षोडश वर्ग

कुंडली में षोडश वर्ग का महत्व :-

Dr.R.B.Dhawan

षोडश अर्थात 16 वर्ग का फलित ज्योतिष में विशेष महत्व है, क्यों की कुंडली का सूक्ष्म अध्ययन करने में उनकी विशेष भूमिका है। आईये सबसे पहले शोडश वर्ग क्या है यह समझ लीजिए :- कुंडली का प्रथम भाव जन्म लग्न कहलाता है, यह भाव तथा सभी 12 भाव 360 अंश परिधि के होते हैं, 360 अंश के 12 भाग ही कुंडली के 12 भाव हैं। अत: कुंडली का कोई भी एक भाव 30 अंश परिधि का माना जाता है। इन 12 भावों में प्रथम भाव लग्न भाव कहलाता है। इस लग्न भाव के 30 अंशों को यदि 2 से भाग किया जाये तो प्रत्येक भाग 15-15 अंश का होगा इस डिवीजन की लग्न भाग को होरा लग्न कहते हैं, इसी प्रकार यदि इस 30 अंश के 3 भाग किये जायें तो प्रत्येक भाग 10 अंश का होगा, इसे द्रेष्कांण और इस के लग्न भाग को द्रेष्कांण लग्न कहते हैं। चार भाग किसे जायेंगे तो इसके लग्न को चतुर्थांश कहेंगे। इसी प्रकार 7 भाग करने पर ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌सप्तमांश लग्न, 9 भाग करने पर नवमांश लग्न, 10 भाग करने पर दशमांश लग्न, 12 भाग करने पर द्वादशांश लग्न, तथा 16, 20, 24 और 30 भाग करने पर क्रमशः षोडशांश, विंशांश, चतुर्विंशांश तथा त्रिशांश लग्न कहते हैं।

कह सकते हैं कि इन वर्गों के अध्ययन के बिना जन्म कुंडली का विश्लेषण अधूरा होता है, क्योंकि जन्म कुंडली से केवल जातक के शरीर, उसकी संरचना एवं स्वास्थ्य के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है, लेकिन षोडश वर्ग का प्रत्येक वर्ग जातक के जीवन के एक विशिष्ट कारकत्व या घटना के अध्ययन में सहायक होता है। जातक के जीवन के जिस पहलू के बारे में हम जानना चाहते हैं, उस पहलू के वर्ग का जब तक हम अध्ययन न करें तो, विश्लेषण अधूरा ही रहता है। जैसे यदि जातक की संपत्ति, संपन्नता आदि के विषय में जानना हो, तो जरूरी है कि होरा वर्ग का अध्ययन किया जाए। इसी प्रकार व्यवसाय के बारे में पूर्ण जानकारी के लिए दशमांश की सहायता ली जाती है। जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं को जानने के लिए किसी विशेष वर्ग का अध्ययन किए बिना फलित गणना में चूक हो सकती है। षोडश वर्ग में सोलह वर्ग होते हैं, जो जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं की जानकरी देते हैं।

जैसे :- होरा से संपत्ति व समृद्धि।

द्रेष्काण से भाई-बहन व पराक्रम।

चतुर्थांश से भाग्य, चल एवं अचल संपत्ति।

सप्तांश से संतान।

नवमांश से वैवाहिक जीवन व जीवन साथी।

दशमांश से व्यवसाय व जीवन की उपलब्धियां।

द्वादशांश से माता-पिता।

षोडशांश से सवारी एवं सामान्य खुशियां।

विंशांश से पूजा-उपासना और आशीर्वाद।

चतुर्विंशांश से विद्या, शिक्षा, दीक्षा, ज्ञान आदि।

सप्तविंशांश से बल एवं दुर्बलता।

त्रिशांश से दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, अनिष्ट।

खवेदांश से शुभ या अशुभ फल।

अक्षवेदांश से जातक का चरित्र।

षष्ट्यांश से जीवन के सामान्य शुभ-अशुभ फल आदि अनेक पहलुओं का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है।

षोडश वर्ग में सोलह वर्ग ही होते हैं, लेकिन इनके अतिरिक्त और चार वर्ग पंचमांश, षष्ट्यांश, अष्टमांश, और एकादशांश भी होते हैं।

पंचमांश से जातक की आध्यात्मिक प्रवृत्ति, पूर्व जन्मों के पुण्य एवं संचित कर्मों की जानकारी प्राप्त होता है।

षष्ट्यांश से जातक के स्वास्थ्य, रोग के प्रति अवरोधक शक्ति, ऋण, झगड़े आदि का विवेचन किया जाता है।

एकादशांश जातक के बिना प्रयास के धन लाभ को दर्शाता है। यह वर्ग पैतृक संपत्ति, शेयर, सट्टे आदि के द्वारा स्थायी धन की प्राप्ति की जानकारी देता है।

अष्टमांश से जातक की आयु एवं आयुर्दाय के विषय में जानकारी मिलती है।

षोडश वर्ग में सभी वर्ग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आज के युग में जातक धन, पराक्रम, भाई-बहनों से विवाद, रोग, संतान वैवाहिक जीवन, साझेदारी, व्यवसाय, माता-पिता और जीवन में आने वाले संकटों के बारे में अधिक प्रश्न करता है। इन प्रश्नों के विश्लेषण के लिए सात वर्ग होरा, द्रेष्काण, सप्तांश, नवांश, दशमांश, द्वादशांश और त्रिशांश ही पर्याप्त हैं।

होरादि सात वर्गों का फलित में प्रयोग :-

होरा: जन्म कुंडली की प्रत्येक राशि के दो समान भाग कर सिद्धांतानुसार जो वर्ग बनता है होरा कहलाता है। इससे जातक के धन से संबंधित पहलू का अध्ययन किया जाता है। होरा में दो ही लग्न होते हैं – सूर्य का अर्थात् सिंह और चंद्र का अर्थात् कर्क। ग्रह या तो चंद्र होरा में रहते हैं या सूर्य होरा में। बृहत पाराशर होराशास्त्र के अनुसार गुरु, सूर्य एवं मंगल सूर्य की होरा में और चंद्र, शुक्र एवं शनि चंद्र की होरा में अच्छा फल देते हैं। बुध दोनोें होराओं में फलदायक है। यदि सभी ग्रह अपनी शुभ होरा में हाे तो, जातक को धन संबंधी समस्याएं कभी नहीं आएंगी, और वह धनी होगा। यदि कुछ ग्रह शुभ और कुछ अशुभ होरा में होंगे तो फल मध्यम और यदि ग्रह अशुभ होरा में होंगे तो जातक निर्धन होता है।

द्रेष्काण: जन्म कुंडली की प्रत्येक राशि के तीन समान भाग कर सिद्धांतानुसार जो वर्ग बनता है वह द्रेष्कांण कहलाता है। दूसरे शब्दों में यह कुंडली का तीसरा भाग है। द्रेष्कांण जातक के भाई बहन से सुख, परस्पर संबंध, पराक्रम के बारे में जानकारी के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त इससे जातक की मृत्यु का स्वरूप भी मालूम किया जाता है। द्रेष्काण से फलित करते समय लग्न कुंडली के तीसरे भाव के स्वामी, तीसरे भाव के कारक मंगल एवं मंगल से तीसरे स्थित बुध की स्थिति और इसके बल का ध्यान रखना चाहिए। यदि द्रेष्काण कुंडली में संबंधित ग्रह अपने शुभ स्थान पर स्थित हैं तो, जातक को भाई-बहनों से विशेष लाभ होगा, और उसके पराक्रम में भी वृद्धि होगी। इसके विपरीत यदि संबंधित ग्रह अपने अशुभ द्रेष्काण में हों तो, जातक को अपने भाई-बहनों से किसी प्रकार का सहयोग प्राप्त नहीं होगा। यह भी संभव है कि जातक अपने मां-बाप की एक मात्र संतान हो।

सप्तांश वर्ग: जन्मकुंडली का सातवां भाग सप्तांश कहलाता है। इससे जातक के संतान सुख की जानकारी मिलती है। जन्मकुंडली में पंचम भाव संतान का भाव माना जाता है। इसलिए पंचमेश पंचम भाव के कारक ग्रह गुरु, गुरु से पंचम स्थित ग्रह और उसके बल का ध्यान रखना चाहिए। सप्तांश वर्ग में संबंधित ग्रह अपने उच्च या शुभ स्थान पर हो तो शुभ फल प्राप्त होता है अर्थात् संतान का सुख प्राप्त होता है। इसके विपरीत अशुभ और नीचस्थ ग्रह जातक को संतानहीन बनाता है या संतान होने पर भी सुख प्राप्त नहीं होता। सप्तांश लग्न और जन्म लग्न दोनों के स्वामियों में परस्पर नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता आवश्यक है।

नवांश वर्ग: जन्म कुंडली का नौवां भाग नवांश कहलाता है। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्ग है। इस वर्ग को जन्मकुंडली का पूरक भी समझा जाता है। आमतौर पर नवांश के बिना फलित नहीं किया जाता। यह ग्रहों के बलाबल और जीवन के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। मुख्य रूप से यह वर्ग विवाह और वैवाहिक जीवन में सुख-दुख को दर्शाता है। लग्न कुंडली में जो ग्रह अशुभ स्थिति में हो वह यदि नवांश में शुभ हो तो शुभ फलदायी माना जाता है। यदि ग्रह लग्न और नवांश दोनों में एक ही राशि में हो तो उसे वर्गोत्मता हासिल होती है, जो शुभ सूचक है। लग्नेश और नवांशेश दोनों का आपसी संबंध लग्न और नवांश कुंडली में शुभ हो तो, जातक का जीवन में विशेष खुशियों से भरा होता है। उसका वैवाहिक जीवन सुखमय होता है, और वह हर प्रकार के सुखों को भोगता हुआ जीवन व्यतीत करता है। वर-वधू के कुंडली मिलान में भी नवांश महत्वपूर्ण है। यदि लग्न कुंडलियां आपस में न मिलें, लेकिन नवांश मिल जाएं तो भी विवाह उत्तम माना जाता है, और गृहस्थ जीवन आनंदमय रहता है। सप्तमेश, सप्तम् के कारक शुक्र (कन्या की कुंडली में गुरु), शुक्र से सप्तम स्थित ग्रह और उनके बलाबल की नवांश कुंडली में शुभ स्थितियां शुभ फलदायी होती हैं। ऐसा देखा गया है कि लग्न कुंडली में जातक को राजयोग होते हुए भी राजयोग का फल प्राप्त नहीं होता यदि नवांश वर्ग में ग्रहों की स्थिति प्रतिकूल होती है। देखने में जातक संपन्न अवश्य नजर आएगा, लेकिन अंदर से खोखला होता है। वह स्त्री से पेरशान होता है, और उसका जीवन संघर्षमय रहता है।

दशमांश: दशमांश अर्थात् कुंडली के दसवें भाग से जातक के व्यवसाय की जानकारी प्राप्त होती है। वैसे देखा जाए तो जन्मकुंडली में दशम भाव जातक का कर्म क्षेत्र अर्थात् व्यवसाय का है। जातक के व्यवसाय में उतार चढ़ाव, स्थिरता आदि की जानकारी प्राप्त करने में दशमांश वर्ग सहायक होता है। यदि दशमेश, दशम भाव में स्थित ग्रह, दशम भाव का कारक बुध और बुध से दशम स्थित ग्रह दशमांश वर्ग में स्थिर राशि में स्थित हों और शुभ ग्रह से युत हों तो व्यवसाय में जातक को सफलता प्राप्त होती है। दशमांश लग्न का स्वामी और लग्नेश दोनों एक ही तत्व राशि के हों, आपस में नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता रखते हों तो, व्यवसाय में स्थिरता देते हैं। इसके विपरीत यदि ग्रह दशमांश में चर राशि स्थित और अशुभ ग्रह से युत हो, लग्नेश और दशमांशेश में आपसी विरोध हो तो जातक का व्यवसाय अस्थिर होता है। दशमांश और लग्न कुंडली दोनों में यदि ग्रह शुभ और उच्च कोटि के हों तो जातक को व्यवसाय में उच्च कोटि की सफलता देते हैं।

द्वादशांश: लग्न कुंडली का बारहवां भाग द्वादशांश कहलाता है। द्वादशांश से जातक के माता-पिता के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। लग्नेश और द्वादशांशेश इन दोनों में आपसी मित्रता इस बात का संकेत करती है कि जातक और उसके माता-पिता के आपसी संबंधी अच्छे रहेंगे। इसके विपरीत ग्रह स्थिति से आपसी संबंधों में वैमनस्य बनता है। इसके अतिरिक्त चतुर्थेश और दशमेश यदि द्वादशांश में शुभ स्थित हों तो भी जातक को माता-पिता का पूर्ण सुख प्राप्त होगा, यदि चतुर्थेश और दशमेश दोनों में से एक शुभ और एक अशुभ स्थिति में हो तो जातक के माता-पिता दोनों में से एक का सुख मिलेगा और दूसरे के सुख में अभाव बना रहेगा। इन्हीं भावों के और कारक ग्रहों से चतुर्थ और दशम स्थित ग्रहों और राशियों के स्वामियों की स्थिति भी द्वादशांश में शुभ होनी चाहिए। यदि सभी स्थितियां शुभ हों तो जातक को माता-पिता का पूर्ण सुख और सहयोग प्राप्त होगा अन्यथा नहीं।

त्रिंशांश: लग्न कुंडली का तीसवां भाग त्रिंशांश कहलाता है। इससे जातक के जीवन में अनिष्टकारी घटनाओं की जानकारी प्राप्त होती है। दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, बीमारी, आॅपरेशन आदि सभी का पता इस त्रिंशांश से किया जाता है। त्रिंशांशेश और लग्नेश की त्रिंशांश में शुभ स्थिति जातक को अनिष्ट से दूर रखती है। जातक की कुंडली में तृतीयेश, षष्ठेश, अष्टमेश और द्वादशेश इन सभी ग्रहों की त्रिंशांश में शुभ स्थिति शुभ जातक को स्वस्थ एवं निरोग रखती है और दुर्घटना से बचाती है। इसके विपरीत अशुभ स्थिति में जातक को जीवन भर किसी न किसी अनिष्टता से जूझना पड़ता है।

इन सात वर्गों की तरह ही अन्य षोड्श वर्ग के वर्गों का विश्लेषण किया जाता है। इन वर्गों का सही विश्लेषण तभी हो सकता है यदि जातक का जन्म समय सही हो, अन्यथा वर्ग गलत होने से फलित भी गलत हो जाएगा। जैसे दो जुड़वां बच्चों के जन्म में तीन-चार मिनट के अंतर में ही जमीन आसमान का आ जाता है, इसी तरह जन्म समय सही न होने से जातक के किसी भी पहलू की सही जानकारी प्राप्त नहीं हो सकती। कई जातकों की कुंडलियां एक सी नजर आती हैं, लेकिन सभी में अंतर वर्गों का ही होता है। यदि वर्गों के विश्लेषण पर विशेष ध्यान दिया जाए तो जुड़वां बच्चों के जीवन के अंतर को समझा जा सकता है। यही कारण है कि हमारे विद्वान महर्षियों ने फलित ज्योतिष की सूक्ष्मता तक पहुंचने के लिए इन षोड्श वर्गों की खोज की और इसका ज्ञान हमें दिया।

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मृतक लोगों के स्वप्न

मृतक लोगों का स्वप्न मे आना, शुभाशुभ विचार :-

Dr.R.B.Dhawan

स्वप्न हर मनुष्य को दिखाई देते हैं, और स्वस्थ व्यक्ति के लिए स्वप्न देखना जरूरी भी है, नींद की अवस्था में कई प्रकार के स्वप्न दिखाई देते हैं, जिनमें कुछ प्रसन्नता देने वाले और कुछ चिंतित करने वाले भी होते हैं, कभी-कभी स्वप्न में हमें अपने ही पूर्वज या पितर अथवा कोई मृत व्यक्ति दिखाई देता है, तब हमें इस प्रकार के स्वप्न का अर्थ समझ नहीं आता। क्या आपके सपने में भी कभी कोई मृत व्‍यक्ति आकर कुछ कहते हैं? क्या होता है, जब आप सपनों में मृत व्‍यक्तियों की आवाज सुनते हैैं, या वो आपका नाम बुलाते हैं। क्‍या आपको मालूम है कि जब कभी मृत व्‍यक्ति सपने में आकर आपका नाम लेते हैं तो, इसका एक मतलब होता है। संभव है वो आपको कुछ बताना चाहते हैं, हो सकता है कि वो आपको कुछ संकेत दे रहें हों? यहां आज हम आपको कुछ बातें बता रहे हैं कि सपने में कोई मृत व्‍यक्ति यदि आप का नाम लेता है तो इसका क्या अर्थ हो सकता है :-

1. यदि आप किसी कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे हैं तो, बार बार कोई मृत व्‍यक्ति आपको सपने में आकर आपका नाम ले रहा है तो, इसका अर्थ है कि वो व्‍यक्ति आपको कुछ अनहोनी के बारे में आगह करना चाहता है।

2. यदि सपने में मृत व्‍यक्ति किसी की बात या किसी व्यक्ति की ओर इशारा कर रहा है तो, इसका अर्थ है, उस व्‍यक्ति से संबंधित या उस बात से संबंधित कोई बुरा समाचार मिलने वाला है।
3. यदि स्वप्न में मृत व्‍यक्ति आपसे कुछ कह रहा है, और आप उनको सुन नहीं पा रहे हैं तो, समझ जाइए कि कोई खुशखबरी आने वाली है।

4. यदि वो सपने में आपसे बात कर रहा है और उसकी आवाज में एक अलग हड़बड़ाहट है तो, इसका अर्थ है कि आप किसी पुराने परिचित से मिलने वाले हैं।

5. यदि सपने में आपको कोई मिलनसार आत्‍मा दिखाई देती है या कोई आत्‍मा आपके साथ थोड़ी फ्रेंडली बनने की कोशिश करती है। तो इसका अर्थ है कि आप अपार सफलता प्राप्‍त करने वाले हैं।
6. यदि आप के सपने में मृत व्‍यक्ति की आवाज थोड़ी तीखी और गहरी होती है तो, वह यह बताती है कि आपकी लाइफ में जल्‍द ही कुछ नया बदलाव आने वाला है।

7. यदि आप सपने में खाली कब्र और शोक सभा की प्रार्थना देखते हैं तो इसका अर्थ है कि आपकी निजी जिंदगी में कोई खतरा आ सकता है।

सैकड़ों प्रकार के स्वप्नों के फल का उल्लेख हमारे पुराणों में कहीं कहीं मिलता है, इसके अलावा बहुत से विद्वानों ने भी इस विषय पर ग्रंथ लिखे हैं, उन में स्वप्न के अनेक प्रकार और फल दिये गये हैं।

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राह दिखाती यह 6 बातें

जीवन को व्यवस्थित करने वाली यह 6 बातें :-

Dr.R.B.Dhawan

श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों में जीवनोपयोगी अनेक शिक्षाएं हैं, जो आज के समय में हमें सही रास्ता दिखाती हैं, श्रीरामचरितमानस के अरण्यकांड में शूर्पणखा जब लक्ष्मण द्वारा नाक, कान काटे जाने के बाद रावण के पास जाती है, तब वह रावण को कहती है कि जीवन में कभी इन 6 बातों को कभी छोटा नहीं समझना :-

रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।

अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।

अर्थात :- शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। ऐसा कहकर शूर्पणखा अनेक प्रकार से विलाप करके रोने लगी।

1. शत्रु अर्थात् दुश्मन :- दुश्मन भले ही कितना ही छोटा क्यों न हो, उसे छोटा नहीं समझना चाहिए, उससे हमेशा सावधान रहना चाहिए। कई बार छोटे दुश्मन भी इतना बड़ा नुकसान कर देते हैं, जिसके कारण बाद में पछताना पड़ता है। यदि छोटे-छोटे राजा मिलकर किसी चक्रवर्ती राजा पर एक साथ हमला कर दें तो उसे भी हरा सकते हैं। इसलिए दुश्मन को कभी छोटा यानी कमजोर नहीं समझना चाहिए।

2. रोग-बीमारी :- छोटी से छोटी बीमारी को भी कभी नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। सर्दी, जुकाम या बुखार आदि भले ही साधारण लगते हों, लेकिन जब यह जब बढ़ जाते हैं तो, शरीर को खोखला कर देते हैं। कई बार ये बड़ी बीमारी का कारण भी बन जाते हैं। साधारण लगने वाली खांसी टी.बी. भी हो सकती है। इन छोटी लगने वाली बीमारियों के कारण ही कई बार मनुष्य को अपने प्राण गंवाने पड़ जाते हैं। इसलिए छोटी बीमारी में भी तुरंत इलाज करवाने में ही समझदारी है।

3. अग्नि अर्थात् आग :- आग में इतनी शक्ति है कि वह कुछ ही समय में बड़े से बड़े जंगल को भी जला कर राख कर सकती है। आग का सबसे छोटा रूप एक चिंगारी होती है, लेकिन जब यह विकराल रूप ले लेती है तो, इस पर नियंत्रण पाना किसी के बस में नहीं होता। इसलिए आग के साथ कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। ये कभी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है।

4. पाप कर्म अर्थात् बुरे काम :- धर्म ग्रंथों के अनुसार, मनुष्यों को उनके द्वारा किए गए कामों के आधार पर पाप व पुण्य की प्राप्ति होती है। कई बार मनुष्य सब कुछ जानकर भी छोटे-छोटे गलत कार्य करते हैं। इन कामों से प्राप्त होने वाला पाप भी कम ही होता है, लेकिन जब इन छोटे-छोटे पाप कर्मों का फल एकत्रित हो जाता है तो इसकी भयानक सजा मिलती है। इसलिए पाप कर्म भले ही छोटा है, लेकिन करने से बचना चाहिए।

5. स्वामी अर्थात् मालिक :- मालिक को कभी भी छोटा नहीं समझना चाहिए। क्योंकि अगर मालिक नाराज हो जाए तो, वह आपका बड़ा नुकसान कर सकता है। अगर आप नौकर हैं, और सोचते हैं कि मालिक को डरा-धमका कर या किसी भी तरीके से अपना काम निकाल लेंगे तो यह आपकी बहुत बड़ी भूल है। मालिक को जब भी मौका मिलेगा, वह आपका नुकसान करने से नहीं चूकेगा। इसलिए मालिक को कभी छोटा यानी कमजोर नहीं समझना चाहिए।

6. सर्प अर्थात् सांप :- सांप दिखने में भले ही कितना भी छोटा क्यों न हो, लेकिन यदि वह एक बार काट ले तो, मृत्यु का कारण बन सकता है। कई बार देखने में आता है कि सांप पकड़ने वाले ही सांप का शिकार बन जाते हैं, क्योंकि उन्हें यही लगता है कि हमेशा की तरह वे सांप को अपने वश में कर लेंगे। उनकी यही सोच कई बार उनकी जान की दुश्मन बन जाती है। इसलिए सांप को कभी छोटा (कमजोर) नहीं समझना चाहिए।

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मन का कारक चंद्रमा

चंद्रमा मन का कारक :-

Dr.R.B.Dhawan

चंद्रमा सौरमंडल के ग्रहों में सबसे तीव्र गति से चलने वाला ग्रह है, ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा को काल पुरुष का मन कहा गया है, यह ग्रह मन का प्रतिनिधित्व करता है, इसी लिए चन्द्रमा को काल पुरुष का मन कहा गया है। चन्द्रमा माता, मन, स्वभाव, जननेन्द्रियों, प्रजनन सम्बन्धी रोगों, गर्भाशय इत्यादि का कारक है, चन्द्रमा जातक के मन की भावनाओं पर नियन्त्रण रखता है, यह जल तत्व ग्रह है, सभी तरल पदार्थ चन्द्रमा के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं इसके अतिरिक्त चन्द्रमा बाग-बगीचे, नमक, समुद्री औषधी, जड़ी-बूटी, मौसम परिवर्तन, विदेश यात्रा, दूध, मान आदि का प्रतिनिधित्व भी करता है। चन्द्रमा के मित्र ग्रह सूर्य और बुध हैं, चन्द्रमा किसी ग्रह से शत्रुता नहीं रखता, चन्द्रमा मंगल, गुरु, शुक्र व शनि से सम संबन्ध रखता है, चन्द्रमा कर्क राशि का स्वामी है, वृषभ राशि में उच्च स्थान प्राप्त करता है, और वृश्चिक राशि में होने पर नीच राशि में और उत्तर-पश्चिम दिशाओं का प्रतिनिधित्व करता है, चन्द्र का भाग्य रत्न मोती है, चन्द्रमा ग्रह का रंग श्वेत, और धातु चांदी माना गया है, चन्द्र का शुभ अंक 2, 11, 20 है, चन्द्रमा के लिए दुर्गा, पार्वती और देवी गौरी की उपासना करनी चाहिए।

चन्द्रमा ग्रह का बीज मंत्र:- ” ऊँ स्रां स्रीं स्रौं स: चन्द्रमसे नम:।” (जप संख्या 11000)

चन्द्र ग्रह का वैदिक मंत्र :- ” ऊँ दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम ।
भाशिनं भवतया भाम्भार्मुकुट्भुशणम।।”

चन्द्रमा की दान योग्य वस्तुएं :- चावल, दूध, चांदी, मोती, दही, मिश्री, श्वेत वस्त्र, श्वेत फूल या चन्दन. इन वस्तुओं का दान सोमवार के दिन सायंकाल में करना चाहिए।

चन्द्रमा से प्रभावित व्यक्तित्व:- चन्द्र राशि लग्न भाव में हो या चन्द्रमा जन्म राशि हो, अथवा चन्द्र लग्न भाव में बली अवस्था में हो, तो व्यक्ति को कफ रोग प्रभावित करते हैं, शरीर की गोलाकार प्रकृति, मन प्रसन्न कर देने वाली आंखे, विनोदी स्वभाव, अतिकामुक, अस्थिर विचारधारा, यह चन्द्रमा से प्रभावित जातक के लक्षण हैं।

चंन्द्रमा के रोग :- चन्द्रमा शरीर में बाईं आंख, गाल, मांस, रक्त बलगम,
वायु, स्त्री में दाईं आंख, पेट, भोजन नली, गर्भाशय, अण्डाशय, मूत्राशय. चन्द्र कुण्डली में कमजोर या पिडित हो, तो व्यक्ति को ह्रदय रोग, फेफडे, दमा, अतिसार, दस्त गुर्दा, बहुमूत्र, पीलिया, गर्भाशय के
रोग, माहवारी में अनियमितता, चर्म रोग, रक्त की कमी, नाडी मण्डल, निद्रा, खुजली, रक्त दूषित होना, फफोले, ज्वर, तपेदिक, अपच, बलगम, जुकाम, सूजन, जल से भय, गले की समस्याएं, उदर-पीडा, फेफडों में सूजन, क्षयरोग, चन्द्रमा से प्रभावित जातक बार-बार विचार बदलने वाला होता है।

चंद्रमा के बली और निर्बल होने पर :-

बाली:- जन्मकुंडली में चन्द्रमा यदि अपनी ही राशि में या मित्र, उच्च राशि षड्बली, शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो, चन्द्रमा की शुभता में वृद्धि होती है, जन्म कुण्डली में चंद्रमा यदि मजबूत एवं बली अवस्था में हो तो, व्यक्ति समस्त कार्यों में सफलता पाने वाला तथा मन से प्रसन्न रहने वाला होता है, पद प्राप्ति व पदोन्नति, जलोत्पन्न, तरल व श्वेत पदार्थों के कारोबार से लाभ मिलता है।

निर्बल:- यदि चन्द्रमा कृष्ण पक्ष की एकादशी से शुक्ल पक्ष की पंचमी के बीच का अथवा नीच या शत्रु राशि में हो, तथा अशुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो, चंद्रमा निर्बल हो जाता है, ऎसी स्थिति में निद्रा व आलस्य घेरे रहता
है, व्यक्ति मानसिक रुप से बेचैन रहता है, उसका मन चंचलता से भरा रहता है, मन में भय व्याप्त रहता है।

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प्रभावित करता है राहु

कैसे प्रभावित करता है, राहु मनुष्य के स्वभाव को:-

Dr.R.B.Dhawan

राहु ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में एक छाया ग्रह कहा गया है, अर्थात इस ग्रह का कोई अपना पिंड नहीं है, वस्तुत: यह दो ग्रहों के भ्रमण मार्ग का कटाव बिंदु मात्र है, परंतु फिर भी कभी-कभी इस ग्रह (कटाव बिंदु) का मनुष्य के मन मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। राहु की प्रवृति राक्षसी होने के कारण ये मनुष्य को तामसिक प्रवृति का अपना गुण प्रदान कर ही देता है, कुंडली में नकारात्मक राहु से प्रभावित व्यक्ति अक्सर भ्रमित रहता है।

पौराणिक धारणा

कैसे बना राहू ग्रह? क्या है राहू ?:-

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हिरन्यकश्यप की सिंहिका नामक पुत्री का विवाह विप्रचिति नामक दानव के साथ हुआ था उसी के गर्भ से राहु ने जन्म लिया। विप्रचिति हमेशा दानवी शक्तियों, आसुरी शक्तियों से दूर रहे और साथ ही समुद्र मंथन के समय अमृतपान के कारण राहु को अमरत्व एवं देवत्व की प्राप्ति हुई। तभी से शिव भक्त राहु अन्य ग्रहों के साथ ब्रह्मा जी की सभा में विराजमान रहते हैं इसलिए इन्हें ग्रह के रूप में मान्यता मिली।

क्या है राहू ?

जन्मकुंडली में राहु पूर्व जन्म के कर्मों के बारे में बताता है, राहु परिवर्तनशील, अस्थिर प्रकृति का ग्रह माना जाता है। राहु में अंतर्दृष्टि भी होती है ताकि वह काल की रचनाओं के बारे में सोच सके बता सके। भौतिक दृष्टि से इसका कोई रंग, रूप, आकार नहीं है, इसकी कोई राशि, वार नहीं होता। वैदिक ज्योतिषियों ने इसकी स्वराशि, उच्च राशि और मूलत्रिकोण राशियों की कल्पना की है। जातक परिजात में राहु की उच्च राशि मिथुन, मूलत्रिकोण कुंभ और स्वराशि कन्या मानी गई है। राहु का व्यवहार अत्यंत प्रभावशाली देखा गया है। राहु पूर्वाभास की योग्यता भी विकसित करता है। विशेषकर जब राहु जल राशियों कर्क, वृश्चिक, मीन में हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि हो।

राहु छुपे हुए रहस्यों, तंत्र, मंत्र, काला जादू व भूत प्रेत का कारक भी है। राहु की तामसिक प्रवृत्ति के कारण वह चालाक है और व्यक्ति को भौतिकता की ओर पूर्णतया अग्रसर करता है, बहुत महत्वाकांक्षी व लालची बनाता है, जिसके लिए व्यक्ति साम-दाम-दंड-भेद की नीतियां अपनाकर जीवन में आगे बढ़ता है।

इसी तरह यह व्यक्ति को भ्रमित भी रखता है। एक के बाद दूसरी इच्छाओं को जागृत करता है। इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह विभिन्न धार्मिक कार्य व यात्राएं भी करता है। राहु प्रधान व्यक्ति में दिखावा करने की प्रवृत्ति विशेष रूप से पायी जाती है। राहु कार्य जाल में फंसाता है, जीवन में आकर्षण को बनाये रखता है, हार नहीं मानता अर्थात इच्छा शक्ति को जागृत रखता है।

राहु का योग जन्म पत्रिका में जिस ग्रह के साथ होगा उसी में विकार उत्पन्न हो जायेगा और केतु का योग जिस ग्रह के साथ होगा उसकी काट होगी। उसका दोष कम हो जायेगा। कोई भी ग्रह राहु के मुख में होगा उस व्यक्ति का व्यवहार उस भाव से संबंधित असंयमित हो जायेगा।

सूर्य के निकट रहने पर राहु सूर्य का सारा बल ग्रहण कर लेता है । इस प्रकार राहु चंद्र के साथ मन की स्थिति बहुत अव्यवस्थित करके मन में उथल-पुथल मचा देता है। विचारों और भावनाओं में विकार उत्पन्न हो जाता है। ऐसा देखने में आया है कि जिन जातकों की जन्मपत्रिका में राहु और चंद्रमा की युति हो वे बहुत परेशान देखे गये हैं, मानसिक सामंजस्यता की बेहद कमी देखी गयी है। अन्य पाप ग्रहों का भी दृष्टि या युति संबंध हो तो मानसिक रोगी व पागलपन की स्थिति भी देखी गयी है।

राहु गुरु के साथ मिलकर गुरु चांडाल योग का निर्माण करता है जो विवाह व ज्ञान प्राप्ति में बाधा बन जाता है। इस प्रकार राहु सभी ग्रहों के साथ युति करके किसी न किसी प्रकार का विकार उत्पन्न करता है। किंतु यह सब फल राहु की दशा अंतर्दशा आने पर ही मिलते हैं। मित्र राशियों में शुभ व शत्रु राशियों में अशुभ फल देते हैं। राहु के परिणाम शुभ मिलेंगे या अशुभ यह मूलतः नक्षत्रों द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।राहु के अपने नक्षत्र हैं आद्रा, स्वाति एवं शतभिषा। इन नक्षत्रों में राहु रहने पर शुभ परिणाम देता है।

ज्योतिष शास्त्रों में राहु पीड़ा को भूत, प्रेत, पिशाच, मसान आदि भी कहा गया है, आयुर्वेद के ग्रंथों में भूत-बाधा को एक विशेष प्रकार की मानसिक बीमारी बताया गया है। आगे की पंक्तियों में कुछ ग्रह योग दे रहा हूं, जो कुंडली में हों तो जातक को अपना प्रभाव दिखाते हैं:-

— लग्न में राहु तथा चंद्र और त्रिकोण में मंगल व शनि हों, तो जातक को प्रेत पीड़ा होती है।

— चंद्र राहु से युक्त अथवा पाप ग्रह से दृष्ट हो, शनि सप्तम में हो तथा कोई शुभ ग्रह चर राशि में हो, तो भूत पीड़ा होती है।

— शनि तथा राहु लग्न में हो, तो जातक को भूत सताता है।

— लग्नेश या चंद्र से युक्त राहु लग्न में हो, तो प्रेत पीड़ा होता है।

— यदि दशम भाव का स्वामी आठवें या एकादश भाव में हो और उस भाव के स्वामी से दृष्ट हो, तो ऐसी स्थिति में प्रेत पीड़ा होता है।

— नीच राशि में स्थित राहु के साथ लग्नेश हो तथा वह लग्नेश सूर्य, शनि व अष्टमेश से दृष्ट हो तो जातक को भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

— पंचम भाव में सूर्य तथा शनि हो, निर्बल अथवा राहु युक्त चन्द्रमा सप्तम भाव में हो तथा बृहस्पति बारहवें भाव में हो, तो भी भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

— जन्म समय चन्द्र ग्रहण हो और लग्न, पंचम तथा नवम भाव में पाप ग्रह हों तो जन्मकाल से ही पिशाच बाधा का भय होता है।

— षष्ठ भाव में पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट राहु या केतु की स्थिति भी पैशाचिक बाधा उत्पन्न करती है।

— लग्न में शनि, राहु की युति हो अथवा दोनों में से कोई भी एक ग्रह स्थिति हो अथवा लग्नस्थ राहु पर शनि की दृष्टि हो, भ्रम होता है।

— लग्नस्थ केतु पर कई पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो, पैशाचिक बाधा होती है।

— निर्बल चन्द्रमा शनि के साथ अष्टम में हो तो पिशाच, भूत-प्रेत मशान आदि का भय।

— निर्बल चन्द्रमा षष्ठ अथवा बाहरहवें में मंगल, राहु या केतु के साथ हो तो भी पिशाच भय।

— चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) के लग्न में राहु और लग्नेश पर यदि षष्ठेश की दृष्टि हो।

— एकादश भाव में मंगल राहु हो तथा नवम भाव में स्थिर राशि (वृष, सिंह,वृश्चिक, कुंभ) और सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु मीन) हो।

— लग्न भाव मंगल से दृष्ट हो तथा षष्ठेश, दशम, सप्तम या लग्न भाव में राहु की स्थिति हों।

— मंगल यदि लग्नेश और राहु के साथ केंद्र या लग्न भाव में स्थिति हो तथा छठे भाव का स्वामी लग्नस्त हो।

— पापग्रहों से युक्त या दृष्ट केतु लग्नगत हो।

— शनि राहु केतु या मंगल में से कोई भी एक ग्रह सप्तम स्थान में हो।

— जब लग्न में चन्द्रमा के साथ राहु हो और त्रिकोण भावों में क्रूर ग्रह हों तो, मानसिक व्याधियां कष्ट देती हैं।

— राहु शनि से युक्त होकर लग्न में स्थित हो तो, मानसिक व्याधियां होती हैं।

— लग्नेश एवं राहु अपनी नीच राशि का होकर अष्टम भाव या अष्टमेश से संबंध करे।

— राहु अष्टम भाव में हो तथा लग्नेश शनि के साथ द्वादश भाव में स्थित हो, तो प्रेत बाधा का प्रभाव संभव होता है।

— द्वितीय में राहु द्वादश में शनि षष्ठ मं चंद्र तथा लग्नेश भी अशुभ भावों में हो।

— चन्द्रमा तथा राहु दोनों ही नीच राशि के होकर अष्टम भाव में हो।

— चतुर्थ भाव में राहु हो वक्री मंगल द्वादश भाव में हो तथा अमावस्या तिथि का जन्म हो तो, नकारात्मक ऊर्जा परेशान करती हैं।

— नीचस्थ सूर्य के साथ केतु हो तथा उस पर शनि की दृष्टि हो तथा लग्नेश भी नीच राशि का हो तो, नकारात्मक ऊर्जा पीड़ित करती है।

— जिन जातकों की कुण्डली में उपरोक्त योग हों, उन्हें विशेष सावधानी पूर्वक रहना चाहिए तथा संयमित जीवन शैली को ग्रहण करना चाहिए। जिन परिस्थितियों के कारण भ्रम अथवा प्रेत बाधा का प्रकोप हो सकता है उनसे बचें। जातक को भ्रम, नकारात्मक ऊर्जा अथवा प्रेतबाधा से मुक्त रखने में यह उपाय सहायक सिद्ध हो सकते हैं:-

— शारीरिक सुचिता के साथ-साथ मानसिक पवित्रता का ध्यान रखें।

— नित्य हनुमान चालीसा तथा बजरंग बाण का पाठ करें।

— मंगलवार का व्रत रखें तथा सुन्दरकांड का पाठ करें।

— पुखराज रत्न से प्रेतात्माएं दूर रहती हैं, पुखराज रत्न धारण करें।

— घर में नित्य शंख बजाये, इससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।

— नित्य गायत्री मंत्र की तीन माला जाप करें।

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नीचभंग राजयोग

नीचभंग राजयोग

Dr.R.B.Dhawan :- 

किसी जातक की जन्मकुंडली में जितने ग्रह बलवान होते हैं, उसकी जन्मकुंडली उतनी ही अधिक बलवान मानी जाती है। इसके अतिरिक्त जन्मकुंडली में जितने ग्रह उच्च राशि में होंगे वह जन्मकुंडली उतनी ही मजबूत होती है । सामान्य स्थिति में तो जन्मकुंडली में कोई ग्रह नीच राशिगत हो तो जन्म कुंडली प्रभावहीन मानी जाती है। नीच ग्रह को देखते ही कुछ ज्योतिषी तो अशुभ फल की घोषणा ही कर देते हैं। भले ही वह प्रभाव किसी अन्य ग्रह के द्वारा दिया गया हो। परंतु मंत्रेश्वर ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ फलदीपिका में इस सिद्धांत का एक दूसरा पहलू भी प्रकाशित किया है, जो की उपरोक्त सिद्धांत के विपरीत है – जन्मकुंडली में नीच राशि के ग्रह होने पर भी कभी-कभी ग्रहों की विशेष स्थिति के कारण जन्मकुंडली में राजयोग का निर्माण होता है।

निचस्थिति जन्मनि यो ग्रह: स्थतदराशिनाथोsपि तदुचनाथा: । 

स चंद्र लग्नायदी केन्द्रवर्ती राजा भवेदधार्मिक चक्रवर्ती  ।।26।।

मंत्रेश्वर ने कहा है- जिन जातको की जन्म कुंडली में नीचभंग राजयोग होता है, वे चट्टानो से भी जल निकालने की क्षमता रखते हैं। ऐसे जातक बहुत अधिक मेहनती होते है, और अपने दम पर एक मुकाम हासिल करते हैं। ये जातक जिस क्षेत्र में भी जाते हैं वही अपनी अमिट छाप बना देते हैं । चाहे दुनिया इनके पक्ष में हो या विपक्ष में इनको सफलता मिलना तय होता हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रमोदी कि कुंडली इसका एक उदाहरण है, जिसमें वृश्चिक लग्न में चंद्रमा और मंगल दोनों स्थित हैं, लग्न में चंद्रमा नीच राशिगत केंद्र में है। आइए देखें कैसे बनते हैं ये नीचभांग राज योग –

1. जातक के जन्म के समय कोई भी एक ग्रह अगर नीच राशिगत हो तो, वो जिस राशि मे नीच होता है, उस राशि का स्वामी यदि चंद्र से केंद्र में हो तो ग्रह का निचभंग होता है ।

2. निचग्रह जिस राशि में उच्च का होता है, उस राशि का स्वामी यदि चंद्र सेे केंद्र में हो तो उस ग्रह का नीचभंग होता है, व जातक राजा होता है, अथवा उच्च पद प्राप्त करता है।

3. जो ग्रह नीच राशिगत होता है, उस राशि का उच्चनाथ यदि चंद्र राशि से केंद्र में हो तो नीचभंग होता है, ऐसा मानते हैं।

4. जो ग्रह नीच राशि मे नीच होता है, वही ग्रह उस राशि स्वामी से यदि युक्त अथवा दृष्ट है, तो नीचभंग राजयोग होता है। परंतु वह नीच ग्रह 6 – 8 – 12 स्थान में नही होना चाहिए (अन्य स्थान में हो तो नीच भंग होता है।) यह योग प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की कुंडली में है।
5. जो ग्रह नीच हो, और नीच ग्रह के राशि स्वामी, व नीच ग्रह जिस राशि मे उच्च होता है, उसका स्वामी ये एक दूसरे से केंद्र में हो तो नीचभंग राजयोग होता है ।

6. नीच ग्रह और नीच ग्रह का राशि स्वामी जिस राशि मे उच्च होता है, वह राशि स्वामी ये दोनों ग्रह यदि लग्न से केंद्र में हो तो नीचभंग होता है।
7. नीच ग्रह का नवमांश स्वामी लग्न के केंद्र व त्रिकोण में हो तो नीचभंग होता है (लग्न व लग्नेश चर राशि मे हों तो यह योग बनता है)
8. नीच ग्रह का राशि स्वामी लग्न व चंद्र से त्रिकोण में हो तो नीचभंग होता है।

9. नीच ग्रह का राशि स्वामी, जहाँ उच्च होता है, वो ग्रह व नीच ग्रह का उच्चनाथ चंद्र के त्रिकोण में हे तो नीचभंग होता है ।।
ऊपर दिये हुये नियम से किसी ग्रह का यदि नीचभंग हुवा है तो भी ये देखना आवश्यक है कि वह योग किस दर्जे का बलवान नीच भंग राजयोग बना रहा है।

विशेष:- इस प्रकार के योग जन्मकुंडली में सैकड़ों बनते हैं, परंतु उन योगों के साथ-साथ एेसे योगों को देखना भी जरूरी है, जो राज योगों को भंग या नगण्य कर देते हैं।

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सरकारी नौकरी का योग

Dr.R.B.Dhawan

पराशरी ज्योतिष के सिद्धांत अनुसार सूर्य को ग्रहों का राजा कहा गया है, राजा अनेक प्रकार से सिद्ध होता है जैसे :- शरीर में सिर और मस्तिष्क जिनका कारक सूर्य है, अर्थात- शरीर पर सिर और मस्तिष्क शासन करते हैं। और सिर व मस्तिष्क पर आत्मा का शासन है। ठीक इसी प्रकार शहर पर विधायक, जिले पर सांसद और सांसदों पर मंत्री, मंत्रीमंडल पर प्रधानमंत्री का शासन होता है, इन सब का सहयोग करते हैं प्रशासनिक अधिकारी। इस प्रकार सूर्य को सौर परिवार का राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। जन्म कुंडली में सरकारी नोकरी के मामले में सूर्य की विभिन्न स्थितियां इस प्रकार फलदायी होती है :–

1- लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य स्थित हो तो व्यक्ति शाोषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है।

2- सूर्य की दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाती है। यहां चंन्द्रमा हो तो, चंद्रमा चंचल तथा अस्थिर ग्रह है, जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार-बार गुजरते हैं।

3- सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते हैं। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप-चुप तरीके से कार्य करने वाले होते हैं।

4-सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा भी प्राप्त होता है।

5- यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध सी.ए., एकाऊंट, गुरु- शिक्षा, बैंक या इंश्योरेंस, शुक्र फाइनेंस सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है।

6-सूर्य का चतुर्थ प्रभाव भी जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते हैं।

7- सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। ऐसे योग राजनीति में भी सफलता दिलाने वाले होते हैं। दशम स्थान कर्म का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है।

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