यातायात और ज्योतिष

यातायात का सम्बंध बिजनेस और ज्योतिष से-

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka Bhavishya), Top best astrologer in delhi

प्रत्येक देश के विकास में यातायात के साधनों का अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारा देश बहुत बड़ा है तथा आबादी भी अधिक है। केवल सरकारी यातातात के साधन रेल, बस, वायुयान आदि आवश्यकता पूरा नहीं कर सकते। अतः प्राईवेट यातायात सुविधाओं का भी महत्व बढ़ जाता है। इस व्यवसाय में धन भी अधिक प्राप्त होता है साथ ही देशवासियों को यातायात के सुविधा पूर्ण साधन भी उपलब्ध होते हैं एवं व्यवसायी को प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती है तथा कई व्यक्तियों को रोजगार भी प्राप्त होता है। इस क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति को सफलता प्राप्त नहीं हो सकती है। जब तक ग्रह योगों का सहयोग न हो। अब हम ज्योतिषीय आधार पर इस व्यवसाय में सफलता प्राप्त करने के योगों का विवरण निम्नानुसार प्रस्तुत कर रहे हैं:-

1. वाहन कारक शुक्र व्यवसाय एवं जनता कारक शनि, यात्रा कारक मंगल प्रेरित करने वाले ग्रह राहु यदि जन्म पत्रिका में बलवान हो तो ऐसा जातक वाहन से सम्बंधित व्यवसाय में रूचि रखने वाला होता है।

2. इस व्यवसाय से धन प्राप्त करने वालों की पत्रिका में शुक्र, शनि मंगल का सम्बंध लग्नेश, धनेश, लाभेश, कर्मेश आदि से किसी भी रूप में होना चाहिये।

3. यदि उच्च का शनि लाभ भाव में मंगल भाग्येश के साथ केन्द्र में लग्न के राहु से दृष्ट हो, कर्मेश बुध के साथ लाभेश शुक्र छठे स्थान में (06 भाव) बैठकर आवागमन के व्यवभाव (12 भाव) को दृष्ट करें, साथ ही उच्च के गुरू, चन्द्र के साथ अच्छी स्थिति में हो तो, ऐसा जातक जनता को आवागमन की सुविधा प्रदान कर इस व्यवसाय में अति सफल होता है।

4. जातक की कुण्डली में यदि शुक्र उच्चाभिलाषी होकर पराक्रम भाव में कुंभ राशि का होकर भाग्यभाव को देखे, जनता कारक चतुर्थ में लाभेश शनि के साथ जनता कारक शनि बैठे और दशम में बैठे लग्नेश व चतुर्थेश गुरू पर दृष्टि हो योग कारक मंगल पंचमेश होकर वाहन कारक शुक्र की राशि लाभ भाव में बैठे, दशमेश बुध, व्यवसाय कारक व धनेश शनि की राशि मकर में हो तथा इस पर लग्नेश गुरू की पंचम दृष्टि हो साथ ही भाग्येश सूर्य स्वयं गुरू की राशि धनु में लग्नगत हो, तो ऐसे जातक को आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराने का व्यवसाय (वाहनों का) कर सफल होकर धन कमाता है।

5. लग्नेश स्वयं वाहन कारक शुक्र होकर कार्यक्षेत्र में व्यवसाय कारक शनि की राशि कुंभ में उच्चाभिलाषी हो, द्वितीय यंत्रिक कारक मंगल स्वग्रही लाभेश के साथ लाभ स्थान में राहु से दृष्ट हो, धनेश, पंचमेश व सुखेश भाग्य भाव में युक्ति करें, योग कारक शनि धनभाव में हो तो ऐसा जातक पुस्तैनी ट्रांसपोर्ट व्यवसाय को आगे बढ़ाते हुये अति सफल प्रतिष्ठित व धनाढ्य ट्रांसपोर्ट व्यवसायी होता है।

अब कुछ सफल यातायात व्यवसाय करने वाले जातकों की जन्म पत्रिकाओं का विवेचन करेंगे –

पत्रिका क्रमांक-1 एक पुस्तैनी ट्रांसपोर्ट व्यवसाय करने वाले जातक की है। पत्रिका में वाहन कारक उच्चाभिलाषी शुक्र लाभेश होकर पराक्रम भाव में बैठकर भाग्य भाव को दृष्टि द्वारा प्रभावित कर रहा है। द्वितीय यांत्रिक कारक मंगल वाहन कारक शुक्र की राशि तुला में लाभ भाव में होकर व्यापार कारक धनभाव में बैठे कर्मेश बुध को चैथी दृष्टि से प्रभावित कर रहा है।

1 लग्नेश व जनता भाव के स्वामी गुरू कर्मभाव में बैठकर जनता कारक धनेश शनि व राहु की युक्ति से परस्पर दृष्टि सम्बंध कर अच्छी स्थिति में है। लग्नेश गुरू की पंचम (5वीं) दृष्टि कर्मेश बुध और धन भाव में होकर दोनों को बल प्रदान कर रही है। भाग्येश सूर्य मित्र लग्न में बैठकर मनकारक चन्द्रमा के साथ परस्पर दृष्टि सम्बंध बना रहा है। नवांश में स्वनवांश के जनता कारक धनेश शनि के साथ कर्मेश व नवांश लग्न का स्वामी व्यापार कारक बुध बैठकर राहु की दृष्टि से प्रभावित है। वाहन कारक शुक्र वृश्चिक नवांश में होकर जनता कारक शनि व लग्नेश गुरू की दृष्टि से प्रभावित है। शुक्र यांत्रिक कारक मंगल के नक्षत्र में तथा कर्मेश बुध, भाग्येश सूर्य के नक्षत्र में होने आदि के कारणों से ही बने, सभी तरह से वाहन से सम्बंधित व्यवसाय के ग्रहयोगों से ही जातक जनता के आवागमन से जुड़े यातायात व्यवसाय से लाभ व यश अर्जित कर रहा है।

विवेचन कुंडली क्रमांक-2 यह एक उच्च स्तर के जनता के आवागमन से जुड़े यातायात से सम्बंधित व्यवसाय करने वाले धनाढ्य व्यवसायी की है। पत्रिका में वाहन कारक शुक्र लाभेश होकर व्यवसाय कारक कर्मेश बुध के साथ युति कर स्वगृही होकर बली है। यांत्रिक कारक मंगल भाग्येश सूर्य के साथ केन्द्र में युति, कर राहु जैसे ग्रह की परस्पर दृष्टि सम्बंध से प्रभावित होकर बैठा है। जनता भाव 04 का स्वामी लग्नेश गुरू उच्च का होकर गजकेसरी योग बनाते हुये जनता कारक धनेश शनि की दृष्टि से प्रभावित है उधर कर्मभाव में मंगल की चतुर्थ दृष्टि कर्मभाव को बल प्रदान कर रहा है। जनता कारक उच्च का शनि लाभ भाव में बैठकर लग्न और लग्न में बैठे प्रेरक राहु को दृष्टि द्वारा बल प्रदान कर रहा है। चन्द्र पत्रिका में लग्न में गजकेसरी योग है एवं वाहन कारक उच्च का शनि और प्रेरक राहु दृष्टि देकर बल प्रदान कर रहे हैं। कर्मेश मंगल धनेश सूर्य के साथ होकर राहु से परस्पर दृष्टि सम्बंध कर रहे हैं। नवांश में शुक्र व्यापार कारक बुध की राशि नवांश में होकर जनता कारक शनि की दृष्टि से प्रभावित होते हुये लग्न के भाग्येश एवं नवांश भाग्य भाव को दृष्टि द्वारा प्रभावित कर रहा है। पुनः नवांश में गजकेसरी योग निर्माण होकर व्यापार, कारक कर्मेश बुध इसी क्षेत्र के साथ है। जिसके कारण ही जातक जनता से सम्बंधित यातायात के व्यवसाय में यश धन एवं ख्याति अर्जित कर रहा है।

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नवरात्रि में कन्या पूजन

नवरात्रि में अवश्य करें, कुमारी पूजन:-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Best Astrologer in Delhi)

नवरात्रि पर्व वर्ष में दो बार आता है। 1. ‘चैत्र नवरात्रि’ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक, तथा 2. ‘आश्विन नवरात्रि’ आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक। चैत्र नवरात्र के दिन से ही नया विक्रमी संवत आरम्भ होता है, और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नक्षत्रों की गणना आश्विन नक्षत्र से आरम्भ होती है। इस आधार पर आश्विन मास ज्योतिषीय वर्ष का प्रथम मास माना जाता है। इस प्रकार दोनों नवरात्र पर्वों के साथ नये शुभारम्भ की भावना जुड़ी हुई है। यह दोनो नवरात्र ऋतुओं के संधिकाल पर पड़ते हैं। संधिकाल की उपासना की दृष्टि से भी इन्हें सर्वाधिक महत्व दिया गया है। इस प्रकार ऋतु-संधिकाल के नौ-नौ दिन दोनों नवरात्रों में विशिष्ट रूप से कुमारी पूजा व साधना अनुष्ठान के लिये महत्वपूर्ण माने गये हैं। नवरात्र पर्व के साथ दुर्गावतरण की कथा तथा कुमारी-पूजा का विधान जुड़ा हुआ है।

कन्या पूजन क्यों आवश्यक :-

आज के युग (कलयुग) की भयावह पारिवारिक, आर्थिक, मानसिक अथवा सामाजिक समस्या से मुक्ति के लिये तथा शक्ति के उद्भव की कामना के लिये कुमारी-पूजा का विधान आवश्यक बताया गया है। इसलिये शास्त्रों में सभी जाति की बालिकाओं के पूजन का महत्व बताया गया है। अतः कुमारी-पूजन में जाति-भेद का विचार करना उचित नहीं है। जाति-भेद करने से मनुष्य नरक से छुटकारा नहीं पाता। जैसे संशय में पड़ा हुआ मंत्र साधक अवश्य पातकी होता है। इसलिये साधक को चाहिये कि वे देवी आज्ञा से नवरात्रों में सभी जाति की बालिकाओं का पूजन करें, क्योंकि कुमारी सर्वविद्या स्वरूपिणी है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

वर्ष के दोनो मुख्य नवरात्रों में वस्त्र, आभूषण और भोजन आदि से कुमारी महापूजा करके मन्द भाग्य वाला मनुष्य भी सर्वत्र विजय और मांगल्य प्राप्त करता है। कलियुग में नवरात्रों में की जाने वाली कन्या पूजा ही समृद्धि हेतु सबसे बड़ी उपासना और सबसे उत्तम तपस्या है। भाग्यवान मनुष्य, नवरात्रों में कुमारी-पूजन से कोटि गुना फल प्राप्त करता है। कुमारी-पूजा से मनुष्य सम्मान, लक्ष्मी, धन, पृथ्वी, श्री सरस्वती और महान् तेज को सरलता पूर्वक प्राप्त कर लेता है। उसके ऊपर दसों महाविद्याएें और देवगण प्रसन्न होते हैं- इसमें कोई भी सन्देह नहीं। कुमारी-पूजन मात्र से मनुष्य त्रिभुवन को वश में कर सकता है, और उसे परम शान्ति मिलती है; इस प्रकार कुमारी-पूजन समस्त पुण्य-फलों को देने वाली है।

कठिनाइयों में कन्या-पूजन :-
महान् भय, दुर्भिक्ष आदि उत्पात, दुःस्वप्न, दुर्मृत्यु तथा अन्य जो भी दुःखदायी समय की आशंकाएं हैं तो, वे सभी कुमारी-पूजन से टल जाते हैं। प्रतिदिन क्रमानुसार विधि-विधान पूर्वक, कुमारी पूजन करना चाहिये। कुमारी साक्षात् योगिनी और श्रेष्ठ देवी हैं, विधियुक्त कुमारियों को भोजन कराना चाहिये। कुमारी को पाद्य, आर्घ्य, धूप, कुमकुम और सफ़ेद चंदन आदि अर्पण करके भक्ति-भाव से उनकी पूजा करें। जो मनुष्य इस प्रकार कन्याओं की पूजा करता है, पूजित हुई कुमारियां उसके विघ्न, भय और अत्यन्त उत्कृट शत्रुओं को नष्ट कर डालती हैं। पूजा करने वाले के ग्रह, रोग, भूत, बेताल और सर्पादि से होने वाले अनेक भय नष्ट हो जाते हैं। उस पर असुर, दुष्ट नाग, दुष्ट ग्रह, भूत, बेताल, गंधर्व, डाकिनी, यक्ष, राक्षस तथा अन्य सभी देवता, भूः भुवः, स्वः, भैरव गण, पृथ्वी आदि के सब भूत, चराचर ब्रह्माण्ड, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव-ये सभी प्रसन्न होते हैं।

कन्या की आयु :-

कुमारी पूजन हेतु कन्या की आयु विभिन्न ग्रन्थों के मतानुसार-
रुद्रयामलतंत्र के उत्तराखण्ड, छठे पटल में कुमारी पूजन के लिये कन्या की आयु के अनुसार उसे अलग-अलग देवियों का नाम व महत्व देते हुए कहा गया है कि- एक वर्ष की आयुवाली बालिका ‘सन्ध्या’ कहलाती है, दो वर्षवाली ‘सरस्वती’, तीन वर्ष वाली ‘त्रिधामूर्ति, चार वर्ष वाली ‘कालिका’, पाँच वर्ष की होने पर ‘सुभगा’, छः वर्ष की ‘उमा’, सात वर्ष की ‘मालिनी’, आठ वर्ष की ‘कुब्जा’, नौ वर्ष की ‘कालसन्दर्भा’, दसवें में ‘अपराजिता’, ग्यारहवें में ‘रुद्राणी’, बारहवें में ‘भैरवी’, तेरहवें में ‘महालक्ष्मी’, चैदह पूर्ण होने पर ‘पीठनायिका’, पन्द्रहवें में ‘क्षेत्रज्ञा’ और सोलहवें में ‘अम्बिका’ मानी जाती है।

बृहन्नीतंत्र आदि ग्रन्थों में उपर्युक्त नामों से कुछ विभिन्नता पायी जाती है। कुब्जिका-तंत्र के सातवें पटल में इसी विषय का इस प्रकार वर्णन है- पाँच वर्ष से लेकर बारह वर्ष की अवस्था तक की बालिका अपने स्वरूप को प्रकाशित करने वाली ‘कुमारी’ कहलाती है। छः वर्ष की अवस्था से आरंभ कर नवें तक की कुमारी साधकों का ‘अभीष्ट साधन’ करती है। आठ वर्ष से लेकर तेरह की अवस्था होने तक उसे ‘कुलजा’ समझें और उसका पूजन करें। दस वर्ष से शुरू कर जब तक वह सोलह वर्ष की हो, उसे युवती जानें और देवी की भाँति उसका चिन्तन करें।

विश्व सार तंत्र में कहा गया है कि- आठ वर्ष की बालिका ‘गौरी’, नौ वर्ष की ‘रोहिणी’ और दस वर्ष की कन्या ‘कन्या’ कहलाती है। इसके बाद वही ‘महामाया’ और ‘रजस्वला’ भी कहीं गयी हैं। बारहवें वर्ष से लेकर बीसवें तक वह सभी तंत्र ग्रन्थों में सुकुमारी कही गयी हैं।

मंत्रमहोदधि के अठारहवें तरंग में इस प्रकार वर्णन है- यजमान को चाहिये कि वे नवरात्रों में दस कन्याओं का पूजन करे। उनमें भी दो वर्ष की अवस्था से लेकर दस वर्ष तक की कुमारियों का ही पूजन करना चाहिये। जो दो वर्ष की उम्रवाली है वह ‘कुमारी’, तीन वर्ष की ‘त्रिमूर्ति’, चार वर्ष की ‘कल्याणी’, पाँच वर्ष की ‘रोहिणी’, छः वर्ष की ‘कालिका’, सात वर्ष की ‘चण्डिका’, आठ वर्ष की ‘शांभवी’, नौ वर्ष की ‘दुर्गा’ और दस वर्ष की कन्या ‘सुभद्रा’ कही गयी है। इनका मंत्रों द्वारा पूजन करना चाहिये। एक वर्ष वाली कन्या की पूजा से प्रसन्नता नहीं होगी, अतः उसका ग्रहण नहीं है, और ग्यारह वर्ष से ऊपर वाली कन्याओं का भी पूजा में ग्रहण वर्जित है।

कुमारी-पूजन का फल-

कुब्जिकातंत्र में वर्णन मिलता है कि- जो नवरात्रों में विधि-विधान सहित कुमारी-पूजन करता है, तथा कुमारी को अन्न, वस्त्र तथा जल अर्पण करता है उसका वह अन्न मेरु के समान और जल समुद्र के सदृश अक्षुण्ण तथा अनन्त होता है। अर्पण किये हुए वस्त्रों द्वारा वह करोड़ों-अरबों वर्षों तक शिवलोक में पूजित होता है। जो कुमारी के लिये पूजा के उपकरणों को देता है, उसके ऊपर देवगण प्रसन्न होकर उसी के पुत्र रूप से प्रकट होते हैं। कलिकाल आज के युग की देन भयावह पारिवारिक, आर्थिक, मानसिक अथवा सामाजिक समस्याओं से मुक्ति के लिये तथा शक्ति के उद्भव की कामना के लिये कुमारी-पूजा का विधान आवश्यक बताया गया है। अतः प्रत्येक देवी उपासक वर्ष के दोनो नवरात्र में कन्या पूजन अवश्य करें।

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गंडमूल नक्षत्र

गंडमूल नक्षत्र और गण्डमूल नक्षत्र का जातक पर प्रभाव :-

Dr.R.B.Dhawan

इस लेख में बताया गया है कि, जातक का जन्म यदि गण्डमूल नक्षत्र में हो तो, उस गंडमूल का जातक या जातक के परिजनों के जीवन पर क्या प्रभाव रहता है? और इसके उपाय क्या हैं :-

गंडमूलक नक्षत्रों के अंतर्गत- 1. अश्विनी, 2. अश्लेषा, 3. मघा, 4. ज्येष्ठा, 5. मूल और 6. रेवती नक्षत्र को रखा गया है।

गंडमूल नक्षत्र :- (Gandmool Nakshtra) ज्योतिषीय गणना के अनुसार नक्षत्र 27 होते हैं, उनमे से छह- 1. अश्विनी, 2. अश्लेषा, 3. मघा, 4. ज्येष्ठा, 5. मूल और 6. रेवती नक्षत्र की गणना गंडमूलक नक्षत्रों में जाती है। राशि और नक्षत्र की समाप्ति जब एक ही स्थान पर होती है, तब यह स्थिति गण्ड या गंडमूल नक्षत्र कहलाती है। राशि और नक्षत्र की समाप्ति से ही नई राशि और नक्षत्र के प्रारम्भ होने को गंडमूल कहते हैं।

गंडमूल नक्षत्र के समय जन्म लेने वाले जातक स्वयं तथा अपने माता-पिता, मामा आदि के लिए कष्ट सूचक होते हैं। यही कारण है कि घर के लोगों को जैसे ही यह पता चलता है कि बालक मूल में हुआ है, वैसे ही वे चिंतिंत हो जाते हैं और नकारात्मक विचारों से ग्रसित भी हो जाते हैं, परिणाम यह कि इसका प्रभाव बच्चे के ऊपर पड़ना आरम्भ हो जाता है, चुंकि बच्चा अपने जन्म के बारह वर्ष तक अपने माता-पिता के कर्मो से प्रभावित होता है। ऐसी स्थिति में माता-पिता के नकारात्मक विचारों का परिणाम यह होता है कि, परिवार कष्टमय जीवन व्यतीत करने लगता है। इसलिए यदि परिवार में कोई बच्चा मूल में जन्म ले लिया है तो, घबराने की आवश्यकता नहीं, और न ही नकारात्मक विचार लायें। शास्त्र में निर्धारित उपाय करायें परिवार के लिए और बच्चे के लिए यह ही शुभ होगा।

गण्डमूल नक्षत्र में जन्म लेने वाला बालक शुभ प्रभाव में है तो वह अवश्य सामान्य बालक से कुछ अलग विशेष विचारों वाला होता है, यदि उसे सामाजिक तथा पारिवारिक बंधन से मुक्त कर दिया जाए तो, ऐसा बालक जिस भी क्षेत्र में जायेगा, अपनी एक अलग पहचान बनायेगा। ऐसे बालक तेजस्वी, यशस्वी, और कला अन्वेषी होते हैं। यह इसके अच्छे प्रभाव भी हैं। अगर वह अशुभ प्रभाव में है तो, इन्हीं नक्षत्रों में जन्मा बालक क्रोधी, रोगी, र्इष्यावान, लम्पट होगा। इस अशुभता को दूर करने के लिए गण्डमूल दोष की विधिवत शांति करा लेना चाहिए।

गण्डमूल नक्षत्र :-

जैसे कि राशि और नक्षत्र के एक ही स्थान पर उदय और मिलन के आधार पर गण्डमूल नक्षत्रों का निर्माण बताया गया है। इसके निर्माण में कुल छह 6 स्थितियां बनती हैं। इसमें से तीन नक्षत्र गण्ड के होते हैं, और तीन मूल के होते हैं।

कर्क राशि तथा आश्लेषा नक्षत्र की समाप्ति साथ-साथ होती है, वही सिंह राशि का समापन और मघा राशि का उदय एक साथ होता है। इसी लिए अश्लेषा को गण्ड संज्ञक और मघा को मूल संज्ञक नक्षत्र कहा जाता है।

इसी प्रकार वृश्चिक राशि और ज्येष्ठा नक्षत्र की समाप्ति एक साथ होती है, तथा धनु राशि और मूल नक्षत्र का आरम्भ यहीं से होता है। इसलिए इस स्थिति को ज्येष्ठा गण्ड और ‘मूल’ मूल नक्षत्र कहा जाता है।

मीन राशि और रेवती नक्षत्र एक साथ समाप्त होते हैं। तथा मेष राशि व अश्विनी नक्षत्र की शुरुआत एक साथ होती है। इसलिए इस स्थिति को रेवती गण्ड और अश्विनी मूल नक्षत्र कहा जाता है।

ऊपर कहे गए तीन गण्ड नक्षत्र अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती का स्वामी ग्रह बुध और तीन नक्षत्र मघा, मूल तथा अश्विनि का स्वामी केतु ग्रह है। जन्म दिन से सत्ताइसवें दिन जन्म नक्षत्र की पुनः आवृति होती है, उस समय मूल और गण्ड नक्षत्रों के अशुभ फल की निवृति और शुभ फल की प्राप्ति के लिए गण्डमूल का उपाय कराया जाता है।

मूल शांति के लिए गण्डवास का महत्त्व :-

मूल शांति के समय सर्वप्रथम गण्डवास देखना आवश्यक है कि गण्ड का वास जन्म काल में कहाँ है?

मुहूर्तचिंतामणि के अनुसार —

स्वर्गेशुचि प्रौष्ठपदेशमाघे भूमौ नभः कार्तिकचैत्रपौषे।

मूलं हि अधस्तास्तु तपस्यमार्गवैशाख शुक्रेष्वशुभं च तत्र।।

अर्थात्:- आषाढ़, भाद्रपद, आश्विन व माघ में गण्ड का वास स्वर्ग लोक में, श्रावण, कार्तिक, चैत्र व पौष मास में गण्डवास मृत्युलोक अथवा पृथ्वी पर, तथा ज्येष्ठ, वैशाख, मार्गशीर्ष व फाल्गुन मास में पाताल अर्थात नरक लोक में गण्ड का वास होता है। जन्म काल में मूल का जिस लोक में वास होता है, उसी लोक का अनिष्ट करता है अतः मृत्यलोक अर्थात धरातल पर वास होने की स्थिति में ही अनिष्ट है।

गण्डमूल नक्षत्र का चरण के अनुसार प्रभाव :-

मुलामघाश्विचरणे प्रथमे पितुश्च पौष्णेन्द्रयोश्च फणिनस्तु चतुर्थपादे।

मातुः पितुः सववपुषो स्ववपुष: अपि करोति नाशं जातो यथा निशि दिनेप्यथ सन्धयोश्च।।

मूल, मघा और अश्विनी के प्रथम चरण का जातक पिता के लिए, रेवती के चौथे चरण और रात्रि में जन्मा जातक माता के लिए, ज्येष्ठ के चतुर्थ चरण और दिन का जन्म जातक पिता तथा अश्लेषा के चौथे चरण संधिकाल (दिन से रात, व रात से दिन की संधि) में जन्म हो तो, स्वयं के लिए जातक अरिष्ट कारक होता है।

अश्विनी नक्षत्र का प्रभाव :-

मेष राशि में अश्विनी नक्षत्र शून्य अंश से प्रारम्भ होकर 13:20 अंश तक तक रहता है, जन्म के समय यदि चंद्रमा मेष राशि में शून्य से 2 : 30 अंशों के मध्य अर्थात प्रथम चरण में ही स्थित हो तो, अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर जातक को अपने जीवन काल में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस नक्षत्र में जन्म लेने पर बच्चा पिता के लिए कष्टकारी होता है, परन्तु हमेशा एेसा नहीं होता।

अश्विनी नक्षत्र :-

प्रथम चरण – पिता को शारीरिक कष्ट एवं हानि।

दूसरा चरण — परिवार में सुख शांति ।

तीसरा चरण — सरकार से लाभ तथा मंत्री पद का लाभ ।

चतुर्थ चरण — परिवार एवं जातक को राज सम्मान तथा ख्याति।

आश्लेषा नक्षत्र का प्रभाव :-

जब चंद्रमा जन्म के समय कर्क राशि में 16 अंश और 40 कला से 30 अंश के मध्य स्थित होता है, तब आश्लेषा नक्षत्र कहलाता है। परन्तु जब चन्द्रमा कर्क के 26 अंश 40 कला से 30 अंश के मध्य हो, अर्थात आश्लेषा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में हो तो, जातक गण्डमूल में उत्पन्न कहलाता है।

आश्लेषा नक्षत्र :-

प्रथम चरण — शांति और सुख मिलेगा।

दूसरा चरण – धन नाश, बहन-भाईयों को कष्ट।

तृतीय चरण — माता को कष्ट।

चतुर्थ चरण — पिता को कष्ट, आर्थिक हानि।

मघा नक्षत्र का प्रभाव :-

सिंह राशि के आरम्भ के साथ ही मघा नक्षत्र शुरु होता है। परन्तु सिंह राशि में जब चंद्रमा शून्य से लेकर दो अंश और बीस कला अर्थात प्रथम चरण में रहता है, तब ही गंडमूल नक्षत्र माना गया है।

मघा नक्षत्र :-

प्रथम चरण — माता को कष्ट होता है।

दूसरा चरण – पिता को कोई कष्ट या हानि होता है।

तीसरा चरण – जातक सुखी जीवन व्यतीत करता है।

चौथा चरण – जातक को धन विद्या का लाभ, कार्य क्षेत्र में स्थायित्व प्राप्त होता है।

ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रभाव :-

जब चंद्रमा जन्म के समय वृश्चिक राशि में 16 अंश और 40 कला से 30 अंश के मध्य स्थित होता है, तब ज्येष्ठा नक्षत्र कहलाता है। परन्तु जब चन्द्रमा वृश्चिक में 26 अंश और 40 कला अर्थात ज्येष्ठा के चतुर्थ चरण में प्रवेश कर चुका हो, तो जातक गण्डमूल में उत्पन्न कहलाता है।

ज्येष्ठा नक्षत्र :-

प्रथम चरण – बड़े भाई-बहनों को कष्ट।

दूसरा चरण – छोटे भाई – बहनों के लिए अशुभ।

तीसरा चरण – माता को कष्ट।

चतुर्थ चरण – स्वयं का नाश।

मूल नक्षत्र का प्रभाव :-

जब चंद्रमा धनु राशि में शून्य से तेरह अंश और बीस मिनट के मध्य स्थित होता है तब यह मूल नक्षत्र में आता है परन्तु जव चन्द्रमा शून्य अंश से तीस मिनट अर्थात प्रथम चरण में हो तो गण्ड मूल में उत्पन्न जातक कहलाता है।

मूल नक्षत्र :-

प्रथम चरण – पिता के जीवन के लिए घातक।

दूसरा चरण – माता के लिए अशुभ, को कष्ट।

तीसरा चरण – धन नाश।

चतुर्थ चरण – जातक सुखी तथा समृद्ध जीवन व्यतीत करता है।

रेवती नक्षत्र का प्रभाव :-

मीन राशि में 16 अंश 40 कला से 30 अंश तक रेवती नक्षत्र होता है। जिस समय चंद्रमा मीन राशि में 26 अंश और 40 कला से 30 अंश के मध्य रहता है, तो गंडमूल नक्षत्र वाला जातक कहलाता है।

रेवती नक्षत्र :-

प्रथम चरण – जीवन सुख और आराम में व्यतीत होगा।

दूसरा चरण – मेहनत एवं बुद्धि से नौकरी में उच्च पद प्राप्त।

तीसरा चरण – धन-संपत्ति का सुख के साथ धन हानि भी।

चतुर्थ चरण — स्वयं के लिए कष्टकारी होता है।

गण्डमूल नक्षत्र शान्ति के उपाय :-

यदि जातक का जन्म गंडमूल नक्षत्र में हुआ है तो, उसके पिता को चाहिए कि अपने बच्चे का चेहरा न देखे और तुरंत पिता कि जेब में फिटकड़ी का टुकड़ा रखवा देना चाहिए। तत्पश्चात् 27 दिन तक प्रतिदिन 27 मूली पत्तों वाली बच्चे के सिर कि तरफ रख देना चाहिए, और पुनः उसे दुसरे दिन चलते पानी में बहा देना चाहिए। यह क्रिया 27 दिनों तक नियमित करना चाहिए। इसके बाद 27 वें दिन विधिवत पूजा करके बच्चे को देखना चाहिए। जिस नक्षत्र में जन्म हुआ है, उससे सम्बन्धित देवता तथा ग्रह की पूजा करनी चाहिए। इससे नक्षत्रों के नकारात्मक प्रभाव में कमी आती है। अश्विनी, मघा, मूल नक्षत्र में जन्में जातकों को गणेशजी की पूजा अर्चना करने से लाभ मिलता है। आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र में जन्में जातकों के लिए बुध ग्रह की अराधना करना चाहिए। तथा बुधवार के दिन हरी वस्तुओं जैसे हरा धनिया, हरी सब्जी, हरा घास इत्यादि का दान करना चाहिए। मूल में जन्में बच्चे के जन्म के ठीक 27वें दिन गंडमूल शांति पूजा करवाई जानी चाहिए, इसके अलावा ब्राह्मणों को दान, दक्षिणा देने और उन्हें भोजन करवाना चाहिए। इसके लिए सम्बंधित नक्षत्र का मन्त्र जाप, 27 कुओं का जल, 27 तीर्थ स्थलों के कंकण, समुद्र का फेन, 27 छिद्र का घड़ा, 27 पेड़ के पत्ते, 07 निर्धारित अनाज 07 खेडो की मृतिका, आदि दिव्य जड़ी-बूटी औषधियों के द्वारा शांति प्रक्रिया सम्पन्न कराना चाहिए। यह क्रिया 27वें दिन तक जब तक वह नक्षत्र हो 27 माला का जप, हवन तर्पण मार्जन कर 27 लोगो को भोजन कराना चाहिए। पुनः दक्षिणा देकर अपने बालक का चेहरा देखना चाहिए।

ज्योतिष के ग्रंथों में अनेक स्थानों पर गंडांत अर्थात गण्डमूल नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है, रेवती नक्षत्र की अंतिम चार घड़ियाँ और अश्वनी नक्षत्र की पहली चार घड़ियाँ गंडांत कही जाती हैं, ज्योतिष शास्त्र में गण्डमूल नक्षत्र के विषय में विस्तार पूर्वक बताया गया है, जातक पारिजात, बृहत्पराशर होरा शास्त्र ,जातकभरणं इत्यादि सभी प्राचीन ग्रंथों में गण्डमूल नक्षत्रों तथा उनके प्रभावों का वर्णन दिया गया है, गण्डमूल नक्षत्रों के सभी चरणों का फल जातक पर क्या विशेष पड़ता है देखें :-

अश्विनी :-

केतु के पहले गण्डमूल नक्षत्र को अश्विनी नक्षत्र कहा जाता है, अश्विनी नक्षत्र मेष राशि में शून्य अंश से प्रारम्भ होकर तेरह अंश बीस कला तक रहता है। जन्म के समय यदि चंद्रमा इन अंशों के मध्य स्थित हो तो, गण्डमूल नक्षत्र में जन्म का समय माना जाता है, अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर जातक को जीवन में अनेक कठिन परिस्थितियों एवं परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, पूर्व जन्म के कर्मों का फल इस नक्षत्र चरण में जन्म लेने के रूप में तुरंत सामने आता है, इस नक्षत्र में जन्म होने पर वह बच्चा पिता के लिए थोड़ा कष्टकारी हो सकता है, लेकिन इस कष्ट को किसी भी नकारात्मकता के साथ नहीं जोड़ा जा सकता, इसके लिए जन्मकुंडली के बहुत से योगों को देखना आवश्यक है।

अश्विनी नक्षत्र के द्वितीय चरण में जन्म लेने वाले बच्चे को जीवन में सुख व आराम प्राप्त होते हैं, अश्विनी नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक को जीवन के किसी भी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त होने के अवसर प्राप्त होते हैं, जातक मित्रों से लाभ प्राप्त करता है, घूमने-फिरने में उसकी रूचि अधिक होती है, किसी एक स्थान पर टिके रहना उसे अच्छा नहीं लगता।

अश्विनी नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने पर जातक को राज सम्मान की प्राप्ति अथवा सरकार की ओर उपहार आदि की प्राप्ति होती है, इसके साथ ही कभी कभी जातक को स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों का सामना करना पडता है।

आश्लेषा :-

कर्क राशि में 16 अंश और 40 कला से 30 अंश तक आश्लेषा नक्षत्र रहता है, जब चंद्रमा जन्म के समय कर्क राशि के इन अंशों के मध्य स्थित होता है, तो यह गंडमूल नक्षत्र कहलाता है।

आश्लेषा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर किसी तरह का कोई विशेष अशुभ नहीं होता, परंतु धन की हानि उठानी पड़ती है, यदि इसकी शांति पूजा हो तो, यह शुभ फल प्रदान करता है।

आश्लेषा नक्षत्र के द्वितीय चरण में जन्म होने पर बच्चा अपने बहन-भाईयों के लिए कष्टकारी होता है, या जातक अपनी संपत्ति को नष्ट कर लेता है।

आश्लेषा नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म हुआ है तो, माता तथा पिता दोनों को ही कष्ट सहना पड़ता है।

आश्लेषा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म हुआ है तो, पिता को आर्थिक हानि तथा शारीरिक कष्ट सहना पड़ता है।

मघा :-

सिंह राशि के शून्य अंश के साथ मघा नक्षत्र का आरम्भ होता है, सिंह राशि में जब चंद्रमा शून्य से लेकर 13 अंश और 20 कला तक रहता है, तब वह गंडमूल नक्षत्र में कहलाता है।

मघा नक्षत्र के प्रथम चरण में यदि किसी बच्चे का जन्म होता है तो, माता को कष्ट होने की संभावना बनी रहती है। इस नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म लेने से पिता को कोई कष्ट या हानि का सामना करना पड़ सकता है।

मघा नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म लेने पर बच्चे को जीवन में सुखों की प्राप्ति होती है। यदि बच्चे का जन्म मघा नक्षत्र के चौथे चरण में होता है, तब उसे कार्य क्षेत्र में स्थायित्व प्राप्त होता है, इस नक्षत्र में जन्म होने के कारण बच्चा उच्च शिक्षा भी ग्रहण करने से पीछे नहीं रहता।

ज्येष्ठा :-

वृश्चिक राशि में 16 अंश 40 कला से 30 अंश तक ज्येष्ठा नक्षत्र होता है। इस समय जब चंद्रमा वृश्चिक राशि में उपरोक्त अंशों के मध्य स्थित हो तो, गंडमूल नक्षत्र होता है।

भारतीय ज्योतिष अनुसार ज्येष्ठा नक्षत्र को अशुभ नक्षत्रों की श्रेणी में रखा गया है, ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म लेने से बच्चे के बड़े भाई-बहनों को कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है।

ज्ये‌ष्ठा के द्वितीय चरण में जन्म होने पर छोटे भाई-बहनों के लिए अशुभ देखा गया है। उन्हें शारीरिक अथवा अन्य कई प्रकार के कष्ट होते हैं।

ज्ये‌ष्ठा के तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक की माता को स्वास्थ्य की दृष्टि से कष्ट बना रहता है।

इस नक्षत्र चरण में जन्म लेने से जातक स्वयं के भाग्य के लिए अच्छा नहीं रहता, उसे जीवन में कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। ज्येष्ठा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाले व्यक्तियों को जीवन में कठिन परिस्थितियों व जटिलताओं का सामना करना पडता है। मैंने देखा है इस चरण में जन्म होने के कारण जातक को जीवनभर दु:ख और पीड़ा का सामना ही करना पड़ता है।

मूल :-

जब चंद्रमा धनु राशि में शून्य से 13 अंश और 20 कला के मध्य स्थित होता है, तब यह गंडमूल नक्षत्र में आता है। बच्चे का जन्म मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में होने से पिता के जीवन में कई प्रकार के अच्छे-बुरे परिवर्तन होने लगते हैं।

मूल नक्षत्र के द्वितीय चरण में बच्चे का जन्म ज्योतिष में माता के लिए अशुभ माना गया है, इस चरण में बच्चे का जन्म होने से माता का जीवन कष्टपूर्ण रहने की संभावना बनती है।

मूल नक्षत्र के तीसरे चरण में हुआ हो, तब उसकी संपत्ति के नष्ट होने की संभावना बनती है, इस चरण में जन्म लेने वाले जातक का संपत्ति से वंचित रहना देखा जा सकता है।

मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने पर जातक सुखी तथा समृद्ध रहता है, परंतु यदि शांति कराई जाये तब ही शुभ फलों की प्राप्ति होती है। इस चरण में जन्म लेने पर बच्चे को अपने जीवन में एक बार भारी हानि उठानी पड़ती है।

रेवती :-

मीन राशि में 16 अंश 40 कला से 30 अंश तक रेवती नक्षत्र होता है। जिस समय चंद्रमा मीन राशि में इन अंशों से गुजर रहा हो तब यह समय गंडमूल नक्षत्र का होता है।

यदि जन्म रेवती नक्षत्र के प्रथम चरण में हुआ है तो, जीवन सुख और आराम से व्यतीत होता है। जातक आर्थिक रूप से सम्पन्न और सुखी रहता है।

रेवती नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म लेने वाले जातक अपनी मेहनत, बुद्धि एवं लगन से नौकरी में उच्च पद प्राप्त करते हैं, या व्यवसायिक रूप से कामयाब हो जाते हैं, परंतु फिर भी जातक को बड़े होकर कुछ भूमि की हानि होती है।

रेवती नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक को धन-संपत्ति का सुख तो प्राप्त होता है, परंतु साथ- साथ धन हानि की भी संभावना बनी रहती है।

रेवती नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाला जातक स्वयं के लिए कष्टकारी साबित होता है। परंतु मतातन्तर से इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति अपने माता-पिता दोनों के लिए ही कष्टकारी सिद्ध होते हैं। उनका जीवन काफी संघर्ष से गुजरता है।

गंडमूल नक्षत्रों का जीवन पर प्रभाव :-

गंडमूल दोष :- अपनी प्रचलित परिभाषा के अनुसार गंडमूल दोष लगभग हर चौथी-पांचवी कुंडली में उपस्थित पाया जाता है, तथा ज्योतिषियों की धारणा के अनुसार यह दोष कुंडली वाले जातक के जीवन में अड़चनें पैदा करने में सक्षम होता है।

गंडमूल दोष होता क्या है, किसी कुंडली में यह दोष बनता कैसे है, तथा इसके दुष्प्रभाव क्या हो सकते हैं? गंडमूल नक्षत्रों का विचार जन्म के समय की ग्रह स्थिति को देखकर किया जाता है। जैसा की पहले लिखा गया है- अश्वनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती गंडमूल नक्षत्र कहलाते हैं। इन नक्षत्रों में जन्मे बालक का 27 दिन तक उसके पिता द्वारा मुंह देखना वर्जित होता है। जन्म के ठीक 27वें दिन उसी नक्षत्र में इसकी मूल शांति करवाना अति आवश्यक होता है। ऐसा ग्रंथों में वर्णित है। सभी नक्षत्रों के चार-चार चरण होते हैं इन्हीं प्रत्येक चरणों के अनुसार माता, पिता, भाई, बहन या अपने कुल में किसी पर भी नक्षत्र अपना प्रभाव दिखाते हैं। प्रायः इन नक्षत्रों में जन्मे बालक-बालिका स्वयं के लिए भी कष्टप्रद हो सकते हैं।
अगर किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली का चन्द्रमा, रेवती, अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा तथा मूल नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में स्थित हो तो, कुंडली धारक का जन्म गंडमूल में हुआ माना जाता है, अर्थात उसकी कुंडली में गंडमूल दोष की उपस्थिति मानी जाती है। 27 नक्षत्रों में से उपर बताए गए 6 नक्षत्रों में चन्द्रमा के स्थित होने से यह दोष माना जाता है, जिसका अर्थ यह निकलता है कि यह दोष लगभग हर चौथी-पांचवी कुंडली में बन जाता है, किन्तु यह धारणा ठीक नहीं है। यह दोष हर चौथी-पांचवी कुंडली में नहीं बल्कि हर 18 वीं कुंडली में ही बनता है। आइए अब इस दोष की प्रचलित परिभाषा तथा इसके विशलेषण से निकली परिभाषा की आपस में तुलना करें। प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह दोष चन्द्रमा के उपर बताए गए 6 नक्षत्रों में से किसी भी एक चरण में स्थित होने से बन जाता है। जबकि वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार यह दोष चन्द्रमा के इन 6 नक्षत्रों के किसी एक नक्षत्र के किसी एक विशेष चरण में होने से ही बनता है। न कि उस नक्षत्र के चारों चरणो में से किसी भी चरण में स्थित होने से।

जैसे- चन्द्रमा रेवती नक्षत्र के चौथे चरण में स्थित हों या अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण में स्थित हो।

जैसे- चन्द्रमा अश्लेषा नक्षत्र के चौथे चरण में स्थित हो या मघा नक्षत्र के पहले चरण में स्थित हो।

जैसे- चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र के चौथे चरण में स्थित हों या मूल नक्षत्र के पहले चरण में स्थित हो।

इस दोष से जुड़े बुरे प्रभावों के बारे में भी जान लीजिए- गंड मूल दोष भिन्न-भिन्न कुंडलियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के बुरे प्रभाव देता है, जिन्हें ठीक से जानने के लिए यह जानना आवश्यक होगा कि कुंडली में चन्द्रमा इन 6 में से किस नक्षत्र में स्थित हैं, और कुंडली के किस भाव में स्थित है? कुंडली के दूसरे सकारात्मक या नकारात्मक ग्रहों का चन्द्रमा पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ रहा है, चन्द्रमा जातक की कुंडली में किस भाव का स्वामी है, तथा ऐसे ही कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य। इस प्रकार से अगर यह दोष कुछ कुंडलियों में बनता भी है तो, भी इसके बुरे प्रभाव अलग-अलग कुंडलियों में अलग-अलग तरह के होते हैं। तथा अन्य दोषों की तरह इस दोष के बुरे प्रभावों को भी किसी विशेष परिभाषा के बंधन में नहीं बांधना चाहिए। बल्कि इस दोष के कारण होने वाले बुरे प्रभावों को उस कुंडली के गहन अध्ययन के बाद ही निश्चित करना चाहिए।

मूल नक्षत्रों की शांति व उपाय :-
मूल नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों के सुखमय भविष्य के लिए इन नक्षत्रों की शांति करवानी आवश्यक मानी गई है, मूल शांति कराने से इनके कारण लगने वाले दोष शांत हो जाते हैं, अन्यथा इनके अनेक प्रभाव लक्षित होते है, जो इस प्रकार से प्रभावित कर सकते हैं :- इस दोष के निवारण का सबसे उत्तम उपाय इस दोष के निवारण के लिए पूजा करवाना ही है। यह पूजा सामान्य पूजा की तरह न होकर एक तकनीकी पूजा होती है।
जन्म नक्षत्र के अनुसार देवता का पूजन करने से अशुभ फलों में कमी आती है, तथा शुभ फलों की प्राप्ति में सहायता प्राप्त होती है, यदि जातक अश्विनी, मघा, मूल नक्षत्र में जन्मा है तो, आपको गणेश जी का पूजन करना चाहिए। इस नक्षत्र में जन्मे जातक को माह के किसी भी एक गुरुवार या बुधवार को हरे रंग के वस्त्र, लहसुनियां आदि में से किसी भी एक वस्तु का दान करना फलदायी रहता है, मंदिर में झंडा फहराने से भी लाभ मिलता है, यदि जातक अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र में जन्मा है तो, उसके लिये बुध ग्रह का पूजन करना फलदायी रहता है। इस नक्षत्र में जन्में जातक को माह के किसी भी एक बुधवार को हरी सब्जी, हरा धनिया, पन्ना, कांसे के बर्तन, आंवला आदि वस्तुओं में से किसी भी एक वस्तु का दान करना शुभकारी होता है।

मूल शांति पूजा :-
उपरोक्त उपायों के अतिरिक्त जो उपाय सबसे अधिक प्रचलन में है, उसके अनुसार यदि बच्चा गण्डमूल नक्षत्र में जन्मा है, तो उसके जन्म से ठीक 27वें दिन उसी जन्म नक्षत्र में चंद्रमा के आने पर गंडमूल शांति पूजा करानी चाहिए। ज्येष्ठा मूल या अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक के लिए उक्त नक्षत्रों से संबंधित मंत्रों का जाप करवाना चाहिये, तथा मूल नक्षत्र शान्ति पूजन करना चाहिए, ब्राह्मणों को दान दक्षिणा एवं भोजन कराना चाहिए, यदि किसी कारणवश 27वें दिन यह पूजा नहीं कराई जा सकती, तब माह में जिस दिन चंद्रमा जन्म नक्षत्र में होता है, तब इसकी शांति कराई जा सकती है।

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ग्रह बाधा के संकेत

Dr.R.B.Dhawan :-

ग्रह बाधा होने से पूर्व यह संकेत मिलते हैं :-

ग्रह अपना शुभाशुभ प्रभाव गोचर एवं दशा-अन्तर्दशा-प्रत्यन्तर्दशा में देते हैं । जिस ग्रह की दशा के प्रभाव में हम होते हैं, उसकी स्थिति के अनुसार शुभाशुभ फल हमें मिलता है । जब भी कोई ग्रह अपना शुभ या अशुभ फल प्रबल रुप में देने वाला होता है, तो वह कुछ संकेत पहले से ही देने लगता है ।इनके उपाय करके बढ़ी समस्याओं से बचा जा सकता है | ऐसे ही कुछ पूर्व संकेतों का विवरण यहाँ दिया है –

1. सूर्य के अशुभ होने के पूर्व संकेत :-
सूर्य अशुभ फल देने वाला हो, तो घर में रोशनी देने वाली वस्तुएँ नष्ट होंगी या प्रकाश का स्रोत बंद होगा । जैसे – जलते हुए बल्ब का फ्यूज होना, तांबे की वस्तु खोना ।
किसी ऐसे स्थान पर स्थित रोशनदान का बन्द होना, जिससे सूर्योदय से दोपहर तक सूर्य का प्रकाश प्रवेश करता हो । ऐसे रोशनदान के बन्द होने के अनेक कारण हो सकते हैं ।
जैसे – अनजाने में उसमें कोई सामान भर देना या किसी पक्षी के घोंसला बना लेने के कारण उसका बन्द हो जाना आदि ।
सूर्य के कारकत्व से जुड़े विषयों के बारे में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है । सूर्य जन्म-कुण्डली में जिस भाव में होता है, उस भाव से जुड़े फलों की हानि करता है । यदि सूर्य पंचमेश, नवमेश हो तो पुत्र एवं पिता को कष्ट देता है । सूर्य लग्नेश हो, तो जातक को सिरदर्द, ज्वर एवं पित्त रोगों से पीड़ा मिलती है । मान-प्रतिष्ठा की हानि का सामना करना पड़ता है ।
किसी अधिकारी वर्ग से तनाव, राज्य-पक्ष से परेशानी ।
यदि न्यायालय में विवाद चल रहा हो, तो प्रतिकूल परिणाम ।
शरीर के जोड़ों में अकड़न तथा दर्द ।
किसी कारण से फसल का सूख जाना ।
व्यक्ति के मुँह में अक्सर थूक आने लगता है तथा उसे बार-बार थूकना पड़ता है ।
सिर किसी वस्तु से टकरा जाता है ।
तेज धूप में चलना या खड़े रहना पड़ता है ।

2. चन्द्र के अशुभ होने के पूर्व संकेत:-

जातक की कोई चाँदी की अंगुठी या अन्य आभूषण खो जाता है या जातक मोती पहने हो, तो खो जाता है ।
जातक के पास एकदम सफेद तथा सुन्दर वस्त्र हो वह अचानक फट जाता है या खो जाता है या उस पर कोई गहरा धब्बा लगने से उसकी शोभा चली जाती है ।
व्यक्ति के घर में पानी की टंकी लीक होने लगती है या नल आदि जल स्रोत के खराब होने पर वहाँ से पानी व्यर्थ बहने लगता है । पानी का घड़ा अचानक टूट जाता है ।
घर में कहीं न कहीं व्यर्थ जल एकत्रित हो जाता है तथा दुर्गन्ध देने लगता है ।

उक्त संकेतों से निम्नलिखित विषयों में अशुभ फल दे सकते हैं :-
माता को शारीरिक कष्ट हो सकता है या अन्य किसी प्रकार से परेशानी का सामना करना पड़ सकता है ।
नवजात कन्या संतान को किसी प्रकार से पीड़ा हो सकती है ।
मानसिक रुप से जातक बहुत परेशानी का अनुभव करता है ।
किसी महिला से वाद-विवाद हो सकता है ।
जल से जुड़े रोग एवं कफ रोगों से पीड़ा हो सकती है । जैसे – जलोदर, जुकाम, खाँसी, नजला, हेजा आदि ।
प्रेम-प्रसंग में भावनात्मक आघात लगता है ।
समाज में अपयश का सामना करना पड़ता है । मन में बहुत अशान्ति होती है ।
घर का पालतु पशु मर सकता है ।
घर में सफेद रंग वाली खाने-पीने की वस्तुओं की कमी हो जाती है या उनका नुकसान होता है । जैसे – दूध का उफन जाना ।
मानसिक रुप से असामान्य स्थिति हो जाती है ,

3. मंगल के अशुभ होने के पूर्व संकेत :-

भूमि का कोई भाग या सम्पत्ति का कोई भाग टूट-फूट जाता है।
घर के किसी कोने में या स्थान में आग लग जाती है । यह छोटे स्तर पर ही होती है ।
किसी लाल रंग की वस्तु या अन्य किसी प्रकार से मंगल के कारकत्त्व वाली वस्तु खो जाती है या नष्ट हो जाती है ।
घर के किसी भाग का या ईंट का टूट जाना ।
हवन की अग्नि का अचानक बन्द हो जाना ।
अग्नि जलाने के अनेक प्रयास करने पर भी अग्नि का प्रज्वलित न होना या अचानक जलती हुई अग्नि का बन्द हो जाना ।
वात-जन्य विकार अकारण ही शरीर में प्रकट होने लगना ।
किसी प्रकार से छोटी-मोटी दुर्घटना हो सकती है ।

4. बुध के अशुभ होने के पूर्व संकेत :-

व्यक्ति की विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है अर्थात् वह अच्छे-बुरे का निर्णय करने में असमर्थ रहता है ।
सूँघने की शक्ति कम हो जाती है ।
काम-भावना कम हो जाती है ।
त्वचा के संक्रमण रोग उत्पन्न होते हैं । पुस्तकें, परीक्षा ले कारण धन का अपव्यय होता है । शिक्षा में शिथिलता आती है ।

5. गुरु के अशुभ होने के पूर्व संकेत :-

अच्छे कार्य के बाद भी अपयश मिलता है ।
किसी भी प्रकार का आभूषण खो जाता है ।
व्यक्ति के द्वारा पूज्य व्यक्ति या धार्मिक क्रियाओं का अनजाने में ही अपमान हो जाता है या कोई धर्म ग्रन्थ नष्ट होता है ।
सिर के बाल कम होने लगते हैं अर्थात् व्यक्ति गंजा होने लगता है ।
दिया हुआ वचन पूरा नहीं होता है तथा असत्य बोलना पड़ता है।

6. शुक्र के अशुभ होने के पूर्व संकेत :-

किसी प्रकार के त्वचा सम्बन्धी रोग जैसे – दाद, खुजली आदि उत्पन्न होते हैं ।
स्वप्नदोष, धातुक्षीणता आदि रोग प्रकट होने लगते हैं ।
कामुक विचार हो जाते हैं ।
किसी महिला से विवाद होता है ।
हाथ या पैर का अंगुठा सुन्न या निष्क्रिय होने लगता है ।

7. शनि के अशुभ होने के पूर्व संकेत :-

दिन में नींद सताने लगती है ।
अकस्मात् ही किसी अपाहिज या अत्यन्त निर्धन और गन्दे व्यक्ति से वाद-विवाद हो जाता है ।
मकान का कोई हिस्सा गिर जाता है ।
लोहे से चोट आदि का आघात लगता है ।
पालतू काला जानवर जैसे- काला कुत्ता, काली गाय, काली भैंस, काली बकरी या काला मुर्गा आदि मर जाता है ।
निम्न-स्तरीय कार्य करने वाले व्यक्ति से झगड़ा या तनाव होता है ।
व्यक्ति के हाथ से तेल फैल जाता है ।
व्यक्ति के दाढ़ी-मूँछ एवं बाल बड़े हो जाते हैं ।
कपड़ों पर कोई गन्दा पदार्थ गिरता है या धब्बा लगता है या साफ-सुथरे कपड़े पहनने की जगह गन्दे वस्त्र पहनने की स्थिति बनती है ।
अँधेरे, गन्दे एवं घुटन भरी जगह में जाने का अवसर मिलता है ।

8. राहु के अशुभ होने के पूर्व संकेत :-

मरा हुआ सर्प या छिपकली दिखाई देती है ।
धुएँ में जाने या उससे गुजरने का अवसर मिलता है या व्यक्ति के पास ऐसे अनेक लोग एकत्रित हो जाते हैं, जो कि निरन्तर धूम्रपान करते हैं ।
किसी नदी या पवित्र कुण्ड के समीप जाकर भी व्यक्ति स्नान नहीं करता।
पाला हुआ जानवर खो जाता है या मर जाता है ।
याददाश्त कमजोर होने लगती है ।
अकारण ही अनेक व्यक्ति आपके विरोध में खड़े होने लगते हैं ।
हाथ के नाखुन विकृत होने लगते हैं ।
मरे हुए पक्षी देखने को मिलते हैं ।
बँधी हुई रस्सी टूट जाती है । मार्ग भटकने की स्थिति भी सामने आती है । व्यक्ति से कोई आवश्यक चीज खो जाती है ।

केतु के अशुभ होने के पूर्व संकेत :-

मुँह से अनायास ही अपशब्द निकल जाते हैं ।
कोई मरणासन्न या पागल कुत्ता दिखायी देता है ।
घर में आकर कोई पक्षी प्राण-त्याग देता है ।
अचानक अच्छी या बुरी खबरें सुनने को मिलती है ।
हड्डियों से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है ।
पैर का नाखून टूटता या खराब होने लगता है ।
किसी स्थान पर गिरने एवं फिसलने की स्थिति बनती है ।
भ्रम होने के कारण व्यक्ति से हास्यास्पद गलतियाँ होती हैं ।

षोडश वर्ग

कुंडली में षोडश वर्ग का महत्व :-

Dr.R.B.Dhawan

षोडश अर्थात 16 वर्ग का फलित ज्योतिष में विशेष महत्व है, क्यों की कुंडली का सूक्ष्म अध्ययन करने में उनकी विशेष भूमिका है। आईये सबसे पहले शोडश वर्ग क्या है यह समझ लीजिए :- कुंडली का प्रथम भाव जन्म लग्न कहलाता है, यह भाव तथा सभी 12 भाव 360 अंश परिधि के होते हैं, 360 अंश के 12 भाग ही कुंडली के 12 भाव हैं। अत: कुंडली का कोई भी एक भाव 30 अंश परिधि का माना जाता है। इन 12 भावों में प्रथम भाव लग्न भाव कहलाता है। इस लग्न भाव के 30 अंशों को यदि 2 से भाग किया जाये तो प्रत्येक भाग 15-15 अंश का होगा इस डिवीजन की लग्न भाग को होरा लग्न कहते हैं, इसी प्रकार यदि इस 30 अंश के 3 भाग किये जायें तो प्रत्येक भाग 10 अंश का होगा, इसे द्रेष्कांण और इस के लग्न भाग को द्रेष्कांण लग्न कहते हैं। चार भाग किसे जायेंगे तो इसके लग्न को चतुर्थांश कहेंगे। इसी प्रकार 7 भाग करने पर ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌सप्तमांश लग्न, 9 भाग करने पर नवमांश लग्न, 10 भाग करने पर दशमांश लग्न, 12 भाग करने पर द्वादशांश लग्न, तथा 16, 20, 24 और 30 भाग करने पर क्रमशः षोडशांश, विंशांश, चतुर्विंशांश तथा त्रिशांश लग्न कहते हैं।

कह सकते हैं कि इन वर्गों के अध्ययन के बिना जन्म कुंडली का विश्लेषण अधूरा होता है, क्योंकि जन्म कुंडली से केवल जातक के शरीर, उसकी संरचना एवं स्वास्थ्य के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है, लेकिन षोडश वर्ग का प्रत्येक वर्ग जातक के जीवन के एक विशिष्ट कारकत्व या घटना के अध्ययन में सहायक होता है। जातक के जीवन के जिस पहलू के बारे में हम जानना चाहते हैं, उस पहलू के वर्ग का जब तक हम अध्ययन न करें तो, विश्लेषण अधूरा ही रहता है। जैसे यदि जातक की संपत्ति, संपन्नता आदि के विषय में जानना हो, तो जरूरी है कि होरा वर्ग का अध्ययन किया जाए। इसी प्रकार व्यवसाय के बारे में पूर्ण जानकारी के लिए दशमांश की सहायता ली जाती है। जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं को जानने के लिए किसी विशेष वर्ग का अध्ययन किए बिना फलित गणना में चूक हो सकती है। षोडश वर्ग में सोलह वर्ग होते हैं, जो जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं की जानकरी देते हैं।

जैसे :- होरा से संपत्ति व समृद्धि।

द्रेष्काण से भाई-बहन व पराक्रम।

चतुर्थांश से भाग्य, चल एवं अचल संपत्ति।

सप्तांश से संतान।

नवमांश से वैवाहिक जीवन व जीवन साथी।

दशमांश से व्यवसाय व जीवन की उपलब्धियां।

द्वादशांश से माता-पिता।

षोडशांश से सवारी एवं सामान्य खुशियां।

विंशांश से पूजा-उपासना और आशीर्वाद।

चतुर्विंशांश से विद्या, शिक्षा, दीक्षा, ज्ञान आदि।

सप्तविंशांश से बल एवं दुर्बलता।

त्रिशांश से दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, अनिष्ट।

खवेदांश से शुभ या अशुभ फल।

अक्षवेदांश से जातक का चरित्र।

षष्ट्यांश से जीवन के सामान्य शुभ-अशुभ फल आदि अनेक पहलुओं का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है।

षोडश वर्ग में सोलह वर्ग ही होते हैं, लेकिन इनके अतिरिक्त और चार वर्ग पंचमांश, षष्ट्यांश, अष्टमांश, और एकादशांश भी होते हैं।

पंचमांश से जातक की आध्यात्मिक प्रवृत्ति, पूर्व जन्मों के पुण्य एवं संचित कर्मों की जानकारी प्राप्त होता है।

षष्ट्यांश से जातक के स्वास्थ्य, रोग के प्रति अवरोधक शक्ति, ऋण, झगड़े आदि का विवेचन किया जाता है।

एकादशांश जातक के बिना प्रयास के धन लाभ को दर्शाता है। यह वर्ग पैतृक संपत्ति, शेयर, सट्टे आदि के द्वारा स्थायी धन की प्राप्ति की जानकारी देता है।

अष्टमांश से जातक की आयु एवं आयुर्दाय के विषय में जानकारी मिलती है।

षोडश वर्ग में सभी वर्ग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आज के युग में जातक धन, पराक्रम, भाई-बहनों से विवाद, रोग, संतान वैवाहिक जीवन, साझेदारी, व्यवसाय, माता-पिता और जीवन में आने वाले संकटों के बारे में अधिक प्रश्न करता है। इन प्रश्नों के विश्लेषण के लिए सात वर्ग होरा, द्रेष्काण, सप्तांश, नवांश, दशमांश, द्वादशांश और त्रिशांश ही पर्याप्त हैं।

होरादि सात वर्गों का फलित में प्रयोग :-

होरा: जन्म कुंडली की प्रत्येक राशि के दो समान भाग कर सिद्धांतानुसार जो वर्ग बनता है होरा कहलाता है। इससे जातक के धन से संबंधित पहलू का अध्ययन किया जाता है। होरा में दो ही लग्न होते हैं – सूर्य का अर्थात् सिंह और चंद्र का अर्थात् कर्क। ग्रह या तो चंद्र होरा में रहते हैं या सूर्य होरा में। बृहत पाराशर होराशास्त्र के अनुसार गुरु, सूर्य एवं मंगल सूर्य की होरा में और चंद्र, शुक्र एवं शनि चंद्र की होरा में अच्छा फल देते हैं। बुध दोनोें होराओं में फलदायक है। यदि सभी ग्रह अपनी शुभ होरा में हाे तो, जातक को धन संबंधी समस्याएं कभी नहीं आएंगी, और वह धनी होगा। यदि कुछ ग्रह शुभ और कुछ अशुभ होरा में होंगे तो फल मध्यम और यदि ग्रह अशुभ होरा में होंगे तो जातक निर्धन होता है।

द्रेष्काण: जन्म कुंडली की प्रत्येक राशि के तीन समान भाग कर सिद्धांतानुसार जो वर्ग बनता है वह द्रेष्कांण कहलाता है। दूसरे शब्दों में यह कुंडली का तीसरा भाग है। द्रेष्कांण जातक के भाई बहन से सुख, परस्पर संबंध, पराक्रम के बारे में जानकारी के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त इससे जातक की मृत्यु का स्वरूप भी मालूम किया जाता है। द्रेष्काण से फलित करते समय लग्न कुंडली के तीसरे भाव के स्वामी, तीसरे भाव के कारक मंगल एवं मंगल से तीसरे स्थित बुध की स्थिति और इसके बल का ध्यान रखना चाहिए। यदि द्रेष्काण कुंडली में संबंधित ग्रह अपने शुभ स्थान पर स्थित हैं तो, जातक को भाई-बहनों से विशेष लाभ होगा, और उसके पराक्रम में भी वृद्धि होगी। इसके विपरीत यदि संबंधित ग्रह अपने अशुभ द्रेष्काण में हों तो, जातक को अपने भाई-बहनों से किसी प्रकार का सहयोग प्राप्त नहीं होगा। यह भी संभव है कि जातक अपने मां-बाप की एक मात्र संतान हो।

सप्तांश वर्ग: जन्मकुंडली का सातवां भाग सप्तांश कहलाता है। इससे जातक के संतान सुख की जानकारी मिलती है। जन्मकुंडली में पंचम भाव संतान का भाव माना जाता है। इसलिए पंचमेश पंचम भाव के कारक ग्रह गुरु, गुरु से पंचम स्थित ग्रह और उसके बल का ध्यान रखना चाहिए। सप्तांश वर्ग में संबंधित ग्रह अपने उच्च या शुभ स्थान पर हो तो शुभ फल प्राप्त होता है अर्थात् संतान का सुख प्राप्त होता है। इसके विपरीत अशुभ और नीचस्थ ग्रह जातक को संतानहीन बनाता है या संतान होने पर भी सुख प्राप्त नहीं होता। सप्तांश लग्न और जन्म लग्न दोनों के स्वामियों में परस्पर नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता आवश्यक है।

नवांश वर्ग: जन्म कुंडली का नौवां भाग नवांश कहलाता है। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्ग है। इस वर्ग को जन्मकुंडली का पूरक भी समझा जाता है। आमतौर पर नवांश के बिना फलित नहीं किया जाता। यह ग्रहों के बलाबल और जीवन के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। मुख्य रूप से यह वर्ग विवाह और वैवाहिक जीवन में सुख-दुख को दर्शाता है। लग्न कुंडली में जो ग्रह अशुभ स्थिति में हो वह यदि नवांश में शुभ हो तो शुभ फलदायी माना जाता है। यदि ग्रह लग्न और नवांश दोनों में एक ही राशि में हो तो उसे वर्गोत्मता हासिल होती है, जो शुभ सूचक है। लग्नेश और नवांशेश दोनों का आपसी संबंध लग्न और नवांश कुंडली में शुभ हो तो, जातक का जीवन में विशेष खुशियों से भरा होता है। उसका वैवाहिक जीवन सुखमय होता है, और वह हर प्रकार के सुखों को भोगता हुआ जीवन व्यतीत करता है। वर-वधू के कुंडली मिलान में भी नवांश महत्वपूर्ण है। यदि लग्न कुंडलियां आपस में न मिलें, लेकिन नवांश मिल जाएं तो भी विवाह उत्तम माना जाता है, और गृहस्थ जीवन आनंदमय रहता है। सप्तमेश, सप्तम् के कारक शुक्र (कन्या की कुंडली में गुरु), शुक्र से सप्तम स्थित ग्रह और उनके बलाबल की नवांश कुंडली में शुभ स्थितियां शुभ फलदायी होती हैं। ऐसा देखा गया है कि लग्न कुंडली में जातक को राजयोग होते हुए भी राजयोग का फल प्राप्त नहीं होता यदि नवांश वर्ग में ग्रहों की स्थिति प्रतिकूल होती है। देखने में जातक संपन्न अवश्य नजर आएगा, लेकिन अंदर से खोखला होता है। वह स्त्री से पेरशान होता है, और उसका जीवन संघर्षमय रहता है।

दशमांश: दशमांश अर्थात् कुंडली के दसवें भाग से जातक के व्यवसाय की जानकारी प्राप्त होती है। वैसे देखा जाए तो जन्मकुंडली में दशम भाव जातक का कर्म क्षेत्र अर्थात् व्यवसाय का है। जातक के व्यवसाय में उतार चढ़ाव, स्थिरता आदि की जानकारी प्राप्त करने में दशमांश वर्ग सहायक होता है। यदि दशमेश, दशम भाव में स्थित ग्रह, दशम भाव का कारक बुध और बुध से दशम स्थित ग्रह दशमांश वर्ग में स्थिर राशि में स्थित हों और शुभ ग्रह से युत हों तो व्यवसाय में जातक को सफलता प्राप्त होती है। दशमांश लग्न का स्वामी और लग्नेश दोनों एक ही तत्व राशि के हों, आपस में नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता रखते हों तो, व्यवसाय में स्थिरता देते हैं। इसके विपरीत यदि ग्रह दशमांश में चर राशि स्थित और अशुभ ग्रह से युत हो, लग्नेश और दशमांशेश में आपसी विरोध हो तो जातक का व्यवसाय अस्थिर होता है। दशमांश और लग्न कुंडली दोनों में यदि ग्रह शुभ और उच्च कोटि के हों तो जातक को व्यवसाय में उच्च कोटि की सफलता देते हैं।

द्वादशांश: लग्न कुंडली का बारहवां भाग द्वादशांश कहलाता है। द्वादशांश से जातक के माता-पिता के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। लग्नेश और द्वादशांशेश इन दोनों में आपसी मित्रता इस बात का संकेत करती है कि जातक और उसके माता-पिता के आपसी संबंधी अच्छे रहेंगे। इसके विपरीत ग्रह स्थिति से आपसी संबंधों में वैमनस्य बनता है। इसके अतिरिक्त चतुर्थेश और दशमेश यदि द्वादशांश में शुभ स्थित हों तो भी जातक को माता-पिता का पूर्ण सुख प्राप्त होगा, यदि चतुर्थेश और दशमेश दोनों में से एक शुभ और एक अशुभ स्थिति में हो तो जातक के माता-पिता दोनों में से एक का सुख मिलेगा और दूसरे के सुख में अभाव बना रहेगा। इन्हीं भावों के और कारक ग्रहों से चतुर्थ और दशम स्थित ग्रहों और राशियों के स्वामियों की स्थिति भी द्वादशांश में शुभ होनी चाहिए। यदि सभी स्थितियां शुभ हों तो जातक को माता-पिता का पूर्ण सुख और सहयोग प्राप्त होगा अन्यथा नहीं।

त्रिंशांश: लग्न कुंडली का तीसवां भाग त्रिंशांश कहलाता है। इससे जातक के जीवन में अनिष्टकारी घटनाओं की जानकारी प्राप्त होती है। दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, बीमारी, आॅपरेशन आदि सभी का पता इस त्रिंशांश से किया जाता है। त्रिंशांशेश और लग्नेश की त्रिंशांश में शुभ स्थिति जातक को अनिष्ट से दूर रखती है। जातक की कुंडली में तृतीयेश, षष्ठेश, अष्टमेश और द्वादशेश इन सभी ग्रहों की त्रिंशांश में शुभ स्थिति शुभ जातक को स्वस्थ एवं निरोग रखती है और दुर्घटना से बचाती है। इसके विपरीत अशुभ स्थिति में जातक को जीवन भर किसी न किसी अनिष्टता से जूझना पड़ता है।

इन सात वर्गों की तरह ही अन्य षोड्श वर्ग के वर्गों का विश्लेषण किया जाता है। इन वर्गों का सही विश्लेषण तभी हो सकता है यदि जातक का जन्म समय सही हो, अन्यथा वर्ग गलत होने से फलित भी गलत हो जाएगा। जैसे दो जुड़वां बच्चों के जन्म में तीन-चार मिनट के अंतर में ही जमीन आसमान का आ जाता है, इसी तरह जन्म समय सही न होने से जातक के किसी भी पहलू की सही जानकारी प्राप्त नहीं हो सकती। कई जातकों की कुंडलियां एक सी नजर आती हैं, लेकिन सभी में अंतर वर्गों का ही होता है। यदि वर्गों के विश्लेषण पर विशेष ध्यान दिया जाए तो जुड़वां बच्चों के जीवन के अंतर को समझा जा सकता है। यही कारण है कि हमारे विद्वान महर्षियों ने फलित ज्योतिष की सूक्ष्मता तक पहुंचने के लिए इन षोड्श वर्गों की खोज की और इसका ज्ञान हमें दिया।

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मृतक लोगों के स्वप्न

मृतक लोगों का स्वप्न मे आना, शुभाशुभ विचार :-

Dr.R.B.Dhawan

स्वप्न हर मनुष्य को दिखाई देते हैं, और स्वस्थ व्यक्ति के लिए स्वप्न देखना जरूरी भी है, नींद की अवस्था में कई प्रकार के स्वप्न दिखाई देते हैं, जिनमें कुछ प्रसन्नता देने वाले और कुछ चिंतित करने वाले भी होते हैं, कभी-कभी स्वप्न में हमें अपने ही पूर्वज या पितर अथवा कोई मृत व्यक्ति दिखाई देता है, तब हमें इस प्रकार के स्वप्न का अर्थ समझ नहीं आता। क्या आपके सपने में भी कभी कोई मृत व्‍यक्ति आकर कुछ कहते हैं? क्या होता है, जब आप सपनों में मृत व्‍यक्तियों की आवाज सुनते हैैं, या वो आपका नाम बुलाते हैं। क्‍या आपको मालूम है कि जब कभी मृत व्‍यक्ति सपने में आकर आपका नाम लेते हैं तो, इसका एक मतलब होता है। संभव है वो आपको कुछ बताना चाहते हैं, हो सकता है कि वो आपको कुछ संकेत दे रहें हों? यहां आज हम आपको कुछ बातें बता रहे हैं कि सपने में कोई मृत व्‍यक्ति यदि आप का नाम लेता है तो इसका क्या अर्थ हो सकता है :-

1. यदि आप किसी कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे हैं तो, बार बार कोई मृत व्‍यक्ति आपको सपने में आकर आपका नाम ले रहा है तो, इसका अर्थ है कि वो व्‍यक्ति आपको कुछ अनहोनी के बारे में आगह करना चाहता है।

2. यदि सपने में मृत व्‍यक्ति किसी की बात या किसी व्यक्ति की ओर इशारा कर रहा है तो, इसका अर्थ है, उस व्‍यक्ति से संबंधित या उस बात से संबंधित कोई बुरा समाचार मिलने वाला है।
3. यदि स्वप्न में मृत व्‍यक्ति आपसे कुछ कह रहा है, और आप उनको सुन नहीं पा रहे हैं तो, समझ जाइए कि कोई खुशखबरी आने वाली है।

4. यदि वो सपने में आपसे बात कर रहा है और उसकी आवाज में एक अलग हड़बड़ाहट है तो, इसका अर्थ है कि आप किसी पुराने परिचित से मिलने वाले हैं।

5. यदि सपने में आपको कोई मिलनसार आत्‍मा दिखाई देती है या कोई आत्‍मा आपके साथ थोड़ी फ्रेंडली बनने की कोशिश करती है। तो इसका अर्थ है कि आप अपार सफलता प्राप्‍त करने वाले हैं।
6. यदि आप के सपने में मृत व्‍यक्ति की आवाज थोड़ी तीखी और गहरी होती है तो, वह यह बताती है कि आपकी लाइफ में जल्‍द ही कुछ नया बदलाव आने वाला है।

7. यदि आप सपने में खाली कब्र और शोक सभा की प्रार्थना देखते हैं तो इसका अर्थ है कि आपकी निजी जिंदगी में कोई खतरा आ सकता है।

सैकड़ों प्रकार के स्वप्नों के फल का उल्लेख हमारे पुराणों में कहीं कहीं मिलता है, इसके अलावा बहुत से विद्वानों ने भी इस विषय पर ग्रंथ लिखे हैं, उन में स्वप्न के अनेक प्रकार और फल दिये गये हैं।

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राह दिखाती यह 6 बातें

जीवन को व्यवस्थित करने वाली यह 6 बातें :-

Dr.R.B.Dhawan

श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों में जीवनोपयोगी अनेक शिक्षाएं हैं, जो आज के समय में हमें सही रास्ता दिखाती हैं, श्रीरामचरितमानस के अरण्यकांड में शूर्पणखा जब लक्ष्मण द्वारा नाक, कान काटे जाने के बाद रावण के पास जाती है, तब वह रावण को कहती है कि जीवन में कभी इन 6 बातों को कभी छोटा नहीं समझना :-

रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।

अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।

अर्थात :- शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। ऐसा कहकर शूर्पणखा अनेक प्रकार से विलाप करके रोने लगी।

1. शत्रु अर्थात् दुश्मन :- दुश्मन भले ही कितना ही छोटा क्यों न हो, उसे छोटा नहीं समझना चाहिए, उससे हमेशा सावधान रहना चाहिए। कई बार छोटे दुश्मन भी इतना बड़ा नुकसान कर देते हैं, जिसके कारण बाद में पछताना पड़ता है। यदि छोटे-छोटे राजा मिलकर किसी चक्रवर्ती राजा पर एक साथ हमला कर दें तो उसे भी हरा सकते हैं। इसलिए दुश्मन को कभी छोटा यानी कमजोर नहीं समझना चाहिए।

2. रोग-बीमारी :- छोटी से छोटी बीमारी को भी कभी नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। सर्दी, जुकाम या बुखार आदि भले ही साधारण लगते हों, लेकिन जब यह जब बढ़ जाते हैं तो, शरीर को खोखला कर देते हैं। कई बार ये बड़ी बीमारी का कारण भी बन जाते हैं। साधारण लगने वाली खांसी टी.बी. भी हो सकती है। इन छोटी लगने वाली बीमारियों के कारण ही कई बार मनुष्य को अपने प्राण गंवाने पड़ जाते हैं। इसलिए छोटी बीमारी में भी तुरंत इलाज करवाने में ही समझदारी है।

3. अग्नि अर्थात् आग :- आग में इतनी शक्ति है कि वह कुछ ही समय में बड़े से बड़े जंगल को भी जला कर राख कर सकती है। आग का सबसे छोटा रूप एक चिंगारी होती है, लेकिन जब यह विकराल रूप ले लेती है तो, इस पर नियंत्रण पाना किसी के बस में नहीं होता। इसलिए आग के साथ कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। ये कभी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है।

4. पाप कर्म अर्थात् बुरे काम :- धर्म ग्रंथों के अनुसार, मनुष्यों को उनके द्वारा किए गए कामों के आधार पर पाप व पुण्य की प्राप्ति होती है। कई बार मनुष्य सब कुछ जानकर भी छोटे-छोटे गलत कार्य करते हैं। इन कामों से प्राप्त होने वाला पाप भी कम ही होता है, लेकिन जब इन छोटे-छोटे पाप कर्मों का फल एकत्रित हो जाता है तो इसकी भयानक सजा मिलती है। इसलिए पाप कर्म भले ही छोटा है, लेकिन करने से बचना चाहिए।

5. स्वामी अर्थात् मालिक :- मालिक को कभी भी छोटा नहीं समझना चाहिए। क्योंकि अगर मालिक नाराज हो जाए तो, वह आपका बड़ा नुकसान कर सकता है। अगर आप नौकर हैं, और सोचते हैं कि मालिक को डरा-धमका कर या किसी भी तरीके से अपना काम निकाल लेंगे तो यह आपकी बहुत बड़ी भूल है। मालिक को जब भी मौका मिलेगा, वह आपका नुकसान करने से नहीं चूकेगा। इसलिए मालिक को कभी छोटा यानी कमजोर नहीं समझना चाहिए।

6. सर्प अर्थात् सांप :- सांप दिखने में भले ही कितना भी छोटा क्यों न हो, लेकिन यदि वह एक बार काट ले तो, मृत्यु का कारण बन सकता है। कई बार देखने में आता है कि सांप पकड़ने वाले ही सांप का शिकार बन जाते हैं, क्योंकि उन्हें यही लगता है कि हमेशा की तरह वे सांप को अपने वश में कर लेंगे। उनकी यही सोच कई बार उनकी जान की दुश्मन बन जाती है। इसलिए सांप को कभी छोटा (कमजोर) नहीं समझना चाहिए।

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मन का कारक चंद्रमा

चंद्रमा मन का कारक :-

Dr.R.B.Dhawan

चंद्रमा सौरमंडल के ग्रहों में सबसे तीव्र गति से चलने वाला ग्रह है, ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा को काल पुरुष का मन कहा गया है, यह ग्रह मन का प्रतिनिधित्व करता है, इसी लिए चन्द्रमा को काल पुरुष का मन कहा गया है। चन्द्रमा माता, मन, स्वभाव, जननेन्द्रियों, प्रजनन सम्बन्धी रोगों, गर्भाशय इत्यादि का कारक है, चन्द्रमा जातक के मन की भावनाओं पर नियन्त्रण रखता है, यह जल तत्व ग्रह है, सभी तरल पदार्थ चन्द्रमा के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं इसके अतिरिक्त चन्द्रमा बाग-बगीचे, नमक, समुद्री औषधी, जड़ी-बूटी, मौसम परिवर्तन, विदेश यात्रा, दूध, मान आदि का प्रतिनिधित्व भी करता है। चन्द्रमा के मित्र ग्रह सूर्य और बुध हैं, चन्द्रमा किसी ग्रह से शत्रुता नहीं रखता, चन्द्रमा मंगल, गुरु, शुक्र व शनि से सम संबन्ध रखता है, चन्द्रमा कर्क राशि का स्वामी है, वृषभ राशि में उच्च स्थान प्राप्त करता है, और वृश्चिक राशि में होने पर नीच राशि में और उत्तर-पश्चिम दिशाओं का प्रतिनिधित्व करता है, चन्द्र का भाग्य रत्न मोती है, चन्द्रमा ग्रह का रंग श्वेत, और धातु चांदी माना गया है, चन्द्र का शुभ अंक 2, 11, 20 है, चन्द्रमा के लिए दुर्गा, पार्वती और देवी गौरी की उपासना करनी चाहिए।

चन्द्रमा ग्रह का बीज मंत्र:- ” ऊँ स्रां स्रीं स्रौं स: चन्द्रमसे नम:।” (जप संख्या 11000)

चन्द्र ग्रह का वैदिक मंत्र :- ” ऊँ दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम ।
भाशिनं भवतया भाम्भार्मुकुट्भुशणम।।”

चन्द्रमा की दान योग्य वस्तुएं :- चावल, दूध, चांदी, मोती, दही, मिश्री, श्वेत वस्त्र, श्वेत फूल या चन्दन. इन वस्तुओं का दान सोमवार के दिन सायंकाल में करना चाहिए।

चन्द्रमा से प्रभावित व्यक्तित्व:- चन्द्र राशि लग्न भाव में हो या चन्द्रमा जन्म राशि हो, अथवा चन्द्र लग्न भाव में बली अवस्था में हो, तो व्यक्ति को कफ रोग प्रभावित करते हैं, शरीर की गोलाकार प्रकृति, मन प्रसन्न कर देने वाली आंखे, विनोदी स्वभाव, अतिकामुक, अस्थिर विचारधारा, यह चन्द्रमा से प्रभावित जातक के लक्षण हैं।

चंन्द्रमा के रोग :- चन्द्रमा शरीर में बाईं आंख, गाल, मांस, रक्त बलगम,
वायु, स्त्री में दाईं आंख, पेट, भोजन नली, गर्भाशय, अण्डाशय, मूत्राशय. चन्द्र कुण्डली में कमजोर या पिडित हो, तो व्यक्ति को ह्रदय रोग, फेफडे, दमा, अतिसार, दस्त गुर्दा, बहुमूत्र, पीलिया, गर्भाशय के
रोग, माहवारी में अनियमितता, चर्म रोग, रक्त की कमी, नाडी मण्डल, निद्रा, खुजली, रक्त दूषित होना, फफोले, ज्वर, तपेदिक, अपच, बलगम, जुकाम, सूजन, जल से भय, गले की समस्याएं, उदर-पीडा, फेफडों में सूजन, क्षयरोग, चन्द्रमा से प्रभावित जातक बार-बार विचार बदलने वाला होता है।

चंद्रमा के बली और निर्बल होने पर :-

बाली:- जन्मकुंडली में चन्द्रमा यदि अपनी ही राशि में या मित्र, उच्च राशि षड्बली, शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो, चन्द्रमा की शुभता में वृद्धि होती है, जन्म कुण्डली में चंद्रमा यदि मजबूत एवं बली अवस्था में हो तो, व्यक्ति समस्त कार्यों में सफलता पाने वाला तथा मन से प्रसन्न रहने वाला होता है, पद प्राप्ति व पदोन्नति, जलोत्पन्न, तरल व श्वेत पदार्थों के कारोबार से लाभ मिलता है।

निर्बल:- यदि चन्द्रमा कृष्ण पक्ष की एकादशी से शुक्ल पक्ष की पंचमी के बीच का अथवा नीच या शत्रु राशि में हो, तथा अशुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो, चंद्रमा निर्बल हो जाता है, ऎसी स्थिति में निद्रा व आलस्य घेरे रहता
है, व्यक्ति मानसिक रुप से बेचैन रहता है, उसका मन चंचलता से भरा रहता है, मन में भय व्याप्त रहता है।

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प्रभावित करता है राहु

कैसे प्रभावित करता है, राहु मनुष्य के स्वभाव को:-

Dr.R.B.Dhawan

राहु ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में एक छाया ग्रह कहा गया है, अर्थात इस ग्रह का कोई अपना पिंड नहीं है, वस्तुत: यह दो ग्रहों के भ्रमण मार्ग का कटाव बिंदु मात्र है, परंतु फिर भी कभी-कभी इस ग्रह (कटाव बिंदु) का मनुष्य के मन मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। राहु की प्रवृति राक्षसी होने के कारण ये मनुष्य को तामसिक प्रवृति का अपना गुण प्रदान कर ही देता है, कुंडली में नकारात्मक राहु से प्रभावित व्यक्ति अक्सर भ्रमित रहता है।

पौराणिक धारणा

कैसे बना राहू ग्रह? क्या है राहू ?:-

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हिरन्यकश्यप की सिंहिका नामक पुत्री का विवाह विप्रचिति नामक दानव के साथ हुआ था उसी के गर्भ से राहु ने जन्म लिया। विप्रचिति हमेशा दानवी शक्तियों, आसुरी शक्तियों से दूर रहे और साथ ही समुद्र मंथन के समय अमृतपान के कारण राहु को अमरत्व एवं देवत्व की प्राप्ति हुई। तभी से शिव भक्त राहु अन्य ग्रहों के साथ ब्रह्मा जी की सभा में विराजमान रहते हैं इसलिए इन्हें ग्रह के रूप में मान्यता मिली।

क्या है राहू ?

जन्मकुंडली में राहु पूर्व जन्म के कर्मों के बारे में बताता है, राहु परिवर्तनशील, अस्थिर प्रकृति का ग्रह माना जाता है। राहु में अंतर्दृष्टि भी होती है ताकि वह काल की रचनाओं के बारे में सोच सके बता सके। भौतिक दृष्टि से इसका कोई रंग, रूप, आकार नहीं है, इसकी कोई राशि, वार नहीं होता। वैदिक ज्योतिषियों ने इसकी स्वराशि, उच्च राशि और मूलत्रिकोण राशियों की कल्पना की है। जातक परिजात में राहु की उच्च राशि मिथुन, मूलत्रिकोण कुंभ और स्वराशि कन्या मानी गई है। राहु का व्यवहार अत्यंत प्रभावशाली देखा गया है। राहु पूर्वाभास की योग्यता भी विकसित करता है। विशेषकर जब राहु जल राशियों कर्क, वृश्चिक, मीन में हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि हो।

राहु छुपे हुए रहस्यों, तंत्र, मंत्र, काला जादू व भूत प्रेत का कारक भी है। राहु की तामसिक प्रवृत्ति के कारण वह चालाक है और व्यक्ति को भौतिकता की ओर पूर्णतया अग्रसर करता है, बहुत महत्वाकांक्षी व लालची बनाता है, जिसके लिए व्यक्ति साम-दाम-दंड-भेद की नीतियां अपनाकर जीवन में आगे बढ़ता है।

इसी तरह यह व्यक्ति को भ्रमित भी रखता है। एक के बाद दूसरी इच्छाओं को जागृत करता है। इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह विभिन्न धार्मिक कार्य व यात्राएं भी करता है। राहु प्रधान व्यक्ति में दिखावा करने की प्रवृत्ति विशेष रूप से पायी जाती है। राहु कार्य जाल में फंसाता है, जीवन में आकर्षण को बनाये रखता है, हार नहीं मानता अर्थात इच्छा शक्ति को जागृत रखता है।

राहु का योग जन्म पत्रिका में जिस ग्रह के साथ होगा उसी में विकार उत्पन्न हो जायेगा और केतु का योग जिस ग्रह के साथ होगा उसकी काट होगी। उसका दोष कम हो जायेगा। कोई भी ग्रह राहु के मुख में होगा उस व्यक्ति का व्यवहार उस भाव से संबंधित असंयमित हो जायेगा।

सूर्य के निकट रहने पर राहु सूर्य का सारा बल ग्रहण कर लेता है । इस प्रकार राहु चंद्र के साथ मन की स्थिति बहुत अव्यवस्थित करके मन में उथल-पुथल मचा देता है। विचारों और भावनाओं में विकार उत्पन्न हो जाता है। ऐसा देखने में आया है कि जिन जातकों की जन्मपत्रिका में राहु और चंद्रमा की युति हो वे बहुत परेशान देखे गये हैं, मानसिक सामंजस्यता की बेहद कमी देखी गयी है। अन्य पाप ग्रहों का भी दृष्टि या युति संबंध हो तो मानसिक रोगी व पागलपन की स्थिति भी देखी गयी है।

राहु गुरु के साथ मिलकर गुरु चांडाल योग का निर्माण करता है जो विवाह व ज्ञान प्राप्ति में बाधा बन जाता है। इस प्रकार राहु सभी ग्रहों के साथ युति करके किसी न किसी प्रकार का विकार उत्पन्न करता है। किंतु यह सब फल राहु की दशा अंतर्दशा आने पर ही मिलते हैं। मित्र राशियों में शुभ व शत्रु राशियों में अशुभ फल देते हैं। राहु के परिणाम शुभ मिलेंगे या अशुभ यह मूलतः नक्षत्रों द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।राहु के अपने नक्षत्र हैं आद्रा, स्वाति एवं शतभिषा। इन नक्षत्रों में राहु रहने पर शुभ परिणाम देता है।

ज्योतिष शास्त्रों में राहु पीड़ा को भूत, प्रेत, पिशाच, मसान आदि भी कहा गया है, आयुर्वेद के ग्रंथों में भूत-बाधा को एक विशेष प्रकार की मानसिक बीमारी बताया गया है। आगे की पंक्तियों में कुछ ग्रह योग दे रहा हूं, जो कुंडली में हों तो जातक को अपना प्रभाव दिखाते हैं:-

— लग्न में राहु तथा चंद्र और त्रिकोण में मंगल व शनि हों, तो जातक को प्रेत पीड़ा होती है।

— चंद्र राहु से युक्त अथवा पाप ग्रह से दृष्ट हो, शनि सप्तम में हो तथा कोई शुभ ग्रह चर राशि में हो, तो भूत पीड़ा होती है।

— शनि तथा राहु लग्न में हो, तो जातक को भूत सताता है।

— लग्नेश या चंद्र से युक्त राहु लग्न में हो, तो प्रेत पीड़ा होता है।

— यदि दशम भाव का स्वामी आठवें या एकादश भाव में हो और उस भाव के स्वामी से दृष्ट हो, तो ऐसी स्थिति में प्रेत पीड़ा होता है।

— नीच राशि में स्थित राहु के साथ लग्नेश हो तथा वह लग्नेश सूर्य, शनि व अष्टमेश से दृष्ट हो तो जातक को भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

— पंचम भाव में सूर्य तथा शनि हो, निर्बल अथवा राहु युक्त चन्द्रमा सप्तम भाव में हो तथा बृहस्पति बारहवें भाव में हो, तो भी भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

— जन्म समय चन्द्र ग्रहण हो और लग्न, पंचम तथा नवम भाव में पाप ग्रह हों तो जन्मकाल से ही पिशाच बाधा का भय होता है।

— षष्ठ भाव में पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट राहु या केतु की स्थिति भी पैशाचिक बाधा उत्पन्न करती है।

— लग्न में शनि, राहु की युति हो अथवा दोनों में से कोई भी एक ग्रह स्थिति हो अथवा लग्नस्थ राहु पर शनि की दृष्टि हो, भ्रम होता है।

— लग्नस्थ केतु पर कई पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो, पैशाचिक बाधा होती है।

— निर्बल चन्द्रमा शनि के साथ अष्टम में हो तो पिशाच, भूत-प्रेत मशान आदि का भय।

— निर्बल चन्द्रमा षष्ठ अथवा बाहरहवें में मंगल, राहु या केतु के साथ हो तो भी पिशाच भय।

— चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) के लग्न में राहु और लग्नेश पर यदि षष्ठेश की दृष्टि हो।

— एकादश भाव में मंगल राहु हो तथा नवम भाव में स्थिर राशि (वृष, सिंह,वृश्चिक, कुंभ) और सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु मीन) हो।

— लग्न भाव मंगल से दृष्ट हो तथा षष्ठेश, दशम, सप्तम या लग्न भाव में राहु की स्थिति हों।

— मंगल यदि लग्नेश और राहु के साथ केंद्र या लग्न भाव में स्थिति हो तथा छठे भाव का स्वामी लग्नस्त हो।

— पापग्रहों से युक्त या दृष्ट केतु लग्नगत हो।

— शनि राहु केतु या मंगल में से कोई भी एक ग्रह सप्तम स्थान में हो।

— जब लग्न में चन्द्रमा के साथ राहु हो और त्रिकोण भावों में क्रूर ग्रह हों तो, मानसिक व्याधियां कष्ट देती हैं।

— राहु शनि से युक्त होकर लग्न में स्थित हो तो, मानसिक व्याधियां होती हैं।

— लग्नेश एवं राहु अपनी नीच राशि का होकर अष्टम भाव या अष्टमेश से संबंध करे।

— राहु अष्टम भाव में हो तथा लग्नेश शनि के साथ द्वादश भाव में स्थित हो, तो प्रेत बाधा का प्रभाव संभव होता है।

— द्वितीय में राहु द्वादश में शनि षष्ठ मं चंद्र तथा लग्नेश भी अशुभ भावों में हो।

— चन्द्रमा तथा राहु दोनों ही नीच राशि के होकर अष्टम भाव में हो।

— चतुर्थ भाव में राहु हो वक्री मंगल द्वादश भाव में हो तथा अमावस्या तिथि का जन्म हो तो, नकारात्मक ऊर्जा परेशान करती हैं।

— नीचस्थ सूर्य के साथ केतु हो तथा उस पर शनि की दृष्टि हो तथा लग्नेश भी नीच राशि का हो तो, नकारात्मक ऊर्जा पीड़ित करती है।

— जिन जातकों की कुण्डली में उपरोक्त योग हों, उन्हें विशेष सावधानी पूर्वक रहना चाहिए तथा संयमित जीवन शैली को ग्रहण करना चाहिए। जिन परिस्थितियों के कारण भ्रम अथवा प्रेत बाधा का प्रकोप हो सकता है उनसे बचें। जातक को भ्रम, नकारात्मक ऊर्जा अथवा प्रेतबाधा से मुक्त रखने में यह उपाय सहायक सिद्ध हो सकते हैं:-

— शारीरिक सुचिता के साथ-साथ मानसिक पवित्रता का ध्यान रखें।

— नित्य हनुमान चालीसा तथा बजरंग बाण का पाठ करें।

— मंगलवार का व्रत रखें तथा सुन्दरकांड का पाठ करें।

— पुखराज रत्न से प्रेतात्माएं दूर रहती हैं, पुखराज रत्न धारण करें।

— घर में नित्य शंख बजाये, इससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।

— नित्य गायत्री मंत्र की तीन माला जाप करें।

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नीचभंग राजयोग

नीचभंग राजयोग

Dr.R.B.Dhawan :- 

किसी जातक की जन्मकुंडली में जितने ग्रह बलवान होते हैं, उसकी जन्मकुंडली उतनी ही अधिक बलवान मानी जाती है। इसके अतिरिक्त जन्मकुंडली में जितने ग्रह उच्च राशि में होंगे वह जन्मकुंडली उतनी ही मजबूत होती है । सामान्य स्थिति में तो जन्मकुंडली में कोई ग्रह नीच राशिगत हो तो जन्म कुंडली प्रभावहीन मानी जाती है। नीच ग्रह को देखते ही कुछ ज्योतिषी तो अशुभ फल की घोषणा ही कर देते हैं। भले ही वह प्रभाव किसी अन्य ग्रह के द्वारा दिया गया हो। परंतु मंत्रेश्वर ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ फलदीपिका में इस सिद्धांत का एक दूसरा पहलू भी प्रकाशित किया है, जो की उपरोक्त सिद्धांत के विपरीत है – जन्मकुंडली में नीच राशि के ग्रह होने पर भी कभी-कभी ग्रहों की विशेष स्थिति के कारण जन्मकुंडली में राजयोग का निर्माण होता है।

निचस्थिति जन्मनि यो ग्रह: स्थतदराशिनाथोsपि तदुचनाथा: । 

स चंद्र लग्नायदी केन्द्रवर्ती राजा भवेदधार्मिक चक्रवर्ती  ।।26।।

मंत्रेश्वर ने कहा है- जिन जातको की जन्म कुंडली में नीचभंग राजयोग होता है, वे चट्टानो से भी जल निकालने की क्षमता रखते हैं। ऐसे जातक बहुत अधिक मेहनती होते है, और अपने दम पर एक मुकाम हासिल करते हैं। ये जातक जिस क्षेत्र में भी जाते हैं वही अपनी अमिट छाप बना देते हैं । चाहे दुनिया इनके पक्ष में हो या विपक्ष में इनको सफलता मिलना तय होता हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रमोदी कि कुंडली इसका एक उदाहरण है, जिसमें वृश्चिक लग्न में चंद्रमा और मंगल दोनों स्थित हैं, लग्न में चंद्रमा नीच राशिगत केंद्र में है। आइए देखें कैसे बनते हैं ये नीचभांग राज योग –

1. जातक के जन्म के समय कोई भी एक ग्रह अगर नीच राशिगत हो तो, वो जिस राशि मे नीच होता है, उस राशि का स्वामी यदि चंद्र से केंद्र में हो तो ग्रह का निचभंग होता है ।

2. निचग्रह जिस राशि में उच्च का होता है, उस राशि का स्वामी यदि चंद्र सेे केंद्र में हो तो उस ग्रह का नीचभंग होता है, व जातक राजा होता है, अथवा उच्च पद प्राप्त करता है।

3. जो ग्रह नीच राशिगत होता है, उस राशि का उच्चनाथ यदि चंद्र राशि से केंद्र में हो तो नीचभंग होता है, ऐसा मानते हैं।

4. जो ग्रह नीच राशि मे नीच होता है, वही ग्रह उस राशि स्वामी से यदि युक्त अथवा दृष्ट है, तो नीचभंग राजयोग होता है। परंतु वह नीच ग्रह 6 – 8 – 12 स्थान में नही होना चाहिए (अन्य स्थान में हो तो नीच भंग होता है।) यह योग प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की कुंडली में है।
5. जो ग्रह नीच हो, और नीच ग्रह के राशि स्वामी, व नीच ग्रह जिस राशि मे उच्च होता है, उसका स्वामी ये एक दूसरे से केंद्र में हो तो नीचभंग राजयोग होता है ।

6. नीच ग्रह और नीच ग्रह का राशि स्वामी जिस राशि मे उच्च होता है, वह राशि स्वामी ये दोनों ग्रह यदि लग्न से केंद्र में हो तो नीचभंग होता है।
7. नीच ग्रह का नवमांश स्वामी लग्न के केंद्र व त्रिकोण में हो तो नीचभंग होता है (लग्न व लग्नेश चर राशि मे हों तो यह योग बनता है)
8. नीच ग्रह का राशि स्वामी लग्न व चंद्र से त्रिकोण में हो तो नीचभंग होता है।

9. नीच ग्रह का राशि स्वामी, जहाँ उच्च होता है, वो ग्रह व नीच ग्रह का उच्चनाथ चंद्र के त्रिकोण में हे तो नीचभंग होता है ।।
ऊपर दिये हुये नियम से किसी ग्रह का यदि नीचभंग हुवा है तो भी ये देखना आवश्यक है कि वह योग किस दर्जे का बलवान नीच भंग राजयोग बना रहा है।

विशेष:- इस प्रकार के योग जन्मकुंडली में सैकड़ों बनते हैं, परंतु उन योगों के साथ-साथ एेसे योगों को देखना भी जरूरी है, जो राज योगों को भंग या नगण्य कर देते हैं।

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