कुण्डली में विवाह प्रतिबंधक योग Vivah Pratibandak Yog in Kundli

कुण्डली में विवाह प्रतिबंधक योग Vivah Pratibandak Yog in Kundli

मित्रों इस लेख में जातकों की कुंडली में विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) के बारे में आपको अति अन्वेषित एवं अनुभव युक्त लेख सम्पादित कर रहा हूँ। शेयर करें व ज्ञान को असीम जनता तक पहुँचायें।

बचपन की सीमा लांघ कर जैसे ही मनुष्य यौवनावस्था में प्रवेश करता है, उसे एक जीवन-साथी की आवश्यकता महसूस होती है। यह प्राकृतिक नियम है, यौवन के आते ही युवा स्त्री अथवा पुरुष में विवाह की इच्छा उत्पन्न होती ही है। आदिमकाल में तो असभ्य मानव अन्य प्राणियों की तरह यौन सम्बंध बनाकर अपनी यौनेच्छा की पूर्ति कर लेता था, किन्तु ज्यों-ज्यों मनुष्य में सामाजिक भावना का उदय हुआ उसने समाज की व्यवस्था को बनाये रखने के लिये ‘विवाह’ vivah जैसी सामाजिक प्रथा को जन्म दिया, और स्वीकार किया।

तभी से समाज की स्वीकृति के बिना स्थापित किया गया यौन सम्बंध अनैतिक समझा जाने लगा। भारत में विवाह को एक पवित्र बंधन माना जाता है, प्रणय-सूत्र में बंधते ही स्त्री और पुरुष दोनों ही कुछ व्यक्तिगत पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों को समझने लगते हैं। जिनके फलस्वरूप उनमें प्रेम, स्नेह, आत्मसमर्पण एवं कर्त्तव्च्य परायणता से युक्त भावनाओं का जन्म होता है, और इसी कारण उनका विवाहित अथवा गृहस्थ जीवन सुखमय बन पाता है।

सुखमय और प्रेम पूर्ण विवाहित जीवन के लिये यह आवश्यक है कि, स्त्री और पुरुष दोनों ही उत्तम चरित्र से युक्त हों, एक दूसरे को पसंद करते हों, और एक-दूसरे के सुख दुःख में भाग लेते हों, और एक दूसरे को इतना अधिक प्रेम करते हों कि अल्प समय के लिये बिछुड़ने पर बेचैनी का अनुभव करते हों।

अगर स्त्री या पुरुष में से कोई एक अथवा दोनों अपने दायित्वों को नहीं समझते और उनमें उपरोक्त भावनाओं का अभाव हो तो, उनका जीवन कलहपूर्ण होने की संभावना बनी रहती है, या वे विवाहित जीवन में सुख का अभाव या न्यूनता का अनुभव करने लगते हैं, जिसके फलस्वरूप तलाक अथवा आत्महत्या तक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

यह सभी तो तब महत्वपूर्ण है, जब जातक की जन्म कुण्डली में विवाह का योग उचित समय में बन रहा हो, इसके विपरीत यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में विवाह का योग ही नहीं बन रहा हो, अर्थात् विवाह प्रतिबंधक योग बना हो तब! ऐसी स्थिति में जातक के साथ-साथ उसके माता-पिता भी चिंता में डूबे रहते हैं।

अनेक उपाय, अनेक यत्न-प्रयत्न करने पर भी विवाह नहीं होता, तब निराश होकर ज्योतिषीयों और कभी-कभी ओझाओं मौलवीयों की शरण में जाते हैं। वस्तुतः विवाह का योग या विवाह का सुख प्रारब्ध का खेल समझा जाता है, जिसकी सूचना हमें जन्म समय की ग्रह स्थिति (जन्म कुण्डली kundli) से मिलती है।

कभी-कभी जन्म कुण्डली kundli में अनेक प्रकार के ग्रहयोग से विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) का निर्माण हो रहा होता है। इन योगों के साथ-साथ यदि उन विवाह प्रतिबंधक योग बनाने वाले ग्रहों पर किसी शुभ ग्रह की कृपा नहीं होती तो विवाह या विवाह होकर भी वैहिक सुख से जातक हीन रहता है। शुभ ग्रह यदि अपना शुभ प्रभाव डाल रहे हों, तब वह विवाह प्रतिबंधक योगों को भीे भंग कर देते हैं।

अतः एक कुशल विद्वान को विवाह प्रतिबंध करने वाले ग्रहयोंगों के साथ-साथ यह भी विचार करना आवश्यक होता है कि, विवाह प्रतिबंधक योगों पर शुभग्रह अपना प्रभाव किस हद तक डाल रहे हैं? शुभ ग्रह अपना प्रभाव डाल भी रहे हैं अथवा नहीं?

आगे एक जातक की जन्म कुण्डली प्रस्तुत की जा रही है, इस कुण्डली में किस प्रकार विवाह प्रतिबंधक ग्रहों (vivah pratibandak yog in kundli) का प्रभाव है, देखें-
30/10/1982 16:37 Vadodara

vivah pratibandak yog in kundli
vivah pratibandak yog in kundli

ग्रहों के भोगांश
लग्न        11रा    17° 25″ 15′
सूर्य         06रा   13° 06″ 03′
चन्द्रमा    11रा   16°  15″ 58′
मंगल      08रा  05° 26″ 39′
बुध          06रा  00° 22″ 41′
गुरू          06रा  23° 41″ 50′
शुक्र         06रा   11° 55″ 50′
शनि        06रा  03° 00″ 40′
राहु          02रा  13°  33″ 07′

आज इस जातक की आयु लगभग 34 वर्ष हो चुकी है, अभी तक अनेक प्रयत्न कर चुके इसके अभिभावक अनेक उपाय कर, कर के थक चुके हैं, परंतु विवाह नहीं हो रहा। मीन लग्न की इस कुण्डली में सप्तम भाव का स्वामी बुध है, यह ग्रह शुक्र की तुला राशि में परंतु अष्टम भाव में सूर्य से अस्त है, हालांकि सप्तम भाव पर पंचमेश चन्द्रमा की सप्तम पूर्ण दृष्टि का योग है, कुण्डली में लग्न तथा चन्द्र लग्न दोनों से सप्तमेश बुध अस्त तथा अष्टम भाव में विवाह का प्रतिबंध सूचित कर रहा है।vivah pratibandhak yog in navansh kundli

विवाह कारक शुक्र द्वितीय व अष्टम भावाधिपति होकर अष्टम भाव में स्थित है, बेशक यह ग्रह स्वग्रही है परंतु इस स्थान में अशुभ फल ही प्रदान कर रहा है, यह शुक्र यहां सूर्य से अस्त भी है। शुक्र तथा बुध का षष्ठेश सूर्य के साथ अष्टम भाव में अस्त होना निश्चित ही विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) का निर्माण कर रहा है।

यहां लग्नेश गुरू शुभ ग्रह होने के कारण थोड़ा शुभ फल दे सकता था परंतु यह ग्रह भी सूर्य के सानिध्य में अस्त है। लग्नेश गुरू, सप्तमेश-चतुर्थेश बुध तथा विवाह सुख का कारक ग्रह शुक्र अष्टम भाव में तो हैं ही, साथ-ही अस्त भी हैं।

इन ग्रहों के साथ कुण्डली में भाग्य स्थान के स्वामी मंगल पर शनि की क्रूर दृष्टि भी विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) में अपना योगदान दे रही है। वर्तमान समय में 13-06-2007 से जातक की शुक्र की महादशा है, इस समय शुक्र की महादशा में राहु की अंतरदशा 13-08-2017 तक रहेगी।

आगे 13 अगस्त 2017 से 13-04-2020 तक गुरू की अंतरदशा होगी, इस अवधि में नैसर्गिक शुभ ग्रह गुरू के शुभ प्रभाव से उपरोक्त अवधि में जातक के लिये शुभ की आशा की जा सकती है। परंतु इस अवधि में भी विवाह संभव होगा या नहीं? पूरी तरह मैं आशा नहीं कर सकता।

गुरू ही एक ग्रह है, जो इस जन्म कुण्डली के अशुभ ग्रहों को अपने शुभ प्रभाव से अनुकूल कर सकता है। परंतु कुण्डली के अधिकांश ग्रह विवाह प्रतिबंधक ग्रहों अथवा योगों (vivah pratibandak yog in kundli) को ही बलवान सूचित कर रहे हैं।