मानसिक स्वास्थ्य

चिकित्सा ज्योतिष में मानसिक बीमारियों का अध्ययन:-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

आज के इस लेख में हम मानसिक स्वास्थ्य चर्चा करेंगे, मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाने के बहुत से कारण हो सकते हैं, परंतु इन कारणों का ज्योतिषीय आधार क्या है? इसकी चर्चा इस लेख के माध्यम से की जाएगी।

चिकित्सा ज्योतिष में शरीर में होने वाली सभी बीमारियों के योग बतायेगा गये हैं, और कुछ ग्रहों के परस्पर संबंध बनते हैं जिनके आधार पर यह पता चलता है कि जातक को किस तरह के रोग हो सकते हैं? लेकिन इसका निर्धारण किसी अनुभवी ज्योतिषी से ही कराना चाहिए अन्यथा बेकार का तनाव उत्पन्न हो सकता है, आइए कुंडली के उन योगों का अध्ययन करें जिनके आधार पर मानसिक रोगों का पता चलता है:-

मानसिक बीमारी में:- चंद्रमा, बुध, चतुर्थ भाव व पंचम भाव का आंकलन किया जाता है, चंद्रमा मन है, बुध से बुद्धि देखी जाती है और चतुर्थ भाव भी मन है, तथा पंचम भाव से बुद्धि देखी जाती है, जब व्यक्ति भावुकता में बहकर मानसिक संतुलन खोता है, तब उसमें पंचम भाव व चंद्रमा की भूमिका अहम मानी जाती है, सेजोफ्रेनिया बीमारी में चतुर्थ भाव की भूमिका मुख्य मानी जाती है, यह देखने के लिए अनुभवी ज्योतिषी शनि व चंद्रमा की युति भी मानसिक शांति के लिए शुभ नहीं मानते हैं, मानसिक परेशानी में चंद्रमा पीड़ित होना चाहिए।

जन्म कुंडली में चंद्रमा अगर राहु के साथ है, तब व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने की संभावना बनी रहती है क्योकि राहु मन को भ्रमित रखता है, और चंद्रमा मन है, मन के घोड़े बहुत ज्यादा दौड़ते हैं, व्यक्ति बहुत ज्यादा हवाई किले बनाता है,
यदि जन्म कुंडली में बुध, केतु और चतुर्थ भाव का संबंध बन रहा है, और यह तीनों अत्यधिक पीड़ित हैं, तब व्यक्ति में अत्यधिक जिद्दीपन हो सकती है,और वह सेजोफ्रेनिया का शिकार हो सकता है, इसके लिए बहुत से लोगों ने बुध व चतुर्थ भाव पर अधिक जोर दिया है।

जन्म कुंडली में गुरु लग्न में स्थित हो और मंगल सप्तम भाव में स्थित हो या मंगल लग्न में और सप्तम में गुरु स्थित हो तब मानसिक आघात लगने की संभावना बनती है।

जन्म कुंडली में शनि लग्न में और मंगल पंचम भाव या सप्तम भाव या नवम भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

कृष्ण पक्ष का बलहीन चंद्रमा हो और वह शनि के साथ 12वें भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग की संभावना बनती है।

शनि व चंद्र की युति में व्यक्ति मानसिक तनाव ज्यादा रखता है,
जन्म कुंडली में शनि लग्न में स्थित हो, सूर्य 12वें भाव में हो, मंगल व चंद्रमा त्रिकोण भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

जन्म कुंडली में मांदी सप्तम भाव में स्थित हो, और अशुभ ग्रह से पीड़ित हो रही हो, राहु व चंद्रमा लग्न में स्थित हो, और अशुभ ग्रह त्रिकोण में स्थित हों, तब भी मानसिक रोग की संभावना बनती है।

मंगल चतुर्थ भाव में शनि से दृष्ट हो या शनि चतुर्थ भाव में राहु/केतु अक्ष पर स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

जन्म कुंडली में शनि व मंगल की युति छठे भाव या आठवें भाव में हो रही हो, जन्म कुंडली में बुध पाप ग्रह के साथ तीसरे भाव में हो, या छठे भाव में हो, या आठवें भाव में हो, या बारहवें भाव में स्थित हो, तब भी मानसिक शांति नहीं मिलती, मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

यदि चंद्रमा की युति केतु व शनि के साथ हो रही हो तब यह अत्यधिक अशुभ माना गया है, और अगर यह अंशात्मक रुप से नजदीक हैं, तब मानसिक रोग होने की संभावना अधिक बनती है।

जन्म कुंडली में शनि और मंगल दोनो ही चंद्रमा या बुध से केन्द्र में स्थित हों तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

मिरगी होने के जन्म कुंडली में लक्षण :-

इसके लिए चंद्र तथा बुध की स्थिति मुख्य रुप से देखी जाती है, साथ ही अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जाती है, शनि व मंगल जन्म कुंडली में छठे या आठवें भाव में स्थित हो तब व्यक्ति को मिरगी संबंधित बीमारी का सामना करना पड़ सकता है।

कुंडली में शनि व चंद्रमा की युति हो, और यह दोनो मंगल से दृष्ट हों, जन्म कुंडली में राहु व चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हों, मानसिक रुप से कमजोर बच्चे अथवा मंदबुद्धि बच्चे जन्म के समय लग्न अशुभ प्रभाव में हो विशेष रुप से शनि का संबंध बन रहा हो, यह संबंध युति, दृष्टि व स्थिति किसी भी रुप से बन सकता है।

शनि पंचम से लग्नेश को देख रहा हो, तब व्यक्ति जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

जन्म के समय बच्चे की कुण्डली में शनि व राहु पंचम भाव में स्थित हो, बुध बारहवें भाव में स्थित हो, और पंचमेश पीड़ित अवस्था में हो, तब बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

पंचम भाव, पंचमेश, चंद्रमा व बुध सभी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तब भी बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

जन्म के समय चंद्रमा लग्न में स्थित हो और शनि व मंगल से दृष्ट हो तब भी व्यक्ति मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

पंचम भाव का राहु भी व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट करने का काम करता है, बुद्धि अच्छी नहीं रहती है।

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आत्महत्या का योग ( हस्तरेखा से)

हस्तरेखाओं के द्वारा हम जातक के जीवन में होने वाली प्रत्येक घटना Suicide का भी पूर्वानुमान लगा सकते हैं।

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मनुष्य के हाथ की प्रत्येक रेखा अपना विशेष महत्व रखती है, जैसे जीवन रेखा, भाग्य रेखा, मस्तिष्क रेखा, यश रेखा, स्वास्थ्य रेखा आदि। आगे की पंक्तियों में हम इन हस्तरेखाओं पर पाये जाने वाले चिन्हों और रेखाओं का विवरण लिखेंगे, जो चिन्ह यदि जातकों के हाथ में पाये जायें, तो वे मनुष्य अपनी प्रकृति के कारण अपने व्यक्तिगत चरित्र को प्रदर्शित करता है। शायद ही कभी ऐसा हो कि कोई चिन्ह या विशेषता हाथ पर किसी व्यक्ति की प्रकृति को नष्ट या धुंधला कर देती हो।

एक खतरनाक चिन्ह व्यक्ति की खतरनाक प्रकृति का पता इस तरह बता देता है। जिस प्रकार घड़ी समय की सूचना देती है, और घड़ी बनाने के लिये जैसे कई प्रकार के पुर्जों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार किसी व्यक्ति को अपराधी या सन्त बनाने के लिये भी हस्त विशिष्टताओं की आवश्यकता होेती है। जिन हाथों में आत्महत्या Suicide करने की प्रवृति होती है वे हाथ प्रायः लम्बे होते हैं। उस पर मस्तिष्क रेखा ढलवा होती है, तथा चन्द्र पर्वत अपने मूल स्थान पर उन्नत एवं विकसित होता है। वहाँ मस्तिष्क रेखा भी जीवन रेखा के साथ जुड़ी हुई होती है। जिसके कारण व्यक्ति की संवेदनशीलता में और अधिक वृद्धि हो जाती। ऐसे व्यक्ति आत्महत्या Suicide पर उतारू नहीं हो सकते, लेकिन अत्याधिक संवेदनशीलता एवं कल्पनाशीलता के कारण किसी कष्ट, दुख या कलंक का प्रभाव उन पर हजारों गुना अधिक होता है। तब शायद वह आत्महत्या करके अपने को शहीद बनाना चाहें। उन्नत शनि पर्वत क्षेत्र भी इस प्रकार की सूचना देता है, तब भी व्यक्ति संवेदनशील होता है, और मानसिक स्थिति से तंग आकर यह निश्चिय कर सकता है कि जीवन जीने योग्य नहीं है। ऐेसे में थोडी सी उकसाहट अथवा निराशा के कारण वह आत्महत्या Suicide कर सकता है।

किसी नुकीले या अधिक नुकीले हाथ में ढलवां मस्तिष्क रेखा का भी यही परिणाम होता है। लेकिन ऐसा व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप क्षणिक आवेश में आकर आत्महत्या Suicide कर सकता है, तथा कोई गहरा आघात अथवा मुसीबत ऐसे व्यक्ति को उत्तेजित करने के लिये काफी होती है। ऐसा व्यक्ति आत्महत्या करने के लिये पहले कुछ सोचता विचारता नहीं है। इसके विपरीत मस्तिष्क रेखा के अस्वाभाविक रूप से झुके हुये न होने पर भी व्यक्ति आत्महत्या Suicide कर लेता है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा जीवन रेखा के साथ जुड़ी होनी चाहिये

बृहस्पति (गुरू) पर्वत क्षेत्र धंसा हुआ तथा शनि पर्वत क्षेत्र पूर्ण उन्नत होना चाहिये। ऐसा व्यक्ति जीवन के संघर्ष में निराश एवं निरूत्साहित हो जाता है, और उसकी सहनशक्ति जबाब दे जाती है, और तब वह आत्महत्या Suicide कर बैठता है। लेकिन ऐसा वह सहसा नहीं करता, बल्कि परिस्थितियों पर पूर्ण रूप से विचार करने के बाद जब उसे आशा की कोई भी किरण दिखाई नहीं देती तब वह आत्महत्या Suicide कर लेता है।

आत्महत्या Suicide की प्रवृत्ति वालों को हत्या के विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है, तथा हाथ को देखकर अपराध करने की असाधारण प्रवृत्ति का पता लगाया जा सकता है। हाथ की बनावट देखकर यह भी पता लगाया जा सकता है कि अपराध का क्या रूप होगा। कुछ लोगों की अपराध करने की सहज प्रवृत्ति होती है, और इस पर संदेह नहीं किया जा सकता, पर कुछ व्यक्ति जन्मजात अपराधी भी होते हैं, जैसे जन्मजात संत। अपराधी प्रवृत्तियों का विकसित होना उस वातावरण और परिस्थिति पर निर्भर करता है, जिनमें व्यक्ति रहता है। आपने प्रायः देखा होगा कि कुछ बच्चों में हर वस्तु को नष्ट करने की प्रवृत्ति होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनमें बुद्धि की कमी होती है, बल्कि यह है कि नष्ट करने की प्रवृत्ति उनमें जन्मजात होती है। ऐसी प्रवृत्तियों को सुधारा जा सकता है, लेकिन कुछ लोगों में इस प्रकार की प्रवृत्ति इतनी अधिक होती है कि, यदि वे दूषित वातावरण अथवा परिस्थितियों में रहने लगें तो दुर्बल मानसिक शक्ति के कारण अथवा आवेश में आकर या प्रलोभन के शिकार होकर अपराधी बन जाते हैं। जहाँ तक हाथ का सम्बंध है, हत्या के अनुसार उसे तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

1. वे हत्या जो आवेश में आने पर क्रोधित होने पर या प्रतिशोध की भावना से की जा सकती है।

2. धन सम्पत्ति अथवा अन्य किसी लाभ के लिये की गई हत्या। ऐसी हत्या व्यक्ति द्वारा अपनी लालची प्रवृत्ति की संतुष्टी के लिये की जा सकती है।

3. जब हत्या करने वाला अपने शिकार के साथ भी मित्रतापूर्ण सम्बंध बनाये रखता है, ऐसी हत्या करने वालों को दूसरों को यातनायें देकर प्रसन्नता होती है, तथा काम की अपेक्षा हत्यारे की पैशाचिक वृत्तियों का पोषण होता है।

पहली श्रेणी साधारण होती है। व्यक्ति केवल परिस्थितिवश हत्यारा बन जाता है, ऐसे व्यक्ति सज्जन एवं भले मानस होते हैं, लेकिन किसी विशेष परिस्थिति में क्रोध से पागल होकर हत्या कर बैठते हैं। होश आने पर जब उन्हें अपने इस हिंसक कृत्य का आभास होता है, तो वे पश्चाताप के कारण टूटकर बिखर जाते हैं। इस प्रकार हत्या करने वाले व्यक्तियों के हाथ में अनियंत्रित क्रोध एवं पाश्विक उत्तेजना के अतिरिक्त दूसरा कोई अशुभ लक्षण नहीं होता है। इस प्रकार के व्यक्तियों के हाथ अविकसित अथवा वैसे होते हैं, ऐसे हाथों में मस्तिष्क रेखा छोटी-मोटी व लाल होती है, तथा नाखून छोटे व लाल व हाथ मारी व सख्त होते हैं। ऐसे हाथों का अंगूठा अति विशिष्ट यानी काफी नीचा छोटा अपने दूसरे पर्व पर मोटा व पहले पर्व पर गदामुखी होता है, ऐसा अंगूठा अत्यंत छोटा चैड़ा वर्गाकार व चपटा होता है, ऐसे व्यक्तियों के हाथों में शुक्र पर्वत क्षेत्र भी असाधारण रूप से उन्नत व विस्तृत होता है, उनमें काम वासना की अधिकता होती है, जिसके कारण वे इस प्रकार के कृत्य कर बैठते हैं।

दूसरी श्रेणी में कुछ भी असाधारण नहीं होता। ऐसे व्यक्तियों के हाथों की मस्तिष्क रेखा में ही विशेषता दिखाई पड़ती है, ऐसे हाथों पर मस्तिष्क रेखा गहरी बुध पर्वत क्षेत्र की ओर ऊपर को उठती हुई अथवा बुध पर्वत क्षेत्र पर पहुँचने से पहले दाँये हाथ में अपने स्थान से हटी हुई होगी। जैसे-जैसे व्यक्ति की प्रवृत्तियों में वृद्धि होती जाती है, वे हृदय रेखा पर अधिकार जमा लेती है। ऐसे हाथ प्रायः सख्त लेकिन अंगूठा असाधारण रूप से मोटा नहीं परंतु सख्त व अन्दर को सिकुड़ा हुआ होता है। अंगूठे की ऐसी बनावट व्यक्ति में लालची प्रवृत्ति की द्योतक होती है, ऐसे व्यक्ति अपने लाभ के लिये अपने अन्तर ज्ञान को भी खत्म कर देते हैं।

तीसरी श्रेणी सर्वाधिक दिलचस्प व सबसे अधिक भयावह भी हो सकती है, ऐसे हाथ में कोई भी असाधारण चिन्ह दिखाई नहीं देता लेकिन सभी विशेषताओं का पूर्ण निरीक्षण करने के बाद व्यक्ति की प्रवृत्ति उसके स्वभाव और छल कपट को देखा जा सकता है, ऐसे व्यक्ति का हाथ पतला लम्बा व सख्त होता है। अंगुलियाँ थोडी-थोड़ी भीतर को मुड़ी हुई तथा अंगूठा लम्बा और उसके दोनों पर्व पूर्ण विकसित होते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति में दृढ़ इच्छा शक्ति योजना बनाने व उसके क्रियान्वित करने की क्षमता होती है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा अपने स्थान पर भी हो सकती है, तथा उससे कुछ हटकर हाथ को पार करती हुई अपने सामान्य स्थान से कुछ ऊपर को भी स्थित होती है। यह व्यक्ति की कपटपूर्ण भावनाओं को व्यक्त करती है। ऐसी मस्तिष्क रेखा लम्बी व महान होगी तथा हाथ में शुक्र पर्वत क्षेत्र या तो धंसा हुआ होगा या बहुत उन्नत होगा।

यदि शुक्र पर्वत हस्त क्षेत्र में धंसा हुआ हो, तो व्यक्ति केवल अपराध करने के लिये ही अपराध करता है, लेकिन यदि शुक्र पर्वत क्षेत्र अत्याधिक उन्नत हो, तो हत्या या अपराध किसी पाश्विक वासना पूर्ति के लिये किया जाता है। अपराध जगत के दक्ष व्यक्तियों के हाथ ऐसे ही होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिये हत्या करना एक कला होती है, जिसे पूरा करने हेतु वह एक-एक विवरण का सूक्ष्म अध्ययन करते हैं। ऐसे व्यक्ति कभी भी हिंसापूर्ण ढंग से हत्या नहीं करते, क्योंकि इसे वे अश्लील समझते हैं। ऐसे व्यक्ति विष का सहारा लेते हैं, व उसका प्रयोग इतनी कुशलता के साथ करते हैं, कि हत्या नहीं बल्कि स्वाभाविक कारणों से हुई मृत्यु जान पड़ती है।

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प्रसिद्धि के योग

जीवन में प्रसिद्धि Fame पाने वाले मनुष्य भाग्यशाली होते हैं, क्योंकि प्रसिद्धि पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों के कारण ही इस जन्म में प्राप्त होती है, और इस जन्म में प्रसिद्धि मिलेगी या नहीं, मिलेगी तो किस स्तर तक मिलेगी? इस की सूचना जन्म कुंडली में ग्रह स्थिति से मिलती है। इस लेख के द्वारा प्रसिद्धि fame के ज्योतिषीय योगों की चर्चा की जा रही है :-

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वेदों को संसार का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना गया है। ज्योतिष शास्त्र भी वेद का ही एक अंग है। इसे सम्पूर्ण शास्त्र भी माना जाता है। इसलिये इसका प्रमाणिक ज्ञान प्राप्त कर उसे व्यावहारिक अर्थात प्रायोगिक तौर पर परखकर जगत का कल्याण करना प्रत्येक के वश की बात नहीं है। ज्योतिष शास्त्र द्वारा तीनों काल की जानकारी प्राप्त की जा सकती है, जबकि अन्य शास्त्र वर्तमान तक ही सीमित हैं। इसीलिये ज्योतिष रूपी महासागर में गोता लगाकर कल्याण करने हेतु विशेष बुद्धि की आवश्यकता रहती है। इसी के कारण जातक ज्योतिष के नियमों को सुनकर समझकर परिस्थितियों के अनुसार सामंजस्य बिठाकर विकल्प ढूँढना एवं अन्तिम सत्य का निर्माण करना संभव हो पाता है। प्राचीन काल में ज्योतिष ज्ञान एक वर्ग विशेष तक ही सीमित था लेकिन वर्तमान में ज्योतिष वर्ग विशेष तक सीमित न रहकर प्रत्येक वर्ग के लोग इसे सीख रहे हैं। विभिन्न संस्थायें भी ज्योतिष विषय के पाठ्यक्रम चलाकर डिप्लोमा एवं डिग्री स्तर के कोर्स करवा रही हैं। इन कोर्सों को करने के पश्चात ज्योतिष का ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन इस ज्ञान के द्वारा उसे धन, मान एवं सम्मान की प्राप्ति भी हो यह आवश्यक नहीं है।

वर्तमान में कम्प्यूटर के चलन के कारण वास्तविक ज्योतिषीय ज्ञाता पिछड़ रहे हैं। ये तथाकथित कम्प्यूटर ज्योतिषी कम्प्यूटर की भाषा में ही फलित बता देते है लेकिन फलित घटित होता नहीं है। तब ज्योतिष से मोह भंग होना भी स्वाभाविक है। ज्योतिषीय गणना हेतु कम्प्यूटर का प्रयोग सटीक है। लेकिन प्रयोग किये जाने वाले साॅफ्टवेयर की शुद्ध गणना की परख भी आवश्यक है। फलित एवं उपाय हेतु भी ज्योतिषी की बुद्धि का समावेश अति आवश्यक है। केवल गणित के सहारे ही कोई ज्योतिषी प्रसिद्धि fame प्राप्त नहीं कर सकता। प्रसिद्धि हेतु गणितीय ज्ञान के साथ-साथ फलित एवं उपाय ज्योतिष का ज्ञान अति आवश्यक है। किसी एक के अभाव में उसको पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती है। इन सबके पश्चात जन्मांग में ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त होने के योगों का होना भी अति आवश्यक है। इन योगों की जन्मांग में उपस्थिति ही उसकी प्रसिद्धि fame का स्तर निर्धारित करती है। भविष्य कथन के साथ-साथ ज्योतिषी स्वर्णिम भविष्य हेतु उपाय भी बताता है। इस कारण इसे भाग्यवाद का समर्थक शास्त्र माना जाता है लेकिन यह पूर्णतया कर्मवाद से प्रेरित है। पूर्व जन्म के शुभ अशुभ कर्मों के परिणाम स्वरूप ही इस जन्म में किसी जातक को प्रसिद्ध प्राप्त हो सकती है। इसलिये ज्योतिष शास्त्र हमेशा शुभ कर्म करने को प्रेरित कर मनुष्य का जीवन सुधारता है। उपरोक्त गुणों के होने पर ही कोई जातक ज्योतिष से प्रसिद्धि fame प्राप्त कर सकता है। यवन के मतानुसार –

चन्द्रा र जीवासुर पूजिताङा नरं प्रकुर्वान्ति सदा धनस्थाः।
विद्या विनितं गणक प्रधानं मेधाविनं ब्राह्मण वल्लभं च।।

अर्थात द्वितीय भाव में चंद्र, मंगल, बृहस्पति व शुक्र की युति हो तो जातक विद्या व विनय से सम्पन्न ज्योतिष में प्रवीण बुद्धिमान एवं ब्राह्मणों का प्यारा होता है। उदाहरणार्थ एक उभरते हुये युवा ज्योतिषी की कुण्डली दी जा रही है जिसने सामान्य मार्गदर्शन से ज्योतिष विद्या आत्मसात कर ली है एवं प्रसिद्धि भी दिनों दिन बढ़ती जा रही है जो कुंडली में स्थित ग्रह योगों के कारण ही सम्भव है –

प्रस्तुत कुंडली में द्वितीय भाव में चंद्र मंगल, बृहस्पति व शुक्र की युति ज्योतिष में प्रवीणता लाकर प्रसिद्ध fame का योग बना रही है। दशम भाव पर शनि, बुध, राहु व बृहस्पति की दृष्टि ज्योतिष में प्रसिद्धि दिला रही है। बृहस्पति की नीच दृष्टि के कारण संघर्ष की स्थिति भी बना रही है। पंचमेश सूर्य तृतीय भाव में एवं तृतीयेश बुध चतुर्थ में होने के कारण इनकी लेखनी शक्ति अच्छी बन रही है। चतुर्थेश उच्च राशि में, द्वितीयेश स्वराशि, लग्नेश व अष्टमेश उच्च नवांश में होने के कारण परम्परा से प्राप्त ज्ञान के अलावा स्वयं के शोध कार्य से प्रसिद्धि का योग भी बन रहा है। जातक तत्व के अनुसार –

जीवे स्वांशे मृदुवंशे त्रिकालज्ञः। जीवे गोपुरे शुभदृष्टे त्रिकालज्ञः।।

अर्थात बृहस्पति अपने नवांश, मृदु षष्टयंश या गोपुरांश में होकर शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक प्रसिद्ध ज्योतिषी होता है। यदि इस योग के साथ त्रिकोणेश भी बलवान हो तो प्रसिद्धि स्थायी रहती है।

दशम भाव पर एवं सप्तम भाव पर शनि मंगल राहु बृहस्पति व बुध, शुक्र का प्रभाव होने पर जातक प्रसिद्ध ज्योतिषी होता है। ये ग्रह जितने बली एवं योगकारक होकर स्थित होंगे उतनी ही प्रसिद्धि अधिक होती है।

प्रस्तुत कुण्डली प्रसिद्ध ज्योतिषि बी.वी. रमण की है। इनकी कुंडली में दशम भाव पर मंगल, शनि, राहु व चंद्र का दृष्टि प्रभाव है जो इन्हें गणित ज्योतिष में कुशल बना रहा है। एवं पूर्वाभास की शक्ति दे रहा है। सप्तम भाव एवं दशम भाव पर मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र की स्थिति प्रभाव इन्हें फलित ज्योतिष एवं उपाय ज्योतिष में प्रवीणता दे रहा है। इसी योग के कारण इन्हें धन मान सम्मान एवं प्रसिद्धि भी प्राप्त हुई। लग्न, दशम एवं द्वितीय भाव पर भावेशों का दृष्टि प्रभाव इसे प्रबल बना रहा है।

कारकांश कुंडली में द्वितीय, तृतीय व पंचम भाव पर बली केतु व बृहस्पति का स्थिति दृष्टि प्रभाव ज्योतिष में प्रसिद्धि प्राप्त करवाता है। जन्मांग चक्र में धन भाव में चंद्र मंगल की युति हो व अष्टम में बुध स्थित हो या सप्तम में मंगल हो तो जातक धन मान सम्मान की प्राप्ति ज्योतिष के द्वारा प्राप्त होती है। धन भाव में चंद्र मंगल की युति जातक को धन की प्राप्ति करवाता है तो अष्टम भाव में बुध की स्थिति ज्योतिष में गुढ ज्ञान या शोध कार्य में सहायता देती है। लेकिन बुध की चंद्र पर दृष्टि के कारण ऐसे जातक प्रसिद्धि fame तो इस ज्ञान के कारण प्राप्त कर सकते हैं लेकिन धन की प्राप्ति कमजोर ही रहेगी। यदि धन भाव में चंद्र बुध की युति बन जाये तब धनमान व सम्मान की प्राप्ति भी होती है। जन्मांग चक्र में बुध व बृहस्पति की बली स्थिति होने पर ही ज्योतिष की पूर्ण जानकारी सम्भव है। इसी प्रकार धनेश लाभेश शुक्र की बलवान स्थिति धन मान सम्मान की प्राप्ति हेतु आवश्यक है। बुध व मंगल शनि की राशि में हों एवं उस पर शनि की दृष्टि भी हो तो उसे ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त होती है।

चंद्र को ज्योतिष में मन का कारक माना है। इससे त्रिकोण में बृहस्पति व बुध से त्रिकोण में मंगल स्थित हो तो जातक त्रिकालज्ञ होता है। बृहस्पति को ज्ञान, बुध बुद्धि व ज्योतिष का, मंगल गणित व तर्क शक्ति का कारक है। तो शुक्र लक्ष्मी रूप है। अतः ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि हेतु मंगल बुध बृहस्पति व शुक्र का बलवान होकर शुभ स्थिति में होना आवश्यक है। जो ग्रह जन्मांग में अशुभ स्थिति में रहेगा उसके कारक सम्बंधी ज्योतिषी में गुणों की कमी होगी। यदि बुध व मंगल कमजोर हुआ तो उसे गणित ज्योतिष में असुविधा महसूस होगी। बुध एवं बृहस्पति कमजोर होने पर उसे ज्योतिषीय ज्ञान का सही समय पर सही उपयोग करने की असुविधा महसूस होगी। शुक्र की निर्बल स्थिति ज्योतिषी के लिये धन प्राप्ति में कमी कराती है। उसकी प्रसिद्धि एवं लोगों को आकर्षित करने की क्षमता भी कम रहती है। इसके लिये जन्मांग चक्र में ज्योतिष में प्रसिद्ध होने के योगों के साथ शुक्र का बलवान होना आवश्यक है। अतः किसी ज्योतिषी को प्रसिद्धि हेतु बुध, बृहस्पति व शुक्र का बलवान होना एवं शनि राहु का योगकारक होना आवश्यक है।

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Depawli Muhurat 2018

2015 Diwali Muhurat

दीपावली के दिन महालक्ष्मी पूजन कब करें, Depawli Muhurat 2018 :-

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सनातन मान्यता के अनुसार एश्वर्यवाली जीवन यापन एवं सफलता व उन्नति, सुख-समृद्धि के लिये शास्त्रों में महालक्ष्मी को प्रसन्न करने का विधान बताया गया है, महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए दीपावली से शुभ दूसरा कोई मुहुर्त muhurat नहीं है। इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन निशीथ काल और महानिशीथ काल, स्थिर लग्न, शुभ चौघड़िया के दुर्लभ तथा सिद्ध मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन करके कोई भी साधक दुर्लभ देवी शक्तियों का आशिर्वाद प्राप्त कर सकता है।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस इस वर्ष 2018 में वृष एवं सिंह (स्थिर लग्न ) के मुहूर्त में महालक्ष्मी दीपावली पूजा मुहूर्त Diwali Muhurat में महालक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व है, इस दिन कि विशेषता यह है कि इस दिन वातावरण में अलौकिक सकारात्मक तथा समृद्धि प्रदान करने वाली ऊर्जा बहुतायत मात्रा में उपस्थित होगी। इस शुभ समय में महालक्ष्मी की पूजा करके कोई भी मनुष्य सर्व भौतिक सुखों का साक्षात्कार कर सकता है। यह रहस्य हर कोई नहीं जानता।

इस वर्ष “आप का भविष्य” के पाठकों के लिए महालक्ष्मी पूजा के विशेष महूर्त की गणना की है, इसी मुहूर्त में समृद्धि प्रदान करने वाले अनेक यंत्रों का निर्माण और अनेक यंत्रों की प्राण-प्रतिष्ठा भी करने का निश्चय किया गया है। (यह दीपावली पर सिद्ध यंत्र आप दीपावली से पूर्व Shukracharya संस्थान में बुक करवा सकते हैं)

दीपावली (महालक्ष्मी) पूजन मुहूर्त 2018

महालक्ष्मी का पूजन केवल स्थिर लग्न में ही सम्पन्न किया जाना चाहिये, क्योंकि हर एक मनुष्य की यही इच्छा होती है कि, लक्ष्मी को स्थिर रखना है। इस वर्ष अमावस्या की रात्रि को वृष और सिंह मात्र दो ही स्थिर लग्न हैं, अतः इन लग्न-मुहूर्त में ही लक्ष्मी पूजन सम्पन्न होना चाहिये।

श्री महालक्ष्मी पूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल से आधी रात तक रहने वाली अमावस श्रेष्ठ होती है। यदि अर्धरात्रि काल में अमावस्या तिथि का आभाव हो, तो प्रदोषकाल में ही दीप प्रज्वलन, महालक्ष्मी पूजन, श्रीगणेश एवं कुबेर आदि पूजन करने का विधान है।

प्रदोषे दीपदानए लक्ष्मी पूजनादि विहितम्।
कार्तिक कृष्ण पक्षे च प्रदोषे भूतदर्शर्योः,
नरः प्रदोष समये दीपदान् दद्यात् मनोरमान्।।

इस वर्ष 2018 ई. कार्तिक अमावस 7 नवम्बर, बुधवार को प्रदोष व्यापिनी तथा रात्रि 21:22 तक निशीथ व्यापिनी होने से दीपावली पर्व इसी दिन होगा। इस वर्ष दीपावली स्वाती तथा विशाखा नक्षत्र आयुष्मान तथा सौभाग्य योग एवं तुला के चन्द्रमा के समय होगी।

सांयकाल सूर्यास्त (प्रदोषकाल प्रारम्भ) के बाद मेष व वृष लग्न एवं स्वाती नक्षत्र विद्यमान होने से यह समयावधि श्रीगणेश, महालक्ष्मी पूजन आदि आरम्भ करने के लिये विशेष रूप से शुभ रहेगी। बही खातों एवं नवीन शुभ कार्यों के लिये भी यह मुहूर्त अत्यंत शुभ होगा। इस वर्ष बुधवार की दीपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रूप से शुभ मानी जायेगी। लक्ष्मीपूजन, दीपदान के लिये प्रदोषकाल ही विशेषतया प्रशस्त माना गया है-

कार्तिके प्रदोषे तु विशेषण अमावस्या निशावर्धके।
तस्यां सम्पूज्येत् देवी भोगमोक्ष प्रदायिनीम्।।

दीपावली के दिन घर में प्रदोषकाल से महालक्ष्मी पूजन प्रारम्भ करके अर्धरात्रि तक जप अनुष्ठानादि करने का विशेष महात्मय होता है। प्रदोषकाल से कुछ समय पहले स्नानादि उपरांत धर्मस्थल पर मंत्रपूर्वक दीपदान करके अपने निवास स्थान पर श्रीगणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर पूजनादि करके अल्पाहार करना चाहिये। तदुपरांत यथोपलब्ध निशीथादि शुभ मुहूर्त में मंत्र-जप, यंत्र-सिद्धि आदि अनुष्ठान सम्पादित करने चाहियें।
दीपावली वास्तव में पांच पर्वों का महोत्सव है, जिसका आरम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) से लेकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई-दूज) तक रहती है। दीपावली के पर्व पर धन की भरपूर प्राप्ति के लिये धन की अधिष्ठात्री भगवती लक्ष्मी का समारोह पूर्वक आवाहन, षोडशोपचार सहित पूजन किया जाता है। आगे दिये गये निर्दिष्ट शुभ मुहूर्तों में किसी पवित्र स्थान पर आटा, हल्दी, अक्षत एवं पुष्पादि से अष्टदल कमल बनाकर श्रीलक्ष्मी का आवाहन एवं स्थापन करके देवों की विधिवत् पूजा अर्चना करनी चाहिये।

आवाहन का मंत्र-
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्र्रां ज्वलंती तृप्तां तर्पयंतीम।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप हव्ये श्रियम्। (श्रीसूक्तम्)।

पूजा मंत्र-
ॐ गं गणपतये नमः।। लक्ष्म्यै नमः।। नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात्।। से लक्ष्मी की, एरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नमः। अग्रलिखित मंत्र से इन्द्र की और कुबेर की निम्न मंत्र से पूजा करें- कुबेराय नमःए धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्मधिपाय च। भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादि सम्पदः।।
पूजन सामग्री में विभिन्न प्रकार की मिठाई, फल पुष्पादि, धूप, दीपादि सुगंधित वस्तुयें सम्मलित करनी चाहियें। दीपावली पूजन में प्रदोष, निशीथ एवं महानिशीथ काल के अतिरिक्त चैघड़िया मुहूर्त भी पूजन, बही-खाता पूजन, कुबेर पूजा, जपादि अनुष्ठान की दृष्टि से विशेष प्रशस्त एवं शुभ माने जाते हैं।

प्रदोषकाल-
7 नवम्बर 2018 को दिल्ली एवं निकटवर्ती नगरों में सूर्यास्त 17:30 से 02 घ. 41 मि. के लिये 20:11 तक प्रदोषकाल रहेगा। सांय 17:57 तक मेष (चर) लग्न तथा सांय 17:57 से 19:52 तक वृष (स्थिर) लग्न विशेष रहेगा। प्रदोषकाल में मेष व वृष लग्न स्वाती नक्षत्र 19:37 तक तथा तुला का चन्द्रमा होने से महालक्ष्मी पूजानादि के लिये शुभ समय होगा। प्रदोषकाल में ही 19:00 से 20:41 तक शुभ की चौघड़ियां रहने से इस योग में दीपदान, महालक्ष्मी, गणेश-कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन, धर्मस्थल एवं घर पर दीप प्रज्वलित करना, ब्राह्मणों तथा आश्रितों को भेंट, मिठाई बांटना शुभ होगा।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़ियां मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चैघडिया
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चैघड़िया पूजन में होनी चाहियें।

निशीथ काल- 7 नवम्बर 2018 को दिल्ली व समीपस्थ नगरों में निशीथकाल रात्रि 20:01 से 22:41 तक रहेगा। इसी निशीथकाल में 19:43 से 21:57 तक मिथुन लग्न मध्यम मुहूर्तए तदुपरांत कर्क लग्न विशेष प्रशस्थ रहेगा। 19:00 से 20:41 तक शुभ की चैघडिया भी शुभ रहेगी। तदुपरांत अमृत की चैघडिया 20:41 से 22:22 तक भी शुभ रहेगी। इस अवधि तक पूजन समाप्त कर श्रीसूक्त, कनकधारा स्त्रोत्र तथा लक्ष्मी स्त्रोत्रादि का जप पाठ करना चाहिये।

महानिशीथ काल- रात्रि 22:41 से 24:20 तक महानिशीथ काल रहेगा। इस अवधि में 21:57 से 24:20 तक कर्क लग्न तदुपरांत सिंह लग्न विशेष शुभ रहेगा। 22:22 से 24:02 तक चर की चौघड़ियां भी शुभ, परंतु तदुपरांत रोग की चौघड़ियां अशुभ रहेगी। इस लिये 24:02 तक श्री गणेश-लक्ष्मी पूजन अवश्य कर लेना चाहिये। महानिशीथ काल में श्री महालक्ष्मी, काली उपासना, यंत्र मंत्र तंत्रादि की क्रियायें व काम्य प्रयोग, तंत्रानुष्ठान, साधनायें एवं यज्ञादि किये जाते हैं।

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