जेल यात्रा योग

जेल यात्रा का योग – Jail travel yog

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka bhavishya.in), Astrological consul

जेल आर्थात् बन्दीगृह jail योग। आधुनिक भाषा में जेल को बन्दी-सुधार गृह कहा जाता है, परंतु यह नहीं कह सकते कि जेल में जाकर कितने प्रतिशत बन्दी सुधर कर बाहर आते हैं।

कभी-कभी मानव को अपने दुर्भाग्य या सौभाग्यवश जीवन में जेल-यात्रा Jail travel भी करनी पड़ जाती है। लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि जेल-यात्रा करने वाले सभी व्यक्ति अपराधी होते है। सामान्यतया ऐसा आभास होता है कि सदाचारी व्यक्ति को जेल-यात्रा Jail travel की नौबत नहीं आ सकती। किन्तु ऐसा सोचना भ्रम है। हम प्रत्यक्ष देखते है कि नृशंस डाकू-हत्यारे, चोर और लुटेरे ही नही, बल्कि कुलीन घरानों के महापुरूष भी कभी-कभी बन्दीगृह के मेहमान बन जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का तो जन्म ही बन्दीगृह में हुआ माना जाता है। जेल-यात्रियों पर shukracharya संस्थान के संस्थापक Dr.R.B.Dhawan ने सैकड़ों कुंडलीयों का संकलन तथा उन पर शोधकार्य किया है, shukracharya के अनुसार इन जेल यात्रा करने वालों को हम सामान्यतया चार श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं –

1. भयंकर सामाजिक अपराधी, जैसे डाकू, हत्यारे आदि।
2. राजनैतिक अपराधी, जैसे नेता लोग।
3. कारागार प्रशासन से सम्बन्धित राजकीय कर्मचारी, जैसे जेलर, जेल के डाक्टर आदि।
4. कैदियों से मुलाकात के लिये जाने वाले उनके परिचित मित्र अथवा सम्बन्धी।

आइये, हम विचार करें कि जेल-यात्रा Jail travel का अध्ययन किसी जातक की जन्म-कुण्डली से किस प्रकार किया जाये? भारतीय ज्योतिष-ग्रन्थों में जेल-यात्रा के अनेक योगों का उल्लेख मिलता है। जातकालकांर के अनुसार यदि सम्पूर्ण अशुभ ग्रह 2, 5, 9 और 12 वें भावों में स्थित हों, तो जातक गिरफ्तार होकर जेल जाता है, और यदि जन्म लग्न में मेष, वृषभ अथवा धनु राशि हो तो उसे सपरिश्रम-कारावास का दण्ड मिलता है।

जातकतत्व :- में भी इसी नियम का निर्देश है, किन्तु साथ ही एक विधान और है कि यदि वृश्चिक लग्न हो और द्वितीय, द्वादश, पंचम एवम् नवम् भाव में अशुभ ग्रह हों तो, जातक हवालात में बन्द रहता है। यदि मेष, मिथुन, कन्या अथवा तुला लग्न हो, तथा द्वितीय, द्वाद्वश पंचम् और नवम् भाव में अशुभ गृह हों तो जातक हथकडी पहनता है। परन्तु यदि कर्क, मकर, अथवा मीन लग्न हो, और लग्न से द्धितीय एवम् द्वादश भावों में अशुभ ग्रह हों तो, जातक को राजकीय भवन में नजर बन्द रहना पड़ता है, और यदि पंचम् एवम् नवम् स्थान से कोई शुभ ग्रह लग्न को देखता हो तो, उसे बेड़ियाँ नहीं डाली जाती। यदि लग्नेश और षष्ठेश शनि के साथ युक्त होकर केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हों तो जातक को कैद की सजा होती है।

उत्तरकालामृत:- के अनुसार द्वादश भाव से जेल का बोध होता है। संकेत-निधि के अनुसार यदि शुक्र द्वितीय भाव में, चन्द्रमा लग्न में, सूर्य एवं बुध द्वादश भाव में, और राहु पचंम भाव में हों तो जातक को जेल की सजा होती है। इसी ग्रन्थ में जेल यात्रा के लिए षष्ठम् एवम् द्वादश भाव का विवेचन भी आवश्यक माना गया है। इस प्रकार हमारे आचार्यो ने द्वादश भाव के साथ-साथ पचंम् नवम् एवम् अष्टम् भावों की विवेचना को ‘जेल यात्रा’ के लिए आवश्यक निर्दिष्ट किया है।

आज के इस वैज्ञानिक युग में मानव सतर्क है। उसकी जिज्ञासाओं का विकास हुआ है। संक्षेप में उसे आत्म-संतुष्टि नहीं होती। वह लकीर का फकीर नही बना रहना चाहता । वह हर बात की गहराई में जाना चाहता है। उसे प्रश्नों का तर्क पूर्ण समाधान चाहिये। वह पूछ सकता है कि ‘जेल यात्रा’ की परिभाषा क्या है ? जेल यात्रा कितनी अवधि की होगी ? कब होगी ? किस कारण से होगी ? आदि-आदि । अनेक बातें हैं जिनका उत्तर देने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए, इसलिये विद्वान ज्योतिषी को इस विषय पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए।

जेल-यात्रा में जातक अपने परिवार से बिछुड़ जाता है। उसके स्वच्छन्द विचरण की स्वतन्त्रता नष्ट हो जाती है। निवास स्थान का परिवर्तन हो जाता है, सुख-शयन का अवसर समाप्त हो जाता है, इन्हें हम ज्योतिषीय भाषा में इस प्रकार कह सकते है:–

1. परिवार (द्वितीय भाव) से वियोग।
2. स्वच्छन्द विचरण (द्वादश भाव ) में बाधा।
3. निवास स्थान (चतुर्थ भाव) का परिवर्तन।
4. शयन-सुख (द्वादश भाव) का अभाव।

5. मानसिक कष्ट (अष्टम् भाव)।
6. शारीरिक श्रम (षष्ठम् भाव) सामाजिक।
7. आत्मग्लानि (पंचम् भाव) पराधियों।
8. हार्दिक पश्चाताप (नवम् भाव) की स्थिति में।

ज्योतिष-जगत के आधुनिक विचारक एवम् सूक्ष्मनक्षत्र-गणित प्रणाली के अनन्य अन्वेषक स्वर्गीय प्रो. कृष्णमूर्ति जी ने अपने जीवन की दशाब्दियों के मन्थन एवम् प्रत्याक्षानुभूतियों के आधार पर ज्योतिष के अध्ययनशील समाज को एक नवीनतम दिशा प्रदान की है। उनकी तर्कपूर्ण मान्यतायें एवम् फलादेश के सरल और सुग्राह्य नियम कृष्णमूर्ति पद्धति के रूप में विख्यात है। देश में ही नहीं, विदेशी ज्यौतिर्विदों ने भी कृष्णमूर्ति पद्धति में आस्था एवम् अभिरूचि व्यक्त की है। आधुनिक युग में जेल-यात्रा योगों का विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता हैः–

1. वे अशुभ ग्रह जो द्वितीय और द्वादश भावस्थ ग्रहों के नक्षत्र में हों ।

2. द्वितीय और द्वादश भावस्थ ऐसे ग्रह जो दुःस्थानों (6, 8, 12) के स्वामी हों।

3. वे अशुभ ग्रह जो द्वितीय और द्वादश भावों के अधिपति ग्रहों के नक्षत्र में हों ।

4. द्वितीय और द्वादश भावों के स्वामी ग्रह।

इन ग्रहों की महादशा (विशोत्तरी), अन्तर्दशा अथवा प्रत्यन्तर में (जब संयुक्त रूप से दशाकाल इन्हीं ग्रहों द्वारा नियन्त्रित हो, तथा गोचर में सूर्य, चन्द्रमा एवम् दशानाथ मुक्तिनाथ आदि पारस्परिक नक्षत्रों एवम् सूक्ष्म में विचरण करें तब) जातक को जेल-यात्रा करनी पड़ेगी। जेल-यात्रा का कारण प्रमुखतः द्योतक ग्रहों Significators के अनुसार इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है:–

1. यदि लग्नेश उपरोक्त द्योतक-ग्रहों (Significators) से किसी प्रकार का सम्बन्ध रखता हो, तो जातक को अदालत के द्वारा जेल की सजा होती है।

2. यदि षष्ठेश उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध रखता हो तो जातक को दीवानी अदालत से, कर्जा न चुकाने के अपराध में, सजा होती है।

3. गुरू, शुक्र या नवमेश यदि लग्नेश तथा उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध रखते हों तो जातक को राजनैतिक कारणों से जेल की सजा होती है।

4. यदि मंगल अष्टमेश हो कर उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध रखता हो तो चोरी या डकैती के आरोप में जेल की सजा होती है।

5. यदि शनि और बुध उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्धित हो तो रिश्वतखोरी, मुनाफाखोरी, जालसाजी अथवा गबन के आरोप में जेल की सजा होती है।

6. मंगल, शनि और शुक्र का उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध, जातक को बलात्कार अथवा अपहरण के अपराध में जेलयात्रा करवाता है।

7. मंगल और शनि का उपरोक्त ग्रहों तथा अष्ट्म भाव से सम्बन्ध हो, तो हत्या के अपराध में जातक को जेल का मार्ग प्रशस्त होता है।

इसी प्रकार जेल से मुक्ति का तात्पर्य है, परिवार से पुनर्मिलन एवं स्वेच्छाचरण की स्वतन्त्रता। यह स्थिति द्वितीय एवं एकादश भावों के अन्तर्गत आती है। अतः जेल से मुक्ति का निर्धारण वे शुभ ग्रह करते हैं, जो उपरोक्त रीति से द्वितीय एवं एकादश भावों के संयुक्त द्योतक हों। सारांश यह कि र्विशोत्तरी दशा-काल में द्वितीय एवं द्वादश भावों के द्योतक ग्रहों की दशा जहां जेल यात्रा इंगित करती है, वहीं द्वितीय एवं एकादश भावों के द्योतक ग्रहों की संयुक्त दशा जेल से मुक्ति का समय दर्शाती है। इस प्रकार जेल-प्रवास की अवधि का अनुमान लगाया जा सकता है। उपरोक्त विवेचन के अतिरिक्त कुछ अन्य बातें भी ध्यान में रखने की आवश्यकता हैं –

1. यदि द्वितीय एवं द्वादश भावों के द्योतक-ग्रह (Significators) तृतीय, षष्ठम् अथवा नवम् भावों में स्थित हों तथा उक्त भाव में यदि स्थिर राशि हो तो जेल यात्रा की अवधि लम्बी हो सकती है।

2. यदि अष्टमेश बली हो एवम् दूषित भी हो तो जातक की मृत्यु जेल-प्रवास की अवधि में ही हो जाती है।

3. जेल यात्रा का कारक ग्रह राहु है। यदि द्वितीय या द्वादशस्थ ग्रह राहु के नक्षत्र में हों अथवा राहु के सूक्ष्म (sub) में हो तथा राहु द्वितीय अथवा द्वादश भाव से सम्बन्ध रखता हो तो जातक को जेलयात्रा करनी ही पड़ती है। चाहे उसने अपराध किया हो अथवा नहीं। जेल-कर्मचारी अथवा किसी अन्य कार्यवश जेल में आने जाने वाले व्यक्तियों की कुण्डली में इसका प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।

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भाग्योदय Bhagyodaya

Bhagyodaya :- भाग्योदय वाला समय अर्थात् सुखद समय जीवन में कब आयेगा? :-

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka bhavishya.in), Astrological consultant

हर मनुष्य अपने अनुभवों और विशेष रूप से जीवन के संघर्षों से सीख लेता है, और उसे पता रहता है की जीवन बिना संघर्ष के चलता ही नहीं। परंतु कभी बहुत अधिक संघर्ष, कभी मध्यम और कभी अल्प संघर्ष वाला समय भी जीवन में आता है। जीवन में जब कम संघर्ष और अधिक लाभ वाला समय रहता है, एेसे समय की हर किसी को प्रतीक्षा रहती है। क्योंकि वही तो वह सुख के पल हैं, जिन पलों में उसे मानसिक और शारीरिक थकावट नहीं होती, और सुखद अनुभव होते हैं। सुखद समय को ही भाग्योदय Bhagyodaya वाला समय कहा जाता है। भाग्योदय कब होगा? अथवा वह समय कब आयेगा जब एक बार नौकरी या कारोबार में अच्छा उठाव आयेगा। जीवन में भाग्योदय कब कब होगा? इस प्रश्न का सही उत्तर ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से अच्छी गणना करने वाला एक विद्वान ज्योतिषी ही बता सकता है। Shukracharya संस्थान के संस्थापक Dr.R.B.Dhawan, top best Astrologer in delhi के द्वारा आगे की पंक्तियों में भाग्योदय के कुछ प्रमाणिक योगों की चर्चा की जा रही है :-

1. भाग्याधिपति (नवम भाव का स्वामी ग्रह) के केन्द्र में रहने से प्रथम ही अवस्था में भाग्य की उन्नति होती है, और त्रिकोणगत अथवा उच्चगत रहने से मध्य अवस्था में जातक भाग्यवान होता है। केन्द्र और त्रिकोण को छोड़कर अन्य स्थानों में स्वक्षेत्रगत अथवा मित्रगृही होने से शेष आयु अर्थात् वृद्धावस्था में भाग्योदय होता है। परन्तु स्मरण रहे कि यह एक साधारण विधि है।

2. इसी प्रकार एक स्थूल रीति से ऐसे भी विचार किया जाता है कि यदि द्वादश राशि को तीन खण्डों में बाँटा जाये तो चार राशियों का एकैक खंड हुआ। लग्न, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ का प्रथम खंड। पंचम, षष्ठ, सप्तम और अष्टम का द्वितीय खंड तथा नवम, दशम, एकादश और द्वादश का तृतीय खंड हुआ।
बृहस्पति और शुक्र सर्वदा शुभग्रह हैं, और बुध भी शुभ हैं परन्तु पापयुक्त रहने से शुभ नहीं कहलाता। क्षीण चन्द्रमा के अतिरिक्त चन्द्रमा भी शुभ है। यह देखना भी जरूरी है कि कुंडली के किस खंड में शुभग्रह की विशेषता है यह सभी खंडों में शुभग्रह बराबर हैं। जिस खंड में शुभग्रह की विशेषता होगी वह जीवन खंड उस जातक का विशेष सुखमय होगा और यदि तीनों खंड़ों में शुभ ग्रह बराबर हैं तो जातक आजन्म एक जैसा रहेगा।

उदाहरण कुंडली में प्रथम खंड धन से मीन प्रर्यन्त है। मीन में चद्रंमा शुभ ग्रह है। द्वितीय खंड मेष से कर्क प्रर्यन्त है। उसमें एक शुभ ग्रह है। तृतीय खंड सिंह से वृश्चिक तक है। उसमें भी एक शुभ ग्रह शुक्र है। बुध भी उसी खंड में है परन्तु सूर्य के साथ रहने से पाप हो गया है। परिणाम यह निकला कि इस जातक का जीवन साधारणतः जन्म से मृत्यु प्रर्यन्त एक प्रकार से सुखमय होगा। साधारणतः ऐसा ही देखा भी जाता है।

3. यदि लग्नेश शुभ राशिगत हो और उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो, अथवा यदि लग्नेश नवम स्थान में हो, अथवा यदि लग्नेश नवम स्थान में हो, अथवा नवमेश पंचम स्थान में हो तो जातक सोलह वर्ष के बाद सुखी होता है।

4. यदि लग्न शुभ राशि का हो और उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि भी हो परन्तु लग्न में कोई पापग्रह न हो तो जातक बाल्यकाल ही से सुखी होता है। यदि लग्न में एक से अधिक पाप ग्रह हो तो जातक आजन्म दुःखी रहता है।

5. यदि लग्नेश का नवाँशेश अर्थात लग्न का स्वामी जिस नवांश में हो उस नवांश का पति यदि लग्न में अथवा त्रिकोण अथवा एकादश भाव में बली होकर हो अथवा उच्च हो जो जातक तीस वर्ष की अवस्था के उपरांत भाग्यशाली होता है।

6. (क) लग्नेश द्वितीय स्थानगत हो। (ख) लग्नेश जिस नवांश में ही उसका स्वामी द्वितीय स्थान में हो। (ग) यदि एकादशेश द्वितीय स्थान में हो तो इन तीन योगों में से किसी के रहने से जातक बीस वर्ष की अवस्था के बाद सुखी होती है।

7. भाग्याधिपति अर्थात् नवमेश जिस राशि में रहता है उस राशि के स्वामी को ‘भाग्यकर्ता’ कहते हैं। जैसे, उदाहरण कुंडली में नवमेश सूर्य तुला राशि में है और तुला का स्वामी शुक्र है। अतः इस जातक का ‘भाग्यकर्ता’ शुक्र हुआ। लिखा है कि यदि सूर्य ‘भाग्यकर्ता’ ग्रह हो तो उस जातक की उन्नति 22 वर्ष के पूर्व विशेष रूप से वर्ष, मंगल होने से 28 वर्ष, बुध से 32 वर्ष, बृहस्पति 16 वर्ष, शुक्र 24 वर्ष और शनि के ‘भाग्यकर्ता’ होने से 36 वर्ष के पूर्व भाग्योन्नति Bhagyodaya नहीं होती है। अर्थात् ‘भाग्यकर्ता’ ग्रह के नियमित समय के बाद से उन्नति होती है। यहाँ तक देखा गया है कि यदि इसके पूर्व दशा अन्तरदशा इत्यादि के अनुसार यदि शुभफल होता भी हो तो उत्कृष्ट फल उपर्युक्त समय के बाद ही होता है।

उदाहरण कुंडली का ‘भाग्यकर्ता’ शुक्र shukracharya है, इस कारण उक्त जातक की भाग्योन्नति 24 वर्ष के बाद सूचित होती है। यर्थाथ में इस जातक की उन्नति 28वें वर्ष से ही अारम्भ हुई थी।

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