मंगली, mangli

मंगली योग का प्रभाव क्या है?

Dr.R.B.Dhawan, top best astrologer in Delhi, astrological consultant

भारतीय जीवनशैली में गृहस्थ आश्रम का विशेष महत्व है। गृहस्थ जीवन की शुरुआत पाणिग्रहण संस्कार से आरंभ होती हैं। प्रणय-सूत्र में बंधना सुखदायी होगा या दुःखदायी, यह दोनों के ग्रहों पर निर्भर करेगा जो कि एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। भारत में सर्वाधिक प्रचलित योग ‘मंगली योग’ है। इसे कुज दोष कहते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि ज्योतिष के प्राचीन महत्वपूर्ण ग्रंथ, वृहत पाराशर, होरा शास्त्र, सारावली, जातक परिजात इत्यादि में मंगली योग का कहीं भी उल्लेख नहीं है फिर भी यह योग इतना प्रचलित है कि बच्चे के जन्म लेने के बाद, विशेषकर कन्या के जन्म लेने के उपरांत माता-पिता यही चिन्ता व्यक्त करते हैं कि कन्या मंगली तो नहीं है। आज भी यही धारणा है कि मंगली योग ही विवाह जीवन को नष्ट करता है, अथवा लड़की की कुंडली में यही योग वर को मृत्यु देगा। इतना भयावह रूप प्रचलित है। असल में तथाकथित झोला छाप पंडितों ने या अज्ञानियों ने तिल का पहाड़ बना दिया है। इसका परिहार होता है, या नहीं। कहां से अच्छा है और कहां बुरा, इसका पूर्ण ज्ञान किए बिना बस जातक को भयभीत करना ही जैसे उनका अधिकार है। मंगल ग्रह के देवता हैं श्री गणेश, श्री हनुमान और मां दुर्गा, ये तीनों ही विघ्न बाधाएं और अमंगल दूर करते हैं। अतः यह जानना आवश्यक है कि जिस ग्रह से मंगली या मांगलिक होना बताया गया है, उसके क्या गुण हैं? और स्वभाव क्या है?
मंगल ग्रह का नाम ‘लौहितंऽग’ हैं, क्योंकि यह दूर से लाल दीख पड़ता है। इसका नामा ‘कुज’ और ‘भौम’ भी है। भूमि पुत्र होने से कुज और पृथ्वी से पृथक् हो जाने के कारण भौम नाम हुआ। चूंकि कुछ संघर्ष के उपरान्त पृथ्वी से पृथकत्व हुआ। अतः मंगल लड़ाई-झगड़ा का कारक ग्रह माना गया है। ग्रहों के कुटुम्ब में रवि, पृथ्वी के पिता और चन्द्र माता के स्थान में है। इसीलिए मंगल में रवि और चन्द्र दोनों के गुणों का मिश्रण पाया जाता है।

आचार्य वराहमिहिर द्वारा –
क्रूरदृक तरुण मूर्ति रूदारः पैत्तिकः, सुचपलः कृशमध्यः।
दुष्ट दृष्टिवाला, नित्य युवा ही प्रतीत होने वाला, दाता, शरीर में पित्त की मात्रा अधिक, अस्थिर चित्त, संकुचि तथा पतली कमर, ऐसा मंगल का स्वरूप है।

पाराशर द्वारा-
‘सत्वकुंजः, नेताज्ञेयो धरात्मजः अत्युच्चांगोभौमः, रक्त वर्णो भौमः, देवता षडानन, भौमा अग्नि, कुजः क्षत्रियः आरः तमः भौमः मज्जा, भौमवार, भौम तिृक्तः, भौम, दक्षिणे, कुजः निशायांबली, भौमः कृष्णेचबली, क्रूर स्वदिवसमहो। रामासपर्वकालवीर्यक्रमात् श. कु. बु. गु. शु. चराघा वृद्धितोवीर्यवत्तराः। स्थूलान् जनयातिसूर्ये दुर्भगान्् सूर्यपुत्रकः। श्रीरोपेतान् तथा चन्द्रः कटुकाधान् धरासुतः। वस्त्रे रक्तचित्रे कुजस्य। कुजः ग्रीष्मः।।

सत्वगुण प्रधान तथा शक्तिशाली भौम है। मंगल नेता है। मंगल का कद बहुत ऊंचा है। भूमि पुत्र मंगल रक्तवर्ण है। इसका देवता षडानन, कीर्तिकेय है। यह पुरुषग्रह है। भौम अग्नितत्व प्रधान है। भौम क्षत्रिय है। यह तामस है। भौम मज्जासार है। वारों में भौमासार, मंगल का है। इसे तिक्त रस पसंद है। इसकी दिशा दक्षिण है यह रात्रिबली है। कृष्ण पक्ष में बली है। क्रूर स्वभाव है। अपने दिवस में, अपनी होरा में, अपने मास में, अपने पर्व और काल में श. भौ. बु. गु. और शु. वृद्धिक्रम से अधिक बलीयान होते हैं। सूर्य बली हो तो जातक स्थूलकाय होता है, शनि से जातक कुरूप और अभागा होता है। चन्द्र से क्षीर युक्त तथा रस प्रधान पदार्थ होते हैं। मंगल कटुक पदार्थों को जन्म देता है। मंगल के वस्त्र लाल और चित्रित होते हैं। मंगल-ग्रीष्म ऋतु का स्वामी है। जहां एक ओर यह क्रूर स्वभावी है, कटुक पदार्थों का जन्मदायक है वहीं वृहत् संहिता अनुसार यह कल्याणकारी भी है।

विपुल विमलमूर्तिः किंशुकाशोवर्णः स्पुटरूचिरमयूश्वस्तप्तताम्र प्रभावः।
विचरतियदि मार्गे चोत्तरे मेदिनीजः
शुभकृदवनिपाना हृदिदश्चप्रजानाम्।।

इसका आकार बड़ा होता है, वर्ण अशोक का किंशुक के फूलों जैसा लाल होता है। किरण स्वच्छ और मनोहर होते हैं, कांति तपे हुए तांबे के समान होती है।
यही मंगल मार्ग से जब चलता है, तब राजा और प्रजा के लिए कल्याणकारी होता है।
अर्थात इन सभी मतों से निष्कर्ष निकलता है कि मंगल ऊर्जा शक्ति है, चंचल स्वभाव, कार्यचतुर, शूर सिद्धांत वचन कहने वला, हिंसक प्रवृत्ति, तमोगुणी, प्रतापी, साहसी, शत्रुओं, को मारने में निपुण, स्वभाव में उग्र, दृष्टि में क्रूरता, कामक्रीड़ा में अति चचंल, उदारचित्त, चपल और आलस्य रहित है, निर्भीक है, स्पष्ट जोरदार बोलने वाला है। अर्थात यदि मंगल शुभ स्थिति में है, उच्च का है, मूल त्रिकोण में है, स्वराशि में है, मित्र राशि में है, योग कारक, शुभग्रहों के साथ तथा शुभ से दृष्ट है तो, उपर्युक्त लिखित गुण जातक में होंगे ही।
मंगली योग भावानुसार- मंगली योग जन्म कुण्डली में मंगल के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित होने से बनता है। उत्तर भारत में द्वितीय भाव में मंगल को मंगली नहीं मानते किन्तु दक्षिण भारत में मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश में कहीं भी वह मंगली ही माना जाता है।
अधिकांश विद्वानों का मत है कि मांगलिक दोष चन्द्र लग्न से तथा शुक्र लग्न से भी देखा जाना चाहिए।
चन्द्र लग्न से मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो तो (कुज दोष) मंगली योग होता है।
शुक्र लगन से मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम या अष्टम में भाव में स्थित हो तो मंगली योग होता है।
मंगली योग चन्द्र, शुक्र से इसलिए देखा जाना चाहिए क्योंकि लग्न के साथ, चन्द्रमा मन का कारक है जिससे समस्त मन की अनुभूति होती है तथा शुक्र, विवाह का कारक है। इसलिए इन दोनों का वैवाहिक जीवन में महत्व है।
मंगल क्रूर ग्रह है इसका गुण अशुभ ही होता है ऐसा सत्य नहीं है। इसको जानने के लिए 1, 2, 4, 7, 8, 12 भावों में परिणाम तथा प्रत्येक बारह राशियों में परिणाम जानने होंगे। क्योंकि मंगल विभिन्न राशियों में भिन्न-भिन्न फल देता है।

उदाहरणार्थ- यदि किसी की कुण्डली में मंगली योग है और मंगल निर्बल है तो मंगल अधिक हानि नहीं कर सकता ऐसी कुण्डली के मिलान के लिए, यह जरूरी नहीं है कि दूसरे की कुण्डली में मांगलिक योग हो। मंगल यदि अस्त है या बली क्रूर ग्रहों से दृष्ट है या संधि में हैं तो मंगल निर्बल होगा।
यदि किसी की कुण्डली में वैवाहिक जीवन सुखद है तथा आयु भी पूर्ण है, तो सका विवाह मंगली योग वाले से किया जाय तो कोई हानि नहीं होगी।
अतः हमें यह जानना आवश्यक है कि मंगल कुण्डली के किस भाव में स्थित है, तथा अपनी दृष्टि द्वारा किन-किन भावों को प्रभावित कर रहा है। मंगल किन ग्रहों के साथ है, तथा मंगल पर किसी ग्रह की दृष्टि है। मंगल के द्वारा कौन से योग बन रहे हैं।? मंगल तात्कालिक शुभ है और अशुभ। इससे पता चलेगा कि यह कुण्डली में कहा लाभ पहुंचाएगा। मंगल अपनी शक्ति अनुसार ही लाभ या हानि पहुंचाएगा। केवल मंगली होना ही वैवाहिक जीवन को खराब नहीं करता और इसका फल सभी के लिए एक जैसा भी नहीं होता। अतः भली भांति अध्ययन करके ही मंगली और वैवाहिक योग बताना चाहिए।
यूं तो ऊपर काफी कुछ लिखा जा चुका है परन्तु मंगली-दोष का परिहार अर्थात निरस्तीकरण भी होता है।

परिहार-
1. मंगल यदि मेष या वृश्चिक राशि में 1, 2, 4, 7, 8, 12वें भाव में हो।

2. बृहस्पति किसी भाव में स्थित होकर मंगल को पूर्ण दृष्टि से देखता हो।

3. शनि किसी भाव में स्थित होकर मंगल को पूर्ण दृष्टि से देखता हो।

4. राहु यदि बृहस्पति या शनि से पूर्ण दृष्टि होकर मंगल पर पूर्ण दृष्टि डालता हो।

5. मंगल चतुर्थ अथवा सप्तम भाव में हो और वहां मेष, कर्क, वृश्चिक या मकर राशि हो।

6. यदि मंगल 1, 2, 4, 7, 8, 12 भाव में बली चन्द्रमा, बृहस्पति या बुध से संयुक्त हो।

7. वृषभ व तुला में चतुर्थ व सप्तम भाव का मंगल हो।

8. मिथुन व कन्या राशि का द्वितीय भावसंधि में मंगल हो।

9. मंगल, कर्क, सिंह अथवा मकर में स्थित हो।

10. मंगल, धनु व मीन का अष्टम में स्थित हो।

11. मगल, तुला व वृषभ में द्वादश में स्थित हो।

12. यदि मंगल शनि के साथ स्थित हो।

13. लड़क या लड़की की कुण्डली में मंगल जहां है वहीं दूसरी कुण्डली में शनि हो।

14. द्वादश भाव में मंगल, बुध, शुक्र की राशि में हो।

15. मंगल, सिंह राशि में स्थित हो।

16. कुम्भ, मकर लग्न में मंगल सप्तम भाव में हो।

17. कर्क व सिंह लग्न में मंगल अष्टम भाव मं हो।

18. शनि की राशि पर मंगल अष्टम भाव में हो।

वक्रिणि नीचारिस्थे वार्कस्थे वा न कुजदोषः।

अनिष्ट स्थान में मंगल यदि वक्री हो व नीच (कर्क राशि) हो अथवा शत्रु राशि (मिथुन व कन्या) राशि का हो तो वह अनिष्ट कारक नहीं होता।

कुजो जीव समायुक्तो युक्तो व शशिना यदा।
चन्द्रः केन्द्रगतो वाऽपि तस्य दोषों न मंगली।।

1, 4, 7, 8, 12 भाव में या अरिष्ट कारक स्थानों में से किसी एक में मंगल बृहस्पति अथवा चन्द्रमा के साथ बैठा हो, किन्तु चन्द्रमा केन्द्र में हो तो वह मंगली दोष नहीं कहा जाता। इस प्रकार मांगलिक कुंडली के अनेक परिहार हैं, अतः अध्ययन करने की आवश्यकता है, डराने की नहीं, और ना ही डरने की आवश्यकता है।

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