शनिश्चरी अमावस्या

शनिश्चरी अमावस्या जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं-

  1. ग्रह दोष
  2. पितृदोष
  3. सहभागी कृत दोष

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष- आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

शनैश्चरी अमावस्या-

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री- इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य है, उन सभी के नाप की ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ प्राप्त कर लेनी चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित की गई हो। यह मुद्रिका ऐसी होनी चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

 

 

काल को जीतने का उपाय

काल को जीतने का उपाय देवी पार्वती ने कहा- प्रभु! काल से आकाश का भी नाश होता है। वह भयंकर काल बडा विकराल है। वह स्वर्ग का भी एक मात्र स्वामी है। आपने उसे दग्ध कर दिया था, परंतु अनेक प्रकार के स्त्रोतो द्वारा जब उसने आपकी स्तुति कि तब आप फिर संतुष्ट हो गये और वह काल पुनः अपनी प्रकृति को प्राप्त हुआ- पूर्णतः स्वस्थ हो गया। आपने उससे बातचीत में कहा- ‘‘काल! तुम सर्वत्र विचरोगे, किंतु लोग तुम्हें देख नहीं सकेंगे।’’

आप प्रभु की कृपादृष्टि होने और वर मिलने से वह काल जी उठा तथा उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया। अतः महेश्वर! क्या यहां ऐसा कोई साधन है, जिससे वह काल को नष्ट किया जा सके? यदि हो तो मुझे बताईये; क्योकि आप योगियों में शिरोमणि और स्वतंत्र प्रभु हैं। आप परोपकार के लिये ही शरीर धारण करते हैं।

शिव बोले– देवी! श्रेष्ठ देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, नाग और मनुश्य- किसी के द्वारा भी काल का नाश नहीं किया जा सकता; परंतु जो ध्यान परायण योगी है, वे शरीर धारी होने पर भी सुख पूर्वक काल को नष्ट कर देते हैं। वरारोहे! ये पंचभौतिक शरीर सदा उन भूतों के गुणों से युक्त होता है और उन्हीं में इसका लय होता है। मिट्टी की देह मिट्टी में ही मिल जाती है।

आकाश से वायु उत्पन्न होती है, वायु से तेज तत्व प्रकट होता है, तेज से जल का प्रकाट्य बताया गया है और जल से पृथ्वी का आविर्भाव होता है। पृथ्वी आदि भूत क्रमशः अपने कारण में लीन होते हैं। पृथ्वी के पांच, जल के चार, तेज के तीन और वायु के दो गुण होते हैं। आकाश का एकमात्र शब्द ही गुण है। पृथ्वी आदि में जो गुण बताये गये हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं- शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। जब भूत अपने गुण को त्याग देता है, तब वह नष्ट हो जाता है और जब गुण को ग्रहण करता है, तब उसका प्रादुर्भाव हुआ बताया जाता है।

देवेश्वरी! इस प्रकार तुम पांचो भूतों के यथार्थ स्वरूप को समझो। देवी! इस कारण काल को जीतने की इच्छा वाले योगी को चाहिये की वे प्रतिदिन प्रयत्न पूर्वक अपने-अपने काल में उसके अंशभूत गुणों का चिंतन करे।

योगवेत्ता पुरूष को चाहिये कि सुखद आसन पर बैठकर विशुद्ध श्वास (प्राणायाम) द्वारा योगाम्यास करे। रात में जब सब लोग सो जायें, उस समय दीपक बुझाकर अंधकार में योगधारण करें। तर्जनी अंगुली से दोनो कानों को बंद करके दो घडी तक दबाये रखें। उस अवस्था में अग्निप्रेरित शब्द सुनाई देता है। इससे संध्या के बादका खाया हुआ अन्न क्षण भर में पच जाता है और सम्पूर्ण रोगों तथा ज्वर आदि बहुत से उपद्रवों का शीघ्र नाश कर देता है।

जो साधक प्रतिदिन इसी प्रकार दो घडी तक शब्द गृहण का साक्षात्कार करता है, वह मृत्यु तथा काम को जीतकर इस जगत में स्वछंद विचरता है और सर्वज्ञ एवं समदर्शी होकर सम्पूर्ण सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। जैसे आकाश में वर्षा से युक्त बादल गरजता है, उसी प्रकार उस शब्द को सुनकर योगी तत्काल संसार बंधन से मुक्त हो जाता है।

तदंतर योगियों द्वारा प्रतिदिन चिंतन किया जाता हुआ वह शब्द क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो जाता है। देवी! इस प्रकार मैने तुम्हें शब्द ब्रह्म के चिंतन का क्रम बताया है। जैसे ध्यान चाहने वाला पुरूष पुआलको छोड देता है, उसी तरह मोक्ष की इच्छा वाला योगी सारे बंधनों को त्याग देता है।

इस शब्द-ब्रह्म को पाकर भी जो दूसरी वस्तु की अभिलाषा करते हैं, वे मुक्के से आकाश को मारते और भूख-प्यास की कामना करते हैं। यह शब्द-ब्रह्म ही सुखद, मोक्ष का कारण, बाहर-भीतर के भेद से रहित, अविनाशी और स्मस्त उपाधियों से रहित परब्रह्म हैं। इसे जानकर मनुश्य मुक्त हो जाते हैं। जो लोग कालपाश से मोहित हो शब्दब्रह्म को नहीं जानते, वे पापी और कुबुद्धि मनुश्य मौत के फंदे में फंसे रहते हैं। मनुश्य तभी तक संसार में जन्म लेते हैं, जबतक सबके आश्रयभूत परम तत्व (परब्रह्म परमात्मा) की प्राप्ति नहीं होती।

परमतत्व का ज्ञान हो जाने पर मनुश्य जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है। निद्रा और आलस्य साधना का बहुत बड़ा विध्न है। इस शत्रु को यत्नपूर्वक जीतकर सुखद आसन पर आसीन हो प्रतिदिन शब्दब्रह्म का अभ्यास करना चाहिये। सौ वर्ष की अवस्था वाला वृद्ध पुरूष आजीवन इसका अभ्यास करे तो उसका शरीर रूपी स्तम्भ मृत्यु को जीतने वाला हो जाता है और उसे प्राणवायु की शक्ति को बढ़ाने वाला आरोग्य प्राप्त होता है।

वृद्ध पुरूष में भी शब्द ब्रह्म के अभ्यास से होने वाले लाभ का विश्वास देखा जाता है, फिर तरूण मनुश्य को इस साधना से पूर्ण लाभ हो, इसके लिये तो कहना ही क्या है। यह शब्द ब्रह्म न ओंकार है न मंत्र है, न बीज है, न अक्षर है। यह अनाहत्नाद (बिना आहत् के अथवा बिना बजाये ही प्रकट होने वाला शब्द) है। इसका उच्चारण किये बिना ही चिंतन होता है। यह शब्दब्रह्म परम कल्याणमय है। प्रिय! शुद्ध बुद्धि वाले पुरूष यत्न पूर्वक निरंतर इसका अनुसंधान करते हैं। अतः 9 प्रकार के शब्द बताये गये हैं। जिन्हें प्राणवेत्ता पुरूषों ने लक्षित किया है। मैं उन्हें प्रयत्न करके बता रहा हूँ। उन शब्दों को नाद्सिद्धि भी कहते हैं। वे शब्द क्रमशः इस प्रकार हैं-

घोष, कांस्य (झांझ आदि), शृंग (सिगा आदि), घंटा, वीणां आदि, बांसुरी, दुन्दु भी, शंख, नवां मेघ गर्जन- इन 9 प्रकार के शब्दों को त्याग कर तुंकार का अभ्यास करें। इस प्रकार सदा ही ध्यान करने वाले योगी पुण्य और पापों से लिप्त नहीं होते। देवी! योगाभ्यास के द्वारा सुनने का प्रयत्न करने पर भी जब योगी उन शब्दों को नहीं सुनता और अभ्यास करते-करते मरणासन्न हो जाता है, तब भी वह दिन-रात उस अभ्यास में ही लगा रहे। ऐसा करने से सात दिनों में वह शब्द प्रकट होता है, जो मृत्यु को जीतने वाला है। देवी! वह शब्द 9 प्रकार का है। उसका मैं यथार्थ रूप से वर्णन करता हूँ।

पहले तो घोषात्मक नाद् प्रकट होता है, जो आत्म शुद्धि का उत्कृष्ठ साधन है। वह उत्तम नाद् सब रोगों को हर लेने वाला तथा मन को वशीभूत करके अपनी और खींचने वाला है।

दूसरा कांस्य-नाद है, जो प्राणियों की गति को स्तम्भित् कर देता है। वह विष, भूत और ग्रह आदि सबको बांधता है- इसमें संशय नहीं है।

तीसरा श्रृग नाद् है, जो अभिचार से सम्बन्ध रखने वाला है। उसका शत्रु के उच्चाटन और मारण में नियोग एवं प्रयोग होता है।

चैथा घंटा नाद् है, जिसका साक्षात् परमेश्वर शिव उच्चारण करते हैं। वह नाद् सम्पूर्ण देवताओं को आकर्षित कर लेता है, फिर भूतल के मनुष्यों की तो बात ही क्या है। यक्षों और गंघर्वो की कन्यायें उस नाद् से आकर्षित हो योगी को उसकी इच्छा के अनुसार महासिद्धि प्रदान करती हैं तथा उसकी अन्य कामनायें भी पूर्ण करती हैं।

पांचवा नाद् वींणा है, जिसे योगी पुरूष ही सदा सुनते हैं। देवी! उस वींणा नाद् से दूर दर्शन की शक्ति प्राप्त होती है। वंशी नाद् का ध्यान करने वाले योगी को सम्पूर्ण तत्व प्राप्त हो जाता है।

दुंदुभी नाद् का चिंतन करने वाला साधक जरा और मृत्यु के कष्ट से छूट जाता है। देवेश्वरी्! शंख नाद् का अनुसंधान होने पर इच्छा अनुसार रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। मेघ नाद् के चिंतन से योगी को कभी विपत्ति का सामना नहीं करना पड़ता। वरानने! जो प्रतिदिन एकाग्र चित्त से ब्रह्म रूपी तुंकार का ध्यान करता है, उसके लिये कुछ भी असाध्य नहीं होता।

उसे मनोवांछित सिद्धि प्राप्त हो जाती है। वह सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और इच्छानुसार रूपधारी होकर सर्वत्र विचरण करता है, कभी विकारों के वशीभूत नहीं होता। वह साक्षात् शिव ही है- इसमें संशय नहीं है। परमेश्वरी! इस प्रकार मैने तुम्हारे समक्ष शब्दब्रह्म के नवधा स्वरूप का पूर्णतया वर्णन किया है।

 

नेत्ररोग नाशक चाक्षुशी विद्या

नेत्ररोग नाशक चाक्षुशी विद्या नेत्र रोग का हरण करने वाली, पाठ मात्र से सिद्ध होने वाली चाक्षुशी विद्या की व्याख्या करते हैं, जिससे समस्त नेत्ररोगों का सम्पूर्णतया नाश हो जाता है। और नेत्र तेज युक्त हो जाते हैं। उस चाक्षुशी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द हैं, सूर्य भगवान देवता हैं, नेत्र रोग की निवृत्ति के लिए इसका जप होता है। यह विनयोग है।

नेत्रोपनिषद मंत्रः-

ऊँ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरिमं चछुरोगान् शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कलप्य। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मलय निर्मलय। ऊँ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ऊँ नमः करूणाकरायामृताय। ऊँ नमः सूर्याय। ऊँ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम। खेचराय नमः महते नमः रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्रमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवा´छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्यक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।

ऊँ (भगवान का नाम ले कर कहे)। हे चक्षु के अधिकारी सूर्य देव ! आप चक्षु में चक्षु के तेज रूप में स्थिर हो जायँ। मेरी रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आंखों के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना स्वर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे में अन्धा न होऊँ (कृपया) वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, उखाड़ दें। ऊँ (सच्चिदानन्दस्वरूप) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्कर को नमस्कार है। ऊँ करूणाकर अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ऊँ सूर्य भगवान् को नमस्कार है। ऊँ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्य देव को नमस्कार है। ऊँ आकाश बिहारी को नमस्कार है। परम श्रेष्ठस्वरूप को नमस्कार है। ऊँ (सबमें क्रिया-शक्ति उत्पन्न करने वाले) रजोगुणरूप सूर्य भगवान को नमस्कार है। (अन्धकार को सर्वथा अपने अंदर समा लेने वाले) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! मुझको असत से सत की ओर ले चलिये। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्णस्वरूप भगवान् सुर्य शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं-उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई नहीं है। जो ब्रह्माण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है, उसको नेत्र सम्बंधी कोई रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अंधा नही होता। आठ ब्रह्ममणों को इस विद्या का दान करने पर इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्ध होती है।

जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों से सुशोभित एवं जातवेदा (भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाले) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय (सुवर्ण के समान कान्तिमान्) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व जो एकमात्र उत्पत्तिज्ञथान हैं, उन प्रचण्ड प्रताप वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव समस्त प्रजाओं (प्राणियों) के समक्ष उदित हो रहे हैं।

ऊँ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।

ऊँ षड्विध ऐश्वर्य से समपन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, दिन का भार वहन करने वाली है। हम उन भगवान् के लिए उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेघा अत्यंत प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पंक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे। ‘‘भगवन् ! इस अंधकार को छिपा दीजिए, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिए तथा तमोमय बन्धन में बधे हुए हम सब प्राणियों को अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार है। पुष्करेक्षण को नमस्कार है। निर्मल नेत्रों वाले अमलेक्षण को नमस्कार है। कमलेक्षण को नमस्कार है। विश्व रूप को नमस्कार है।

नेत्र रोग से पीडि़त श्रद्धालु साधक को चाहिए कि प्रतिदिन प्रातःकाल हरिद्रा (हल्दी के रस) से अनार की शाखा की कलम के द्वारा काँसे के पात्र में निम्नलिखित विधि से यन्त्र को लिखें।

फिर उसी यन्त्र पर ताँबे की कटोरी में चर्तुमुख (चारो ओर चार बत्तीयो का) घी का दीपक जलाकर रख दें। तदानन्तर गन्ध-पुष्पादि से यन्त्र का पूजन करें। फिर पूर्व की ओर मुख करके बैंठे और हरिद्रा (हल्दी) की माला से ऊँ ह्नीं हंसः’ इस बीज मंत्र की छः मालाएँ जप कर नेत्रोंपनिषद के कम से कम बारह पाठ करें। पाठ के पश्चात फिर उपर्युक्त बीजमंत्र की पांच मालाएँ जपें। तदनन्तर सूर्य भगवान् को श्रदापूर्वक अघ्र्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा।

ऐसा करते रहने से इस उपनिशद् का नेत्ररोगनाशक अदभुत प्रभाव बहुत शीघ्र देखने में आता है।

 

प्रचण्ड शक्ति है बगलामुखी

प्रचण्ड शक्ति है बगलामुखी  साधकों के लिये समस्त साधनाओं की कुंजी है ‘तंत्र’! सब सम्प्रदायों की सब प्रकार की साधना का गूढ़ रहस्य तंत्रशास्त्र में निहित है। तंत्र केवल शक्ति उपासना का ही प्रधान अवलम्बन नहीं है, वह सभी साधनाओं का एकमात्र आश्रय है इसमें स्थूलतम साधन प्रणाली से लेकर अति गुह्य मंत्रशास्त्र और अति गुह्यतर योग साधनादि के समस्त क्रिया कौशलों का सविस्तार वर्णन है। तंत्रान्तर्गत दार्शनिक तत्त्व भी कम सूक्ष्म नहीं हैं। हाँ, ये प्रचलित दर्शन शास्त्रों के समान जटिल भाष्य, टीका और विविध मतवाद द्वारा भायाक्रान्त या दुर्बोध्य नहीं है।

जिस प्रकार मनुश्य की प्रकृति सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भेद से तीन प्रकार की होती है, उसी प्रकार तंत्र शास्त्र भी सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भेद से तीन प्रकार का होता है, तथा इसकी साधना प्रणाली भी उसी प्रकार गुणभेद से तीन प्रकार की व्याख्यात होती है। जिसकी जैसी प्रकृति व रुचि हो, तदनुसार ही साधन पथ को ग्रहण कर साधन करने से वह जीवन को कृतकृत्य कर सकता है। शक्ति जिस प्रकार देव स्वभाव वा दैवीगुण युक्त जीवों की जननी रूपा हैं, उसी प्रकार वह असुर गुण युक्त अथवा असुरों की भी जननी है। इसी कारण असुर और देवता दोनों ही उनकी उपासना में प्रवृत्त होते हैं तथा दोनों ही अपने-अपने स्वभावानुसार उपासना की प्रणाली का अवलम्बन करते हैं, एवं उनका साधन फल भी साधना की प्रकृति के अनुसार ही होता है। इसी कारण शास्त्र दोनों प्रकार की साधन प्रणाली बतलाते हैं। यहां पाठकों को एक ऐसी प्रचण्ड शक्ति बगलामुखी की सरल और शास्त्रोक्त साधना पद्धति का उल्लेख किया जा रहा है जिस देवी का स्थान शक्ति के दस महाविद्या स्वरूपों में प्रमुख है, साधक शत्रु बाधा से मुक्ति चाहता हो अथवा कलह नाश तिरस्कार से छुटकारा या भय-मुक्ति चाहता हो तो इसके लिये बगलामुखी देवी की साधना से तीव्र कोई साधना नहीं है।

आज हम यह विशेष तांत्रोक्त सरल साधना पद्धति साधकों के लिये स्पष्ट कर रहे हैं, जो अत्यंत प्रचण्ड तथा गुह्यतम साधना पद्धति है। गुरू भक्ति में पूर्ण समर्पित साधक तथा गुरू पूजन करने वाले साधकों के लिए है, इस तीव्र साधना का आधार गुरू भक्ति ही है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को ऐश्वर्यशाली बनकर आनन्द से जीना चाहता है, और यह आनन्द, ऐश्वर्य प्राप्त करनें के लिये निरन्तर इच्छा करता है, तथा प्रयत्न भी करता रहता है, परंतु क्या सब के साथ ऐसा ही होता है? इसका यही उत्तर मिलेगा, कि ऐसा संभव नहीं हो पाता, वास्तविक जीवन में तो कष्ट आते हैं, बार-बार बाधायें उपस्थित होती हैं। जीवन में चार बड़े भयंकर विष हैं, जिनके रहते जीवन में आनन्द आ ही नहीं सकता, ये चार विष हैं-

  1. शत्रु बाधा
  2. कलह
  3. तिरस्कार
  4. भय

वास्तव में शत्रु तो चैबीस घंटे आप पर सवार ही रहता है, मित्र से तो आप कभी-कभी मिलते हैं। यदि आप का भी कोई शत्रु बन गया है तो आप का चिन्तन हर समय उसकी ओर ही रहेगा। आपका विचार प्रवाह पहले की तरह न रहकर बदल जायेगा। आप हर समय आशंकित रहेंगे और सोचने लगेंगे कि ऐसा जीवन क्या जीवन है? आपको कोई पुरस्कृत न करे, तो कोई अन्तर नहीं पड़ता, लेकिन यदि कोई आपका तिरस्कार करे, कोई आपको तुच्छ समझे, तो यह मरण समान ही है।

कलह मानव जीवन की सभी उपलब्धियों, सभी कलाओं का नाश कर देती है। कलह शारीरिक क्षति तो पहुंचाती ही है, मानसिक दृष्टि से भी मनुश्य को दुर्बल कर देती है। वह कुछ रचनात्मक कार्य करना चाहता है, लेकिन यदि नित्य प्रति कलह का सामना करना पड़े, चाहे वह कलह पारिवारिक हो, अथवा बाहर के किसी शत्रु के द्वारा उत्पन्न की गयी हो। जीवन का आनन्द तत्व तो समाप्त हो ही जाता है।

चैथी महत्वपूर्ण विपरीत स्थिति भय है, यह भय शत्रु से भी हो सकता है, अपने अधिकारी से भी हो सकता है और अपने व्यापारिक प्रतिस्पर्धी से भी हो सकता है। भय के तो सैकड़ों प्रकार हैं, इसमें से एक भी प्रकार का भय यदि मनुश्य को है तो वह सामान्य रूप से जीवनयापन नहीं कर सकता। यही चारों स्थितियां ही विष हैं, और विष को अपने जीवन से दूर करने का, नष्ट करने का एक उपाय है, वह है- गुरू की भक्ति से गुरू कृपा, प्राप्त कर साधना में सिद्धि प्राप्त कर लेना।

बगलामुखी साधना प्रयोगः-

देवी बगलामुखी की सिद्धि मंगलवार की चतुर्दशी से आरम्भ कर 40 दिन में सवा लाख मंत्र जप द्वारा की जाती है। विस्तृत साधना के तीन खण्ड प्रातः काल, मध्याह्न काल, तथा सायंकाल की साधना का विशेष क्रम है, और इस तांत्रोक्त साधना को इसी रूप में सम्पन्न करने से पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। परंतु बगलामुखी साधना पर्वकाल (होली, दीपावली, महाशिवरात्रि) में केवल एक रात्रि में ही सिद्ध की जा सकती है। इसके अतिरिक्त बगलामुखी जयंती पर्व भी बगलामुखी साधना के लिये उपयुक्त है। इस वर्ष 26 अप्रैल 2015 के दिन श्री बगलामुखी जयंती पर्व है, इस दिन साधक यह साधना सम्पन्न कर सकते हैं।

साधना के लिये जिस सामग्री की आवश्यकता होती है वह इस प्रकार है- एक लकडी की चैकी तथा उस पर बिछाने के लिये पीला वस्त्र, पीले पुष्प, पीले रंगे हुये चावल, कुंकुम, पीली मौली, 21 साबुत सुपारी, हल्दी का चूर्ण, पीले रंग की नैवेद्य (मिठाई), हल्दी की 108 दाने की प्राण प्रतिष्ठित माला, तथा स्वर्णपत्र पर बने अथवा स्वर्ण आलेपित प्राण प्रतिष्ठित बगलामुखी महायंत्र, शुद्ध मुहूर्त में निर्मित स्वर्ण के कवच में रक्षा कवच, तथा बगलामुखी देवी का रंगीन चित्र।

इस साधना में बगलामुखी देवी का चित्र देखे तो इस देवी का स्वरूप दस महाविद्याओं में सबसे निराला लगता है। यह तीन नेत्र वाली देवी अपने एक हाथ में मुग्दर और दूसरे में शत्रु की जीभ लिये तीव्रतम प्रचण्ड रूप धारण किये तीनों लोकों को स्तम्भित कर देने वाली शक्ति है। देवी के इस स्वरूप में सोलह शक्तियाँ समाहित हैं-

  1. मंगला
  2. स्तम्भिनी
  3. जृम्भिणी
  4. मोहिनी
  5. वश्या
  6. वला
  7. बलका
  8. भूधरा
  9. कल्मषा
  10. धात्री
  11. कलना
  12. कलाकर्षिणी
  13. भ्राम्रिका
  14. मन्दगमा
  15. भोगस्था
  16. भाविका

यह प्रचण्ड साधना तीव्रतम साधना की श्रेणी में आती है, अतः किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु ही गुरू आज्ञा से की जानी चाहिए, अन्यथा इससे भयंकर दोष पैदा होकर शरीर का क्षय करने लग जाते हैं।

ऊपर लिखे जो चार दोष हैं, उनके निवारण हेतु विशेष संकल्प लेकर यह प्रयोग आरम्भ करना चाहिए। जब तक इन चार में से कोई एक कष्ट न हो तब तक गुरू भी इस साधना की आज्ञा नहीं देते-

  1. भयंकर शत्रु बाधा
  2. दीर्घकालिक कलह
  3. अति तिरस्कार
  4. प्राण हरने वाला भय।

कई सामान्य साधक जिन्हें पूजन विधि का पूर्ण ज्ञान नहीं होता, उनसे साधना में गलतियाँ हो सकती हैं, अतः शास्त्रों में विधान है, कि यदि पहले गुरू आज्ञा और गुरू पूजन कर के प्राणायाम साधन तथा गायत्री पाठ करके यह साधना प्रारम्भ की जाय, तो कोई साधनात्मक दोष नहीं रहता। साधना की आज्ञा गुरू से लेकर शुभ मुहूर्त अथवा पर्वकाल (दीपावली की रात्रि) में स्नानादि कर शुद्ध पीले वस्त्र धारण कर पीले ऊनी आसन पर बैठकर प्रथम हाथ में थोडे पीले रंगे हुये चावल तथा पवित्र जल लेकर संकल्प लिया जाता है-

संकल्प मंत्र-

ऊँ अस्य श्रीबगलामुखी महामंत्रस्य नारद ऋषिः वृहतीश्छन्दः श्रीबगलामुखी देवता ह्लीं बीजं स्वाहा शक्तिः मम् सकलकामनासिद्धयर्थे जपे विनियोगः

अब सामने एक लकडी की चैकी पर पीला वस्त्र बिछा कर उस पर बगलामुखी देवी का रंगीन चित्र स्थापित करें (इस चित्र को पहले ही फ्रेम करवा लें) फिर पीतल का दीपक शुद्ध घी से प्रज्जवलित करें। पीले पुष्प, पीले रंगे हुये चावल, साबुत सुपारी तथा एक पात्र में 250 ग्रा. हल्दी चूर्ण, हल्दी की माला तथा अन्य साधना सामग्री रखकर अर्धमुद्रित नेत्रों से देवी का ध्यान तथा मानसिक आहवाहन् करें-

ध्यान मंत्र-

दुष्ट स्तम्भन मुग्र विध्न शमनं दारिद्रîविच्छेदनं भूमद्धीशमनं चलन्मृगद्दशां चेतः समाकर्षणम्। सौभाग्यैक निकेतन मम दृशोः कारूण्यपूर्णेक्षणो शत्रो र्मारण माविरस्तु पुरतो मातस्त्वदीयं वपुः।।

करूणापूर्ण नेत्रों वाली माता बगलामुखी मेरे समक्ष आपका वह स्वरूप प्रगट हो जो शत्रुओं की शत्रुता को नष्ट तथा दुष्टों का स्तम्भन, भयंकर विध्नों का निवारण, दरिद्रता का विनाश, राजभय का शमन करने वाला है, मेरे नेत्रों के लिए सौभाग्य का एक मात्र निकेतन है, तुम्हारे चरणों में सादर प्रणाम !!

अब स्वर्णपत्र पर बने अथवा स्वर्ण आलेपित प्राण प्रतिष्ठित बगलामुखी महायंत्र तथा शुद्ध मुहूर्त में निर्मित स्वर्ण के कवच में रक्षा कवच को चैकी पर देवी के चित्र के सामने रखकर देवी के चित्र के साथ पूजन करें- पूजन में पीले पुष्प, पीले कुंकुम, हल्दी तथा मौली समर्पित करते हुये पूजा सम्पन्न करें, देवी के समक्ष पीले रंग की नैवेद्य (मिठाई) अर्पित करें। अब देवी की सोलह शक्तियों का पूजन प्रारम्भ करें, इस हेतु निम्न एक-एक मंत्र पढ़ते हुए सोलह बगलामुखी शक्तियों की स्थापना करें (सोलह स्थानो पर मंत्र पढते हुये एक-एक मुट्ठी हल्दी का चूर्ण रखें)।

ऊँ मंगलायै नमः

ऊँ स्तम्भिन्यै नमः

ऊँ जृम्भिण्यै नमः

ऊँ मोहिन्यै नमः

ऊँ वश्यायै नमः

ऊँ वलायै नमः

ऊँ बलकायै नमः

ऊँ भूधरायै नमः

ऊँ कल्मषायै नमः

ऊँ धात्रयै नमः

ऊँ कलनायै नमः

ऊँ कालाकर्षिण्यै नमः

ऊँ भ्रामिकायै नमः

ऊँ मन्दगमनायै नमः

ऊँ भोगस्थायै नमः

ऊँ भाविकायै नमः

अब प्रत्येक देवी शक्ति के आगे एक साबुत सुपारी रखें और पीले चावल तथा पीले पुष्प अर्पित करें। और फिर हल्दी की माला से जप आरम्भ कर सूर्योदय तक मंत्र का जप करते रहें। यदि जप के बीच में लघुशंका के लिये उठना पडे तब देवी को विलम्ब की प्रार्थना करके उठें और दोबारा देवी का ध्यान करते हुये जप आरम्भ कर सूर्योदय तक जप करें दीपक में घी की आवश्यकता हो तो चम्मच से डालते रहें।

जप मंत्र-

ऊँ हृीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जीह्नां कील्य बुद्विं विनाश्य हृीं ऊँ स्वाहाः।

ओम र्हिं बाग्लमुखी सरवदुस्ताना वाचम मुखाम पदम स्तंभयाए जीव्हां कीलयाए बुधीं विनाश्याए र्हिं ओम स्वाहा 

जप पूर्ण होने पर जप समर्पण मंत्र का पाठ हाथ में माला लेकर हाथ जोडकर प्रार्थना करते हुये करें-

जप समर्पण मंत्र-

गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्। सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात् सुरेश्वर।।

अर्थात् हे ‘देवी ! सुरेश्वरी !! आप गोपनीय से भी अति गोपनीय वस्तु की गोप्ता (संरक्षक) हैं, हमारे द्वारा किये गये इस जप को ग्रहण करें और आपकी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो। इस के पश्चात् देवी को मानसिक विदाई देते हुये नमस्कार करें और देवी को जो नवैदय का भोग लगाया था उस मिष्ठान का परिवार सहित प्रसाद ग्रहण करें। प्रज्जवलित दीपक शांत होने पर स्वर्ण आलेपित प्राण प्रतिष्ठित बगलामुखी महायंत्र तथा देवी बगलामुखी के रंगीन चित्र को छोडकर शेष सामग्री हटा लें। शुद्ध मुहूर्त में निर्मित स्वर्ण के कवच में रक्षा कवच को देवी के चित्र के सामने से हटाकर अपने गले में पीले धागे के साथ श्रद्धापूर्वक धारण करें और हमेशा धारण किये रहें। (यह कवच गुरूजी द्वारा विशेष रूप से शुद्ध मुहर्त में निर्माण किया गया है।) इस कवच के प्रभाव से शत्रु निर्बल तथा स्वयं के पराक्रम में वृद्धि होती है। शेष सभी सामग्री फूल, चावल, हल्दी व सुपारी इत्यादि जल में विसर्जित कर दें। देवी के चित्र को तथा बगलामुखी यंत्र को अपने पूजा स्थान में ही स्थापित कर दें।

नोट- इस विशेष साधना को करने से पहले गुरूजी से आज्ञा लेकर साधना सामग्री का कार्यालय से प्राप्त कर सकते हैं।

 

शनिदेव की क्रूरता क्यों

शनिदेव की क्रूरता क्यों शनि भगवान् सूर्य के पुत्र हैं। छाया (स्वर्णा) इनकी माता हैं शास्त्रों के अनुसार ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। यह कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में इस प्रकार आयी है-

बचपन से ही शनि देवता भगवान् कृष्ण के अनुराग में निमग्न रहते थे। व्यस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। पत्नी सती-साध्वी और तेजस्विनी थी। एक रात ऋतु-स्नानकर पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा से वह पति के पास पहुँची। पति ध्यान में बैठे थे। बाह्य ज्ञान न था। पत्नी प्रतीक्षा कर थक गयी। ऋतुकाल निष्फल हो चुका था। इस उपेक्षा से क्रुद्ध होकर सती ने शाप दे दिया कि जिसे तुम देख लोगे वह नष्ट हो जायेगा। ध्यान टूटने पर शनि देवता ने पत्नी को मनाया। पत्नी को स्वयं पश्चाताप हो रहा था, किंतु शाप के प्रतीकार की शक्ति उसमें न थी। तब से शनि देवता सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वे किसी का अहित नहीं चाहते थे। उनकी दृष्टि पड़ते कोई भी नष्ट हो सकता था। शनि ग्रह यदि कहीं रोहिणी-शकट भेदन कर दें तो पृथ्वी पर बारह वर्ष घोर दुर्भिक्ष पड़ जाये और प्राणियों का बचना ही कठिन हो जाये।

ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से शनिग्रह जब रोहिणी का भेदन कर बढ़ जाता है, तब यह योग आता है।

यह योग महाराज दशरथ के समय में आने वाला था। इस योग के आने पर पानी और अन्न के बिना उनकी प्रजा तड़प-तड़प कर मर जायेगा, यह दारुण दृश्य महाराज के सामने आ गया। प्रजा को इस कष्ट से बचाने के लिये रथ पर बैठकर महाराज दशरथ नक्षत्र मण्डल में जा पहुँचे। पहले तो महाराज ने शनि देवता को प्रतिदिन की भाँति प्रणाम किया और बाद में क्षत्रिय-धर्म के अनुसार उन पर संहारस्त्र का संधान किया। शनि देवता महाराज की राजोचित कर्तव्य-निष्ठा से प्रसन्न हो गये और वरदान माँगने को कहा। महाराज ने वर में माँगा कि जब तक सूर्य, नक्षत्र आदि विद्यमान हैं, आप कभी शकट-भेदन न करें। शनि देवता ने यह वरदान दे दिया। शनि देव की कृपा देखकर महाराज को रोमांच हो आया। उन्होंने रथ में धनुष डाल दिया और उनकी पूजा की। उसके बाद सरस्वती और गणेश का ध्यान कर स्तोत्र की रचना की।

शनि स्तोत्र-

नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।

नमः कालाग्रिरूपाय कृतान्ताय च वै नमः।।

नमो निर्मासदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते।।

नमो कोटरक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः।

नमो धोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तुते ।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च।।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः।

त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः।।

प्रसादं करू मे देव वराहोहमुपागतः।

एवं स्तुतस्तदा सौरिग्र्रहराजो महाबलः।।

यह शनि स्तोत्र अचूक प्रभावकारी है, प्रतिदिन इसका एक पाठ करना चाहिये।

यदि प्रतिदिन न कर सकें तो प्रत्येक शनिवार को अवश्य ही स्तोत्र पाठ करें।

इस स्तुति से शनि देवता संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने एक वरदान और माँगने को कहा। महाराज ने दूसरे वरदान मे माँगा- ‘भगवन्! देवता, मानव, पशु-पक्षी किसी को आप कष्ट न दें।’ शनि देवता ने एक शर्त के साथ यह वरदान भी दे दिया। शर्त यह थी कि यदि किसी की कुण्डली या गोचर में मृत्यु-स्थान, जन्मस्थान अथवा चतुर्थ स्थान में मैं रहूँ, तब मैं उसे मृत्यु का कष्ट दे सकता हूँ, किंतु यदि वह मेरी प्रतिमा की पूजा कर तुम्हारे द्वारा किये गये स्तोत्र का पाठ करेगा तो उसे मैं कभी पीड़ा नहीं दूंगा। अपितु उसकी रक्षा करूँगा। शनि के अधिदेवता प्रजापति और प्रत्याधिदेवता यम हैं। शनि ग्रह एक-एक राशि में तीस-तीस महीने रहते हैं और तीस ही वर्ष में सब राशियों को पार करते हैं।

(श्रीमद्भ० 5।22।14)

वर्ण- शनि देवता का वर्ण कृष्ण है।

(मत्स्यपु० 14।6)

वाहन- इनका वाहन गीध तथा रथ लोहे का बना हुआ है।

(मत्स्यपु० 127।8)

आयुध- धनुष-बाण और त्रिशूल इनके आयुध है। इनका स्वरूप इस प्रकार है-

इन्द्रनीलद्युतिः शूली वरदो गृध्रवाहनः।

बाणबाणासनधरः कर्तव्योऽर्कसुतस्तथा।।

(मस्त्यपु० 14।6)

‘शनैश्चर की शरीर-कान्ति इन्द्रनीलमणि की-सी है। वे गीध पर सवार होते हैं और हाथ में धनुष, बाण, त्रिशूल और वर मुद्रा धारण किये रहते हैं।’

वैदिक तथा तंत्रिक मंत्रों के रूप में हमें अनेक ग्रंथों में उपलब्ध हैं।

आज विज्ञान का युग है। पर इस युग में भी मंत्र-तंत्र में कोई वास्तविक शक्ति है या नहीं- यह एक पहेली बनी हुई है। यह तो र्निर्ववाद है कि प्राचीनकाल में मानवीय विश्वासों और मान्यताओं में मंत्र- तंत्रों का बहुत बड़ा स्थान था और आज भी है। अन्य दृष्टियों से विकसित और परिष्कृत रूचि के लोग मंत्र तंत्रों के चमत्कारिक गुण और प्रभाव में आज भी अगाध विश्‍वास रखते हैं। यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि तांत्रिक सिद्धियाँ और सिद्ध पुरूषों के वर्णनातीत प्रभाव हमें उलझन में डाल देते हैं और आज जब मनुश्य में स्थित छठी इंद्रिय की और इंद्रियातीत शक्तियों की खोजे हो रही है, हमें एक नितांत मानवीय विश्वास का पुर्नमूल्यांकन करने की सच्ची प्रेरणा मिलती दिखाई पड़ती है। परामनोविज्ञान की खोजों ने तो भौतिकवादी देश तक को इतना प्रभावित किया है कि रूस जैसे देश में भी इस पर शोधकार्य प्रारंभ हो गया। यह तो मानी हुई बात है कि किसी भी समस्या का दो टूक समाधान नहीं है और ऐसी जगह तो हमारे वैज्ञानिक साधन भी प्रायः समाप्त हो जाते हैं। पर आज ऐसे लोगों को भी जो इंद्रियातीत किसी शक्ति या रहस्य में विश्वास नहीं करते। आये दिन ऐसे अनुभव होते हैं, जिनसे उनकी सारी मान्यता धूल में मिल जाती है।

‘तंत्र’ का अर्थ वह शास्त्र है, जिसके द्वारा ज्ञान का विस्तार किया जाता है- तन्यते विस्तार्यते ज्ञानमनेन इति तंत्रम्। इसके दो विशिष्ट अंग है। संयम करना, नियंत्रण करना या विस्तृत शक्ति को केंद्रिकृत करना। सूर्य की किरणें जगत में व्याप्त हैं। इन विस्तीर्ण किरणों को केंद्रियभूत करने पर शक्ति संचारित होती है। जिससे अलौकिक कार्य किये जा सकते हैं। रशिमयों में अत्यंत सूक्ष्म शक्तियाँ हैं। जिन्हें एकत्रित कर विज्ञान के विधानानुसार विकीर्ण कर अनेक भीषण कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं।

अब मंत्रों को लीजिये- ‘मंत्र’ शब्द मन धातु के उत्तर ‘त्रै, धातु एवं ङ् प्रत्यय के योग से निष्पन्न होता है। (मनत्रै=मंत्र) ’ मननात् त्रायते यस्मात् तस्मान्मन्त्र मंत्र उदाहृतः।’ जिसके मनन द्वारा, चिंतन द्वारा, ध्यान द्वारा, दुःख कष्ट की निवृति होकर परमानंद की प्राप्ति होती है। उसी का नाम मंत्र है। सामान्यतया मंत्र के तीन प्रकार हैं- वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक। तीनों प्रकार के मंत्रों में तीन तत्त्व निहित रहते हैं। मंत्र के साथ प्रणव अथवा व्याहृतियों का चोली दामन का संबध है। इन से हमें आध्यात्मिक लाभ क्या हैं आइये इस पर एक दृष्टि डालें।

प्रणव अथवा व्याहृति- परम तत्त्व के निकट आना।

बीज- परम तत्त्व का दर्शन करना और उसे उपलब्ध करना।

देवता- लौटते समय अपने सभी तत्वों को तदभव से परिभावित करना। एकाक्षर मंत्र में भी ये तीनों तत्त्व पाये जाते हैं। एकाक्षर प्रणव या ऊँकार सर्वव्यापी भगवतत्त्व को प्रकाश करता है। इसमें शक्तिमान और शक्तितत्त्व के सब रहस्य विद्यमान हैं। इसके अकार, उकार, मकार- शक्तितत्त्व के और अर्द्धमात्रा ‘शांतं शिवमद्वैतम्’ के द्योतक हैं।

 

उपनिषद् में शक्ति का रहस्य

उपनिषद् में शक्ति का रहस्य विश्व में जो कुछ है, वह व्यापक ब्रह्म है। ‘तैत्तिरीयोपनिषद्’’ ने ब्रह्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि जिसमें सारा विश्व पैदा होता है, पैदा होकर जीता है और जीकर जिसमें लय हो जाता है, उसी का नाम ब्रह्म है। इस बात को समझाते हुए गुरूदेव ने पहले शिष्य को यह बताया कि ‘अन्न ब्रह्मेति व्यजानत’ अर्थात् अन्न ब्रह्म है। देह अन्न से पैदा हुआ, अन्न से जीता है और अन्न में लय होता है। अतएव अन्न को ब्रह्म मानो। शिष्य को इस व्याख्या से संतोष न हुआ, तब गुरूजी ने ‘प्राणं ब्रह्मोति व्यजानत’ कहा अर्थात प्राण ब्रह्म है। देह प्राण से पैदा हुआ, प्राण से जीता और प्राण में लय होता है। शिष्य को इस व्याख्या से भी सन्तोष न हुआ। फिर गुरूजी ने ‘मन ब्रह्मेति व्यजानत’ बताया अर्थात मन ब्रह्म है। शिष्य को इस व्याख्या से भी सन्तोष न हुआ। तब गुरूजी ने ‘विज्ञान’ को और पीछे ‘आन्नद’ को ब्रह्म बताया, लेकिन जब इतने सारे ब्रह्म बताए गये, तब हम किसको सचमुच ब्रह्म मानें? ब्रह्म की उक्त व्याख्याओं से हमें सन्तोष नहीं होता।

‘माण्डूक्योपनिषद्’ ने आत्मा की चार अवस्थायें बताई हैं-

  1. जाग्रत
  2. स्वप्न
  3. सुशुप्ति
  4. तुरीय।

जाग्रत् और स्वप्न का अनुभव सबको होता है। सुषुप्ति अर्थात् गाढ़ निद्रा। तुरीय का अनुभव सबको नहीं होता। अतः उसे आत्मा की चैथी अवस्था कह कर उसका सारा वर्णन नकार में ही किया है। जब आत्मा की यह हालत है, तब ब्रह्म क्या वस्तु है, कैसे समझ में आये? आदि शंकराचार्य अपने शिष्य के साथ जंगल में जा रहे थे। रास्ते में एक पागल हाथी आता दिखाई पड़ा। सबलोग इधर-उधर हो गये। हाथी के निकल जाने के बाद एक शिष्य ने गुरू से पूछा कि आप तो ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ बताते हैं। अतएव हम और हाथी सब ब्रह्म ही हैं। फिर हम सब हाथी को देखकर भाग क्यों गये? शंकराचार्यजी ने कहा कि ‘‘हाथी का आना, हमारा देखना और छिपना सभी ब्रह्म था।’’

इतना सोचने-विचारने के बाद जो कुछ है, यह मानने में नहीं आता। यदि कोई कहे कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’, तो मानना पड़ेगा कि ‘मैं’ और ‘ब्रह्म’ अलग-अलग वस्तु हैं, क्यो कि वस्तु और वस्तु का मालिक दोनों एक नहीं होते। सभी तरह से ब्रह्म का विचार करने पर यही ज्ञात होता है कि जो कुछ है, वह अकेला ब्रह्म नहीं है, अपितु साथ में कुछ और भी है। वह क्या है, यह जानना चाहिये।

जिस द्रव में से नवीन पदार्थ प्राप्त हो या पैदा हुआ पदार्थ फिर द्रव बनकर अणु-अणु में मिल जाये, उस द्रव का नाम ‘तत्त्व’ है। उदाहरण के लिये पृथ्वी में एक ही बीज को जल, वायु और अग्नि मिलने से वह अवकाश में प्रस्फुटित होकर पेड़ बनता है और पेड़ में से रूई और कपड़ा भी बनता है। वह कपड़ा यदि जल गया, तो कहा जायेगा कि बीज ने जो रूपक धारण किया था, वह अग्नि में जलकर तत्त्व, तत्त्व में मिल गया। तत्त्व अर्थात् भू, जल अग्नि, वायु और आकाश। प्रत्येक तत्व में दूसरे चार तत्वो की कुछ-न-कुछ मिलावट विद्यमान है। तत्त्व अणु में से पैदा होते हैं। अणु में भयंकर शक्ति है।

अणु-बम कितनी हानि कर सकता है, उससे लोग अपरिचित नहीं हैं। अणु में छिपी हुई भयंकर शक्ति क्या है, उसे जानना चाहिए।

विश्व अनन्त है और अनंत होने से प्रत्येक बिन्दु मध्य बिन्दु है। जो चीज शान्त है, उसका मध्य बिन्दु एक ही होगा। यदि अनन्त का बिन्दु एक ही माना जाये, तो अनंत शान्त हो जायगा। अतएव अनंत का प्रत्येक बिन्दु चिद्-बिन्दु है। उसमें जीवन्त चिद्-शक्ति है। उस प्रत्येक बिन्दु या अणु में भयंकर शक्ति है। तो फिर उस शक्ति को ही विश्व की आदि-शक्ति क्यों न माना जाये ?

कठोपनिषद्’’ में यम ने नचिकेता को बताया कि सूर्य विश्व की आँखें हैं, लेकिन आँख में रोग होने से सूर्य में रोग नहीं होता। इसी तरह प्राणी मात्र की अन्तरात्मा एक होते हुए भी व्यक्तिगत दुःख से आत्मा कुछ नहीं बिगड़ता अर्थात आत्मा को कुछ भी कष्ट नहीं होता। यम ने ब्रह्म का भाव न बताकर सूर्य में विद्यमान शक्ति का भाव बताया। सूर्य की गुरूत्वाकर्षण-शक्ति से नवग्रह नियमानुसार सूर्य के चारों ओर बराबर घुम रहें हैं। तब सोच सकते हैं कि सूर्य में कितनी शक्ति है। सूर्य में जो शक्ति हैं, वह अणु में भी है क्योंकि सूर्य अणु से बनता है।

ईशावास्योपनिषद्’ कहता है कि जो आदमी केवल विद्या की उपासना करता है, वह अंधकार में प्रवेश करता है और जो केवल अविद्या की उपासना करता है, वह भी अंधकार में पड़ता है। जैसे केवल विद्या या अविद्या को मानने से अपना काम नहीं चलता, वैसे ही न अकेले ब्रह्म को मानने से हमारा काम चलेगा, न अकेली शक्तिो मानने से।

यह सब सोचने पर मानना पड़ेगा कि विश्व में दो चीजें होनी चाहिये-एक व्यापक ब्रह्म और दुसरी शक्ति। व्यापक ब्रह्म शिव है और बाकी जो कुछ है, वह शक्ति है। उस शक्ति को कुछ भी नाम दीजिये। चाहे चिद्शक्ति कहो या आदिशक्ति कहो या विश्व की परमेश्वरी ही क्यों न कह डालो।

यह मैं नहीं कहता पुराणों में लिखा है

पार्वती शिव से बोलीं- प्रभो! यदि आप प्रसन्न हैं तो योगी योगाकाशजनित वायु को जिस प्रकार प्राप्त होता है, वह सब मुझे बताइये।

भगवान शिव ने कहा- सुन्दरी! इससे पूर्व मैने योगियों के हित की कामना से कालपर विजय प्राप्त करने की विधि का वर्णन किया है। योगी किस प्रकार वायु का स्वरूप धारण करता है, यह भी बताया है। अब और भी बताता हूँ- इससे पूर्व बताई गई विधि से योगशक्ति के द्वारा मृत्यु-दिवस को योगी जानकर और प्राणायाम में तत्पर हो जाय। ऐसा करने पर वह आधे मास में ही आनेवाले काल को जीत लेता है। हृदय में स्थित हुई प्राणवायु सदा अग्नि को उद्दीप्त करनेवाली है। उसे अग्नि का सहायक बताया गया है। वह वायु बाहर और भीतर सर्वत्र व्याप्त और महान है। ज्ञान, विज्ञान और उत्साह- सबकी प्रवृति वायु से ही होती है। जिसने वायु को जीत लिया, उसने इस सम्पूर्ण जगत पर विजय पा ली।

साधक को चाहिये कि वह जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु को जीतने की इच्छा से सदा धारणा में स्थित रहे; क्योकि योगपरायण योगी को भलीभाँति धारणा और ध्यान में तत्पर रहना चाहिये। जैसे लोहार मुख से धौकनी को फूक-फूंककर उस वायु के द्वारा अपने सब कार्य सम्पन्न करता है, उसी प्रकार योगी को प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये। प्राणायाम के समय जिसका ध्यान किया जाता है, वे आराध्यदेव परमेश्वर सहस्त्रों मस्तक, नेत्र, पैर और हाथों से युक्त हैं। तथा समस्त ग्रन्थियों को आवृत करके उनसे भी दस अंगुल आगे स्थित हैं। आदि में व्याहृति और अंत में शिरोमंत्र सहित गायत्री का तीन बार जप करें और प्राणवायु को रोके रहें। प्राणों के इस आयाम का नाम प्राणायाम है। चन्दमा और सूर्य आदि ग्रह जा-जाकर लौट आते हैं। परंतु प्राणायाम पूर्वक ध्यानपरायण योगी जाने पर आज तक नहीं लौटे हैं। (अर्थात्- मुक्त हो गये हैं)। देवी! जो द्विज सौ वर्षों तक तपस्या करके कुशों के अग्रभाग से एक बूंद जल पीता है, वह जिस फल को पाता है, वही ब्राह्मणों को एकमात्र धारण अथवा प्रणायाम द्वारा मिल जाता है। जो द्विज प्रातः उठकर एक प्राणायाम करता है, वह अपने सम्पूर्ण पाप को शीध्र ही नष्ट कर देता है और ब्रह्मलोक को जाता है। जो आलस्यरहित होकर सदा एकांत में प्राणायाम करता है, वह जरा और मृत्यु को जीतकर वायु के समान गतिशील हो आकाश में विचरता है। वह सिद्धों के स्वरूप, कांति, मेधा, पराक्रम और शौर्य को प्राप्त कर लेता है। उसकी गति वायु के समान हो जाती है। तथा उसे स्पृहणीय सौख्य एवं परम सुख की प्राप्ति होती है।

देवेश्वरी! योगी जिस प्रकार वायु से सिद्धि प्राप्त करता है, वह सब विधान मैने बता दिया है। अब तेज से जिस तरह वह सिद्धि लाभ करता है, उसे भी बता रहा हूँ। जहां दूसरे लोगों की बातचीत का कोलाहल न पहुँचता हो, ऐसे शांत एकांत स्थान में अपने सुखद आसन पर बैठकर चन्द्रमा और सूर्य (वाम और दक्षिण नेत्र) की कांति से प्रकाशित मध्यवर्ती देश भ्रूमध्यभाग में जो अग्नि का तेज अव्यक्त रूप से प्रकाशित होता है, उसे आलस्यरहित योगी दीपकर रहित अंधकारपूर्ण स्थान में चिन्तन करने पर निश्चय ही देख सकता है- इसमें संशय नही है। योगी हाथ की अंगुलियों से यत्नपूर्वक दोनो नेत्रों को कुछ-कुछ दबाये रक्खे और उनके तारों को देखता हुआ एकाग्र चित्त से आधे मुहूर्त तक उन्हीं का चिंतन करे। तदन्तर अंधकार में भी ध्यान करने पर वह उस ईश्वरीय ज्योति को देख सकता है। वह ज्योति सॅद, लाल, पीली, काली तथा इन्द्रधनुष के समान रंगवाली होती है। भौंहों के बीच में ललाटवर्ती बालसूर्य के समान तेजवाले उन अग्निदेव का साक्षात्कार करके योगी इच्छानुसार रूप धारण करने वाला हो जाता है। तथा मनोवांछित शरीर धारण करके क्रीड़ा करता है। वह योगी कारण तत्व को शांत करके उसमें आविष्ट होना, दूसरे के शरीर में प्रवेश करना, अणिमा आदि गुणों को पा लेना, मन से ही सब कुछ देखना, दूर की बातों को सुनना और जानना, अदृष्य हो जाना, बहुत से रूप धारण कर लेना तथा आकाश मार्ग में विचरना इत्यादि सिद्धियों को निरंतर अभ्यास प्रभाव से प्राप्त कर लेता है। जो अंधकार से परे और सूर्य के समान तेजस्वी है, उसी इस महान् ज्योतिर्मय पुरूष (परमात्मा) को मैं जानता हूँ। उन्हीं को जानकर मनुश्यकाल या मृत्यु को लाँघ जाता है। मोक्ष के लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

देवी! इस प्रकार मैने तुमसे तेजस्तत्व के चिन्न की उत्तम विधि का वर्णन किया है, जिससे योगी काल पर विजय पाकर अमरत्व को प्राप्त कर लेता है।

देवी! अब पुनः दूसरा श्रेष्ठ उपाय बताता हूँ, जिससे मनुश्य की मृत्यु नहीं होती।

देवी! ध्यान करने वाले योगियों की चैथी गति साधना बताई जाती है। योगी अपने चित्त को वश में करके यथायोग्य स्थान में सुखद आसन पर बैठे। वह शरीर को ऊँचा करके अंजली बांधकर चोंचकी-सी आकृति वाले मुख के द्वारा धीरे-धीरे वायु का पान करें। ऐसा करने पर क्षणभर में तातु के भीतर स्थित जीवनदायी जल की बूँदें टपकने लगती हैं। उन बूँदों को वायु के द्वारा लेकर सूँघे। वह शीतल जल अमृत स्वरूप है। जो योगी उसे प्रतिदिन पीता है, वह कभी मृत्यु के आधीन नहीं होता। उसे भूख-प्यास नहीं लगती। उसका शरीर दिव्य और तेज महान् हो जाता है। वह बल में हाथी के समान तथ वेग में घोडे के समान हो जाता है। उसकी दृष्टि गरूड़ के समान तेज हो जाती है और उसे दूर की बातें भी सुनाई देने लगती हैं। उसके केश काले और घुंघराले हो जाते है तथा अंग की कांति गंधर्व एवं विद्याधरों की समानता करती है। वह मनुश्य सौ वर्ष तक जीवित रहता है तथा अपनी उत्तम बुद्धि के द्वारा बृहस्पति के तुल्य हो जाता है। उसमें इच्छानुसार विचरने की शक्ति आ जाती है और वह सदा सुखी रहकर आकाश मार्ग में विचरण करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।

देवी! अब मृत्यु पर विजय पाने की पुनः तीसरी विधि बता रहा हूँ, जिसे देवताओं ने भी प्रयत्नपूर्वक छिपा रक्खा है, तुम उसे सुनो- योगी पुरूष अपनी जिव्हा को मोड़कर तालु में लगाने का प्रयत्न करें। कुछ काल तक ऐसा करने से वह क्रमशः लम्बी होकर गले की घाँटी तक पहुंच जाती है। तदन्तर जब जिव्हा से गले की घाँटी सटती है, तब शीतल सुधा का स्त्राव करती है। उस सुधा को जो योगी सदा पीता है, वह अमरत्व को प्राप्त होता है।

(शिव पुराण- अध्याय 27)

पार्वती भगवान शिव से बोलीं- भगवन! मैने आपकी कृपा से सम्पूर्ण मत जान लिया है। देव! जिन मंत्रों द्वारा जिस विधि से जिस प्रकार आपकी पूजा होती है, वह भी मुझे ज्ञान हो गया है। किंतु प्रभों! अब भी कालचक्र के सम्बन्ध में एक संशय है कृपया मेरा यह संशय दूर करें। देव! मृत्यु का क्या चिन्ह है? आयु का क्या प्रमाण है? नाथ यदि मैं आपकी प्रिया हूँ तो मुझे ये सब बातें बतायें।

महादेव जी ने कहा- प्रिये! यदि अक्समात् शरीर सब ओर से पीला पड़ जाये और ऊपर से कुछ लाल दिखे, तो यह जानना चाहिये कि उस मनुश्य की मृत्यु छः महीने के भीतर हो जायेगी। शिवे! जब मुहँ, कान, नेत्र और जिव्हा का स्तम्भव हो जाये, तब भी छः महीने के भीतर ही मृत्यु जाननी चाहिये। भद्रे! जो रूरू मृग के पीछे होनेवाली शिकारियों की भयानक आवाज को भी जल्दी नहीं सुनता, उसकी मृत्यु भी छः महीने के भीतर ही जाननी चाहिये। जब सूर्य, चन्द्रमा या अग्नि के सानिध्य से प्रकट होनेवाले प्रकाश को मनुश्य नहीं देखता, उसे सब कुछ काला-काला अंधकारमय ही दिखाई देता है, तब उसका जीवन छः मास से अधिक नहीं होता। देवी! प्रिय! जब मनुश्य का बायां हाथ लगातार एक सप्ताह तक फड़कता ही रहे, तब उसका जीवन एक मास ही शेष है- ऐसा जानना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। जब सारे अंगों में अंगड़ाई आने लगे और तालू सूख जाये, तब वह मनुश्य एक मास तक ही जीवित रहता है-इसमें संशय नहीं है। त्रिदोष में जिसकी नाक बहने लगे, उसका जीवन 15 दिन से अधिक नहीं चलता। मुख और कण्ठ सूखने लगे तो यह जानना चाहिये कि छः महीने बीतते-बीतते इसकी आयु समाप्त हो जायेगी। भागिनी! जिसकी जीभ फूल जाये और दांतों से मवाद निकलने लगे, उसकी भी छः महीने के भीतर मृत्यु हो जाती है। इन चिन्हों से मृत्युकाल को समझना चाहिये।

सुन्दरी! जल, तेल, घी तथा दर्पण में जब भी अपनी परछाईं न दिखाई दे या विकृत दिखाई दे, तब कालचक्र के ज्ञाता पुरूष को यह जान लेना चाहिये कि उसकी भी आयु छः मास से अधिक नहीं है। देवेश्वरी! अब दूसरी बात सुनों, जिससे मृत्यु का ज्ञान होता है। जब अपनी छाया को सिर से रहित देखें अथवा अपने को छाया से रहित पायें, तब वह मनुश्य एक मास भी जीवित नहीं रहता।

पार्वती! ये मैने अंगों में प्रकट होने वाले मृत्यु के लक्षण बताये हैं। भदे्र! अब बाहर प्रकट हाने वाले लक्षणों का वर्णन करता हूँ, सुनों। देवी! जब चन्द्रमण्डल या सूर्यमण्डल प्रभाहीन एवं लाल दिखायी दे, तब आधे मास में भी मनुश्य की मृत्यु हो जाती है। अरूंधती, महायाना, चन्द्रमा- इन्हें जो न देख सके अथवा जिसे ताराओं का दर्शन न हो, ऐसा पुरूष एक मास तक जीवित रहता है। यदि ग्रहों का दर्शन होने पर भी दिशाओं का ज्ञान न हो- मन पर मूढता छाई रहे तो छः महीने में निश्चय ही मृत्यु हो जाती है। यदि उतथ्य नामक तारा का, धु्रव का अथवा सूर्यमण्डल का भी दर्शन न हो सके, रात में इन्द्रधनुष और मध्याहन में उल्कापात होता दिखाई दे तथा गीद्य और कौये घेरे रहें तो उस मनुश्य की आयु छः महीने से अधिक नहीं होती।

यदि आकाश में सप्तऋषि तथा स्वर्गमार्ग (छाया पथ) न दिखाई दे तो कालज्ञ पुरूषों को उस पुरूष की आयु छः मास ही शेष समझनी चाहिये। जो अक्समात् सूर्य और चन्द्रमा को राहु से ग्रस्त देखता है और सम्पूर्ण दिशायें जिसे घूमती दिखाई देती हैं, वह अवश्य ही छः महीने में मृत्यु को प्राप्त होता है। यदि अक्समात् नीली मक्खीयाँ आकर पुरूष को घेर लें तो वास्तव में उसकी आयु एक मास ही शेष जाननी चाहिये। यदि गीध, कौआ अथवा कबूतर सिर पर चढ़ जाये तो वह पुरूष शीघ्र ही एक मास के भीतर मर जाता है, इसमें संशय नहीं है।

 

 

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण भारतीय ऋषियों ने 16 संस्कारों के रूप में जो अनुशासित व्यवस्था व्यक्तित्व निर्माण के लिये रूपान्तरित की है, उसमें विवाह संस्कार का स्थान महत्वपूर्ण है। विवाह पीढ़ी-विस्तार का समाज सम्मत हेतु है। विवाह विभिन्न सभ्यताओं, सुसंस्कृतियों, संस्कारों, विचार धाराओं और भाव धाराओं के सम्पर्क का भी हेतु है।

विवाह नामक रसपूर्ण संस्कार के प्रति व्यक्ति कि उत्कंठा, जिज्ञासा और लालसा सहज ही है। किन्तु नियति सबके प्रति समान रूप से उदार नहीं होती। आज उचित समय पर विवाह सम्पन्न होना एक दुःसाध्य प्रक्रिया हो गई है- विशेषतः कन्या पक्ष के संदर्भ में। ग्रहों का अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन पर निर्विवाद रूप से पड़ता है। इस संदर्भ में आस्था अनास्था से कोई अन्तर नही पड़ता। जैसे किसी बंद कमरे में बैठकर सूर्य के आलोक अथवा तेज का प्रतिवाद नही किया जा सकता उसी प्रकार ज्योतिष भाग्य और ईश्वर में अश्रद्धा उसके मौलिक प्रभाव को क्षति नही पहुँचाती। इस सत्य को निरन्तर ध्यान में रखना चाहिए। व्यक्ति के जीवन में जन्म के समय ग्रहों की स्थिति एक प्रमुख भूमिका रखती है।

समस्त जीवन इनकी शुभता-अशुभता, सुसंयोगिता- कुसंयोगिता और प्रभुता-क्षीणता के द्वारा निर्धारित होता है। व्यक्ति आजीवन अपनी नियति से संघर्ष करता है और पराभूत होने का दर्शन सीखता है। कन्या के विवाह में अनपेक्षित विलम्ब देखकर अभिभावक चिन्ता के महासमुद्र में निमग्न हो जाते हैं।

अपनी समस्त शक्ति और सामाजिक परिचय का उपयोग करके भी वे अपनी कन्या के लिए उपयुक्त वर नहीं प्राप्त कर पाते। जीवन ऐसे अभावों का क्रूर साक्षात्कार है।

जीवन के अभावों की पूर्ति के लिए मानव ने तंत्र-मंत्र-यंत्र का भी समय समय पर प्रयोग-उपयोग किया है। सर्वप्रथम मंत्र के अर्थ विस्तार की संक्षिप्त विवेचना अनिवार्य है। वैदिक ऋचाओं से दैवी शक्तियों की स्तुतियों, यज्ञादि के लिए विचरित पदों एवं शब्द प्रतीकों तक मंत्र की एक सुसंस्कृत परम्परा प्रवाहमान है। मंत्र शब्द की सामथ्र्य का चरणतम केन्द्रियभूत आह्नान है। ‘मंत्र’ शब्द मंत्रि गुप्तभाषणे’’ धातु से घ् प्रत्यय द्वारा निष्पन्न होता है जिसका तात्पर्य है रहस्य। वह रहस्य जो देवोपम है किन्तु मानवीय अनुभूति का विषय है। तंत्र साहित्य के मतानुसार वह प्रत्येक शब्द मंत्र है जो देवता की स्तुति में निवेदित है। श्रुति, स्मृति, पुराण, उपनिषद, आगम और निगम सभी मंत्रों के उल्लेख से परिपूर्ण हैं। यह सत्य है कि वैदिक मंत्र जितने शक्तिसम्पन्न हैं, उनकी साधना उतनी हीं दुरूह और दुष्कर है। इसलिए वेदोक्त मंत्रों के स्थान पर तंत्र शास्त्र आज किंचित् सहज समझा जाता है। इस तथ्य के विस्तार में जाना इसलिए अप्रासंगिक होगा क्योंकि इस लेख की केन्द्रिय वस्तु है कि विवाह योग्य युवक या कन्या के विवाह में विलम्ब होने पर किन मंत्रो के प्रयोग से आशानुकूल सफलता प्राप्त होगी। अनुभव से सिद्ध हो चुका है कि युवक या कन्या के विवाह मे आने वाली अनेकानेक बाधाओं की शांति मंत्रशक्ति से सुनिश्चित हो सकती है।

जन्मांग में शनि की स्थिति, शनि द्वारा प्रचालित स्थिति, राशियाँ, नक्षत्र और भाव आदि का अध्ययन करना चाहिए। यदि शनि शुक्र से युक्त होकर, सूर्य अथवा चन्द्र किसी एक ग्रह पर दृष्टि निक्षेप करता हो तो विवाह मे विलम्ब होता है। यदि सूर्य अथवा चन्द्र या दोनों संयुक्त रूप से शनि के नवांश में स्थित हों और शुक्र भी शनि से अक्षिप्त हो तो विवाह में आशा के विपरीत विध्न उपस्थित होतें हैं। सप्तम भाव अथवा लग्न के पाप ग्रहक्रांत होने पर पापकर्तरि योग की स्थापना होती है जिसके परिणाम स्वरूप दाम्पत्य अनेकानेक संकटो से घिर जाता है। लग्न सप्तम भाव अथवा इसके अधिपति ग्रह यदि सूर्य और शनि, शनि और मंगल, शनि और राहु, आकर सूर्य जैसे क्रूर ग्रहों से आबद्ध होते हैं तो विवाह की दिशा में विलम्ब अथवा निषेध जैसे संकेत प्राप्त होते हैं। विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब तब भी होता है जब लग्नाधिपति, सप्तमाधिपति, चन्द्रराशि-अधिपति और स्वयं चन्द्र शनि से दृष्ट, युक्त अथवा द्वादश भावस्थ होते हैं। वक्री ग्रह की सप्तम भाव अथवा सप्तम भावेश पर दृष्टि अथवा स्थिति या युति विवाह में बाधा उत्पन्न करती हैं। इन्हीं स्थितियों में द्वितीय भाव या शुक्र हो तो विवाह विलम्बित होता है। पंचमेश और सप्तमेश का परस्पर परिवर्तन योग स्थापित हो अथवा राहु और शुक्र सप्तम अथवा नवम भाव में हों तथा क्रूर ग्रह की दृष्टि का कुसंयोग हो तो विवाह में ज्योतिषीय दृष्टि से विलम्ब की घोषणा की जा सकती है।

 

Diwali Pooja Muhurat 2016

diwali pooja muhurat 2016

Diwali Pooja Muhurat 2016

30 अक्तूबर 2016 दीपावली पर्व है। दीपावली की रात्रि प्रदोषकाल में महालक्ष्मी पूजन (Diwali Pooja Muhurat 2016) की परम्परा आदिकाल से चली आ रही है। इस दिन सूर्य व चन्द्रमा तुला (शुक्र की राशि) में विचरण कर रहे होते हैं।

कार्तिक अमावस्या की रात्रि स्थिर लग्न (वृष या सिंह) में महानिशीथ काल में महालक्ष्मी का पूजन करने से माता लक्ष्मी साधक के घर स्थाई निवास करती हैं।

इस वर्ष महालक्ष्मी पूजन MahaLaxmi Diwali Pooja Muhurat 2016 का शुभ तथा विशेष मुहूर्त सॉय 18:28 से आरम्भ होकर 20:22 तक रहेगा।

इस दिन सॉय 18:28 से 20:22 तक के समय में अमावस्या तिथि अंतर्गत वृष लग्न तथा शुभ, अमृत तथा चर का चौघडिया का शुभ योग बना है।

स्थिर लग्न के मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन करने से धन-धान्य स्थिर रहता है। इस मुहूर्त में दीपदान, गणपति सहित महालक्ष्मी पूजन, कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन तथा धर्मस्थलों में और अपने घर में दीप प्रज्जवलित करना चाहिये।

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दीपावली पूजन तथा इस रात्रि में की जाने वाली विशेष साधनाओं का विस्तार पूर्वक विवरण जानने के लिये देखें गुरूजी द्वारा प्रकाशित अॉनलाईन ज्योतिषीय मासिक पत्रिका aapkabhavishya यह पत्रिका www.shukracharya.com पर नि:शुल्क उपलब्ध है।

इस के अतिरिक्त AapKaBhavishya.in पर भी गुरूजी (डा. आर.बी.धवन) के ज्योतिषीय लेख भी आप पढ़ सकते हैं।

Santaan Prapti Upaya for Diwali – इस दीपावली करें संतान प्राप्ति उपाय

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Santaan Prapti Upaya संतान प्राप्ति उपाय (एक दिवसीय दीपावली साधना प्रयोग)

कुण्डली में संतानोत्पत्ति योग न हो अथवा अनेक बार गर्भ हानि होती रही हो या संतान दीघार्यु नहीं होती हो तो उसके लिए यह संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya महत्वपूर्ण है। इस साधना प्रयोग को दीपावली की रात्रि में संतान की इच्छा करने वाली महिला के संपन्न करने से संतान का योग प्रबल होकर एक वर्ष में संतानोत्पत्ति अवश्य होती है। और वह संतान आज्ञाकारी होती है। इस प्रकार के प्रयोग से गृहस्थ जीवन अनुकूल एवं सुखदायी बन जाता है।

संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya के लिए साधिका को चाहिए कि वह दीपावली की रात्रि में स्नानादि कर पीले वस्त्र धारण कर पूर्व की तरफ मुख कर के पीले आसन पर बैठ जाएं सामने लकड़ी की चौकी पर एक थाली में चावल से त्रिकोण बनाकर उसके मध्य में मोती पर बने अभिमंत्रित मुक्ता गणपति की स्थापना करें और फिर पंचोपचार (फूल, चावल, रोली, कलावा तथा धूप-दीप) से पूजा करके पुत्रजीवा की 108 दानों वाली माला से 51 माला अग्रलिखित मंत्र जप पूर्ण करें।

यही प्रयोग प्रत्येक माह शुक्ल पंचमी के दिन गर्भवती होने तक पुत्र की इच्छा रखने वाली महिला को दोहराना चाहिये। निश्चय ही उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। यही संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya उस महिला का पति या घर का कोई अन्य सदस्य भी कर सकता है, परंतु उसको उस महिला के नाम का संकल्प अवष्य लेना होगा। यदि कोई साधक-साधिका किसी दूसरे के लिए प्रयोग करना चाहे तो संकल्प ले लें कि ‘मैं यह प्रयोग अमुक व्यक्ति के लिए संपन्न कर रहा/रही हूँ।

मंत्र- ऊँ नमो नारायणाय पुत्र सन्तानं देही देहि ठः ठः स्वाहा।

जप पूर्ण होने पर गणपति जी को मिष्ठान का भोग लगवाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें। वह माला जल में विसर्जित कर दें। मुक्ता गणपति का चांदी में लॉकेट बनवाकर महिला को गले में धारण करना चाहिये।

साधना सामग्री– अभिमंत्रित मुक्ता गणपति (मोती पर बने गणपति), 108 दाने की पुत्रजीवा माला।

न्यौछावर राशि रू. 3100

संपर्क : Sukracharya, F-265, Street No. 22, Laxmi Nagar, Delhi-110092, Mob: 09810143516

Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

janmashtami 2016

Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

आज जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के शुभअवसर पर आपके लिए प्रस्तुत है यह लेख।  सनातन दर्शन का यह मूलभूत सिद्धांत है कि जिस सत्चित् आनंद के आश्रय से यह दृश्यमान जगत अथवा यह धरातल संचालित हो रहा है, उसी के सहारे नियमित रूप से प्राणियों की आवश्यकता और रक्षा की व्यवस्था भी हो रही है।

भक्तों की धारणा है कि जब-जब विश्व व्यवस्था में अतिक्रमण होता है, तब-तब निराकार ईश्वर का एक अंश मूर्त साकार रूप ग्रहण करके व्यवस्था की पुनः स्थापना करने के लिये अवतीर्ण होता है, विश्व-व्यवस्था कि सुस्थिति, विश्वमंगल के लिये आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। इसलिये पूर्णब्रह्म परमेश्वर अवतार धारण कर अव्यवस्था जन्य भूमिभार का हरण करते हैं।

शास्त्रों ने ऐसे चैबीस अवतारों में श्रीराम और श्रीकृष्ण के अवतारों को विशेष महत्व दिया है। श्रीराम सोइ सच्चिदानंदघन रामा हैं और श्री कृष्ण भागवताकार के शब्दों में कृष्णस्तु भगवान स्वयम् हैं।

दोनों ने तत्कालीन अव्यवस्था एवं धर्मग्लानि को दूर करने के लिये अलौकिक शक्ति, अद्भुद् सौंदर्य और मर्यादा क्षमाशील विधान का आदर्श रूप उपस्थित कर विश्व व्यवस्था को सुचारूता दी। दोनों ने रावण, कंस आदि नृशंस राजाओं की उच्छृंखलता को परास्त कर साधु संरक्षण और लोक मंगल की विधायिनी व्यवस्था को संस्थापित किया।

यही कारण है कि इनकी अवतरण तिथियों को मनाये जाने वाले हमारे व्रत, उत्सव आदि में इनका प्रभाव अक्षुण्ण है और हम इनके आदर्श को समझने एवं व्यवहार में लाने के लिये इनकी जन्म जयंतियाँ प्रतिवर्ष व्रत के रूप में मनाते हैं। तथा लौकिक व परलौकिक लाभ उठाते हैं।

उसी परंपरा में हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रª के ये दो महान पर्व हैं- श्रीराम नवमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016)। श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण का आर्विभाव इसी तिथि को बुधवार के दिन रोहिणी नक्षत्र में अर्द्धरात्रि के समय हुआ था।

शास्त्रों में अष्टमी व्रत के दो भेद किये गये हैं- शुद्धा और विद्धा। सूर्योदय से सूर्योदय तक व्याप्त अष्टमी शुद्धा और सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच सप्तमी अथवा नवमी से युक्त होने पर विद्धा कही जाती है। फिर इनके तीन भेद किये जाते हैं:- समा, न्यूना और अधिका। इन भेदों के कारण अष्टमी अट्ठारह प्रकार की ही हो जाती है।

परंतु मान्यता की दृष्टि से तत्काल (अर्धरात्रि-व्यापिनी) अष्टमी ही ग्राह्य मानी गई है। ऐसी अष्टमी (Janmashtami) दो दिनों तक अथवा दोनों ही दिन न हो तो नवमी विद्धा ही ग्रहण करनी चाहिये।

इस वर्ष जन्माष्टमी का यह पर्व 25 अगस्त 2016 के दिन मनाया जाना शास्त्र सम्मत है, इस दिन सूर्याेदय के समय कृतिका नक्षत्र उदय होगा तदुपरांत दोपहर 12:10 से रोहिणी नक्षत्र आरम्भ होगा।

इस व्रत का महत्व शिव, विष्णु, ब्रह्मा भविष्य आदि पुराणों में तथा धर्मसिंधु, निर्णय-सिंधु आदि निबंध-ग्रंथों में प्रचूरता से वर्णित है। यह सर्वमान्य, पापघ्न तथा बाल, वृद्ध, कुमार, युवा अवस्था वाले नरों व नारियों के लिए अनुष्ठेय है।

कुछ शास्त्रों के अनुसार जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत नहीं करने वाले सक्षम नर-नारियों को पाप लगता है, और करने वालों के पापों की निवृत्ति एवं सुख की अभिवृद्धि होती है। इस व्रत में अष्टमी में उपवास और भगवत्पूजन का तथा नवमी में पारणा करने का विधान है।

अष्टमी (Janmashtami 2016) के एक दिन पहले लघु भोजन करना चाहिये। रात्रि में जितेंद्रिय रहना चाहिये। उपवास के दिन प्रातः स्नानादि नित्यकर्म करके सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि आकाष, आकाषचारी देवता और ब्रह्मा आदि को नमस्कार करके पूर्व या उत्तर मुख बैठें, हाथ में जल, फूल, कुष और गंध लेकर संकल्प करें-
ममाखिलपापप्रषमनपूर्वकं सर्वाभीष्टसिद्धये श्री कृष्णजन्माष्टमीव्रतमहं करिष्ये।

मध्याह्न समय में काले तिल डालकर उस जल से स्नान करके देवकी जी के लिये -सूतिकागृह नियत करें। उसे स्वच्छ व सुषोभित करके उसमें सूतिकोपयोगी सामग्री यथाक्रम रखें। गीतवाद्य का आयोजन करना और अधिक अच्छा होगा।

सूतिका गृह के सुःखद शोभन विभाग में सुंदर सुकोमल बिछौने के सुदृढ़ मंत्र पर अक्षतादि का मंडल बनवाकर उसपर शुभ कलष स्थापित करें एवं उसी पर सोना, चांदी, तांबा, पीतल, मणि, वृक्ष, मिट्टी या चित्ररूप भगवान की मूर्ति स्थापित करें।

मूर्ति में सद्यःप्रसूत श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और श्री लक्ष्मी जी उनके चरणस्पर्ष किये हुए हों- यह भाव प्रकाष्य होना चाहिए। फिर यथा समय भगवान के आर्विभाव की भावना कर वैदिक विधि पुरूष सुक्त से षोडशोपचार पूजन करना चाहिये।

यदि ऐसा करना संभव न हो तो पौराणिक अथवा संप्रदायानुसार दषोपचार या पंचोपचार आदि से पूजन करके आरती उतारनी चाहिये। इस पूजन में देवकी, वसुदेव, नंद, यषोदा और लक्ष्मीजी- इन सबका नाममंत्र से पूजन करना चाहिए।

अंत में निम्नांकित मंत्र से अध्र्य दें-
प्रणमे देवजननीं त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात्तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमोनमः।।
सपुत्राघ्र्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।।

फिर श्रीकृष्ण को पुष्पांजलि दें –
‘धर्माय धर्मेष्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’

इसके बाद जातकर्म-संस्कार, नालच्छेदन, षष्ठी पूजन और नामकरणादि करके चंद्रमा का भी पूजन करें-
‘सोमाय सोमेष्वराय सोमपतये सोमसम्भवाय सोमाय नमो नमः।’

फिर शंख में जल, कुष, कुसुम और गंध डालकर दोनों घुटने भूमि में टेककर प्रार्थना करते हुए अघ्र्य देवें-
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्र समुद्भव। गृहाणाध्र्यं शषांकेमं रोहिण्या सहितो मम।।
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषाम्पते। नमस्ते रोहिणीकान्त अघ्र्यं मे प्रतिगृह्यताम।।

रात्रि के शेष भाग को स्तोत्र-पाठादि अथवा संकीर्तन करते हुए व्यतीत करें। उसके बाद अगले दिन पूर्वार्द्ध में स्नानादिक नित्य क्रिया संपन्न कर जिस नक्षत्र तिथि या योग की प्रमुखता मानकर व्रत किया हो उसके अंत में भगवदर्पण पूर्वक अन्नादिक ग्रहण कर पारणा करें।

अष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत करने से प्रणत क्लेषहारी वृन्दावनबिहारी भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और अपनी भक्त्ति देते हैं। अष्टमी व्र्रत का महत्त्व अत्यधिक है, अतः यह व्रत प्रत्येक को श्रद्धा व निष्ठा पूर्वक करना चाहिये।

आगे की पक्तियों में साधकों के लिये कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर एक इच्छा पूर्ति प्रयोग दिया जा रहा है, आप चाहें तो यह प्रयोग आप भी संपन्न कर सकते हैं, यह विशेष श्रेणी का काम्य प्रयोग है- इतनी बात निश्चित है कि श्री कृष्ण साधना हेतु किया गया कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता।

साधक अपना निर्णय स्वयं लेते हुए श्री कृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के इस महान सिद्ध पर्व पर कोई न कोई साधना कर्म अवश्य संपन्न करें।

इच्छा पूर्ति गोविंद प्रयोग

इस साधना प्रयोग हेतु साधक 25 अगस्त 2016 रात्रि का प्रथम प्रहर बीत जाने के बाद साधना क्रम प्रारंभ करें। अर्द्ध रात्रि के साथ पूर्ण कर मंत्र जप संपन्न करे, इस साधना हेतु- श्री कृष्ण यंत्र तथा एक वैजयन्ती माला का होना आवश्यक हैं। अपने सामने सर्वप्रथम एक बाजोट पीले पुष्प बिछा दें और उन पुष्पों के बीचों बीच श्री कृष्ण यंत्र स्थापित करें, तथा इस यंत्र का पूजन केवल चंदन तथा केसर से ही संपन्न करें।
अपने सामने कृष्ण का एक सुंदर चित्र फ्रेम में मढ़वा कर स्थापित करें। चित्र को भी तिलक करें तथा प्रसाद स्वरूप पंचामृत साथ रख लें, जिसमें घी, दूध, दही, शक्कर तथा गंगाजल मिश्रित हो। इसके अतिरिक्त अन्य नैवेद्य भी अर्पित कर सकते हैं। इच्छा पूर्ति यंत्र के दोनों और दो-दो गोमती चक्र स्थापित करें, तथा उन्हें केसर का तिलक लगायें और दोनों हाथ जोड़ कर भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें, श्री कृष्ण का ध्यान कर उनकी आठ शक्तियाँ लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कांति, कीर्ति, तुष्टि एवं पुष्टि की मानसिक पूजा करें। प्रत्येक शक्ति के लिए निम्न मंत्र का उच्चारण करें-

ऊँ लक्ष्म्यै नमः।
ऊँ सरस्वत्ये नमः।
ऊँ रत्ये नमः।
ऊँ प्रीत्यै नमः।
ऊँ कान्त्ये नमः।
ऊँ कीत्र्ये नमः।
ऊँ तुष्टयै नमः।
ऊँ पुष्टये नमः।

शक्ति पूजन के पश्चात् इच्छापूर्ति मंत्र का जप प्रारंभ किया जाता है, इसकी भी विशेष विधि है, इसमें अपने दोनों हाथों में अक्षत् पुष्प और थोड़ा गंगाजल लें, और इच्छा पूर्ति मंत्र का उच्चारण करते हुए उसे अर्पित कर दें।
इच्छा पूर्ति मन्त्र- ऊँ श्रीं हृीं क्लीं कृष्णायै गोविन्दायै नमः।

इस प्रकार 108 बार इस मंत्र का उच्चारण इसी विधि से संपन्न करें यह प्रयोग पूर्ण हो जाने के बाद पहले से जलाकर रखे हुए दीपक, अगरबत्ती तथा धूप से आरती संपन्न कर प्रसाद ग्रहण करें। यदि कोई साधक 40 दिन तक प्रतिदिन एक माला मंत्र जप संपन्न करे तो उसका इच्छित कार्य अवश्य ही संपन्न हो जाता है।