शनिश्चरी अमावस्या

शनिश्चरी अमावस्या जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं-

  1. ग्रह दोष
  2. पितृदोष
  3. सहभागी कृत दोष

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष- आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

शनैश्चरी अमावस्या-

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री- इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य है, उन सभी के नाप की ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ प्राप्त कर लेनी चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित की गई हो। यह मुद्रिका ऐसी होनी चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

 

 

फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या

फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या है जो आज पूरे विश्व में छाई हुई है फैंगशुई का अर्थ है विन्ड वॉटर (हवा और पानी) हवा ऊर्जा को चारों ओर वितरित करती है और पानी संचित करती है। ये दोनों ऊर्जाएं मनुष्य के जीवन पर प्रभाव डालती है अच्छी ऊर्जा (च्वेपजपअम म्दमतहल) उस परिवेश में रहने वालों को अच्छा स्वास्थ्य शांति तथा समृद्धि प्रदान करती हैं। फैंगशुई को अपनाकर इस नकरात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के लिए क्र्योस (उपाय) का सहारा लेते हैं।

वास्तव में यह एक जीवनशैली (लाइफ स्टाइल) है जो पूर्ण रूप से हमारे जीवन से जुड़ी हुई है हमारे आस-पास की चीजों का स्थान परिवर्तन करके जीवन में सुधार लाया जा सकता है। फैंगशुई को चीन की वास्तुकला भी कहते हैं। हजारों वर्षो से चीन के लोग वातावरण में मौजूद इन सकारात्मक एवं नकारात्मक शक्तियों का सफलता पूर्वक प्रयोग करके व उन्हें ठीक दिशा में प्रवाहित करके उनके माध्यम से अपने जीवन में खुशहाली प्राप्त करने में सफल रहे हैं।

यदि आप भी अपने आस-पास की वस्तुओं को ठीक जगह पर स्थापित कर लें जो प्रकृति के साथ अच्छा तालमेल बिठाने में समर्थ होंगे। दोषपूर्ण फैंगशुई जीवन में असामंजस्यता तथा परेशानियों का कारण हो सकती है। वास्तुशास्त्र के अनुसार भवन निर्माण से पहले दिशाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है या निर्मित भवन को तोड़कर उसमें सुधार लाया जा सकता है जबकि फैंगशुई में आप सिर्फ अपने आस-पास की वस्तुओं को ठीक जगह स्थापित करके या क्योर लगा कर इसका लाभ उठा सकते है सही दिशा में संबंधित क्योर लगाकर हम उस दिशा से संबंधित परेशानियों का निवारण कर सकते हैं।

 

नेत्ररोग नाशक चाक्षुशी विद्या

नेत्ररोग नाशक चाक्षुशी विद्या नेत्र रोग का हरण करने वाली, पाठ मात्र से सिद्ध होने वाली चाक्षुशी विद्या की व्याख्या करते हैं, जिससे समस्त नेत्ररोगों का सम्पूर्णतया नाश हो जाता है। और नेत्र तेज युक्त हो जाते हैं। उस चाक्षुशी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द हैं, सूर्य भगवान देवता हैं, नेत्र रोग की निवृत्ति के लिए इसका जप होता है। यह विनयोग है।

नेत्रोपनिषद मंत्रः-

ऊँ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरिमं चछुरोगान् शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कलप्य। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मलय निर्मलय। ऊँ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ऊँ नमः करूणाकरायामृताय। ऊँ नमः सूर्याय। ऊँ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम। खेचराय नमः महते नमः रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्रमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवा´छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्यक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।

ऊँ (भगवान का नाम ले कर कहे)। हे चक्षु के अधिकारी सूर्य देव ! आप चक्षु में चक्षु के तेज रूप में स्थिर हो जायँ। मेरी रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आंखों के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना स्वर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे में अन्धा न होऊँ (कृपया) वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, उखाड़ दें। ऊँ (सच्चिदानन्दस्वरूप) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्कर को नमस्कार है। ऊँ करूणाकर अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ऊँ सूर्य भगवान् को नमस्कार है। ऊँ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्य देव को नमस्कार है। ऊँ आकाश बिहारी को नमस्कार है। परम श्रेष्ठस्वरूप को नमस्कार है। ऊँ (सबमें क्रिया-शक्ति उत्पन्न करने वाले) रजोगुणरूप सूर्य भगवान को नमस्कार है। (अन्धकार को सर्वथा अपने अंदर समा लेने वाले) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! मुझको असत से सत की ओर ले चलिये। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्णस्वरूप भगवान् सुर्य शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं-उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई नहीं है। जो ब्रह्माण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है, उसको नेत्र सम्बंधी कोई रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अंधा नही होता। आठ ब्रह्ममणों को इस विद्या का दान करने पर इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्ध होती है।

जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों से सुशोभित एवं जातवेदा (भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाले) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय (सुवर्ण के समान कान्तिमान्) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व जो एकमात्र उत्पत्तिज्ञथान हैं, उन प्रचण्ड प्रताप वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव समस्त प्रजाओं (प्राणियों) के समक्ष उदित हो रहे हैं।

ऊँ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।

ऊँ षड्विध ऐश्वर्य से समपन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, दिन का भार वहन करने वाली है। हम उन भगवान् के लिए उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेघा अत्यंत प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पंक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे। ‘‘भगवन् ! इस अंधकार को छिपा दीजिए, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिए तथा तमोमय बन्धन में बधे हुए हम सब प्राणियों को अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार है। पुष्करेक्षण को नमस्कार है। निर्मल नेत्रों वाले अमलेक्षण को नमस्कार है। कमलेक्षण को नमस्कार है। विश्व रूप को नमस्कार है।

नेत्र रोग से पीडि़त श्रद्धालु साधक को चाहिए कि प्रतिदिन प्रातःकाल हरिद्रा (हल्दी के रस) से अनार की शाखा की कलम के द्वारा काँसे के पात्र में निम्नलिखित विधि से यन्त्र को लिखें।

फिर उसी यन्त्र पर ताँबे की कटोरी में चर्तुमुख (चारो ओर चार बत्तीयो का) घी का दीपक जलाकर रख दें। तदानन्तर गन्ध-पुष्पादि से यन्त्र का पूजन करें। फिर पूर्व की ओर मुख करके बैंठे और हरिद्रा (हल्दी) की माला से ऊँ ह्नीं हंसः’ इस बीज मंत्र की छः मालाएँ जप कर नेत्रोंपनिषद के कम से कम बारह पाठ करें। पाठ के पश्चात फिर उपर्युक्त बीजमंत्र की पांच मालाएँ जपें। तदनन्तर सूर्य भगवान् को श्रदापूर्वक अघ्र्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा।

ऐसा करते रहने से इस उपनिशद् का नेत्ररोगनाशक अदभुत प्रभाव बहुत शीघ्र देखने में आता है।

 

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण भारतीय ऋषियों ने 16 संस्कारों के रूप में जो अनुशासित व्यवस्था व्यक्तित्व निर्माण के लिये रूपान्तरित की है, उसमें विवाह संस्कार का स्थान महत्वपूर्ण है। विवाह पीढ़ी-विस्तार का समाज सम्मत हेतु है। विवाह विभिन्न सभ्यताओं, सुसंस्कृतियों, संस्कारों, विचार धाराओं और भाव धाराओं के सम्पर्क का भी हेतु है।

विवाह नामक रसपूर्ण संस्कार के प्रति व्यक्ति कि उत्कंठा, जिज्ञासा और लालसा सहज ही है। किन्तु नियति सबके प्रति समान रूप से उदार नहीं होती। आज उचित समय पर विवाह सम्पन्न होना एक दुःसाध्य प्रक्रिया हो गई है- विशेषतः कन्या पक्ष के संदर्भ में। ग्रहों का अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन पर निर्विवाद रूप से पड़ता है। इस संदर्भ में आस्था अनास्था से कोई अन्तर नही पड़ता। जैसे किसी बंद कमरे में बैठकर सूर्य के आलोक अथवा तेज का प्रतिवाद नही किया जा सकता उसी प्रकार ज्योतिष भाग्य और ईश्वर में अश्रद्धा उसके मौलिक प्रभाव को क्षति नही पहुँचाती। इस सत्य को निरन्तर ध्यान में रखना चाहिए। व्यक्ति के जीवन में जन्म के समय ग्रहों की स्थिति एक प्रमुख भूमिका रखती है।

समस्त जीवन इनकी शुभता-अशुभता, सुसंयोगिता- कुसंयोगिता और प्रभुता-क्षीणता के द्वारा निर्धारित होता है। व्यक्ति आजीवन अपनी नियति से संघर्ष करता है और पराभूत होने का दर्शन सीखता है। कन्या के विवाह में अनपेक्षित विलम्ब देखकर अभिभावक चिन्ता के महासमुद्र में निमग्न हो जाते हैं।

अपनी समस्त शक्ति और सामाजिक परिचय का उपयोग करके भी वे अपनी कन्या के लिए उपयुक्त वर नहीं प्राप्त कर पाते। जीवन ऐसे अभावों का क्रूर साक्षात्कार है।

जीवन के अभावों की पूर्ति के लिए मानव ने तंत्र-मंत्र-यंत्र का भी समय समय पर प्रयोग-उपयोग किया है। सर्वप्रथम मंत्र के अर्थ विस्तार की संक्षिप्त विवेचना अनिवार्य है। वैदिक ऋचाओं से दैवी शक्तियों की स्तुतियों, यज्ञादि के लिए विचरित पदों एवं शब्द प्रतीकों तक मंत्र की एक सुसंस्कृत परम्परा प्रवाहमान है। मंत्र शब्द की सामथ्र्य का चरणतम केन्द्रियभूत आह्नान है। ‘मंत्र’ शब्द मंत्रि गुप्तभाषणे’’ धातु से घ् प्रत्यय द्वारा निष्पन्न होता है जिसका तात्पर्य है रहस्य। वह रहस्य जो देवोपम है किन्तु मानवीय अनुभूति का विषय है। तंत्र साहित्य के मतानुसार वह प्रत्येक शब्द मंत्र है जो देवता की स्तुति में निवेदित है। श्रुति, स्मृति, पुराण, उपनिषद, आगम और निगम सभी मंत्रों के उल्लेख से परिपूर्ण हैं। यह सत्य है कि वैदिक मंत्र जितने शक्तिसम्पन्न हैं, उनकी साधना उतनी हीं दुरूह और दुष्कर है। इसलिए वेदोक्त मंत्रों के स्थान पर तंत्र शास्त्र आज किंचित् सहज समझा जाता है। इस तथ्य के विस्तार में जाना इसलिए अप्रासंगिक होगा क्योंकि इस लेख की केन्द्रिय वस्तु है कि विवाह योग्य युवक या कन्या के विवाह में विलम्ब होने पर किन मंत्रो के प्रयोग से आशानुकूल सफलता प्राप्त होगी। अनुभव से सिद्ध हो चुका है कि युवक या कन्या के विवाह मे आने वाली अनेकानेक बाधाओं की शांति मंत्रशक्ति से सुनिश्चित हो सकती है।

जन्मांग में शनि की स्थिति, शनि द्वारा प्रचालित स्थिति, राशियाँ, नक्षत्र और भाव आदि का अध्ययन करना चाहिए। यदि शनि शुक्र से युक्त होकर, सूर्य अथवा चन्द्र किसी एक ग्रह पर दृष्टि निक्षेप करता हो तो विवाह मे विलम्ब होता है। यदि सूर्य अथवा चन्द्र या दोनों संयुक्त रूप से शनि के नवांश में स्थित हों और शुक्र भी शनि से अक्षिप्त हो तो विवाह में आशा के विपरीत विध्न उपस्थित होतें हैं। सप्तम भाव अथवा लग्न के पाप ग्रहक्रांत होने पर पापकर्तरि योग की स्थापना होती है जिसके परिणाम स्वरूप दाम्पत्य अनेकानेक संकटो से घिर जाता है। लग्न सप्तम भाव अथवा इसके अधिपति ग्रह यदि सूर्य और शनि, शनि और मंगल, शनि और राहु, आकर सूर्य जैसे क्रूर ग्रहों से आबद्ध होते हैं तो विवाह की दिशा में विलम्ब अथवा निषेध जैसे संकेत प्राप्त होते हैं। विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब तब भी होता है जब लग्नाधिपति, सप्तमाधिपति, चन्द्रराशि-अधिपति और स्वयं चन्द्र शनि से दृष्ट, युक्त अथवा द्वादश भावस्थ होते हैं। वक्री ग्रह की सप्तम भाव अथवा सप्तम भावेश पर दृष्टि अथवा स्थिति या युति विवाह में बाधा उत्पन्न करती हैं। इन्हीं स्थितियों में द्वितीय भाव या शुक्र हो तो विवाह विलम्बित होता है। पंचमेश और सप्तमेश का परस्पर परिवर्तन योग स्थापित हो अथवा राहु और शुक्र सप्तम अथवा नवम भाव में हों तथा क्रूर ग्रह की दृष्टि का कुसंयोग हो तो विवाह में ज्योतिषीय दृष्टि से विलम्ब की घोषणा की जा सकती है।

 

Diwali Pooja Muhurat 2016

diwali pooja muhurat 2016

Diwali Pooja Muhurat 2016

30 अक्तूबर 2016 दीपावली पर्व है। दीपावली की रात्रि प्रदोषकाल में महालक्ष्मी पूजन (Diwali Pooja Muhurat 2016) की परम्परा आदिकाल से चली आ रही है। इस दिन सूर्य व चन्द्रमा तुला (शुक्र की राशि) में विचरण कर रहे होते हैं।

कार्तिक अमावस्या की रात्रि स्थिर लग्न (वृष या सिंह) में महानिशीथ काल में महालक्ष्मी का पूजन करने से माता लक्ष्मी साधक के घर स्थाई निवास करती हैं।

इस वर्ष महालक्ष्मी पूजन MahaLaxmi Diwali Pooja Muhurat 2016 का शुभ तथा विशेष मुहूर्त सॉय 18:28 से आरम्भ होकर 20:22 तक रहेगा।

इस दिन सॉय 18:28 से 20:22 तक के समय में अमावस्या तिथि अंतर्गत वृष लग्न तथा शुभ, अमृत तथा चर का चौघडिया का शुभ योग बना है।

स्थिर लग्न के मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन करने से धन-धान्य स्थिर रहता है। इस मुहूर्त में दीपदान, गणपति सहित महालक्ष्मी पूजन, कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन तथा धर्मस्थलों में और अपने घर में दीप प्रज्जवलित करना चाहिये।

Related :

दीपावली पूजन तथा इस रात्रि में की जाने वाली विशेष साधनाओं का विस्तार पूर्वक विवरण जानने के लिये देखें गुरूजी द्वारा प्रकाशित अॉनलाईन ज्योतिषीय मासिक पत्रिका aapkabhavishya यह पत्रिका www.shukracharya.com पर नि:शुल्क उपलब्ध है।

इस के अतिरिक्त AapKaBhavishya.in पर भी गुरूजी (डा. आर.बी.धवन) के ज्योतिषीय लेख भी आप पढ़ सकते हैं।

Santaan Prapti Upaya for Diwali – इस दीपावली करें संतान प्राप्ति उपाय

santaan-prapti-upaya-diwali-2016

Santaan Prapti Upaya संतान प्राप्ति उपाय (एक दिवसीय दीपावली साधना प्रयोग)

कुण्डली में संतानोत्पत्ति योग न हो अथवा अनेक बार गर्भ हानि होती रही हो या संतान दीघार्यु नहीं होती हो तो उसके लिए यह संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya महत्वपूर्ण है। इस साधना प्रयोग को दीपावली की रात्रि में संतान की इच्छा करने वाली महिला के संपन्न करने से संतान का योग प्रबल होकर एक वर्ष में संतानोत्पत्ति अवश्य होती है। और वह संतान आज्ञाकारी होती है। इस प्रकार के प्रयोग से गृहस्थ जीवन अनुकूल एवं सुखदायी बन जाता है।

संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya के लिए साधिका को चाहिए कि वह दीपावली की रात्रि में स्नानादि कर पीले वस्त्र धारण कर पूर्व की तरफ मुख कर के पीले आसन पर बैठ जाएं सामने लकड़ी की चौकी पर एक थाली में चावल से त्रिकोण बनाकर उसके मध्य में मोती पर बने अभिमंत्रित मुक्ता गणपति की स्थापना करें और फिर पंचोपचार (फूल, चावल, रोली, कलावा तथा धूप-दीप) से पूजा करके पुत्रजीवा की 108 दानों वाली माला से 51 माला अग्रलिखित मंत्र जप पूर्ण करें।

यही प्रयोग प्रत्येक माह शुक्ल पंचमी के दिन गर्भवती होने तक पुत्र की इच्छा रखने वाली महिला को दोहराना चाहिये। निश्चय ही उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। यही संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya उस महिला का पति या घर का कोई अन्य सदस्य भी कर सकता है, परंतु उसको उस महिला के नाम का संकल्प अवष्य लेना होगा। यदि कोई साधक-साधिका किसी दूसरे के लिए प्रयोग करना चाहे तो संकल्प ले लें कि ‘मैं यह प्रयोग अमुक व्यक्ति के लिए संपन्न कर रहा/रही हूँ।

मंत्र- ऊँ नमो नारायणाय पुत्र सन्तानं देही देहि ठः ठः स्वाहा।

जप पूर्ण होने पर गणपति जी को मिष्ठान का भोग लगवाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें। वह माला जल में विसर्जित कर दें। मुक्ता गणपति का चांदी में लॉकेट बनवाकर महिला को गले में धारण करना चाहिये।

साधना सामग्री– अभिमंत्रित मुक्ता गणपति (मोती पर बने गणपति), 108 दाने की पुत्रजीवा माला।

न्यौछावर राशि रू. 3100

संपर्क : Sukracharya, F-265, Street No. 22, Laxmi Nagar, Delhi-110092, Mob: 09810143516

Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

janmashtami 2016

Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

आज जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के शुभअवसर पर आपके लिए प्रस्तुत है यह लेख।  सनातन दर्शन का यह मूलभूत सिद्धांत है कि जिस सत्चित् आनंद के आश्रय से यह दृश्यमान जगत अथवा यह धरातल संचालित हो रहा है, उसी के सहारे नियमित रूप से प्राणियों की आवश्यकता और रक्षा की व्यवस्था भी हो रही है।

भक्तों की धारणा है कि जब-जब विश्व व्यवस्था में अतिक्रमण होता है, तब-तब निराकार ईश्वर का एक अंश मूर्त साकार रूप ग्रहण करके व्यवस्था की पुनः स्थापना करने के लिये अवतीर्ण होता है, विश्व-व्यवस्था कि सुस्थिति, विश्वमंगल के लिये आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। इसलिये पूर्णब्रह्म परमेश्वर अवतार धारण कर अव्यवस्था जन्य भूमिभार का हरण करते हैं।

शास्त्रों ने ऐसे चैबीस अवतारों में श्रीराम और श्रीकृष्ण के अवतारों को विशेष महत्व दिया है। श्रीराम सोइ सच्चिदानंदघन रामा हैं और श्री कृष्ण भागवताकार के शब्दों में कृष्णस्तु भगवान स्वयम् हैं।

दोनों ने तत्कालीन अव्यवस्था एवं धर्मग्लानि को दूर करने के लिये अलौकिक शक्ति, अद्भुद् सौंदर्य और मर्यादा क्षमाशील विधान का आदर्श रूप उपस्थित कर विश्व व्यवस्था को सुचारूता दी। दोनों ने रावण, कंस आदि नृशंस राजाओं की उच्छृंखलता को परास्त कर साधु संरक्षण और लोक मंगल की विधायिनी व्यवस्था को संस्थापित किया।

यही कारण है कि इनकी अवतरण तिथियों को मनाये जाने वाले हमारे व्रत, उत्सव आदि में इनका प्रभाव अक्षुण्ण है और हम इनके आदर्श को समझने एवं व्यवहार में लाने के लिये इनकी जन्म जयंतियाँ प्रतिवर्ष व्रत के रूप में मनाते हैं। तथा लौकिक व परलौकिक लाभ उठाते हैं।

उसी परंपरा में हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रª के ये दो महान पर्व हैं- श्रीराम नवमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016)। श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण का आर्विभाव इसी तिथि को बुधवार के दिन रोहिणी नक्षत्र में अर्द्धरात्रि के समय हुआ था।

शास्त्रों में अष्टमी व्रत के दो भेद किये गये हैं- शुद्धा और विद्धा। सूर्योदय से सूर्योदय तक व्याप्त अष्टमी शुद्धा और सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच सप्तमी अथवा नवमी से युक्त होने पर विद्धा कही जाती है। फिर इनके तीन भेद किये जाते हैं:- समा, न्यूना और अधिका। इन भेदों के कारण अष्टमी अट्ठारह प्रकार की ही हो जाती है।

परंतु मान्यता की दृष्टि से तत्काल (अर्धरात्रि-व्यापिनी) अष्टमी ही ग्राह्य मानी गई है। ऐसी अष्टमी (Janmashtami) दो दिनों तक अथवा दोनों ही दिन न हो तो नवमी विद्धा ही ग्रहण करनी चाहिये।

इस वर्ष जन्माष्टमी का यह पर्व 25 अगस्त 2016 के दिन मनाया जाना शास्त्र सम्मत है, इस दिन सूर्याेदय के समय कृतिका नक्षत्र उदय होगा तदुपरांत दोपहर 12:10 से रोहिणी नक्षत्र आरम्भ होगा।

इस व्रत का महत्व शिव, विष्णु, ब्रह्मा भविष्य आदि पुराणों में तथा धर्मसिंधु, निर्णय-सिंधु आदि निबंध-ग्रंथों में प्रचूरता से वर्णित है। यह सर्वमान्य, पापघ्न तथा बाल, वृद्ध, कुमार, युवा अवस्था वाले नरों व नारियों के लिए अनुष्ठेय है।

कुछ शास्त्रों के अनुसार जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत नहीं करने वाले सक्षम नर-नारियों को पाप लगता है, और करने वालों के पापों की निवृत्ति एवं सुख की अभिवृद्धि होती है। इस व्रत में अष्टमी में उपवास और भगवत्पूजन का तथा नवमी में पारणा करने का विधान है।

अष्टमी (Janmashtami 2016) के एक दिन पहले लघु भोजन करना चाहिये। रात्रि में जितेंद्रिय रहना चाहिये। उपवास के दिन प्रातः स्नानादि नित्यकर्म करके सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि आकाष, आकाषचारी देवता और ब्रह्मा आदि को नमस्कार करके पूर्व या उत्तर मुख बैठें, हाथ में जल, फूल, कुष और गंध लेकर संकल्प करें-
ममाखिलपापप्रषमनपूर्वकं सर्वाभीष्टसिद्धये श्री कृष्णजन्माष्टमीव्रतमहं करिष्ये।

मध्याह्न समय में काले तिल डालकर उस जल से स्नान करके देवकी जी के लिये -सूतिकागृह नियत करें। उसे स्वच्छ व सुषोभित करके उसमें सूतिकोपयोगी सामग्री यथाक्रम रखें। गीतवाद्य का आयोजन करना और अधिक अच्छा होगा।

सूतिका गृह के सुःखद शोभन विभाग में सुंदर सुकोमल बिछौने के सुदृढ़ मंत्र पर अक्षतादि का मंडल बनवाकर उसपर शुभ कलष स्थापित करें एवं उसी पर सोना, चांदी, तांबा, पीतल, मणि, वृक्ष, मिट्टी या चित्ररूप भगवान की मूर्ति स्थापित करें।

मूर्ति में सद्यःप्रसूत श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और श्री लक्ष्मी जी उनके चरणस्पर्ष किये हुए हों- यह भाव प्रकाष्य होना चाहिए। फिर यथा समय भगवान के आर्विभाव की भावना कर वैदिक विधि पुरूष सुक्त से षोडशोपचार पूजन करना चाहिये।

यदि ऐसा करना संभव न हो तो पौराणिक अथवा संप्रदायानुसार दषोपचार या पंचोपचार आदि से पूजन करके आरती उतारनी चाहिये। इस पूजन में देवकी, वसुदेव, नंद, यषोदा और लक्ष्मीजी- इन सबका नाममंत्र से पूजन करना चाहिए।

अंत में निम्नांकित मंत्र से अध्र्य दें-
प्रणमे देवजननीं त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात्तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमोनमः।।
सपुत्राघ्र्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।।

फिर श्रीकृष्ण को पुष्पांजलि दें –
‘धर्माय धर्मेष्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’

इसके बाद जातकर्म-संस्कार, नालच्छेदन, षष्ठी पूजन और नामकरणादि करके चंद्रमा का भी पूजन करें-
‘सोमाय सोमेष्वराय सोमपतये सोमसम्भवाय सोमाय नमो नमः।’

फिर शंख में जल, कुष, कुसुम और गंध डालकर दोनों घुटने भूमि में टेककर प्रार्थना करते हुए अघ्र्य देवें-
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्र समुद्भव। गृहाणाध्र्यं शषांकेमं रोहिण्या सहितो मम।।
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषाम्पते। नमस्ते रोहिणीकान्त अघ्र्यं मे प्रतिगृह्यताम।।

रात्रि के शेष भाग को स्तोत्र-पाठादि अथवा संकीर्तन करते हुए व्यतीत करें। उसके बाद अगले दिन पूर्वार्द्ध में स्नानादिक नित्य क्रिया संपन्न कर जिस नक्षत्र तिथि या योग की प्रमुखता मानकर व्रत किया हो उसके अंत में भगवदर्पण पूर्वक अन्नादिक ग्रहण कर पारणा करें।

अष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत करने से प्रणत क्लेषहारी वृन्दावनबिहारी भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और अपनी भक्त्ति देते हैं। अष्टमी व्र्रत का महत्त्व अत्यधिक है, अतः यह व्रत प्रत्येक को श्रद्धा व निष्ठा पूर्वक करना चाहिये।

आगे की पक्तियों में साधकों के लिये कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर एक इच्छा पूर्ति प्रयोग दिया जा रहा है, आप चाहें तो यह प्रयोग आप भी संपन्न कर सकते हैं, यह विशेष श्रेणी का काम्य प्रयोग है- इतनी बात निश्चित है कि श्री कृष्ण साधना हेतु किया गया कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता।

साधक अपना निर्णय स्वयं लेते हुए श्री कृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के इस महान सिद्ध पर्व पर कोई न कोई साधना कर्म अवश्य संपन्न करें।

इच्छा पूर्ति गोविंद प्रयोग

इस साधना प्रयोग हेतु साधक 25 अगस्त 2016 रात्रि का प्रथम प्रहर बीत जाने के बाद साधना क्रम प्रारंभ करें। अर्द्ध रात्रि के साथ पूर्ण कर मंत्र जप संपन्न करे, इस साधना हेतु- श्री कृष्ण यंत्र तथा एक वैजयन्ती माला का होना आवश्यक हैं। अपने सामने सर्वप्रथम एक बाजोट पीले पुष्प बिछा दें और उन पुष्पों के बीचों बीच श्री कृष्ण यंत्र स्थापित करें, तथा इस यंत्र का पूजन केवल चंदन तथा केसर से ही संपन्न करें।
अपने सामने कृष्ण का एक सुंदर चित्र फ्रेम में मढ़वा कर स्थापित करें। चित्र को भी तिलक करें तथा प्रसाद स्वरूप पंचामृत साथ रख लें, जिसमें घी, दूध, दही, शक्कर तथा गंगाजल मिश्रित हो। इसके अतिरिक्त अन्य नैवेद्य भी अर्पित कर सकते हैं। इच्छा पूर्ति यंत्र के दोनों और दो-दो गोमती चक्र स्थापित करें, तथा उन्हें केसर का तिलक लगायें और दोनों हाथ जोड़ कर भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें, श्री कृष्ण का ध्यान कर उनकी आठ शक्तियाँ लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कांति, कीर्ति, तुष्टि एवं पुष्टि की मानसिक पूजा करें। प्रत्येक शक्ति के लिए निम्न मंत्र का उच्चारण करें-

ऊँ लक्ष्म्यै नमः।
ऊँ सरस्वत्ये नमः।
ऊँ रत्ये नमः।
ऊँ प्रीत्यै नमः।
ऊँ कान्त्ये नमः।
ऊँ कीत्र्ये नमः।
ऊँ तुष्टयै नमः।
ऊँ पुष्टये नमः।

शक्ति पूजन के पश्चात् इच्छापूर्ति मंत्र का जप प्रारंभ किया जाता है, इसकी भी विशेष विधि है, इसमें अपने दोनों हाथों में अक्षत् पुष्प और थोड़ा गंगाजल लें, और इच्छा पूर्ति मंत्र का उच्चारण करते हुए उसे अर्पित कर दें।
इच्छा पूर्ति मन्त्र- ऊँ श्रीं हृीं क्लीं कृष्णायै गोविन्दायै नमः।

इस प्रकार 108 बार इस मंत्र का उच्चारण इसी विधि से संपन्न करें यह प्रयोग पूर्ण हो जाने के बाद पहले से जलाकर रखे हुए दीपक, अगरबत्ती तथा धूप से आरती संपन्न कर प्रसाद ग्रहण करें। यदि कोई साधक 40 दिन तक प्रतिदिन एक माला मंत्र जप संपन्न करे तो उसका इच्छित कार्य अवश्य ही संपन्न हो जाता है।

नाग पंचमी उपाय Nag Panchami Muhurat & Upaya 2016

Nag Panchami Muhurat & Upaya 2016

Nag Panchami Muhurat & Upaya नाग पंचमी 7 अगस्त 2016

हमारे धर्म ग्रन्थों में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पूजा Nag Panchami Muhurat & Upaya का विधान है। पुराणें के अनुसार नागों की अनेक जातियाँ और प्रजातियाँ हैं। भविष्य पुराण में नागों के लक्षण, नाम, स्वरूप एवं जातियों का विस्तार से वर्णन मिलता है। मणिधारी तथा इच्छाधारी नागों का भी उल्लेख मिलता है।

श्रावणमास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) का त्यौहार नागों को समर्पित है। इस त्यौहार पर व्रत पूर्वक नागों का अर्चन-पूजन होता है। व्रत के साथ एक बार भोजन करने का नियम है। पूजा में पृथ्वी पर नागों का चित्रांकन किया जाता है। स्वर्ण, रजत, काष्ठ या मृत्तिका से नाग बनाकर पुष्प, गंध, धूप-दीप एवं विविध नैवेद्यों से नागों का पूजन होता है।

नाग अथवा सर्प पूजा की परम्परा पूरे भारतवर्ष में प्राचीनकाल से रही है, प्रत्येक गाँव में ऐसा स्थान अवश्य होता है, जिसमें नाग देव की प्रतिमा बनी होती है, और उसका पूजन किया जाता है।

नागपंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) के दिन को तो एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, इसके पीछे भी विशेष कारण है जिस का वर्णन आगे इसी लेख में करेंगे। समय के अनुसार मूल स्वरूप को अवश्य भुला दिया गया है।

क्या नाग देवता हैं?

जिस प्रकार मनुष्य योनि है, उसी प्रकार नाग भी योनि भी है, प्राचीन कथाओं में उल्लेख मिलता है कि पहले नागों का स्वरूप मनुष्य की भांति होता था, लेकिन नागों को विष्णु की अनन्य भक्ति के कारण वरदान प्राप्त होकर इनका स्वरूप बदल दिया गया, और इनका स्थान विष्णु की शय्या के रूप में हो गया, नाग ही ऐसे देव हैं, जिन्हें विष्णु का साथ हर समय मिलता है, और भगवान शंकर के गले में शोभा पाते हैं, भगवान भास्कर (सूर्य) के रथ के अश्व भी नाग का ही स्वरूप हैं।

भय एक ऐसा भाव है, जिससे कि बली से बली व्यक्ति, बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति, भी अपने को शक्तिहीन समझता है। कोई अपने शत्रुओं से भय खाता है, कोई अपने अधिकारी से भय खाता है, कोई भूत-प्रेत से भयभीत रहता है, भयभीत व्यक्ति उन्नति की राह पर कदम नहीं बढ़ा सकता है, भय का नाश, और भय पर विजय प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है, और नाग, सर्प देवता भय के प्रतीक हैं, इसलिए इनकी पूजा का विधान हर जगह मिलता है।

सम्बंधित : Nazardosh Ke Saral Upay

नाग पंचमी रक्षात्मक प्रार्थना का पर्व-

आमतौर पर नागपंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) के पर्व को महिलाओं का ही पर्व माना जाता है, जो कि बिल्कुल गलत है, ‘‘नाग’’ वास्तव में कुण्डलिनी शक्ति के स्वरूप हैं, यह विशेष पर्व कुण्डलिनी शक्ति की उपासना का पर्व है। इस पर्व पर छोटा-मोटा कुण्डलिनी जागरण प्रयोग कर व्यक्ति किसी भी प्रकार की भय बाधा से मुक्ति पा सकता है।

इसका विधान भी अत्यंत सरल है-
नागपंचमी के दिन प्रातः जल्दी उठकर सूर्योदय के साथ सबसे पहले शिव पूजा संपन्न करनी चाहिए, शिव पूजा में शिवजी जी का ध्यान कर शिवलिंग पर दूध मिश्रित जल चढ़ायें और एक माला ‘ऊँ नमः शिवाय’ मंत्र का जप अवश्य करें। नाग पूजा में साधक अपने स्थान पर भी पूजा संपन्न कर सकता है, और किसी देवालय में भी।

किसी धातु का बना छोटा सा नाग का स्वरूप ले लें या फिर एक सफेद कागज पर नाग देवता का चित्र बना लें। इसे अपने पूजा स्थान में सामने सिंदूर से रंगे चावलों पर स्थापित करें, और एक पात्र में दूध नैवेद्य स्वरूप रखें। सर्वप्रथम अपने सदगुरू का ध्यान कर, सर्प भय निवृति हेतु प्रार्थना करें, तत्पश्चात नागदेवता का ध्यान करें कि-

हे नागदेव! मेरे समस्त भय, मेरी समस्त पीड़ाओं का नाश करें, मेरे शरीर में अहंकार रूपी विष को दूर करें, मेरे शरीर में व्याप्त क्रोध रूपी विष से मेरी रक्षा करें, इसके बाद नागदेव के चित्र पर सिंदूर का लेप करें, तथा इसी सिंदूर से अपने स्वयं के तिलक लगायें। इस के बाद अग्र लिखित मंत्र का 21 बार पाठ करते हुये नाग देवता तथा कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करें।

मंत्र-
जरत्कारूर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी। वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा ।।
जरत्कारूप्रिया स्तीकमाता विषहरेति च। महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता।।
द्वादशैतानि नमानि पूजाकाले तु यः पठेत्। तस्य नागभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

थोड़ी देर शांत होकर बैठ जायें तथा ऊँ नमः शिवाय का जप करते रहें, इससे भय का नाश होता है और बड़ी से बड़ी बाधा से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।

पूजन के बाद नागदेव के सम्मुख रखे दूध को प्रसाद स्वरूप स्वयं ग्रहण करें, यदि यह दूध किसी अस्वस्थ व्यक्ति को पिलाया जाये, तो उसे दिन-प्रतिदिन स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होगा। यदि कोई किसी पुराने रोग से पीड़ित हो तो यह प्रयोग 7 दिन तक करें, लेकिन पूजन से पहले अस्वस्थ व्यक्ति के नाम से संकल्प अवश्य लें। इस पूजा का प्रभाव इतना अनुकूल रहता है कि विशेष कार्य पर जाते समय नागदेव का ध्यान कर, यदि आप प्रबल से प्रबल शत्रु के पास भी चले जाते हैं, तो वह शत्रु आप से सत व्यवहार ही करेगा, हानि देने की बात ही दूर रही।

संतान प्राप्ति का नाग शान्ति प्रयोग-

जो स्त्रियाँ नागपंचमी के दिन नागदेव का विधि-विधान सहित पूजन करती हैं, उनकी संतान प्राप्ति की कामना अवश्य पूर्ण होती है। स्त्रियों को अपनी संतान रक्षा हेतु भी नाग शान्ति प्रयोग करना चाहिये। नागपंचमी के दिन सांयकाल शिव का ध्यान करते हुए नाग देव का पूजन करना चाहिए, इसमें पूजन तो ऊपर दी गई विधि के अनुसार ही करना है किंतु अंतर केवल इतना ही है, कि संतान प्राप्ति तथा रक्षा हेतु आगे दिये मंत्र का 51 बार जप करें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पùनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
संतान प्राप्यते संतान रक्षा तथा।
सर्वबाधा नास्ति सर्वत्र सिद्धि भवेत्।।

यह प्रयोग नागपंचमी से लेकर सात दिन तक संपन्न करें। इस प्रयोग को करने से भयबाधा व संतान की कामना पूर्ति अवश्य होती है।

Shivling Upasana शिवलिंगोपासना (Shivratri Special)

Maha Shivratri Special on Shivling

Shivling Upasana शिवलिंगोपासना

तैतीस करोड़ देवी-देवताओं में शिव ही ऐसे हैं जिनकी लिंग shivling के रूप में पूजा होती है जो देवलोक के ऐशो आराम से दूर एक फक्कड़ बाबा के रूप में माने जाते हैं। भांग-धतूरा खाकर, अंग विभूति लिपटा कर जहरीले नागों को गले में लिपटाये प्रसन्न घूमते हैं। शिव Shiv ही हैं जो अक्खड़ दानी हैं। शिवलिंग Shivling पर जल मात्र चढ़ाने से मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं।

भगवान शिव shiv सृष्टि के संहारक हैं। वे मानव के तन-मन की पीड़ा दूर करते हैं, वे आशुतोष है और अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते है। रूद्र उनका एक और नाम है जिसका अर्थ है रोगों को हरण करने वाला। भगवान शिव की उपासना में शिवलिंग shivling पूजा का सबसे अधिक प्रचलन है। लिंग पूजन से सभी मनोकामनायें पूर्ण होती है और सुख शांति की प्राप्ति होती है।

गरुड़ पुराण के अनुसार लिंग shivling अलग- अलग पदार्थों से अनेक प्रकार के बनाये जाते हैं जिस पदार्थ से लिंग बनाये जाते हैं वैसा ही फल प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अलग-अलग वस्तुओं से अभिषेक करने से भी भिन्न फल की प्राप्ति होती है।

जैसे-
श्री प्राप्ति के लिए गन्ने के रस में अभिषेक करना चाहिए।
ज्वर आदि प्रकोप से बचाव हेतु जलधारा से पूजन करें।
वंश वृद्धि हेतु धृत योग से अभिषेक करें।
पाप निवारण हेतु मधु से पूजन करना चाहिए।
समस्त व्याधियों के हरण हेतु पीली, सरसों के तेल से पूजन करें।
लम्बी आयु के लिए दुग्ध से पूजन करें।
एवं संतान प्राप्ति हेतु शर्करा से अभिषेक करना चाहिए।

मृत्युंजय साधना या रूद्राभिषेक दोनों ही मोक्ष और लम्बी आयु देने वाले हैं।

अठारहों पुराणों में शिव को श्रेष्ठ कहा गया है। शिव को उनकी श्रेष्ठता के कारण ही देवाधिदेव कहा गया है। इन्हीं शिव से संबंधित है महाशिवरात्रि-व्रत। देवों में श्रेष्ठ शिव हैं तो स्वभावतः शिव से सम्बद्ध महाशिवरात्रि व्रत व्रतों में सर्वश्रेष्ठ है यह सामान्य जन भी जानते हैं।

जिस व्रत को शिव की प्रियरात्रि में संपन्न किया जाता है वह व्रत शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है तो हर माह में कृष्ण पक्ष में शिवरात्रि व्रत पड़ता है। परन्तु महाशिवरात्रि व्रत फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को पड़ती हैं।

यह अर्थ, काम, मोक्ष तीनों की प्रदाता है अर्थात् मनोकामना पूर्ति हेतु महाशिवरात्रि व्रत करने योग्य है यह सद्या फलदाता है। भोले बाबा स्वयं तो दिगम्बर, श्मशान सेवी और वृषभ वाहन पर है परन्तु अपने भक्तों को अकल्पनीय ऐश्वर्य प्रदान करने में भी पीछे नहीं रहते है। कभी-कभी बाबा ऐसा वरदान दे देते हैं कि बाद में स्वयं परेशानी में पड़ जाते हैं।

रावण शिवभक्त ही था उसकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे इतना सशक्त बना दिया कि उसने सोने की लंका बना ली और विभिन्न देवताओं को बंदी बनाकर अपने अधीन कार्य लेने लगा। इन्द्र रावण के यहां पानी भरने लगे, अग्नि भोजन पकाने लगी, वायु पंखा झलने लगी।

इसी रावण को मारने के लिए रामावतार हुआ और राम भी रावण वध में तभी सफल हुए जब उन्होंने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना कर पूजा-अर्चना की। अतः आप दीन-हीन हो, पापी हो, पुण्यात्मा हो वैभवशाली हो। भगवान शिव की उपासना कीजिए आपकी आकांक्षाएं शीघ्रपूर्ण हो जाएंगी। शिवोपासन की सर्वथा सरल विधि महाशिवरात्रि व्रत का पालन है कहते हैं।

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपाप प्रणाशनम।
आचांडालमनुष्याणां मुक्तिमुति प्रदायकम्।।

संस्कृत भाषा में लिंग का अर्थ होता है चिन्ह और इसी अर्थ में यह शिवलिंग shivling के लिए प्रयुक्त होता है। शिवलिंग shivling का अर्थ है शिव का परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित चिह्न है।

त्रिगुण की जो अव्यक्तावस्था है, जिसके त्रिगुण उत्पन्न हुआ है, उसी में लीन हो जाता है, सारे संसार के उस उपादान कारण को, जो अनादि और अनन्त है, उसे लिंग कहते हैं। इसी से यह संपूर्ण संसार उत्पन्न होता है। इस प्रकार आधारसहित लिंग जगत का कारण है, माँ उमा, महेश्वर स्वरूप है। भगवान शिव स्वयं ज्योतिलिंग स्वरूप तमस से परे स्थित है। लिंग और वेदों के समायोग से वे अर्धनारीश्वर होते हैं।

भिन्न-भिन्न पदार्थो के बने शिवलिंग shivling –
» मिश्री से बनाये हुए शिवलिंग की पूजा से रोग आदि से छुटकारा मिलता है।
» तीनों का आटा समान भाग में गूंथ कर जो शिवलिंग पूजा जाता है, (गेहूं, चावल, जौ, आटा लें) इससे जातक को संतान, लक्ष्मी और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
» किसी से प्रेम प्यार बढ़ाने के लिए गुड़ की भेली में शिवलिंग बनाकर उस व्यक्ति का संकल्प और ध्यान करने से विशेष लाभ मिलता हैं
» यदि चीनी की चाशनी को जमा कर शिवलिंग बनाकर पूजा की जाए तो सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
» यदि किसी को वंश-वृद्धि में बाधा आ रही हो तो वह जातक बांस के अंकुर को शिवलिंग के समान काटकर पूजा करे तो लाभ होगा।
» आंवले को पीसकर बनाया गया शिवलिंग मुक्तिप्रदाता होता है। (आंवले के सीजन में 108 दिन लगातार शिवलिंग बनाकर पूजा करें तो मुक्ति पाओगे।)
» स्फटिक तथा अन्य रत्नों के बने शिवलिंगों जातकों की अभीष्ट कामनाएं पूरी करता है।
» शत्रुओं के नाश के लिए लहसुनिया के बने शिवलिंग की पूजा करने से विजय मिलती है।
» पीतल का शिवलिंग निर्धनता निवारक है। बृहस्पतिवार से पूजा शुरु करें।
» चांँदी का शिवलिंग धन-धान्य बढ़ाता है-सोमवार से पूजा शुरु करें।
» सोने से बना शिवलिंग समृद्धि का वर्द्धन करता है।
» यदि स्त्रियां मोती के शिवलिंग का पूजन करें तो भाग्य-वृद्धि होती है।
» यदि जातक कपूर से बने शिवलिंग का पूजन करता है तो उसको भक्ति और मुक्ति दोनों को प्राप्त करता है।
» यदि जिस जातक की पत्रिका में अकाल-मृत्यु का भय हो तो वह दूर्वा को शिवलिंग गुथकर उसकी आराधना करे तो विशेष लाभ होता है।
» गायत्री मंत्र का सवा लाख आहुति का यज्ञ करके उस भस्म से शिवलिंग बनाकर पूजा की जाए तो जातक की अभिलाषा बहुत शीघ्र पूर्ण होती है।
» वशीकरण के लिए सोंठ, मिर्च, पीपल के चूर्ण को सेंधा नमक के साथ गूंथ कर शिवलिंग बनाने पर पूजा करने पर लाभ मिलता है।
» चन्दन और कस्तूरी व गौलोचन के साथ गजमुक्ता को मिलाकर जो शिवलिंग की पूजा करेंगे तो वशीकरण, सम्मोहन आकर्षण के साथ शिव साम्राज्य की भी प्राप्ति होती है।
» यदि किसान जातक गुड़ की पिण्डी (लिंग) बनाकर उसमें गेहूं के दाने चिपका कर पूजा करने से उस को उत्पादन अधिक होगा।
» दही को बांधकर निचोड़ देने के बाद उससे जो शिवलिंग बन जाए उसकी पूजा करने से लक्ष्मी, सुख व काम सुख की प्राप्ति होती है।
» असली पारद से बनें शिवलिंग की शास्त्रों में बहुत ही प्रशंसा की गयी है। इस शिवलिंग को शास्त्रों में ज्योर्तिलिंग से भी बहुत श्रेष्ठ माना गया है। इसका पूजन सर्वकामनाप्रद, समस्त पापों का नाश करता है, यह जातक को जीवन के संपूर्ण सुख एवं मोक्षप्रद शिवस्वरूप प्रदान करता है। पारद शिवलिंग गारन्टी देने वाले से ही लें आजकल लैड के ऊपर पाॅलिश की जाती है। नकली पारद शिवलिंग की पूजा से कोई लाभ नहीं होगा।

सम्बंधित : शिवलिंग कहाँ से प्राप्त करें » Buy Shivling Online

शिव-पूजन के लिए निम्न बातों पर विशेष ध्यान दिया जाए तो पूजा का फल कई गुणा ज्यादा मिलता है।
1. भगवान शिवजी की पूजा में तिल का प्रयोग नहीं होता और चम्पा के फूल भी नहीं चढ़ाया जाता।
2. शिवजी की पूजा में भी दूर्वा, तुलसी-दल चढ़ाया जाता है। इसमें संदेह नहीं किया जाना चाहिए। तुलसी की मंजरियों से पूजा बहुत श्रेष्ठ मानी जाती है।
3. शिवजी की पूजा में बिल्व पत्र प्रधान है और नीलकमल सर्वश्रेष्ठ पुष्प माना गया है। बिल्व-पत्र चढ़ाते समय बिल्व पत्र का चिकना भाग मूर्ति की ओर रखना चाहिए।
4. जितने अधिक बिल्व-पत्रों को चढ़ाया जाए उतना ही उत्तम होता है, खण्डित बिल्व पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए।
5. शिवजी के पूजन के समय करताल नहीं बजाना चाहिए।
6. विशेष शिवजी के पूजन (अनुष्ठान) कर भस्म त्रिपुण्ड और रूद्राक्ष माला जातक के शरीर पर जरूर होनी चाहिये।
7. शिवजी की परिक्रमा में संपूर्ण परक्रिमा नहीं की जाती।
8. चढ़े हुए जल वाली नाली का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। वहीं से परिक्रमा उल्टी की जाती है।

Dukh Nashak Shani Dev सर्व दुःख नाशक शनि देव

Shani Dev

Sarv Dukh Nashak Shani Dev सर्व दुःख नाशक शनि देव

Shani Dev
Sarv Dukh Nashak Shani Dev

समस्त ग्रहों में शनिदेव(shani dev)  ही ऐसे ग्रह हैं, जो अत्यन्त क्रोधी होते हये भी अत्यन्त दयालु कहे गये हैं। इनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं, तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।

पौराणिक कथाओं में शनि(shani dev) को सूर्य-पुत्र, यम का भाई, अपने भक्तों को अभय देने वाला, समस्त विघ्नों को नष्ट करने वाला एवं सम्पूर्ण सिद्धियों का दाता कहा गया है। जबकि ज्योतिष की दृष्टि में शनि एक क्रूर ग्रह है। कहा गया है, कि यह क्रूर ग्रह एक ही पल में राजा को रंक बना देता है।

जब बात आती है शनि दशा या साढेसाती की, तो हमारा भयभीत एवं चिन्तित होना स्वाभाविक होता है। समस्त ग्रहों में शनिदेव ही ऐसे ग्रह हैं, जो अत्यन्त क्रोधी होते हुये भी अत्यन्त दयालु हैं। इनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं, तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।

जब सृष्टि की रचना आरम्भ हुई, तो सृष्टि रचना का कार्यभार ब्रह्मा ने संभाला, विष्णु ने जीवों के पालन एंव उनकी रक्षा का उत्तरदायित्व लिया और भगवान शंकर को आवश्यकता पड़ने पर सृष्टि का संहार एवं दुष्ट जनों के विनाश का कार्य सौंपा गया। अपने भक्तों की रक्षा एवं पतितों को उनके पापों का दण्ड देने के लिये शिवजी ने अपने गणों की उत्पत्ति की।

सूर्य पुत्र यम एवं शनि (shani dev) को भी उनके गणों में सम्मिलित किया गया। शनि अत्यन्त पराक्रमी होने के साथ उद्दण्ड भी थे; तोड़-फोड़, मार-काट एवं विनाशकारी कार्यो में इनकी आरम्भ से ही रूचि थी। यह देखकर शिवजी ने यम को तो मृत्यु का देवता बनाया और शनि को दुष्ट जनों को उनके पापों का दण्ड देने का कार्य सौंपा।

शनि (shani dev) भगवान शंकर के शिष्य, सूर्य के पुत्र तथा यम के भाई हैं। शनि सर्वदा प्रभु भक्तों को अभय दान देते हैं, और उसकी हर प्रकार से रक्षा करते हैं। शनि समस्त सिद्धियों के दाता हैं। साधना, उपासना द्वारा सहज ही प्रसन्न होते हैं, और अपने भक्तों की समस्त कामनाओं को पूरा करते हैं। शनि सभी ग्रहों में महाशक्तिशाली और घातक हैं। कहते हैं कि सांप का काटा और शनि का मारा पानी नहीं मांगता।

जब शनि (shani dev) का प्रभाव पड़ा, तो श्री कृष्ण को द्वारिका में शरण लेनी पड़ी। और भगवान राम को, जिनका राज तिलक होने वाला था, सब कुछ छोड़कर नंगे पांव वन में जाना पडा। शनि के प्रभाव से जब अवतारी पुरूष भी नहीं बच सके, तो भला सामान्य लोगों का शनि के प्रकोप से बच पाना सम्भव कहां है?

ये सभी कथायें एक सीमा तक सत्य हैं, परन्तु इनके आधार पर भ्रमित होना विद्वता नहीं हैं। वस्तुतः शनि ग्रह की व्याख्या ही अधूरी है। शनि का तात्पर्य है ‘जीवन की गति’।

राशिगत शनि का प्रभाव किस प्रकार से पड़ता है? और किस राशि पर यह विचरण करता है, इस का क्या प्रभाव होता है? यह किसी विद्वान ज्योतिषी से ही जाना जा सकता है। शनि (shani dev) पीड़ादायक हो सकता है, लेकिन यदि शनि को अनुकूल बना लिया जाये, तो यह सर्वोच्चता भी प्रदान कर सकता है।

शनि देव सम्बंधित अन्य लेख : Shani Amavasya Upaya

ब्रह्मवैवर्त पुराण में यह वर्णन मिलता है, कि जब माता-पार्वती के गर्भ से भगवान गणपति ने जन्म लिया, तो नवजात शिशु को आशीर्वाद प्रदान करने के लिये समस्त देवी-देवता ग्रह नक्षत्र, यक्ष-गन्धर्व आदि उपस्थित हुये तथा एक-एक कर सभी ने गणपति को अपने सामर्थ्य अनुसार तेजस्विता प्रदान की।

इस क्रम में माता पार्वती का ध्यान शनि देव (shani dev) पर गया, जो कि एक किनारे चुप-चाप सिर झुकाऐ खडे़ थे। थोड़ी देर तक माता पार्वती इस बात को देखती रहीं, किन्तु समझ में नहीं आया, कि शनिदेव आगे बढ़कर शिशु का मुख देखकर उसे आशीर्वाद क्यों नहीं दे रहें हैं, अतः उन्होंने इसका कारण शनिदेव से ही पूछा-‘क्या आपको खुशी नहीं हो रही है?’

प्रसन्नता नहीं हो रही है? आप क्यों नहीं आगे बढ़कर मेरे पुत्र को आशीर्वाद दे रहे हैं? मेरे पुत्र की तरफ आप क्यों नहीं दृष्टिपात कर रहे हैं? यह सुनकर शनिदेव ने सिर झुकाये हुये अत्यन्त विनम्रता से कहा- ‘मां ! ऐसा करने के लिये आप मुझे न कहें, क्योंकि मैं नहीं चाहता हूं, कि इस कोमल शिशु का अनिष्ट हो।’ यह सुनकर पार्वती को उनकी बात पर भरोसा नहीं हुआ और उन्होनें आज्ञा दी-‘तुम आगे आओ और बालक को देखकर आशीर्वाद दो।’

अत्यन्त विवश होकर शनिदेव (shani dev) ने थोड़ा सा सिर उठाकर बालक की ओर देखा, तो उनकी दृष्टि पड़ते ही उस शिशु का सिर धड़ से अलग हो गया। यह देखकर पार्वती को बहुत कष्ट हुआ और क्रोध भी आया, किन्तु वे शनि को कुछ कह भी नहीं पा रही थीं, क्योंकि आज्ञा उन्होंने स्वयं दी थी। फिर उनके मुंह से निकल गया-‘भगवान शिव ही बचायें शनि की दृष्टि से’।

एक और प्रसंग है, रोहिणी शकट भेदन से सम्बन्धित, जो इस प्रकार है-
ज्योतिषियों ने जब नीलम सी क्रांति वाले शनिदेव को कृतिका नक्षत्र के अन्तिम चरण में देखा, तो वे भयभीत हो गए। रोहिणी शकट भेदन देवताओं के लिये भी दुःखदायी होता है, तथा राक्षस भी इससे भयभीत हो जाते हैं। सभी राजाओं के लिये यह परेशानी का कारण था, राजा दशरथ जो कि महा तेजस्वी व ईश्वर भक्त थे, उनका रथ नक्षत्र मण्डल को भी पार करने की शक्ति रखता था।

बहुत सोच-विचार करने पर भी तब कोई हल न निकला, तो वे अपने अलौकिक अस्त्र-शस्त्र लेकर नक्षत्र मण्डल की ओर चल दिये। वे सूर्य से भी ऊंचे उठकर रोहिणी पृष्ठ की ओर गये। वहां से उन्होंने शनिदेव को कृतिका से रोहिणी में प्रवेश को तत्पर जानकर अलौकिक संहारास्त्र का प्रयोग करने हेतु अपने आपको संयोजित किया।

तब शनिदेव (shani dev) महाराज दशरथ का यह अदम्य साहस देखकर बहुत प्रसन्न हुये और वरदान मांगने को कहा। शनिदेव को प्रसन्न हुये देख महाराज दशरथ ने उनकी स्तुति की और कहा, हे शनिदेव! प्रजा के कल्याण हेतु आप रोहिणी नक्षत्र का भेदन न करें।

शनि देव ने प्रसन्न हो कर तुरंत कहा ‘‘तथास्तु’’ और यह भी कहा कि जो व्यक्ति आप द्वारा सुनाये गये स्तोत्र से मेरी स्तुति करेंगे, उन पर मेरा प्रतिकूल प्रभाव कभी नहीं होगा।

जय शनि देव।। 

सम्बंधित : Shani Yantra Locket