प्रसिद्धि के योग

जीवन में प्रसिद्धि Fame पाने वाले मनुष्य भाग्यशाली होते हैं, क्योंकि प्रसिद्धि पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों के कारण ही इस जन्म में प्राप्त होती है, और इस जन्म में प्रसिद्धि मिलेगी या नहीं, मिलेगी तो किस स्तर तक मिलेगी? इस की सूचना जन्म कुंडली में ग्रह स्थिति से मिलती है। इस लेख के द्वारा प्रसिद्धि fame के ज्योतिषीय योगों की चर्चा की जा रही है :-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

वेदों को संसार का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना गया है। ज्योतिष शास्त्र भी वेद का ही एक अंग है। इसे सम्पूर्ण शास्त्र भी माना जाता है। इसलिये इसका प्रमाणिक ज्ञान प्राप्त कर उसे व्यावहारिक अर्थात प्रायोगिक तौर पर परखकर जगत का कल्याण करना प्रत्येक के वश की बात नहीं है। ज्योतिष शास्त्र द्वारा तीनों काल की जानकारी प्राप्त की जा सकती है, जबकि अन्य शास्त्र वर्तमान तक ही सीमित हैं। इसीलिये ज्योतिष रूपी महासागर में गोता लगाकर कल्याण करने हेतु विशेष बुद्धि की आवश्यकता रहती है। इसी के कारण जातक ज्योतिष के नियमों को सुनकर समझकर परिस्थितियों के अनुसार सामंजस्य बिठाकर विकल्प ढूँढना एवं अन्तिम सत्य का निर्माण करना संभव हो पाता है। प्राचीन काल में ज्योतिष ज्ञान एक वर्ग विशेष तक ही सीमित था लेकिन वर्तमान में ज्योतिष वर्ग विशेष तक सीमित न रहकर प्रत्येक वर्ग के लोग इसे सीख रहे हैं। विभिन्न संस्थायें भी ज्योतिष विषय के पाठ्यक्रम चलाकर डिप्लोमा एवं डिग्री स्तर के कोर्स करवा रही हैं। इन कोर्सों को करने के पश्चात ज्योतिष का ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन इस ज्ञान के द्वारा उसे धन, मान एवं सम्मान की प्राप्ति भी हो यह आवश्यक नहीं है।

वर्तमान में कम्प्यूटर के चलन के कारण वास्तविक ज्योतिषीय ज्ञाता पिछड़ रहे हैं। ये तथाकथित कम्प्यूटर ज्योतिषी कम्प्यूटर की भाषा में ही फलित बता देते है लेकिन फलित घटित होता नहीं है। तब ज्योतिष से मोह भंग होना भी स्वाभाविक है। ज्योतिषीय गणना हेतु कम्प्यूटर का प्रयोग सटीक है। लेकिन प्रयोग किये जाने वाले साॅफ्टवेयर की शुद्ध गणना की परख भी आवश्यक है। फलित एवं उपाय हेतु भी ज्योतिषी की बुद्धि का समावेश अति आवश्यक है। केवल गणित के सहारे ही कोई ज्योतिषी प्रसिद्धि fame प्राप्त नहीं कर सकता। प्रसिद्धि हेतु गणितीय ज्ञान के साथ-साथ फलित एवं उपाय ज्योतिष का ज्ञान अति आवश्यक है। किसी एक के अभाव में उसको पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती है। इन सबके पश्चात जन्मांग में ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त होने के योगों का होना भी अति आवश्यक है। इन योगों की जन्मांग में उपस्थिति ही उसकी प्रसिद्धि fame का स्तर निर्धारित करती है। भविष्य कथन के साथ-साथ ज्योतिषी स्वर्णिम भविष्य हेतु उपाय भी बताता है। इस कारण इसे भाग्यवाद का समर्थक शास्त्र माना जाता है लेकिन यह पूर्णतया कर्मवाद से प्रेरित है। पूर्व जन्म के शुभ अशुभ कर्मों के परिणाम स्वरूप ही इस जन्म में किसी जातक को प्रसिद्ध प्राप्त हो सकती है। इसलिये ज्योतिष शास्त्र हमेशा शुभ कर्म करने को प्रेरित कर मनुष्य का जीवन सुधारता है। उपरोक्त गुणों के होने पर ही कोई जातक ज्योतिष से प्रसिद्धि fame प्राप्त कर सकता है। यवन के मतानुसार –

चन्द्रा र जीवासुर पूजिताङा नरं प्रकुर्वान्ति सदा धनस्थाः।
विद्या विनितं गणक प्रधानं मेधाविनं ब्राह्मण वल्लभं च।।

अर्थात द्वितीय भाव में चंद्र, मंगल, बृहस्पति व शुक्र की युति हो तो जातक विद्या व विनय से सम्पन्न ज्योतिष में प्रवीण बुद्धिमान एवं ब्राह्मणों का प्यारा होता है। उदाहरणार्थ एक उभरते हुये युवा ज्योतिषी की कुण्डली दी जा रही है जिसने सामान्य मार्गदर्शन से ज्योतिष विद्या आत्मसात कर ली है एवं प्रसिद्धि भी दिनों दिन बढ़ती जा रही है जो कुंडली में स्थित ग्रह योगों के कारण ही सम्भव है –

प्रस्तुत कुंडली में द्वितीय भाव में चंद्र मंगल, बृहस्पति व शुक्र की युति ज्योतिष में प्रवीणता लाकर प्रसिद्ध fame का योग बना रही है। दशम भाव पर शनि, बुध, राहु व बृहस्पति की दृष्टि ज्योतिष में प्रसिद्धि दिला रही है। बृहस्पति की नीच दृष्टि के कारण संघर्ष की स्थिति भी बना रही है। पंचमेश सूर्य तृतीय भाव में एवं तृतीयेश बुध चतुर्थ में होने के कारण इनकी लेखनी शक्ति अच्छी बन रही है। चतुर्थेश उच्च राशि में, द्वितीयेश स्वराशि, लग्नेश व अष्टमेश उच्च नवांश में होने के कारण परम्परा से प्राप्त ज्ञान के अलावा स्वयं के शोध कार्य से प्रसिद्धि का योग भी बन रहा है। जातक तत्व के अनुसार –

जीवे स्वांशे मृदुवंशे त्रिकालज्ञः। जीवे गोपुरे शुभदृष्टे त्रिकालज्ञः।।

अर्थात बृहस्पति अपने नवांश, मृदु षष्टयंश या गोपुरांश में होकर शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक प्रसिद्ध ज्योतिषी होता है। यदि इस योग के साथ त्रिकोणेश भी बलवान हो तो प्रसिद्धि स्थायी रहती है।

दशम भाव पर एवं सप्तम भाव पर शनि मंगल राहु बृहस्पति व बुध, शुक्र का प्रभाव होने पर जातक प्रसिद्ध ज्योतिषी होता है। ये ग्रह जितने बली एवं योगकारक होकर स्थित होंगे उतनी ही प्रसिद्धि अधिक होती है।

प्रस्तुत कुण्डली प्रसिद्ध ज्योतिषि बी.वी. रमण की है। इनकी कुंडली में दशम भाव पर मंगल, शनि, राहु व चंद्र का दृष्टि प्रभाव है जो इन्हें गणित ज्योतिष में कुशल बना रहा है। एवं पूर्वाभास की शक्ति दे रहा है। सप्तम भाव एवं दशम भाव पर मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र की स्थिति प्रभाव इन्हें फलित ज्योतिष एवं उपाय ज्योतिष में प्रवीणता दे रहा है। इसी योग के कारण इन्हें धन मान सम्मान एवं प्रसिद्धि भी प्राप्त हुई। लग्न, दशम एवं द्वितीय भाव पर भावेशों का दृष्टि प्रभाव इसे प्रबल बना रहा है।

कारकांश कुंडली में द्वितीय, तृतीय व पंचम भाव पर बली केतु व बृहस्पति का स्थिति दृष्टि प्रभाव ज्योतिष में प्रसिद्धि प्राप्त करवाता है। जन्मांग चक्र में धन भाव में चंद्र मंगल की युति हो व अष्टम में बुध स्थित हो या सप्तम में मंगल हो तो जातक धन मान सम्मान की प्राप्ति ज्योतिष के द्वारा प्राप्त होती है। धन भाव में चंद्र मंगल की युति जातक को धन की प्राप्ति करवाता है तो अष्टम भाव में बुध की स्थिति ज्योतिष में गुढ ज्ञान या शोध कार्य में सहायता देती है। लेकिन बुध की चंद्र पर दृष्टि के कारण ऐसे जातक प्रसिद्धि fame तो इस ज्ञान के कारण प्राप्त कर सकते हैं लेकिन धन की प्राप्ति कमजोर ही रहेगी। यदि धन भाव में चंद्र बुध की युति बन जाये तब धनमान व सम्मान की प्राप्ति भी होती है। जन्मांग चक्र में बुध व बृहस्पति की बली स्थिति होने पर ही ज्योतिष की पूर्ण जानकारी सम्भव है। इसी प्रकार धनेश लाभेश शुक्र की बलवान स्थिति धन मान सम्मान की प्राप्ति हेतु आवश्यक है। बुध व मंगल शनि की राशि में हों एवं उस पर शनि की दृष्टि भी हो तो उसे ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त होती है।

चंद्र को ज्योतिष में मन का कारक माना है। इससे त्रिकोण में बृहस्पति व बुध से त्रिकोण में मंगल स्थित हो तो जातक त्रिकालज्ञ होता है। बृहस्पति को ज्ञान, बुध बुद्धि व ज्योतिष का, मंगल गणित व तर्क शक्ति का कारक है। तो शुक्र लक्ष्मी रूप है। अतः ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि हेतु मंगल बुध बृहस्पति व शुक्र का बलवान होकर शुभ स्थिति में होना आवश्यक है। जो ग्रह जन्मांग में अशुभ स्थिति में रहेगा उसके कारक सम्बंधी ज्योतिषी में गुणों की कमी होगी। यदि बुध व मंगल कमजोर हुआ तो उसे गणित ज्योतिष में असुविधा महसूस होगी। बुध एवं बृहस्पति कमजोर होने पर उसे ज्योतिषीय ज्ञान का सही समय पर सही उपयोग करने की असुविधा महसूस होगी। शुक्र की निर्बल स्थिति ज्योतिषी के लिये धन प्राप्ति में कमी कराती है। उसकी प्रसिद्धि एवं लोगों को आकर्षित करने की क्षमता भी कम रहती है। इसके लिये जन्मांग चक्र में ज्योतिष में प्रसिद्ध होने के योगों के साथ शुक्र का बलवान होना आवश्यक है। अतः किसी ज्योतिषी को प्रसिद्धि हेतु बुध, बृहस्पति व शुक्र का बलवान होना एवं शनि राहु का योगकारक होना आवश्यक है।

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क्यों जरूरी है, कुण्डली मिलाना (Kundli Milaan)

kundli milaan

भारतीय ज्योतिष में परम्परागत जन्मनक्षत्र के चरणों के आधार पर कुण्डली मिलान (kundli milaan) की प्रथा चली आ रही है। हर प्रांत और भाषा में प्रकाशित होने वाले पंचांग में इस से संबंधित सारिणी दी होती हैं, इस सारिणी के आधार पर बहुत सरलता से वर-कन्या के लिये पारंपरिक गुणों का पता लगा लिया जाता है। परंतु इससे एक सीमा तक ही लाभ की आशा की जा सकती है, क्योंकि यह कुण्डली मिलान (kundli milaan) की सम्पूर्ण पद्धति का एक भाग ही है, यह सम्पूर्ण विश्लेषण नहीं कहा जा सकता।

kundli milaan

प्रभावशाली ग्रहों का जब तक हाल मालुम नहीं किया जाता तब तक यह मिलान अधूरा ही कहा जायेगा। आगे की पंक्तियों में कुण्डली मिलान(kundli milaan) के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र दे रहा हूँ जिनके आधार पर वर-कन्या की कुण्डलियों का सूक्ष्म विश्लेषण किया जा सकता है। परंतु इन सूत्रों की गहराइयों को समझने के लिये आपका दीर्घकालिक ज्योतिषीय अनुभव आवश्यक है।
1. पहली और सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, सब से पहले वर-कन्या की अपनी-अपनी विशेषताएं उनकी कुण्डलियों द्वारा जांचनी आवश्यक हैं। पुरूष की कुण्डली(kundli) में उसकी आयु का अनुमान, कुण्डली का सप्तम स्थान (वैवाहिक सुख) व उसके बाद में आनेवाली दशाओं-अंतरदशाओं का अध्ययन करना आवश्यक है, इसी से उसका शारीरिक स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति का अनुमान भी हो जाता है। आयु के लिये ग्रहयोग और दशाओं-अंतरदशाओं दोनों से करना चाहिए। अकाल मृत्यु, दुर्घटनाएं ह्रदयावरोध आदि अशुभ घटनायें मारक दशाओं में ही घटित होती हैं। भारतीय वैदिक पद्धति में अनेक कलत्र दोष के योग तथा उनके परिहार भी मिलते हैं, दोनो कुण्डलीयों में इनकी जानकारी कर लेनी चाहिए।
2. पुरूष की कुण्डली में सातवें भाव व इसका स्वामी बलवान पाप ग्रहों के साथ या इनसे दृष्ट नहीं होना चाहिए।
सातवें भाव तथा सातवें भाव के स्वामी से केन्द्र में कोई अग्नि तत्व वाला ग्रह नहीं होना चाहिए।
सातवें भाव का कारक शुक्र भी पाप ग्रहों विशेषकर मंगल, सूर्य, राहु व शनि से युक्त या दृष्ट नहीं होना चाहिए। शुक्र का नीच राशि में, षष्ठ-अष्ठम् में होना अथवा पाप ग्रहों से घिरा हुआ होना भी गृहस्थ सुख के लिये अच्छा नहीं होता।
3. स्त्री या पुरूष दोनों की कुण्डलियों में शुक्र का सातवें भाव के स्वामी के साथ होना सुखी वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत है, परंतु यह शुक्र मंगल के साथ नहीं होना चाहिए अन्यथा उस जातक की कुण्डली में चरित्र दोष होता ही है (अन्य सम्बंध भी होंगे)।
4. चन्द्रमा जो मन का कारक ग्रह कहा जाता है, इस ग्रह का भी सुखी या दुःखी वैवाहिक जीवन में बहुत बडा योगदान होता है। कुण्डली में यदि चंद्रमा सप्तमेश या शुक्र के साथ किसी धनु लग्न वाली कुण्डली में स्थित हो तो सुखी वैवाहिक जीवन के लिए बहुत ही हानिप्रद है।
5. बुध का योगदान भी विवाह में सुख-दुःख के लिये कम महत्वपूर्ण नहीं है। यह ग्रह यदि सप्तम भाव में गुलिक के साथ हो, या उसे शनि या मंगल देखते हों तो, वैवाहिक जीवन बहुत दुःखी हो जाता है। यह ग्रह यदि सप्तमेश शुक्र के साथ षष्ठ मे स्थित हो अथवा स्वयं ही सप्तमेश होकर षष्ठ में हो तो नपुंसक बना देता है।
6. वर-कन्या दोनो की कुण्डलियों में पंचम भाव की स्थिति का भी पता लगा लेना चाहिए, पंचम भाव का स्वामी अशुभ स्थान में अथवा अशुभ स्थान के स्वामी या मंगल, सूर्य, राहु से पीड़ित नहीं होना चाहिए। अच्छा योग हो, पंचम या पंचमेश का गुरू के दृष्टि अथवा योग में होना शुभ लक्षण होते हैं। संतान देने की शुभता गुरू में हैं।
7. महिलाओं की कुण्डली में आठवाँ स्थान, उसके स्वामी की स्थिति कारक शुक्रादि के बल का विचार अवश्य करना चाहिए।
8. मंगल दोष यदि है तो साथी की कुण्डली में मंगल दोष का परिहार करने वाले ग्रह एेसे स्थान में होने चाहियें। कुण्डली का द्वितीय स्थान, चंन्द्रमा से द्वितीय, शुक्र से द्वितीय स्थान एवं सप्तमेश से द्वितीय स्थान यदि पाप ग्रह से मुक्त है तो यह शुभ योग है।

अब कुछ आवश्यक निर्देश-

1. वर की कुण्डली में सप्तम स्थान का स्वामी जिस राशि में हो, वही राशि यदि कन्या की हो तो, सुखी दाम्पत्य जीवन होता है।
2. यदि कन्या की राशि वर के सप्तमेश का त्रिकोंण हो तो परस्पर खूब प्रेम होता है।
3. वर का शुक्र जिस राशि में हो,  वही राशि यदि कन्या की हो तो कल्याणकारी विवाह होता है।
4. वर का लग्नेश जिस राशि में हो, वही राशि यदि कन्या की हो तो, वैवाहिक जीवन आनंदमय व्यतीत होता है।
5. वर-कन्या के जन्म लग्न और जन्म राशि के तत्वों को विस्तार पूर्वक विचार करना चाहिए।

यदि दोनों के लग्नों या राशियों के एक ही तत्व हों या परस्पर प्रेम मित्रता रखने वाले तत्व हों तो, जीवनभर प्रेम रहता है।