मंत्र सिद्धि Mantra Siddhi

Mantra Siddhi :- मंत्र सिद्धि और मंत्रों में विद्युत शक्ति कैसे कार्य करती है? :-

Dr.R.B.Dhawan (editor – AAP ka Bhavishya), top best astrologer in delhi,shukracharya

यह अटूट सत्य है कि मंत्रों में अपार शक्ति है, परन्तु मंत्र साधना Mantra Siddhi क्यों और कैसे होती है ? हमारे इस भौतिक शरीर में दो और शरीर हैं – 1. वैद्युतिक (सूक्ष्म शरीर) और 2. मानसिक (कारण शरीर)। हम जो खाते हैं उससे उक्त तीनों शरीरों को पोषण प्राप्त होता है, और तीनों का प्रथक-प्रथक एवं संयुक्त कार्य है। हमारे स्थूल शरीर के प्रश्न के उत्तर में हमें यह भली प्रकार जान और मान लेना चाहिये कि आकाश में सूक्ष्म रूप में अन्य तत्व भी तो हैं। इस अन्यान्य तत्वों में आकाश भी गौण रूप में विद्यमान है। guruji shukracharya के संस्थापक जी का कथन है कि यह समस्त संसार जो भिन्न-भिन्न रूप और प्रकृति में दिखायी पड़ता है, वह मूलभूत इन्हीं पाँच तत्वों की माया है। उनका अनुपात विभिन्न प्रकार की आकृतियों स्वभाव और गुण धर्म का कारण बनता है। इन तथ्यों के प्रतीक अथवा तन्मात्रा जिस स्थूल में प्रजनन और संहार, आकर्षण और विकर्षण का कारण बनती है।

भारतीय संस्कृति ज्ञान या भारतीय वाङ्मय में शब्द को ब्रह्म का प्रतीक माना जाता है। यहाँ तक कि ब्रह्म का गुणात्मक शरीर शब्द ही तो है। इस संसार में यदि शब्द को हटा दिया जाये तो मानव समाज मूक ही नहीं अपितु सम्पूर्ण जड़-चेतन और चैतन्यता स्थिर हो जायेगा, और स्थिरता से उपक्रांति होगी जो महाविनाश का प्रतीक है। मंत्र मार्ग भी है, और लक्ष्य भी। यह गुणात्मक सत्ता से चलकर गुणात्मक तीन अवस्थाओं में पहुँच जाता है, और उस समय शब्द का सुस्पष्ट और प्रत्यक्ष दर्शन होता है।

जागतिक सफलता और चमत्कार के लिये मंत्र का प्रयोग किया जाता है। हमारा शरीर ही नहीं, मन-मस्तिष्क भी इन तत्वों का अनुपात हमारे शरीरों फिजिकल, अष्ट्रल, और साइकोलोजिकल रूप को भी प्रभावित करता है। मंत्रों में इन तत्वों को उत्कृष्ट और शांति करने की सूक्ष्म व्यवस्था है (जैसी विधि आयुर्वेद में वात, पित्त कफ के शमन उद्दीयन के द्वारा रोग निवारण में प्रचलित है। मंत्र मशीन से अधिक निर्दोष सबल और सरल है। एक बार सिद्ध करने पर इसे जहाँ चाहें प्रयोग में लाया जा सकता है। मंत्र की शुद्ध भावना शब्द है, इससे शब्द की ऊर्जा और भावना शक्ति परस्पर गणित होकर कार्य करती है। शब्द किंवा ध्वनि को अनुप्रष्ठ एवं अनुरदेध्य तरंगें विद्युत की प्रतिरोध गामिनी तरंगों के साथ जब एक रूप हो जाती हैं तो मंत्र जागृत और सिद्ध हो जाता है। मंत्र को सतत् जपने से यही स्थिति आती हैं मंत्र साधना से मंत्र का जप पहले साधक को मन, व्यवहार में नितान्त निर्मल करता है, और निर्मल तन-मन वाले व्यक्ति की तरंगें सबल, दीर्घ और इच्छित दिशा में शमन करने लगती है। इसलिये उसका मंत्र सभी भौतिक कार्यों को सिद्ध Mantra Siddhi कर देता है।

वैज्ञानिक विश्लेषणः- आप कल्पना कीजिये कि संसार में कुल तीन अरब प्राणी हैं, जिनमें आधे तो दिन के प्रकाश में कार्य व्यस्त हैं, और आधे रात्रि में आनन्द से सो रहे हैं। आधे, यानी डेढ़ अरब प्राणी जागरण काल में यदि तीन घंटे बातचीत करते हों, तब क्या आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि वे बातचीत द्वारा कितनी विद्युत शक्ति उत्पन्न करते हैं। विद्युत ध्वनि शास्त्र तथा इंजीनियरिंग द्वारा गणना करके देखा जाये तो लोग उक्त तीन घंटों में कम से कम 6,000 खरब वाट विद्युत शक्ति केवल अपने शब्दों और ध्वनियों से उत्पन्न करते हैं। यह विद्युत ऊर्जा दामोदर घाटी, रिहृंध बांध, तथा भाखड़ा नांगल एवं बम्बई के ट्रांबे परमाणु प्रतिवर्तक की सम्मिलित शक्ति से कहीं अधिक है तथा भारत में उत्पन्न होने वाली कुल बिजली से लगभग आठ गुनी अधिक है। इस विद्युत ऊर्जा से सम्पूर्ण विश्व में घंटों प्रकाश किया जा सकता है। यदि इस ऊर्जा की एक यूनिट की कीमत केवल पचास पैसे रखी जाये तो उसकी कीमत एक खरब रूपये होगी।

Dr.R.B.Dhawan (संस्थापक shukracharya) शब्द शक्ति के सम्बंध में कहते हैं कि- वैज्ञानिक डाॅ. बोएड ने एक ऐसा विचित्र यंत्र बनाया है, जिसके सम्मुख बोलने से हिलोरे और कंपन स्पष्ट देखे तथा आंके जा सकते हैं। यदि उसके सामने कोई जोर-जोर से बोले तो यंत्र टूटकर बिखर सकता है।

शब्दों का प्रभाव:- उच्चादित शब्दों का ठीक इसी प्रकार का प्रभाव हमारी त्वचा व कानों की त्वचा पर पड़ता है। इस सम्बंध में कान और त्वचा की संवेदना की प्रक्रिया लगभग एक ही प्रकार की है। शब्दों के लिये कानों की त्वचा की संवेदनशीलता सबसे अधिक होती है, जबकि त्वचा की संवेदना प्रायः नगण्य भी होती है। कान-विद्युत घट ‘वाई मारकस पीजो इलैक्ट्रिक साउंड सेल’ का भी काम करते हैं। इस प्रकार का विद्युत घट अर्ध-चालक पत्थरों के बचाव द्वारा उत्पन्न बिजली के सिद्धांत पर बनता है। साधारण तौर पर इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। कि कान को एक प्रकार का ‘माइक्रोफोन’ कह सकते हैं। इसकी विशेषता यह होती है कि उसमें 02 से 20,000 आवर्तन का कोई सुनायी पड़ने योग्य शब्द प्रवेश करते ही विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है और वह सीधे मस्तिष्क तक पहुँचती है। तद्नन्तर विविध क्रिया प्रक्रियाओं को जन्म देते हुये शरीर के सभी भागों एवं ग्रन्थियों को क्रियाशील और विद्युत धारावर्ती बना देती हैै।

चमड़ी से इसी प्रकार का काम एक माध्यम द्वारा होता है। त्वचा पर सर्वप्रथम ध्वनि-चाप ‘प्रैशर’ का प्रभाव पड़ता है। फिर ग्राहक स्नायु-तंतुओं में बिजली का संचरण होता है। बिजली की यह धारा तदनंतर अपनी दीर्घ यात्रा के पश्चात मस्तिष्क के स्नायु तन्तुओं को अल्प मात्रा में विद्युन्मयी करती है। शब्दों का सर्वाधिक प्रभाव उनका आलोड़न-विलोड़न क्रमशः कर्ण-स्नायु, मस्तिष्क, अन्य स्नायु सूत्र हृदय, अंतस्रावी ग्रन्थियों, पेट, वृक्क, यकृत, रक्त तथा प्रस्वेद ग्रन्थियों पर पड़ता है।

शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ावः- उच्चारित शब्दों का श्रोता के मस्तिष्क पर दो प्रकार से प्रभाव पड़ता है। पहला, मुख से शब्द निकलने से पूर्व वक्ता के मस्तिष्क से उसी प्रकार की विद्युत-चुम्बकीय तरंगें निकलती हैं, जिन्हें श्रोता का मस्तिष्क ग्रहण करने की चेष्टा करता है। दूसरा उच्चारित शब्द वायु के माध्यम से विद्युत संचार के रूप में कर्ण रंध्रों से होते हुये मस्तिष्क में पहुँचते हैं। तब वे हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा आदि आवेगों को मस्तिष्क में उत्पन्न करते हैं। इसी से शरीरांगों में प्रस्फुरण और संदीपन होते हैं। शब्द इस प्रकार प्रेरणा, प्रास्फुरण, स्फूर्ति उत्पन्न कर प्रायः शरीर के अवयवों में साधारण अवस्था से अधिक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। वे कभी-कभी निष्क्रियता और शिथिलता भी उत्पन्न करते हैं।
स्नायु मंडल पर भी शब्दों के विविध प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं। अद्विग्नता, क्लांति, विषाद, शरीर कम्पन, चित्त की चंचलता भयानक स्वप्न आदि उन प्रभावों की स्पष्ट विकृतियाँ होती हैं। मूर्छा, स्मृति, भ्रम और विक्षिप्तता का भी आक्रमण हो सकता है। शब्दों के काम, क्रोध, मोह, लोभ तथा भय उत्पन्न होने पर दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं, और रक्त का प्रवाह भी ऊँचा उठने लगता है। रक्त में विशेष प्रकार का विष टाक्सिन पैदा होने लगता है। इसी प्रकार हर्षोत्पादक व आशाजनक शब्द मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत तुल्य काम करते हैं।

शब्दों से रहस्योद्घाटन:- प्रिय, अप्रिय शब्दों के अनुसार पेट में भी प्रतिक्रियायें होती हैं। उनसे भूख और पाचन क्रियायें घट या बढ़ जाती हैं। इन्हीं सब तथ्यों को सामने रखकर शब्दों और प्रश्नों के माध्यम से उत्तेजित कर अपराधों का पता लगाने के लिये मिथ्यान्वेषी (लाइ-डिटेक्टर) यंत्र का आविष्कार किया गया है। शब्दों की बौछार से अपराधी के शरीरांगों में होने वाली क्रिया-प्रतिक्रियाओं को विद्युत धारा द्वारा ग्रहण कर रहस्य की मंत्र-मन् धातु के उत्तर उ – प्रत्यायत – त्रै – धातु जोड़ने से ‘मंत्र’ शब्द साधित Mantra Siddhi होता है। (मन् + त्रं = उ मंत्र’ मननात जायते यस्मात् मंत्र उदाहतः।’) जिसके मनन, चिंतन ओर ध्यान द्वारा लौकिक, परालौकिक सुख की उपलब्धि होती है। उसी का नाम मंत्र है।

गुत्थी को सुलझाने में मदद मिलती है :- क्रोध, घृणा और भयजनक शब्द को सुनकर व्यक्ति की ‘एड्रीनलग्लैंड’ से ‘एड्रोलिन’ नामक स्राव काफी वेग से निकल-निकल कर रक्त में मिलने लगता है और मस्तिष्क तथा अन्य अंगों को असाधारण रूप से जागरूक और शक्तिशाली बना देता है, पर केवल अल्पकाल के लिये। एड्रेलिन के निकलते समय यकृत (लीवर) से एक विशेष प्रकार की पहले से ही जमा हुई शर्करा (ग्लाइकोजिन) स्वयं निःसृत होने लगती है। इसी क्रम में बार-बार मूत्र आने की शिकायत होती है।

शब्द-प्रक्रियाओं का महत्व:- भारतीय संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों में शब्दों की इन्हीं सब प्रक्रियाओं को ध्यान में रखकर कल्याण, मनोकामना सिद्धि, शत्रुनाशन, शत्रु मारण, उच्चाटन आदि के लिये विविध शब्द प्रक्रियाओं का विधान किया गया है। आज के वैज्ञानिक युग में यह सब मनोवैज्ञानिक युद्ध यानी साइकोलाॅजिकल वार या स्नायविक युद्ध (वार आॅफ नवर््ज) के अंतर्गत आता है।

मंत्र शक्ति के मूल में मूल भावना :- मंत्र शक्ति के मूल में यही भावना काम करती है। गाली-गलौज, मखौल, व्यंग्य, धमकियाँ आदि इन्हीं उपर्युक्त कार्यों की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। पाश्चात्य देशों में इन्हीं के एक रूप को सम्मोहन (हिप्नोटिज्म) और आत्म परामर्श (आॅटो सजेशन) की संज्ञा प्रदान की गई है। प्रसिद्ध रूसी विद्वान पावलाव ने शब्दों को अत्यंत शक्तिशाली अनुकूलित प्रतिवर्त (उत्तेजन) कंडीशंड रेप्लेक्स कहा है। इस प्रकार उपर्युक्त विवरणों से स्पष्ट हो जाता है कि मंत्रों में सुनिश्चित रूप से शक्ति होती है और उनसे कार्यों की सिद्धि भी प्राप्त की जा सकती है। मंत्र तीन प्रकार के होते हैं – वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक। विद्वत समाज की धारणा है कि कलियुग में प्रथम दो प्रकार के मंत्र सफल नहीं होते। कलियुग के लिये तांत्रिक मंत्र ही शक्तिशाली है। तांत्रिक मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं – साबरी मंत्र, डामरी मंत्र, बीजाक्षर मंत्र। इन तीनों प्रकार के तांत्रिक मंत्रों का अपना-अपना विज्ञान है। जो लोग उसके वैज्ञानिक रहस्य को समझते हैं, वे ही मंत्रों का प्रयोग कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। तांत्रिक मंत्रों की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे बिना दीक्षा के न तो सिद्ध होते हैं, और न ही काम करते हैं। मंत्रों का पुरश्चरण भी है। पुरश्चरण से मंत्र की शक्ति एकत्र होकर संकल्प शक्ति और विचार शक्ति के साथ तादात्म्य स्थापित करती है। इसी को ‘मंत्र जागरण’ कहते हैं।

जप में मन का एकाग्र होना आवश्यक है। बिना होठ हिलाये मंत्र का जप करना चाहिये। तभी सिद्धि मिलती है। इस प्रकार मंत्र का जप करने से मंत्र शक्ति सूक्ष्मतम प्राण वायु ‘ईथर’ में अपने अधिष्ठान्न देवता का आकार प्रकार और रूप की रचना करने लग जाती है। जब रचना पूर्ण हो जाती है तब देवता उसमें प्रविष्ट होकर साधक से तादात्म्य स्थापित कर इच्छा अथवा संकल्प को पूर्ण करते हैं। इसीलिये सामान्य व्यक्ति को मंत्र-प्रणेता नहीं कहा गया है, वरन् ऋषियों को ही मंत्र द्रष्टा (ऋषयों मंत्र द्रष्टारः) कहा गया है।

पशु – पक्षी, पेड़ पौधे आदि सभी में बिजली होती है। वे सभी वैसे ही हमारी शब्दोत्पन्न शारीरिक और मानसिक बिजली से अत्यंत सूक्ष्म रूप से ही प्रभावित होते हैं। इतना ही नहीं पत्थरों पर भी शब्दों का प्रभाव पड़ता है। विल्लौर, टूरमेलीन, रोचीसाल्ट तथा अमोनियम के सम्मुख बोलने पर वे सक्रिय हो उठते हैं तथा उनमें से विद्युत धारा निकलती है। उसी सिद्धांत का लाभ उठाकर ‘ध्वनि- विद्युत घटक’ का निर्माण किया गया है। तानसेन के राग से दीपक का जल उठना और बैजू-बावरा के संगीत से हिरणों का आना प्रसिद्ध है। इन सबकी पृष्ठभूमि में शब्द शक्ति का अपूर्वसामंजस्य ही है, तांत्रिक मंत्रों में ऐसा ही सामंजस्य रहता है।

तंत्र शास्त्र के अनुसार प्रत्येक वर्ण की अपनी स्वतंत्र शक्ति है जिसे ‘वर्ण मातृका’ कहते हैं। प्रत्येक वर्णमातृ का अपना रंग, रूप और गति है। मनुष्य के तीन शरीर हैं – स्थूल, सूक्षम और कारण शरीर। प्रत्येक शरीर में तीन-तीन वर्णमातृका शक्ति केन्द्र हैं। कारण शरीर से उच्चारित शब्द को ‘पश्यंती’ और मध्यमा तथा स्थूल शरीर से उच्चारित शब्द को ‘वैखरी’ कहते हैं। पहले और दूसरे केन्द्र में बहिर्मुखी मन काम करता है। इसी प्रकार तीसरे केन्द्र में अन्तर्मुखी मन काम करता है। इसलिये जप से मन का अंतर्मुखी होना आवश्यक है। मन को अन्तर्मुखी करने के लिये ‘ध्यान’ का विधान है। ध्यान कई प्रकार का होता है, मगर उनमें निराकार ध्यान ही सर्वोत्तम है। उससे मन अंतर्मुखी होकर पराकेन्द्र से तादात्म्य स्थापित करता है।

शब्दों की शक्ति:- हमारी अंगुलियों के बीच घूमनेवाले माला के दाने उनको एकत्र करते रहते हैं। जप करते समय उन पर ध्यान रखना आवश्यक है। इससे मंत्र शक्ति को गति मिलती है जिससे मंत्र शीघ्र ही सिद्ध होते हैं। शब्दों में सुनिश्चित शक्ति है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। प्राचीन भारतीय वाङमय में इसलिये शब्दों को साक्षात् सर्वशक्तिमान ईश्वर, ब्रह्म या शब्द ब्रह्म की संज्ञा प्रदान की गई है।

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पुष्प चिकित्सा

कैसे करें पुष्पों से चिकित्सा –

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka Bhavishya), top best astrologer in Delhi

पुष्प, जहाँ अपनी सुन्दरता से मन को आह्लादित एवं प्रफुल्लित करते है, वहीं वे अपनी सुगन्धि से सम्पूर्ण परिवेश को आप्यायित का सुवासित भी कर देते है। अपने आराध्य के चरणों में प्रेमी भक्त की पुष्पांजलि प्रेमास्पद का सहसा प्राकट्य करा देती है। पुष्पों की अनन्त महिमा है। पुष्प के सभी अवयव उपयोगी होते हैं। इनके यथाविधि उपयोग से अनेक रोगों का शमन किया जा सकता है।

फूलों के रस से तैयार किया गया लेप बाह्य रूप से त्वचा पर लगाने से उसकी सुगन्धि हृदय तथा नासिका तक अपना प्रभाव दिखाकर मन को आनन्दित कर देती है। सबसे अच्छी बात यह है कि पुष्प-चिकित्सा के कोई दुष्प्रभाव नहीं होते। फूलों को शरीर पर धारण करने से शरीर की शोभा, कान्ति, सौंदर्य और श्री की वृद्धि होती है। उनकी सुगन्धि रोगनाशक भी है। फूल के सुगन्धित परमाणु वातावरण में घुलकर नासिका की झिल्ली में पहुँचकर अपनी सुगन्धि का मस्तिष्क, हृदय, आँख, कान तथा पाचन क्रिया आदि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। ये थकान को तुरंत दूर करते हैं। इनकी सुगन्धि से की गयी उपचार प्रणाली को एरोमा थेरेपी कहा जाता है। यहाँ कुछ पुष्पों के संक्षेप में औषधीय प्रयोग दिये जा रहे हैं, सम्यक् जानकारी प्राप्त करके उनसे लाभ उठाया जा सकता है –

कमल:- कमल और लक्ष्मी का सम्बंध अविभाज्य है। कमल सृष्टि की वृद्धि का द्योतक है। इसके पराग से मधुमक्खी शहद तो बनाती ही है, इनके फूलों से तैयार किये गये गुलकन्द का उपयोग प्रत्येक प्रकार के रोगों में तथा कब्ज के निवारण हेतु किया जाता है। कमल के फूल के अंदर हरे रंग के दाने से निकलते है, जिन्हें भूनकर मखाने बनाये जाते हैं, परंतु उनको कच्चा छीलकर खाने से ओज एवं बल की वृद्धि होती है। इनका गुण शीत है। इसका सबसे अधिक प्रयोग अंजन की भाँति नेत्रों में ज्योति बढ़ाने के लिये शहद में मिलाकर किया जाता है। पंखुड़ियों को पीसकर उबटन में मिलाकर चेहरे पर मलने से चेहरे की सुन्दरता बढ़ती है।

केवड़ा:- इसकी गंध कस्तूरी जैसी मोहक होती है। इसके पुष्प दुर्गन्धनाशक तथा उन्मादक है। केवड़े का तेल उत्तेजक श्वासविकार में लाभकारी है। इसका इत्र सिरदर्द और गठिया में उपयोगी है। इसकी मंजरी का उपयोग पानी में उबालकर कुष्ठ, चेचक, खुजली तथा हृदय रोगों में स्नान करके किया जा सकता है। इसका अर्क पानी में डालकर पीने से सिरदर्द तथा थकान दूर होती है। बुखार में एक बूँद देने से पसीना बाहर आता है। इसका इत्र दो बूँद कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है।

गुलाब:- गुलाब का पुष्प सौंदर्य, स्नेह एवं प्रेम का प्रतीक है। इसका गुलकंद रेचक है, जो पेट और आँतों की गर्मी शांत करके हृदय को प्रसन्नता प्रदान करता है। गुलाब जल से आँखें धोने से आँखों की लाली तथा सूजन कम होती है। गुलाब का इत्र उत्तेजक होता है तथा इसका तेल मस्तिष्क को ठंडा रखता है। गुलाब के अर्क का भी मधुर भोज्य पदार्थों में प्रयोग किया जाता है। गर्मी में इसका प्रयोग शीतवर्धक होता है।

चंपा:- चंपा के फूलों को पीसकर कुष्ठरोग के घाव में लगाया जा सकता है। इसका अर्क रक्त-कृमि को नष्ट करता है। इसके फूलों को सुखाकर बनाया गया चूर्ण खुजली में उपयोगी है। यह उत्सर्जक, नेत्रज्योति वर्धक तथा पुरूषों को शक्ति एवं उत्तेजना प्रदान करता है।

सौंफ (शतपुष्पा):- सौंफ अत्यंत गुणकारी है। सौंफ के पुष्पों को पानी में डालकर उबाल लें, साथ में एक बड़ी इलायची तथा कुछ पुदीना के पत्ते भी डाल दें। अच्छा यह रहे कि मिट्टी के बर्तन में उबाले पानी को ठंडा करके दाँत निकलने वाले बच्चे या छोटे बच्चे जो गर्मी से पीड़ित हों, उन्हें एक-एक चम्मच कई बार दें। इससे उनके पेट की पीड़ा शांत होगी तथा दाँत भी ठीक प्रकार से निकलेंगे।

गेंदा:- मलेरिया के मच्छरों का प्रकोप दूर करने के लिये यदि गेंदे की खेती गंदे नालों और घर के आस-पास की जाये तो इसकी गंध से मच्छर दूर भाग जाते हैं। लीवर के रोगी के लीवर की सूजन, पथरी एवं चर्मरोगों में इसका प्रयोग किया जा सकता है।

बेला:- यह अत्याधिक सुगंधयुक्त प्रदाहनाशक है। उसकी कलियों को चबाने से स्त्रियों के मासिक धर्म का अवरोध दूर हो जाता है।

रात-रानी:- इसकी गंध इतनी तीव्र होती है कि यह दूर-दूर तक के स्थानों को मुग्ध कर देती है। इसका पुष्प प्रायः सांयकाल से लेकर अर्धरात्रि के कुछ पूर्व तक सुगन्ध अधिक देता है। पंरतु इसके बाद धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है इसकी गंध से मच्छर नहीं आते। इसकी गंध मादक और निद्रादायक है

सूरजमुखी:- इसमें विटामिन ए तथा डी होता है। यह सूर्य का प्रकाश न मिलने के कारण होने वाले रोगों को रोकता है। इसका तेल हृदय रोगों में कोलेस्ट्राॅल को कम करता है।

चमेली:- चर्मरोगों, पायरिया, दंतशूल घाव, नेत्ररोगों और फोड़े-फुंसियों में चमेली का तेल बनाकर उपयोग किया जाता है। यह शरीर में रक्तसंचार की मात्रा बढ़ाकर उसे स्फूर्ति प्रदान करता है। इसके पत्ते चबाने से मुँह के छाले तुरंत दूर हो जाते हैं। मानसिक प्रसन्नता देने में चमेली का अद्भुत योगदान है।

केसर:- यह मन को प्रसन्न करता तथा चेहरे को कान्तिमान बनाता है। यह शक्तिवर्धक, वमन को रोकने वाला तथा वात, पित्त एवं कफ (त्रिदोषों) का नाशक है। तन्त्रिकाओं में व्याप्त उद्विन्नता एवं तनाव को केसर शांत रखता है। इसलिये इसे प्रकृति-प्रदन्त टैंकुलाइजर, भी कहा जाता है। दूध या पान के साथ इसका सेवन करने से यह अत्यंत ओज, बल, शक्ति एवं स्फूर्ति को बढ़ाता है।

अशोक:- यह मदन-वृक्ष भी कहलाता है। इसके फूल, छाल तथा पत्तियाँ स्त्रियों के अनेक रोगों में औषधि के रूप में उपयोगी है। इसकी छाल का आसव सेवन कराकर स्त्रियों की अधिकांश शोक (मानसिक पीड़ा) को ठीक किया जा सकता है।

ढाक (पलाश):- ढाक को अप्रतिम सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि इसके गुच्छेदार फूल बहुत दूर से ही आकर्षित करते हैं। इसी आकर्षण के कारण इसे वन की ज्योति भी कहते हैं। इसका चूर्ण पेट के किसी भी प्रकार के कृमिका नाश करने में सहायक है। इसके पुष्पों को पानी के साथ पीसकर लुगदी पेडू पर रखने से पथरी के कारण दर्द होने पर या नाम उतरने पर लाभ होता है।

गुड़हल (जवा):- गुड़हल के पुष्प का सम्बंध गर्भाशय से ऋतुकाल के बाद यदि फूल को घी में भूनकर सेवन करें तो गर्भ स्थिर होता है। गुड़हल के फूल चबाने से मुँह के छाले दूर हो जाते है। इसके फूलों को पीसकर बालों में लेप करने से बालों का गंजापन मिटता है। यह उन्माद को दूर करने वाला एकमात्र पुष्प है। गुड़हल शीतवर्धक, वाजीकरण तथा रक्तशोधक है। इसे सुजाक के रोग में गुलकंद या शर्बत बनाकर दिया जा सकता है। इसका शर्बत हृदय को फूल की भाँति प्रफुल्लित करने वाला तथा रूचिकर होता है।

शंखपुष्पी (विष्णुकांता):- शंखपुष्पी गर्मियों में अधिक खिलता है। यह घास की तरह होता है। इसके फूल-पत्ते तथा डंठल तीनों को उखाड़कर पीसकर पानी में मिलाकर छान लेने तथा इसमें शहद या मिश्री मिलाकर पीने से पूरे दिन मस्तिष्क में ताजगी रहती है। सुस्ती नहीं आती। इसका सेवन विद्यार्थियों को अवश्य करना चाहिये।

बबूल (कीकर):- बबूल के फूलों को पीसकर सिर में लगाने से सिरदर्द गायब हो जाता है। इसका लेप दाद और एग्जिमा पर करने से चर्मरोग दूर होता है। इसके अर्क के सेवन से रक्तविकार दूर हो जाता है। यह खाँसी और श्वांस के रोग में लाभकारी है। इसके कुल्ले दंतक्षय को रोकते हैं।

नीम:- इसके फूलों को पीसकर लुगदी बनाकर फोड़े-फुंसी पर लगाने से जलन तथा गर्मी दूर होती है। शरीर पर मलकर स्नान करने से दाद दूर होता है। यदि फूलों को पीसकर पानी में घोलकर छान लें और इसमें शहद मिलाकर पीयें तो वजन कम होता है तथा रक्त साफ होता है। यह संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाला है। नीम हर प्रकार से उपयोगी है, इसे घर का वैद्य कहा जाता है।

लौंग:- यह आमाशय और आँतों में रहने वाले उन सूक्ष्म कीटाणुओं को नष्ट करती है। जिनके कारण मनुष्य का पेट फूलता है। यह रक्त के श्वेत कणों में वृद्धि करके शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि करती है। शरीर तथा मुँह के दुर्गन्ध नाश करती है। शरीर के किसी भी हिस्से पर इसे घिसकर लगाने से दर्दनाशक औषधि का काम करती है। दाढ़ या दंतशूल में मुँह में डालकर चूसने से लाभ होता है। इसके धूम्र सेवन से शरीर में उत्पन्न अनावश्यक तत्वों को पसीने द्वारा बाहर निकाल देता है।

जूही:- जूही के फूलों का चूर्ण या गुलकंद अम्लपित्त को नष्ट करके पेट के अल्सर तथा छाले को दूर करता है। इसके सांन्ध्यि में निरन्तर रहने से क्षयरोग नहीं होता।

माधवी:- चर्मरोगों के निवारण के लिये इसके चूर्ण का लेप किया जाता है। गठिया-रोग में प्रातःकाल फूलों को चबाने से आराम मिलता है। इसके फूल श्वांसरोग को भी दूर करते हैं।
हारसिंगार (परिजात):- यह गठिया-रोगों का नाशक है। इसका लेप चेहरे की कांति को बढ़ाता है। इसकी मधुर सुगंध मन को प्रफुल्लित कर देती है।

आक:- इसका फूल कफनाशक है, यह प्रदाहकारक भी है। यदि पीलिया-रोग में पान में रखकर एक या दो कली तीन दिन तक दी जाये तो काफी हद तक आराम होता है।

कदम्ब:- यम मदन-वृक्ष भी कहलाता है। बीमारी में फूल एवं पत्तों वाली इसकी टहनी लेकर गोशाला में लगा देने से बीमारी दूर होती है। वर्षा ऋतु में पल्लवित होने वाला यह गोपीप्रिय वृक्ष है।

कचनार:- इसकी कली शरद्-ऋतु में प्रस्फुटित होती है। इसकी कलियाँ बार-बार मल-त्याग की प्रवृत्ति को रोकती हैं। कचनार की छाल एवं फूल को जल के साथ मिलाकर तैयार की गई पुलटिस जले घाव एवं फोड़े के उपचार में उपयोगी है।

शिरीष:- यह तेज सुगन्ध वाला जंगली वृक्ष है। इसकी सुगन्ध जब तेज हवा के साथ आती है तो मानव झूम सा जाता है। खुजली में इसके फूल पीसकर लगाने चाहिये, इसके फूलों के काढ़े से नेत्र धोने पर किसी भी प्रकार के नेत्र-विकारों में लाभ होगा।

नागकेसर:- यह खुजली नाशक है और लौंग जैसा लम्बा तथा डंडी में लगा रहता है। इसके फूलों का चूर्ण बनाकर मक्खन के साथ या दही के साथ खाने से रक्तार्श में लाभ होता है। इसका चूर्ण गर्भधारण में भी सहायक है।

मौलसिरी (बकुल):- इसके फूलों को तेल में मिलाकर इत्र बनता है। मौलसिरी के फूलांे का चूर्ण बनाकर त्वचा पर लेप करने से त्वचा अधिक कोमल हो जाती है। इसके फूलों का शर्बत स्त्रियों के बाँझपन को दूर करने में समर्थ है।

अमलतास:- ग्रीष्म ऋतु में फूलने वाला गहरे पीले रंग के गुच्छेदार पुष्पों का यह पेड़ दूर से देेखने में ही आँखों को प्रिय लगता है। इसके फूलों का गुलकंद बनाकर खाने से कब्ज दूर होता है पंरतु अधिक मात्रा में सेवन करने से यह दस्तावर होता है जी मिचलाता है एवं पेट में ऐंठन उत्पन्न करता है।

अनार:- शरीर में पित्ती होने पर अनार के फूलों का रस मिश्री मिलाकर पीना चाहिये। मुँह के छालों में फल रखकर चूसना चाहिये। आँख आने पर कली का रस आँख में डालना चाहिये। अनार के फूल खाने से शराब छूट जाती है। फूलों के पौधों की भीतरी कोशिकाओं में विशेष प्रकार के प्रद्रवी झिल्लियों के आवरण वाले कण होते हैं। इन्हें लवक (प्लास्टिड्स) कहते है। ये कण जब तक फूलों का रंग समाप्त न हो जाये तब तक जीवित रहते हैं।

ये लवक दो प्रकार के होते हैं – 1 वर्णिक लवक और 2 हरित लवक इनमें रंगीन लवकों को वर्णी लवक कहते हैं। वर्णीलवक ही फूल-पौधों को विभिन्न रंग प्रदान करते हैं। वर्णी लवक का आकार निश्चित नहीं होता, बल्कि लवक अलग-अलग पौधों में अलग-अलग रचना वाले होते हैं। पौधें में सबसे महत्वपूर्ण लवक है हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट)। हरित लवक पौधों में हरा रंग ही नहीं देता, बल्कि पौधों में भोजन का निर्माण भी करता है। हरित लवक कार्बन-डाइआॅक्साइड गैस, जल और सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में ग्लूकोज कार्बोहाइडेट पदार्थ का निर्माण करता है।

पुष्प सूर्य के प्रकाश में सूर्य की किरणों से सम्पर्क स्थापित करके अपनी रंगीन किरणें हमारी आँखों तक पहुँचाते हैं। जिससे शरीर को ऋणात्मक, धनात्मक तथा कुछ न्यूट्रल प्रकाश की किरणें मिलती है जो शरीर के अंदर पहुँचकर विभिन्न प्रकार के रोगों को रोकने में सहायता प्रदान करती हैं। इस प्रकार हम कलर थैरेपी द्वारा भी चिकित्सा के लाभ ले सकते हैं।

नोट- किसी भी औषधी को वैद्य की सलाह से ही सेवन करें।

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यातायात और ज्योतिष

यातायात का सम्बंध बिजनेस और ज्योतिष से-

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka Bhavishya), Top best astrologer in delhi

प्रत्येक देश के विकास में यातायात के साधनों का अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारा देश बहुत बड़ा है तथा आबादी भी अधिक है। केवल सरकारी यातातात के साधन रेल, बस, वायुयान आदि आवश्यकता पूरा नहीं कर सकते। अतः प्राईवेट यातायात सुविधाओं का भी महत्व बढ़ जाता है। इस व्यवसाय में धन भी अधिक प्राप्त होता है साथ ही देशवासियों को यातायात के सुविधा पूर्ण साधन भी उपलब्ध होते हैं एवं व्यवसायी को प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती है तथा कई व्यक्तियों को रोजगार भी प्राप्त होता है। इस क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति को सफलता प्राप्त नहीं हो सकती है। जब तक ग्रह योगों का सहयोग न हो। अब हम ज्योतिषीय आधार पर इस व्यवसाय में सफलता प्राप्त करने के योगों का विवरण निम्नानुसार प्रस्तुत कर रहे हैं:-

1. वाहन कारक शुक्र व्यवसाय एवं जनता कारक शनि, यात्रा कारक मंगल प्रेरित करने वाले ग्रह राहु यदि जन्म पत्रिका में बलवान हो तो ऐसा जातक वाहन से सम्बंधित व्यवसाय में रूचि रखने वाला होता है।

2. इस व्यवसाय से धन प्राप्त करने वालों की पत्रिका में शुक्र, शनि मंगल का सम्बंध लग्नेश, धनेश, लाभेश, कर्मेश आदि से किसी भी रूप में होना चाहिये।

3. यदि उच्च का शनि लाभ भाव में मंगल भाग्येश के साथ केन्द्र में लग्न के राहु से दृष्ट हो, कर्मेश बुध के साथ लाभेश शुक्र छठे स्थान में (06 भाव) बैठकर आवागमन के व्यवभाव (12 भाव) को दृष्ट करें, साथ ही उच्च के गुरू, चन्द्र के साथ अच्छी स्थिति में हो तो, ऐसा जातक जनता को आवागमन की सुविधा प्रदान कर इस व्यवसाय में अति सफल होता है।

4. जातक की कुण्डली में यदि शुक्र उच्चाभिलाषी होकर पराक्रम भाव में कुंभ राशि का होकर भाग्यभाव को देखे, जनता कारक चतुर्थ में लाभेश शनि के साथ जनता कारक शनि बैठे और दशम में बैठे लग्नेश व चतुर्थेश गुरू पर दृष्टि हो योग कारक मंगल पंचमेश होकर वाहन कारक शुक्र की राशि लाभ भाव में बैठे, दशमेश बुध, व्यवसाय कारक व धनेश शनि की राशि मकर में हो तथा इस पर लग्नेश गुरू की पंचम दृष्टि हो साथ ही भाग्येश सूर्य स्वयं गुरू की राशि धनु में लग्नगत हो, तो ऐसे जातक को आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराने का व्यवसाय (वाहनों का) कर सफल होकर धन कमाता है।

5. लग्नेश स्वयं वाहन कारक शुक्र होकर कार्यक्षेत्र में व्यवसाय कारक शनि की राशि कुंभ में उच्चाभिलाषी हो, द्वितीय यंत्रिक कारक मंगल स्वग्रही लाभेश के साथ लाभ स्थान में राहु से दृष्ट हो, धनेश, पंचमेश व सुखेश भाग्य भाव में युक्ति करें, योग कारक शनि धनभाव में हो तो ऐसा जातक पुस्तैनी ट्रांसपोर्ट व्यवसाय को आगे बढ़ाते हुये अति सफल प्रतिष्ठित व धनाढ्य ट्रांसपोर्ट व्यवसायी होता है।

अब कुछ सफल यातायात व्यवसाय करने वाले जातकों की जन्म पत्रिकाओं का विवेचन करेंगे –

पत्रिका क्रमांक-1 एक पुस्तैनी ट्रांसपोर्ट व्यवसाय करने वाले जातक की है। पत्रिका में वाहन कारक उच्चाभिलाषी शुक्र लाभेश होकर पराक्रम भाव में बैठकर भाग्य भाव को दृष्टि द्वारा प्रभावित कर रहा है। द्वितीय यांत्रिक कारक मंगल वाहन कारक शुक्र की राशि तुला में लाभ भाव में होकर व्यापार कारक धनभाव में बैठे कर्मेश बुध को चैथी दृष्टि से प्रभावित कर रहा है।

1 लग्नेश व जनता भाव के स्वामी गुरू कर्मभाव में बैठकर जनता कारक धनेश शनि व राहु की युक्ति से परस्पर दृष्टि सम्बंध कर अच्छी स्थिति में है। लग्नेश गुरू की पंचम (5वीं) दृष्टि कर्मेश बुध और धन भाव में होकर दोनों को बल प्रदान कर रही है। भाग्येश सूर्य मित्र लग्न में बैठकर मनकारक चन्द्रमा के साथ परस्पर दृष्टि सम्बंध बना रहा है। नवांश में स्वनवांश के जनता कारक धनेश शनि के साथ कर्मेश व नवांश लग्न का स्वामी व्यापार कारक बुध बैठकर राहु की दृष्टि से प्रभावित है। वाहन कारक शुक्र वृश्चिक नवांश में होकर जनता कारक शनि व लग्नेश गुरू की दृष्टि से प्रभावित है। शुक्र यांत्रिक कारक मंगल के नक्षत्र में तथा कर्मेश बुध, भाग्येश सूर्य के नक्षत्र में होने आदि के कारणों से ही बने, सभी तरह से वाहन से सम्बंधित व्यवसाय के ग्रहयोगों से ही जातक जनता के आवागमन से जुड़े यातायात व्यवसाय से लाभ व यश अर्जित कर रहा है।

विवेचन कुंडली क्रमांक-2 यह एक उच्च स्तर के जनता के आवागमन से जुड़े यातायात से सम्बंधित व्यवसाय करने वाले धनाढ्य व्यवसायी की है। पत्रिका में वाहन कारक शुक्र लाभेश होकर व्यवसाय कारक कर्मेश बुध के साथ युति कर स्वगृही होकर बली है। यांत्रिक कारक मंगल भाग्येश सूर्य के साथ केन्द्र में युति, कर राहु जैसे ग्रह की परस्पर दृष्टि सम्बंध से प्रभावित होकर बैठा है। जनता भाव 04 का स्वामी लग्नेश गुरू उच्च का होकर गजकेसरी योग बनाते हुये जनता कारक धनेश शनि की दृष्टि से प्रभावित है उधर कर्मभाव में मंगल की चतुर्थ दृष्टि कर्मभाव को बल प्रदान कर रहा है। जनता कारक उच्च का शनि लाभ भाव में बैठकर लग्न और लग्न में बैठे प्रेरक राहु को दृष्टि द्वारा बल प्रदान कर रहा है। चन्द्र पत्रिका में लग्न में गजकेसरी योग है एवं वाहन कारक उच्च का शनि और प्रेरक राहु दृष्टि देकर बल प्रदान कर रहे हैं। कर्मेश मंगल धनेश सूर्य के साथ होकर राहु से परस्पर दृष्टि सम्बंध कर रहे हैं। नवांश में शुक्र व्यापार कारक बुध की राशि नवांश में होकर जनता कारक शनि की दृष्टि से प्रभावित होते हुये लग्न के भाग्येश एवं नवांश भाग्य भाव को दृष्टि द्वारा प्रभावित कर रहा है। पुनः नवांश में गजकेसरी योग निर्माण होकर व्यापार, कारक कर्मेश बुध इसी क्षेत्र के साथ है। जिसके कारण ही जातक जनता से सम्बंधित यातायात के व्यवसाय में यश धन एवं ख्याति अर्जित कर रहा है।

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अष्ट सिद्धियां

अष्ट सिद्धियां, नव निधियां :-

सनातन शास्त्रों में आठ प्रकार की सिद्धियों का वर्णन मिलता है, यह अष्टसिद्धियां क्या हैं, इन्हें कैसे सिद्ध किया जाता है? और उनकी विशेषतायें क्या हैं:-

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पुराणों में बार-बार अष्ट सिद्धियों और नौ निधियां का वर्णन मिलता है, विशेषकर हनुमान चालीसा में सीताजी द्वारा हनुमान जी को दिए वरदान में इसका विशेष वर्णन है, आईये जानें कि क्या हैं ये आष्ट सिद्धियां : –

हर मनुष्य में बीजरूप (अति सूक्षम) कुछ विशेष नैसर्गिक गुण होते हैं। इन्हीं में ही धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य detachment भी हैं। ऐश्वर्य का अर्थ धन संपदा से नहीं है, वह श्री के अंतर्गत आती है। ये ऐश्वर्य अणिमादिक अष्ट सिद्धिंयाँ ही हैं। इन अष्ट सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सदाचार युक्त जीवन व्यतीत करना पडता है, और कहीं न कहीं वैराग्य भाव का भी इसमें योगदान है। वैराग्य detachment है। जितने भी अलौकिक शक्तियों से संपन्न देवी-देवता हुए हैं, उन्होंने सभी चमत्कारपूर्ण कार्य अष्ट सिद्धियों के बल पर ही किये थे।

प्रमुख सिद्धियाँ आठ हैं, सिद्धि का अर्थ है पूर्णता की प्राप्ति होना व सफलता की अनुभूति मिलना, सिद्धि को प्राप्त करने का मार्ग कठिन है, ओर जो इन सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है, वह जीवन की पूर्णता को पा लेता है। असामान्य कौशल या क्षमता अर्जित करने को ही ‘सिद्धि’ कहा गया है। चमत्कारिक साधनों द्वारा ‘अलौकिक शक्तियों को पाना जैसे – दिव्यदृष्टि, अपना आकार छोटा कर लेना, घटनाओं की स्मृति प्राप्त कर लेना इत्यादि, ‘सिद्धि’ यही होती है। शास्त्रों में अनेक सिद्धियों की चर्चा की गई है, और इन सिद्धियों को यदि नियमित और अनुशासनबद्ध रहकर किया जाए तो, अनेक प्रकार की परा और अपरा सिद्धियाँ चिन्हित कि जा सकती है।

यह सिद्धियाँ भी दो प्रकार की होती हैं, एक परा और दूसरी अपरा, यह सिद्धियां इंद्रियों के नियंत्रण और व्यापकता को दर्शाती हैं। सब प्रकार की उत्तम, मध्यम और अधम सिद्धियाँ अपरा सिद्धियां कहलाती है। मुख्य सिद्धियाँ आठ प्रकार की कही गई हैं, इन सिद्धियों को पाने के उपरांत साधक के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। सिद्धियां क्या हैं? व इनसे क्या हो सकता है ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर मार्कंडेय पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में प्राप्त होता है, जो इस प्रकार है:-
अणिमा लघिमा गरिमा प्राप्ति: प्राकाम्यंमहिमा तथा।
ईशित्वं च वशित्वंच सर्वकामावशायिता:।।

यह आठ मुख्य सिद्धियाँ इस प्रकार हैं:- अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता और वंशिका।
1. अणिमा सिद्धि –

अपने शरीर को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता ही अणिमा सिद्धि है, यह वह सिद्धि है, जिसके सिद्ध होने पर मनुष्य सूक्ष्म रूप धर कर एक प्रकार से दूसरों के लिए अदृश्य हो जाता है. इसके द्वारा आकार में लघु होकर एक अणु रुप में परिवर्तित हो सकता है। अणु एवं परमाणुओं की शक्ति से सम्पन्न वो साधक वीर व बलवान हो जाता है, अणिमा की सिद्धि से सम्पन्न योगी अपनी शक्ति द्वारा अपार बल प्राप्त कर लेता है ।

2. महिमा सिद्धि –

अपने को बड़ा एवं विशाल बना लेने की क्षमता को महिमा सिद्धि कहा जाता है, यह शरीर के आकार को विस्तार देती है, विशालकाय स्वरुप को जन्म देने में सहायक है, इस सिद्धि से सम्पन्न होकर साधक प्रकृति को विस्तारित करने में भी सक्षम होता है, जिस प्रकार केवल ईश्वर ही अपनी इसी सिद्धि से ब्रह्माण्ड का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार साधक भी इस सिद्धि को पाकर वैसी शक्ति पा लेता है।

3. गरिमा सिद्धि –
इस सिद्धि से मनुष्य अपने शरीर को जितना चाहे, उतना भारी बना सकता है, यह सिद्धि साधक को अनुभव कराती है कि उसका वजन या भार उसके अनुसार बहुत अधिक बढ़ सकता है, जिसके द्वारा वह किसी के हटाए या हिलाए जाने पर भी नहीं हिल सकता।

4. लघिमा सिद्धि –

स्वयं को हल्का बना लेने की क्षमता ही लघिमा सिद्धि होती है, लघिमा सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत हल्का अनुभव करता है, इस दिव्य महासिद्धि के प्रभाव से योगी सुदूर अनन्त तक फैले हुए ब्रह्माण्ड के किसी भी पदार्थ को अपने पास बुलाकर उस को लघु करके अपने हिसाब से उसमें परिवर्तन कर सकता है ।

5. प्राप्ति सिद्धि –

कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता इस सिद्धि के बल पर प्राप्त होती है, साधक कुछ भी पाना चाहें उसे प्राप्त कर सकता है, इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक जिस भी किसी वस्तु की इच्छा करता है, वह असंभव होने पर भी उसे प्राप्त हो जाती है, जैसे रेगिस्तान में प्यासे को पानी प्राप्त हो सकता है, या अमृत की चाह को भी पूरा कर पाने में वह सक्षम हो जाता है, केवल इसी सिद्धि द्वारा ही वह असंभव को संभव कर सकता है।

6. प्राकाम्य सिद्धि –

कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता प्राकाम्य सिद्धि की उपलब्धि है, इसके सिद्ध हो जाने पर मन के विचार आपके अनुरुप परिवर्तित होने लगते हैं, इस सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत शक्तिशाली अनुभव करता है, इस सिद्धि को पाने के बाद मनुष्य जिस वस्तु कि इच्छा करता है, उसे पाने में सफल होता है, व्यक्ति चाहे तो आसमान में उड़ भी सकता है, और यदि चाहे तो पानी पर चल भी सकता है।

7. ईशिता सिद्धि –

हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना ही इस सिद्धि की पूर्णता है, इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक समस्त प्रभुत्व और अधिकार प्राप्त करने में सफल हो जाता है, सिद्धि प्राप्त होने पर अपने आदेश के अनुसार किसी पर भी अधिकार जमाया जा सकता है, वह चाहे राज्यों से लेकर साम्राज्य ही क्यों न हो, इस सिद्धि को पाने पर साधक ईश रुप में परिवर्तित हो जाता है।

8. वशिता सिद्धि –

जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता को ही वशिता या वशिकरण सिद्धि कहा जाता है, इस सिद्धि के द्वारा जड़, चेतन, जीव-जन्तु, पदार्थ-प्रकृति, सभी को स्वयं के वश में किया जा सकता है।

जो योगी इन अष्ट सिद्धियों को जो प्राप्त कर लेता है, उसे इस मृत्युलोक में ईश्वर के समान मान लिया जाता है, बहुत से योगियों ने इन्हें प्राप्त किया होगा। लेकिन उपलब्ध ग्रंथों, कथाओं, रामायण, महाभारत के अनुसार केवल दो शरीर धारिओं अर्थात जिसने धरती पर जन्म लिया, उन्होंने इनका खुल के प्रयोग किया। कौन हैं ये दोनों? श्रीहनुमान और श्रीकृष्ण। इसीलिए इनका यश और कीर्ति अमर व् अक्शुण है। श्रीकृष्ण को साक्षात् ईश्वर माना गया है, व जरंगबली की महिमा अपरम्पार है।

नव निधि रहस्य :-

भोलेनाथ ओर माँ आदि शक्ति सहज ही उनके भक्तों को आशीर्वाद में ही दे देते हैं नव निधियों का खजाना ।।

ॐ शिवशक्ति ऐं बं पां लं हं त्री अर्धनारीश्वर नमामि जगत शक्तिम नमः।।

नव-निधियां किसी भी मनुष्य को असामान्य और अलौकिक शक्तियां प्रदान करने में सक्षम हैं।

1. पर-काया प्रवेश : किसी अन्य के शरीर में अपनी आत्मा का प्रवेश करवाना पर-काया प्रवेश कहलाता हैं, साधक अपनी आत्मा को यहाँ तक की किसी मृत देह में भी प्रवेश करवा कर उसे जीवित कर सकता हैं।

2. हादी विद्या : यह सिद्धि प्राप्त करने के पश्चात साधक को भूख तथा प्यास नहीं लगती हैं, वह जब तक चाहें बिना खाए-पीये रह सकता है।

3. कादी विद्या : कादी विद्या प्राप्ति के बाद व्यक्ति के शरीर तथा मस्तिष्क पर बदलते मौसम का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, ना तो ठंड लगती है ना गर्मी, ना ही उस पर वर्षा का कोई असर होता है, ना तूफान कुछ बिगाड़ पाता है।

4. वायु गमन सिद्धि : साधक वायु या वातावरण में तैरने में सक्षम होता है, और क्षण भर में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच सकता है।

5. मदलसा सिद्धि : साधक अपने शरीर के आकार को अपनी इच्छानुसार कम या बड़ा सकता है, या कहें तो अपने शारीरिक आकर में अपने इच्छा अनुसार वृद्धि या ह्रास कर सकता है।

6. कनकधर सिद्धि : यह सिद्धि प्राप्त करने वाला साधक असीमित धन का स्वामी बन जाता है, उसकी धन-संपदा का कोई सानी नहीं रहती।

7. प्रक्य साधना : इस साधना में सफल होने के पश्चात साधक अपने शिष्य को किसी विशिष्ट महिला के गर्भ से जन्म धारण करने की आज्ञा दे सकता है।

8. सूर्य विज्ञान : इस सिद्धि को प्राप्त करने के पश्चात साधक, सूर्य की किरणों की सहायता से कोई भी तत्व किसी अन्य तत्व में बदल या परिवर्तित कर सकता है।

9. मृत संजीवनी विद्या : इस विद्या को प्राप्त करने के पश्चात, साधक किसी भी मृत व्यक्ति को पुनः जीवित कर सकता है।

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Depawli Muhurat 2018

2015 Diwali Muhurat

दीपावली के दिन महालक्ष्मी पूजन कब करें, Depawli Muhurat 2018 :-

Dr.R.B.Dhawan (Top best Astrologer in Delhi)

सनातन मान्यता के अनुसार एश्वर्यवाली जीवन यापन एवं सफलता व उन्नति, सुख-समृद्धि के लिये शास्त्रों में महालक्ष्मी को प्रसन्न करने का विधान बताया गया है, महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए दीपावली से शुभ दूसरा कोई मुहुर्त muhurat नहीं है। इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन निशीथ काल और महानिशीथ काल, स्थिर लग्न, शुभ चौघड़िया के दुर्लभ तथा सिद्ध मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन करके कोई भी साधक दुर्लभ देवी शक्तियों का आशिर्वाद प्राप्त कर सकता है।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस इस वर्ष 2018 में वृष एवं सिंह (स्थिर लग्न ) के मुहूर्त में महालक्ष्मी दीपावली पूजा मुहूर्त Diwali Muhurat में महालक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व है, इस दिन कि विशेषता यह है कि इस दिन वातावरण में अलौकिक सकारात्मक तथा समृद्धि प्रदान करने वाली ऊर्जा बहुतायत मात्रा में उपस्थित होगी। इस शुभ समय में महालक्ष्मी की पूजा करके कोई भी मनुष्य सर्व भौतिक सुखों का साक्षात्कार कर सकता है। यह रहस्य हर कोई नहीं जानता।

इस वर्ष “आप का भविष्य” के पाठकों के लिए महालक्ष्मी पूजा के विशेष महूर्त की गणना की है, इसी मुहूर्त में समृद्धि प्रदान करने वाले अनेक यंत्रों का निर्माण और अनेक यंत्रों की प्राण-प्रतिष्ठा भी करने का निश्चय किया गया है। (यह दीपावली पर सिद्ध यंत्र आप दीपावली से पूर्व Shukracharya संस्थान में बुक करवा सकते हैं)

दीपावली (महालक्ष्मी) पूजन मुहूर्त 2018

महालक्ष्मी का पूजन केवल स्थिर लग्न में ही सम्पन्न किया जाना चाहिये, क्योंकि हर एक मनुष्य की यही इच्छा होती है कि, लक्ष्मी को स्थिर रखना है। इस वर्ष अमावस्या की रात्रि को वृष और सिंह मात्र दो ही स्थिर लग्न हैं, अतः इन लग्न-मुहूर्त में ही लक्ष्मी पूजन सम्पन्न होना चाहिये।

श्री महालक्ष्मी पूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल से आधी रात तक रहने वाली अमावस श्रेष्ठ होती है। यदि अर्धरात्रि काल में अमावस्या तिथि का आभाव हो, तो प्रदोषकाल में ही दीप प्रज्वलन, महालक्ष्मी पूजन, श्रीगणेश एवं कुबेर आदि पूजन करने का विधान है।

प्रदोषे दीपदानए लक्ष्मी पूजनादि विहितम्।
कार्तिक कृष्ण पक्षे च प्रदोषे भूतदर्शर्योः,
नरः प्रदोष समये दीपदान् दद्यात् मनोरमान्।।

इस वर्ष 2018 ई. कार्तिक अमावस 7 नवम्बर, बुधवार को प्रदोष व्यापिनी तथा रात्रि 21:22 तक निशीथ व्यापिनी होने से दीपावली पर्व इसी दिन होगा। इस वर्ष दीपावली स्वाती तथा विशाखा नक्षत्र आयुष्मान तथा सौभाग्य योग एवं तुला के चन्द्रमा के समय होगी।

सांयकाल सूर्यास्त (प्रदोषकाल प्रारम्भ) के बाद मेष व वृष लग्न एवं स्वाती नक्षत्र विद्यमान होने से यह समयावधि श्रीगणेश, महालक्ष्मी पूजन आदि आरम्भ करने के लिये विशेष रूप से शुभ रहेगी। बही खातों एवं नवीन शुभ कार्यों के लिये भी यह मुहूर्त अत्यंत शुभ होगा। इस वर्ष बुधवार की दीपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रूप से शुभ मानी जायेगी। लक्ष्मीपूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल ही विशेषतया प्रशस्त माना गया है-

कार्तिके प्रदोषे तु विशेषण अमावस्या निशावर्धके।
तस्यां सम्पूज्येत् देवी भोगमोक्ष प्रदायिनीम्।।

दीपावली के दिन घर में प्रदोषकाल से महालक्ष्मी पूजन प्रारम्भ करके अर्धरात्रि तक जप अनुष्ठानादि करने का विशेष महात्मय होता है। प्रदोषकाल से कुछ समय पहले स्नानादि उपरांत धर्मस्थल पर मंत्रपूर्वक दीपदान करके अपने निवास स्थान पर श्रीगणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर पूजनादि करके अल्पाहार करना चाहिये। तदुपरांत यथोपलब्ध निशीथादि शुभ मुहूर्त में मंत्र-जप, यंत्र-सिद्धि आदि अनुष्ठान सम्पादित करने चाहियें।
दीपावली वास्तव में पांच पर्वों का महोत्सव है, जिसका आरम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) से लेकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई-दूज) तक रहती है। दीपावली के पर्व पर धन की भरपूर प्राप्ति के लिये धन की अधिष्ठात्री भगवती लक्ष्मी का समारोह पूर्वक आवाहन, षोडशोपचार सहित पूजन किया जाता है। आगे दिये गये निर्दिष्ट शुभ मुहूर्तों में किसी पवित्र स्थान पर आटा, हल्दी, अक्षत एवं पुष्पादि से अष्टदल कमल बनाकर श्रीलक्ष्मी का आवाहन एवं स्थापन करके देवों की विधिवत् पूजा अर्चना करनी चाहिये।

आवाहन का मंत्र-
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्र्रां ज्वलंती तृप्तां तर्पयंतीम।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप हव्ये श्रियम्। (श्रीसूक्तम्)।

पूजा मंत्र-
ॐ गं गणपतये नमः।। लक्ष्म्यै नमः।। नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात्।। से लक्ष्मी की, एरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नमः। अग्रलिखित मंत्र से इन्द्र की और कुबेर की निम्न मंत्र से पूजा करें- कुबेराय नमःए धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्मधिपाय च। भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादि सम्पदः।।
पूजन सामग्री में विभिन्न प्रकार की मिठाई, फल पुष्पादि, धूप, दीपादि सुगंधित वस्तुयें सम्मलित करनी चाहियें। दीपावली पूजन में प्रदोष, निशीथ एवं महानिशीथ काल के अतिरिक्त चैघड़िया मुहूर्त भी पूजन, बही-खाता पूजन, कुबेर पूजा, जपादि अनुष्ठान की दृष्टि से विशेष प्रशस्त एवं शुभ माने जाते हैं।

प्रदोषकाल-
7 नवम्बर 2018 को दिल्ली एवं निकटवर्ती नगरों में सूर्यास्त 17:30 से 02 घ. 41 मि. के लिये 20:11 तक प्रदोषकाल रहेगा। सांय 17:57 तक मेष (चर) लग्न तथा सांय 17:57 से 19:52 तक वृष (स्थिर) लग्न विशेष रहेगा। प्रदोषकाल में मेष व वृष लग्न स्वाती नक्षत्र 19:37 तक तथा तुला का चन्द्रमा होने से महालक्ष्मी पूजानादि के लिये शुभ समय होगा। प्रदोषकाल में ही 19:00 से 20:41 तक शुभ की चौघड़ियां रहने से इस योग में दीपदान, महालक्ष्मी, गणेश-कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन, धर्मस्थल एवं घर पर दीप प्रज्वलित करना, ब्राह्मणों तथा आश्रितों को भेंट, मिठाई बांटना शुभ होगा।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़ियां मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चैघडिया
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चैघड़िया पूजन में होनी चाहियें।

निशीथ काल- 7 नवम्बर 2018 को दिल्ली व समीपस्थ नगरों में निशीथकाल रात्रि 20:01 से 22:41 तक रहेगा। इसी निशीथकाल में 19:43 से 21:57 तक मिथुन लग्न मध्यम मुहूर्तए तदुपरांत कर्क लग्न विशेष प्रशस्थ रहेगा। 19:00 से 20:41 तक शुभ की चैघडिया भी शुभ रहेगी। तदुपरांत अमृत की चैघडिया 20:41 से 22:22 तक भी शुभ रहेगी। इस अवधि तक पूजन समाप्त कर श्रीसूक्त, कनकधारा स्त्रोत्र तथा लक्ष्मी स्त्रोत्रादि का जप पाठ करना चाहिये।

महानिशीथ काल- रात्रि 22:41 से 24:20 तक महानिशीथ काल रहेगा। इस अवधि में 21:57 से 24:20 तक कर्क लग्न तदुपरांत सिंह लग्न विशेष शुभ रहेगा। 22:22 से 24:02 तक चर की चौघड़ियां भी शुभ, परंतु तदुपरांत रोग की चौघड़ियां अशुभ रहेगी। इस लिये 24:02 तक श्री गणेश-लक्ष्मी पूजन अवश्य कर लेना चाहिये। महानिशीथ काल में श्री महालक्ष्मी, काली उपासना, यंत्र मंत्र तंत्रादि की क्रियायें व काम्य प्रयोग, तंत्रानुष्ठान, साधनायें एवं यज्ञादि किये जाते हैं।

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