ज्योतिष की नजर में शेयर बाज़ार – July 2015

Share Market in July-2015 in Astrology

जुलाई में व्यापार का आरम्भ 1 तारीख को बुधवार के दिन होगा आरम्भ के समय सूर्यदेव मंगलदेव के साथ मिथुन राशी में होंगे, चन्द्रमा धनु में , बुधदेव वृषभ में, गुरुदेव शुक्रदेव के साथ कर्क में, शनिदेव वृश्चिक में, राहुदेव कन्या में और केतुदेव मीन राशि में होंगे|

ग्रहों के प्रभाव स्वरूप बाजार सकारात्मक रूप से खुलने की  प्रबल आशा रहेगी लेकिन प्रत्येक तेजी पर जिस भी सेक्टर में लाभ मिले  लाभ कमाना ठीक रहेगा तेल, तिलहन, चीनी-चावल, मिलो और F.M.C.G. उद्योग में बिकवाली को प्राथमिकता देना ठीक रहेगा UNITED SPIRIT, ITC, HIND UNI, BRITANNIA, RUCHI SOYA, MARICO., EMAMI में लाभ कमाना ठीक रहेगा, ऐश्वर्य विलासिता और रिटेल ,फेशन, होटल, रेस्टोरेंट, फ़ूड चेन आदि में FUTURE RETAIL, TITAN, ARVIND, TBJ, MONT CARLO, GEETANJALI GEMS, JUBILANT FOOD, SPECIALTY RESTAURANT में भी लाभ कमाना ठीक रहेगा क्यों की असंतुलित वर्षा और मौसम की अनियमितता के चलते इनमे  गिरावट कि प्रबल सम्भावना रहेगी पहली तिमाही के परिणामो के भी नकारात्मक रहने  के समाचारो से बाजार में निवेशकों का अभाव रहेगा विदेशी व्यापार में भी घाटे के संकेत नज़र आने से रूपये के अवमूल्य्न की भी आशा रहेगी इसलिए किसी भी नवीन निवेश से दूर ही रहना ठीक रहेगा।

सरकारी हस्तक्षेप और नियमो की सख्ती के चलते रियल्टी, इंफ्रास्टक्चर के प्रोजेक्ट में देरी की संभावना बनेगी जिसके चलते, सीमेंट और स्टील की मांग में भी कमी रहने की आशा रहेगी लेकिन प्रत्येक गिरावट पर ACC, AMBUJA, ULTRA TECH, SHREE CEMENT, SAIL, TATA STEEL, JSW STEEL में निवेश करना ठीक रहेगा अंतिम सप्ताह में हास्पिटल मेडिसन और फार्मा सेक्टर में गिरावट का रुख रहेगा ऐसे में GSK PHARMA, DR REDDY, BIOCON, APPOLO HOSPITAL में निवेश  के  लिए एक उचित   अवसर रहेगा माह के अंत में बाज़ार गिरावट  के साथ बंद होने की आशा रहेगी।

नोट: – उपरोक्त फलादेश गृह स्थिति पर आधारित हे, इसका उद्धेश्य पाठको का मार्ग दर्शन करना है। कोई भी निर्णय लेने से पहले बाज़ार को प्रभावित करने वाले अन्य कारणों पर भी ध्यान दे| सट्टा खेलने की प्रवर्ति, निर्णय में गलती एवं निजी भाग्यहीनता के कारण होने वाले किसी भी नुकसान के लिए लेखक, सम्पादक, समाचार पत्र, वेबसाइट आदि की कोई जिम्मेदारी नही होगी।

Shivpuran & Rudraksha – शिवपुराण में रूद्राक्ष

14 Mukhi Rudraksha

रूद्राक्षोपनिषद्वैद्यं महा्रयद्रत्योज्ज्वलम्।
प्रतियोगिविनिर्मुक्तं शिवमात्रपदं भजे।।

‘रूद्राक्ष-उपनिषद् से जानने योग्य, महारूद्ररूप से उज्जवल, प्रतियोगीरहित, शिवषदवाच्य तत्त्व की मैं शरण लेता हूँ। हरिः ओम्।
भुसुण्ड नाम के ऋषि ने कालाग्निरूद्र से पूछा कि, ‘रूद्राक्ष की उत्पत्ति किस प्रकार हुई तथा उसके धारण करने से क्या फल मिलता है – इसे आप लोकहित के लिए कृपा करके कहिये।’ कालाग्निरूद्र भगवान् ने कहा कि ‘त्रिपुरासुर नामक दैत्य का नाश करने के लिये मैंने नेत्रों को बंद कर लिया था। उस समय मेरी आंखों में से जल के बिन्दु पृथ्वी पर गिरे और वही रूद्राक्ष रूप में परिणत हो गये। सर्वलोक के अनुग्रह के लिये मैं यह बतलाता हूँ कि उनके नामोच्चारण मात्र से गो-दान का फल, और दर्शन तथा स्पर्श से दुगुने फल प्राप्त होता है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता।’ इस संबंध में नीचे लिखी उक्ति है-
भुसुण्ड ऋषि ने पूछा कि ‘वह रूद्राक्ष कहाँ स्थित है, उसका क्या नाम है, वह किस प्रकार मनुष्यों के द्वारा धारण किया जाता है, कितने प्रकार के इसके मुख हैं और किन मन्त्रों से इसे धारण किया जाता है- आदि सब बातें कृपा करके कहिये।’

14 Mukhi Rudraksha
14 Mukhi Rudraksha

श्रीकालाग्निरूद्र बोले – ‘देवताओं के हजारों वर्षों तक मैने अपनी आँखे खुली रखीं। उस समय मेरी आँखों से जल की बूंदें पृथ्वी पर गिर पड़ी। वे आंसू की बूंदे भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने के लिये स्थावरत्व को प्राप्तकर महारूद्राक्ष नामक वृक्ष हो गये। रूद्राक्ष धारण करने से भक्तों के रात-दिन के पाप नष्ट होते हैं, उसका दर्शन करने से लाखों गुना पुण्य मिलता है। जो मनुष्य रूद्राक्ष धारण कर रूद्राक्ष की माला से इष्टदेव का जप करता है उसे अनन्तगुने पुण्य की प्राप्ति होती है। आंवले के फल के समान आकार वाला रूद्राक्ष उत्तम होता है, बेर के समान आकार वाला मध्यम और चने के समान आकार वाला कनिष्ठ होता है। अब उसके धारण करने की प्रक्रिया कहता हूँ सुनो। श्रीशंकर भगवान् की आज्ञा से पथ्वी पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र चार जाति के रूद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए। प्रत्येक जाति के मनुष्य को अपनी-अपनी जाति के रूद्राक्ष ही फलदायक होते हैं। श्वेत रूद्राक्ष को ब्राह्मण, लाल को क्षत्रिय, पीले को वैश्य और काले को शुद्र जानना चाहिये और ब्राह्मण को श्वेत रूद्राक्ष धारण करना चाहिये, क्षत्रिय को लाल, वैश्य को पीला और शुद्र को काला रूद्राक्ष पहनना चाहिये। आकार में एक समान, चिकने, पक्के (मजबूत) मोटे तथा कांटोंवाले रूद्राक्ष के दाने शुभ होते हैं। कीड़ा लगे हुए, टूटे-फूटे, बिना कांटों के, छिद्रयुक्त तथा बिना जुड़े हुए- इन छः प्रकार के रूद्राक्षों का त्याग करना चाहिये। जिस रूद्राक्ष में स्वयंमेव बना हुआ छिद्र किया हुआ हो उसे मध्यम जानना चाहिये। शास्त्र में लिखे अनुसार एक समान, चिकने, पक्के एवं मोटे दानों को रेशम के धागे में पिरोकर शरीर के तत्तद् अवयव में धारण करें। जिस रूद्राक्ष की माला कसौटी के पत्थर सुवर्ण की रेखा के समान जान पड़े वह रूद्राक्ष उत्तम है, ऐसे रूद्राक्ष को शिव-भक्त धारण करें। शिखा में एक रूद्राक्ष, सिर पर तीस, गले में छत्तीस, दोनो बाहुओं में सोलह, कलाई में बारह और कन्धे पर पचास दाने धारण करें और एक सौ आठ रूद्राक्षों की माला का यज्ञोपवीत बनावंे। दो, पांच अथवा सात लड़ो की माला कण्ठ-प्रदेश-में धारण करें। मुकुट में, कुण्डल में, कर्णफूल में तथा हार में भी रूद्राक्ष धारण करें। बाजूबन्द में, कड़े में, विशेष कर कर धनी में, सोते-जागते, खाते-पीते सर्वदा मनुष्य को रूद्राक्ष धारण करना चाहिये। तीन सौ रूद्राक्ष धारण करना अधम, पांच सौ मध्यम और एक हजार उत्तम है। बुद्धिमान पुरूष-

ऊँ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः ब्रह्माधिपतिब्र्रह्मणः शिवो में अस्तु सदाशिवोम्।
– इस मन्त्र से मस्तक में,

ऊँ तत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूदः प्रचोदयात्।
– इस मन्त्र से कण्ठ में,

ऊँ अधोरेम्योऽथ घोरेभ्यो घोरधोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रूद्ररूपेभ्यः।
इस मन्त्र से गले, हृदय और हाथों में धारण करे।

गूंथे हुए पचास रूद्राक्षों को चतुर मनुष्य आकाश के समान व्यापक पेटपर धारण करें और मूल मन्त्रों से तीन, पांच अथवा सात लड़ों में गूंथी हुई माला को धारण करें। इसके बाद भुसुण्ड ऋषिः ने महाकालाग्निरूद्र भगवान् से पूछा कि, ‘रूद्राक्ष के भेद से जो रूद्राक्ष जिस स्वरूप वाला और जिस फल को देने वाला, मुखयुक्त, दुष्ट का नाश करने वाला और इच्छामात्र से शुभ फल को देने वाला है वह स्वरूप मुझे कहिये।’ इस विषय पर निम्नलिखित उक्ति है-

‘हे मुनिश्रेष्ठ! एक मुखवाला रूद्राक्ष परब्रह्मस्वरूप है और जितेन्द्रिय पुरूष उसको धारण कर परब्रह्मस्वरूप में लीन हो जाता है। दो मुखवाला रूद्राक्ष अर्धनारीश्वर भगवान् का स्वरूप है, उसको जो नित्य धारण करता है उस पर अर्धनारीश्वर भगवान् सदा प्रसन्न रहते हैं। तीन मुखवाला रूद्राक्ष त्रिविध अग्नि का स्वरूप है, उसके पहनने वालों पर अग्निदेव सदा प्रसन्न रहते हैं। चार मुखवाला रूद्राक्ष चतुर्मख ब्रह्मा का स्वरूप है और उसको धारण करने वाले पर चतुर्मुख ब्रह्मदेव सदा प्रसन्न रहते हैं। पांच मुखवाला रूद्राक्ष पाँच ब्रह्ममन्त्रों का स्वरूप हैं और उसके धारण करने वाले को पंचमुख भगवान् शिव, जो स्वयं ब्रह्मरूप हैं, नरहत्या से भी मुक्त कर देते हैं। छः मुखवाला रूद्राक्ष कार्तिकेय स्वामी का स्वरूप हैं, उसके धारण करने से महान् ऐश्वर्य एवं उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है। बुद्धिमान् एवं ज्ञानी पुरूष ज्ञान और सम्पत्ति की शुद्धि के लिये इस रूद्राक्ष को धारण करें। इसे विद्वान् लोग विनायकदेव का स्वरूप भी कहते हैं। उसके धारण करने से अटूट लक्ष्मी तथा पूर्ण आरोग्य की प्राप्ति का स्वरूप है और आठ वसुदेवताओं को तथा गंगाजी को प्रिय है। उसके धारण करनेवाले पर ये सत्यवादी अष्टवसु प्रसन्न होते हैं। नव मुखवाला रूद्राक्ष नवदुर्गा का स्वरूप हैं, उसके धारण करने मात्र से नवदुर्गायें प्रसन्न होती हैं। इस मुखवाले रूद्राक्ष को यम का स्वरूप कहते हैं। यह दर्शनमात्र से शांति प्रदान करने वाला है, तो फिर उसके धारण करने से शांति मिलने में कोई संदेह ही नहीं है। ग्यारह मुखवाला रूद्राक्ष एकादश रूद्र का स्वरूप है, उसे धारण करने वाले को वह तद्रूप करने वाला ओर सौभाग्य प्रदान करने वाला है। बाहर मुखवाला रूद्राक्ष महाविष्णु का स्वरूप है, वह बारह आदित्य के समान स्वरूप प्रदान करने वाला है। तेरह मुखवाला रूद्राक्ष इच्छित फल तथा सिद्धि प्रदान करने वाला है, इसके धारण मात्र से परमेश्वर प्रसन्न होते हैं।

‘चैदह’ मुखवाला रूद्राक्ष (14 mukhi Rudraksha) रूद्र के नेत्र से उत्पन्न हुआ है, वह सर्व व्याधि को हरने वाला तथा सदा आरोग्य प्रदान करने वाला है। रूद्राक्ष धारण करने वाले पुरूष को मद्य, मांस, लहसुन, प्याज, सहिंजन, बहुयार (लहटोर), विड्वराह (ग्राम्यशूकर)-इन अभक्ष्यों का त्याग करना चाहिये। ग्रहण के समय, मेष-संक्रान्ति, उत्तरायण, अन्य संक्रान्ति, अमावास्या, पूर्णिमा तथा पूर्ण दिनों में रूद्राक्ष धारण करने से तत्काल, मनुष्य सर्व पापों से छूट जाता है। रूद्राक्ष का मूल ब्रह्मा, विष्णु मध्यभाग और उसका मुख रूद्र है और उसके बिन्दु सब देवता कहे गये हैं।

अनन्तर अनत्कुमारी ने कालाग्निरूद्र भगवान् से रूद्राक्ष धारण करने की विधि पूछी। उसी समय निशाद, जड़भरत, दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिल, वशिष्ठ, पिप्लाद आदि ऋषि भी उनके समीप आ गये। भगवान् कालिग्नरूद्र ने उनके आने का प्रयोजन पूछा, तब उन्होंने यही कहा कि हम सब रूद्राक्ष-धारण विधि को सुनना चाहते हैं। तत्पश्चात् भगवान् कालाग्निरूद्र ने कहा कि, ‘रूद्र के नयनों से उत्पन्न होने के कारण ही इनकी रूद्राक्ष-संज्ञा हुई है। भगवान् सदशिव संहारकाल में संहार करके अपने संहार नेत्र को बंद कर लेते हैं, उस नेत्र में से रूद्राक्ष के उत्पन्न होने के कारण उसका नाम ‘रूद्राक्ष’ प्रसिद्ध हुआ है। रूद्राक्ष का नाम उच्चारण करने से दस गो-दान का फल मिलता है। वही यह ‘भस्मज्योति’ रूद्राक्ष है। उस रूद्राक्ष को हाथ से स्पर्शकर धारण करने से दो हजार गो-दान का फल मिलता है तथा एकादश रूद्रत्य की प्राप्ति होती है। उस रूद्राक्ष को सिर पर धारण करने से कोटि गो-दान का फल मिलता है। जो मनुष्य इस रूद्राक्ष जाबालोपनिषद्का नित्य पाठ करता है अथवा उसके रहस्य को जानता है यह बालक या युवा, महान् हो जाता है, वह सबका गुरू और मन्त्रों का उपदोश करने वाला हो जाता है। रूद्राक्ष को पहनकर होम करना चाहिए, इन्हीं का धारण करके पूजन करना चाहिए, इसी प्रकार यह रूद्राख राक्षसों का नाश करने वाला तथा मृत्यु से तारने वाला है। रूद्राक्ष को गुरू से लेकर कण्ठ, बाँह और शिखा में बाँधें। रूद्राक्ष के दाता गुरू को गुरूदक्षिणा में सप्तद्वीप वाली पृथ्वी का दान भी अपूर्ण ही है, इसलिये उसे श्रद्धापूर्वक कम-से-कम एक गाय का दान करें यह गो-दान ही शिष्य को फल देता है। जो ब्राह्मण इस उपनिषद का सांयकाल में पाठ करता है। उसके दिन के पाप नष्ट हो जाते हैं, मध्याह्न में पाठ करने से छः जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा प्रातःकाल पाठ करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और छः अरब गायत्री जप का फल मिलता है। ब्रह्महत्या, मदिरापान, सुवर्ण की चोरी, गुरू-स्त्री गमन तथा संसर्ग-दोष से हुए अनेक पाप भी इसे नष्ट हो जाते हैं और वह पवित्र हो जाता हैं वह सब तीर्थों का फल भोगता है, पतित के संग भाषण करने से लगे हुए पाप से मुक्त हो जाता है, अपनी पंक्ति मंे भोजन करने वाले सैकड़ो-हजारों पवित्र करने वाला हो जाता है और अन्त में शिवलोक में सायुज्य-मुक्ति पाता है, इससे उसका पुर्नजन्म नहीं होता।

शनैश्चरी अमावस्या – Shanaishchari Amavasya – 18 April 2015

Shani Amavasya 18 April 2015

 

Shani Amavasya 18 April 2015
Shani Amavasya 18 April 2015

जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं- 1. ग्रह दोष, 2. पितृदोष, 3. सहभागी कृत दोष।

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष– आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री– इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य शनि गृह से प्रभावित हैं , उन सभी के लिए ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ तथा “सिद्ध शनि गृह यंत्र लॉकेट (shani yantra locket)” प्राप्त कर लेना चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित किये गए हो। मुद्रिका तथा शनि गृह यंत्र लॉकेट ऐसे होने चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

सिद्ध शनि गृह यंत्र लॉकेट (shani yantra locket) हमारे कार्यालय से प्राप्त करें। क्लिक करें । 

कालसर्प योग – KaalSarp Yog

KaalSarp Yog Kundli
KaalSarp Yog Kundli

कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है।

देश भर में हजारों की संख्या में हमारे पाठक वर्ग की ओर से निरंतर पत्र प्राप्त हो रहे थे की कालसर्प योग पर ‘आप का भविष्य’ मे एक विशेष लेख प्रकाशित किया जाये। अब जब ईष्ट की प्रेरणा और प्रभु की इच्छा हुई तब यह ‘कालसर्प योग विशेष’ लेख पाठकों से समक्ष प्रस्तुत है।

कालसर्प योग की शांति के लिए कालसर्प दोष निवारण यंत्र (kaalsarp dosh nivaran yantra) की आराधना करनी चाहिए।

पाठको कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है। पं. जवाहर लाल जी की कुण्डली में भी इसी प्रकार से अनेक राजयोग तथा एक कालसर्प योग बना है। इन दोनो का ही फल उनके जीवन में घटित भी हुआ है। वह लम्बे समय तक जेल में भी रहे थे। उन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति भी नहीं मिली थी। क्योकि उनके पिता ने सारी सम्पत्ति देश को दान दी थी। इस प्रकार वह अपनी पैतृक संपत्ति से वंचित हुये। परंतु कुण्डली में एक से अधिक राजयोगों का निर्माण होने के कारण उन्हें ‘‘शासक’’ का पद भी प्राप्त हुआ।

मैने अपने जीवन में अनेक ऐसे उच्चकोटी के संतों की कुण्डली में भी कालसर्प योग देखा है। परंतु उन सभी संतों का जीवन राष्ट्र के लिये आज भी समर्पित है। यह बिलकुल सत्य है कि वह सभी व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नही कर पाये परंतु जब वह समाज और देश के लिये समर्पित हुये तब उच्चकोटी का सम्मान आज भी उन्हें मिल रहा है। वह सभी किसी न किसी रूप से ट्रस्ट बनाकर संचित धन का राष्ट्र के लिये प्रयोग कर रहे हैं। अतः यह स्पष्ट है कि यह कालसर्प नामक योग व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नहीं करने देता। परंतु देश के लिये या समाज के लिये संकल्पित होने पर यह योग बहुविख्यात करता है।

मैं पाठकों को यह भी बताना चाहता हूँ कि प्रत्येक वह ‘कालसर्प योग’ कालसर्प योग नहीं होता जिस कुण्डली में राहु या केतु के साथ कोई अन्य ग्रह भी विराजमान हों। क्योंकि यदि वह अन्य ग्रह यदि राहु या केतु से डिग्रीयों में इनसे एक डिग्री भी बाहर है तब इस योग का वह प्रभाव मेरे अनुभव में कालसर्प योग जैसा कभी नहीं देखा गया। अतः पहले कुण्डली में इस प्रकार की ग्रहदशा होने पर राहु या केतु के साथ वाले ग्रहों को डिग्रीयों का अवश्य जांच लें।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer

अक्षय तृतीया – Akshaya Tritiya

अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya)

भारत वर्ष संस्कृति प्रधान देश है, सनातन संस्कृति में व्रत और त्यौहारों का विशेष महत्व है। व्रत और त्यौहार नयी प्रेरणा एवं स्फूर्ति का संवहन करते हैं। इससे मानवीय मूल्यों की वृद्धि बनी रहती है और संस्कृति का निरन्तर परिपोषण तथा संरक्षण होता रहता है। भारतीय मनीषियों ने व्रत-व्रर्तों का आयोजन कर व्यक्ति और समाज को पथ भ्रष्ट होने से बचाया है। भारतीय कालगणना के अनुसार चार स्वयं सिद्ध अभिजित् मुहूर्त हैं- चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडीपडवा), आखतीज (अक्षय तृतीया) दशहरा और दीपावती के पूर्व की प्रदोष-तिथि। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया या आखा तृतीया अथवा आखातीज भी कहते हैं।

‘अक्षय’ का अर्थ है- जिसका कभी नाश (क्षय) न हो, अथवा जो स्थायी रहे।

स्थायी वही रह सकता है जो सर्वदा सत्य है। सत्य केवल परमात्मा (ईश्वर) ही है जो अक्षय, अखण्ड और सर्वव्यापक है। यह अक्षय तृतीया तिथि ईश्वर तिथि है। यह अक्षय तिथि परशुरामजी का जन्मदिन होने के कारण ‘परशुराम-तिथि’ भी कही जाती है। परशुरामजी की गिनती चिरंजीवी महात्माओं में की जाती है। अतः यह तिथि चिरंजीवी तिथि भी कहलाती है। चारों युगों (सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग) में से त्रेतायुग का आरम्भ इसी आखातीज से हुआ है।

क्षयधर्मा वस्तुयें- असöावना, असद्विचार, अहंकार, स्वार्थ, काम, क्रोध तथा लोभ पैदा करती हैं जिन्हें भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता (16।18) में आसुरीवृत्ति कहा है। इससे हम त्याग, परोपकार, मैत्री, करूणा और प्रेम पाकर परम शांति पाते हैं, अर्थात् हमें दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है।
सामाजिक पर्व- आखातीज का दिन सामाजिक पर्व का दिन है। इस दिन कोई दूसरा मुहूर्त न देखकर स्वयंसिद्ध अभिजित् शुभ मुहूर्त के कारण विवाहोत्सव आदि मांगलिक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं।

अक्षय ग्रंथ गीता- गीता स्वयं एक अक्षय, अमरनिधि ग्रन्थ है जिसका पठन-पाठन, मनन एवं स्वाध्याय करके हम जीवन की पूर्णता को पा सकते हैं, जीवन की सार्थकता को समझ सकते हैं और अक्षय तत्व को प्राप्त कर सकते हैं। अक्षय तिथि के समान हमारा संकल्प दृढ़, श्रद्धापूर्ण और हमारी निष्ठा अटूट होनी चाहिये। तभी हमें व्रतोपवासों का समग्र आध्यात्मिक फल प्राप्त हो सकता है।

नवान्न का पर्व है, अक्षयतृतीया-

भारतीय लोक-मानस सदैव से ऋतु-पर्व मनाता रहा है। हर ऋतु के परिवर्तन को मंगल भाव के साथ मनाने के लिये व्रत, पर्व और त्यौहारों की एक श्रंृखला लोकजीवन को निरन्तर आबद्ध किये हुये है। इस श्रंृखला में अक्षय तृतीया का पर्व वसन्त और ग्रीष्म के सन्धि काल का महोत्सव है। वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह व्रत-पर्व लोक में बहुश्रुत और बहुमान्य है। विष्णुधर्म सूत्र, मत्स्यपुराण, नारदीय पुराण तथा भविश्यादि पुराणों में इसका विस्तृत उल्लेख है तथा इस व्रत की कई कथायें भी हैं। सनातन-धर्मी गृहस्थजन इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। अक्षय तृतीया को दिये गये दान और किये गये स्नान, जप, तप, हवन आदि कर्मों का शुभ और अनन्त फल मिलता है-
स्नात्वा हुत्वा च दत्त्वा च जप्त्वानन्तफलं लभेत्।

भविष्य पुराण के अनुसार सभी कर्मों का फल अक्षय हो जाता है, इसलिये इसका नाम ‘अक्षय’ पड़ा है।
यदि यह तृतीया कृत्तिका नक्षत्र से युक्त हो तो विशेष फलदायिनी होती है। भविष्य पुराण यह भी कहता है कि इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, क्योंकि कृतयुग (सत्ययुग) का (कल्पभेद से त्रेतायुग का) प्रारम्भ इसी तिथि से हुआ है। इसमें जल से भरे कलश, पंखे, चरणपादुकायें (खड़ाऊँ), पादत्राण (जूता), छाता, गौ, भूमि, स्वर्णपात्र आदि का दान पुण्यकारी माना गया है। इस दान के पीछे यह लोकविश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जायेगा वे समस्त वस्तुयें स्वर्ग मे गर्मी की ऋतु में प्राप्त होंगी। इस व्रत में घड़ा, कुल्हड़, सकोरा आदि रखकर पूजा की जाती है।

बुन्लेदखण्ड में यह व्रत अक्षय तृतीया से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। कुमारी कन्यायें अपने भाई, पिता, बाबा तथा गाँव-घर के, कुटुम्ब के लोगों को सगुन बाँटती हैं, और गीत गाती हैं, जिसमें एक दिन पीहर न जा पाने की कचोट व्यक्त होती है। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिये शकुन निकाला जाता है, और वर्षा की कामना की जाती है तथा लड़कियाँ झुण्ड बनाकर घर-घर जाकर शकुन गीत गाती हैं। लड़के पतंग उड़ाते हैं। ‘सतनजा’ (सात अन्न) से पूजा की जाती है। मालवा में नये घड़े के ऊपर खरबूजा और आम्रपत्र रखकर पूजा होती है। किसानों के लिये यह नववर्ष के प्रारम्भ का शुभ दिन माना जाता है। इस दिन कृषि कार्य का प्रारम्भ शुभ और समृद्धि देगा, ऐसा विश्वास किया जाता है। इसी दिन बदरिकाश्रम में भगवान् बद्रीनाथ के पट खुलते हैं। इसीलिये इस तिथि को श्रीबद्रीनाथजी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और लक्ष्मीनारायण के दर्शन किये जाते हैं। इस तिथि में गंगास्नान को अति पुण्यकारी माना गया है। मृत पित्तरों का तिल से तर्पण, जल से तर्पण और पिण्डदान भी इस दिन इस विश्वास से किया जाता है कि इसका फल अक्षय होगा।
इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था, इसीलिये इनकी जयन्तियाँ भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती हैं। श्रीपरशुराम जी प्रदोषकाल में प्रकट हुये थे इसलिये यदि द्वितीया को मध्याह्न से पहले तृतीया आ जाये तो उस दिन अक्षय तृतीया, नर- नारायण-जयंती, हयग्रीव जयन्ती सभी सम्पन्न की जाती है। इसे परशुराम तीज भी कहते हैं, अक्षय तृतीया बड़ी पवित्र और सुख-सौभाग्य देने वाली तिथि है।

इसी दिन गौरी की पूजा भी होती है। सधवा स्त्रियाँ और कन्यायें गौरी-पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुये चने बाँटती हैं, गौरी-पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न आदि भरकर दान करती हैं। गौरी-विनायकोपेता के अनुसार गौरी पुत्र गणेश की तिथि चतुर्थी का संयोग यदि तृतीया में होता है, तो वह अधिक शुभ फलदायिनी होती है। इस तिथि को सुख-समृद्धि और सफलता की कामना से व्रतोत्सव के साथ ही अस्त्र-शस्त्र, वस्त्र-आभूषण आदि बनवाये, खरीदे और धारण किये जाते हैं। नयी भूमि का क्रय, भवन, संस्था आदि का प्रवेश इस तिथि को शुभ फलदायी माना जाता है।

अक्षय तृतीया में तृतीया तिथि, सोमवार और रोहिणी नक्षत्र तीनों का सुयोग बहुत श्रेष्ठ माना जाता है। किसानों में यह लोकविश्वास है कि यदि इस तिथि को चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी आगे होगी तो फसल के लिये अच्छा होगा और यदि पीछे होगी तो उपज अच्छी नहीं होगी। इस सम्बंध में भड्डरी की कहावतें भी लोक में प्रचलित हैं –

अखै तीज रोहिणी न होई।
पौष अमावस मूल न जोई।।
राखी श्रवणो हीन बिचारो।
कातिक पूनो कृतिका टारो।।
महि माहीं खल बलहिं प्रकासै।
कहत भड्डरी सालि बिनासै।।

अर्थात् वैशाख की अक्षय तृतीया को यदि रोहिणी न हो, पौस की अमावास्या को मूल न हो, रक्षा बन्धन के दिन श्रवण और कार्तिक की पूर्णिमा को कृतिका न हो, तो पृथ्वी पर दुष्टों का बल बढ़ेगा और उस साल धान की उपज न होगी। इस तिथि पर ईख के रस से बने पदार्थ, दही, चावल, दूध से बने व्यंजन, खरबूज, तरबूज और लड्डू का भोग लगाकर दान करने का भी विधान है।

स्कन्द पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेेख है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान् विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम-मंदिरों में इस तिथि को परशुराम-जयंती बड़ी धूम-धाम से मनायी जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। परशुराम-जयंती होने के कारण इस तिथि में भगवान् परशुराम के आविर्भाव की कथा भी कही-सुनी जाती है।

Do Shri yantra pooja on Akshaya Tritiya
shri yantra pooja akshaya tritiya

युग बदला, आवश्यकतायें बदली और मान्यतायें भी बदल गई, आज मानव जीवन का केन्द्र बिन्दु केवल अर्थ और काम में ही सीमित हो गया है, और शेष दोनों धर्म और मोक्ष भी अर्थ पर ही आधारित हो गये हैं। आज व्यक्ति की सर्वप्रथम आवश्यकता केवल आर्थिक ही है, उसके पास धन का न होना, सुखद जीवन का अंत ही माना जाता है। यह पर्व लक्ष्मी-विष्णु की आराधना का विशेष पर्व है। हमारे शास्त्रों मे भी कहा गया है कि यदि लक्ष्मी जी, विष्णु जी के साथ मनुष्य के घर में स्थायी रूप से निवास करें, तो व्यक्ति के जीवन में किसी भी वस्तु तथा भौतिक सुखों का अभाव हो ही नही सकता। हमारे शास्त्रों में इस लिये इस दिन विशेष रूप से ‘श्री यंत्र’ (shri yantra) जो कि माँ लक्ष्मी जी का आधार एवं मनुष्य को जीवन में हर प्रकार का भौतिक सुख और ऐश्वर्य देने वाला है तथा दरिद्रता को जीवन से दूर करने वाला है, इस श्री यंत्र की घर में स्थापना विधान बतलाया गया है।

स्वयं गुरू गोरखनाथ जी ने भी एक स्थान पर कहा है भले ही अन्य सारे प्रयोग असफल हो जायंे, भले ही साधक नया हो, भले ही उसे स्पष्ट मंत्रो के उच्चारण का ज्ञान न हो, परन्तु अक्षय तृतिया के अवसर पर इनको सफलता अवश्य मिलती है। इस पर्व की पूर्णता के बारे में स्पष्ट करते हुये यहाँ तक कहा गया है कि कोई अभागा ही होगा जो इस पावन अवसर को गवायेगा। जिसके भाग्य में दरिद्रता ही लिखी हुई हो, वही ऐसा अवसर चूकेगा। अतः इस मुहूर्त का उपयोग करके व्यक्ति अपने दरिद्रता, अभाव, परेशानियों को हमेशा के लिये अपने जीवन से कोसों दूर भगा सकता है और उसके स्थान पर सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य व उन्नति को प्राप्त करता है। अक्षय तृतीया वाले दिन स्वर्ण-मुद्रा व स्वर्ण आभूषण खरीदने की भी प्रथा है, यह मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य के जीवन व घर-परिवार में सुख-समृद्धि और ऐश्वर्यता आती है।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer

सौभाग्य को चमका देती है ~ सूर्य रेखा

Surya Rekha

मनुष्य के हाथ में- सूर्य-रेखा को ‘रविरेखा’ या ‘तेजस्वी-रेखा’ भी कहा जाता हैं, कारण यह भाग्य-रेखा से होने वाले उज्जवल भविष्य या सौभाग्य को ठीक उसी प्रकार चमका देती हैं जिस प्रकार सूर्य अपने प्रखर प्रकाश से रात्रि के अंधकार को दूर करता है। जिस प्रकार से हिम के ढके हुई पर्वत श्रृंखलाओं को विशेष चमकाता हैं। इससे यह न समझ लेना चाहिये कि सूर्य-रेखा के अभाव में हाथ में पड़ी शुभ भाग्य-रेखा का कोई मूल्य ही नहीं होता या उसका प्रभाव ही मध्यम हो जाता हैं समझने के लिए उपर्युक्त शिखर-श्रृंखलाओं को ही ले लीजिये। वे बर्फ से ढंकी रहती हैं बर्फ का गुण हैं चमकना, चाहे रात्रि हो या दिन; उसके स्वाभाविक गुण चमकने में कोई अन्तर नहीं आता- वह सदा एक सा चमकता ही रहता हैं। सूर्य की किरणों से अन्तर केवल इतना ही होता हैं कि वे अपने सहयोग से उसमें एक विशेष प्रकार की चमक उत्पन्न कर देती है। और वह पहले की अपेक्षा और अधिक चमकने लग जाता है। यही बात रेखाओं के सम्बन्ध में भी है। यदि भाग्यरेखा के साथ सूर्यरेखा भी अधिक बलवान् होकर पड़ी हो तो वह सोने में सुगन्ध का काम करती हैं, अर्थात् यों कहिये कि एक राजा को चक्रवर्ती समा्रट बनाने का काम करती है, यही भाव है।

Surya Rekha
Surya Rekha

यदि किसी के हाथ में भाग्य-रेखा निर्बल हो या उसका सर्वथा ही अभाव हो तो सुन्दर, छोटी सी सूर्य-रेखा के प्रभाव से वह व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) वैसा प्रभावशाली न हो, फिर भी रजोगुणी अवश्य होगा। ऐसे व्यक्ति में सदैव धनाढय होने की, जनता में सम्मान पाने की या कोई बड़ा नेता बनने की अभिलाषाएँ बनी रहती हैं। वह दस्तकार न होकर भी दस्तकारों से प्रेम रखता हैं किसी विषय में पूर्ण ज्ञान रखते हुए भी वह अपनी योग्यता दूसरों पर प्रकट नहीं कर पाता। साधारण शुभ भाग्यरेखा के साथ भी सूर्य-रेखा अधिक उपयोगी समझी जाती है। इसमें संदेह नहीं कि जिस समय यह रेखा (सूर्य-रेखा) मनुष्य के हाथ में आरम्भ होती है उसी समय से उसके भाग्य में कुछ विशेष सुधार होने लग जाता है। यह रेखा निम्नलिखित सात स्थानों से आरम्भ होती है-

(1) मणिबन्ध या उसके समीप से।
(2) चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होकर सूर्यागुंलि की ओर
(3) जीवन-रेखा से।
(4) भाग्य-रेखा से प्रारम्भ होती है।
(5) मंगलक्षेत्र या हथेली के मध्य-भाग से।
(6) मस्तक-रेखा को स्पर्शकर
(7) हृदय-रेखा को स्पर्श करती (सूर्य के स्थान पर जाती है)।

 

इन सात स्थानों से प्रारम्भ होने वाली सूर्य-रेखा हमें समय समय पर हमारी दुर्घटनाओं या हमारे भाग्यसम्बन्धी अनेक अनेक जटिल प्रश्नों को हल करती है। यहां पृथक्-पृथक् सातों प्रकारों का विस्तृत विचार किया जा रहा है।

(1) यदि सूर्य-रेखा मणिबन्ध या उसके समीप से आरम्भ होकर भाग्य-रेखा के निकट समानान्तर अपने स्थान को जा रही हो तो यह सबसे उत्तम मानी गयी है। ऐसी रेखावाला व्यक्ति स्त्री या पुरूष प्रतिभा ओर भाग्य का मेल होने से, जिस काम को हाथ लगाता या आरंभ करता हैं उसमें पूर्णतः सफल होता है।

(2) इसके विपरीत यदि सूर्य-रेखा चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होती हो तो इसमें संदेह नहीं कि उसका भाग्य चमकेगा, पर उसकी यह उन्नति निजी परिश्रम द्वारा न होकर दूसरों की इच्छा ओर सहायता पर अधिक निर्भर करती हैं संभव है, उसे उसके मित्र सहायता करें, या इस सम्बन्ध में अपनी कोई शुभ सम्मति दें जिससे वह उन्नति के पथ पर अग्रसर हो।
चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होकर अनामिकांगुलि तक पहुंचने वाली गहरी सूर्यरेखा के सम्बन्ध में यह बात अवश्य ध्यान में रखने की है। ऐसे व्यक्ति का जीवन अनेक घटनाओं से भरा और संदेह पूर्ण होता है। उसमें बहुुत से परिवर्तन भी होते हें किन्तु यदि रेखा चन्द्रस्थान से निकलकर भाग्य-रेखा के समानान्तर जा रही हो तो भविष्य सुखमय हो सकता है। यदि प्रेम बाधक न हो, और विचारों में दृढ़ता होने के साथ ही साथ मस्तकरेखा भी अपना फल शुभ दे रही हो। निश्चय ही ऐसा व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) तेजस्वी और प्रसन्नचित्त होता है।, फिर भी उसमें एक बड़ा भारी दोष यह पाया जाता है कि उसके विचार कभी स्थिर नहीं रहते। सर्वसारण स्त्री या पुरूषों का उस पर अधिक प्रभाव पड़ता है। और अनायास ही वह अपने पूर्वनिश्चित विचारों को बदल देता हैं वह यश पाने की इच्छा करता है, किन्तु अपने संकल्प पर दृढ़ न रह सकने के कारण अपने प्रयत्नों अधिक सफल नहीं होता।

(3) जीवन-रेखा से आरम्भ होने वाली स्पष्ट सूर्य-रेखा भविष्य में उन्नति और यश बढाने वाली मानी गयी हैं किन्तु यह उन्नति उसके निजी परिश्रम और योग्यता से ही होती है। एक व्यावसायिक हाथ को छोड़कर शेष सभी हाथों में इसके प्रभाव से मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी कला में पूरी उन्नति कर सकता है। यह रेखा उपर्युक्त दशा में स्त्री या पुरूष के शीघ्र ग्राही होने का भी एक अचूक प्रमाण है ऐसे व्यक्ति सुन्दरता के पुजारी होते हैं ओर अपने जीवन का एक बड़ा भाग सौन्दर्य-उपासना में ही बिताते हैं यही कारण हैं कि वे उन स्त्री-पुरूषों की अपेक्षा, जिनकी सूर्य-रेखा स्वयं भाग्यरेखा से आरंभ हो रही हो, जीवन का अधिक उपभोग नहीं कर पाते।

(4) यदि यह रेखा भाग्य-रेखा से आरम्भ होती हो तो भाग्यरेखा के गुणों में वृद्धिकर उसकी शक्ति दूगनी कर देती है, प्रायः देखा गया है कि यह रेखा जिस स्थान से भाग्य-रेखा से ऊपर उठती है वहीं से किसी विशेष उत्कर्ष या उन्नति का आरम्भ होता है। रेखा जितनी ही अधिक स्पष्ट और सुन्दर होगी, उन्नति का क्षेत्र उतना ही विस्तृत और उन्नति भी अधिक होगी। ऐसी सूर्य-रेखा प्रायः ऐसे हाथों में भी दिख पड़ती है जो चित्रकार होना तो दूर रहा, एक सीधी रेखा भी नहीं खीच सकते। वे रंगों के अनुभवी भी इतने होते हैं कि पीले और गुलाबी रंग का अन्तर जानना भी उनकी शक्ति से बाहर की बात होती हैं अतः स्पष्ट है कि ऐसी रेखा वाला व्यक्ति कुशल कलाकार या दस्तकार नहीं हो सकता। हाँ, वह सुन्दरता का पुजारी और प्राकृतिक दृश्यों का प्रेमी अवश्य होता हैं दूसरे शब्दों में सुन्दरता तथा प्रकृति से प्रेम करना उनका एक स्वाभाविक गुण ही हो जाता हैं।

(5) मंगलक्षेत्र या हथेली के मध्यभाग से प्रारभ होने वाली सूर्य-रेखा अनेक अपत्ति और बाधाओं के बाद उन्नति सूचित करती है इसका सहायक मंगलक्षेत्र होता है यदि किसी के हाथ का मंगलक्षेत्र उच्च हो तो वह बहुत उन्नति करता है किन्तु मंगलकृत कष्ट भोग लेने के पश्चात् ही वह अपनी उन्नति कर पाता है।

(6) यदि यह रेखा मस्तकरेखा से आरंभ होती हो और स्पष्ट हो तो वह मानव के जीवन के मध्यकाल में (करीब 35 वें वर्ष) तक उन्नति करता है उसकी यह उन्नति जातीय योग्यता और मस्तिष्क शक्ति के अुनसार होती है।

(7) हृदय-रेखा से आरम्भ होने वाली सूर्य-रेखा जीवन के उत्तरकाल में मानव की उन्नति करती है। यह अवस्था लगभग 56 वर्ष की होगी, किन्तु एतदर्थ हृदयरेखा से ऊपर सूर्यरेखा का स्पष्ट होना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में उस स्त्री या पुरूष के जीवन का चैथा चरण सुखमय या कम से कम निरापदा बीतता है। इसके विपरीत यदि हृदय-रेखा से ऊपर सूर्य-रेखा का सर्वथा अभाव हो या वह छोटे-छोटे टुकडों से बनी या टूटी-फूटी हो तो जीवन का चैथाकाल चिन्ताओं से भरा और अन्धकारमय व्यतीत होगा, विशेषतः तब जब कि भाग्य रेखा निराशाजनक हो।

यदि सूर्य-रेखा और भाग्यरेखा दोनों ही शुभफल देने वाली होकर एक दूसरी के समानान्तर जा रही हों, साथ ही मस्तक-रेखा भी स्पष्ट और सीधी हो तो वह धनाढ़य और ऐश्वर्यपूर्ण होने का सबसे बड़ा लक्षण है। ऐसे योगवाला व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) बुद्धिमान् और दूरदर्शी होने के कारण जिस काम को हाथ लगाता हैं उसी में सफल होता है।

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यदि हाथ में सूर्य की अंगुली पहली अंगुली तर्जनी से अधिक लम्बी और बीच की मध्यमांगुलि के बराबर हो, साथ ही सूर्य-रेखा से अधिक बलवान् हो तो उस मनुष्य की प्रवृत्ति जुआ खेलने की ओर अधिक पायी जाती है, किन्तु उसमें धन या गुणों का अभाव नहीं होता। हाँ, कभी-कभी यदि मस्तक-रेखा नीचे की ओर झुकी हो तो उसका और भी अधिक बुरा प्रभाव पड़ता हैं जैसे-सदा सट्टा, लाटरी या जुआ खेलना, शर्त लगाना आदि।

यदि सूर्य-रेखा सूर्यक्षेत्र की ओर न जाकर शनि की अंगुली की ओर जा रही हो तो उस व्यक्ति की उन्नति या सफलता शोक और कठिनाइयों से मिली होती हैं। ऐसे व्यक्ति धनवान और उन्नतिशील होकर भी प्रायः सुखी नहीं रह पाते। यदि यह रेखा शनिक्षेत्र को काट रही हो या अपनी कोई शाखा गुरूक्षेत्र की ओर भेज रही हो तो उसकी उन्नति या सफलता कोई शासन-अधिकार अथवा राज्य द्वारा उच्च पद्वी पाने के रूप में होगी। परन्तु रेखा का यह लक्षण किसी भी दशा में इतना प्रभाव पूर्ण नहीं हो सकता जितना भाग्य-रेखा के गुरू अंगुली की ओर जाने के सम्बन्ध में हो सकता है।

प्रायः देखा गया है कि छोटी-छोटी एक या एक से अधिक रेखाएँ एक दूसरी के समानान्तर में सूर्यक्षेत्र पर दौड़ती पायी जाती हैं। ऐसे योगवाले व्यक्ति के विचार बिखरे होते हैं वह कभी कुछ करना चाहता है तो कभी कुछ। अतएव वह व्यापार, चित्रकारी या कला-कौशल किसी भी विशेष काम में कभी उन्नति नहीं कर पाता। सूर्यरेखा के साथ कुछ ऐसे चिन्ह भी पाये जाते हैं जो भाग्योन्नति में बाधा डालते हैं उदाहरणार्थ-हथेली यदि अधिक गहरी हो तो वह अशुभ लक्षण हैं।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer

वेद(vedas) और ब्रह्म(brahm)

 

vedas aur brahm
vedas aur brahm

यतो वा इमामि भूतानि जायते येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसेविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व, तद् ब्रह्म।

अर्थात् पंचभूतों में से भूत जिससे पैदा होते हैं, जन्म पाकर उसि के कारण जीवित रहते हैं। और नाश होते हुये जिसमें प्रविष्ट होते हैं, वही जानने योग्य है और वही ब्रह्म है।

ब्रह्म ही जगत् के जन्मादि का कारण है, इस विषय में तो किसी का मतभेद है ही नहीं। वही जगत जन्म का कारण है जो ब्रह्मके लक्ष्ण में अंर्तगत है। श्रुति कहती है कि सृष्टि के पूर्वकाल में जब सत् और असत् ही नहीं थे, तब केवल शिव ही थे। सत् कहते है। चेतन जगत को और असत् कहते है। जड वस्तुओं को। इस प्रकार इस जगत में केवल दो ही मुख्य तत्व हैं- चेतन और अचेतन। यह दोनो जब नहीं थे तब एक शिव ही थे। अर्थात् दोनो की उत्पत्ति से पहले केवल शिव ही थे। तब शिव को ही उनकी उत्पत्ति का कारण होना चाहिये?

ब्रह्माजी ब्रह्माण्डों की रचना करते करते और विष्णु जी उनका पालन करते करते कितने ही थक जायें, परंतु आप यदि चाहें तो उन के द्वारा रचित इस सारी सृष्टि को एक ही पल में अपना तीसरा नेत्र खोलकर अपने में समेट सकते हैं। हे देवाधिदेव महादेव! मेरी आपके चरणों में यही प्रार्थना है कि जिस प्रकार आप जगत के जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर उसका संहार कर उसे नवीन रूप देते हैं। उसी प्रकार विविध तापों से पीडित और जर्जरित मानव जाति के अंतःकरण के मल को जलाकर उसे सवर्ण की भाँति परिष्कृत कर दीजिये।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer

मां दुर्गा महाशक्ति – नवरात्रि पर्व

मां दुर्गा महाशक्ति – नवरात्रि पर्व

सर्व स्वस्ये सर्वेश सर्व शक्ति समन्विते।
भयेस्य स्त्राही नो देवी दुर्गे माॅ नमोस्तुते।।

shubh navratri aapkabhavishya.in
Shubh Navratri aapkabhavishya.in

आज के अर्थ प्रधन युग में मानव का लक्ष्य यश, मान प्राप्त करने के साथ धन भवन, वाहन आदि को प्राप्त कर परिपूर्ण होना है। अतः मानव अपने प्रयत्नों से सब कुछ प्राप्ति करने का करता रहता है क्योंकि क्रियाशील मानव का जीवन ही वास्तविक, जीवन है। जीवन में प्राप्ति तब तक संभव नही जब तक समय क्षण योग का ज्ञान नही होगा। क्योंकि प्रत्येक क्षण अपने आप में अलग-अलग महत्व लिये होता है। भक्ति, साधना आराधना कर्म से जुड़ी है। इनका समन्वय किसी पूर्व योग मुहुर्त में होता है तो मानव जीवन का निर्माण स्वतः ही संभव हो जाता है।

नवरात्रि पर्व याने जीवन में व्याप्त अंधकार कर समाप्त कर प्रकाश की ओर अग्रसर कर जीवन को सामर्थ बनाता है। साथ ही आने वाली विपदाओं से छुटकारा दिलवाता है, नवरात्रि पर्व मानव में अपनी प्रकृति के अनुसार सात्विक, राजस, तामस, त्रिगुणात्म गुण प्रकट करते हैं।

साधक जो गुरू के सानिध्य में मंत्रो द्वारा साधना कर शक्ति प्राप्त करता है। आराधक जो आत्मा से लीन होकर आराधना करता है एवं मोक्ष चाहता है। भक्त जो निष्ठा एवं भाव से समर्पित होता है एवं परिस्थितियों से संघर्ष कर सुयोग का लाभ उठा लेता है।

इस विशेष क्षण में माँ-दुर्गा की भक्ति आराधक को प्रकृल्लित विकसित करके सौभाग्य प्रदान करती है, जिस महाशक्ति की उपासना तीनो लोको के स्वामी ब्रह्मा-विष्णु-महेश एवं सभी देवता गण करते हैं, जो तीनो देवों से बढकर है, जो सूक्ष्म एवं स्थूल शरीर से परे महाप्राण आदि शक्ति है, वह स्वयं पर ब्रह्म स्वरूप है, जो केवल अपनी इच्छा मात्र से ही सृष्टि की रचना चल-अचल भौतिक प्राणिज वस्तुओं को पालन, रचना व संहार करने में समर्थ है। यद्यपि वह निगुर्ण स्वरूप है किन्तु धर्म की रक्षा व दुष्टों के नाश हेतु शक्ति ने अवतार धारण किये हैं।

श्रीमद्भागवत में स्वयं देवी ने ब्रह्मा जी से कहा है कि एक ही वास्तविकता है वह है सत्य, में ही सत्य हूँ, मैं न तो नर हूँ, न नारी! एवं न ही प्राणी लेकिन कोई वस्तु ऐसी नही जिसमें में, विधमान नही हूँ। प्रत्येक वस्तु में शक्ति रूप में रहती हूँ देवीपुराण में स्वयं भगवान विष्णु स्वीकार करते हैं। कि वे भी शक्ति से मुक्त नही हैं। वो कठपुतली की भांति कार्यरत है, कठपुतनी संचालन की डोर तो महादेवी के हाथ में है। ब्रह्माजी सृष्टि की रचना करते हैं तो विष्णु जी पालन करते हैं एवं शिवजी संहार करते हैं जो केवल यंत्र की भांति कार्यरत हैं, जो शक्ति की कठपुतली मात्र हैं।
महादानव दैत्यराज के अत्याचार से तंग आकर समस्त देवतागण ब्रह्माजी के पास एवं दैत्यराज से मुक्ति दिलाने की अर्चना की। तब ब्रह्माजी ने बताया कि दैत्यराज की मृत्यु कुवांरी कन्या के हाथ से होगी। तब सभी देवाताओं ने मिलकर अपने सम्मिलित तेज से देवी के इस शक्ति रूप को प्रकट किया। भगवान शंकर के तेज से देवी का मुंह, यमराज के तेज से केश, भगवान विष्णु के तेज से भुजायें, इन्द्र के तेज से स्तन, पवन के तेज से कमर, वरूण के तेज से जांघे, पृथ्वी के तेज से नितम्ब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से पैरों की उगलियाँ, वस्तुओं के तेज से भौहें, वायु के तेज से काल एवं अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने। देवी का शक्ति रूप प्रकट होने पर शिवजी ने शक्ति व बाणों का तरकस, यमराज ने दण्ड, काल ने तलवार, विश्वकर्मा ने परसा, प्रजापति न मणियों की माला, वरूण न दिव्य शंख, हनुमान जी ने गदा, शेषनाग ने मणियों से सुभोभिति नाग, इन्द्र ने वज्र, भगवान श्री नारायण ने धनुष, वरूण के पाश व तीर ब्रह्मा ने चारों वेद, हिमालय सवारी के लिये सिंह, समुद्र ने दिव्य वस्त्र एवं आभूषण दिये। जिससे शक्ति देवी 18 भुजाओं वाली प्रकट हुई। सभी के द्वारा देवी की स्तुति की गई कि शक्ति सदैव अजन्मी और अविनाशी है, यही आदि यही अंत है तो ब्रह्मा-विष्णु महेश सहित देवताओं व मनुष्यों द्वारा पूज्य हैं। शक्ति के नौ अवतार हैं जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं-

1. शैलपुत्री।
2. ब्रहमचारिणी।
3. चन्द्रघंटा।
4. कुष्माडा।
5. स्कन्दमाता।
6. कात्यानी।
7. कालरात्रि।
8. महागौरी।
9. सिद्धियात्री आदि।

श्री दुर्गा सप्तशती में देवी के नौ अवतारों का वर्णन है।

माँ की शक्ति वह शस्त्र है, जिसके माध्यम से किसी महा संग्राम को आसानी से जीता जा सकता है-
शक्ति की प्राप्ति माँ दुर्गा से गतिशील भक्त को होती है। भाग्य का रोना रोने वाले या असहाय का नहीं सृष्टि की अनन्त शक्ति प्राणी मात्र के सत्कर्म पुरूषार्थ एवं कर्तव्य परायणता में निहित है कर्म ही शक्ति का मूलाधार है वह परम शक्ति प्राप्त करने का मार्ग है। अतः शक्ति प्राप्त कर जीवन को आनन्दमयी, सुखी बनाकर विकास करना है, जो शक्ति पूजन करना चाहिये। क्योंकि शक्ति स्वरूप माँ दुर्गा की आराधना कर्म, निष्ठा और कर्तव्य परायण बनाकर जीवन को शक्ति प्रदान करती है।

माँ देवी के 108 नाम हैं, जिनका योग 9 है, माँ ने नौ अवतार धारण किये हैं। साधना में ली जाने वाली माला के मणियों की संख्या 108 है, जिनका योग 9 है, आकाशीय सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं। नवरात्रि का योग नौ है अंको की संख्या भी नौ है, जो शक्ति की साधना एवं भक्ति का योग हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से अणुबम, बिजली, बेतार, यान वायुयान आदि शक्ति ऊर्जा पर आधारित है। शक्ति बिना प्राणी निर्जिव है। अतः सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देवी का प्रतिबिम्ब छाया मात्र है। समस्त भौतिक पदार्थो एवं जीवों में शक्ति देवी द्वारा ही चेतना व प्राण का संचार होता है। इस नश्वर संसार में चेतना के रूप में प्रकट होने से देवी की चित स्वरूप मणी माना जाता है। प्रत्येक मानव में भी शक्ति अर्थात ऊर्जा है, जैसे इंजन से फालतू भाप निकाली जाती है, उसी प्रकार मानव भी व्यर्थ में अपनी ऊर्जा नष्ट करता है, किन्तु जिनकी शक्ति संगीत, खेलकूद, लिखने पढ़ने में शोध में विज्ञान की खोज में साधना, समाधि में खर्च होती है, वह व्यर्थ नही जाती।

सामान्य से सामान्य गृहस्थी मानव द्वारा माँ की आराधना कर शक्ति प्राप्त की जा सकती है। जिससे जीवन में पूर्ण प्रज्ञावान चेतन्य तथा सोलह कला पूर्ण व्यक्तित्व बन सकता है। इसके लिये कही भटकने या सन्यास लेने की आवश्यकता भक्ति साधनों की जिनका सीधा संबंध मन से, श्रद्धा से, विश्वास से है। अतः माॅ की शरण में जाना ही मानव कल्याण है।

साधना के लिए दुर्गा यंत्र (Durga Yantra) हमारे संस्थान से प्राप्त करें|

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे स्वार्थ साधिके।
शरण्ये अम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।

भगवती दुर्गा आप मंगल हैं। समस्त भक्तों का कल्याण करने वाली हैं। मैं आपकी शरण में हूँ आप मेरी रक्षा करें।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer