संजीवनी मंत्र

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वेदों में महामृत्युंजय तथा गायत्री मंत्र की बड़ी महिमा बताई गई है, इसी लिए विद्वानों द्वारा कहा जाता है कि इन में से किसी भी एक मंत्र का सवा लाख जाप करके जीवनी की इच्छा को पूरा किया जा सकता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इन दोनों मंत्रों को मिलाकर एक अन्य मंत्र महामृत्युंजय गायत्री मंत्र अथवा मृत संजीवनी मंत्र का निर्माण किया था। इस मंत्र को संजीवनी विद्या के नाम से जाना जाता है। इस मंत्र के जाप से मृत व्यक्ति को भी जीवित करना संभव है।

क्या है संजीवनी मंत्र :-

ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ त्रयंबकंयजामहे ॐ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ॐ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम ॐ भर्गोदेवस्य धीमहि ॐ उर्वारूकमिव बंधनान ॐ धियो योन: प्रचोदयात ॐ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ॐ स्व: ॐ भुव: ॐ भू: ॐ स: ॐ जूं ॐ हौं ॐ

ऋषि शुक्राचार्य ने इस मंत्र की आराधना की थी जिसके प्रभाव से वह देव-दानव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए दानवों को सहज ही जीवित कर सके। महामृत्युंजय मंत्र में जहां सनातन धर्म के सभी 33 देवताओं (8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 वषट तथा ॐ) की शक्तियां समाहित हैं, वहीं गायत्री मंत्र की प्राण ऊर्जा तथा आत्मशक्ति को चमत्कारिक रूप से बढ़ाने वाला मंत्र है।

संजीवनी मंत्र के जाप में निम्न बातों का ध्यान रखें:-

1. जपकाल के दौरान पूर्ण रूप से सात्विक जीवन जिएं।

2. मंत्र के दौरान साधक का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।

3. इस मंत्र का जाप शिवमंदिर में या किसी शांत एकांत जगह पर रूद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए।

4. मंत्र का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और सही होना चाहिए साथ ही मंत्र की आवाज होठों से बाहर नहीं आनी चाहिए।

5. जपकाल के दौरान व्यक्ति को मांस, शराब, सेक्स तथा अन्य सभी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए। उसे पूर्ण ब्रहमचर्य के साथ रहते हुए अपनी पूजा करनी चाहिए।

महामृत्युंजय + गायत्री (संजीवनी) मंत्र का जाप का अभ्यास गुरु के द्वारा मंत्र प्राप्त करके ही करना चाहिये। आध्यात्म विज्ञान के अनुसार संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है, जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता। अर्थात् इस मंत्र साधना को किसी अनुभवी गुरू के दिशा- निर्देश में ही करनी चाहिए। गुरु जी से मंत्र प्राप्त करके गौरीपति मृत्युञ्जयेश्वर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करनेके पश्चात भक्त को सदा मृतसञ्जीवन नामक कवच का सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये। महादेव भगवान् शंकर का यह मृतसञ्जीवन नामक कवच पुण्यप्रद है, गुह्य और मङ्गल प्रदान करनेवाला है।

आचार्य शिष्य को उपदेश करते हैं कि – हे वत्स! अपने मन को एकाग्र करके इस मृतसञ्जीवन कवच को सुनो। यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है। इस मंत्र की गोपनीयता सदा बनाये रखना।

मृतसञ्जीवन नामक कवच:-

॥1॥ सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं । महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ 2।।समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं । शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥3॥ वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवित: । मृत्युञ्जयो महादेव: प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥4॥ जरा से अभय करनेवाले, निरन्तर यज्ञ करने वाले, सभी देवताओं से आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव ! आप पर्व-दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥4॥ दधाअन: शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुज: प्रभु: ।सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥5॥ अभय प्रदान करने वाली शक्ति को धारण करने वाले, तीन मुखों वाले तथा छ: भुजओं वाले, अग्रिरूपी प्रभु सदाशिव अग्रिकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥5॥ अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभु: । यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ॥6॥ अट्ठरह भुजाओं से युक्त, हाथ में दण्ड और अभय मुद्रा धारण करने वाले, सर्वत्र व्याप्त यमरुपी महादेव शिव दक्षिण-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥6॥ खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवित: । रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ॥7॥ हाथ में खड्ग और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, धैर्यशाली, दैत्यगणोंसे आराधित रक्षोरुपी महेश नैर्ऋत्यकोणमें मेरी सदा रक्षा करें ॥7।। पाशाभयभुज: सर्वरत्नाकरनिषेवित: । वरुणात्मा महादेव: पश्चिमे मां सदावतु ॥8॥ हाथ में अभय मुद्रा और पाश धाराण करनेवाले, शभी रत्नाकरों से सेवित, वरुण स्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम- दिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥8॥ गदाभयकर: प्राणनायक: सर्वदागति: । वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्कर: पातु सर्वदा ॥9॥ हाथों में गदा और अभय मुद्रा धारण करने वाले, प्राणों के रक्षक, सर्वदा गतिशील वायुस्वरूप शंकरजी वायव्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥9॥ शङ्खाभयकरस्थो मां नायक: परमेश्वर: । सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्कर: प्रभु: ॥10॥ हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले नायक (सर्वमार्गद्रष्टा) सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओं के मध्य में मेरी रक्षा करें ॥10॥ शूलाभयकर: सर्वविद्यानमधिनायक: । ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वर: ॥11॥ हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सभी विद्याओं के स्वामी, ईशानस्वरूप भगवान् परमेश्व शिव ईशानकोण में मेरी रक्षा करें ॥11॥ ऊधर्व भागे ब्र:मरूपी विश्वात्माऽध: सदावतु । शिरो मे शङ्कर: पातु ललाटं चन्द्रशेखर:॥12॥ ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊधर्व भाग में तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभाग में मेरी सदा रक्षा करें । शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें ॥12॥ भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु । भ्रूयुग्मं गिरिश: पातु कर्णौ पातु महेश्वर: ॥13॥ मेरे भौंहों के मध्य में सर्वलोकेश और दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें, दोनों भौंहों की रक्षा गिरिश एवं दोनों कानों की रक्षा भगवान् महेश्वर करें

॥13॥ नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वज: । जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ॥14॥ महादेव मेरी नासीका की तथा वृषभ ध्वज मेरे दोनों ओठों की सदा रक्षा करें । दक्षिणामूर्ति मेरी जिह्वा की तथा गिरिश मेरे दाँतोंकी रक्षा करें ॥14॥ मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषण: । पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ॥15॥ मृत्युञ्जय मेरे मुख की एवं नागभूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठ की रक्षा करें । पिनाकी मेरे दोनों हाथों की तथा त्रिशूली मेरे हृदय की रक्षा करें ॥15॥ पञ्चवक्त्र: स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वर: । नाभिं पातु विरूपाक्ष: पाश्र्वौ में पार्वतीपति: ॥16॥ पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनो की और जगदीश्वर मेरे उदर की रक्षा करें । विरूपाक्ष नाभि की और पार्वतीपति पाश्र्वभाग की रक्षा करें ॥16॥ कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिप: । गुह्यं महेश्वर: पातु ममोरू पातु भैरव: ॥17॥ गिरीश मेरे दोनों कटिभाग की तथा प्रमथाधिप पृष्टभाग की रक्षा करें । महेश्वर मेरे गुह्यभाग की और भैरव मेरे दोनों ऊरुओं की रक्षा करें ॥17॥ जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका । पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्य: सदाशिव: ॥18॥ जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनों की, जगदम्बिका मेरे दोनों जंघो की तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्तर मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें ॥18॥ गिरिश: पातु मे भार्यां भव: पातु सुतान्मम । मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायक: ॥19॥ गिरीश मेरी भार्या की रक्षा करें, तथा भव मेरे पुत्रों की रक्षा करें । मृत्युञ्जय मेरे आयु की गणनायक मेरे चित्त की रक्षा करें ॥19॥ सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकाल: सदाशिव: । एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥20॥ कालों के काल सदाशिव मेरे सभी अंगो की रक्षा करें ।

[ हे वत्स ! ] देवताओंके लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवचका वर्णन मैंने तुमसे किया है ॥20॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् । सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥21॥ महादेवजी ने मृतसञ्जीवन नामक इस कवच को कहा है । इस कवच की सहस्त्र (1000) आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है ॥21॥ य: पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहित: । सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥22॥ जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथावा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयुका उपयोग करता है ॥ 22॥ हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ । आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥23॥ जो व्यक्ति अपने हाथसे मरणासन्न व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कवच का पाठ करता है, उस आसन्नमृत्यु प्राणीके भीतर चेतनता आ जाती है । फिर उसे कभी आधि-व्याधि नहीं होती ॥23॥ कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा । अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तम: ॥24॥ यह मृतसञ्जीवन कवच काल के गाल में गये हुए व्यक्ति को भी जीवन प्रदान कर ‍देता है, और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणोंसे युक्त ऐश्वर्य को प्राप्त करता है ॥24॥ युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं । युद्दमध्ये स्थित: शत्रु: सद्य: सर्वैर्न दृश्यते ॥25॥ युद्ध आरम्भ होने के पूर्व जो इस मृतसञ्जीवन कवच का 28 बार पाठ करके रणभूमिमें उपस्थित होता है, वह उस समय सभी शत्रुओं से अदृश्य रहता है।

॥25॥ न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै । विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ॥26॥ यदि देवताओं के भी साथ युद्ध छिड जाये तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नही कर सकते, वह विजय प्राप्त करता है ॥26॥ प्रातरूत्थाय सततं य: पठेत्कवचं शुभं । अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ॥27॥ जो प्रात:काल उठकर इस कल्याणकारी कवच सदा पाठ करता है, उसे इस लोक तथा परलोक में भी अक्षय्य सुख प्राप्त होता है ॥27॥ सर्वव्याधिविनिर्मृक्त: सर्वरोगविवर्जित: । अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिक: ॥28॥ वह सम्पूर्ण व्याधियों से मुक्त हो जाता है, सब प्रकार के रोग उसके शरीर से भाग जाते हैं । वह अजर-अमर होकर सदा के लिये सोलह वर्षवाला व्यक्ति बन जाता है ॥28॥ विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् । तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ॥29॥ इस लोकमें दुर्लभ भोगों को प्राप्त कर सम्पूर्ण लोकों में विचरण करता रहता है । इसलिये इस महागोपनीय कवच को मृतसञ्जीवन नाम से कहा है ॥29॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ॥30॥ यह देवतओं के लिय भी दुर्लभ है ॥30॥ ॥ इति वसिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ॥——————————————————

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चक्षुषोपनिषद् , Chaksusopnisad

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‘चाक्षुषी विद्या’ चक्षुषोपनिषद् ,Chaksusopnisad में उल्लेखित विद्या है, यद विद्या जटिल से जटिल नेत्ररोग का हरण करने वाली, पाठ मात्र से सिद्ध होने वाली विद्या है। जिससे समस्त नेत्ररोगों का सम्पूर्णत: नाश हो जाता है। और नेत्र तेज युक्त हो जाते हैं। उस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द हैं, सूर्य भगवान देवता हैं, नेत्ररोग की निवृत्ति के लिये चाक्षुषी विद्या मंत्र का जप होता है।

नेत्रोपनिषद् मंत्रः-
ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरिमं चछुरोगान् शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कलप्य। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मलय निर्मलय। ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करूणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम। खेचराय नमः महते नमः रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्रमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवा छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चाक्षुष्मतीविद्याां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्यक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।
ॐ (भगवान का नाम ले कर कहे)। हे चक्षु के अधिकारी सूर्य देव ! आप चक्षु में चक्षु के तेज रूप में स्थिर हो जायें, मेरी रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आंखों के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना स्वर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे में अन्धा न होऊँ (कृपया) वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, उखाड़ दें। ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्कर को नमस्कार है। ॐ करूणाकर अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ॐ सूर्य भगवान् को नमस्कार है। ॐ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्य देव को नमस्कार है। ॐ आकाश बिहारी को नमस्कार है। परम श्रेष्ठस्वरूप को नमस्कार है। ॐ (सबमें क्रिया-शक्ति उत्पन्न करने वाले) रजोगुणरूप सूर्य भगवान को नमस्कार है। (अन्धकार को सर्वथा अपने अंदर समा लेने वाले) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! मुझको असत से सत की ओर ले चलिये। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्ण स्वरूप भगवान् सूर्य शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं- उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई नहीं है। जो ब्रह्माण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है, उसको नेत्र सम्बंधी कोई रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अंधा नही होता। आठ ब्रह्ममणों को इस विद्या का दान करने पर इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्ध होती है।
जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों से सुशोभित एवं जातवेदा ( भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाले ) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय (सुवर्ण के समान कान्तिमान्) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व जो एकमात्र उत्पत्ति स्थान हैं, उन प्रचण्ड प्रताप वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव समस्त प्रजाओं ( प्राणियों ) के समक्ष उदित हो रहे हैं।
ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।
ॐ षड्विध ऐश्वर्य से समपन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, दिन का भार वहन करने वाली है। हम उन भगवान् के लिये उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेघा अत्यंत प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पंछी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे। ‘भगवन् ! इस अंधकार को छिपा दीजिये, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिये तथा तमोमय बन्धन में बधे हुये हम सब प्राणियों को अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार है। पुष्करेक्षण को नमस्कार है। निर्मल नेत्रों वाले अमलेक्षण को नमस्कार है। कमलेक्षण को नमस्कार है। विश्व रूप को नमस्कार है।
नेत्र रोग से पीड़ित श्रद्धालु साधक को चाहिये कि प्रतिदिन प्रातःकाल पूर्व की ओर मुख करके बैंठे और हरिद्रा (हल्दी) की माला से ॐ ह्नीं हंसः इस बीज मंत्र की छः मालायें जप कर नेत्रोंपनिषद के कम से कम बारह पाठ करें। पाठ के पश्चात फिर उपर्युक्त बीजमंत्र की पांच मालायें जपें। तदनन्तर सूर्य भगवान् को श्रदापूर्वक अर्घ्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा।

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मंगल, मांगलिक

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मंगल से प्रायः सभी भयभीत रहते हैं। विशेषकर बालिका/बालक की कुंडली यदि मंगलीक हुई तो माता-पिता की चिंता बढ़ जाती है। वैसे ज्योतिष में मंगल को काल पुरूष का पराक्रम माना गया है। यह तमोगुणी अग्नि तत्व प्रधान ग्रह है। यह मेष एवं वृश्चिक राशि का स्वामी है। मकर राशि इसकी उच्च राशि तथा कर्क राशि इसकी नीच राशि है। यह मेष राशि में 1 से 12 अंश तक मूल त्रिकोण में, मेष में ही 13 अंश से
30 तक तथा सम्पूर्ण वृश्चिक राशि में स्वराशि का, मकर में 28 अंश तक उच्च का, एवं कर्क में 28 अंश तक नीच राशि का होता है। मंगल का सम्बंध मकर राशि से सर्वोत्तम, मेष से उत्तम, सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु व मीन राशि से मध्यम, वृष एवं मिथुन से सामान्य तथा कर्क, तुला व कुंभ राशि से प्रतिकूल होता है। मंगल कुंडली में अपने स्थित भाव से चौथे, सातवें एवं आठवें भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है। कुंडली में यह तीसरे भाव का कारक है। मंगल के लिये तीसरा, छठा एवं ग्यारहवाँ भाव पूर्णतः शुभ है, लेकिन तीसरे भाव में स्थित मंगल नौवें भाव में स्थित ग्रह से वेध पाता है। वेध प्राप्त शुभ मंगल भी अशुभ फलदायी होता है।

जन्म कुंडली में लग्न भाव से मंगल के लिये 3, 6, 10, 11 भाव शुभ होते हैं। 1, 2, 5, 7, 9 भाव अरिष्ट दायक तथा 4, 8, 12वाँ भाव में से किसी में भी स्थित मंगल जातक/जातिका के लिये अत्यंत अरिष्ट प्रभाव देता है। मंगल कर्क, सिंह, मीन लग्न के लिये प्रबल कारक ग्रह है। मेष राशि के लिये अष्टमेश होकर तथा वृश्चिक राशि लग्न के लिये षष्ठेश होकर तटस्थ स्वभाव का हो जाता है। कारक होकर अत्यंत शुभ फलदायक होता है।

यदि जन्म कुंडली में मंगल लग्न (प्रथम भाव) चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या बारहवें भाव में हो तो कुंडली मंगलिक अर्थात मंगल दोष युक्त हो जाती है, और ऐसा मंगल दाम्पत्य सुख की हानि करता है। लग्नस्थ मंगल की पति/ पत्नी भाव पर पूर्ण दृष्टि पड़ती है। अतः दाम्पत्य जीवन ठीक नहीं बीतता है। जातक/जातिका शिरोव्यथा से पीड़ित हो सकते हैं। लग्नस्थ मंगल जातक को क्रोधी, हिंसक, झगड़ालू प्रवृत्ति का कर देता है, जीवन भर कोई न कोई स्वास्थ्य बाधा बनी रहती है।

चतुर्थ भावास्थित मंगल की सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि पड़ती है, अतः यदि मंगली लड़के या लड़की की शादी गैर मंगली लड़की या लड़के से हो जाये तो पति/पत्नी सदैव रूग्ण रहते हैं। संतान का अभाव हो सकता है। गर्भाशय या गुप्तांग के विकार रहते हैं। आॅपरेशन से भी गुजरना पड़ सकता है। यदि मंगल युवावस्था में हो (प्रत्येक ग्रह 10 से 23 अंश तक युवावस्था में होता है) तथा सप्तम या अष्टम भाव में स्थित हो तो पति/पत्नी की आयुहानि करता है। वैधव्य/विधुरता देता है। बारहवें भाव स्थित मंगल व्यक्ति के जीवन में अस्थिरता देता है। दाम्पत्य सुख नहीं मिलने देता है। कोई न कोई बाधा सच्चा पति/पत्नी सुख नहीं भोगने देती है। द्वितीय भाव स्थित मंगल की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ भाव पर, अष्टम भाव पर एवं नवम भाव पर पड़ती है, अतः यह भी पति/पत्नी के सुख की हानि करता है।
मंगली लड़के की शादी मंगली लड़की से करने से यह दोष को दूर होता है, लेकिन दोनों के मंगल एक ही भाव में न हों। अशुभ प्रभावकारी मंगल उदर विकार, एपैन्डि साइटिस, रक्त विकार सूखा रोग, एनीमिनीया, पित्त विकार, जलना, गिरना, गुप्त रोग, स्नायु दौर्बल्य आदि रोगों से कष्ट देता है। मंगल की गर्मी को कोई भी ग्रह शांत नहीं कर सकता है। मंगल-शनि युति या मंगल-केतु युति या मंगल-राहु युति अत्यंत अशुभ परिणाम देती है। यदि यह युति सप्तम भाव, सप्तमेश, गुरू या शुक्र को प्रभावित करें तो भी दाम्पत्य सुख दिव्य स्वप्न बन जाता है। इसी प्रकार यदि दोनों अग्नि कारक ग्रह सूर्य एवं मंगल की युति हो जायें तो, बहुत हानि होती है। शुक्र के साथ मंगल की युति अति कामुक बना देगी तथा वीर्य स्राव दोष देती है। यदि रक्त का कारक ग्रह मंगल उपरोक्तानुसार पाप प्रभाव में हो तो कैंसर रोग हो सकता है। जिन लग्नों के लिये मंगल मारक प्रभाव वाला ग्रह हो, अर्थात् मारकेश हो तो उन लग्नों को मंगल की अशुभ स्थिति अत्यंत कष्टप्रद होती है। मंगल निम्नलिखित लग्नों के लिये मारक होता है- वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर एवं कुंभ। कुछ योग जो मंगलीक दोष को निष्प्रभावी कर देते हैं:-

1. यदि मेलापक में लड़के-लड़की दोनों ही मंगलीक हों तो, मंगल दोष निष्प्रभावी हो जाता है, अर्थात् शादी उपरांत दोनों का जीवन ठीक चलता है।

2. कुंडली में मंगल शुक्र के साथ स्थित हो या शुक्र से दृष्ट हो अर्थात दोनों एक दूसरे से सम सप्तक स्थित हों। केन्द्र में मंगल की युति भी मांगलीक दोष का निवारण करती है।

3. यदि मंगल अपनी ही राशि में हो, उच्च या नीच राशि में हो, वक्री हो, अस्त हो तो मंगलदोष नहीं रहता है। मूल त्रिकोण में भी मंगलिक दोष नहीं होता है।

4. जन्म कुंडली में मंगल जन्म लग्न से केन्द्रस्थ हो तथा चंद्रमा साथ में हो तो मंगल दोष मिट जाता है।

5. मिथुन लग्न एवं कन्या लग्न में जन्मे जातक/जातिका का पति/पत्नी भाव का स्वामी (सप्तमेश) गुरू होता है और यदि गुरू 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगलिक दोष मिट जाता है। मंगल 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं हो।

6. जन्म लग्न मेष या सिंह, कर्क, मीन, धनु होने पर मंगल दोष कारक नहीं रहता है। यदि एक पक्ष मंगलीक है, तथा दूसरे पक्ष की कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में यदि मंगल न हो तो, इन्हीं भावों में से किसी में भी सूर्य या शनि होने से मंगलिक दोष का निवारण हो जाता है।

7. चर राशि मेष, कर्क, तुला एवं मकर में से किसी भी राशि में स्थित मंगल दोषकारी नहीं है।

8. यदि शुभ ग्रह यथा बलवान चंद्रमा, बुध, गुरू शुक्र केन्द्र में हों, तथा शनि, राहु, केतु एवं सूर्य त्रिक स्थान में स्थित हों तो, भी मंगलिक दोष मिट जाता है।

9. लग्न में मेष का मंगल, चतुर्थ में वृश्चिक राशि का मंगल, सप्तम में मकर राशि का मंगल, बारहवें भाव मेें धनु राशि का मंगल, लग्न में सिंह या मकर राशि का मंगल, द्वादश भाव में वृष और तुला राशि का मंगल चौथे भाव में मेष, धनु या मीन राशि का मंगल हो तो, मंगल दोषदायक नहीं रहता है।

10. सप्तमेश केन्द्र में बलवान हो, और मंगल वृष या तुला राशि में हो तो, दोष मिट जाता है। मंगल गुरू के साथ हो, या गुरू से दृष्ट हो तो, भी मंगलिक दोष नहीं होता है।

11. यदि मेलापक के गुण 25 से आगे हों, राशि मैत्री हो, दोनों के गुण एक हों तो, भी मंगलदोष निष्प्रभावी हो जाता है।

मंगलिक दोष को मिटा देने वाले ये कुछ परिहार हैं- इनमें से कुछ विवादास्पद भी हैं, अतः कुंडली मिलान करते समय यदि कुंडली प्रथम दृष्टि में मंगलिक प्रतीत हो तो, उसका सूक्ष्म परीक्षण परिहारों के संदर्भ में करें केवल इस आधार पर कि –

लग्न व्यये च पाताले यामित्रे चाऽष्टमे कुजः।
कन्या भर्तृविनाशाय वरः कन्या विनाशकृत।।

किसी जातक/जातिका की कुंडली को मंगलिक घोषित कर माँ-बाप को चिंताग्रस्त नहीं बना देना चाहिये, और यदि कुुंडली वास्तव में मंगलिक दोष युक्त है तो-

कुज दोषवती देया कुज दोषवते सदा।
नास्ति दोषो न चानिष्टं दम्पत्योः सुख वर्धनम्।।

अर्थात् मंगलिक दोषयुक्त कन्या की शादी मंगलिक दोष युक्त लड़के से कर दी जाये तो दोष समाप्त हो जाता है। कोई अनिष्ट नहीं होता है, और दाम्पत्य सुख की वृद्धि होती है।

कब कुंडली मिलान की आवश्यकता नहीं:- मिलान केवल जन्म कुंडली होने पर ही मंगलिक दोष देखा जा सकता है। जन्म कुंडली न होने की स्थिति में दोनों के नाम के प्रथमाक्षर से केवल अष्टकूटों का मिलान ही देखना चाहिये। दोनों में से यदि एक विधवा या विधुर हों या परित्यक्त या परित्यक्ता हों तो किसी प्रकार के मिलान की आवश्यकता नहीं है। मंगलिक की भी नहीं। जातक/ जातिका में से कोई भी एक विकृतांग हो तो भी किसी भी प्रकार के मिलान की जरूरत नहीं है। दोनों में परस्पर शादी से पूर्व ही प्रेमाशक्ति हो और दोनों शादी करने के लिये उद्यत हों तो भी मिलान या अन्य किसी दोष को देखने की आवश्यकता नहीं है।

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संतान योग

इस‌ लेख में जन्म कुंडली में संतान योग कैसे बनता है, यह अनेक उदाहरणों के साथ समझाया गया है:-

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जन्म कुंडली में संतान विचारने के लिए पंचम भाव का मुख्य स्थान होता है। पंचम भाव से संतान का विचार करना चाहिए। दूसरी संतान का विचार करना हो, तो सप्तम भाव से करना चाहिए। तीसरी संतान के विषय में जानना हो, तो अपनी जन्म कुंडली के भाग्य स्थान से विचार करना चाहिए

1. पंचम भाव का स्वामी स्वग्रही हो।
2. पंचम भाव पर पाप ग्रहों की दॄष्टि ना होकर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो, अथवा स्वयं चतुर्थ सप्तम भाव को देखता हो।
3. पंचम भाव का स्वामी कोई नीच ग्रह ना हो यदि भाव पंचम में कोई उच्च ग्रह हो तो अति सुंदर योग होता है।
4. पंचम भाव में कोई पाप ग्रह ना होकर शुभ ग्रह विद्यमान हों, और षष्ठेश या अष्टमेश की उपस्थिति भाव पंचम में नही होनी चाहिये।
5. पंचम भाव का स्वामी को षष्ठ, अष्टम एवम द्वादश भाव में नहीं होना चाहिये, पंचम भाव के स्वामी के साथ कोई पाप ग्रह भी नही होना चाहिये साथ ही स्वयं पंचम भाव का स्वामी नीच का नही होना चाहिये।
6. पंचम भाव का स्वामी उच्च राशिगत होकर केंद्र त्रिकोण में हो।
7. पति एवम पत्नी दोनों की कुंडलियों का अध्ययन करना चाहिए।
8. सप्तमांश लग्न का स्वामी जन्म कुंडली में: बलवान, शुभ स्थान, सप्तमांश लग्न भी शुभ ग्रहों से युक्त।
9. एकादश भाव में शुभ ग्रह बलवान हो।

संसार में कोई भी ऐसा दंपति नहीं होगा, जो संतान सुख नहीं चाहता हो। चाहे वह गरीब हो या अमीर। सभी के लिए संतान सुख होना सुखदायी ही रहता है। संतान चाहे खूबसूरत हो या बदसूरत, लेकिन माता-पिता को बस संतान चाहिए। फिर चाहे वह संतान माता-पिता के लिए सहारा बने या न बने। अकबर बादशाह ने भी काफी मन्नतें मानकर सलीम को माँगा था।

किसी-किसी की संतान होती है, और फिर गुजर जाती है। ऐसा क्यों होता है? ये सब ग्रहों की अशुभ स्थिति से होता है। यहाँ पर हम इन्हीं सब बातों की जानकारी देंगे, जिससे आप भी जान सकें कि संतान होगी या नहीं।

पंचम स्थान संतान का होता है। वही विद्या का भी माना जाता है। पंचम स्थान कारक गुरु और पंचम स्थान से पंचम स्थान (नवम स्थान) पुत्र सुख का स्थान होता है। पंचम स्थान गुरु का हो तो हानिकारक होता है, यानी पुत्र में बाधा आती है।

सिंह लग्न में पंचम गुरु वृश्चिक लग्न में मीन का गुरु स्वग्रही हो, तो संतान प्राप्ति में बाधा आती है, परन्तु गुरु की पंचम दृष्टि हो, या पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो संतान सुख उत्तम मिलता है।

पंचम स्थान का स्वामी भाग्य स्थान में हो, तो प्रथम संतान के बाद पिता का भाग्योदय होता है। यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो उसकी पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो पुत्र अत्यंत प्रभावशाली होता है। मंगल की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या पंचम भाव पर पड़ रही हो, तो पुत्र अवश्य होता है।

पुत्र संततिकारक चँद्र, बुध, शुक्र यदि पंचम भाव पर दृष्टि डालें तो पुत्री संतति होती है। यदि पंचम स्थान पर बुध का संबंध हो, और उस पर चँद्र या शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो, तो वह संतान होशियार होती है। पंचम स्थान का स्वामी शुक्र यदि पुरुष की कुंडली में लग्न में या अष्टम में या तृतीय भाव पर हो, एवं सभी ग्रहों में बलवान हो, तो निश्चित तौर पर लड़की ही होती है। पंचम स्थान पर मकर का शनि कन्या संतति अधिक होता है। कुंभ का शनि भी लड़की देता है। पुत्र की चाह में पुत्रियाँ होती हैं। कुछ संतान नष्ट भी होती है।

पंचम स्थान का स्वामी जितने ग्रहों के साथ होगा, उतनी संतान होगी। जितने पुरुष ग्रह होंगे, उतने पुत्र और जितने स्त्रीकारक ग्रहों के साथ होंगे, उतनी संतान पुत्री होगी। सप्तमांश कुंडली के पंचम भाव पर या उसके साथ या उस भाव में कितने अंक लिखे हैं, उतनी संतान होगी। एक नियम यह भी है कि सप्तमांश कुंडली में चँद्र से पंचम स्थान में जो ग्रह हो, एवं उसके साथ जीतने ग्रहों का संबंध हो, उतनी संतान होगी।

संतान सुख कैसे होगा :-

संतान प्राप्ति के लिए भी हमें पंचम स्थान का ही विश्लेषण करना होगा। पंचम स्थान का मालिक किसके साथ बैठा है, यह भी जानना होगा। पंचम स्थान में गुरु शनि को छोड़कर पंचम स्थान का अधिपति पाँचवें हो, तो संतान संबंधित शुभ फल देता है। यदि पंचम स्थान का स्वामी आठवें, बारहवें हो, तो संतान सुख नहीं होता। यदि हो भी तो सुख मिलता नहीं या तो संतान नष्ट होती है, या अलग हो जाती है। यदि पंचम स्थान का अधिपति सप्तम, नवम, ग्यारहवें, लग्नस्थ, द्वितीय में हो, तो संतान से संबंधित सुख शुभ फल देता है। द्वितीय स्थान के स्वामी ग्रह पंचम में हो, तो संतान सुख उत्तम होकर लक्ष्मीपति बनता है।

पंचम स्थान का अधिपति छठे में हो, तो दत्तक पुत्र लेने का योग बनता है। पंचम स्थान में मीन राशि का गुरु कम संतान देता है। पंचम स्थान में धनु राशि का गुरु हो, तो संतान तो होगी, लेकिन स्वास्थ्य कमजोर रहेगा। गुरु का संबंध पंचम स्थान पर संतान योग में बाधा देता है। सिंह, कन्या राशि का गुरु हो तो संतान नहीं होती। इस प्रकार तुला राशि का शुक्र पंचम भाव में अशुभ ग्रह के साथ (राहु, शनि, केतु) के साथ हो, तो संतान नहीं होती।

पंचम स्थान में मेष, सिंह, वृश्चिक राशि हो, और उस पर शनि की दृष्टि हो, तो पुत्र संतान सुख नहीं होता। पंचम स्थान पर पड़ा राहु गर्भपात कराता है। यदि पंचम भाव में गुरु के साथ राहु हो, तो चांडाल योग बनता है, और संतान में बाधा डालता है, यदि यह योग स्त्री की कुंडली में हो तो। यदि यह योग पुरुष कुंडली में हो तो संतान नहीं होती। नीच का राहु भी संतान नहीं देता। राहु, मंगल, पंचम हो तो एक संतान होती है। पंचम स्थान में पड़ा चँद्र, शनि, राहु भी संतान बाधक होता है। यदि योग लग्न में न हों तो चँद्र कुंडली देखना चाहिए। यदि चँद्र कुंडली में यह योग बने तो उपरोक्त फल जानें।

पंचम स्थान पर राहु या केतु हो, तो पितृदोष, दैविक दोष, जन्म दोष होने से भी संतान नहीं होती। यदि पंचम भाव पर पितृदोष या पुत्रदोष बनता हो, तो उस दोष की शांति करवाने के बाद संतान प्राप्ति संभव है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य संतान पक्ष में चिंता देता है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य ऑपरेशन द्वारा संतान देता है। पंचम स्थान पर सूर्य मंगल की युति हो, और शनि की दृष्टि पड़ रही हो, तो संतान की शस्त्र से मृत्यु होती है।

पंचम भाव और गुरु :-

गुरु जब मीन राशी में पंचम में हो, तो अल्प संतति देते है। धनु में हो, तो बहुत प्रयास के बाद देते है। कर्क और कुम्भ राशी में होने पर गुरु संतति नहीं देते ऐसे ही फल पंचम भाव में कर्क, मीन, कुम्भ या धनु राशी में होने पर संतति सुख नहीं देते। लेकिन बाकी पंचमेश और युति और दृष्टि सम्बन्ध भी देख लेना चाहिए, खाली एक गुरु के उपर कुछ भी नहीं बोलना चाहिए।

एक बात हमेशा ध्यान रखें, की गुरु सिंह राशी में निर्बल हो जाते हैं, जबकि गुरु और सूर्य परम मित्र हैं, इसके पीछे एक तर्क तो ये है की गुरु मंत्री है और सूर्य रजा, अब राजा के घर में गुरु कैसे स्थान हानि करेंगे, और एक तर्क ये है, की गुरु अपनी उच्च राशी कर्क से निकल कर नीच राशी गत होता है, इसी कारण गुरु पंचम में सिंह राशी में स्थान हानि नहीं करते। वही कुम्भ राशी राजा के गृह से सबसे अधिक दूर होने से वह वे अपने स्थान भ्रष्ट करने के स्वभाव का पूर्ण प्रभाव दिखाते है।

सिर्फ गुरु के इन परिस्थतियो के आधार पर ही फलित नहीं करना चाहिए, कहा जाता है की पंचम का गुरु यदि मंगल और सूर्य से दृष्ट है, तो भी स्थान हानि नहीं कर पाता, अगर कर्क का गुरु चंद्रमा से दृष्ट या फिर कुम्भ का गुरु शनि से दृष्ट है तो भी गुरु के योग विफल हो जायेंगे। पंचम भाव पर पंचमेश की दृष्टि भी उस भाव को बल देगी, अतः इन परिस्थितियों में योग विफल हो जाएगा, ये तो हम सब जानते ही हैं की पूर्ण कुडंली विश्लेषण के बाद ही पूर्ण फलादेश किया जा सकता है, यहाँ तो हम सिर्फ गुरु के पंचम में होने की स्थितियों पर चर्चा कर रहे हैं।

संतान प्राप्ति का समय :-
संतान प्राप्ति के समय को जानने के लिए पंचम भाव, पंचमेश अर्थात पंचम भाव का स्वामी, पंचम कारक गुरु, पंचमेश, पंचम भाव में स्थित ग्रह और पंचम भाव, पंचमेश पर दृष्टियों पर ध्यान देना चाहिए। जातक का विवाह हो चुका हो, और संतान अभी तक नहीं हुई हो, संतान का समय निकाला जा सकता है। पंचम भाव जिन शुभ ग्रहों से प्रभावित हो उन ग्रहों की दशा-अंतर्दशा और गोचर के शुभ रहते संतान की प्राप्ति होती है। गोचर में जब ग्रह पंचम भाव पर या पंचमेश पर या पंचम भाव में बैठे ग्रहों के भावों पर गोचर करता है, तब संतान सुख की प्राप्ति का समय होता है। यदि गुरु गोचरवश पंचम, एकादश, नवम या लग्न में भ्रमण करे तो भी संतान लाभ की संभावना होती है। जब गोचरवश लग्नेश, पंचमेश तथा सप्तमेश एक ही राशि में भ्रमण करे, तो संतान लाभ होता है।

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शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा और स्वास्थ्यवर्धक खीर :-

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शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागिरी पूर्णिमा भी कहा जाता है, को हिंदू चंद्र पक्ष अश्विन महीने (सितंबर-अक्टूबर) के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन के रूप में इसे कुमुड़ी (चांदनी) के रूप में भी जाना जाता है, जैसा कि इस दिन, पृथ्वी पर चंद्रमा की बौछार ‘अमृत किरणें’ या जीवन के अमृत उसके किरणों के माध्यम से है पूर्णिमा की चमक विशेष आनन्द लेती है, यह बदलते मौसम का प्रतीक है, मानसून के अंत में शरद पूर्णिमा की रात्रि चन्द्रमा की किरणों में औषधीय गुण रहते हैं।

5000 वर्ष पहले भी इस रात में भगवान श्रीकृष्ण और राधाजी ने वृन्दावन में अनगिनत गोपी को दिव्य आनंद प्रकट किया था। यह माना जाता है कि चंद्रमा और पृथ्वी शरद पूर्णिमा रात्रि पर सबसे करीब दूरी पर हैं। इस वजह से, चंद्रमा की किरणों में कई अमृत किरणें (उपचारात्मक गुण) हैं, चांदनी के नीचे खीर रखना शरीर और आत्मा दोनों को पोषण करता है, निम्नलिखित कुछ स्वास्थ्य युक्तियां दी गई हैं, जिन्हें अपनाने पर हम सभी को शरद पूर्णिमा का लाभ मिल सकता है।

शरद पूर्णिमा पर, शाम को चावल, दूध और मिश्री की खीर बनायें, खीर बनाने के दौरान कुछ समय के लिए इस में सोने या चांदी की वस्तु रखें, बनने के बाद उसे निकाल कर लगभग 9 बजे से करीब 12 बजे तक इसे चाँदनी में रखें। उस रात के लिए कोई भी अन्य खाना न पकाया जाए, केवल खीर ही खानी चाहिए। देर रात में हमें अत्यधिक आहार नहीं लेना चाहिए, इसलिए खीर को तदनुसार खाना चाहिए। शरद पूर्णिमा ‌की रात में रखी खीर को दूसरे दिन प्रातःकाल भी खाया जा सकता है। क्योंकि इसे प्रसाद के रूप में भगवान को देने के बाद बनाया जाता है। रात में 15-20 मिनट के लिए चंद्रमा की ओर देखे । ध्यान रहे आप आँखों को नहीं झपका रहे हों।

आँखों की परेशानियों से मुक्त होने के लिए और आंखें पूरी तरह ठीक से काम करने के लिए, शरद पूर्णिमा चाँद की चांदनी में ही में एक सुई में धागा लगाने का प्रयास करें। (कोई अन्य प्रकाश पास नहीं होना चाहिए)। शरद पूर्णिमा पर पूरी रात यदि आप जागरण कर सकते हैं, तो यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा होगा।

शरद पूनम रात आध्यात्मिक उत्थान के लिए बहुत फायदेमंद है, इसलिए इस रात को जागने का प्रयास करना चाहिए, यदि संभव है, तो इस पवित्र रात को जप ध्यान कीर्तन करें, जिससे की आप अपने भाग्य को भी जगा सकते है! शरद पूर्णिमा वर्ष में एक बार आती है, और कहा जाता है की इस दिन भगवान् श्रीकृष्ण सभी की मनोकामना पूर्ण करते हैं, इसलिए जैसे आप खीर बनाए उसे भगवान् विष्णु के भोग लगा कर चांदनी में रख दें, जिससे की इसकी मिठास आपके जीवन में सुखो की भरमार कर देगी, और आप अपना जीवन सुखमय जी सकेंगे !यदि आप खुद खीर नहीं बना सकते हैं, तो आप किसी मंदिर से प्रसाद भी ला सकते हैं !

एेसी मान्यता है कि गाय के दूध से! किशमिश और केसर डालकर चावल मिश्रित खीर बनाकर शाम को चंद्रोदय के समय बाहर खुले में रखने से उसमें पुष्टिकारक औषधीय गुणों का समावेश हो जाता है, यह खीर आध्यात्मिक उत्थान के लिए श्रेष्ठ है, जब अगले दिन प्रातः काल उसका सेवन करते हैं, तो वह हमारे आरोग्य के लिए मानसिक स्वास्थ्य अत्यंत लाभकारी हो जाती है, एक अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है, यह तत्व चंद्र किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का अवशोषण करता है, चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है, इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है, जोकि विज्ञान पर आधारित है।

आयुर्वेद के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन खीर को चन्द्रमा की किरणों में रखने से उसमे औषधीय गुण पैदा हो जाते है, और इससे कई असाध्य रोग दूर किये जा सकते है, खीर खाने का अपना औषधीय महत्त्व भी है, इस समय दिन में गर्मी होती है, और रात को सर्दी होती है, ऋतु परिवर्तन के कारण पित्त प्रकोप हो सकता है, खीर खाने से पित्त शांत रहता है, इस प्रकार शारीरिक परेशानी से बचा जा सकता है, शरद पूर्णिमा की रात में खीर का सेवन करने से जीवनदायिनी ऊर्जा प्राप्त होती है।

आयुर्वेद में उल्लेखित है कि यदि यह खीर मिटटी की हंडिया में रखी जाये, और प्रातः बच्चे उसका सेवन करें, तो छोटे बच्चों के मानसिक विकास में अतिशय योगदान करती है .!

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वास्तु शास्त्र

वास्तु शास्त्र से करें गृह निर्माण :-

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प्रत्येक परिवार की पहली आवश्यकता होती है- अपना घर। मध्यम वर्ग इस सपने को संजोने के लिए जीवन भर संघर्ष करता है। जिस समय यह सपना सच होने जा रहा हो, तो हमें वह घर पूर्ण रूप से समृद्धि दें, इसका ध्यान रखना चाहिए। अत: वास्तु के अनुसार गृह निर्माण करवाना चाहिए।

किसी भी प्लॉट या भूमि पर गृह निर्माण करते समय यह ध्यान रखें कि भूमि (प्लॉट) के अग्नि कोण में खाना बनाने का स्थान (रसोई घर), दक्षिण-पश्चिम में शयन गृह, अस्त्र-शस्त्रागार, पश्चिम में भोजन करने का स्थान, वायव्य कोण में मेहमान का कमरा, ईशान में देवालय एवं उत्तर में भारी वस्तुयें रखने का स्थान होना चाहिए, तथा उत्तर-पूर्व के मध्य बाथरूम होना अच्छा है।

जल स्थान एवं वास्तुशास्त्र :-

मकान में पानी का स्थान सभी मतों से ईशान से प्राप्त करने को कहा जाता है, और घर के पानी को उत्तर दिशा में घर के पानी को निकालने के लिये कहा जाता है। लेकिन जिनके घर पश्चिम दिशा की तरफ़ अपनी फ़ेसिंग किये होते हैं, और पानी आने का मुख्य स्तोत्र या तो वायव्य से होता है, या फ़िर दक्षिण पश्चिम से होता है, उन घरों के लिये पानी को ईशान से कैसे प्राप्त किया जा सकता है? इसके लिये वास्तुशास्त्री अपनी अपनी राय के अनुसार कहते हैं, कि पानी को पहले ईशान में ले जायें।
मेरा मानना है कि घर के अन्दर पानी का इन्टरेन्स कहीं से भी हो, लेकिन पानी को ईशान में ले जाने से पानी की घर के अन्दर प्रवेश की क्रिया से तो वास्तुदोष दूर नही किया जा सकता है, लेकिन ईशान में रख कर उसका ख़राब इफ़ेक्ट तो हम कम कर सकते ही हैं।

पानी के प्रवेश के लिये अगर घर का फ़ेस साउथ में है, तो और भी जटिल समस्या पैदा हो जाती है, नैऋत्य दिशा से आता है तो कीटाणुओं और रसायनिक जांच से उसमे किसी न किसी प्रकार की गंदगी जरूर मिलेगी, और अगर वह अग्नि दिशा से प्रवेश करता है, तो घर के अन्दर पानी की कमी ही रहेगी, और जितना पानी घर के अन्दर प्रवेश करेगा, उससे कहीं अधिक महिलाओं सम्बन्धी बीमारियां मिलेंगी।

पानी को उत्तर दिशा वाले मकानों के अन्दर ईशान और वायव्य से घर के अन्दर प्रवेश दिया जा सकता है, लेकिन मकान के बनाते समय अगर पानी को ईशान में नैऋत्य से ऊंचाई से घर के अन्दर प्रवेश करवा दिया गया तो भी पानी अपनी वही स्थिति रखेगा जो नैऋत्य से पानी को घर के अन्दर लाने से माना जा सकता है।

पानी को ईशान से लाते समय जमीनी सतह से नीचे लाकर एक टंकी पानी की अण्डर ग्राउंड बनवानी चाहिए, फ़िर पानी को घर के प्रयोग के लिये लाना चाहिये। बरसात के पानी को निकालने के लिये जहां तक हो उत्तर दिशा से ही निकालें, फ़िर देखें घर के अन्दर धन की आवक में कितना इजाफ़ा होता है, लेकिन उत्तर से पानी निकालने के बाद आपका मनमुटाव सामने वाले पडौसी से हो सकता है, इसके लिये उससे भी मधुर सम्बन्ध बनाने की कोशिश करते रहे।

वास्तुशास्त्र में भवन का निर्माण करते समय जल का भंडारण किस दिशा में हो यह एक महत्वपूर्ण विषय है शास्त्रों के अनुसार भवन में जल का स्थान ईशान कोण (नॉर्थ ईस्ट) में होना चाहिए परन्तु उतर दिशा, पूर्व दिशा और पश्चिम दिशा में भी जल का स्थान हो सकता है, परन्तु आग्नेय कोण में यदि जल का स्थान होगा तो पुत्र नाश, शत्रु भय और बाधा का सामना होता है, दक्षिण पश्चिम दिशा में जल का स्थान पुत्र की हानि,दक्षिण दिशा में पत्नी की हानि, वायव्य दिशा में शत्रु पीड़ा और घर का मध्य में धन का नाश होता है।

वास्तु शास्त्र में भूखंड के या भवन के दक्षिण और पश्चिम दिशा की और कोई नदी या नाला या कोई नहर भवन या भूखंड के समानंतर नहीं होनी चाहिए परन्तु यदि जल का बहाव पश्चिम से पूर्व की और हो या फिर दक्षिण से उतर की और तो उत्तम होता है, भवन में जल का भंडारण आग्नेय, दक्षिण पश्चिम, वायव्य कोण, दक्षिण दिशा में ना हो, जल भंडारण की सबसे उत्तम दिशा पूर्व, उत्तर या ईशान कोण है।

अग्नि कोण के गेट वाले घर :-

अग्नि कोण के गेट वाले घरों में और उत्तर की तरफ़ सीढियों वाले मकान कभी भी कर्जे से मुक्त नही हो पाते हैं। जिन घरों के दरवाजे नैऋत्य में होते हैं, और उनके नैऋत्य में ही अगर पानी के टेंक अन्डरग्राउंड बना दिये गये हैं, तो उस मकान में रहने वाले जीवन भर कोर्ट केस और सरकारी कर्जों से मुक्त नही हो पाते हैं। अक्सर इस दिशा के दरवाजे वालों के दो ही पुत्र होते हैं, जिनमें बडे पुत्र के कारण पूरे घर की सम्पत्ति का विनाश हो जाता है,और अंत में वह भी एक पुत्री के होने के बाद अपनी लीला किसी तामसी कारण से समाप्त कर लेता है।

ईशान दिशा :-

यदि ईशान क्षेत्र की उत्तरी या पूर्वी दीवार कटी हो, तो उस कटे हुए भाग पर एक बड़ा शीशा लगाएं। इससे भवन का ईशान क्षेत्र प्रतीकात्मक रूप से बढ़ जाता है। यदि ईशान कटा हो, अथवा किसी अन्य कोण की दिशा बढ़ी हो, तो किसी साधु पुरुष अथवा अपने गुरु या बृहस्पति ग्रह या फिर ब्रह्मा जी का कोई चित्र अथवा मूर्ति या कोई अन्य प्रतीक चिह्न ईशान में रखें। गुरु की सेवा करना सर्वोत्तम उपाय है। बृहस्पति ईशान के स्वामी और देवताओं के गुरु हैं। कटे ईशान के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए साधु पुरुषों को बेसन की बनी बर्फी या लड्डुओं का प्रसाद बांटना चाहिए। यह क्षेत्र जलकुंड, कुआं अथवा पेयजल के किसी अन्य स्रोत हेतु सर्वोत्तम स्थान है। यदि यहां जल हो, तो चीनी मिट्टी के एक पात्र में जल और तुलसीदल या फिर गुलदस्ता अथवा एक पात्र में फूलों की पंखुड़ियां और जल रखें। शुभ फल की प्राप्ति के लिए इस जल और फूलों को नित्य प्रति बदलते रहें। अपने शयन कक्ष की ईशान दिशा की दीवार पर भोजन की तलाश में उड़ते शुभ पक्षियों का एक सुंदर चित्र लगाएं। कमाने हेतु बाहर निकलने से हिचकने वाले लोगों पर इसका चमत्कारी प्रभाव होता है। यह अकर्मण्य लोगों में नवीन उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है। बर्फ से ढके कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ योगी की मुद्रा में बैठे महादेव शिव का ऐसा फोटो, चित्र अथवा मूर्ति स्थापित करें, जिसमें उनके भाल पर चंद्रमा हो और लंबी जटाओं से गंगा जी निकल रही हों।
ईशान में विधि पूर्वक बृहस्पति यंत्र की स्थापना करें।

पूर्व दिशा में दोष /बचाव के उपाय :-

* यदि भवन में पूर्व दिशा का स्थान ऊँचा हो, तो व्यक्ति का सारा जीवन आर्थिक अभावों, परेशानियों में ही व्यतीत होता रहेगा, और उसकी सन्तान अस्वस्थ, कमजोर स्मरणशक्ति वाली, पढाई-लिखाई में जी चुराने तथा पेट और यकृत के रोगों से पीडित रहेगी।

* यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान न हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर हो, तो परिवार के मुखिया को आँखों की बीमारी, स्नायु अथवा ह्रदय रोग की स्मस्या का सामना करना पडता है।

* घर के पूर्वी भाग में कूडा-कर्कट, गन्दगी एवं पत्थर, मिट्टी इत्यादि के ढेर हों, तो गृहस्वामिनी में गर्भहानि का सामना करना पडता है।

* भवन के पश्चिम में नीचा या रिक्त स्थान हो, तो गृहस्वामी यकृत, गले, गाल ब्लैडर इत्यादि किसी बीमारी से परिवार को मंझधार में ही छोडकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

* यदि पूर्व की दिवार पश्चिम दिशा की दिवार से अधिक ऊँची हो, तो संतान हानि का सामना करना पडता है।

* अगर पूर्व दिशा में शौचालय का निर्माण किया जाए, तो घर की बहू-बेटियाँ अवश्य अस्वस्थ रहेंगीं।

बचाव के उपाय:-

* पूर्व दिशा में पानी, पानी की टंकी, नल, हैंडापम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा।

* पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है, जो कि कालपुरूष के मुख का प्रतीक है, इसके लिए घर के मुखिया को चांदी पर बना ‘सूर्य यन्त्र’ हमेशा धारण करना चाहिए, और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज (झंडा) लगायें।

* पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें, धन और वंश की वृद्धि होगी, तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढेगी।

• दूध, दही, घी, सिरका, अचार का स्थान रसोई के बगल में होना चाहिए। श्रृंगार एवं औषधि सामग्री शयनकक्ष के बगल में होना चाहिए। विद्यार्थियों के पढ़ने का कमरा देवालय के बगल में होना चाहिए।

• घर के आस-पास बड़, पीपल, इमली, कैथ, नींबू, कांटे वाले एवं दूध वाले वृक्ष नहीं होना चाहिए। इस वृक्षों के घर के आस-पास होने से धन की हानि होती है।

• कुआं एवं जल का स्थान मुख्य द्वार से पूर्व ईशान, उत्तर अथवा पश्चिम में होने से धन प्राप्त होता है। सौभाग्य में बढ़ोतरी होती है।

• अग्निकोण में संतान हानि, दक्षिण में गृहिणी का नाश, नैऋत्य कोण में गृह मालिक का नाश एवं वायु कोण में भय, चिंता बनी रहती है।

• भवन में स्तंभ लगाने की आवश्यकता हो, तो स्तंभ सम संख्या में लगवाना चाहिए। इनकी संख्या यदि विषम हो, तो अशुभ फल देते है।

• पूर्ण रूप से उपरोक्त विधि को ध्यान में रखते हुए भवन निर्माण करने से घर में सुख-समृद्धि, यश, वैभव एवं शांति प्राप्त होती है।

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कार्तिक

कार्तिक मास का महत्व, कार्तिक में क्या करें, और क्या न करें?

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इस वर्ष 2018 में कार्तिक मास 23 अक्टूबर से आरम्भ हो रहा है। तथा कार्तिक पूर्णिमा 23 नवम्बर 2018 के दिन है। पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक मास के समान पुण्य प्रदायक कोई मास नहीं है, सतयुग के समान कोई युग नहीं है। वेदों के समान कोई शास्त्र नहीं, और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है। स्कन्द पुराण में भी कार्तिक मास को सबसे उत्तम मास माना गया है। इसी तरह सभी देवताओं में श्रीहरि, सभी तीर्थों में बद्रीनारायण को सबसे श्रेष्ठ माना है।

इस मास में ऐसा क्या किया जाता है, जिस से यह मास पुण्य प्रदायक है :-
कार्तिक मास में जो लोग संकल्प लेकर प्रतिदिन प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी तीर्थ स्थान, किसी नदी अथवा पोखर पर जाकर कार्तिक स्नान करते हैं, या घर में ही गंगाजल युक्त जल से स्नान करते हुए भगवान का ध्यान करते हैं, उन पर प्रभु प्रसन्न होते हैं। कार्तिक स्नान के पश्चात पहले भगवान विष्णु एवं शिव और बाद में सूर्य भगवान को अर्ध्य प्रदान करते हुए विधिपूर्वक अन्य दिव्यात्माओं को अर्ध्य देते हुए पितरों का तर्पण करना चाहिए। पितृ तर्पण के समय हाथ में तिल अवश्य लेने चाहिये क्योंकि मान्यता है कि जितने तिलों को हाथ में लेकर कोई अपने पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण करता है, उतने ही वर्षों तक उनके पितर स्वर्गलोक में वास करते हैं। इस मास अधिक से अधिक प्रभु नाम का चिंतन करना चाहिए।

स्नान के पश्चात नए एवं पवित्र वस्त्र धारण करें, तथा भगवान विष्णु जी का धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प एवं मौसम के फलों के साथ विधिवत सच्चे मन से पूजन करें, भगवान को मस्तक झुकाकर बारम्बार प्रणाम करते हुए किसी भी गलती के लिए क्षमा याचना करें। कार्तिक मास की कथा स्वयं सुनें तथा दूसरों को भी सुनाएं। कुछ लोग कार्तिक मास में व्रत करने का भी संकल्प करते हैं, तथा केवल फलाहार करते हैं, जबकि कुछ लोग पूरा मास एक समय भोजन करके कार्तिक मास के नियम का पालन करते हैं। इस मास में श्रीमद्भागवत कथा, श्री रामायण, श्रीमद्भगवदगीता, श्री विष्णुसहस्रनाम आदि स्रोत्रों का पाठ करना उत्तम है।

कार्तिक मास में दीपदान की महिमा :- वैसे तो भगवान के मंदिर में दीप दान करने वालों के घर सदा खुशहाल रहते हैं, परंतु कार्तिक मास में दीपदान की असीम महिमा है। इस मास में वैसे तो किसी भी देव मंदिर में जाकर रात्रि जागरण किया जा सकता है, परंतु यदि किसी कारण वश मंदिर में जाना सम्भव न हो तो किसी पीपल व वट वृक्ष के नीचे बैठकर अथवा तुलसी के पास दीपक जलाकर प्रभु नाम की महिमा का गुणगान किया जा सकता है। इस मास में भूमि शयन करना भी उत्तम है । पितरों के लिए आकाश में दीपदान करने की अत्यधिक महिमा है, जो लोग भगवान विष्णु के लिए आकाश दीप का दान करते हैं, उन्हें कभी क्रूर मुख वाले यमराज का दर्शन नहीं करना पड़ता, और जो लोग अपने पितरों के निमित्त आकाश में दीपदान करते हैं, उनके नरक में पड़े पितर भी उत्तम गति को प्राप्त करते हैं। जो लोग नदी किनारे, देवालय, सड़क के चौराहे पर दीपदान करते हैं, उन्हें सर्वतोमुखी लक्ष्मी प्राप्त होती है।

दान की महिमा :- कार्तिक मास में दान अति श्रेष्ठ कर्म है। स्कंदपुराण के अनुसार दानों में श्रेष्ठ कन्यादान है। कन्यादान से बड़ा विद्या दान, विद्यादान से बड़ा गौदान, गौदान से बड़ा अन्न दान माना गया है। अपनी सामर्थ्यानुसार धन, वस्त्र, कंबल, रजाई, जूता, गद्दा, छाता व किसी भी वस्तु का दान करना चाहिए तथा कार्तिक में केला और आंवले के फल का दान करना भी श्रेयस्कर है। कलियुग में कार्तिक मास को मोक्ष के साधन के रूप में दर्शाया गया है। पुराणों के मतानुसार इस मास में कार्तिक स्नान व दान चारों पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को देने वाला माना गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार नारायण ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने नारद को और नारद ने महाराज पृथु ने कार्तिक मास के सर्वगुणसंपन्न माहात्मय के संदर्भ में बताया गया है।

कार्तिक मास में जो कार्य प्रधान माने गए हैं :-
1- धर्म शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास में सबसे प्रधान कार्य दीपदान करना बताया गया है। इस मास में नदी, पोखर, तालाब आदि में दीपदान किया जाता है। इससे अतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है।
2- इस मास में तुलसी पूजन करने तथा सेवन करने का विशेष महत्व बताया गया है। वैसे तो हर मास में तुलसी का सेवन व आराधना करना श्रेयस्कर होता है, लेकिन कार्तिक में तुलसी पूजा का महत्व कई गुना माना गया है।
3- भूमि पर शयन करना कार्तिक मास का तीसरा प्रधान कार्य माना गया है। भूमि पर शयन करने से मन में सात्विकता का भाव आता है, तथा अन्य विकार भी समाप्त हो जाते हैं।
4- कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है।
5- कार्तिक मास में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई, बैंगन आदि का सेवन निषेध है।

कार्तिक व्रत के नियम :-
1- कार्तिक व्रती (कार्तिक मास में व्रत रखने वाला) को तामसिक एवं उत्तेजक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
2- किसी दूसरे के अन्न का भक्षण, किसी से द्रोह तथा परदेश गमन भी निषेध है।
3- दिन के चौथे पहर में एक समय पत्तल पर भोजन करना चाहिए।
4- कार्तिकव्रती को ब्रह्मचर्य का पालन करना तथा भूमि पर शयन करना आवश्यक होता है।
5- पूरे मास में केवल एक बार नरक चतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) को ही शरीर पर तेल लगाना चाहिए। शेष दिनों में तेल लगाना वर्जित है।
6- व्रती को लौकी, गाजर, कैथ, बैंगन आदि तथा बासी अन्न, पराया अन्न व दूषित अन्न नहीं खाना चाहिए।
7- व्रती को चाहिए कि वह तपस्वियों के समान व्यवहार करे। अर्थात कम बोले, किसी की निंदा या विवाद न करे, मन पर संयम रखें आदि !

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दशहरा और शमी

दशहरा और शमी, का सम्बन्ध उत्तर भारत में प्रचलित है:-

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उत्तर भारत में यह विश्वास किया जाता है, की दशहरा के दिन शमी का पौधा घर पर लायें, उसको खाद-पानी देकर उसकी सेवा करें, और हर शनिवार को शाम में तिल तेल का दीपक शमी के पौधे के नीचे जलायें, ऐसा करने से जीवन में कभी धन की कमी नहीं होगी, तथा हर छेत्र में सफलता मिलेगी, दशहरा के दिन माता के मंदिर में लाल कपड़ा या लाल चुनरी भी अर्पित करें, या मंदिर के बाहर बैठे निर्धन को दान करें, तथा मंदिर में प्रकाश दान करें तो जीवन में कभी धन का अभाव नहीं रहेगा। शमी को खेजड़ी, जण्ड या सांगरी नाम से भी जाना जाता है, मूलतः यह रेगिस्तान में पाया जाने वाला वृक्ष है, जो थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों पर भी पाया जाता है। अंग्रेजी में यह प्रोसोपिस सिनेरेरिया नाम से जाना जाता है

विजया-दशमी या दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की प्रथा है। कहा जाता है ये भगवान श्री राम का प्रिय वृक्ष था और लंका पर आक्रमण से पहले उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा कर के उससे विजयी होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था। आज भी कई जगहों पर लोग रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते धन-संपदा के प्रतीक के रूप में एक दूसरे को बाँटते हैं, और उनके कार्यों में सफलता मिलने कि कामना करते हैं। शमी वृक्ष का वर्णन महाभारत काल में भी मिलता है, अपने 12 वर्ष के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने सारे अस्त्र इसी पेड़ पर छुपाये थे जिसमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी था। कुरुक्षेत्र में कौरवों के साथ युद्ध के लिये जाने से पहले भी पांडवों ने शमी के वृक्ष की पूजा की थी, और उससे शक्ति और विजय की कामना की थी, तब से ही ये माना जाने लगा जो भी इस वृक्ष कि पूजा करता है, उसे शक्ति और विजय मिलती है

शमी शमयते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया । तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता

हे शमी, आप पापों का क्षय करने वाली और दुश्मनों को पराजित करने वाली हैं। आप अर्जुन का धनुष धारण करने वाली हैं, और श्री राम को प्रिय हैं, जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा की थी, मैं भी करता हूँ। मेरी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर करके उसे सुखमय बना दीजिये, एक और कथा के अनुसार कवि कालिदास ने शमी के वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या कर के ही ज्ञान कि प्राप्ति की थी, शमी वृक्ष की लकड़ी शनि ग्रह की शांति के लिए किसे जाने वाले यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। शनिवार को शनि शांति के लिए शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है। शनि देव को शान्त रखने के लिये शमी वृक्ष की पूजा की जाती है, शमी को गणेश जी का प्रिय वृक्ष भी माना जाता है, और इसकी पत्तियाँ गणेश जी की पूजा में भी चढ़ाई जाती हैं। बिहार और झारखण्ड समेत आसपास के कई राज्यों में इस वृक्ष की पूजा की जाती है, और इसे लगभग हर घर के दरवाज़े के दाहिनी ओर लगा देखा जा सकता है। किसी भी काम पर जाने से पहले इसके दर्शन को शुभ मना जाता है। आश्विन शुक्ल दशमी को विजय दशमी कहा जाता है, विजय के संदर्भ में दशहरा के दिन शास्त्रों में बताया गया है, की विजय प्राप्ति के लिए शस्त्र (हथियार) की पूजा अवश्य करें

आज के दिन नवीन हथियार खरीद कर घर की दक्षिण दिशा में टांगना चाहिए, साथ ही शमी और अपराजिता वृक्ष की पूजा करें और दोनों की जड़ दाहिने हाँथ में बांधने से समाज में यश और कीर्ति बढती है, क्यों‌ की दशहरा के दिन ही नौ दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा-आराधना करने के बाद भगवान श्री राम ने अभिमानी रावण का वध कर के इस संसार को असत्य पर सत्य की जीत का सन्देश दिया था

शमीपूजन:
निम्न श्लोकोंसे शमी की प्रार्थना की जाती है :-
शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका । धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी ।। करिष्यमाणयात्रायां यथाकाल सुखं मया।तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वंभवश्रीरामपूजिते।।

श्लोक के उच्चारण के साथ ही मानसिक रूप से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि ‘शमी सभी पापों को नष्ट करती है। शमी शत्रुओं का समूल विनाश करती है। शमी के कांटे हत्या इत्यादि के पापों से भी रक्षा करते हैं। अर्जुन के धनुष को धारण करने वाली और भगवान श्रीराम को भी प्रिय लगने वाली शमी मेरा कल्याण करे।

अपराजिता पूजन मंत्र :- हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनक मेखला। अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम।।

पूजा के समय वृक्ष के नीचे चावल, सुपारी हल्दी की गांठ और मुद्रा रखते हैं । फिर वृक्ष की प्रदक्षिणा कर उसके मूल (जड़) के पास की थोड़ी मिट्टी व उस वृक्ष के पत्ते घर लाते हैं । ऐसा जो आज के दिन करता है, यह साल भर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। अपराजिता देवी सकल सिद्धियों की प्रदात्री साक्षात् माता दुर्गा का ही अवतार हैं। यात्रा प्रारंभ करने के समय माता अपराजिता की यह स्तुति अनिवार्य रूप से करनी चाहिए, जिससे यात्रा में कोई विघ्न उपस्थित नहीं होता।

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बगलामुखी साधना

बगलामुखी दश महाविद्याओं में ये एक अतिउग्र महाविद्या है, यह ब्रह्मास्त्रविद्या मानी जाती है, इस साधना के साधक मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन एवं विद्वेषण प्रयोग करने में समर्थ होते हैं, यह तंत्र विद्या प्रचण्ड तूफान की तरह शत्रु का मान-मर्दन करने में पूरी तरह से सक्षम है:-

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भारतीय तंत्र-शास्त्र अपने आप में अद्भुत आश्चर्य जनक एवं रहस्यमय रहा है। ज्यों-ज्यों हम इसके रहस्य की गहराई में जाते हैं। त्यों-त्यों हमें विलक्षण अनुभव होते हैं। कुछ तंत्र-मंत्र तो बलशाली एवं शीघ्र फलदायी हैं, ऐसे ही मंत्रों में एक मंत्र है – बगलामुखी मंत्र यह मंत्र तो प्रचण्ड तूफान से भी टक्कर लेने में समर्थ है, इसी लिए इस मंत्र विद्या (साधना) को ब्रह्मास्त्रविद्या कहा गया है। एक तरफ जहाँ यह मंत्र शीघ्र ही सफलता दायक है, वहीं दूसरी ओर विशेष अनुष्ठान एवं मंत्र जप के द्वारा जो बगलामुखी यंत्र सिद्ध किया जाता है, वह भी तुरन्त कार्य सिद्ध में सहायता प्रदान करता है। बहुत से तांत्रिक तो यह कहते हैं कि पूरे विश्व की ताकत भी इस मंत्र से टक्कर लेने में असमर्थ है। मंत्रमहाणर्व में इसके बारे में लिखा है:-

बृह्मस्त्रं च प्रवक्ष्यामि स्दयः प्रत्यय कारण्।
मस्य स्मरणमात्रेण पवनोडपि स्थिरावते।।

इस मंत्र को सिद्ध करने के बाद मात्र इच्छा शक्ति से ही प्रचण्ड पवन भी स्थिर हो जाती है। व्यक्ति के घर में इस मंत्र से सिद्ध यंत्र हो, या फिर जिस व्यक्ति ने अपनी भुजा पर इस यंत्र को बाँध रखा हो, उस की कभी भी शत्रु हानि नहीं कर सकते। अनेक तांत्रिकों का मत है कि आज के युग में जब पग-पग पर शत्रु हावी होने की चेष्टा करते हैं, और इस प्रकार से चारों तरफ शत्रु नीचा दिखाने का प्रयत्न करते हैैं, तब प्रत्येक उन्नति चाहने वाले व्यक्ति के लिये यह तांत्रिक साधना या यह यंत्र धारण करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य समझा जा सकता है। सारे शत्रु निवारण यंत्रों में बगलामुखी यंत्र सर्वश्रेष्ठ है यह सिद्ध तांत्रिक यंत्र अद्भुत व प्रभावशाली है, तथा किसी भी प्रकार के मुकद्दमें में सफलता देने में सहायक है। यह कह सकते हैं कि यह सिद्ध यंत्र शत्रुओं का मान-मर्दन करने में पूरी तरह से सक्षम है। जो अपने जीवन में बिना किसी शत्रुबाधा के उन्नति चाहता है, प्रगति से सर्वाेच्य शिखर पर पहुँचना चाहता है, उसके लिये बगलामुखी साधना आवश्यक है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस यंत्र का उपयोग जहाँ हिन्दू राजाओं ने अपने शत्रु के मर्दन के लिये किया था, वहीं कुछ विदेशी शासकों ने भी इसका प्रयोग कर अनेक कार्यों में सफलता प्राप्त की। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने भी अपने शत्रुओं को परास्त करने के लिये बगलामुखी साधना कराई और सफलता प्राप्त की हिन्दू शासकों में तो चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, समुंद्रगुप्त ने भी बगलामुखी साधना अपने तांत्रिकों से कराकर शत्रुओं पर विजय एवं सफलता प्राप्त की।

इस साधना से मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन एवं विद्वेषण प्रयोग भली-भाँति सफलता पूर्वक सम्पन्न किये जाते हैं। जहाँ तक मेरा अनुभव है, उस मंत्र की साधना से बांझ स्त्री को भी मनचाही संतान प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है। इसके साथ ही साथ शत्रुओं का मान मर्दन कर अपार विजय प्राप्त की जा सकती है। दरिद्र व्यक्ति को सम्पन्न बनाने के लिये मार्ग प्रशस्त किय जा सकता है, और प्रतिकूल मुकद्दमें में भी पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है। परन्तु भूल करके भी सामान्य व्यक्ति को इस प्रकार की साधना में नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि यह साधना तलवार की धार के समान है। अतः यदि थोड़ी सी भी गलती हो जाये तो साधना करने वाला व्यक्ति ही कष्ट में आ जाता है, मेरे अपने अनुभव से तो यही कहूंगा कि बिना पूरा ज्ञान प्राप्त किये जिन लोगों ने यह साधना को प्रारम्भ किया वे साधना काल में ही पागल होते देखे गये हैं, और बड़ी कठिनाई से उन्हें सामान्य अवस्था में लाया गया। अतः सामान्य पण्डित भी इस प्रकार की साधना करने में हिचकिचाते हैं, जो भी व्यक्ति इस साधना को सम्पन्न करना चाहे, उन्हें चाहिये कि वह योग्य गुरू के निर्देशन में ही कार्य सम्पन्न करें, और यदि यंत्र सिद्धकर यंत्र धारण करना चाहे तो उन्हें चाहिये कि वह बगलामुखी सिद्धि किसे हुए विद्वान की देखरेख में यह साधना सम्पन्न करें। साधना काल में प्रत्येक साधक को दृढ़ता के साथ इनसे सम्बंधित नियमों का पालन करना चाहिये।

साधना काल में ध्यान रखने योग्य बातें:-
1. बगलामुखी साधना में साधक को पूर्ण पवित्रता के साथ मंत्र जप करना चाहिये और उसे पूरी तरह ब्रह्माचर्य व्रत का पालन करना चाहिये।

2. साधक को पीले वस्त्र धारण करना चाहिये, धोती तथा ऊपर ओढ़ने वाली चादर दोनों ही पीले रंग में रंगी हो।

3. साधक एक समय में भोजन करें और भोजन में बेसन से बनी हुई वस्तु का प्रयोग अवश्य करें।

4. साधक को दिन में नींद नहीं लेना चाहिये न व्यर्थ की बातचीत करें, और न किसी स्त्री से किसी प्रकार का सम्पर्क स्थापित करें।

5. साधना काल में साधक बगलामुखी यंत्र बनाकर उसे स्थापित कर उसके मंत्र जाप करें।

6. साधना काल में साधक बाल न कटवायें और न क्षौर कर्म ही करें।

7. यह साधना या मंत्र जाप रात्रि को होता है। अतः यह साधना रात के समय 10 बजे से प्रातः 4 बजे के बीच करें, परन्तु जो साधना सिद्धि कर चुके हैं, वे साधक या ब्राह्मण दिन को भी मंत्र जाप कर सकते हैं।

8. साधना काल में पीली गौ का घी प्रयोग में लें तथा दीपक में जिस रूई का प्रयोग करें उसे पहले पीले रंग में रंग कर सुखा लें और उसके बाद ही उस रूई को दीपक के लिये प्रयोग करें।

9. साधना में 36 अक्षर वाला मंत्र प्रयोग करना ही उचित है और यही मंत्र शीघ्र सफलता देने में सहायक है।

10. साधना घर के एकांत कमरे में देवी मंदिर में, पर्वत शिखर पर शिवालय में या गुरू के समीप बैठकर की जानी चाहिये।

11. इसके मारण, मोहन वंशीकरण, उच्चाटन कई प्रयोग हैं। अतः गुरू से आज्ञा प्राप्त कर उसके बताये हुये रास्ते से ही साधना करना चाहिये।

13. मोक्ष प्राप्ति के लिये क्रोध का स्तम्भन आवश्यक है, और यह इस प्रयोग से संभव है। अतः मोक्ष प्राप्ति के लिये भी इसका प्रयोग साधक और वैष्णव लोग करते हैं।

14. साधना में कुलाचार का पूजन, वीर साधना, चक्रानुष्ठान अवश्य ही करना चाहिये जिससे कि कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हो सकें। महान शत्रुओं पर विजय आसुरी तत्वों पर विजय, शत्रुभय निवारण और शत्रु संहारक तथा राजकीय महाभय, कोर्ट केस और बंधन से मुक्ति के लिये यह अमोघ और शत्रुदमन ब्रह्मास्त्रविद्या कवच है।

इस मंत्र से सिद्ध साधक को बगलामुखी महायंत्र को सोने पर उत्कीर्ण करवा कर या भोजपत्र के ऊपर केशर, अष्टगंध से लिखकर प्रतिष्ठा पुरश्चरण विधान करके प्राण-प्रतिष्ठा पूर्वक सोने के कवच में बंद कर देना चाहिए, बाद में ब्रह्मास्त्र बगलामुखी सवालक्ष मंत्र से सिद्ध करके धारण करने से शत्रु का दमन होता है। राजकीय केस में भी सफलता मिलती है। इस ब्रह्मास्त्र प्रयोग से सर्वकार्य में विजय, यश प्राप्त होता है। तथा मारण-मोहन, वशीकरण, स्तंभन, उच्चाटन, मूठ-चोट आदि तमाम शत्रु द्वारा उत्पन्न संकट दूर होते हैं। भूत-प्रेतादि महाभय नष्ट होते हैं, तथा सर्व प्रकार से सर्व दिशाओं से विजय प्राप्त होती है। ऐसा अमोघ ब्रह्मास्त्रविद्या कवच जो जगत में सर्वोपरि है, उससे ऊँचा कोई यंत्र, मंत्र या तंत्र जगत में नहीं है।

श्री ब्रह्मास्त्र महाविद्या मंत्र – तंत्र शास्त्र में दशमहाविद्या की महिमा अतिविशिष्ठ है। उसमें सर्वोपरि बगला उपासना जो सर्वसिद्ध है। परन्तु वह गुरूगम्य होने से योग्य गुरू के पास मंत्र दीक्षा ग्रहण करने के बाद उपासना करने से सिद्धि प्राप्त होती है। पुरश्चरण सिद्धि करने से या योग्य विद्वान के पास करवाने से सिद्ध होता है। क्योंकि क्रिया शुद्धि के बिना मंत्र सिद्धि नहीं होती है।

पुरश्चरण:-

पीताम्बरधरो भूत्वा पूर्वाशाभिमुखः स्थितः। लक्षमेकं जपेन्मत्रं हरिद्रा ग्रन्थि मालया।।
ब्रह्मचर्य स्तो नित्यं प्रयतो ध्यान तत्परः। पियंगुकुसमे नापि पीतयपुष्येन होमयेत्।।

बगलामुखी पुरश्चरण के लिये एकान्त जगह, जमीन गाय के गोबर से लीपी हुई, पीला आसन, पीला पीताम्बर, पीली हल्दी की माला, पीला पात्र, सुवर्ण प्रतिमा यंत्र तथा पीले फूल, केसर, हल्दी, अष्टगंध से अर्चन फिर अंगन्यास, करन्यास आदि करके आह्वान ध्यान फिर सवालक्ष मंत्र अनुष्ठान, दशांश पीत पुष्प से हवन, तर्पण, मार्जन, ब्रह्मभोजन, कुमारी पूजन, भोजन से अनुष्ठान सिद्ध होता है।

श्री बगलामुखी मंत्र –
ॐ हृीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदंस्तम्भ्यजिह्वां। कीलय बुद्धिं विनाशाय हृीं ऊँ स्वाहा।।

यह महामंत्र मूल मंत्र है जिसका पुरश्चरण करने से पहले निम्न मंत्रों से पूजा करनी चाहिये।

बगलामुखी गायत्री मंत्र –
ॐ बगलामुख्यैच विद्नहे स्तम्भिन्यै च धीमहि तन्नौदेवी प्रचोदयात्।।

बगलामुखी देवी यंत्र मूर्ति, न्यास, प्राण प्रतिष्ठा, महापूजन करके निम्न मंत्र से ध्यान करके पुरश्चरण करना चाहिये।

विनियोग:-
ॐ अस्य श्री बगलामुखी मन्त्रस्य नारद ऋषिः त्रिष्टुप छन्दः बगलामुखी देवता हृीं बीजम स्वाहा शक्तिः ममाअभीष्ट सिध्यर्थेजपे विनियोगः।

ध्यानम:-
मध्ये सुधाब्धिमणि मण्डय रतन्वेधां। सिंहा सनोपरि गतां पर पीतवर्णाम।।
पीताम्बरा भरण-मालय- विभूषितांगी। देवी स्मरामि धृत-मुदगर वैरि जिह्वाम।।
जिह्यग्र मादाय करेण देवी वामेन शत्रुन परिपीडयन्तीम्। गदाभिधातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढयां द्विभुजां नमामि।।

उपरोक्त ध्यानादि के बाद पूर्व दिशा में मुख रखकर सरसों तेल का दीपक जलाकर कलश स्नापनादि करके एक ही आसन पर नियमित रूप से हर रोज 41 माला 31 दिन तक करें। और सवालक्ष पूर्ण करके दशांश क्रम से महापुरश्चरण सिद्ध होता है, तथा बगलामुखी कवच ब्रह्मस्त्र गले में या भुजा में धारण करने से त्रैलोक्य विजयी भवेत् हर जगह से विजय प्राप्त होती है।

बगला साधना से किस-किस प्रकार की समस्या का समाधान संभव है :-
बगलामुखी उपासना से मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, अनिष्ट ग्रहों के आवरणों से मुक्ति, मन इच्छित व्यक्ति का मिलन, शत्रु पर विजय, कोर्ट केस में विजय, बंधन, जेल से मुक्ति होती है, तथा शत्रु के अलावा पर बुद्धि, देव, दानव, सर्प और हिंसक प्राणियों पर भी स्तंभन होता है।

देवी के प्रमुख मंदिर:- बगलामुखी का मन्दिर दतिया गोहाटी आसाम में है। गोहाटी जयपुर से डायरेक्ट वायुयान द्वारा जाया जा सकता है।

बगलामुखी साधना में प्रयोग होने वाली सामग्री :-
आकर्षण:- शहद, घी, मिश्री के साथ नमक का हवन करने से सभी का आकर्षण होता है।

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कुबेर साधना

इस वर्ष दीपावली पर्व व धन त्रयोदशी के पर्व पर आप भी करें – धन कुबेर साधना।

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवलोक के धनाध्यक्ष कुबेर हैं। कुबेर न केवल देवताओं के धनाध्यक्ष हैं, बल्कि समस्त यक्षों, गुह्यकों, किन्नरों और मानवों के अधिपति भी कहे गये हैं। ये नवनिधियों में पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और वर्चस् के स्वामी भी हैं। जब एक निधि भी अनन्त वैभवों को देने वाली मानी गयी है, और धनाध्यक्ष कुबेर तो गुप्त या प्रकट समस्त संसार के वैभवों के अधिष्ठाता देव हैं। यह देव उत्तर दिशा के अधिपति हैं, इसी लिये प्रायः सभी यज्ञ, पूजा उत्सवों तथा दस दिक्पालों के पूजन में उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में कुबेर का पूजन किया जाता है।

धनकुबेर और धन त्रयोदशी :- धन त्रयोदशी तथा दीपावली के दिन कुबेर की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। देवताओं के धनाध्यक्ष महाराज कुबेर राजाओं के भी अधिपति हैं, क्योकि सभी निधियों, धनों के स्वामी यही देव हैं, अतः सभी प्रकार की निधियों या सुख, वैभव तथा वर्चस्व की कामना पूर्ति, फल की वृष्टि करने में वैश्रवण कुबेर समर्थ हैं। सारांश में कहा जा सकता है कि धनाध्यक्ष कुबेर की साधना ध्यान करने से मनुष्य का दुःख-दारिद्रय दूर होता है और अनन्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में गहरा विश्वास रखने वालों का अटल विश्वास है कि शिव के अभिन्न मित्र होने से कुबेर अपने भक्त की सभी विपत्तियों से रक्षा करते हैं, और उनकी कृपा से साधक में आध्यात्मिक ज्ञान, वैराग्य आदि के साथ-साथ उदारता, सौम्यता, शांति तथा तृप्ति आदि सात्त्विक गुण भी स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाते हैं।

राजाधिराज कुबेर की साधना-
इस वर्ष धन त्रयोदशी विशेष योगों के साथ उदित हो रही है। आगामी पंक्तियों में एक अत्यन्त गोपनीय और दुर्लभ प्रयोग दिया जा रहा है जिसे धन त्रयोदशी के दिन रात्रि में ही सम्पन्न किया जाना है। इस ‘धन कुबेर साधना’ को जिस-जिस ने भी सम्पन्न किया है, उन सभी को अनायास धन प्राप्त हुआ है। यही नहीं अपितु इसके फलस्वरूप रोग, कर्ज़ व मुकद्दमें की परेशानी, विवाह बाधा, भवन का आभाव, पारिवारिक झंझट, ग्रह बाधा और आर्थिक आभाव भी दूर हुए हैं, और आज वे सभी साधक समाज में सम्माननीय तथा सम्पन्न जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस साधना को सम्पन्न करने वाले प्रत्येक साधक का यह अनुभव है, कि इस साधना को सम्पन्न करने से आर्थिक बाधा तो रहती ही नहीं, और घर की गरीबी पूर्ण रूप से लुप्त हो जाती है। इस साधना को सम्पन्न करने से धन, वैभव, सुख तथा भाग्योदय का योग शीघ्र प्राप्त होने लगता है। ‘आप का भविष्य’ के पाठकों के लिए और विशेष कर साधकों के लिए यह गोपनीय साधना प्रयोग आगे की पक्तियों में दिया जा रहा है, मेरा पूर्ण विश्वास है कि इस साधना को सम्पन्न कर निश्चय ही आप साधक मेरे कथन से सहमत होगें।

महाराज वैश्रवण कुबेर की उपासना से संबंधित मंत्र, यंत्र, ध्यान एवं उपासना आदि की सारी प्रक्रियायें श्रीविद्यार्णव, मंत्रमहार्णव, मंत्रमहोदधि, श्रीतत्त्वनिधि तथा विष्णुधर्मोत्तरादि पुराणों में विस्तार से निर्दिष्ट हैं। तदनुसार इनके अष्टाक्षर, षोडशाक्षर तथा पंचत्रिंशदक्षरात्मक छोटे-बड़े अनेक मंत्र प्राप्त होते हैं। मंत्रों के अलग-अलग ध्यान भी निर्दिष्ट हैं। मंत्र साधना में गहन रूची रखने वाले साधक उपरोक्त ग्रन्थों का अवलोकन करें। यहाँ पाठकों के लिये धनाध्यक्ष कुबेर की एक सहज व सरल साधना पद्धति दी जा रही है। यह साधना धनत्रयोदशी के दिन की जानी चाहिये यदि कोई साधक इस साधना को दीपावली की रात्रि में करना चाहे तो उस महापर्व पर भी यह साधना कर सकते हैं। अथवा दोनो ही दिन (धनत्रयोदशी तथा दीपावली) यह साधना सम्पन्न की जा सकती है। इस वर्ष धनत्रयोदशी 5 नवम्बर 2018 तथा दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है। यह साधना स्थिर लग्न में ही सम्पन्न की जाती है। क्योंकि स्थिर लग्न में जिस कार्य को किया जाता है वह स्थिरता को प्राप्त होता है, और लक्ष्मी को तो सभी स्थिर ही रखना चाहते हैं। अतः यह साधना तो अवश्य स्थिर लग्न में ही करनी चाहिये। ‘स्थिर लग्न’ इन दिनों में वृष तथा सिंह लग्न ही पढ रही हैं। वृषभ लग्न 5 नवम्बर 2018 धनत्रयोदशी के दिन सांयकाल 18 बजकर 05 मिनट से रात्रि 20 बजकर 00 मिनट तक रहेगी। तथा सिंह लग्न मध्य रात्रि में ठीक 24 बजकर 35 मिनट से 02 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। इसी प्रकार दीपावली 7 नवम्बर 2018 के दिन वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। तथा सिंह लग्न 7 नवम्बर की मध्य रात्रि को 00 बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। इस साधना के लिये यह स्थिर लग्न का मुहूर्त सर्वोत्तम महूर्त माना गया है। इस दिन स्थिर लग्न में शुद्ध रजत (चांदी) पर निर्मित कुबेर यंत्र तथा जप के लिये कमलबीज की 108 दाने की माला का प्रयोग किया जाना चाहिये। इसमें भी कुबेर यंत्र विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठित होना आवश्यक है, तथा माला नई व शुद्ध होनी चाहिये।

साधना पद्धति:- धनत्रयोदशी की रात्रि में उत्तर दिशा की ओर मुख करके पुरूष साधक पीले वस्त्र तथा महिलायें पीली साड़ी पहनकर बैठें सामने एक लकड़ी के पटरे पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर प्राण प्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र स्थापित करें और साथ ही शुद्ध घी का दीपक जलाकर पंचोपचार पूजा करें मिठाई का भोग लगावें तथा विनियोगादि क्रिया करके 11 माला कमलबीज की माला से कुबेर मंत्र का जप करें। जप सम्पूर्ण होने पर प्रसादरूप में मिठाई का परिजनों को वितरण करें और फिर रात्रि में उसी पूजा स्थल में ही निद्रा विश्राम करें। प्रातः शेष फूलादि सामग्री जल में विसर्जित कर दें तथा शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण श्री कुबेर यंत्र को पीले आसन सहित अपनी तिजोरी कैश बाॅक्स या अलमारी अथवा संदूक में रख दें। तथा कमलबीज की जप माला को गले में धारण करें।

विनियोग:-
सर्वप्रथम हाथ में जल लेकर निम्नलिखित विनियोग करें-
अस्य श्रीकुबेरमंत्रस्य विश्रवा ऋषिः बृहती छन्दः धनेश्वरः कुबेरो देवता ममाभीष्टसिद्धयथे जपे विनियोगः।

करन्यासः-
विनियोग के उपरांत करन्यास करें-
यक्षाय अंगुष्ठाभ्यां नमः।
कुबेराय तर्जनीभ्यां नमः।
वैश्रवणाय मध्यमाभ्यां नमः।
धनधान्याधिपतये अनामिकाभ्यां नमः।
धनधान्य समृद्धिं में कनिष्ठकाभ्यां नमः।
देहि दापय स्वाहा करतल करपृष्ठाभ्यां नमः।

षडंगन्यासः-
करन्यास के उपरांत षडंगन्यास करें-
यक्षाय हृदयाय नमः।
कुबेराय शिरसे स्वाहा।
वैश्रवणाय शिखायै वषट्।
धनधान्याधिपतये कवचाय हुम्।
धनधान्य समृद्धि में नेत्रत्रयाय वौषट्।
देहि दापय स्वाहा अस्त्राय फट्।

कुबेर का ध्यानः-
इनके मुख्य ध्यान श्लोक में इन्हें मनुष्यों के द्वारा पालकी पर अथवा श्रेष्ठ पुष्पक विमान पर विराजित दिखाया गया है। इनका वर्ण गारुडमणि या गरुडरत्न के समान दीप्तिमान् पीतवर्णयुक्त बतलाया गया है, और समस्त निधियां इनके साथ मूर्तिमान् होकर इनके पार्श्रवभाग में निर्दिष्ट हैं। ये किरीट मुकुटादि आभूषणों से विभूषित हैं। इनके एक हाथ में श्रेष्ठ गदा तथा दूसरे हाथ में धन प्रदान करने की वरमुद्रा सुशोभित है। ये उन्नत उदरयुक्त स्थूल शरीर वाले हैं। ऐसे भगवान् शिव के परम सुहृद् भगवान् कुबेर का ध्यान करना चाहिए-

मनुजवाह्यविमानवरस्थितं गरुडरत्ननिभं निधिनायकम्।
शिवसखं कमुकुरादिविभूषितं वरगदे दधतं भज तुन्दिलम्।।

सम्पन्नता के लिये कुबेर मंत्र-
यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय स्वाहा।

वैसे तो इस मंत्र की जप संख्या एक लक्ष (एक लाख) कही गयी है। परंतु धनत्रयोदशी अथवा दीपावली की रात्रि में जितना हो सके विधि-विधान से इस मंत्र का जप करना ही पर्याप्त होता है। मंत्र का जप सम्पन्न होने पर तिल एवं शुद्ध घी से दशांश हवन करना चाहिये। यह साधना कार्तिक कृष्ण 13 अर्थात् धन त्रयोदशी पर की जाती है, पूरे भारतवर्ष के लोग धन त्रयोदशी के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ महालक्ष्मी तथा आरोग्य प्रदान करने वाले देव धनवंतरि की पूजा-आराधना एवं साधना करते हैं, और सुख संपदा के अभिलाषी तो इस दिन कुछ विशेष प्रयोग सम्पन्न करते हैं जिससे कि अगले पूरे वर्ष तक घर के सभी सदस्य प्रसन्न व निरोगी रहें, और उनके घर में श्रीलक्ष्मी का निवास और प्रसन्नता बनी रहे।

साधना कब सम्पन्न करें?-
इस साधना या प्रयोग को केवल धन त्रयोदशी की रात्रि में ही सम्पन्न किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त किसी भी मुहूर्त में नहीं सम्पन्न किया जा सकता है। यह केवल एक रात्रि की साधना है और इस साधना को सम्पन्न करने से साधक का धनाभाव दूर होकर सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।

अनुष्ठान विधि-
सबसे पहले साधक पूजा स्थान में पीला रेशमी आसन बिछा कर उत्तर दिशा की ओर मुख कर के बैठ जाये और पूजा तथा साधना सामग्री की व्यवस्था पहले से ही कर लें। पूजा सामग्री में- 1. जल के लिये ताम्र पात्र, 2. गंगाजल या गुलाब जल, 3. दीपक के लिये शुद्ध घी, 4. प्रसाद के लिये 100 ग्रा. बताशे, 5. सफेद गुलाब के 4-5 पुष्प तथा पीले पुष्पों की दो माला, 6. नैवेद्य (मिठाई), 7. गूगल का धूप या अगरबत्ती, 8. दीपक, 9. पानी वाला नारियल, 10. पाँच प्रकार के फल, 11. रोली, 12. कलावा, 13. ग्यारह साबुत सुपारी तथा 14. पांच पान के साबुत डन्डी वाले पत्ते। साधक को यह पूजन सामग्री पूजा स्थान में एक थाल में स्वास्तिक बनाकर रख लेनी चाहिये। साथ ही साधना हेतु प्रमुख रूप से श्री शुद्ध चांदी पर बना और प्राणप्रतिष्ठित ‘कुबेर यंत्र’ तथा शुद्ध अष्टगन्ध को भी किसी प्रतिष्ठित संस्थान से मंगवाकर पहले ही रख लेना चाहिए। इसके अलावा साधक को चाहिये, धनत्रयोदशी वाले दिन सात्विक आचार विहार करें, ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करें, दिन में एक-दो बार फलाहार या दुग्धाहार करें तथा रात्रि में साधना के उपरांत भूमि शयन करें। इसके अतिरिक्त इस बात का पूरा ध्यान रखें कि इस प्रयोग या अनुष्ठान की किसी से चर्चा न की जाये अर्थात् इसे गोपनीय ही रखें।

श्री कुबेर यंत्र की विशेषता –
इस यंत्र को भली प्रकार से अष्टगंध के द्वारा आलेपित करके इस के बाद इस यंत्र के ऊपर एक सुपारी स्थापित कर दें, यह यंत्र रजत-पत्र (चांदी) पर अंकित होता है यह विशेष रूप से ध्यान में रखें, और फिर इस यंत्र को प्राण प्रतिष्ठित अवश्य किया गया हो। तभी इस का चमत्कारी प्रभाव देखने में आता है। सही विधि-विधान से सिद्ध किया गया श्री कुबेर यंत्र दुर्लभ होता है। और सिद्ध होने के बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए यह यंत्र एक ‘सौभाग्यशाली धरोहर’ बना रहता है। इस यंत्र को सिद्ध करने के उपरांत साधक को इसे शुद्ध पीले रेशमी कपडे में लपेटकर ऊपर कलावा बांधकर अपनी तिजोरी अथवा कैश बाॅक्स मे रखना चाहियेे। कभी भी इस का प्रदर्शन किसी के सामने न करें। प्रदर्शन करने से इसकी शक्ति क्षीण होती है। यदि ठीक प्रकार से सिद्ध करके रखा रहेगा तभी यह अपने आप में पूर्ण भाग्योदय कारक, धनप्रदायक तथा सौभाग्यशाली प्रभाव प्रकट करेगा। शास्त्रों में वर्णित इस प्रकार के यंत्र को आप किसी सिद्ध पुरूष से भी प्राप्त कर सकते हैं। आप यदि चाहते हैं तो समय रहते गुरूजी से भी सिद्ध करके मंगवा सकते हैं, इसके लिए shukracharya कार्यालय में पहले से अपना आर्डर बुक करवा सकते हैं।

प्रयोग विधि-
इस वर्ष 2018 में धन त्रयोदशी 5 अक्तूबर 2018 सोमवार के दिन है। सोमवार की रात्रि में साधक स्नान कर पीली धोती पहन कर रात्रि सूर्यास्त से 2 घन्टे पश्चात् उत्तर दिशा की ओर मुख करके शुद्ध रेशमी आसन पर बैठ जायें और सामने एक कुबेर देवता का चित्र तथा एक श्री कुबेर यंत्र जो कि शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण किया गया हो, तथा धन कुबेर के मंत्र से अभिमंत्रित किया गया हो सामने लकड़ी के एक बाजोट पर स्थापित कर लें। स्थापित करने से पहले उस बजोट पर पीला रेशमी कपड़ा अवश्य बिछा दें। इसके ऊपर एक थाली रखें जो कि स्टील की न हो, चांदी की या पीतल की हो, उस थाली के बीचो-बीच रोली से स्वास्तिक बनाकर स्वास्तिक के बीचो-बीच थोड़े चावल रखें उनके उपर एक साबुत सुपारी जिस पर पहले कलावा लपेट लें। फिर इस थाली के एक भाग में अष्टगन्ध, अनार की लकड़ी से बनी कलम रखें। अनार की लकड़ी का प्रबन्ध पहले से ही करके रखना चाहिये। इसके बाद फूल, अक्षत्, कलावा, रोली, पान के पत्ते साबुत सुपारी, तथा थोड़ी मिठाई भी रखें। कुबेर देवता के चित्र तथा यंत्र को पुष्प अर्पित करें, पुष्प माला पहिनायें सामने एक छोटी स्टील की प्लेट में धूप तथा दीपक लगायें, स्वयं तथा परिवार के सदस्यों को कलावा बांध कर रोली से चावल लगाकर तिलक करें। इस के बाद अष्टगंध को गुलाबजल या फिर गंगाजल से गीला कर लें और धन कुबेर के यंत्र पर अनार की कलम की सहायता से लेप कर दें। और फिर थाली में रखकर इस पर नारियल अर्पित करें, तथा मिठाई से भोग लगायें। इस प्रकार का प्रत्येक कार्य करते समय साधक ॐ यक्षराज कुबेराय नमः। मंत्र का उच्चारण करते रहें, सम्पूर्ण पूजन इसी मंत्र के उच्चारण से किया जाता है। इसके बाद 7 मुखी रूद्राक्ष की माला (जिसे लक्ष्मी माला कहा गया है) जो की 108 दाने वाली नई माला होनी चाहिये इस रूद्राक्ष माला से इस कुबेर देवता के मंत्र- ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय स्वाहा। मंत्र की 11 माला जप करें, जप पूर्ण होने पर कुबेर देवता के चित्र तथा श्री कुबेर यंत्र को प्रणाम करें तथा यंत्र व चित्र की सात प्रदक्षिणा करें, और फिर श्री कुबेर यंत्र तथा यक्षराज कुबेर के चित्र को अपने दोनों हाथों में लेकर सम्मान के साथ (आसन के साथ) तिजोरी या कैशबाॅक्स में स्थान दे दें। अनेक साधकों का अनुभव है कि इस साधना का लाभ कुछ ही दिनों में प्रभावशाली ढंग से प्रकट होने लग गया। कुछ साधकों के द्वारा यह भी अनुभव किया गया है कि दूसरे ही दिन से साधक को आर्थिक-व्यापारिक दृष्टि से चमत्कारिक लाभ अनुभव होने लगे। प्रयोग सम्पन्न करने के इच्छुक साधकों से अनुरोध है कि यह साधना पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से सम्पन्न करें।

विशेष- इस साधना के लिये साधना सामग्री की व्यवस्था समय से पूर्व ही कर लें। यह सामग्री shukracharya संस्थान में उपलब्ध है। इसमें 1. श्री कुबेर यंत्र जो कि ‘शुद्ध चांदी’ पर उत्कीर्ण तथा धन कुबेर के मंत्र से अभिमंत्रित किया गया होगा, 2. अष्टगन्ध, 3. कुबेर देवता का चित्र, 4. सप्त मुखी रूद्राक्ष की 108 दाने की माला, तथा 5. अनार की लकड़ी से बनी कलम होगी। इस सारी सामग्री के लिये न्यौछावर राशि केवल 5100/-रू है। आप का भविष्य के पाठकों के लिये गुरूजी ने विशेष रूप से यह सामग्री प्राणप्रतिष्ठा की है, राशि आपको अग्रिम भेजनी होगी। यह राशि आप कम से कम एक माह पूर्व भेज दें, जिससे की समय पर यह सामग्री आपको प्राप्त हो सके और आप निश्चिंत हो सकें। इसके लिए आप shukracharya कार्यालय में फोन द्वारा अपना आर्डर 15-20 दिन पहले ही बुक करवा लें।

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