नीचभंग राजयोग

नीचभंग राजयोग

Dr.R.B.Dhawan :- 

किसी जातक की जन्मकुंडली में जितने ग्रह बलवान होते हैं, उसकी जन्मकुंडली उतनी ही अधिक बलवान मानी जाती है। इसके अतिरिक्त जन्मकुंडली में जितने ग्रह उच्च राशि में होंगे वह जन्मकुंडली उतनी ही मजबूत होती है । सामान्य स्थिति में तो जन्मकुंडली में कोई ग्रह नीच राशिगत हो तो जन्म कुंडली प्रभावहीन मानी जाती है। नीच ग्रह को देखते ही कुछ ज्योतिषी तो अशुभ फल की घोषणा ही कर देते हैं। भले ही वह प्रभाव किसी अन्य ग्रह के द्वारा दिया गया हो। परंतु मंत्रेश्वर ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ फलदीपिका में इस सिद्धांत का एक दूसरा पहलू भी प्रकाशित किया है, जो की उपरोक्त सिद्धांत के विपरीत है – जन्मकुंडली में नीच राशि के ग्रह होने पर भी कभी-कभी ग्रहों की विशेष स्थिति के कारण जन्मकुंडली में राजयोग का निर्माण होता है।

निचस्थिति जन्मनि यो ग्रह: स्थतदराशिनाथोsपि तदुचनाथा: । 

स चंद्र लग्नायदी केन्द्रवर्ती राजा भवेदधार्मिक चक्रवर्ती  ।।26।।

मंत्रेश्वर ने कहा है- जिन जातको की जन्म कुंडली में नीचभंग राजयोग होता है, वे चट्टानो से भी जल निकालने की क्षमता रखते हैं। ऐसे जातक बहुत अधिक मेहनती होते है, और अपने दम पर एक मुकाम हासिल करते हैं। ये जातक जिस क्षेत्र में भी जाते हैं वही अपनी अमिट छाप बना देते हैं । चाहे दुनिया इनके पक्ष में हो या विपक्ष में इनको सफलता मिलना तय होता हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रमोदी कि कुंडली इसका एक उदाहरण है, जिसमें वृश्चिक लग्न में चंद्रमा और मंगल दोनों स्थित हैं, लग्न में चंद्रमा नीच राशिगत केंद्र में है। आइए देखें कैसे बनते हैं ये नीचभांग राज योग –

1. जातक के जन्म के समय कोई भी एक ग्रह अगर नीच राशिगत हो तो, वो जिस राशि मे नीच होता है, उस राशि का स्वामी यदि चंद्र से केंद्र में हो तो ग्रह का निचभंग होता है ।

2. निचग्रह जिस राशि में उच्च का होता है, उस राशि का स्वामी यदि चंद्र सेे केंद्र में हो तो उस ग्रह का नीचभंग होता है, व जातक राजा होता है, अथवा उच्च पद प्राप्त करता है।

3. जो ग्रह नीच राशिगत होता है, उस राशि का उच्चनाथ यदि चंद्र राशि से केंद्र में हो तो नीचभंग होता है, ऐसा मानते हैं।

4. जो ग्रह नीच राशि मे नीच होता है, वही ग्रह उस राशि स्वामी से यदि युक्त अथवा दृष्ट है, तो नीचभंग राजयोग होता है। परंतु वह नीच ग्रह 6 – 8 – 12 स्थान में नही होना चाहिए (अन्य स्थान में हो तो नीच भंग होता है।) यह योग प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की कुंडली में है।
5. जो ग्रह नीच हो, और नीच ग्रह के राशि स्वामी, व नीच ग्रह जिस राशि मे उच्च होता है, उसका स्वामी ये एक दूसरे से केंद्र में हो तो नीचभंग राजयोग होता है ।

6. नीच ग्रह और नीच ग्रह का राशि स्वामी जिस राशि मे उच्च होता है, वह राशि स्वामी ये दोनों ग्रह यदि लग्न से केंद्र में हो तो नीचभंग होता है।
7. नीच ग्रह का नवमांश स्वामी लग्न के केंद्र व त्रिकोण में हो तो नीचभंग होता है (लग्न व लग्नेश चर राशि मे हों तो यह योग बनता है)
8. नीच ग्रह का राशि स्वामी लग्न व चंद्र से त्रिकोण में हो तो नीचभंग होता है।

9. नीच ग्रह का राशि स्वामी, जहाँ उच्च होता है, वो ग्रह व नीच ग्रह का उच्चनाथ चंद्र के त्रिकोण में हे तो नीचभंग होता है ।।
ऊपर दिये हुये नियम से किसी ग्रह का यदि नीचभंग हुवा है तो भी ये देखना आवश्यक है कि वह योग किस दर्जे का बलवान नीच भंग राजयोग बना रहा है।

विशेष:- इस प्रकार के योग जन्मकुंडली में सैकड़ों बनते हैं, परंतु उन योगों के साथ-साथ एेसे योगों को देखना भी जरूरी है, जो राज योगों को भंग या नगण्य कर देते हैं।

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कर्ज की समस्या

कर्ज की समस्या और ज्योतिषीय कारण:-

Dr.R.B.Dhawan:-

जन्म होते ही हम अपने प्रारब्ध के चक्र से बंधे होते हैं, और जन्मकुंडली हमारे इसी प्रारब्ध को सूचित करती है। हमारे जीवन में सभी घटनाएं नवग्रह द्वारा ही सूचित होती हैं। आज के समय में जहाँ आर्थिक असंतुलन हमारी चिंता का एक मुख्य कारण है, वहीँ एक दूसरी स्थिति जिसके कारण अधिकांश लोग चिंतित और परेशान रहते हैं वह है “कर्ज की स्थिति” धन चाहे व्यक्तिगत लिया गया हो, या सरकारी लोन के रूप में, ये दोनों ही स्थितियां व्यक्ति के ऊपर एक बोझ के समान बनी रहती हैं, कई बार ना चाहते हुये भी परिस्थितिवश व्यक्ति को कर्ज रुपी बोझ का सामना करना ही पड़ता है, वैसे तो आज के समय में अपने कार्यो की पूर्ती के लिए अधिकांश लोग कर्ज लेते हैं, परन्तु जब जीवन पर्यन्त बनी रहे या बार-बार यह स्थिति सामने आये तो वास्तव में यह भी हमारी कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोगों के द्वारा ही सूचित होती है।कुंडली में “छटा भाव” कर्ज का भाव माना गया है, अर्थात कुंडली का छटा भाव ही व्यक्ति के जीवन में कर्ज की स्थिति को सूचित करता है, जब कुंडली के :-

छटे भाव में कोई पाप योग बना हो, या षष्टेश ग्रह बहुत पीड़ित हो तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है जैसे –

यदि छटे भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में भावस्थ हो, छठ्ठेे भाव में राहु-चन्द्रमाँ की युति हो, राहु-सूर्य के साथ होने से ग्रहण योग बन रहा हो, छठ्ठेे भाव में राहु मंगल का योग हो, छठ्ठे भाव में गुरु-चाण्डाल योग बना हो, शनि-मंगल या केतु-मंगल की युति छठ्ठे भाव में हो तो …ऐसे पाप या क्रूर योग जब कुंडली के छटे भाव में बनते हैं तो व्यक्ति को कर्ज की समस्या बहुत परेशान करती है और री-पेमेंट में बहुत समस्यायें आती हैं।

छठ्ठे भाव का स्वामी ग्रह भी जब नीच राशि में हो अष्टम भाव में हो या बहुत पीड़ित हो तो कर्ज की समस्या होती है । इसके अलावा “मंगल” को कर्ज का नैसर्गिक नियंत्रक ग्रह माना गया है ! अतः यहाँ मंगल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है यदि कुंडली में मंगल अपनी नीच राशि (कर्क) में हो आठवें भाव में बैठा हो, या अन्य प्रकार से अति पीड़ित हो तो भी कर्ज की समस्या बड़ा रूप ले लेती है”

विशेष: – यदि छठ्ठे भाव में बने पाप योग पर बलवान बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो कर्ज का रीपेमेंट संघर्ष के बाद हो जाता है या व्यक्ति को कर्ज की समस्या का समाधान मिल जाता है परन्तु बृहस्पति की शुभ दृष्टि के आभाव में समस्या बनी रहती है।

छठ्ठे भाव में पाप योग जितने अधिक होंगे उतनी समस्या अधिक होगी, अतः कुंडली का छठा भाव पीड़ित होने पर लोन आदि लेने में भी बहुत सतर्कता बरतनी चाहिये।

बहुत बार व्यक्ति की कुंडली अच्छी होने पर भी व्यक्ति को कर्ज की समस्या का सामना करना पड़ता है, जिसका कारण उस समय कुंडली में चल रही अकारक ग्रहों की दशाएं या गोचर ग्रहों का प्रभाव होता है, जिससे अस्थाई रूप से व्यक्ति उस विशेष समय काल के लिए कर्ज के बोझ से घिर जाता है।

उदाहरणार्थ : अकारक षष्टेश और द्वादशेश की दशा व्यक्ति को कर्ज की समस्या देती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में अलग-अलग ग्रह-स्थिति और अलग-अलग दशाओं के कारण व्यक्तिगत रूप से तो कुण्डली विश्लेषण के बाद ही किसी व्यक्ति के लिए चल रही कर्ज की समस्या के लिए सटीक ज्योतिषीय उपाय निश्चित किये जा सकते हैं। अतः यहाँ हम कर्जमुक्ति के लिए ऐसे कुछ मुख्य उपाय बता रहे हैं, जिन्हें कोई भी व्यक्ति कर सकता है:-

उपाय :-
1. मंगल यन्त्र को घर के मंदिर में लाल वस्त्र पर स्थापित करें, और प्रतिदिन इस मंत्र का एक माला जाप करें :- ॐ क्राम क्रीम क्रोम सः भौमाय नमः।

2. प्रति दिन *ऋणमोचन मंगल स्तोत्र* का पाठ करें।

3. *हनुमान चालीसा* का पाठ करें।

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अष्ट सिद्धियां

अष्ट सिद्धियां, नव निधियां :-

सनातन शास्त्रों में आठ प्रकार की सिद्धियों का वर्णन मिलता है, यह अष्टसिद्धियां क्या हैं, इन्हें कैसे सिद्ध किया जाता है? और उनकी विशेषतायें क्या हैं:-

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पुराणों में बार-बार अष्ट सिद्धियों और नौ निधियां का वर्णन मिलता है, विशेषकर हनुमान चालीसा में सीताजी द्वारा हनुमान जी को दिए वरदान में इसका विशेष वर्णन है, आईये जानें कि क्या हैं ये आष्ट सिद्धियां : –

हर मनुष्य में बीजरूप (अति सूक्षम) कुछ विशेष नैसर्गिक गुण होते हैं। इन्हीं में ही धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य detachment भी हैं। ऐश्वर्य का अर्थ धन संपदा से नहीं है, वह श्री के अंतर्गत आती है। ये ऐश्वर्य अणिमादिक अष्ट सिद्धिंयाँ ही हैं। इन अष्ट सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सदाचार युक्त जीवन व्यतीत करना पडता है, और कहीं न कहीं वैराग्य भाव का भी इसमें योगदान है। वैराग्य detachment है। जितने भी अलौकिक शक्तियों से संपन्न देवी-देवता हुए हैं, उन्होंने सभी चमत्कारपूर्ण कार्य अष्ट सिद्धियों के बल पर ही किये थे।

प्रमुख सिद्धियाँ आठ हैं, सिद्धि का अर्थ है पूर्णता की प्राप्ति होना व सफलता की अनुभूति मिलना, सिद्धि को प्राप्त करने का मार्ग कठिन है, ओर जो इन सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है, वह जीवन की पूर्णता को पा लेता है। असामान्य कौशल या क्षमता अर्जित करने को ही ‘सिद्धि’ कहा गया है। चमत्कारिक साधनों द्वारा ‘अलौकिक शक्तियों को पाना जैसे – दिव्यदृष्टि, अपना आकार छोटा कर लेना, घटनाओं की स्मृति प्राप्त कर लेना इत्यादि, ‘सिद्धि’ यही होती है। शास्त्रों में अनेक सिद्धियों की चर्चा की गई है, और इन सिद्धियों को यदि नियमित और अनुशासनबद्ध रहकर किया जाए तो, अनेक प्रकार की परा और अपरा सिद्धियाँ चिन्हित कि जा सकती है।

यह सिद्धियाँ भी दो प्रकार की होती हैं, एक परा और दूसरी अपरा, यह सिद्धियां इंद्रियों के नियंत्रण और व्यापकता को दर्शाती हैं। सब प्रकार की उत्तम, मध्यम और अधम सिद्धियाँ अपरा सिद्धियां कहलाती है। मुख्य सिद्धियाँ आठ प्रकार की कही गई हैं, इन सिद्धियों को पाने के उपरांत साधक के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। सिद्धियां क्या हैं? व इनसे क्या हो सकता है ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर मार्कंडेय पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में प्राप्त होता है, जो इस प्रकार है:-
अणिमा लघिमा गरिमा प्राप्ति: प्राकाम्यंमहिमा तथा।
ईशित्वं च वशित्वंच सर्वकामावशायिता:।।

यह आठ मुख्य सिद्धियाँ इस प्रकार हैं:- अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता और वंशिका।
1. अणिमा सिद्धि –

अपने शरीर को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता ही अणिमा सिद्धि है, यह वह सिद्धि है, जिसके सिद्ध होने पर मनुष्य सूक्ष्म रूप धर कर एक प्रकार से दूसरों के लिए अदृश्य हो जाता है. इसके द्वारा आकार में लघु होकर एक अणु रुप में परिवर्तित हो सकता है। अणु एवं परमाणुओं की शक्ति से सम्पन्न वो साधक वीर व बलवान हो जाता है, अणिमा की सिद्धि से सम्पन्न योगी अपनी शक्ति द्वारा अपार बल प्राप्त कर लेता है ।

2. महिमा सिद्धि –

अपने को बड़ा एवं विशाल बना लेने की क्षमता को महिमा सिद्धि कहा जाता है, यह शरीर के आकार को विस्तार देती है, विशालकाय स्वरुप को जन्म देने में सहायक है, इस सिद्धि से सम्पन्न होकर साधक प्रकृति को विस्तारित करने में भी सक्षम होता है, जिस प्रकार केवल ईश्वर ही अपनी इसी सिद्धि से ब्रह्माण्ड का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार साधक भी इस सिद्धि को पाकर वैसी शक्ति पा लेता है।

3. गरिमा सिद्धि –
इस सिद्धि से मनुष्य अपने शरीर को जितना चाहे, उतना भारी बना सकता है, यह सिद्धि साधक को अनुभव कराती है कि उसका वजन या भार उसके अनुसार बहुत अधिक बढ़ सकता है, जिसके द्वारा वह किसी के हटाए या हिलाए जाने पर भी नहीं हिल सकता।

4. लघिमा सिद्धि –

स्वयं को हल्का बना लेने की क्षमता ही लघिमा सिद्धि होती है, लघिमा सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत हल्का अनुभव करता है, इस दिव्य महासिद्धि के प्रभाव से योगी सुदूर अनन्त तक फैले हुए ब्रह्माण्ड के किसी भी पदार्थ को अपने पास बुलाकर उस को लघु करके अपने हिसाब से उसमें परिवर्तन कर सकता है ।

5. प्राप्ति सिद्धि –

कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता इस सिद्धि के बल पर प्राप्त होती है, साधक कुछ भी पाना चाहें उसे प्राप्त कर सकता है, इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक जिस भी किसी वस्तु की इच्छा करता है, वह असंभव होने पर भी उसे प्राप्त हो जाती है, जैसे रेगिस्तान में प्यासे को पानी प्राप्त हो सकता है, या अमृत की चाह को भी पूरा कर पाने में वह सक्षम हो जाता है, केवल इसी सिद्धि द्वारा ही वह असंभव को संभव कर सकता है।

6. प्राकाम्य सिद्धि –

कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता प्राकाम्य सिद्धि की उपलब्धि है, इसके सिद्ध हो जाने पर मन के विचार आपके अनुरुप परिवर्तित होने लगते हैं, इस सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत शक्तिशाली अनुभव करता है, इस सिद्धि को पाने के बाद मनुष्य जिस वस्तु कि इच्छा करता है, उसे पाने में सफल होता है, व्यक्ति चाहे तो आसमान में उड़ भी सकता है, और यदि चाहे तो पानी पर चल भी सकता है।

7. ईशिता सिद्धि –

हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना ही इस सिद्धि की पूर्णता है, इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक समस्त प्रभुत्व और अधिकार प्राप्त करने में सफल हो जाता है, सिद्धि प्राप्त होने पर अपने आदेश के अनुसार किसी पर भी अधिकार जमाया जा सकता है, वह चाहे राज्यों से लेकर साम्राज्य ही क्यों न हो, इस सिद्धि को पाने पर साधक ईश रुप में परिवर्तित हो जाता है।

8. वशिता सिद्धि –

जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता को ही वशिता या वशिकरण सिद्धि कहा जाता है, इस सिद्धि के द्वारा जड़, चेतन, जीव-जन्तु, पदार्थ-प्रकृति, सभी को स्वयं के वश में किया जा सकता है।

जो योगी इन अष्ट सिद्धियों को जो प्राप्त कर लेता है, उसे इस मृत्युलोक में ईश्वर के समान मान लिया जाता है, बहुत से योगियों ने इन्हें प्राप्त किया होगा। लेकिन उपलब्ध ग्रंथों, कथाओं, रामायण, महाभारत के अनुसार केवल दो शरीर धारिओं अर्थात जिसने धरती पर जन्म लिया, उन्होंने इनका खुल के प्रयोग किया। कौन हैं ये दोनों? श्रीहनुमान और श्रीकृष्ण। इसीलिए इनका यश और कीर्ति अमर व् अक्शुण है। श्रीकृष्ण को साक्षात् ईश्वर माना गया है, व जरंगबली की महिमा अपरम्पार है।

नव निधि रहस्य :-

भोलेनाथ ओर माँ आदि शक्ति सहज ही उनके भक्तों को आशीर्वाद में ही दे देते हैं नव निधियों का खजाना ।।

ॐ शिवशक्ति ऐं बं पां लं हं त्री अर्धनारीश्वर नमामि जगत शक्तिम नमः।।

नव-निधियां किसी भी मनुष्य को असामान्य और अलौकिक शक्तियां प्रदान करने में सक्षम हैं।

1. पर-काया प्रवेश : किसी अन्य के शरीर में अपनी आत्मा का प्रवेश करवाना पर-काया प्रवेश कहलाता हैं, साधक अपनी आत्मा को यहाँ तक की किसी मृत देह में भी प्रवेश करवा कर उसे जीवित कर सकता हैं।

2. हादी विद्या : यह सिद्धि प्राप्त करने के पश्चात साधक को भूख तथा प्यास नहीं लगती हैं, वह जब तक चाहें बिना खाए-पीये रह सकता है।

3. कादी विद्या : कादी विद्या प्राप्ति के बाद व्यक्ति के शरीर तथा मस्तिष्क पर बदलते मौसम का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, ना तो ठंड लगती है ना गर्मी, ना ही उस पर वर्षा का कोई असर होता है, ना तूफान कुछ बिगाड़ पाता है।

4. वायु गमन सिद्धि : साधक वायु या वातावरण में तैरने में सक्षम होता है, और क्षण भर में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच सकता है।

5. मदलसा सिद्धि : साधक अपने शरीर के आकार को अपनी इच्छानुसार कम या बड़ा सकता है, या कहें तो अपने शारीरिक आकर में अपने इच्छा अनुसार वृद्धि या ह्रास कर सकता है।

6. कनकधर सिद्धि : यह सिद्धि प्राप्त करने वाला साधक असीमित धन का स्वामी बन जाता है, उसकी धन-संपदा का कोई सानी नहीं रहती।

7. प्रक्य साधना : इस साधना में सफल होने के पश्चात साधक अपने शिष्य को किसी विशिष्ट महिला के गर्भ से जन्म धारण करने की आज्ञा दे सकता है।

8. सूर्य विज्ञान : इस सिद्धि को प्राप्त करने के पश्चात साधक, सूर्य की किरणों की सहायता से कोई भी तत्व किसी अन्य तत्व में बदल या परिवर्तित कर सकता है।

9. मृत संजीवनी विद्या : इस विद्या को प्राप्त करने के पश्चात, साधक किसी भी मृत व्यक्ति को पुनः जीवित कर सकता है।

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सरकारी नौकरी का योग

Dr.R.B.Dhawan

पराशरी ज्योतिष के सिद्धांत अनुसार सूर्य को ग्रहों का राजा कहा गया है, राजा अनेक प्रकार से सिद्ध होता है जैसे :- शरीर में सिर और मस्तिष्क जिनका कारक सूर्य है, अर्थात- शरीर पर सिर और मस्तिष्क शासन करते हैं। और सिर व मस्तिष्क पर आत्मा का शासन है। ठीक इसी प्रकार शहर पर विधायक, जिले पर सांसद और सांसदों पर मंत्री, मंत्रीमंडल पर प्रधानमंत्री का शासन होता है, इन सब का सहयोग करते हैं प्रशासनिक अधिकारी। इस प्रकार सूर्य को सौर परिवार का राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। जन्म कुंडली में सरकारी नोकरी के मामले में सूर्य की विभिन्न स्थितियां इस प्रकार फलदायी होती है :–

1- लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य स्थित हो तो व्यक्ति शाोषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है।

2- सूर्य की दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाती है। यहां चंन्द्रमा हो तो, चंद्रमा चंचल तथा अस्थिर ग्रह है, जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार-बार गुजरते हैं।

3- सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते हैं। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप-चुप तरीके से कार्य करने वाले होते हैं।

4-सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा भी प्राप्त होता है।

5- यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध सी.ए., एकाऊंट, गुरु- शिक्षा, बैंक या इंश्योरेंस, शुक्र फाइनेंस सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है।

6-सूर्य का चतुर्थ प्रभाव भी जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते हैं।

7- सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। ऐसे योग राजनीति में भी सफलता दिलाने वाले होते हैं। दशम स्थान कर्म का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है।

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