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम-मंदिरों में इस तिथि को परशुराम-जयंती बड़ी धूम-धाम से मनायी जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। परशुराम-जयंती होने के कारण इस तिथि में भगवान् परशुराम के आविर्भाव की कथा भी कही-सुनी जाती है।

Do Shri yantra pooja on Akshaya Tritiya
shri yantra pooja akshaya tritiya

युग बदला, आवश्यकतायें बदली और मान्यतायें भी बदल गई, आज मानव जीवन का केन्द्र बिन्दु केवल अर्थ और काम में ही सीमित हो गया है, और शेष दोनों धर्म और मोक्ष भी अर्थ पर ही आधारित हो गये हैं। आज व्यक्ति की सर्वप्रथम आवश्यकता केवल आर्थिक ही है, उसके पास धन का न होना, सुखद जीवन का अंत ही माना जाता है। यह पर्व लक्ष्मी-विष्णु की आराधना का विशेष पर्व है। हमारे शास्त्रों मे भी कहा गया है कि यदि लक्ष्मी जी, विष्णु जी के साथ मनुष्य के घर में स्थायी रूप से निवास करें, तो व्यक्ति के जीवन में किसी भी वस्तु तथा भौतिक सुखों का अभाव हो ही नही सकता। हमारे शास्त्रों में इस लिये इस दिन विशेष रूप से ‘श्री यंत्र’ (shri yantra) जो कि माँ लक्ष्मी जी का आधार एवं मनुष्य को जीवन में हर प्रकार का भौतिक सुख और ऐश्वर्य देने वाला है तथा दरिद्रता को जीवन से दूर करने वाला है, इस श्री यंत्र की घर में स्थापना विधान बतलाया गया है।

स्वयं गुरू गोरखनाथ जी ने भी एक स्थान पर कहा है भले ही अन्य सारे प्रयोग असफल हो जायंे, भले ही साधक नया हो, भले ही उसे स्पष्ट मंत्रो के उच्चारण का ज्ञान न हो, परन्तु अक्षय तृतिया के अवसर पर इनको सफलता अवश्य मिलती है। इस पर्व की पूर्णता के बारे में स्पष्ट करते हुये यहाँ तक कहा गया है कि कोई अभागा ही होगा जो इस पावन अवसर को गवायेगा। जिसके भाग्य में दरिद्रता ही लिखी हुई हो, वही ऐसा अवसर चूकेगा। अतः इस मुहूर्त का उपयोग करके व्यक्ति अपने दरिद्रता, अभाव, परेशानियों को हमेशा के लिये अपने जीवन से कोसों दूर भगा सकता है और उसके स्थान पर सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य व उन्नति को प्राप्त करता है। अक्षय तृतीया वाले दिन स्वर्ण-मुद्रा व स्वर्ण आभूषण खरीदने की भी प्रथा है, यह मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य के जीवन व घर-परिवार में सुख-समृद्धि और ऐश्वर्यता आती है।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer

सौभाग्य को चमका देती है ~ सूर्य रेखा

Surya Rekha

मनुष्य के हाथ में- सूर्य-रेखा को ‘रविरेखा’ या ‘तेजस्वी-रेखा’ भी कहा जाता हैं, कारण यह भाग्य-रेखा से होने वाले उज्जवल भविष्य या सौभाग्य को ठीक उसी प्रकार चमका देती हैं जिस प्रकार सूर्य अपने प्रखर प्रकाश से रात्रि के अंधकार को दूर करता है। जिस प्रकार से हिम के ढके हुई पर्वत श्रृंखलाओं को विशेष चमकाता हैं। इससे यह न समझ लेना चाहिये कि सूर्य-रेखा के अभाव में हाथ में पड़ी शुभ भाग्य-रेखा का कोई मूल्य ही नहीं होता या उसका प्रभाव ही मध्यम हो जाता हैं समझने के लिए उपर्युक्त शिखर-श्रृंखलाओं को ही ले लीजिये। वे बर्फ से ढंकी रहती हैं बर्फ का गुण हैं चमकना, चाहे रात्रि हो या दिन; उसके स्वाभाविक गुण चमकने में कोई अन्तर नहीं आता- वह सदा एक सा चमकता ही रहता हैं। सूर्य की किरणों से अन्तर केवल इतना ही होता हैं कि वे अपने सहयोग से उसमें एक विशेष प्रकार की चमक उत्पन्न कर देती है। और वह पहले की अपेक्षा और अधिक चमकने लग जाता है। यही बात रेखाओं के सम्बन्ध में भी है। यदि भाग्यरेखा के साथ सूर्यरेखा भी अधिक बलवान् होकर पड़ी हो तो वह सोने में सुगन्ध का काम करती हैं, अर्थात् यों कहिये कि एक राजा को चक्रवर्ती समा्रट बनाने का काम करती है, यही भाव है।

Surya Rekha
Surya Rekha

यदि किसी के हाथ में भाग्य-रेखा निर्बल हो या उसका सर्वथा ही अभाव हो तो सुन्दर, छोटी सी सूर्य-रेखा के प्रभाव से वह व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) वैसा प्रभावशाली न हो, फिर भी रजोगुणी अवश्य होगा। ऐसे व्यक्ति में सदैव धनाढय होने की, जनता में सम्मान पाने की या कोई बड़ा नेता बनने की अभिलाषाएँ बनी रहती हैं। वह दस्तकार न होकर भी दस्तकारों से प्रेम रखता हैं किसी विषय में पूर्ण ज्ञान रखते हुए भी वह अपनी योग्यता दूसरों पर प्रकट नहीं कर पाता। साधारण शुभ भाग्यरेखा के साथ भी सूर्य-रेखा अधिक उपयोगी समझी जाती है। इसमें संदेह नहीं कि जिस समय यह रेखा (सूर्य-रेखा) मनुष्य के हाथ में आरम्भ होती है उसी समय से उसके भाग्य में कुछ विशेष सुधार होने लग जाता है। यह रेखा निम्नलिखित सात स्थानों से आरम्भ होती है-

(1) मणिबन्ध या उसके समीप से।
(2) चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होकर सूर्यागुंलि की ओर
(3) जीवन-रेखा से।
(4) भाग्य-रेखा से प्रारम्भ होती है।
(5) मंगलक्षेत्र या हथेली के मध्य-भाग से।
(6) मस्तक-रेखा को स्पर्शकर
(7) हृदय-रेखा को स्पर्श करती (सूर्य के स्थान पर जाती है)।

 

इन सात स्थानों से प्रारम्भ होने वाली सूर्य-रेखा हमें समय समय पर हमारी दुर्घटनाओं या हमारे भाग्यसम्बन्धी अनेक अनेक जटिल प्रश्नों को हल करती है। यहां पृथक्-पृथक् सातों प्रकारों का विस्तृत विचार किया जा रहा है।

(1) यदि सूर्य-रेखा मणिबन्ध या उसके समीप से आरम्भ होकर भाग्य-रेखा के निकट समानान्तर अपने स्थान को जा रही हो तो यह सबसे उत्तम मानी गयी है। ऐसी रेखावाला व्यक्ति स्त्री या पुरूष प्रतिभा ओर भाग्य का मेल होने से, जिस काम को हाथ लगाता या आरंभ करता हैं उसमें पूर्णतः सफल होता है।

(2) इसके विपरीत यदि सूर्य-रेखा चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होती हो तो इसमें संदेह नहीं कि उसका भाग्य चमकेगा, पर उसकी यह उन्नति निजी परिश्रम द्वारा न होकर दूसरों की इच्छा ओर सहायता पर अधिक निर्भर करती हैं संभव है, उसे उसके मित्र सहायता करें, या इस सम्बन्ध में अपनी कोई शुभ सम्मति दें जिससे वह उन्नति के पथ पर अग्रसर हो।
चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होकर अनामिकांगुलि तक पहुंचने वाली गहरी सूर्यरेखा के सम्बन्ध में यह बात अवश्य ध्यान में रखने की है। ऐसे व्यक्ति का जीवन अनेक घटनाओं से भरा और संदेह पूर्ण होता है। उसमें बहुुत से परिवर्तन भी होते हें किन्तु यदि रेखा चन्द्रस्थान से निकलकर भाग्य-रेखा के समानान्तर जा रही हो तो भविष्य सुखमय हो सकता है। यदि प्रेम बाधक न हो, और विचारों में दृढ़ता होने के साथ ही साथ मस्तकरेखा भी अपना फल शुभ दे रही हो। निश्चय ही ऐसा व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) तेजस्वी और प्रसन्नचित्त होता है।, फिर भी उसमें एक बड़ा भारी दोष यह पाया जाता है कि उसके विचार कभी स्थिर नहीं रहते। सर्वसारण स्त्री या पुरूषों का उस पर अधिक प्रभाव पड़ता है। और अनायास ही वह अपने पूर्वनिश्चित विचारों को बदल देता हैं वह यश पाने की इच्छा करता है, किन्तु अपने संकल्प पर दृढ़ न रह सकने के कारण अपने प्रयत्नों अधिक सफल नहीं होता।

(3) जीवन-रेखा से आरम्भ होने वाली स्पष्ट सूर्य-रेखा भविष्य में उन्नति और यश बढाने वाली मानी गयी हैं किन्तु यह उन्नति उसके निजी परिश्रम और योग्यता से ही होती है। एक व्यावसायिक हाथ को छोड़कर शेष सभी हाथों में इसके प्रभाव से मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी कला में पूरी उन्नति कर सकता है। यह रेखा उपर्युक्त दशा में स्त्री या पुरूष के शीघ्र ग्राही होने का भी एक अचूक प्रमाण है ऐसे व्यक्ति सुन्दरता के पुजारी होते हैं ओर अपने जीवन का एक बड़ा भाग सौन्दर्य-उपासना में ही बिताते हैं यही कारण हैं कि वे उन स्त्री-पुरूषों की अपेक्षा, जिनकी सूर्य-रेखा स्वयं भाग्यरेखा से आरंभ हो रही हो, जीवन का अधिक उपभोग नहीं कर पाते।

(4) यदि यह रेखा भाग्य-रेखा से आरम्भ होती हो तो भाग्यरेखा के गुणों में वृद्धिकर उसकी शक्ति दूगनी कर देती है, प्रायः देखा गया है कि यह रेखा जिस स्थान से भाग्य-रेखा से ऊपर उठती है वहीं से किसी विशेष उत्कर्ष या उन्नति का आरम्भ होता है। रेखा जितनी ही अधिक स्पष्ट और सुन्दर होगी, उन्नति का क्षेत्र उतना ही विस्तृत और उन्नति भी अधिक होगी। ऐसी सूर्य-रेखा प्रायः ऐसे हाथों में भी दिख पड़ती है जो चित्रकार होना तो दूर रहा, एक सीधी रेखा भी नहीं खीच सकते। वे रंगों के अनुभवी भी इतने होते हैं कि पीले और गुलाबी रंग का अन्तर जानना भी उनकी शक्ति से बाहर की बात होती हैं अतः स्पष्ट है कि ऐसी रेखा वाला व्यक्ति कुशल कलाकार या दस्तकार नहीं हो सकता। हाँ, वह सुन्दरता का पुजारी और प्राकृतिक दृश्यों का प्रेमी अवश्य होता हैं दूसरे शब्दों में सुन्दरता तथा प्रकृति से प्रेम करना उनका एक स्वाभाविक गुण ही हो जाता हैं।

(5) मंगलक्षेत्र या हथेली के मध्यभाग से प्रारभ होने वाली सूर्य-रेखा अनेक अपत्ति और बाधाओं के बाद उन्नति सूचित करती है इसका सहायक मंगलक्षेत्र होता है यदि किसी के हाथ का मंगलक्षेत्र उच्च हो तो वह बहुत उन्नति करता है किन्तु मंगलकृत कष्ट भोग लेने के पश्चात् ही वह अपनी उन्नति कर पाता है।

(6) यदि यह रेखा मस्तकरेखा से आरंभ होती हो और स्पष्ट हो तो वह मानव के जीवन के मध्यकाल में (करीब 35 वें वर्ष) तक उन्नति करता है उसकी यह उन्नति जातीय योग्यता और मस्तिष्क शक्ति के अुनसार होती है।

(7) हृदय-रेखा से आरम्भ होने वाली सूर्य-रेखा जीवन के उत्तरकाल में मानव की उन्नति करती है। यह अवस्था लगभग 56 वर्ष की होगी, किन्तु एतदर्थ हृदयरेखा से ऊपर सूर्यरेखा का स्पष्ट होना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में उस स्त्री या पुरूष के जीवन का चैथा चरण सुखमय या कम से कम निरापदा बीतता है। इसके विपरीत यदि हृदय-रेखा से ऊपर सूर्य-रेखा का सर्वथा अभाव हो या वह छोटे-छोटे टुकडों से बनी या टूटी-फूटी हो तो जीवन का चैथाकाल चिन्ताओं से भरा और अन्धकारमय व्यतीत होगा, विशेषतः तब जब कि भाग्य रेखा निराशाजनक हो।

यदि सूर्य-रेखा और भाग्यरेखा दोनों ही शुभफल देने वाली होकर एक दूसरी के समानान्तर जा रही हों, साथ ही मस्तक-रेखा भी स्पष्ट और सीधी हो तो वह धनाढ़य और ऐश्वर्यपूर्ण होने का सबसे बड़ा लक्षण है। ऐसे योगवाला व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) बुद्धिमान् और दूरदर्शी होने के कारण जिस काम को हाथ लगाता हैं उसी में सफल होता है।

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यदि हाथ में सूर्य की अंगुली पहली अंगुली तर्जनी से अधिक लम्बी और बीच की मध्यमांगुलि के बराबर हो, साथ ही सूर्य-रेखा से अधिक बलवान् हो तो उस मनुष्य की प्रवृत्ति जुआ खेलने की ओर अधिक पायी जाती है, किन्तु उसमें धन या गुणों का अभाव नहीं होता। हाँ, कभी-कभी यदि मस्तक-रेखा नीचे की ओर झुकी हो तो उसका और भी अधिक बुरा प्रभाव पड़ता हैं जैसे-सदा सट्टा, लाटरी या जुआ खेलना, शर्त लगाना आदि।

यदि सूर्य-रेखा सूर्यक्षेत्र की ओर न जाकर शनि की अंगुली की ओर जा रही हो तो उस व्यक्ति की उन्नति या सफलता शोक और कठिनाइयों से मिली होती हैं। ऐसे व्यक्ति धनवान और उन्नतिशील होकर भी प्रायः सुखी नहीं रह पाते। यदि यह रेखा शनिक्षेत्र को काट रही हो या अपनी कोई शाखा गुरूक्षेत्र की ओर भेज रही हो तो उसकी उन्नति या सफलता कोई शासन-अधिकार अथवा राज्य द्वारा उच्च पद्वी पाने के रूप में होगी। परन्तु रेखा का यह लक्षण किसी भी दशा में इतना प्रभाव पूर्ण नहीं हो सकता जितना भाग्य-रेखा के गुरू अंगुली की ओर जाने के सम्बन्ध में हो सकता है।

प्रायः देखा गया है कि छोटी-छोटी एक या एक से अधिक रेखाएँ एक दूसरी के समानान्तर में सूर्यक्षेत्र पर दौड़ती पायी जाती हैं। ऐसे योगवाले व्यक्ति के विचार बिखरे होते हैं वह कभी कुछ करना चाहता है तो कभी कुछ। अतएव वह व्यापार, चित्रकारी या कला-कौशल किसी भी विशेष काम में कभी उन्नति नहीं कर पाता। सूर्यरेखा के साथ कुछ ऐसे चिन्ह भी पाये जाते हैं जो भाग्योन्नति में बाधा डालते हैं उदाहरणार्थ-हथेली यदि अधिक गहरी हो तो वह अशुभ लक्षण हैं।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer