संजीवनी मंत्र

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वेदों में महामृत्युंजय तथा गायत्री मंत्र की बड़ी महिमा बताई गई है, इसी लिए विद्वानों द्वारा कहा जाता है कि इन में से किसी भी एक मंत्र का सवा लाख जाप करके जीवनी की इच्छा को पूरा किया जा सकता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इन दोनों मंत्रों को मिलाकर एक अन्य मंत्र महामृत्युंजय गायत्री मंत्र अथवा मृत संजीवनी मंत्र का निर्माण किया था। इस मंत्र को संजीवनी विद्या के नाम से जाना जाता है। इस मंत्र के जाप से मृत व्यक्ति को भी जीवित करना संभव है।

क्या है संजीवनी मंत्र :-

ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ त्रयंबकंयजामहे ॐ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ॐ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम ॐ भर्गोदेवस्य धीमहि ॐ उर्वारूकमिव बंधनान ॐ धियो योन: प्रचोदयात ॐ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ॐ स्व: ॐ भुव: ॐ भू: ॐ स: ॐ जूं ॐ हौं ॐ

ऋषि शुक्राचार्य ने इस मंत्र की आराधना की थी जिसके प्रभाव से वह देव-दानव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए दानवों को सहज ही जीवित कर सके। महामृत्युंजय मंत्र में जहां सनातन धर्म के सभी 33 देवताओं (8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 वषट तथा ॐ) की शक्तियां समाहित हैं, वहीं गायत्री मंत्र की प्राण ऊर्जा तथा आत्मशक्ति को चमत्कारिक रूप से बढ़ाने वाला मंत्र है।

संजीवनी मंत्र के जाप में निम्न बातों का ध्यान रखें:-

1. जपकाल के दौरान पूर्ण रूप से सात्विक जीवन जिएं।

2. मंत्र के दौरान साधक का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।

3. इस मंत्र का जाप शिवमंदिर में या किसी शांत एकांत जगह पर रूद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए।

4. मंत्र का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और सही होना चाहिए साथ ही मंत्र की आवाज होठों से बाहर नहीं आनी चाहिए।

5. जपकाल के दौरान व्यक्ति को मांस, शराब, सेक्स तथा अन्य सभी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए। उसे पूर्ण ब्रहमचर्य के साथ रहते हुए अपनी पूजा करनी चाहिए।

महामृत्युंजय + गायत्री (संजीवनी) मंत्र का जाप का अभ्यास गुरु के द्वारा मंत्र प्राप्त करके ही करना चाहिये। आध्यात्म विज्ञान के अनुसार संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है, जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता। अर्थात् इस मंत्र साधना को किसी अनुभवी गुरू के दिशा- निर्देश में ही करनी चाहिए। गुरु जी से मंत्र प्राप्त करके गौरीपति मृत्युञ्जयेश्वर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करनेके पश्चात भक्त को सदा मृतसञ्जीवन नामक कवच का सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये। महादेव भगवान् शंकर का यह मृतसञ्जीवन नामक कवच पुण्यप्रद है, गुह्य और मङ्गल प्रदान करनेवाला है।

आचार्य शिष्य को उपदेश करते हैं कि – हे वत्स! अपने मन को एकाग्र करके इस मृतसञ्जीवन कवच को सुनो। यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है। इस मंत्र की गोपनीयता सदा बनाये रखना।

मृतसञ्जीवन नामक कवच:-

॥1॥ सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं । महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ 2।।समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं । शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥3॥ वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवित: । मृत्युञ्जयो महादेव: प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥4॥ जरा से अभय करनेवाले, निरन्तर यज्ञ करने वाले, सभी देवताओं से आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव ! आप पर्व-दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥4॥ दधाअन: शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुज: प्रभु: ।सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥5॥ अभय प्रदान करने वाली शक्ति को धारण करने वाले, तीन मुखों वाले तथा छ: भुजओं वाले, अग्रिरूपी प्रभु सदाशिव अग्रिकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥5॥ अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभु: । यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ॥6॥ अट्ठरह भुजाओं से युक्त, हाथ में दण्ड और अभय मुद्रा धारण करने वाले, सर्वत्र व्याप्त यमरुपी महादेव शिव दक्षिण-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥6॥ खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवित: । रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ॥7॥ हाथ में खड्ग और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, धैर्यशाली, दैत्यगणोंसे आराधित रक्षोरुपी महेश नैर्ऋत्यकोणमें मेरी सदा रक्षा करें ॥7।। पाशाभयभुज: सर्वरत्नाकरनिषेवित: । वरुणात्मा महादेव: पश्चिमे मां सदावतु ॥8॥ हाथ में अभय मुद्रा और पाश धाराण करनेवाले, शभी रत्नाकरों से सेवित, वरुण स्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम- दिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥8॥ गदाभयकर: प्राणनायक: सर्वदागति: । वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्कर: पातु सर्वदा ॥9॥ हाथों में गदा और अभय मुद्रा धारण करने वाले, प्राणों के रक्षक, सर्वदा गतिशील वायुस्वरूप शंकरजी वायव्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥9॥ शङ्खाभयकरस्थो मां नायक: परमेश्वर: । सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्कर: प्रभु: ॥10॥ हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले नायक (सर्वमार्गद्रष्टा) सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओं के मध्य में मेरी रक्षा करें ॥10॥ शूलाभयकर: सर्वविद्यानमधिनायक: । ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वर: ॥11॥ हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सभी विद्याओं के स्वामी, ईशानस्वरूप भगवान् परमेश्व शिव ईशानकोण में मेरी रक्षा करें ॥11॥ ऊधर्व भागे ब्र:मरूपी विश्वात्माऽध: सदावतु । शिरो मे शङ्कर: पातु ललाटं चन्द्रशेखर:॥12॥ ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊधर्व भाग में तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभाग में मेरी सदा रक्षा करें । शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें ॥12॥ भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु । भ्रूयुग्मं गिरिश: पातु कर्णौ पातु महेश्वर: ॥13॥ मेरे भौंहों के मध्य में सर्वलोकेश और दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें, दोनों भौंहों की रक्षा गिरिश एवं दोनों कानों की रक्षा भगवान् महेश्वर करें

॥13॥ नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वज: । जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ॥14॥ महादेव मेरी नासीका की तथा वृषभ ध्वज मेरे दोनों ओठों की सदा रक्षा करें । दक्षिणामूर्ति मेरी जिह्वा की तथा गिरिश मेरे दाँतोंकी रक्षा करें ॥14॥ मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषण: । पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ॥15॥ मृत्युञ्जय मेरे मुख की एवं नागभूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठ की रक्षा करें । पिनाकी मेरे दोनों हाथों की तथा त्रिशूली मेरे हृदय की रक्षा करें ॥15॥ पञ्चवक्त्र: स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वर: । नाभिं पातु विरूपाक्ष: पाश्र्वौ में पार्वतीपति: ॥16॥ पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनो की और जगदीश्वर मेरे उदर की रक्षा करें । विरूपाक्ष नाभि की और पार्वतीपति पाश्र्वभाग की रक्षा करें ॥16॥ कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिप: । गुह्यं महेश्वर: पातु ममोरू पातु भैरव: ॥17॥ गिरीश मेरे दोनों कटिभाग की तथा प्रमथाधिप पृष्टभाग की रक्षा करें । महेश्वर मेरे गुह्यभाग की और भैरव मेरे दोनों ऊरुओं की रक्षा करें ॥17॥ जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका । पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्य: सदाशिव: ॥18॥ जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनों की, जगदम्बिका मेरे दोनों जंघो की तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्तर मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें ॥18॥ गिरिश: पातु मे भार्यां भव: पातु सुतान्मम । मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायक: ॥19॥ गिरीश मेरी भार्या की रक्षा करें, तथा भव मेरे पुत्रों की रक्षा करें । मृत्युञ्जय मेरे आयु की गणनायक मेरे चित्त की रक्षा करें ॥19॥ सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकाल: सदाशिव: । एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥20॥ कालों के काल सदाशिव मेरे सभी अंगो की रक्षा करें ।

[ हे वत्स ! ] देवताओंके लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवचका वर्णन मैंने तुमसे किया है ॥20॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् । सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥21॥ महादेवजी ने मृतसञ्जीवन नामक इस कवच को कहा है । इस कवच की सहस्त्र (1000) आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है ॥21॥ य: पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहित: । सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥22॥ जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथावा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयुका उपयोग करता है ॥ 22॥ हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ । आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥23॥ जो व्यक्ति अपने हाथसे मरणासन्न व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कवच का पाठ करता है, उस आसन्नमृत्यु प्राणीके भीतर चेतनता आ जाती है । फिर उसे कभी आधि-व्याधि नहीं होती ॥23॥ कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा । अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तम: ॥24॥ यह मृतसञ्जीवन कवच काल के गाल में गये हुए व्यक्ति को भी जीवन प्रदान कर ‍देता है, और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणोंसे युक्त ऐश्वर्य को प्राप्त करता है ॥24॥ युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं । युद्दमध्ये स्थित: शत्रु: सद्य: सर्वैर्न दृश्यते ॥25॥ युद्ध आरम्भ होने के पूर्व जो इस मृतसञ्जीवन कवच का 28 बार पाठ करके रणभूमिमें उपस्थित होता है, वह उस समय सभी शत्रुओं से अदृश्य रहता है।

॥25॥ न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै । विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ॥26॥ यदि देवताओं के भी साथ युद्ध छिड जाये तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नही कर सकते, वह विजय प्राप्त करता है ॥26॥ प्रातरूत्थाय सततं य: पठेत्कवचं शुभं । अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ॥27॥ जो प्रात:काल उठकर इस कल्याणकारी कवच सदा पाठ करता है, उसे इस लोक तथा परलोक में भी अक्षय्य सुख प्राप्त होता है ॥27॥ सर्वव्याधिविनिर्मृक्त: सर्वरोगविवर्जित: । अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिक: ॥28॥ वह सम्पूर्ण व्याधियों से मुक्त हो जाता है, सब प्रकार के रोग उसके शरीर से भाग जाते हैं । वह अजर-अमर होकर सदा के लिये सोलह वर्षवाला व्यक्ति बन जाता है ॥28॥ विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् । तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ॥29॥ इस लोकमें दुर्लभ भोगों को प्राप्त कर सम्पूर्ण लोकों में विचरण करता रहता है । इसलिये इस महागोपनीय कवच को मृतसञ्जीवन नाम से कहा है ॥29॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ॥30॥ यह देवतओं के लिय भी दुर्लभ है ॥30॥ ॥ इति वसिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ॥——————————————————

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चक्षुषोपनिषद् , Chaksusopnisad

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‘चाक्षुषी विद्या’ चक्षुषोपनिषद् ,Chaksusopnisad में उल्लेखित विद्या है, यद विद्या जटिल से जटिल नेत्ररोग का हरण करने वाली, पाठ मात्र से सिद्ध होने वाली विद्या है। जिससे समस्त नेत्ररोगों का सम्पूर्णत: नाश हो जाता है। और नेत्र तेज युक्त हो जाते हैं। उस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द हैं, सूर्य भगवान देवता हैं, नेत्ररोग की निवृत्ति के लिये चाक्षुषी विद्या मंत्र का जप होता है।

नेत्रोपनिषद् मंत्रः-
ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरिमं चछुरोगान् शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कलप्य। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मलय निर्मलय। ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करूणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम। खेचराय नमः महते नमः रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्रमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवा छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चाक्षुष्मतीविद्याां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्यक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।
ॐ (भगवान का नाम ले कर कहे)। हे चक्षु के अधिकारी सूर्य देव ! आप चक्षु में चक्षु के तेज रूप में स्थिर हो जायें, मेरी रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आंखों के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना स्वर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे में अन्धा न होऊँ (कृपया) वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, उखाड़ दें। ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्कर को नमस्कार है। ॐ करूणाकर अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ॐ सूर्य भगवान् को नमस्कार है। ॐ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्य देव को नमस्कार है। ॐ आकाश बिहारी को नमस्कार है। परम श्रेष्ठस्वरूप को नमस्कार है। ॐ (सबमें क्रिया-शक्ति उत्पन्न करने वाले) रजोगुणरूप सूर्य भगवान को नमस्कार है। (अन्धकार को सर्वथा अपने अंदर समा लेने वाले) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! मुझको असत से सत की ओर ले चलिये। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्ण स्वरूप भगवान् सूर्य शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं- उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई नहीं है। जो ब्रह्माण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है, उसको नेत्र सम्बंधी कोई रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अंधा नही होता। आठ ब्रह्ममणों को इस विद्या का दान करने पर इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्ध होती है।
जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों से सुशोभित एवं जातवेदा ( भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाले ) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय (सुवर्ण के समान कान्तिमान्) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व जो एकमात्र उत्पत्ति स्थान हैं, उन प्रचण्ड प्रताप वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव समस्त प्रजाओं ( प्राणियों ) के समक्ष उदित हो रहे हैं।
ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।
ॐ षड्विध ऐश्वर्य से समपन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, दिन का भार वहन करने वाली है। हम उन भगवान् के लिये उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेघा अत्यंत प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पंछी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे। ‘भगवन् ! इस अंधकार को छिपा दीजिये, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिये तथा तमोमय बन्धन में बधे हुये हम सब प्राणियों को अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्ष को नमस्कार है। पुष्करेक्षण को नमस्कार है। निर्मल नेत्रों वाले अमलेक्षण को नमस्कार है। कमलेक्षण को नमस्कार है। विश्व रूप को नमस्कार है।
नेत्र रोग से पीड़ित श्रद्धालु साधक को चाहिये कि प्रतिदिन प्रातःकाल पूर्व की ओर मुख करके बैंठे और हरिद्रा (हल्दी) की माला से ॐ ह्नीं हंसः इस बीज मंत्र की छः मालायें जप कर नेत्रोंपनिषद के कम से कम बारह पाठ करें। पाठ के पश्चात फिर उपर्युक्त बीजमंत्र की पांच मालायें जपें। तदनन्तर सूर्य भगवान् को श्रदापूर्वक अर्घ्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा।

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मंगल, मांगलिक

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मंगल से प्रायः सभी भयभीत रहते हैं। विशेषकर बालिका/बालक की कुंडली यदि मंगलीक हुई तो माता-पिता की चिंता बढ़ जाती है। वैसे ज्योतिष में मंगल को काल पुरूष का पराक्रम माना गया है। यह तमोगुणी अग्नि तत्व प्रधान ग्रह है। यह मेष एवं वृश्चिक राशि का स्वामी है। मकर राशि इसकी उच्च राशि तथा कर्क राशि इसकी नीच राशि है। यह मेष राशि में 1 से 12 अंश तक मूल त्रिकोण में, मेष में ही 13 अंश से
30 तक तथा सम्पूर्ण वृश्चिक राशि में स्वराशि का, मकर में 28 अंश तक उच्च का, एवं कर्क में 28 अंश तक नीच राशि का होता है। मंगल का सम्बंध मकर राशि से सर्वोत्तम, मेष से उत्तम, सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु व मीन राशि से मध्यम, वृष एवं मिथुन से सामान्य तथा कर्क, तुला व कुंभ राशि से प्रतिकूल होता है। मंगल कुंडली में अपने स्थित भाव से चौथे, सातवें एवं आठवें भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है। कुंडली में यह तीसरे भाव का कारक है। मंगल के लिये तीसरा, छठा एवं ग्यारहवाँ भाव पूर्णतः शुभ है, लेकिन तीसरे भाव में स्थित मंगल नौवें भाव में स्थित ग्रह से वेध पाता है। वेध प्राप्त शुभ मंगल भी अशुभ फलदायी होता है।

जन्म कुंडली में लग्न भाव से मंगल के लिये 3, 6, 10, 11 भाव शुभ होते हैं। 1, 2, 5, 7, 9 भाव अरिष्ट दायक तथा 4, 8, 12वाँ भाव में से किसी में भी स्थित मंगल जातक/जातिका के लिये अत्यंत अरिष्ट प्रभाव देता है। मंगल कर्क, सिंह, मीन लग्न के लिये प्रबल कारक ग्रह है। मेष राशि के लिये अष्टमेश होकर तथा वृश्चिक राशि लग्न के लिये षष्ठेश होकर तटस्थ स्वभाव का हो जाता है। कारक होकर अत्यंत शुभ फलदायक होता है।

यदि जन्म कुंडली में मंगल लग्न (प्रथम भाव) चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या बारहवें भाव में हो तो कुंडली मंगलिक अर्थात मंगल दोष युक्त हो जाती है, और ऐसा मंगल दाम्पत्य सुख की हानि करता है। लग्नस्थ मंगल की पति/ पत्नी भाव पर पूर्ण दृष्टि पड़ती है। अतः दाम्पत्य जीवन ठीक नहीं बीतता है। जातक/जातिका शिरोव्यथा से पीड़ित हो सकते हैं। लग्नस्थ मंगल जातक को क्रोधी, हिंसक, झगड़ालू प्रवृत्ति का कर देता है, जीवन भर कोई न कोई स्वास्थ्य बाधा बनी रहती है।

चतुर्थ भावास्थित मंगल की सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि पड़ती है, अतः यदि मंगली लड़के या लड़की की शादी गैर मंगली लड़की या लड़के से हो जाये तो पति/पत्नी सदैव रूग्ण रहते हैं। संतान का अभाव हो सकता है। गर्भाशय या गुप्तांग के विकार रहते हैं। आॅपरेशन से भी गुजरना पड़ सकता है। यदि मंगल युवावस्था में हो (प्रत्येक ग्रह 10 से 23 अंश तक युवावस्था में होता है) तथा सप्तम या अष्टम भाव में स्थित हो तो पति/पत्नी की आयुहानि करता है। वैधव्य/विधुरता देता है। बारहवें भाव स्थित मंगल व्यक्ति के जीवन में अस्थिरता देता है। दाम्पत्य सुख नहीं मिलने देता है। कोई न कोई बाधा सच्चा पति/पत्नी सुख नहीं भोगने देती है। द्वितीय भाव स्थित मंगल की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ भाव पर, अष्टम भाव पर एवं नवम भाव पर पड़ती है, अतः यह भी पति/पत्नी के सुख की हानि करता है।
मंगली लड़के की शादी मंगली लड़की से करने से यह दोष को दूर होता है, लेकिन दोनों के मंगल एक ही भाव में न हों। अशुभ प्रभावकारी मंगल उदर विकार, एपैन्डि साइटिस, रक्त विकार सूखा रोग, एनीमिनीया, पित्त विकार, जलना, गिरना, गुप्त रोग, स्नायु दौर्बल्य आदि रोगों से कष्ट देता है। मंगल की गर्मी को कोई भी ग्रह शांत नहीं कर सकता है। मंगल-शनि युति या मंगल-केतु युति या मंगल-राहु युति अत्यंत अशुभ परिणाम देती है। यदि यह युति सप्तम भाव, सप्तमेश, गुरू या शुक्र को प्रभावित करें तो भी दाम्पत्य सुख दिव्य स्वप्न बन जाता है। इसी प्रकार यदि दोनों अग्नि कारक ग्रह सूर्य एवं मंगल की युति हो जायें तो, बहुत हानि होती है। शुक्र के साथ मंगल की युति अति कामुक बना देगी तथा वीर्य स्राव दोष देती है। यदि रक्त का कारक ग्रह मंगल उपरोक्तानुसार पाप प्रभाव में हो तो कैंसर रोग हो सकता है। जिन लग्नों के लिये मंगल मारक प्रभाव वाला ग्रह हो, अर्थात् मारकेश हो तो उन लग्नों को मंगल की अशुभ स्थिति अत्यंत कष्टप्रद होती है। मंगल निम्नलिखित लग्नों के लिये मारक होता है- वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर एवं कुंभ। कुछ योग जो मंगलीक दोष को निष्प्रभावी कर देते हैं:-

1. यदि मेलापक में लड़के-लड़की दोनों ही मंगलीक हों तो, मंगल दोष निष्प्रभावी हो जाता है, अर्थात् शादी उपरांत दोनों का जीवन ठीक चलता है।

2. कुंडली में मंगल शुक्र के साथ स्थित हो या शुक्र से दृष्ट हो अर्थात दोनों एक दूसरे से सम सप्तक स्थित हों। केन्द्र में मंगल की युति भी मांगलीक दोष का निवारण करती है।

3. यदि मंगल अपनी ही राशि में हो, उच्च या नीच राशि में हो, वक्री हो, अस्त हो तो मंगलदोष नहीं रहता है। मूल त्रिकोण में भी मंगलिक दोष नहीं होता है।

4. जन्म कुंडली में मंगल जन्म लग्न से केन्द्रस्थ हो तथा चंद्रमा साथ में हो तो मंगल दोष मिट जाता है।

5. मिथुन लग्न एवं कन्या लग्न में जन्मे जातक/जातिका का पति/पत्नी भाव का स्वामी (सप्तमेश) गुरू होता है और यदि गुरू 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगलिक दोष मिट जाता है। मंगल 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं हो।

6. जन्म लग्न मेष या सिंह, कर्क, मीन, धनु होने पर मंगल दोष कारक नहीं रहता है। यदि एक पक्ष मंगलीक है, तथा दूसरे पक्ष की कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में यदि मंगल न हो तो, इन्हीं भावों में से किसी में भी सूर्य या शनि होने से मंगलिक दोष का निवारण हो जाता है।

7. चर राशि मेष, कर्क, तुला एवं मकर में से किसी भी राशि में स्थित मंगल दोषकारी नहीं है।

8. यदि शुभ ग्रह यथा बलवान चंद्रमा, बुध, गुरू शुक्र केन्द्र में हों, तथा शनि, राहु, केतु एवं सूर्य त्रिक स्थान में स्थित हों तो, भी मंगलिक दोष मिट जाता है।

9. लग्न में मेष का मंगल, चतुर्थ में वृश्चिक राशि का मंगल, सप्तम में मकर राशि का मंगल, बारहवें भाव मेें धनु राशि का मंगल, लग्न में सिंह या मकर राशि का मंगल, द्वादश भाव में वृष और तुला राशि का मंगल चौथे भाव में मेष, धनु या मीन राशि का मंगल हो तो, मंगल दोषदायक नहीं रहता है।

10. सप्तमेश केन्द्र में बलवान हो, और मंगल वृष या तुला राशि में हो तो, दोष मिट जाता है। मंगल गुरू के साथ हो, या गुरू से दृष्ट हो तो, भी मंगलिक दोष नहीं होता है।

11. यदि मेलापक के गुण 25 से आगे हों, राशि मैत्री हो, दोनों के गुण एक हों तो, भी मंगलदोष निष्प्रभावी हो जाता है।

मंगलिक दोष को मिटा देने वाले ये कुछ परिहार हैं- इनमें से कुछ विवादास्पद भी हैं, अतः कुंडली मिलान करते समय यदि कुंडली प्रथम दृष्टि में मंगलिक प्रतीत हो तो, उसका सूक्ष्म परीक्षण परिहारों के संदर्भ में करें केवल इस आधार पर कि –

लग्न व्यये च पाताले यामित्रे चाऽष्टमे कुजः।
कन्या भर्तृविनाशाय वरः कन्या विनाशकृत।।

किसी जातक/जातिका की कुंडली को मंगलिक घोषित कर माँ-बाप को चिंताग्रस्त नहीं बना देना चाहिये, और यदि कुुंडली वास्तव में मंगलिक दोष युक्त है तो-

कुज दोषवती देया कुज दोषवते सदा।
नास्ति दोषो न चानिष्टं दम्पत्योः सुख वर्धनम्।।

अर्थात् मंगलिक दोषयुक्त कन्या की शादी मंगलिक दोष युक्त लड़के से कर दी जाये तो दोष समाप्त हो जाता है। कोई अनिष्ट नहीं होता है, और दाम्पत्य सुख की वृद्धि होती है।

कब कुंडली मिलान की आवश्यकता नहीं:- मिलान केवल जन्म कुंडली होने पर ही मंगलिक दोष देखा जा सकता है। जन्म कुंडली न होने की स्थिति में दोनों के नाम के प्रथमाक्षर से केवल अष्टकूटों का मिलान ही देखना चाहिये। दोनों में से यदि एक विधवा या विधुर हों या परित्यक्त या परित्यक्ता हों तो किसी प्रकार के मिलान की आवश्यकता नहीं है। मंगलिक की भी नहीं। जातक/ जातिका में से कोई भी एक विकृतांग हो तो भी किसी भी प्रकार के मिलान की जरूरत नहीं है। दोनों में परस्पर शादी से पूर्व ही प्रेमाशक्ति हो और दोनों शादी करने के लिये उद्यत हों तो भी मिलान या अन्य किसी दोष को देखने की आवश्यकता नहीं है।

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मंगली, mangli

मंगली योग का प्रभाव क्या है?

Dr.R.B.Dhawan, top best astrologer in Delhi, astrological consultant

भारतीय जीवनशैली में गृहस्थ आश्रम का विशेष महत्व है। गृहस्थ जीवन की शुरुआत पाणिग्रहण संस्कार से आरंभ होती हैं। प्रणय-सूत्र में बंधना सुखदायी होगा या दुःखदायी, यह दोनों के ग्रहों पर निर्भर करेगा जो कि एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। भारत में सर्वाधिक प्रचलित योग ‘मंगली योग’ है। इसे कुज दोष कहते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि ज्योतिष के प्राचीन महत्वपूर्ण ग्रंथ, वृहत पाराशर, होरा शास्त्र, सारावली, जातक परिजात इत्यादि में मंगली योग का कहीं भी उल्लेख नहीं है फिर भी यह योग इतना प्रचलित है कि बच्चे के जन्म लेने के बाद, विशेषकर कन्या के जन्म लेने के उपरांत माता-पिता यही चिन्ता व्यक्त करते हैं कि कन्या मंगली तो नहीं है। आज भी यही धारणा है कि मंगली योग ही विवाह जीवन को नष्ट करता है, अथवा लड़की की कुंडली में यही योग वर को मृत्यु देगा। इतना भयावह रूप प्रचलित है। असल में तथाकथित झोला छाप पंडितों ने या अज्ञानियों ने तिल का पहाड़ बना दिया है। इसका परिहार होता है, या नहीं। कहां से अच्छा है और कहां बुरा, इसका पूर्ण ज्ञान किए बिना बस जातक को भयभीत करना ही जैसे उनका अधिकार है। मंगल ग्रह के देवता हैं श्री गणेश, श्री हनुमान और मां दुर्गा, ये तीनों ही विघ्न बाधाएं और अमंगल दूर करते हैं। अतः यह जानना आवश्यक है कि जिस ग्रह से मंगली या मांगलिक होना बताया गया है, उसके क्या गुण हैं? और स्वभाव क्या है?
मंगल ग्रह का नाम ‘लौहितंऽग’ हैं, क्योंकि यह दूर से लाल दीख पड़ता है। इसका नामा ‘कुज’ और ‘भौम’ भी है। भूमि पुत्र होने से कुज और पृथ्वी से पृथक् हो जाने के कारण भौम नाम हुआ। चूंकि कुछ संघर्ष के उपरान्त पृथ्वी से पृथकत्व हुआ। अतः मंगल लड़ाई-झगड़ा का कारक ग्रह माना गया है। ग्रहों के कुटुम्ब में रवि, पृथ्वी के पिता और चन्द्र माता के स्थान में है। इसीलिए मंगल में रवि और चन्द्र दोनों के गुणों का मिश्रण पाया जाता है।

आचार्य वराहमिहिर द्वारा –
क्रूरदृक तरुण मूर्ति रूदारः पैत्तिकः, सुचपलः कृशमध्यः।
दुष्ट दृष्टिवाला, नित्य युवा ही प्रतीत होने वाला, दाता, शरीर में पित्त की मात्रा अधिक, अस्थिर चित्त, संकुचि तथा पतली कमर, ऐसा मंगल का स्वरूप है।

पाराशर द्वारा-
‘सत्वकुंजः, नेताज्ञेयो धरात्मजः अत्युच्चांगोभौमः, रक्त वर्णो भौमः, देवता षडानन, भौमा अग्नि, कुजः क्षत्रियः आरः तमः भौमः मज्जा, भौमवार, भौम तिृक्तः, भौम, दक्षिणे, कुजः निशायांबली, भौमः कृष्णेचबली, क्रूर स्वदिवसमहो। रामासपर्वकालवीर्यक्रमात् श. कु. बु. गु. शु. चराघा वृद्धितोवीर्यवत्तराः। स्थूलान् जनयातिसूर्ये दुर्भगान्् सूर्यपुत्रकः। श्रीरोपेतान् तथा चन्द्रः कटुकाधान् धरासुतः। वस्त्रे रक्तचित्रे कुजस्य। कुजः ग्रीष्मः।।

सत्वगुण प्रधान तथा शक्तिशाली भौम है। मंगल नेता है। मंगल का कद बहुत ऊंचा है। भूमि पुत्र मंगल रक्तवर्ण है। इसका देवता षडानन, कीर्तिकेय है। यह पुरुषग्रह है। भौम अग्नितत्व प्रधान है। भौम क्षत्रिय है। यह तामस है। भौम मज्जासार है। वारों में भौमासार, मंगल का है। इसे तिक्त रस पसंद है। इसकी दिशा दक्षिण है यह रात्रिबली है। कृष्ण पक्ष में बली है। क्रूर स्वभाव है। अपने दिवस में, अपनी होरा में, अपने मास में, अपने पर्व और काल में श. भौ. बु. गु. और शु. वृद्धिक्रम से अधिक बलीयान होते हैं। सूर्य बली हो तो जातक स्थूलकाय होता है, शनि से जातक कुरूप और अभागा होता है। चन्द्र से क्षीर युक्त तथा रस प्रधान पदार्थ होते हैं। मंगल कटुक पदार्थों को जन्म देता है। मंगल के वस्त्र लाल और चित्रित होते हैं। मंगल-ग्रीष्म ऋतु का स्वामी है। जहां एक ओर यह क्रूर स्वभावी है, कटुक पदार्थों का जन्मदायक है वहीं वृहत् संहिता अनुसार यह कल्याणकारी भी है।

विपुल विमलमूर्तिः किंशुकाशोवर्णः स्पुटरूचिरमयूश्वस्तप्तताम्र प्रभावः।
विचरतियदि मार्गे चोत्तरे मेदिनीजः
शुभकृदवनिपाना हृदिदश्चप्रजानाम्।।

इसका आकार बड़ा होता है, वर्ण अशोक का किंशुक के फूलों जैसा लाल होता है। किरण स्वच्छ और मनोहर होते हैं, कांति तपे हुए तांबे के समान होती है।
यही मंगल मार्ग से जब चलता है, तब राजा और प्रजा के लिए कल्याणकारी होता है।
अर्थात इन सभी मतों से निष्कर्ष निकलता है कि मंगल ऊर्जा शक्ति है, चंचल स्वभाव, कार्यचतुर, शूर सिद्धांत वचन कहने वला, हिंसक प्रवृत्ति, तमोगुणी, प्रतापी, साहसी, शत्रुओं, को मारने में निपुण, स्वभाव में उग्र, दृष्टि में क्रूरता, कामक्रीड़ा में अति चचंल, उदारचित्त, चपल और आलस्य रहित है, निर्भीक है, स्पष्ट जोरदार बोलने वाला है। अर्थात यदि मंगल शुभ स्थिति में है, उच्च का है, मूल त्रिकोण में है, स्वराशि में है, मित्र राशि में है, योग कारक, शुभग्रहों के साथ तथा शुभ से दृष्ट है तो, उपर्युक्त लिखित गुण जातक में होंगे ही।
मंगली योग भावानुसार- मंगली योग जन्म कुण्डली में मंगल के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित होने से बनता है। उत्तर भारत में द्वितीय भाव में मंगल को मंगली नहीं मानते किन्तु दक्षिण भारत में मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश में कहीं भी वह मंगली ही माना जाता है।
अधिकांश विद्वानों का मत है कि मांगलिक दोष चन्द्र लग्न से तथा शुक्र लग्न से भी देखा जाना चाहिए।
चन्द्र लग्न से मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो तो (कुज दोष) मंगली योग होता है।
शुक्र लगन से मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम या अष्टम में भाव में स्थित हो तो मंगली योग होता है।
मंगली योग चन्द्र, शुक्र से इसलिए देखा जाना चाहिए क्योंकि लग्न के साथ, चन्द्रमा मन का कारक है जिससे समस्त मन की अनुभूति होती है तथा शुक्र, विवाह का कारक है। इसलिए इन दोनों का वैवाहिक जीवन में महत्व है।
मंगल क्रूर ग्रह है इसका गुण अशुभ ही होता है ऐसा सत्य नहीं है। इसको जानने के लिए 1, 2, 4, 7, 8, 12 भावों में परिणाम तथा प्रत्येक बारह राशियों में परिणाम जानने होंगे। क्योंकि मंगल विभिन्न राशियों में भिन्न-भिन्न फल देता है।

उदाहरणार्थ- यदि किसी की कुण्डली में मंगली योग है और मंगल निर्बल है तो मंगल अधिक हानि नहीं कर सकता ऐसी कुण्डली के मिलान के लिए, यह जरूरी नहीं है कि दूसरे की कुण्डली में मांगलिक योग हो। मंगल यदि अस्त है या बली क्रूर ग्रहों से दृष्ट है या संधि में हैं तो मंगल निर्बल होगा।
यदि किसी की कुण्डली में वैवाहिक जीवन सुखद है तथा आयु भी पूर्ण है, तो सका विवाह मंगली योग वाले से किया जाय तो कोई हानि नहीं होगी।
अतः हमें यह जानना आवश्यक है कि मंगल कुण्डली के किस भाव में स्थित है, तथा अपनी दृष्टि द्वारा किन-किन भावों को प्रभावित कर रहा है। मंगल किन ग्रहों के साथ है, तथा मंगल पर किसी ग्रह की दृष्टि है। मंगल के द्वारा कौन से योग बन रहे हैं।? मंगल तात्कालिक शुभ है और अशुभ। इससे पता चलेगा कि यह कुण्डली में कहा लाभ पहुंचाएगा। मंगल अपनी शक्ति अनुसार ही लाभ या हानि पहुंचाएगा। केवल मंगली होना ही वैवाहिक जीवन को खराब नहीं करता और इसका फल सभी के लिए एक जैसा भी नहीं होता। अतः भली भांति अध्ययन करके ही मंगली और वैवाहिक योग बताना चाहिए।
यूं तो ऊपर काफी कुछ लिखा जा चुका है परन्तु मंगली-दोष का परिहार अर्थात निरस्तीकरण भी होता है।

परिहार-
1. मंगल यदि मेष या वृश्चिक राशि में 1, 2, 4, 7, 8, 12वें भाव में हो।

2. बृहस्पति किसी भाव में स्थित होकर मंगल को पूर्ण दृष्टि से देखता हो।

3. शनि किसी भाव में स्थित होकर मंगल को पूर्ण दृष्टि से देखता हो।

4. राहु यदि बृहस्पति या शनि से पूर्ण दृष्टि होकर मंगल पर पूर्ण दृष्टि डालता हो।

5. मंगल चतुर्थ अथवा सप्तम भाव में हो और वहां मेष, कर्क, वृश्चिक या मकर राशि हो।

6. यदि मंगल 1, 2, 4, 7, 8, 12 भाव में बली चन्द्रमा, बृहस्पति या बुध से संयुक्त हो।

7. वृषभ व तुला में चतुर्थ व सप्तम भाव का मंगल हो।

8. मिथुन व कन्या राशि का द्वितीय भावसंधि में मंगल हो।

9. मंगल, कर्क, सिंह अथवा मकर में स्थित हो।

10. मंगल, धनु व मीन का अष्टम में स्थित हो।

11. मगल, तुला व वृषभ में द्वादश में स्थित हो।

12. यदि मंगल शनि के साथ स्थित हो।

13. लड़क या लड़की की कुण्डली में मंगल जहां है वहीं दूसरी कुण्डली में शनि हो।

14. द्वादश भाव में मंगल, बुध, शुक्र की राशि में हो।

15. मंगल, सिंह राशि में स्थित हो।

16. कुम्भ, मकर लग्न में मंगल सप्तम भाव में हो।

17. कर्क व सिंह लग्न में मंगल अष्टम भाव मं हो।

18. शनि की राशि पर मंगल अष्टम भाव में हो।

वक्रिणि नीचारिस्थे वार्कस्थे वा न कुजदोषः।

अनिष्ट स्थान में मंगल यदि वक्री हो व नीच (कर्क राशि) हो अथवा शत्रु राशि (मिथुन व कन्या) राशि का हो तो वह अनिष्ट कारक नहीं होता।

कुजो जीव समायुक्तो युक्तो व शशिना यदा।
चन्द्रः केन्द्रगतो वाऽपि तस्य दोषों न मंगली।।

1, 4, 7, 8, 12 भाव में या अरिष्ट कारक स्थानों में से किसी एक में मंगल बृहस्पति अथवा चन्द्रमा के साथ बैठा हो, किन्तु चन्द्रमा केन्द्र में हो तो वह मंगली दोष नहीं कहा जाता। इस प्रकार मांगलिक कुंडली के अनेक परिहार हैं, अतः अध्ययन करने की आवश्यकता है, डराने की नहीं, और ना ही डरने की आवश्यकता है।

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