Mesh Lagn Features मेष लग्न की विशेषता

mesh lagn aries ascendant

मेष लग्न की विशेषता Mesh Lagn Features

मेष लग्न (Mesh Lagn) में जन्म लेने वाला व्यक्ति मंझले कद का तथा ललाई युक्त गौर वर्ण का होता है। ऐसा व्यक्ति चतुर तथा तुरन्त निर्णय लेने वाला होता है, राज्य समाज में प्रगति करता है। प्रत्येक कार्य के वैज्ञानिक विधि से सम्पन्न करना चाहता है। स्वयं की प्रतिभा से प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। ज्यौतिष आदि किसी कला का प्रेमी होता है,परंतु जल से भय करता है।

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मेष लग्न (Mesh Lagn) के विभिन्न ग्रहों से सम्बन्धित फल :

सूर्य:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में सूर्य पंचमेश होता है, वह इस भाव से सम्बन्धित-विद्या, बुद्धि, विवेक, वाणी, सन्तान तथा तेज से सम्बन्धित फल प्रदान करता है। त्रिकोणाधिपति होने से सूर्य कारक माना जाता है। तथा अपनी महादशा व अन्तर्दशा में भाव स्थिति के अनुसार शुभ फल प्रदान करता है।

चन्द्र:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में चन्द्र चतुर्थ, भाव का अधिपति होता है। शुभ ग्रह केन्द्राधिपति हो तो अशुभ फल प्रदान करता है। चन्द्र माता का नैसर्गिक कारक ग्रह है। यह माता, भूमि मनोबल, सुख, वाहन, जायदाद आदि से सम्बन्धित फल प्रदान करेगा।

मंगल:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में मंगल लग्नेश व अष्टमेश होता है, लग्नेश होने से कारक तथा अष्टमेश होने से मारक होता है, पर लग्नेश को अष्टमेश होने का दोष नहीं लगता। अतः मंगल कारक ही रहेगा तथा अपनी दशा अन्तर्दशा में शुभ फल प्रदान करेगा। मंगल छठे, आठवे या बारहवें भाव में स्थित होने पर इसके कारकत्व में कुछ कमी आ जाती है। मंगल तन, रूप, आयु दिनचर्या, आत्मबल, पुरातत्व, उदर आदि से सम्बन्धित फल प्रदान करता है।

बुध:- तृतीयेश व षष्ठेश होने से बुध मेष लग्न (Mesh Lagn) में सर्वथा अकारक माना जाता है, तथा अपनी दशा अन्तर्दशा में अशुभ फल प्रदान करता है। यह चर्म रोग व शत्रु उत्पन्न करता है। तथा व्यापार में उतार-चढ़ाव लाता है। भाई-बहन, पराक्रम, प्रभाव, शत्रु, रोग ननिहाल, आदि से सम्बन्धित फलादेश बुध की स्थिति से देखा जाता है।

गुरू:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में गुरू भाग्येश व व्ययेश होता है। भाग्येश होने से पूर्ण कारक तथा व्ययेश होने से अकारक होता है। अतः गुरू-दशा का पूर्वाद्ध शुभ तथा उत्तरार्द्ध व्यय कारक होता है। कतिपय पंडितों के मतभेद के बाबजूद भी मेष लग्न में गुरू को कारक ही मानना चाहिये। क्योंकि लग्न से गिनने पर जो भाव पहले आता है, उससे सम्बन्धित फल ही वह ग्रह प्रदान करता है।
नवम भाव द्वादश भाव से प्रथम आने के कारण गुरू भाग्य-वर्द्धक ही रहेगा। फिर वह नैसर्गिक शुभ ग्रह भी है। तीसरे यह भी सामान्य सिद्धान्त है कि दो भावों का अधिपति होने की दशा में कोई भी ग्रह उस भाव से सम्बन्धित फल विशेष रूप से प्रदान करेगा। जिस भाव में उसकी मूल त्रिकोण राशि होगी। गुरू की मूल त्रिकोण राशि नवम भाव में होगी।
अतः गुरू इस भाव से सम्बन्धित फल ही प्रदान करेगा। शुभ स्थान में स्थित होने पर अवश्यमेव उच्च फल प्रदान करेगा। भाग्य, धर्म, यश, व्यय, अन्य स्थान आदि से सम्बन्धित फल गुरू की स्थिति से देखना चाहिये।

शुक्र:- मेष लग्न में शुक्र द्धितीयेश व सप्तमेश होता है। द्धितीयेश होने से शुक्र का सम्बन्ध धन-कुटुम्ब आदि से तथा सप्तमेश होने के कारण जीवन साथी, रोजगार, भोग-विलास आदि से होता है। द्धितीयेश होने से शुक्र अकारक तथा मारक प्रभाव लिये हुये होता है। पर स्वगृही या उच्च का होने पर अपनी महादशा व अन्तर्दशा में खूब धन व भोग विलास देता है। सप्तमेश (शुभ ग्रह केन्द्राधिपति होने से) शुक्र भी अकारक माना जाता है। अतः मेष लग्न में शुक्र अकारक ही रहेगा। तीसरे भाव का शुक्र भी अपनी दशा में अशुभ फल ही देगा। मेष लग्न में शुक्र की सर्वोत्तम स्थिति द्धितीय व द्धादश भाव में होगी।

शनि:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में शनि दशमेश व एकादशेश अर्थात् राज्येश लाभेश होगा। दशमेश होने से (क्रूर ग्रह केन्द्राधिपति होने पर शुभ फल प्रदान करता है) शनि कारक तथा एकादशेश होने से अकारक है, लग्न से दशम भाव प्रथम होने के कारण उस भाव से सम्बन्धित फल शनि अधिक देगा पर उसकी मूल त्रिकोण राशि कुम्भ एकादश भाव में होने के कारण एकादश भाव से सम्बन्धित फल ही प्रदान करेगा।
अतः शनि सम हुआ। पर स्वभाव से क्रूर ग्रह होने के कारण मेष लग्न में शनि अकारक ही रहेगा। शुभ भाव में स्थित होने पर ही (सप्तम या दशम भाव में) अपनी महादशा व अन्तर्दशा में उच्च फल प्रदान करेगा, अन्यथा नहीं।

राहु-केतु:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में तीसरे, छठे एवं ग्यारहवें भाव में स्थित होने पर राहु केतु अच्छा फल प्रदान करेगे।

मेष लग्न (Mesh Lagn) में उच्च नीच व स्वगृही ग्रहों का फल:-

सूर्य:- मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली Kundli  में प्रथम भाव में स्थित होने पर सूर्य उच्च का होता है, 10 अंश तक परमेच्य होता है। जिस जातक के सूर्य लग्न में स्थित होता है, वह व्यक्ति स्वस्थ शरीर वाला, विद्वान होता है। सन्तान पक्ष की प्रबलता, बुद्धिमत्ता, साहस, धैर्य, व्यवहार कुशलता तथा महात्वाकाँक्षा आदि गुण उसे सहज ही प्राप्त होते हैं।

पर सप्तम भाव पर सूर्य की नीच दृष्टि पड़ने के कारण उस भाव में सम्बन्धित फल में न्यूनता आ जायेगी। अतः जातक को दाम्पत्य सुख में कुछ कमी तथा क्लेश की प्राप्ति होती है, और उसकी मर्जी के अनुसार भी कम ही चलेगी। रोजगार के क्षेत्र में भी (विशेष कर सूर्य की दशा, अन्तर्दशा में) उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

पंचम भाव में स्वगृही सूर्य के होने पर जातक अत्यन्त व्रिद्धान, बुद्धिमान, प्रभावशाली तथा वाणी का धनी होगा, तथा सन्तान से शक्ति प्राप्त करेगा। ऐसे सूर्य की लाभ स्थान पर शत्रु क्षेत्रीय दृष्टि होने से आमदनी के मार्ग में रूकावट आयेगी।

मेष लग्न (Mesh Lagn) की कुण्डली kundli के सप्तम भाव में नीच राशिस्थ सूर्य के प्रभाव से जीवन साथी के सम्बन्ध में कुछ न कुछ परेशानी बनी रहेगी, तथा जीवन साथी का सुख कम प्राप्त होगा। जीवन यापन के मार्ग में निरन्तर कठिनाइयाँ आयेंगी।

पंचमेश सूर्य के नीच राशि में होने से विद्या क्षेत्र में कमजोरी रहेगी, तथा सन्तान पक्ष कमजोर रहेगा। सूर्य की सप्तम उच्च दृष्टि लग्न पर होने के कारण जातक का शरीर कुछ लम्बे कद का होगा। हृदय में स्वाभिमान की मात्रा अधिक होगी। युक्ति बल द्वारा वह सम्मान तथा प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा।

उच्च नीच व स्वगृही चन्द्र का फल:-

द्वितीय भाव में उच्चस्थ चन्द्र के प्रभाव से जातक बहुत धनी तथा जमीन जायदाद का स्वामी होगा। श्वेत वस्तु चाँदी आदि का व्यापार करेगा। जिसमें अच्छा लाभ होगा। कुटुम्ब की वृद्धि होगी। द्धितीय स्थान मारक प्रभाव युक्त भी होता है।

अतः माता के सम्बन्ध में किसी न किसी कमी का अनुभव भी होता रहेगा। अष्टम भाव पर नीच दृष्टि होने से आयु, व पुरातत्व के सम्बन्ध में कुछ परेशानी भी बनी रहेगी। शुक्र की महादशा व चन्द्र के अन्तर में यदि चाँदी आदि श्वेत वस्तु का व्यवसाय किया जाये तो लाखों की प्राप्ति होती है।

चतुर्थ भाव में स्वगृही चन्द्र के प्रभाव से जातक की माता, भूमि व जमीन जायदाद का उŸाम सुख प्राप्त होगा। मनोरंजन के साधन निरन्तर प्राप्त होंगे। पर दशम भाव में शनि की मकर राशि पर चन्द्र की दृष्टि होने से पिता से वैमनस्य रहता है, तथा राज्य पक्ष में भी व्यवधान आ सकता है।

अष्टम भाव में नीच राशिस्थ चन्द्र के प्रभाव से आयु व पुरातत्व सम्बन्धी हानि उठानी पड़ती है। चतुर्थेश के नीचस्थ होने के कारण माता सम्बन्धी सुख में कमी आती है, जन्म स्थान से बाहर रहना पड़ता है। तथा घरेलू सुख शान्ति में कमी आती है। पर धन भाव पर चन्द्र की उच्य दृष्टि पड़ने से धन सम्बन्धी सुख निरन्तर प्राप्त होता रहता है। जातक धन व सुख प्राप्त करने हेतु मनोयोग के साथ निरन्तर प्रयत्न शील रहेगा।

उच्च, स्वगृही व नीचस्थ मंगल का फल:-

मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली के दशम भाव में मंगल के स्थित होने पर वह उच्च का माना जाता है। मंगल अपने शत्रु शनि की राशि पर होने के कारण पिता के साथ जातक का कुछ वैमनस्य रहता है, पर जातक व्यवसाय में विशेष उन्नति प्राप्त करेगा, तथा राज्य से भी पुरस्कार प्राप्त हो सकता है। मंगल जो लग्नेश है लग्न भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है। अतः शारीरिक प्रभाव में उन्नति करेगा। चतुर्थ भाव पर नीच दृष्टि पड़ने से माता तथा भूमि सम्बन्धी सुख में कमी आयेगी।

प्रथम भाव में स्वगृही मंगल की स्थिति के प्रभाव से जातक का शरीर पुष्ट होगा, तथा आत्मबल प्रचुर मात्रा में होगा पर अष्टमेश होने के कारण कभी-कभी रोगों का शिकार भी होना पड़ता है।
चतुर्थ भाव पर नीच दृष्टि होने से माता, जमीन, जायदाद के सम्बन्ध में परेशानी होती है।
सप्तम भाव पर मंगल की दृष्टि स्त्री व रोजगार के क्षेत्र में बाधा डालती है।
मंगल की महादशा व अंतर्दशा सामान्यतया लाभप्रद रहेगी।

चतुर्थ भाव में नीचस्थ मंगल के प्रभाव से जातक को माता, जमीन, जायदाद तथा सुख में कमी आती है।
सप्तम भाव पर दृष्टि होने से स्त्री व रोजगार सम्बन्धी बाधा आती है।
पर दशम भाव पर उच्च दृष्टि पड़ने से पिता तथा राज्य सम्बन्धी मामलों मे विशेष उन्नति होती है।
जिस भाव में कोई भी नीच का ग्रह स्थित होगा वहाँ उस भाव से सम्बन्धी फलों में कुछ न्यूनता आ जायेगी।
स्वगृही ग्रह अपने भाव से सम्बन्धित उच्च फल ही देगा।

मेष लग्न में विभिन्न योग:-

1. रूचक योग:- किसी भी लग्न कुण्डली में यदि मंगल अपनी राशि का होकर, या मूल त्रिकोण का होकर अथवा उच्च राशि का होकर केन्द्र में स्थित होगा तो रूचक योग बनेगा। मेष लग्न कुण्डली में मंगल के लग्न अथवा दशम भाव में स्थित होने पर यह योग बनता है।
फल:- इस योग वाला जातक हृष्ट-पुष्ट बलिष्ठ तथा चरित्रवान होता है। वह अपने कार्यो से प्रसिद्धि प्राप्त करता है। देश व संस्कृति के प्रति जागरूक रहता है, सेना में उच्च अधिकारी हो सकता है।

2. मालव्य योग:- शुक्र के स्वराशि, मूल त्रिकोण या उच्च राशि का होकर केन्द्र में स्थित होने पर मालव्य योग बनता है। मेष लग्न में शुक्र केवल सप्तम भाव में बैठ कर मालव्य योग बना सकता है। (सप्तम भाव में शुक्र अकारक तथा गृहस्थ-जीवन को बिगाड़ने वाला माना जाता है।)
फल:- इस योग वाला जातक सुन्दर व आकर्षक शरीर वाला, धनी ख्याति प्राप्त कलाकार, दीर्घायु एवं उŸाम वाहन का मालिक होता है।

3. शश योग:- शनि अपनी उच्च शशि, स्वराशि या मूल त्रिकोण राशि का हो, तथा केन्द्र में स्थित हो तो शश योग बनता है। मेष लग्न की कुण्डली में शनि सप्तम भाव एवं दशम भाव में स्थित होकर शश योग बनता है।
फल:- शश योग रखने वाला जातक राजनीति में चतुर होता हैं। धीरे-धीरे उन्नति करता है, तथा नौकरों पर उसकी आज्ञा चलती है।

4. चामर योग:- लग्नेश उच्च का होकर केन्द्र में स्थित हो तथा गुरू उसे देखता हो। मेष लग्न कुण्डली में यदि मंगल दशम भाव में स्थित हो तथा गुरू द्वितीय, चतुर्थ, तथा षष्ठ भाव में हो तो चामर योग बनता है।
फल:- चामर योग वाला जातक उच्च, प्रतिष्ठित, मान्य, विद्धान, वेद शास्त्रों, का ज्ञाता व पूर्णायु होता है। तथा स्व-कार्यो से प्रसिद्धि प्राप्त करता है।
5. लक्ष्मी योग:- भाग्येश यदि स्वराशि, उच्च अथवा मूल त्रिकोण राशि का होकर केन्द्र में स्थित हो, तथा लग्नेश बलवान हो तो, लक्ष्मी योग बनता है। मेष लग्न में गुरू भाग्येश होता है। जो चतुर्थ भाव में बैठ कर लक्ष्मी योग बनाता है। इसके साथ-साथ मंगल लग्न अथवा दशम भाव में होना चाहिये।
फल:- लक्ष्मी योग वाला जातक सम्पन्न धनवान, भाषण कला में प्रवीण, लोगों को अपने पक्ष में करने की युक्ति जानने वाला, गुणी, चतुर, योग्य तथा ख्याति प्राप्त व्यक्ति होता है।

6. राज योग:- मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली में सूर्य चन्द्र का संयोग प्रबल राज योग कारक होता है। क्योंकि चन्द्र चतुर्थ का व सूर्य पंचम भाव का अधिपति होने से केन्द्र त्रिकोण का सम्बन्ध स्थापित कर देते है। मंगल सूर्य तथा शनि गुरू की युति भी राज योग कारक मानी गई है। पर मंगल लग्नेश होने के साथ-साथ अष्टमेश भी है, गुरू नवमेश होने के साथ-साथ व्ययेश भी होता है। तथा शनि दशमेश के साथ लाभेश है, अतः इस राजयोग में कुछ न्यूनता आ जाती है। कुछ पण्डितों का यह भी मत है कि मंगल सूर्य की युति भी प्रबल राजयोग कारक होती है, क्योंकि लग्नेश को अष्टमेश होने का दोष नहीं लगता ।

7. अन्य सामान्य योग:-
(1) मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली में शुक्र की सर्वोत्तम स्थिति द्वादश भाव में होती है। ऐसा शुक्र अपार धन देता है। तथा सर्वोत्तम जीवन साथी का सुख भी। द्वादश भाव में शुक्र सामान्यतः भोगदाता होता है। मेष लग्न (Mesh Lagn) में द्वादश भाव में शुक्र की उच्च राशि होती है। इस प्रकार शुक्र धनेश व सप्तमेश होकर अपनी उच्च राशि एवं प्रिय भाव में बैठ कर अतुल धन राशि तथा उत्तम स्त्री सुख देगा। द्वितीय भाव में भी शुक्र स्वगृही होने से धन दाता माना गया है।
(2) मंगल का सम्बन्ध डाक्टरी विद्या (सर्जन) से होता है। अतः लग्न द्वितीय भाव एवं पंचम भाव का सम्बन्ध मंगल से हो तो वह व्यक्ति डाक्टर बनता है। चूँकि मेष लग्न में मंगल स्थित हो तो उसकी द्रष्टि द्धितीय तथा पंचम भाव पर पड़ेगी। इस प्रकार मंगल का सम्बन्ध लग्न, द्धितीय व पंचम भाव से हो जाने के कारण जातक एक सफल डाक्टर (सर्जन) होगा। दशम या द्वितिय भाव में मंगल की स्थिति भी डाक्टरी योग बनाती है।
(3) भावार्थ रत्नाकर की पंक्ति “शुक्रस्य षष्ठ संस्थानं योगदं भवतु ध्रुवम्” के अनुसार छठे भाव में भी शुक्र योग कारक होता है। पर मेष लग्न मे यह नियम लागू नहीं होगा। क्योंकि षष्ठ भाव में शुक्र की नीच राशि होगी। धनेश का नीच राशि में होना भी हानि कारक है, तथा सप्तमेश शुक्र का नीच राशिगत होना और अधिक बाधा कारक होगा। इसका कारण यह है कि एक तो शुक्र स्त्री भवन का अधिपति है, दूसरे वह स्त्री सुख का नैसर्गिक कारक ग्रह है। अतः छठे भाव में शुक्र के होने से जातक को गृहस्थ जीवन का सुख बहुत कम मिलेगा, तथा साथी बीमार रहेगा।
(4) षष्ठेश बुध यदि सप्तम भाव में होगा तो, जातक के जीवन-साथी को रोगी बना देगा।
(5) मेष लग्न जातक की कुण्डली में बुध और मंगल का संयोग सिर दर्द तथा मस्तिष्क की शिराओं का रोग देने वाला होगा।
(6) लग्नेश मंगल, धनेश शुक्र एवं भाग्येश गुरू का परस्परिक सम्बन्ध या धनेश, लग्नेश व पंचमेश का सम्बन्ध किसी भी शुभ भाव में हो तो, खूब लाभ देगा।
(7) लग्नेश अष्टमेश मंगल यदि नीच राशि में (चतुर्थ भाव ) हो, और साथ में गुरू न हो तो, चेचक अथवा अन्य घावों जैसे निशान होंगे।
(8) नवम भाव में शुक्र गुरू की युति जातक को कलाकार बनाती है।

कुण्डली में विवाह प्रतिबंधक योग Vivah Pratibandak Yog in Kundli

कुण्डली में विवाह प्रतिबंधक योग Vivah Pratibandak Yog in Kundli

मित्रों इस लेख में जातकों की कुंडली में विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) के बारे में आपको अति अन्वेषित एवं अनुभव युक्त लेख सम्पादित कर रहा हूँ। शेयर करें व ज्ञान को असीम जनता तक पहुँचायें।

बचपन की सीमा लांघ कर जैसे ही मनुष्य यौवनावस्था में प्रवेश करता है, उसे एक जीवन-साथी की आवश्यकता महसूस होती है। यह प्राकृतिक नियम है, यौवन के आते ही युवा स्त्री अथवा पुरुष में विवाह की इच्छा उत्पन्न होती ही है। आदिमकाल में तो असभ्य मानव अन्य प्राणियों की तरह यौन सम्बंध बनाकर अपनी यौनेच्छा की पूर्ति कर लेता था, किन्तु ज्यों-ज्यों मनुष्य में सामाजिक भावना का उदय हुआ उसने समाज की व्यवस्था को बनाये रखने के लिये ‘विवाह’ vivah जैसी सामाजिक प्रथा को जन्म दिया, और स्वीकार किया।

तभी से समाज की स्वीकृति के बिना स्थापित किया गया यौन सम्बंध अनैतिक समझा जाने लगा। भारत में विवाह को एक पवित्र बंधन माना जाता है, प्रणय-सूत्र में बंधते ही स्त्री और पुरुष दोनों ही कुछ व्यक्तिगत पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों को समझने लगते हैं। जिनके फलस्वरूप उनमें प्रेम, स्नेह, आत्मसमर्पण एवं कर्त्तव्च्य परायणता से युक्त भावनाओं का जन्म होता है, और इसी कारण उनका विवाहित अथवा गृहस्थ जीवन सुखमय बन पाता है।

सुखमय और प्रेम पूर्ण विवाहित जीवन के लिये यह आवश्यक है कि, स्त्री और पुरुष दोनों ही उत्तम चरित्र से युक्त हों, एक दूसरे को पसंद करते हों, और एक-दूसरे के सुख दुःख में भाग लेते हों, और एक दूसरे को इतना अधिक प्रेम करते हों कि अल्प समय के लिये बिछुड़ने पर बेचैनी का अनुभव करते हों।

अगर स्त्री या पुरुष में से कोई एक अथवा दोनों अपने दायित्वों को नहीं समझते और उनमें उपरोक्त भावनाओं का अभाव हो तो, उनका जीवन कलहपूर्ण होने की संभावना बनी रहती है, या वे विवाहित जीवन में सुख का अभाव या न्यूनता का अनुभव करने लगते हैं, जिसके फलस्वरूप तलाक अथवा आत्महत्या तक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

यह सभी तो तब महत्वपूर्ण है, जब जातक की जन्म कुण्डली में विवाह का योग उचित समय में बन रहा हो, इसके विपरीत यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में विवाह का योग ही नहीं बन रहा हो, अर्थात् विवाह प्रतिबंधक योग बना हो तब! ऐसी स्थिति में जातक के साथ-साथ उसके माता-पिता भी चिंता में डूबे रहते हैं।

अनेक उपाय, अनेक यत्न-प्रयत्न करने पर भी विवाह नहीं होता, तब निराश होकर ज्योतिषीयों और कभी-कभी ओझाओं मौलवीयों की शरण में जाते हैं। वस्तुतः विवाह का योग या विवाह का सुख प्रारब्ध का खेल समझा जाता है, जिसकी सूचना हमें जन्म समय की ग्रह स्थिति (जन्म कुण्डली kundli) से मिलती है।

कभी-कभी जन्म कुण्डली kundli में अनेक प्रकार के ग्रहयोग से विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) का निर्माण हो रहा होता है। इन योगों के साथ-साथ यदि उन विवाह प्रतिबंधक योग बनाने वाले ग्रहों पर किसी शुभ ग्रह की कृपा नहीं होती तो विवाह या विवाह होकर भी वैहिक सुख से जातक हीन रहता है। शुभ ग्रह यदि अपना शुभ प्रभाव डाल रहे हों, तब वह विवाह प्रतिबंधक योगों को भीे भंग कर देते हैं।

अतः एक कुशल विद्वान को विवाह प्रतिबंध करने वाले ग्रहयोंगों के साथ-साथ यह भी विचार करना आवश्यक होता है कि, विवाह प्रतिबंधक योगों पर शुभग्रह अपना प्रभाव किस हद तक डाल रहे हैं? शुभ ग्रह अपना प्रभाव डाल भी रहे हैं अथवा नहीं?

आगे एक जातक की जन्म कुण्डली प्रस्तुत की जा रही है, इस कुण्डली में किस प्रकार विवाह प्रतिबंधक ग्रहों (vivah pratibandak yog in kundli) का प्रभाव है, देखें-
30/10/1982 16:37 Vadodara

vivah pratibandak yog in kundli
vivah pratibandak yog in kundli

ग्रहों के भोगांश
लग्न        11रा    17° 25″ 15′
सूर्य         06रा   13° 06″ 03′
चन्द्रमा    11रा   16°  15″ 58′
मंगल      08रा  05° 26″ 39′
बुध          06रा  00° 22″ 41′
गुरू          06रा  23° 41″ 50′
शुक्र         06रा   11° 55″ 50′
शनि        06रा  03° 00″ 40′
राहु          02रा  13°  33″ 07′

आज इस जातक की आयु लगभग 34 वर्ष हो चुकी है, अभी तक अनेक प्रयत्न कर चुके इसके अभिभावक अनेक उपाय कर, कर के थक चुके हैं, परंतु विवाह नहीं हो रहा। मीन लग्न की इस कुण्डली में सप्तम भाव का स्वामी बुध है, यह ग्रह शुक्र की तुला राशि में परंतु अष्टम भाव में सूर्य से अस्त है, हालांकि सप्तम भाव पर पंचमेश चन्द्रमा की सप्तम पूर्ण दृष्टि का योग है, कुण्डली में लग्न तथा चन्द्र लग्न दोनों से सप्तमेश बुध अस्त तथा अष्टम भाव में विवाह का प्रतिबंध सूचित कर रहा है।vivah pratibandhak yog in navansh kundli

विवाह कारक शुक्र द्वितीय व अष्टम भावाधिपति होकर अष्टम भाव में स्थित है, बेशक यह ग्रह स्वग्रही है परंतु इस स्थान में अशुभ फल ही प्रदान कर रहा है, यह शुक्र यहां सूर्य से अस्त भी है। शुक्र तथा बुध का षष्ठेश सूर्य के साथ अष्टम भाव में अस्त होना निश्चित ही विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) का निर्माण कर रहा है।

यहां लग्नेश गुरू शुभ ग्रह होने के कारण थोड़ा शुभ फल दे सकता था परंतु यह ग्रह भी सूर्य के सानिध्य में अस्त है। लग्नेश गुरू, सप्तमेश-चतुर्थेश बुध तथा विवाह सुख का कारक ग्रह शुक्र अष्टम भाव में तो हैं ही, साथ-ही अस्त भी हैं।

इन ग्रहों के साथ कुण्डली में भाग्य स्थान के स्वामी मंगल पर शनि की क्रूर दृष्टि भी विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) में अपना योगदान दे रही है। वर्तमान समय में 13-06-2007 से जातक की शुक्र की महादशा है, इस समय शुक्र की महादशा में राहु की अंतरदशा 13-08-2017 तक रहेगी।

आगे 13 अगस्त 2017 से 13-04-2020 तक गुरू की अंतरदशा होगी, इस अवधि में नैसर्गिक शुभ ग्रह गुरू के शुभ प्रभाव से उपरोक्त अवधि में जातक के लिये शुभ की आशा की जा सकती है। परंतु इस अवधि में भी विवाह संभव होगा या नहीं? पूरी तरह मैं आशा नहीं कर सकता।

गुरू ही एक ग्रह है, जो इस जन्म कुण्डली के अशुभ ग्रहों को अपने शुभ प्रभाव से अनुकूल कर सकता है। परंतु कुण्डली के अधिकांश ग्रह विवाह प्रतिबंधक ग्रहों अथवा योगों (vivah pratibandak yog in kundli) को ही बलवान सूचित कर रहे हैं।