उपनिषद् में शक्ति का रहस्य

उपनिषद् में शक्ति का रहस्य विश्व में जो कुछ है, वह व्यापक ब्रह्म है। ‘तैत्तिरीयोपनिषद्’’ ने ब्रह्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि जिसमें सारा विश्व पैदा होता है, पैदा होकर जीता है और जीकर जिसमें लय हो जाता है, उसी का नाम ब्रह्म है। इस बात को समझाते हुए गुरूदेव ने पहले शिष्य को यह बताया कि ‘अन्न ब्रह्मेति व्यजानत’ अर्थात् अन्न ब्रह्म है। देह अन्न से पैदा हुआ, अन्न से जीता है और अन्न में लय होता है। अतएव अन्न को ब्रह्म मानो। शिष्य को इस व्याख्या से संतोष न हुआ, तब गुरूजी ने ‘प्राणं ब्रह्मोति व्यजानत’ कहा अर्थात प्राण ब्रह्म है। देह प्राण से पैदा हुआ, प्राण से जीता और प्राण में लय होता है। शिष्य को इस व्याख्या से भी सन्तोष न हुआ। फिर गुरूजी ने ‘मन ब्रह्मेति व्यजानत’ बताया अर्थात मन ब्रह्म है। शिष्य को इस व्याख्या से भी सन्तोष न हुआ। तब गुरूजी ने ‘विज्ञान’ को और पीछे ‘आन्नद’ को ब्रह्म बताया, लेकिन जब इतने सारे ब्रह्म बताए गये, तब हम किसको सचमुच ब्रह्म मानें? ब्रह्म की उक्त व्याख्याओं से हमें सन्तोष नहीं होता।

‘माण्डूक्योपनिषद्’ ने आत्मा की चार अवस्थायें बताई हैं-

  1. जाग्रत
  2. स्वप्न
  3. सुशुप्ति
  4. तुरीय।

जाग्रत् और स्वप्न का अनुभव सबको होता है। सुषुप्ति अर्थात् गाढ़ निद्रा। तुरीय का अनुभव सबको नहीं होता। अतः उसे आत्मा की चैथी अवस्था कह कर उसका सारा वर्णन नकार में ही किया है। जब आत्मा की यह हालत है, तब ब्रह्म क्या वस्तु है, कैसे समझ में आये? आदि शंकराचार्य अपने शिष्य के साथ जंगल में जा रहे थे। रास्ते में एक पागल हाथी आता दिखाई पड़ा। सबलोग इधर-उधर हो गये। हाथी के निकल जाने के बाद एक शिष्य ने गुरू से पूछा कि आप तो ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ बताते हैं। अतएव हम और हाथी सब ब्रह्म ही हैं। फिर हम सब हाथी को देखकर भाग क्यों गये? शंकराचार्यजी ने कहा कि ‘‘हाथी का आना, हमारा देखना और छिपना सभी ब्रह्म था।’’

इतना सोचने-विचारने के बाद जो कुछ है, यह मानने में नहीं आता। यदि कोई कहे कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’, तो मानना पड़ेगा कि ‘मैं’ और ‘ब्रह्म’ अलग-अलग वस्तु हैं, क्यो कि वस्तु और वस्तु का मालिक दोनों एक नहीं होते। सभी तरह से ब्रह्म का विचार करने पर यही ज्ञात होता है कि जो कुछ है, वह अकेला ब्रह्म नहीं है, अपितु साथ में कुछ और भी है। वह क्या है, यह जानना चाहिये।

जिस द्रव में से नवीन पदार्थ प्राप्त हो या पैदा हुआ पदार्थ फिर द्रव बनकर अणु-अणु में मिल जाये, उस द्रव का नाम ‘तत्त्व’ है। उदाहरण के लिये पृथ्वी में एक ही बीज को जल, वायु और अग्नि मिलने से वह अवकाश में प्रस्फुटित होकर पेड़ बनता है और पेड़ में से रूई और कपड़ा भी बनता है। वह कपड़ा यदि जल गया, तो कहा जायेगा कि बीज ने जो रूपक धारण किया था, वह अग्नि में जलकर तत्त्व, तत्त्व में मिल गया। तत्त्व अर्थात् भू, जल अग्नि, वायु और आकाश। प्रत्येक तत्व में दूसरे चार तत्वो की कुछ-न-कुछ मिलावट विद्यमान है। तत्त्व अणु में से पैदा होते हैं। अणु में भयंकर शक्ति है।

अणु-बम कितनी हानि कर सकता है, उससे लोग अपरिचित नहीं हैं। अणु में छिपी हुई भयंकर शक्ति क्या है, उसे जानना चाहिए।

विश्व अनन्त है और अनंत होने से प्रत्येक बिन्दु मध्य बिन्दु है। जो चीज शान्त है, उसका मध्य बिन्दु एक ही होगा। यदि अनन्त का बिन्दु एक ही माना जाये, तो अनंत शान्त हो जायगा। अतएव अनंत का प्रत्येक बिन्दु चिद्-बिन्दु है। उसमें जीवन्त चिद्-शक्ति है। उस प्रत्येक बिन्दु या अणु में भयंकर शक्ति है। तो फिर उस शक्ति को ही विश्व की आदि-शक्ति क्यों न माना जाये ?

कठोपनिषद्’’ में यम ने नचिकेता को बताया कि सूर्य विश्व की आँखें हैं, लेकिन आँख में रोग होने से सूर्य में रोग नहीं होता। इसी तरह प्राणी मात्र की अन्तरात्मा एक होते हुए भी व्यक्तिगत दुःख से आत्मा कुछ नहीं बिगड़ता अर्थात आत्मा को कुछ भी कष्ट नहीं होता। यम ने ब्रह्म का भाव न बताकर सूर्य में विद्यमान शक्ति का भाव बताया। सूर्य की गुरूत्वाकर्षण-शक्ति से नवग्रह नियमानुसार सूर्य के चारों ओर बराबर घुम रहें हैं। तब सोच सकते हैं कि सूर्य में कितनी शक्ति है। सूर्य में जो शक्ति हैं, वह अणु में भी है क्योंकि सूर्य अणु से बनता है।

ईशावास्योपनिषद्’ कहता है कि जो आदमी केवल विद्या की उपासना करता है, वह अंधकार में प्रवेश करता है और जो केवल अविद्या की उपासना करता है, वह भी अंधकार में पड़ता है। जैसे केवल विद्या या अविद्या को मानने से अपना काम नहीं चलता, वैसे ही न अकेले ब्रह्म को मानने से हमारा काम चलेगा, न अकेली शक्तिो मानने से।

यह सब सोचने पर मानना पड़ेगा कि विश्व में दो चीजें होनी चाहिये-एक व्यापक ब्रह्म और दुसरी शक्ति। व्यापक ब्रह्म शिव है और बाकी जो कुछ है, वह शक्ति है। उस शक्ति को कुछ भी नाम दीजिये। चाहे चिद्शक्ति कहो या आदिशक्ति कहो या विश्व की परमेश्वरी ही क्यों न कह डालो।

यह मैं नहीं कहता पुराणों में लिखा है

पार्वती शिव से बोलीं- प्रभो! यदि आप प्रसन्न हैं तो योगी योगाकाशजनित वायु को जिस प्रकार प्राप्त होता है, वह सब मुझे बताइये।

भगवान शिव ने कहा- सुन्दरी! इससे पूर्व मैने योगियों के हित की कामना से कालपर विजय प्राप्त करने की विधि का वर्णन किया है। योगी किस प्रकार वायु का स्वरूप धारण करता है, यह भी बताया है। अब और भी बताता हूँ- इससे पूर्व बताई गई विधि से योगशक्ति के द्वारा मृत्यु-दिवस को योगी जानकर और प्राणायाम में तत्पर हो जाय। ऐसा करने पर वह आधे मास में ही आनेवाले काल को जीत लेता है। हृदय में स्थित हुई प्राणवायु सदा अग्नि को उद्दीप्त करनेवाली है। उसे अग्नि का सहायक बताया गया है। वह वायु बाहर और भीतर सर्वत्र व्याप्त और महान है। ज्ञान, विज्ञान और उत्साह- सबकी प्रवृति वायु से ही होती है। जिसने वायु को जीत लिया, उसने इस सम्पूर्ण जगत पर विजय पा ली।

साधक को चाहिये कि वह जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु को जीतने की इच्छा से सदा धारणा में स्थित रहे; क्योकि योगपरायण योगी को भलीभाँति धारणा और ध्यान में तत्पर रहना चाहिये। जैसे लोहार मुख से धौकनी को फूक-फूंककर उस वायु के द्वारा अपने सब कार्य सम्पन्न करता है, उसी प्रकार योगी को प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये। प्राणायाम के समय जिसका ध्यान किया जाता है, वे आराध्यदेव परमेश्वर सहस्त्रों मस्तक, नेत्र, पैर और हाथों से युक्त हैं। तथा समस्त ग्रन्थियों को आवृत करके उनसे भी दस अंगुल आगे स्थित हैं। आदि में व्याहृति और अंत में शिरोमंत्र सहित गायत्री का तीन बार जप करें और प्राणवायु को रोके रहें। प्राणों के इस आयाम का नाम प्राणायाम है। चन्दमा और सूर्य आदि ग्रह जा-जाकर लौट आते हैं। परंतु प्राणायाम पूर्वक ध्यानपरायण योगी जाने पर आज तक नहीं लौटे हैं। (अर्थात्- मुक्त हो गये हैं)। देवी! जो द्विज सौ वर्षों तक तपस्या करके कुशों के अग्रभाग से एक बूंद जल पीता है, वह जिस फल को पाता है, वही ब्राह्मणों को एकमात्र धारण अथवा प्रणायाम द्वारा मिल जाता है। जो द्विज प्रातः उठकर एक प्राणायाम करता है, वह अपने सम्पूर्ण पाप को शीध्र ही नष्ट कर देता है और ब्रह्मलोक को जाता है। जो आलस्यरहित होकर सदा एकांत में प्राणायाम करता है, वह जरा और मृत्यु को जीतकर वायु के समान गतिशील हो आकाश में विचरता है। वह सिद्धों के स्वरूप, कांति, मेधा, पराक्रम और शौर्य को प्राप्त कर लेता है। उसकी गति वायु के समान हो जाती है। तथा उसे स्पृहणीय सौख्य एवं परम सुख की प्राप्ति होती है।

देवेश्वरी! योगी जिस प्रकार वायु से सिद्धि प्राप्त करता है, वह सब विधान मैने बता दिया है। अब तेज से जिस तरह वह सिद्धि लाभ करता है, उसे भी बता रहा हूँ। जहां दूसरे लोगों की बातचीत का कोलाहल न पहुँचता हो, ऐसे शांत एकांत स्थान में अपने सुखद आसन पर बैठकर चन्द्रमा और सूर्य (वाम और दक्षिण नेत्र) की कांति से प्रकाशित मध्यवर्ती देश भ्रूमध्यभाग में जो अग्नि का तेज अव्यक्त रूप से प्रकाशित होता है, उसे आलस्यरहित योगी दीपकर रहित अंधकारपूर्ण स्थान में चिन्तन करने पर निश्चय ही देख सकता है- इसमें संशय नही है। योगी हाथ की अंगुलियों से यत्नपूर्वक दोनो नेत्रों को कुछ-कुछ दबाये रक्खे और उनके तारों को देखता हुआ एकाग्र चित्त से आधे मुहूर्त तक उन्हीं का चिंतन करे। तदन्तर अंधकार में भी ध्यान करने पर वह उस ईश्वरीय ज्योति को देख सकता है। वह ज्योति सॅद, लाल, पीली, काली तथा इन्द्रधनुष के समान रंगवाली होती है। भौंहों के बीच में ललाटवर्ती बालसूर्य के समान तेजवाले उन अग्निदेव का साक्षात्कार करके योगी इच्छानुसार रूप धारण करने वाला हो जाता है। तथा मनोवांछित शरीर धारण करके क्रीड़ा करता है। वह योगी कारण तत्व को शांत करके उसमें आविष्ट होना, दूसरे के शरीर में प्रवेश करना, अणिमा आदि गुणों को पा लेना, मन से ही सब कुछ देखना, दूर की बातों को सुनना और जानना, अदृष्य हो जाना, बहुत से रूप धारण कर लेना तथा आकाश मार्ग में विचरना इत्यादि सिद्धियों को निरंतर अभ्यास प्रभाव से प्राप्त कर लेता है। जो अंधकार से परे और सूर्य के समान तेजस्वी है, उसी इस महान् ज्योतिर्मय पुरूष (परमात्मा) को मैं जानता हूँ। उन्हीं को जानकर मनुश्यकाल या मृत्यु को लाँघ जाता है। मोक्ष के लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

देवी! इस प्रकार मैने तुमसे तेजस्तत्व के चिन्न की उत्तम विधि का वर्णन किया है, जिससे योगी काल पर विजय पाकर अमरत्व को प्राप्त कर लेता है।

देवी! अब पुनः दूसरा श्रेष्ठ उपाय बताता हूँ, जिससे मनुश्य की मृत्यु नहीं होती।

देवी! ध्यान करने वाले योगियों की चैथी गति साधना बताई जाती है। योगी अपने चित्त को वश में करके यथायोग्य स्थान में सुखद आसन पर बैठे। वह शरीर को ऊँचा करके अंजली बांधकर चोंचकी-सी आकृति वाले मुख के द्वारा धीरे-धीरे वायु का पान करें। ऐसा करने पर क्षणभर में तातु के भीतर स्थित जीवनदायी जल की बूँदें टपकने लगती हैं। उन बूँदों को वायु के द्वारा लेकर सूँघे। वह शीतल जल अमृत स्वरूप है। जो योगी उसे प्रतिदिन पीता है, वह कभी मृत्यु के आधीन नहीं होता। उसे भूख-प्यास नहीं लगती। उसका शरीर दिव्य और तेज महान् हो जाता है। वह बल में हाथी के समान तथ वेग में घोडे के समान हो जाता है। उसकी दृष्टि गरूड़ के समान तेज हो जाती है और उसे दूर की बातें भी सुनाई देने लगती हैं। उसके केश काले और घुंघराले हो जाते है तथा अंग की कांति गंधर्व एवं विद्याधरों की समानता करती है। वह मनुश्य सौ वर्ष तक जीवित रहता है तथा अपनी उत्तम बुद्धि के द्वारा बृहस्पति के तुल्य हो जाता है। उसमें इच्छानुसार विचरने की शक्ति आ जाती है और वह सदा सुखी रहकर आकाश मार्ग में विचरण करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।

देवी! अब मृत्यु पर विजय पाने की पुनः तीसरी विधि बता रहा हूँ, जिसे देवताओं ने भी प्रयत्नपूर्वक छिपा रक्खा है, तुम उसे सुनो- योगी पुरूष अपनी जिव्हा को मोड़कर तालु में लगाने का प्रयत्न करें। कुछ काल तक ऐसा करने से वह क्रमशः लम्बी होकर गले की घाँटी तक पहुंच जाती है। तदन्तर जब जिव्हा से गले की घाँटी सटती है, तब शीतल सुधा का स्त्राव करती है। उस सुधा को जो योगी सदा पीता है, वह अमरत्व को प्राप्त होता है।

(शिव पुराण- अध्याय 27)

पार्वती भगवान शिव से बोलीं- भगवन! मैने आपकी कृपा से सम्पूर्ण मत जान लिया है। देव! जिन मंत्रों द्वारा जिस विधि से जिस प्रकार आपकी पूजा होती है, वह भी मुझे ज्ञान हो गया है। किंतु प्रभों! अब भी कालचक्र के सम्बन्ध में एक संशय है कृपया मेरा यह संशय दूर करें। देव! मृत्यु का क्या चिन्ह है? आयु का क्या प्रमाण है? नाथ यदि मैं आपकी प्रिया हूँ तो मुझे ये सब बातें बतायें।

महादेव जी ने कहा- प्रिये! यदि अक्समात् शरीर सब ओर से पीला पड़ जाये और ऊपर से कुछ लाल दिखे, तो यह जानना चाहिये कि उस मनुश्य की मृत्यु छः महीने के भीतर हो जायेगी। शिवे! जब मुहँ, कान, नेत्र और जिव्हा का स्तम्भव हो जाये, तब भी छः महीने के भीतर ही मृत्यु जाननी चाहिये। भद्रे! जो रूरू मृग के पीछे होनेवाली शिकारियों की भयानक आवाज को भी जल्दी नहीं सुनता, उसकी मृत्यु भी छः महीने के भीतर ही जाननी चाहिये। जब सूर्य, चन्द्रमा या अग्नि के सानिध्य से प्रकट होनेवाले प्रकाश को मनुश्य नहीं देखता, उसे सब कुछ काला-काला अंधकारमय ही दिखाई देता है, तब उसका जीवन छः मास से अधिक नहीं होता। देवी! प्रिय! जब मनुश्य का बायां हाथ लगातार एक सप्ताह तक फड़कता ही रहे, तब उसका जीवन एक मास ही शेष है- ऐसा जानना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। जब सारे अंगों में अंगड़ाई आने लगे और तालू सूख जाये, तब वह मनुश्य एक मास तक ही जीवित रहता है-इसमें संशय नहीं है। त्रिदोष में जिसकी नाक बहने लगे, उसका जीवन 15 दिन से अधिक नहीं चलता। मुख और कण्ठ सूखने लगे तो यह जानना चाहिये कि छः महीने बीतते-बीतते इसकी आयु समाप्त हो जायेगी। भागिनी! जिसकी जीभ फूल जाये और दांतों से मवाद निकलने लगे, उसकी भी छः महीने के भीतर मृत्यु हो जाती है। इन चिन्हों से मृत्युकाल को समझना चाहिये।

सुन्दरी! जल, तेल, घी तथा दर्पण में जब भी अपनी परछाईं न दिखाई दे या विकृत दिखाई दे, तब कालचक्र के ज्ञाता पुरूष को यह जान लेना चाहिये कि उसकी भी आयु छः मास से अधिक नहीं है। देवेश्वरी! अब दूसरी बात सुनों, जिससे मृत्यु का ज्ञान होता है। जब अपनी छाया को सिर से रहित देखें अथवा अपने को छाया से रहित पायें, तब वह मनुश्य एक मास भी जीवित नहीं रहता।

पार्वती! ये मैने अंगों में प्रकट होने वाले मृत्यु के लक्षण बताये हैं। भदे्र! अब बाहर प्रकट हाने वाले लक्षणों का वर्णन करता हूँ, सुनों। देवी! जब चन्द्रमण्डल या सूर्यमण्डल प्रभाहीन एवं लाल दिखायी दे, तब आधे मास में भी मनुश्य की मृत्यु हो जाती है। अरूंधती, महायाना, चन्द्रमा- इन्हें जो न देख सके अथवा जिसे ताराओं का दर्शन न हो, ऐसा पुरूष एक मास तक जीवित रहता है। यदि ग्रहों का दर्शन होने पर भी दिशाओं का ज्ञान न हो- मन पर मूढता छाई रहे तो छः महीने में निश्चय ही मृत्यु हो जाती है। यदि उतथ्य नामक तारा का, धु्रव का अथवा सूर्यमण्डल का भी दर्शन न हो सके, रात में इन्द्रधनुष और मध्याहन में उल्कापात होता दिखाई दे तथा गीद्य और कौये घेरे रहें तो उस मनुश्य की आयु छः महीने से अधिक नहीं होती।

यदि आकाश में सप्तऋषि तथा स्वर्गमार्ग (छाया पथ) न दिखाई दे तो कालज्ञ पुरूषों को उस पुरूष की आयु छः मास ही शेष समझनी चाहिये। जो अक्समात् सूर्य और चन्द्रमा को राहु से ग्रस्त देखता है और सम्पूर्ण दिशायें जिसे घूमती दिखाई देती हैं, वह अवश्य ही छः महीने में मृत्यु को प्राप्त होता है। यदि अक्समात् नीली मक्खीयाँ आकर पुरूष को घेर लें तो वास्तव में उसकी आयु एक मास ही शेष जाननी चाहिये। यदि गीध, कौआ अथवा कबूतर सिर पर चढ़ जाये तो वह पुरूष शीघ्र ही एक मास के भीतर मर जाता है, इसमें संशय नहीं है।

 

 

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण भारतीय ऋषियों ने 16 संस्कारों के रूप में जो अनुशासित व्यवस्था व्यक्तित्व निर्माण के लिये रूपान्तरित की है, उसमें विवाह संस्कार का स्थान महत्वपूर्ण है। विवाह पीढ़ी-विस्तार का समाज सम्मत हेतु है। विवाह विभिन्न सभ्यताओं, सुसंस्कृतियों, संस्कारों, विचार धाराओं और भाव धाराओं के सम्पर्क का भी हेतु है।

विवाह नामक रसपूर्ण संस्कार के प्रति व्यक्ति कि उत्कंठा, जिज्ञासा और लालसा सहज ही है। किन्तु नियति सबके प्रति समान रूप से उदार नहीं होती। आज उचित समय पर विवाह सम्पन्न होना एक दुःसाध्य प्रक्रिया हो गई है- विशेषतः कन्या पक्ष के संदर्भ में। ग्रहों का अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन पर निर्विवाद रूप से पड़ता है। इस संदर्भ में आस्था अनास्था से कोई अन्तर नही पड़ता। जैसे किसी बंद कमरे में बैठकर सूर्य के आलोक अथवा तेज का प्रतिवाद नही किया जा सकता उसी प्रकार ज्योतिष भाग्य और ईश्वर में अश्रद्धा उसके मौलिक प्रभाव को क्षति नही पहुँचाती। इस सत्य को निरन्तर ध्यान में रखना चाहिए। व्यक्ति के जीवन में जन्म के समय ग्रहों की स्थिति एक प्रमुख भूमिका रखती है।

समस्त जीवन इनकी शुभता-अशुभता, सुसंयोगिता- कुसंयोगिता और प्रभुता-क्षीणता के द्वारा निर्धारित होता है। व्यक्ति आजीवन अपनी नियति से संघर्ष करता है और पराभूत होने का दर्शन सीखता है। कन्या के विवाह में अनपेक्षित विलम्ब देखकर अभिभावक चिन्ता के महासमुद्र में निमग्न हो जाते हैं।

अपनी समस्त शक्ति और सामाजिक परिचय का उपयोग करके भी वे अपनी कन्या के लिए उपयुक्त वर नहीं प्राप्त कर पाते। जीवन ऐसे अभावों का क्रूर साक्षात्कार है।

जीवन के अभावों की पूर्ति के लिए मानव ने तंत्र-मंत्र-यंत्र का भी समय समय पर प्रयोग-उपयोग किया है। सर्वप्रथम मंत्र के अर्थ विस्तार की संक्षिप्त विवेचना अनिवार्य है। वैदिक ऋचाओं से दैवी शक्तियों की स्तुतियों, यज्ञादि के लिए विचरित पदों एवं शब्द प्रतीकों तक मंत्र की एक सुसंस्कृत परम्परा प्रवाहमान है। मंत्र शब्द की सामथ्र्य का चरणतम केन्द्रियभूत आह्नान है। ‘मंत्र’ शब्द मंत्रि गुप्तभाषणे’’ धातु से घ् प्रत्यय द्वारा निष्पन्न होता है जिसका तात्पर्य है रहस्य। वह रहस्य जो देवोपम है किन्तु मानवीय अनुभूति का विषय है। तंत्र साहित्य के मतानुसार वह प्रत्येक शब्द मंत्र है जो देवता की स्तुति में निवेदित है। श्रुति, स्मृति, पुराण, उपनिषद, आगम और निगम सभी मंत्रों के उल्लेख से परिपूर्ण हैं। यह सत्य है कि वैदिक मंत्र जितने शक्तिसम्पन्न हैं, उनकी साधना उतनी हीं दुरूह और दुष्कर है। इसलिए वेदोक्त मंत्रों के स्थान पर तंत्र शास्त्र आज किंचित् सहज समझा जाता है। इस तथ्य के विस्तार में जाना इसलिए अप्रासंगिक होगा क्योंकि इस लेख की केन्द्रिय वस्तु है कि विवाह योग्य युवक या कन्या के विवाह में विलम्ब होने पर किन मंत्रो के प्रयोग से आशानुकूल सफलता प्राप्त होगी। अनुभव से सिद्ध हो चुका है कि युवक या कन्या के विवाह मे आने वाली अनेकानेक बाधाओं की शांति मंत्रशक्ति से सुनिश्चित हो सकती है।

जन्मांग में शनि की स्थिति, शनि द्वारा प्रचालित स्थिति, राशियाँ, नक्षत्र और भाव आदि का अध्ययन करना चाहिए। यदि शनि शुक्र से युक्त होकर, सूर्य अथवा चन्द्र किसी एक ग्रह पर दृष्टि निक्षेप करता हो तो विवाह मे विलम्ब होता है। यदि सूर्य अथवा चन्द्र या दोनों संयुक्त रूप से शनि के नवांश में स्थित हों और शुक्र भी शनि से अक्षिप्त हो तो विवाह में आशा के विपरीत विध्न उपस्थित होतें हैं। सप्तम भाव अथवा लग्न के पाप ग्रहक्रांत होने पर पापकर्तरि योग की स्थापना होती है जिसके परिणाम स्वरूप दाम्पत्य अनेकानेक संकटो से घिर जाता है। लग्न सप्तम भाव अथवा इसके अधिपति ग्रह यदि सूर्य और शनि, शनि और मंगल, शनि और राहु, आकर सूर्य जैसे क्रूर ग्रहों से आबद्ध होते हैं तो विवाह की दिशा में विलम्ब अथवा निषेध जैसे संकेत प्राप्त होते हैं। विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब तब भी होता है जब लग्नाधिपति, सप्तमाधिपति, चन्द्रराशि-अधिपति और स्वयं चन्द्र शनि से दृष्ट, युक्त अथवा द्वादश भावस्थ होते हैं। वक्री ग्रह की सप्तम भाव अथवा सप्तम भावेश पर दृष्टि अथवा स्थिति या युति विवाह में बाधा उत्पन्न करती हैं। इन्हीं स्थितियों में द्वितीय भाव या शुक्र हो तो विवाह विलम्बित होता है। पंचमेश और सप्तमेश का परस्पर परिवर्तन योग स्थापित हो अथवा राहु और शुक्र सप्तम अथवा नवम भाव में हों तथा क्रूर ग्रह की दृष्टि का कुसंयोग हो तो विवाह में ज्योतिषीय दृष्टि से विलम्ब की घोषणा की जा सकती है।

 

Dukh Nashak Shani Dev सर्व दुःख नाशक शनि देव

Shani Dev

Sarv Dukh Nashak Shani Dev सर्व दुःख नाशक शनि देव

Shani Dev
Sarv Dukh Nashak Shani Dev

समस्त ग्रहों में शनिदेव(shani dev)  ही ऐसे ग्रह हैं, जो अत्यन्त क्रोधी होते हये भी अत्यन्त दयालु कहे गये हैं। इनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं, तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।

पौराणिक कथाओं में शनि(shani dev) को सूर्य-पुत्र, यम का भाई, अपने भक्तों को अभय देने वाला, समस्त विघ्नों को नष्ट करने वाला एवं सम्पूर्ण सिद्धियों का दाता कहा गया है। जबकि ज्योतिष की दृष्टि में शनि एक क्रूर ग्रह है। कहा गया है, कि यह क्रूर ग्रह एक ही पल में राजा को रंक बना देता है।

जब बात आती है शनि दशा या साढेसाती की, तो हमारा भयभीत एवं चिन्तित होना स्वाभाविक होता है। समस्त ग्रहों में शनिदेव ही ऐसे ग्रह हैं, जो अत्यन्त क्रोधी होते हुये भी अत्यन्त दयालु हैं। इनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं, तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।

जब सृष्टि की रचना आरम्भ हुई, तो सृष्टि रचना का कार्यभार ब्रह्मा ने संभाला, विष्णु ने जीवों के पालन एंव उनकी रक्षा का उत्तरदायित्व लिया और भगवान शंकर को आवश्यकता पड़ने पर सृष्टि का संहार एवं दुष्ट जनों के विनाश का कार्य सौंपा गया। अपने भक्तों की रक्षा एवं पतितों को उनके पापों का दण्ड देने के लिये शिवजी ने अपने गणों की उत्पत्ति की।

सूर्य पुत्र यम एवं शनि (shani dev) को भी उनके गणों में सम्मिलित किया गया। शनि अत्यन्त पराक्रमी होने के साथ उद्दण्ड भी थे; तोड़-फोड़, मार-काट एवं विनाशकारी कार्यो में इनकी आरम्भ से ही रूचि थी। यह देखकर शिवजी ने यम को तो मृत्यु का देवता बनाया और शनि को दुष्ट जनों को उनके पापों का दण्ड देने का कार्य सौंपा।

शनि (shani dev) भगवान शंकर के शिष्य, सूर्य के पुत्र तथा यम के भाई हैं। शनि सर्वदा प्रभु भक्तों को अभय दान देते हैं, और उसकी हर प्रकार से रक्षा करते हैं। शनि समस्त सिद्धियों के दाता हैं। साधना, उपासना द्वारा सहज ही प्रसन्न होते हैं, और अपने भक्तों की समस्त कामनाओं को पूरा करते हैं। शनि सभी ग्रहों में महाशक्तिशाली और घातक हैं। कहते हैं कि सांप का काटा और शनि का मारा पानी नहीं मांगता।

जब शनि (shani dev) का प्रभाव पड़ा, तो श्री कृष्ण को द्वारिका में शरण लेनी पड़ी। और भगवान राम को, जिनका राज तिलक होने वाला था, सब कुछ छोड़कर नंगे पांव वन में जाना पडा। शनि के प्रभाव से जब अवतारी पुरूष भी नहीं बच सके, तो भला सामान्य लोगों का शनि के प्रकोप से बच पाना सम्भव कहां है?

ये सभी कथायें एक सीमा तक सत्य हैं, परन्तु इनके आधार पर भ्रमित होना विद्वता नहीं हैं। वस्तुतः शनि ग्रह की व्याख्या ही अधूरी है। शनि का तात्पर्य है ‘जीवन की गति’।

राशिगत शनि का प्रभाव किस प्रकार से पड़ता है? और किस राशि पर यह विचरण करता है, इस का क्या प्रभाव होता है? यह किसी विद्वान ज्योतिषी से ही जाना जा सकता है। शनि (shani dev) पीड़ादायक हो सकता है, लेकिन यदि शनि को अनुकूल बना लिया जाये, तो यह सर्वोच्चता भी प्रदान कर सकता है।

शनि देव सम्बंधित अन्य लेख : Shani Amavasya Upaya

ब्रह्मवैवर्त पुराण में यह वर्णन मिलता है, कि जब माता-पार्वती के गर्भ से भगवान गणपति ने जन्म लिया, तो नवजात शिशु को आशीर्वाद प्रदान करने के लिये समस्त देवी-देवता ग्रह नक्षत्र, यक्ष-गन्धर्व आदि उपस्थित हुये तथा एक-एक कर सभी ने गणपति को अपने सामर्थ्य अनुसार तेजस्विता प्रदान की।

इस क्रम में माता पार्वती का ध्यान शनि देव (shani dev) पर गया, जो कि एक किनारे चुप-चाप सिर झुकाऐ खडे़ थे। थोड़ी देर तक माता पार्वती इस बात को देखती रहीं, किन्तु समझ में नहीं आया, कि शनिदेव आगे बढ़कर शिशु का मुख देखकर उसे आशीर्वाद क्यों नहीं दे रहें हैं, अतः उन्होंने इसका कारण शनिदेव से ही पूछा-‘क्या आपको खुशी नहीं हो रही है?’

प्रसन्नता नहीं हो रही है? आप क्यों नहीं आगे बढ़कर मेरे पुत्र को आशीर्वाद दे रहे हैं? मेरे पुत्र की तरफ आप क्यों नहीं दृष्टिपात कर रहे हैं? यह सुनकर शनिदेव ने सिर झुकाये हुये अत्यन्त विनम्रता से कहा- ‘मां ! ऐसा करने के लिये आप मुझे न कहें, क्योंकि मैं नहीं चाहता हूं, कि इस कोमल शिशु का अनिष्ट हो।’ यह सुनकर पार्वती को उनकी बात पर भरोसा नहीं हुआ और उन्होनें आज्ञा दी-‘तुम आगे आओ और बालक को देखकर आशीर्वाद दो।’

अत्यन्त विवश होकर शनिदेव (shani dev) ने थोड़ा सा सिर उठाकर बालक की ओर देखा, तो उनकी दृष्टि पड़ते ही उस शिशु का सिर धड़ से अलग हो गया। यह देखकर पार्वती को बहुत कष्ट हुआ और क्रोध भी आया, किन्तु वे शनि को कुछ कह भी नहीं पा रही थीं, क्योंकि आज्ञा उन्होंने स्वयं दी थी। फिर उनके मुंह से निकल गया-‘भगवान शिव ही बचायें शनि की दृष्टि से’।

एक और प्रसंग है, रोहिणी शकट भेदन से सम्बन्धित, जो इस प्रकार है-
ज्योतिषियों ने जब नीलम सी क्रांति वाले शनिदेव को कृतिका नक्षत्र के अन्तिम चरण में देखा, तो वे भयभीत हो गए। रोहिणी शकट भेदन देवताओं के लिये भी दुःखदायी होता है, तथा राक्षस भी इससे भयभीत हो जाते हैं। सभी राजाओं के लिये यह परेशानी का कारण था, राजा दशरथ जो कि महा तेजस्वी व ईश्वर भक्त थे, उनका रथ नक्षत्र मण्डल को भी पार करने की शक्ति रखता था।

बहुत सोच-विचार करने पर भी तब कोई हल न निकला, तो वे अपने अलौकिक अस्त्र-शस्त्र लेकर नक्षत्र मण्डल की ओर चल दिये। वे सूर्य से भी ऊंचे उठकर रोहिणी पृष्ठ की ओर गये। वहां से उन्होंने शनिदेव को कृतिका से रोहिणी में प्रवेश को तत्पर जानकर अलौकिक संहारास्त्र का प्रयोग करने हेतु अपने आपको संयोजित किया।

तब शनिदेव (shani dev) महाराज दशरथ का यह अदम्य साहस देखकर बहुत प्रसन्न हुये और वरदान मांगने को कहा। शनिदेव को प्रसन्न हुये देख महाराज दशरथ ने उनकी स्तुति की और कहा, हे शनिदेव! प्रजा के कल्याण हेतु आप रोहिणी नक्षत्र का भेदन न करें।

शनि देव ने प्रसन्न हो कर तुरंत कहा ‘‘तथास्तु’’ और यह भी कहा कि जो व्यक्ति आप द्वारा सुनाये गये स्तोत्र से मेरी स्तुति करेंगे, उन पर मेरा प्रतिकूल प्रभाव कभी नहीं होगा।

जय शनि देव।। 

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वेद(vedas) और ब्रह्म(brahm)

 

vedas aur brahm
vedas aur brahm

यतो वा इमामि भूतानि जायते येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसेविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व, तद् ब्रह्म।

अर्थात् पंचभूतों में से भूत जिससे पैदा होते हैं, जन्म पाकर उसि के कारण जीवित रहते हैं। और नाश होते हुये जिसमें प्रविष्ट होते हैं, वही जानने योग्य है और वही ब्रह्म है।

ब्रह्म ही जगत् के जन्मादि का कारण है, इस विषय में तो किसी का मतभेद है ही नहीं। वही जगत जन्म का कारण है जो ब्रह्मके लक्ष्ण में अंर्तगत है। श्रुति कहती है कि सृष्टि के पूर्वकाल में जब सत् और असत् ही नहीं थे, तब केवल शिव ही थे। सत् कहते है। चेतन जगत को और असत् कहते है। जड वस्तुओं को। इस प्रकार इस जगत में केवल दो ही मुख्य तत्व हैं- चेतन और अचेतन। यह दोनो जब नहीं थे तब एक शिव ही थे। अर्थात् दोनो की उत्पत्ति से पहले केवल शिव ही थे। तब शिव को ही उनकी उत्पत्ति का कारण होना चाहिये?

ब्रह्माजी ब्रह्माण्डों की रचना करते करते और विष्णु जी उनका पालन करते करते कितने ही थक जायें, परंतु आप यदि चाहें तो उन के द्वारा रचित इस सारी सृष्टि को एक ही पल में अपना तीसरा नेत्र खोलकर अपने में समेट सकते हैं। हे देवाधिदेव महादेव! मेरी आपके चरणों में यही प्रार्थना है कि जिस प्रकार आप जगत के जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर उसका संहार कर उसे नवीन रूप देते हैं। उसी प्रकार विविध तापों से पीडित और जर्जरित मानव जाति के अंतःकरण के मल को जलाकर उसे सवर्ण की भाँति परिष्कृत कर दीजिये।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer