क्यों जरूरी है, कुण्डली मिलाना (Kundli Milaan)

kundli milaan

भारतीय ज्योतिष में परम्परागत जन्मनक्षत्र के चरणों के आधार पर कुण्डली मिलान (kundli milaan) की प्रथा चली आ रही है। हर प्रांत और भाषा में प्रकाशित होने वाले पंचांग में इस से संबंधित सारिणी दी होती हैं, इस सारिणी के आधार पर बहुत सरलता से वर-कन्या के लिये पारंपरिक गुणों का पता लगा लिया जाता है। परंतु इससे एक सीमा तक ही लाभ की आशा की जा सकती है, क्योंकि यह कुण्डली मिलान (kundli milaan) की सम्पूर्ण पद्धति का एक भाग ही है, यह सम्पूर्ण विश्लेषण नहीं कहा जा सकता।

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प्रभावशाली ग्रहों का जब तक हाल मालुम नहीं किया जाता तब तक यह मिलान अधूरा ही कहा जायेगा। आगे की पंक्तियों में कुण्डली मिलान(kundli milaan) के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र दे रहा हूँ जिनके आधार पर वर-कन्या की कुण्डलियों का सूक्ष्म विश्लेषण किया जा सकता है। परंतु इन सूत्रों की गहराइयों को समझने के लिये आपका दीर्घकालिक ज्योतिषीय अनुभव आवश्यक है।
1. पहली और सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, सब से पहले वर-कन्या की अपनी-अपनी विशेषताएं उनकी कुण्डलियों द्वारा जांचनी आवश्यक हैं। पुरूष की कुण्डली(kundli) में उसकी आयु का अनुमान, कुण्डली का सप्तम स्थान (वैवाहिक सुख) व उसके बाद में आनेवाली दशाओं-अंतरदशाओं का अध्ययन करना आवश्यक है, इसी से उसका शारीरिक स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति का अनुमान भी हो जाता है। आयु के लिये ग्रहयोग और दशाओं-अंतरदशाओं दोनों से करना चाहिए। अकाल मृत्यु, दुर्घटनाएं ह्रदयावरोध आदि अशुभ घटनायें मारक दशाओं में ही घटित होती हैं। भारतीय वैदिक पद्धति में अनेक कलत्र दोष के योग तथा उनके परिहार भी मिलते हैं, दोनो कुण्डलीयों में इनकी जानकारी कर लेनी चाहिए।
2. पुरूष की कुण्डली में सातवें भाव व इसका स्वामी बलवान पाप ग्रहों के साथ या इनसे दृष्ट नहीं होना चाहिए।
सातवें भाव तथा सातवें भाव के स्वामी से केन्द्र में कोई अग्नि तत्व वाला ग्रह नहीं होना चाहिए।
सातवें भाव का कारक शुक्र भी पाप ग्रहों विशेषकर मंगल, सूर्य, राहु व शनि से युक्त या दृष्ट नहीं होना चाहिए। शुक्र का नीच राशि में, षष्ठ-अष्ठम् में होना अथवा पाप ग्रहों से घिरा हुआ होना भी गृहस्थ सुख के लिये अच्छा नहीं होता।
3. स्त्री या पुरूष दोनों की कुण्डलियों में शुक्र का सातवें भाव के स्वामी के साथ होना सुखी वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत है, परंतु यह शुक्र मंगल के साथ नहीं होना चाहिए अन्यथा उस जातक की कुण्डली में चरित्र दोष होता ही है (अन्य सम्बंध भी होंगे)।
4. चन्द्रमा जो मन का कारक ग्रह कहा जाता है, इस ग्रह का भी सुखी या दुःखी वैवाहिक जीवन में बहुत बडा योगदान होता है। कुण्डली में यदि चंद्रमा सप्तमेश या शुक्र के साथ किसी धनु लग्न वाली कुण्डली में स्थित हो तो सुखी वैवाहिक जीवन के लिए बहुत ही हानिप्रद है।
5. बुध का योगदान भी विवाह में सुख-दुःख के लिये कम महत्वपूर्ण नहीं है। यह ग्रह यदि सप्तम भाव में गुलिक के साथ हो, या उसे शनि या मंगल देखते हों तो, वैवाहिक जीवन बहुत दुःखी हो जाता है। यह ग्रह यदि सप्तमेश शुक्र के साथ षष्ठ मे स्थित हो अथवा स्वयं ही सप्तमेश होकर षष्ठ में हो तो नपुंसक बना देता है।
6. वर-कन्या दोनो की कुण्डलियों में पंचम भाव की स्थिति का भी पता लगा लेना चाहिए, पंचम भाव का स्वामी अशुभ स्थान में अथवा अशुभ स्थान के स्वामी या मंगल, सूर्य, राहु से पीड़ित नहीं होना चाहिए। अच्छा योग हो, पंचम या पंचमेश का गुरू के दृष्टि अथवा योग में होना शुभ लक्षण होते हैं। संतान देने की शुभता गुरू में हैं।
7. महिलाओं की कुण्डली में आठवाँ स्थान, उसके स्वामी की स्थिति कारक शुक्रादि के बल का विचार अवश्य करना चाहिए।
8. मंगल दोष यदि है तो साथी की कुण्डली में मंगल दोष का परिहार करने वाले ग्रह एेसे स्थान में होने चाहियें। कुण्डली का द्वितीय स्थान, चंन्द्रमा से द्वितीय, शुक्र से द्वितीय स्थान एवं सप्तमेश से द्वितीय स्थान यदि पाप ग्रह से मुक्त है तो यह शुभ योग है।

अब कुछ आवश्यक निर्देश-

1. वर की कुण्डली में सप्तम स्थान का स्वामी जिस राशि में हो, वही राशि यदि कन्या की हो तो, सुखी दाम्पत्य जीवन होता है।
2. यदि कन्या की राशि वर के सप्तमेश का त्रिकोंण हो तो परस्पर खूब प्रेम होता है।
3. वर का शुक्र जिस राशि में हो,  वही राशि यदि कन्या की हो तो कल्याणकारी विवाह होता है।
4. वर का लग्नेश जिस राशि में हो, वही राशि यदि कन्या की हो तो, वैवाहिक जीवन आनंदमय व्यतीत होता है।
5. वर-कन्या के जन्म लग्न और जन्म राशि के तत्वों को विस्तार पूर्वक विचार करना चाहिए।

यदि दोनों के लग्नों या राशियों के एक ही तत्व हों या परस्पर प्रेम मित्रता रखने वाले तत्व हों तो, जीवनभर प्रेम रहता है।