मंगल, मांगलिक

Dr.R.B.Dhawan, top best astrologer in delhi

मंगल से प्रायः सभी भयभीत रहते हैं। विशेषकर बालिका/बालक की कुंडली यदि मंगलीक हुई तो माता-पिता की चिंता बढ़ जाती है। वैसे ज्योतिष में मंगल को काल पुरूष का पराक्रम माना गया है। यह तमोगुणी अग्नि तत्व प्रधान ग्रह है। यह मेष एवं वृश्चिक राशि का स्वामी है। मकर राशि इसकी उच्च राशि तथा कर्क राशि इसकी नीच राशि है। यह मेष राशि में 1 से 12 अंश तक मूल त्रिकोण में, मेष में ही 13 अंश से
30 तक तथा सम्पूर्ण वृश्चिक राशि में स्वराशि का, मकर में 28 अंश तक उच्च का, एवं कर्क में 28 अंश तक नीच राशि का होता है। मंगल का सम्बंध मकर राशि से सर्वोत्तम, मेष से उत्तम, सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु व मीन राशि से मध्यम, वृष एवं मिथुन से सामान्य तथा कर्क, तुला व कुंभ राशि से प्रतिकूल होता है। मंगल कुंडली में अपने स्थित भाव से चौथे, सातवें एवं आठवें भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है। कुंडली में यह तीसरे भाव का कारक है। मंगल के लिये तीसरा, छठा एवं ग्यारहवाँ भाव पूर्णतः शुभ है, लेकिन तीसरे भाव में स्थित मंगल नौवें भाव में स्थित ग्रह से वेध पाता है। वेध प्राप्त शुभ मंगल भी अशुभ फलदायी होता है।

जन्म कुंडली में लग्न भाव से मंगल के लिये 3, 6, 10, 11 भाव शुभ होते हैं। 1, 2, 5, 7, 9 भाव अरिष्ट दायक तथा 4, 8, 12वाँ भाव में से किसी में भी स्थित मंगल जातक/जातिका के लिये अत्यंत अरिष्ट प्रभाव देता है। मंगल कर्क, सिंह, मीन लग्न के लिये प्रबल कारक ग्रह है। मेष राशि के लिये अष्टमेश होकर तथा वृश्चिक राशि लग्न के लिये षष्ठेश होकर तटस्थ स्वभाव का हो जाता है। कारक होकर अत्यंत शुभ फलदायक होता है।

यदि जन्म कुंडली में मंगल लग्न (प्रथम भाव) चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या बारहवें भाव में हो तो कुंडली मंगलिक अर्थात मंगल दोष युक्त हो जाती है, और ऐसा मंगल दाम्पत्य सुख की हानि करता है। लग्नस्थ मंगल की पति/ पत्नी भाव पर पूर्ण दृष्टि पड़ती है। अतः दाम्पत्य जीवन ठीक नहीं बीतता है। जातक/जातिका शिरोव्यथा से पीड़ित हो सकते हैं। लग्नस्थ मंगल जातक को क्रोधी, हिंसक, झगड़ालू प्रवृत्ति का कर देता है, जीवन भर कोई न कोई स्वास्थ्य बाधा बनी रहती है।

चतुर्थ भावास्थित मंगल की सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि पड़ती है, अतः यदि मंगली लड़के या लड़की की शादी गैर मंगली लड़की या लड़के से हो जाये तो पति/पत्नी सदैव रूग्ण रहते हैं। संतान का अभाव हो सकता है। गर्भाशय या गुप्तांग के विकार रहते हैं। आॅपरेशन से भी गुजरना पड़ सकता है। यदि मंगल युवावस्था में हो (प्रत्येक ग्रह 10 से 23 अंश तक युवावस्था में होता है) तथा सप्तम या अष्टम भाव में स्थित हो तो पति/पत्नी की आयुहानि करता है। वैधव्य/विधुरता देता है। बारहवें भाव स्थित मंगल व्यक्ति के जीवन में अस्थिरता देता है। दाम्पत्य सुख नहीं मिलने देता है। कोई न कोई बाधा सच्चा पति/पत्नी सुख नहीं भोगने देती है। द्वितीय भाव स्थित मंगल की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ भाव पर, अष्टम भाव पर एवं नवम भाव पर पड़ती है, अतः यह भी पति/पत्नी के सुख की हानि करता है।
मंगली लड़के की शादी मंगली लड़की से करने से यह दोष को दूर होता है, लेकिन दोनों के मंगल एक ही भाव में न हों। अशुभ प्रभावकारी मंगल उदर विकार, एपैन्डि साइटिस, रक्त विकार सूखा रोग, एनीमिनीया, पित्त विकार, जलना, गिरना, गुप्त रोग, स्नायु दौर्बल्य आदि रोगों से कष्ट देता है। मंगल की गर्मी को कोई भी ग्रह शांत नहीं कर सकता है। मंगल-शनि युति या मंगल-केतु युति या मंगल-राहु युति अत्यंत अशुभ परिणाम देती है। यदि यह युति सप्तम भाव, सप्तमेश, गुरू या शुक्र को प्रभावित करें तो भी दाम्पत्य सुख दिव्य स्वप्न बन जाता है। इसी प्रकार यदि दोनों अग्नि कारक ग्रह सूर्य एवं मंगल की युति हो जायें तो, बहुत हानि होती है। शुक्र के साथ मंगल की युति अति कामुक बना देगी तथा वीर्य स्राव दोष देती है। यदि रक्त का कारक ग्रह मंगल उपरोक्तानुसार पाप प्रभाव में हो तो कैंसर रोग हो सकता है। जिन लग्नों के लिये मंगल मारक प्रभाव वाला ग्रह हो, अर्थात् मारकेश हो तो उन लग्नों को मंगल की अशुभ स्थिति अत्यंत कष्टप्रद होती है। मंगल निम्नलिखित लग्नों के लिये मारक होता है- वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर एवं कुंभ। कुछ योग जो मंगलीक दोष को निष्प्रभावी कर देते हैं:-

1. यदि मेलापक में लड़के-लड़की दोनों ही मंगलीक हों तो, मंगल दोष निष्प्रभावी हो जाता है, अर्थात् शादी उपरांत दोनों का जीवन ठीक चलता है।

2. कुंडली में मंगल शुक्र के साथ स्थित हो या शुक्र से दृष्ट हो अर्थात दोनों एक दूसरे से सम सप्तक स्थित हों। केन्द्र में मंगल की युति भी मांगलीक दोष का निवारण करती है।

3. यदि मंगल अपनी ही राशि में हो, उच्च या नीच राशि में हो, वक्री हो, अस्त हो तो मंगलदोष नहीं रहता है। मूल त्रिकोण में भी मंगलिक दोष नहीं होता है।

4. जन्म कुंडली में मंगल जन्म लग्न से केन्द्रस्थ हो तथा चंद्रमा साथ में हो तो मंगल दोष मिट जाता है।

5. मिथुन लग्न एवं कन्या लग्न में जन्मे जातक/जातिका का पति/पत्नी भाव का स्वामी (सप्तमेश) गुरू होता है और यदि गुरू 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगलिक दोष मिट जाता है। मंगल 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं हो।

6. जन्म लग्न मेष या सिंह, कर्क, मीन, धनु होने पर मंगल दोष कारक नहीं रहता है। यदि एक पक्ष मंगलीक है, तथा दूसरे पक्ष की कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में यदि मंगल न हो तो, इन्हीं भावों में से किसी में भी सूर्य या शनि होने से मंगलिक दोष का निवारण हो जाता है।

7. चर राशि मेष, कर्क, तुला एवं मकर में से किसी भी राशि में स्थित मंगल दोषकारी नहीं है।

8. यदि शुभ ग्रह यथा बलवान चंद्रमा, बुध, गुरू शुक्र केन्द्र में हों, तथा शनि, राहु, केतु एवं सूर्य त्रिक स्थान में स्थित हों तो, भी मंगलिक दोष मिट जाता है।

9. लग्न में मेष का मंगल, चतुर्थ में वृश्चिक राशि का मंगल, सप्तम में मकर राशि का मंगल, बारहवें भाव मेें धनु राशि का मंगल, लग्न में सिंह या मकर राशि का मंगल, द्वादश भाव में वृष और तुला राशि का मंगल चौथे भाव में मेष, धनु या मीन राशि का मंगल हो तो, मंगल दोषदायक नहीं रहता है।

10. सप्तमेश केन्द्र में बलवान हो, और मंगल वृष या तुला राशि में हो तो, दोष मिट जाता है। मंगल गुरू के साथ हो, या गुरू से दृष्ट हो तो, भी मंगलिक दोष नहीं होता है।

11. यदि मेलापक के गुण 25 से आगे हों, राशि मैत्री हो, दोनों के गुण एक हों तो, भी मंगलदोष निष्प्रभावी हो जाता है।

मंगलिक दोष को मिटा देने वाले ये कुछ परिहार हैं- इनमें से कुछ विवादास्पद भी हैं, अतः कुंडली मिलान करते समय यदि कुंडली प्रथम दृष्टि में मंगलिक प्रतीत हो तो, उसका सूक्ष्म परीक्षण परिहारों के संदर्भ में करें केवल इस आधार पर कि –

लग्न व्यये च पाताले यामित्रे चाऽष्टमे कुजः।
कन्या भर्तृविनाशाय वरः कन्या विनाशकृत।।

किसी जातक/जातिका की कुंडली को मंगलिक घोषित कर माँ-बाप को चिंताग्रस्त नहीं बना देना चाहिये, और यदि कुुंडली वास्तव में मंगलिक दोष युक्त है तो-

कुज दोषवती देया कुज दोषवते सदा।
नास्ति दोषो न चानिष्टं दम्पत्योः सुख वर्धनम्।।

अर्थात् मंगलिक दोषयुक्त कन्या की शादी मंगलिक दोष युक्त लड़के से कर दी जाये तो दोष समाप्त हो जाता है। कोई अनिष्ट नहीं होता है, और दाम्पत्य सुख की वृद्धि होती है।

कब कुंडली मिलान की आवश्यकता नहीं:- मिलान केवल जन्म कुंडली होने पर ही मंगलिक दोष देखा जा सकता है। जन्म कुंडली न होने की स्थिति में दोनों के नाम के प्रथमाक्षर से केवल अष्टकूटों का मिलान ही देखना चाहिये। दोनों में से यदि एक विधवा या विधुर हों या परित्यक्त या परित्यक्ता हों तो किसी प्रकार के मिलान की आवश्यकता नहीं है। मंगलिक की भी नहीं। जातक/ जातिका में से कोई भी एक विकृतांग हो तो भी किसी भी प्रकार के मिलान की जरूरत नहीं है। दोनों में परस्पर शादी से पूर्व ही प्रेमाशक्ति हो और दोनों शादी करने के लिये उद्यत हों तो भी मिलान या अन्य किसी दोष को देखने की आवश्यकता नहीं है।

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क्यों जरूरी है, कुण्डली मिलाना (Kundli Milaan)

kundli milaan

भारतीय ज्योतिष में परम्परागत जन्मनक्षत्र के चरणों के आधार पर कुण्डली मिलान (kundli milaan) की प्रथा चली आ रही है। हर प्रांत और भाषा में प्रकाशित होने वाले पंचांग में इस से संबंधित सारिणी दी होती हैं, इस सारिणी के आधार पर बहुत सरलता से वर-कन्या के लिये पारंपरिक गुणों का पता लगा लिया जाता है। परंतु इससे एक सीमा तक ही लाभ की आशा की जा सकती है, क्योंकि यह कुण्डली मिलान (kundli milaan) की सम्पूर्ण पद्धति का एक भाग ही है, यह सम्पूर्ण विश्लेषण नहीं कहा जा सकता।

kundli milaan

प्रभावशाली ग्रहों का जब तक हाल मालुम नहीं किया जाता तब तक यह मिलान अधूरा ही कहा जायेगा। आगे की पंक्तियों में कुण्डली मिलान(kundli milaan) के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र दे रहा हूँ जिनके आधार पर वर-कन्या की कुण्डलियों का सूक्ष्म विश्लेषण किया जा सकता है। परंतु इन सूत्रों की गहराइयों को समझने के लिये आपका दीर्घकालिक ज्योतिषीय अनुभव आवश्यक है।
1. पहली और सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, सब से पहले वर-कन्या की अपनी-अपनी विशेषताएं उनकी कुण्डलियों द्वारा जांचनी आवश्यक हैं। पुरूष की कुण्डली(kundli) में उसकी आयु का अनुमान, कुण्डली का सप्तम स्थान (वैवाहिक सुख) व उसके बाद में आनेवाली दशाओं-अंतरदशाओं का अध्ययन करना आवश्यक है, इसी से उसका शारीरिक स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति का अनुमान भी हो जाता है। आयु के लिये ग्रहयोग और दशाओं-अंतरदशाओं दोनों से करना चाहिए। अकाल मृत्यु, दुर्घटनाएं ह्रदयावरोध आदि अशुभ घटनायें मारक दशाओं में ही घटित होती हैं। भारतीय वैदिक पद्धति में अनेक कलत्र दोष के योग तथा उनके परिहार भी मिलते हैं, दोनो कुण्डलीयों में इनकी जानकारी कर लेनी चाहिए।
2. पुरूष की कुण्डली में सातवें भाव व इसका स्वामी बलवान पाप ग्रहों के साथ या इनसे दृष्ट नहीं होना चाहिए।
सातवें भाव तथा सातवें भाव के स्वामी से केन्द्र में कोई अग्नि तत्व वाला ग्रह नहीं होना चाहिए।
सातवें भाव का कारक शुक्र भी पाप ग्रहों विशेषकर मंगल, सूर्य, राहु व शनि से युक्त या दृष्ट नहीं होना चाहिए। शुक्र का नीच राशि में, षष्ठ-अष्ठम् में होना अथवा पाप ग्रहों से घिरा हुआ होना भी गृहस्थ सुख के लिये अच्छा नहीं होता।
3. स्त्री या पुरूष दोनों की कुण्डलियों में शुक्र का सातवें भाव के स्वामी के साथ होना सुखी वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत है, परंतु यह शुक्र मंगल के साथ नहीं होना चाहिए अन्यथा उस जातक की कुण्डली में चरित्र दोष होता ही है (अन्य सम्बंध भी होंगे)।
4. चन्द्रमा जो मन का कारक ग्रह कहा जाता है, इस ग्रह का भी सुखी या दुःखी वैवाहिक जीवन में बहुत बडा योगदान होता है। कुण्डली में यदि चंद्रमा सप्तमेश या शुक्र के साथ किसी धनु लग्न वाली कुण्डली में स्थित हो तो सुखी वैवाहिक जीवन के लिए बहुत ही हानिप्रद है।
5. बुध का योगदान भी विवाह में सुख-दुःख के लिये कम महत्वपूर्ण नहीं है। यह ग्रह यदि सप्तम भाव में गुलिक के साथ हो, या उसे शनि या मंगल देखते हों तो, वैवाहिक जीवन बहुत दुःखी हो जाता है। यह ग्रह यदि सप्तमेश शुक्र के साथ षष्ठ मे स्थित हो अथवा स्वयं ही सप्तमेश होकर षष्ठ में हो तो नपुंसक बना देता है।
6. वर-कन्या दोनो की कुण्डलियों में पंचम भाव की स्थिति का भी पता लगा लेना चाहिए, पंचम भाव का स्वामी अशुभ स्थान में अथवा अशुभ स्थान के स्वामी या मंगल, सूर्य, राहु से पीड़ित नहीं होना चाहिए। अच्छा योग हो, पंचम या पंचमेश का गुरू के दृष्टि अथवा योग में होना शुभ लक्षण होते हैं। संतान देने की शुभता गुरू में हैं।
7. महिलाओं की कुण्डली में आठवाँ स्थान, उसके स्वामी की स्थिति कारक शुक्रादि के बल का विचार अवश्य करना चाहिए।
8. मंगल दोष यदि है तो साथी की कुण्डली में मंगल दोष का परिहार करने वाले ग्रह एेसे स्थान में होने चाहियें। कुण्डली का द्वितीय स्थान, चंन्द्रमा से द्वितीय, शुक्र से द्वितीय स्थान एवं सप्तमेश से द्वितीय स्थान यदि पाप ग्रह से मुक्त है तो यह शुभ योग है।

अब कुछ आवश्यक निर्देश-

1. वर की कुण्डली में सप्तम स्थान का स्वामी जिस राशि में हो, वही राशि यदि कन्या की हो तो, सुखी दाम्पत्य जीवन होता है।
2. यदि कन्या की राशि वर के सप्तमेश का त्रिकोंण हो तो परस्पर खूब प्रेम होता है।
3. वर का शुक्र जिस राशि में हो,  वही राशि यदि कन्या की हो तो कल्याणकारी विवाह होता है।
4. वर का लग्नेश जिस राशि में हो, वही राशि यदि कन्या की हो तो, वैवाहिक जीवन आनंदमय व्यतीत होता है।
5. वर-कन्या के जन्म लग्न और जन्म राशि के तत्वों को विस्तार पूर्वक विचार करना चाहिए।

यदि दोनों के लग्नों या राशियों के एक ही तत्व हों या परस्पर प्रेम मित्रता रखने वाले तत्व हों तो, जीवनभर प्रेम रहता है।