शनिश्चरी अमावस्या

शनिश्चरी अमावस्या जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं-

  1. ग्रह दोष
  2. पितृदोष
  3. सहभागी कृत दोष

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष- आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

शनैश्चरी अमावस्या-

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री- इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य है, उन सभी के नाप की ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ प्राप्त कर लेनी चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित की गई हो। यह मुद्रिका ऐसी होनी चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

 

 

फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या

फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या है जो आज पूरे विश्व में छाई हुई है फैंगशुई का अर्थ है विन्ड वॉटर (हवा और पानी) हवा ऊर्जा को चारों ओर वितरित करती है और पानी संचित करती है। ये दोनों ऊर्जाएं मनुष्य के जीवन पर प्रभाव डालती है अच्छी ऊर्जा (च्वेपजपअम म्दमतहल) उस परिवेश में रहने वालों को अच्छा स्वास्थ्य शांति तथा समृद्धि प्रदान करती हैं। फैंगशुई को अपनाकर इस नकरात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के लिए क्र्योस (उपाय) का सहारा लेते हैं।

वास्तव में यह एक जीवनशैली (लाइफ स्टाइल) है जो पूर्ण रूप से हमारे जीवन से जुड़ी हुई है हमारे आस-पास की चीजों का स्थान परिवर्तन करके जीवन में सुधार लाया जा सकता है। फैंगशुई को चीन की वास्तुकला भी कहते हैं। हजारों वर्षो से चीन के लोग वातावरण में मौजूद इन सकारात्मक एवं नकारात्मक शक्तियों का सफलता पूर्वक प्रयोग करके व उन्हें ठीक दिशा में प्रवाहित करके उनके माध्यम से अपने जीवन में खुशहाली प्राप्त करने में सफल रहे हैं।

यदि आप भी अपने आस-पास की वस्तुओं को ठीक जगह पर स्थापित कर लें जो प्रकृति के साथ अच्छा तालमेल बिठाने में समर्थ होंगे। दोषपूर्ण फैंगशुई जीवन में असामंजस्यता तथा परेशानियों का कारण हो सकती है। वास्तुशास्त्र के अनुसार भवन निर्माण से पहले दिशाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है या निर्मित भवन को तोड़कर उसमें सुधार लाया जा सकता है जबकि फैंगशुई में आप सिर्फ अपने आस-पास की वस्तुओं को ठीक जगह स्थापित करके या क्योर लगा कर इसका लाभ उठा सकते है सही दिशा में संबंधित क्योर लगाकर हम उस दिशा से संबंधित परेशानियों का निवारण कर सकते हैं।

 

प्रचण्ड शक्ति है बगलामुखी

प्रचण्ड शक्ति है बगलामुखी  साधकों के लिये समस्त साधनाओं की कुंजी है ‘तंत्र’! सब सम्प्रदायों की सब प्रकार की साधना का गूढ़ रहस्य तंत्रशास्त्र में निहित है। तंत्र केवल शक्ति उपासना का ही प्रधान अवलम्बन नहीं है, वह सभी साधनाओं का एकमात्र आश्रय है इसमें स्थूलतम साधन प्रणाली से लेकर अति गुह्य मंत्रशास्त्र और अति गुह्यतर योग साधनादि के समस्त क्रिया कौशलों का सविस्तार वर्णन है। तंत्रान्तर्गत दार्शनिक तत्त्व भी कम सूक्ष्म नहीं हैं। हाँ, ये प्रचलित दर्शन शास्त्रों के समान जटिल भाष्य, टीका और विविध मतवाद द्वारा भायाक्रान्त या दुर्बोध्य नहीं है।

जिस प्रकार मनुश्य की प्रकृति सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भेद से तीन प्रकार की होती है, उसी प्रकार तंत्र शास्त्र भी सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भेद से तीन प्रकार का होता है, तथा इसकी साधना प्रणाली भी उसी प्रकार गुणभेद से तीन प्रकार की व्याख्यात होती है। जिसकी जैसी प्रकृति व रुचि हो, तदनुसार ही साधन पथ को ग्रहण कर साधन करने से वह जीवन को कृतकृत्य कर सकता है। शक्ति जिस प्रकार देव स्वभाव वा दैवीगुण युक्त जीवों की जननी रूपा हैं, उसी प्रकार वह असुर गुण युक्त अथवा असुरों की भी जननी है। इसी कारण असुर और देवता दोनों ही उनकी उपासना में प्रवृत्त होते हैं तथा दोनों ही अपने-अपने स्वभावानुसार उपासना की प्रणाली का अवलम्बन करते हैं, एवं उनका साधन फल भी साधना की प्रकृति के अनुसार ही होता है। इसी कारण शास्त्र दोनों प्रकार की साधन प्रणाली बतलाते हैं। यहां पाठकों को एक ऐसी प्रचण्ड शक्ति बगलामुखी की सरल और शास्त्रोक्त साधना पद्धति का उल्लेख किया जा रहा है जिस देवी का स्थान शक्ति के दस महाविद्या स्वरूपों में प्रमुख है, साधक शत्रु बाधा से मुक्ति चाहता हो अथवा कलह नाश तिरस्कार से छुटकारा या भय-मुक्ति चाहता हो तो इसके लिये बगलामुखी देवी की साधना से तीव्र कोई साधना नहीं है।

आज हम यह विशेष तांत्रोक्त सरल साधना पद्धति साधकों के लिये स्पष्ट कर रहे हैं, जो अत्यंत प्रचण्ड तथा गुह्यतम साधना पद्धति है। गुरू भक्ति में पूर्ण समर्पित साधक तथा गुरू पूजन करने वाले साधकों के लिए है, इस तीव्र साधना का आधार गुरू भक्ति ही है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को ऐश्वर्यशाली बनकर आनन्द से जीना चाहता है, और यह आनन्द, ऐश्वर्य प्राप्त करनें के लिये निरन्तर इच्छा करता है, तथा प्रयत्न भी करता रहता है, परंतु क्या सब के साथ ऐसा ही होता है? इसका यही उत्तर मिलेगा, कि ऐसा संभव नहीं हो पाता, वास्तविक जीवन में तो कष्ट आते हैं, बार-बार बाधायें उपस्थित होती हैं। जीवन में चार बड़े भयंकर विष हैं, जिनके रहते जीवन में आनन्द आ ही नहीं सकता, ये चार विष हैं-

  1. शत्रु बाधा
  2. कलह
  3. तिरस्कार
  4. भय

वास्तव में शत्रु तो चैबीस घंटे आप पर सवार ही रहता है, मित्र से तो आप कभी-कभी मिलते हैं। यदि आप का भी कोई शत्रु बन गया है तो आप का चिन्तन हर समय उसकी ओर ही रहेगा। आपका विचार प्रवाह पहले की तरह न रहकर बदल जायेगा। आप हर समय आशंकित रहेंगे और सोचने लगेंगे कि ऐसा जीवन क्या जीवन है? आपको कोई पुरस्कृत न करे, तो कोई अन्तर नहीं पड़ता, लेकिन यदि कोई आपका तिरस्कार करे, कोई आपको तुच्छ समझे, तो यह मरण समान ही है।

कलह मानव जीवन की सभी उपलब्धियों, सभी कलाओं का नाश कर देती है। कलह शारीरिक क्षति तो पहुंचाती ही है, मानसिक दृष्टि से भी मनुश्य को दुर्बल कर देती है। वह कुछ रचनात्मक कार्य करना चाहता है, लेकिन यदि नित्य प्रति कलह का सामना करना पड़े, चाहे वह कलह पारिवारिक हो, अथवा बाहर के किसी शत्रु के द्वारा उत्पन्न की गयी हो। जीवन का आनन्द तत्व तो समाप्त हो ही जाता है।

चैथी महत्वपूर्ण विपरीत स्थिति भय है, यह भय शत्रु से भी हो सकता है, अपने अधिकारी से भी हो सकता है और अपने व्यापारिक प्रतिस्पर्धी से भी हो सकता है। भय के तो सैकड़ों प्रकार हैं, इसमें से एक भी प्रकार का भय यदि मनुश्य को है तो वह सामान्य रूप से जीवनयापन नहीं कर सकता। यही चारों स्थितियां ही विष हैं, और विष को अपने जीवन से दूर करने का, नष्ट करने का एक उपाय है, वह है- गुरू की भक्ति से गुरू कृपा, प्राप्त कर साधना में सिद्धि प्राप्त कर लेना।

बगलामुखी साधना प्रयोगः-

देवी बगलामुखी की सिद्धि मंगलवार की चतुर्दशी से आरम्भ कर 40 दिन में सवा लाख मंत्र जप द्वारा की जाती है। विस्तृत साधना के तीन खण्ड प्रातः काल, मध्याह्न काल, तथा सायंकाल की साधना का विशेष क्रम है, और इस तांत्रोक्त साधना को इसी रूप में सम्पन्न करने से पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। परंतु बगलामुखी साधना पर्वकाल (होली, दीपावली, महाशिवरात्रि) में केवल एक रात्रि में ही सिद्ध की जा सकती है। इसके अतिरिक्त बगलामुखी जयंती पर्व भी बगलामुखी साधना के लिये उपयुक्त है। इस वर्ष 26 अप्रैल 2015 के दिन श्री बगलामुखी जयंती पर्व है, इस दिन साधक यह साधना सम्पन्न कर सकते हैं।

साधना के लिये जिस सामग्री की आवश्यकता होती है वह इस प्रकार है- एक लकडी की चैकी तथा उस पर बिछाने के लिये पीला वस्त्र, पीले पुष्प, पीले रंगे हुये चावल, कुंकुम, पीली मौली, 21 साबुत सुपारी, हल्दी का चूर्ण, पीले रंग की नैवेद्य (मिठाई), हल्दी की 108 दाने की प्राण प्रतिष्ठित माला, तथा स्वर्णपत्र पर बने अथवा स्वर्ण आलेपित प्राण प्रतिष्ठित बगलामुखी महायंत्र, शुद्ध मुहूर्त में निर्मित स्वर्ण के कवच में रक्षा कवच, तथा बगलामुखी देवी का रंगीन चित्र।

इस साधना में बगलामुखी देवी का चित्र देखे तो इस देवी का स्वरूप दस महाविद्याओं में सबसे निराला लगता है। यह तीन नेत्र वाली देवी अपने एक हाथ में मुग्दर और दूसरे में शत्रु की जीभ लिये तीव्रतम प्रचण्ड रूप धारण किये तीनों लोकों को स्तम्भित कर देने वाली शक्ति है। देवी के इस स्वरूप में सोलह शक्तियाँ समाहित हैं-

  1. मंगला
  2. स्तम्भिनी
  3. जृम्भिणी
  4. मोहिनी
  5. वश्या
  6. वला
  7. बलका
  8. भूधरा
  9. कल्मषा
  10. धात्री
  11. कलना
  12. कलाकर्षिणी
  13. भ्राम्रिका
  14. मन्दगमा
  15. भोगस्था
  16. भाविका

यह प्रचण्ड साधना तीव्रतम साधना की श्रेणी में आती है, अतः किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु ही गुरू आज्ञा से की जानी चाहिए, अन्यथा इससे भयंकर दोष पैदा होकर शरीर का क्षय करने लग जाते हैं।

ऊपर लिखे जो चार दोष हैं, उनके निवारण हेतु विशेष संकल्प लेकर यह प्रयोग आरम्भ करना चाहिए। जब तक इन चार में से कोई एक कष्ट न हो तब तक गुरू भी इस साधना की आज्ञा नहीं देते-

  1. भयंकर शत्रु बाधा
  2. दीर्घकालिक कलह
  3. अति तिरस्कार
  4. प्राण हरने वाला भय।

कई सामान्य साधक जिन्हें पूजन विधि का पूर्ण ज्ञान नहीं होता, उनसे साधना में गलतियाँ हो सकती हैं, अतः शास्त्रों में विधान है, कि यदि पहले गुरू आज्ञा और गुरू पूजन कर के प्राणायाम साधन तथा गायत्री पाठ करके यह साधना प्रारम्भ की जाय, तो कोई साधनात्मक दोष नहीं रहता। साधना की आज्ञा गुरू से लेकर शुभ मुहूर्त अथवा पर्वकाल (दीपावली की रात्रि) में स्नानादि कर शुद्ध पीले वस्त्र धारण कर पीले ऊनी आसन पर बैठकर प्रथम हाथ में थोडे पीले रंगे हुये चावल तथा पवित्र जल लेकर संकल्प लिया जाता है-

संकल्प मंत्र-

ऊँ अस्य श्रीबगलामुखी महामंत्रस्य नारद ऋषिः वृहतीश्छन्दः श्रीबगलामुखी देवता ह्लीं बीजं स्वाहा शक्तिः मम् सकलकामनासिद्धयर्थे जपे विनियोगः

अब सामने एक लकडी की चैकी पर पीला वस्त्र बिछा कर उस पर बगलामुखी देवी का रंगीन चित्र स्थापित करें (इस चित्र को पहले ही फ्रेम करवा लें) फिर पीतल का दीपक शुद्ध घी से प्रज्जवलित करें। पीले पुष्प, पीले रंगे हुये चावल, साबुत सुपारी तथा एक पात्र में 250 ग्रा. हल्दी चूर्ण, हल्दी की माला तथा अन्य साधना सामग्री रखकर अर्धमुद्रित नेत्रों से देवी का ध्यान तथा मानसिक आहवाहन् करें-

ध्यान मंत्र-

दुष्ट स्तम्भन मुग्र विध्न शमनं दारिद्रîविच्छेदनं भूमद्धीशमनं चलन्मृगद्दशां चेतः समाकर्षणम्। सौभाग्यैक निकेतन मम दृशोः कारूण्यपूर्णेक्षणो शत्रो र्मारण माविरस्तु पुरतो मातस्त्वदीयं वपुः।।

करूणापूर्ण नेत्रों वाली माता बगलामुखी मेरे समक्ष आपका वह स्वरूप प्रगट हो जो शत्रुओं की शत्रुता को नष्ट तथा दुष्टों का स्तम्भन, भयंकर विध्नों का निवारण, दरिद्रता का विनाश, राजभय का शमन करने वाला है, मेरे नेत्रों के लिए सौभाग्य का एक मात्र निकेतन है, तुम्हारे चरणों में सादर प्रणाम !!

अब स्वर्णपत्र पर बने अथवा स्वर्ण आलेपित प्राण प्रतिष्ठित बगलामुखी महायंत्र तथा शुद्ध मुहूर्त में निर्मित स्वर्ण के कवच में रक्षा कवच को चैकी पर देवी के चित्र के सामने रखकर देवी के चित्र के साथ पूजन करें- पूजन में पीले पुष्प, पीले कुंकुम, हल्दी तथा मौली समर्पित करते हुये पूजा सम्पन्न करें, देवी के समक्ष पीले रंग की नैवेद्य (मिठाई) अर्पित करें। अब देवी की सोलह शक्तियों का पूजन प्रारम्भ करें, इस हेतु निम्न एक-एक मंत्र पढ़ते हुए सोलह बगलामुखी शक्तियों की स्थापना करें (सोलह स्थानो पर मंत्र पढते हुये एक-एक मुट्ठी हल्दी का चूर्ण रखें)।

ऊँ मंगलायै नमः

ऊँ स्तम्भिन्यै नमः

ऊँ जृम्भिण्यै नमः

ऊँ मोहिन्यै नमः

ऊँ वश्यायै नमः

ऊँ वलायै नमः

ऊँ बलकायै नमः

ऊँ भूधरायै नमः

ऊँ कल्मषायै नमः

ऊँ धात्रयै नमः

ऊँ कलनायै नमः

ऊँ कालाकर्षिण्यै नमः

ऊँ भ्रामिकायै नमः

ऊँ मन्दगमनायै नमः

ऊँ भोगस्थायै नमः

ऊँ भाविकायै नमः

अब प्रत्येक देवी शक्ति के आगे एक साबुत सुपारी रखें और पीले चावल तथा पीले पुष्प अर्पित करें। और फिर हल्दी की माला से जप आरम्भ कर सूर्योदय तक मंत्र का जप करते रहें। यदि जप के बीच में लघुशंका के लिये उठना पडे तब देवी को विलम्ब की प्रार्थना करके उठें और दोबारा देवी का ध्यान करते हुये जप आरम्भ कर सूर्योदय तक जप करें दीपक में घी की आवश्यकता हो तो चम्मच से डालते रहें।

जप मंत्र-

ऊँ हृीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जीह्नां कील्य बुद्विं विनाश्य हृीं ऊँ स्वाहाः।

ओम र्हिं बाग्लमुखी सरवदुस्ताना वाचम मुखाम पदम स्तंभयाए जीव्हां कीलयाए बुधीं विनाश्याए र्हिं ओम स्वाहा 

जप पूर्ण होने पर जप समर्पण मंत्र का पाठ हाथ में माला लेकर हाथ जोडकर प्रार्थना करते हुये करें-

जप समर्पण मंत्र-

गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्। सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात् सुरेश्वर।।

अर्थात् हे ‘देवी ! सुरेश्वरी !! आप गोपनीय से भी अति गोपनीय वस्तु की गोप्ता (संरक्षक) हैं, हमारे द्वारा किये गये इस जप को ग्रहण करें और आपकी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो। इस के पश्चात् देवी को मानसिक विदाई देते हुये नमस्कार करें और देवी को जो नवैदय का भोग लगाया था उस मिष्ठान का परिवार सहित प्रसाद ग्रहण करें। प्रज्जवलित दीपक शांत होने पर स्वर्ण आलेपित प्राण प्रतिष्ठित बगलामुखी महायंत्र तथा देवी बगलामुखी के रंगीन चित्र को छोडकर शेष सामग्री हटा लें। शुद्ध मुहूर्त में निर्मित स्वर्ण के कवच में रक्षा कवच को देवी के चित्र के सामने से हटाकर अपने गले में पीले धागे के साथ श्रद्धापूर्वक धारण करें और हमेशा धारण किये रहें। (यह कवच गुरूजी द्वारा विशेष रूप से शुद्ध मुहर्त में निर्माण किया गया है।) इस कवच के प्रभाव से शत्रु निर्बल तथा स्वयं के पराक्रम में वृद्धि होती है। शेष सभी सामग्री फूल, चावल, हल्दी व सुपारी इत्यादि जल में विसर्जित कर दें। देवी के चित्र को तथा बगलामुखी यंत्र को अपने पूजा स्थान में ही स्थापित कर दें।

नोट- इस विशेष साधना को करने से पहले गुरूजी से आज्ञा लेकर साधना सामग्री का कार्यालय से प्राप्त कर सकते हैं।

 

उपनिषद् में शक्ति का रहस्य

उपनिषद् में शक्ति का रहस्य विश्व में जो कुछ है, वह व्यापक ब्रह्म है। ‘तैत्तिरीयोपनिषद्’’ ने ब्रह्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि जिसमें सारा विश्व पैदा होता है, पैदा होकर जीता है और जीकर जिसमें लय हो जाता है, उसी का नाम ब्रह्म है। इस बात को समझाते हुए गुरूदेव ने पहले शिष्य को यह बताया कि ‘अन्न ब्रह्मेति व्यजानत’ अर्थात् अन्न ब्रह्म है। देह अन्न से पैदा हुआ, अन्न से जीता है और अन्न में लय होता है। अतएव अन्न को ब्रह्म मानो। शिष्य को इस व्याख्या से संतोष न हुआ, तब गुरूजी ने ‘प्राणं ब्रह्मोति व्यजानत’ कहा अर्थात प्राण ब्रह्म है। देह प्राण से पैदा हुआ, प्राण से जीता और प्राण में लय होता है। शिष्य को इस व्याख्या से भी सन्तोष न हुआ। फिर गुरूजी ने ‘मन ब्रह्मेति व्यजानत’ बताया अर्थात मन ब्रह्म है। शिष्य को इस व्याख्या से भी सन्तोष न हुआ। तब गुरूजी ने ‘विज्ञान’ को और पीछे ‘आन्नद’ को ब्रह्म बताया, लेकिन जब इतने सारे ब्रह्म बताए गये, तब हम किसको सचमुच ब्रह्म मानें? ब्रह्म की उक्त व्याख्याओं से हमें सन्तोष नहीं होता।

‘माण्डूक्योपनिषद्’ ने आत्मा की चार अवस्थायें बताई हैं-

  1. जाग्रत
  2. स्वप्न
  3. सुशुप्ति
  4. तुरीय।

जाग्रत् और स्वप्न का अनुभव सबको होता है। सुषुप्ति अर्थात् गाढ़ निद्रा। तुरीय का अनुभव सबको नहीं होता। अतः उसे आत्मा की चैथी अवस्था कह कर उसका सारा वर्णन नकार में ही किया है। जब आत्मा की यह हालत है, तब ब्रह्म क्या वस्तु है, कैसे समझ में आये? आदि शंकराचार्य अपने शिष्य के साथ जंगल में जा रहे थे। रास्ते में एक पागल हाथी आता दिखाई पड़ा। सबलोग इधर-उधर हो गये। हाथी के निकल जाने के बाद एक शिष्य ने गुरू से पूछा कि आप तो ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ बताते हैं। अतएव हम और हाथी सब ब्रह्म ही हैं। फिर हम सब हाथी को देखकर भाग क्यों गये? शंकराचार्यजी ने कहा कि ‘‘हाथी का आना, हमारा देखना और छिपना सभी ब्रह्म था।’’

इतना सोचने-विचारने के बाद जो कुछ है, यह मानने में नहीं आता। यदि कोई कहे कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’, तो मानना पड़ेगा कि ‘मैं’ और ‘ब्रह्म’ अलग-अलग वस्तु हैं, क्यो कि वस्तु और वस्तु का मालिक दोनों एक नहीं होते। सभी तरह से ब्रह्म का विचार करने पर यही ज्ञात होता है कि जो कुछ है, वह अकेला ब्रह्म नहीं है, अपितु साथ में कुछ और भी है। वह क्या है, यह जानना चाहिये।

जिस द्रव में से नवीन पदार्थ प्राप्त हो या पैदा हुआ पदार्थ फिर द्रव बनकर अणु-अणु में मिल जाये, उस द्रव का नाम ‘तत्त्व’ है। उदाहरण के लिये पृथ्वी में एक ही बीज को जल, वायु और अग्नि मिलने से वह अवकाश में प्रस्फुटित होकर पेड़ बनता है और पेड़ में से रूई और कपड़ा भी बनता है। वह कपड़ा यदि जल गया, तो कहा जायेगा कि बीज ने जो रूपक धारण किया था, वह अग्नि में जलकर तत्त्व, तत्त्व में मिल गया। तत्त्व अर्थात् भू, जल अग्नि, वायु और आकाश। प्रत्येक तत्व में दूसरे चार तत्वो की कुछ-न-कुछ मिलावट विद्यमान है। तत्त्व अणु में से पैदा होते हैं। अणु में भयंकर शक्ति है।

अणु-बम कितनी हानि कर सकता है, उससे लोग अपरिचित नहीं हैं। अणु में छिपी हुई भयंकर शक्ति क्या है, उसे जानना चाहिए।

विश्व अनन्त है और अनंत होने से प्रत्येक बिन्दु मध्य बिन्दु है। जो चीज शान्त है, उसका मध्य बिन्दु एक ही होगा। यदि अनन्त का बिन्दु एक ही माना जाये, तो अनंत शान्त हो जायगा। अतएव अनंत का प्रत्येक बिन्दु चिद्-बिन्दु है। उसमें जीवन्त चिद्-शक्ति है। उस प्रत्येक बिन्दु या अणु में भयंकर शक्ति है। तो फिर उस शक्ति को ही विश्व की आदि-शक्ति क्यों न माना जाये ?

कठोपनिषद्’’ में यम ने नचिकेता को बताया कि सूर्य विश्व की आँखें हैं, लेकिन आँख में रोग होने से सूर्य में रोग नहीं होता। इसी तरह प्राणी मात्र की अन्तरात्मा एक होते हुए भी व्यक्तिगत दुःख से आत्मा कुछ नहीं बिगड़ता अर्थात आत्मा को कुछ भी कष्ट नहीं होता। यम ने ब्रह्म का भाव न बताकर सूर्य में विद्यमान शक्ति का भाव बताया। सूर्य की गुरूत्वाकर्षण-शक्ति से नवग्रह नियमानुसार सूर्य के चारों ओर बराबर घुम रहें हैं। तब सोच सकते हैं कि सूर्य में कितनी शक्ति है। सूर्य में जो शक्ति हैं, वह अणु में भी है क्योंकि सूर्य अणु से बनता है।

ईशावास्योपनिषद्’ कहता है कि जो आदमी केवल विद्या की उपासना करता है, वह अंधकार में प्रवेश करता है और जो केवल अविद्या की उपासना करता है, वह भी अंधकार में पड़ता है। जैसे केवल विद्या या अविद्या को मानने से अपना काम नहीं चलता, वैसे ही न अकेले ब्रह्म को मानने से हमारा काम चलेगा, न अकेली शक्तिो मानने से।

यह सब सोचने पर मानना पड़ेगा कि विश्व में दो चीजें होनी चाहिये-एक व्यापक ब्रह्म और दुसरी शक्ति। व्यापक ब्रह्म शिव है और बाकी जो कुछ है, वह शक्ति है। उस शक्ति को कुछ भी नाम दीजिये। चाहे चिद्शक्ति कहो या आदिशक्ति कहो या विश्व की परमेश्वरी ही क्यों न कह डालो।

यह मैं नहीं कहता पुराणों में लिखा है

पार्वती शिव से बोलीं- प्रभो! यदि आप प्रसन्न हैं तो योगी योगाकाशजनित वायु को जिस प्रकार प्राप्त होता है, वह सब मुझे बताइये।

भगवान शिव ने कहा- सुन्दरी! इससे पूर्व मैने योगियों के हित की कामना से कालपर विजय प्राप्त करने की विधि का वर्णन किया है। योगी किस प्रकार वायु का स्वरूप धारण करता है, यह भी बताया है। अब और भी बताता हूँ- इससे पूर्व बताई गई विधि से योगशक्ति के द्वारा मृत्यु-दिवस को योगी जानकर और प्राणायाम में तत्पर हो जाय। ऐसा करने पर वह आधे मास में ही आनेवाले काल को जीत लेता है। हृदय में स्थित हुई प्राणवायु सदा अग्नि को उद्दीप्त करनेवाली है। उसे अग्नि का सहायक बताया गया है। वह वायु बाहर और भीतर सर्वत्र व्याप्त और महान है। ज्ञान, विज्ञान और उत्साह- सबकी प्रवृति वायु से ही होती है। जिसने वायु को जीत लिया, उसने इस सम्पूर्ण जगत पर विजय पा ली।

साधक को चाहिये कि वह जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु को जीतने की इच्छा से सदा धारणा में स्थित रहे; क्योकि योगपरायण योगी को भलीभाँति धारणा और ध्यान में तत्पर रहना चाहिये। जैसे लोहार मुख से धौकनी को फूक-फूंककर उस वायु के द्वारा अपने सब कार्य सम्पन्न करता है, उसी प्रकार योगी को प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये। प्राणायाम के समय जिसका ध्यान किया जाता है, वे आराध्यदेव परमेश्वर सहस्त्रों मस्तक, नेत्र, पैर और हाथों से युक्त हैं। तथा समस्त ग्रन्थियों को आवृत करके उनसे भी दस अंगुल आगे स्थित हैं। आदि में व्याहृति और अंत में शिरोमंत्र सहित गायत्री का तीन बार जप करें और प्राणवायु को रोके रहें। प्राणों के इस आयाम का नाम प्राणायाम है। चन्दमा और सूर्य आदि ग्रह जा-जाकर लौट आते हैं। परंतु प्राणायाम पूर्वक ध्यानपरायण योगी जाने पर आज तक नहीं लौटे हैं। (अर्थात्- मुक्त हो गये हैं)। देवी! जो द्विज सौ वर्षों तक तपस्या करके कुशों के अग्रभाग से एक बूंद जल पीता है, वह जिस फल को पाता है, वही ब्राह्मणों को एकमात्र धारण अथवा प्रणायाम द्वारा मिल जाता है। जो द्विज प्रातः उठकर एक प्राणायाम करता है, वह अपने सम्पूर्ण पाप को शीध्र ही नष्ट कर देता है और ब्रह्मलोक को जाता है। जो आलस्यरहित होकर सदा एकांत में प्राणायाम करता है, वह जरा और मृत्यु को जीतकर वायु के समान गतिशील हो आकाश में विचरता है। वह सिद्धों के स्वरूप, कांति, मेधा, पराक्रम और शौर्य को प्राप्त कर लेता है। उसकी गति वायु के समान हो जाती है। तथा उसे स्पृहणीय सौख्य एवं परम सुख की प्राप्ति होती है।

देवेश्वरी! योगी जिस प्रकार वायु से सिद्धि प्राप्त करता है, वह सब विधान मैने बता दिया है। अब तेज से जिस तरह वह सिद्धि लाभ करता है, उसे भी बता रहा हूँ। जहां दूसरे लोगों की बातचीत का कोलाहल न पहुँचता हो, ऐसे शांत एकांत स्थान में अपने सुखद आसन पर बैठकर चन्द्रमा और सूर्य (वाम और दक्षिण नेत्र) की कांति से प्रकाशित मध्यवर्ती देश भ्रूमध्यभाग में जो अग्नि का तेज अव्यक्त रूप से प्रकाशित होता है, उसे आलस्यरहित योगी दीपकर रहित अंधकारपूर्ण स्थान में चिन्तन करने पर निश्चय ही देख सकता है- इसमें संशय नही है। योगी हाथ की अंगुलियों से यत्नपूर्वक दोनो नेत्रों को कुछ-कुछ दबाये रक्खे और उनके तारों को देखता हुआ एकाग्र चित्त से आधे मुहूर्त तक उन्हीं का चिंतन करे। तदन्तर अंधकार में भी ध्यान करने पर वह उस ईश्वरीय ज्योति को देख सकता है। वह ज्योति सॅद, लाल, पीली, काली तथा इन्द्रधनुष के समान रंगवाली होती है। भौंहों के बीच में ललाटवर्ती बालसूर्य के समान तेजवाले उन अग्निदेव का साक्षात्कार करके योगी इच्छानुसार रूप धारण करने वाला हो जाता है। तथा मनोवांछित शरीर धारण करके क्रीड़ा करता है। वह योगी कारण तत्व को शांत करके उसमें आविष्ट होना, दूसरे के शरीर में प्रवेश करना, अणिमा आदि गुणों को पा लेना, मन से ही सब कुछ देखना, दूर की बातों को सुनना और जानना, अदृष्य हो जाना, बहुत से रूप धारण कर लेना तथा आकाश मार्ग में विचरना इत्यादि सिद्धियों को निरंतर अभ्यास प्रभाव से प्राप्त कर लेता है। जो अंधकार से परे और सूर्य के समान तेजस्वी है, उसी इस महान् ज्योतिर्मय पुरूष (परमात्मा) को मैं जानता हूँ। उन्हीं को जानकर मनुश्यकाल या मृत्यु को लाँघ जाता है। मोक्ष के लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

देवी! इस प्रकार मैने तुमसे तेजस्तत्व के चिन्न की उत्तम विधि का वर्णन किया है, जिससे योगी काल पर विजय पाकर अमरत्व को प्राप्त कर लेता है।

देवी! अब पुनः दूसरा श्रेष्ठ उपाय बताता हूँ, जिससे मनुश्य की मृत्यु नहीं होती।

देवी! ध्यान करने वाले योगियों की चैथी गति साधना बताई जाती है। योगी अपने चित्त को वश में करके यथायोग्य स्थान में सुखद आसन पर बैठे। वह शरीर को ऊँचा करके अंजली बांधकर चोंचकी-सी आकृति वाले मुख के द्वारा धीरे-धीरे वायु का पान करें। ऐसा करने पर क्षणभर में तातु के भीतर स्थित जीवनदायी जल की बूँदें टपकने लगती हैं। उन बूँदों को वायु के द्वारा लेकर सूँघे। वह शीतल जल अमृत स्वरूप है। जो योगी उसे प्रतिदिन पीता है, वह कभी मृत्यु के आधीन नहीं होता। उसे भूख-प्यास नहीं लगती। उसका शरीर दिव्य और तेज महान् हो जाता है। वह बल में हाथी के समान तथ वेग में घोडे के समान हो जाता है। उसकी दृष्टि गरूड़ के समान तेज हो जाती है और उसे दूर की बातें भी सुनाई देने लगती हैं। उसके केश काले और घुंघराले हो जाते है तथा अंग की कांति गंधर्व एवं विद्याधरों की समानता करती है। वह मनुश्य सौ वर्ष तक जीवित रहता है तथा अपनी उत्तम बुद्धि के द्वारा बृहस्पति के तुल्य हो जाता है। उसमें इच्छानुसार विचरने की शक्ति आ जाती है और वह सदा सुखी रहकर आकाश मार्ग में विचरण करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।

देवी! अब मृत्यु पर विजय पाने की पुनः तीसरी विधि बता रहा हूँ, जिसे देवताओं ने भी प्रयत्नपूर्वक छिपा रक्खा है, तुम उसे सुनो- योगी पुरूष अपनी जिव्हा को मोड़कर तालु में लगाने का प्रयत्न करें। कुछ काल तक ऐसा करने से वह क्रमशः लम्बी होकर गले की घाँटी तक पहुंच जाती है। तदन्तर जब जिव्हा से गले की घाँटी सटती है, तब शीतल सुधा का स्त्राव करती है। उस सुधा को जो योगी सदा पीता है, वह अमरत्व को प्राप्त होता है।

(शिव पुराण- अध्याय 27)

पार्वती भगवान शिव से बोलीं- भगवन! मैने आपकी कृपा से सम्पूर्ण मत जान लिया है। देव! जिन मंत्रों द्वारा जिस विधि से जिस प्रकार आपकी पूजा होती है, वह भी मुझे ज्ञान हो गया है। किंतु प्रभों! अब भी कालचक्र के सम्बन्ध में एक संशय है कृपया मेरा यह संशय दूर करें। देव! मृत्यु का क्या चिन्ह है? आयु का क्या प्रमाण है? नाथ यदि मैं आपकी प्रिया हूँ तो मुझे ये सब बातें बतायें।

महादेव जी ने कहा- प्रिये! यदि अक्समात् शरीर सब ओर से पीला पड़ जाये और ऊपर से कुछ लाल दिखे, तो यह जानना चाहिये कि उस मनुश्य की मृत्यु छः महीने के भीतर हो जायेगी। शिवे! जब मुहँ, कान, नेत्र और जिव्हा का स्तम्भव हो जाये, तब भी छः महीने के भीतर ही मृत्यु जाननी चाहिये। भद्रे! जो रूरू मृग के पीछे होनेवाली शिकारियों की भयानक आवाज को भी जल्दी नहीं सुनता, उसकी मृत्यु भी छः महीने के भीतर ही जाननी चाहिये। जब सूर्य, चन्द्रमा या अग्नि के सानिध्य से प्रकट होनेवाले प्रकाश को मनुश्य नहीं देखता, उसे सब कुछ काला-काला अंधकारमय ही दिखाई देता है, तब उसका जीवन छः मास से अधिक नहीं होता। देवी! प्रिय! जब मनुश्य का बायां हाथ लगातार एक सप्ताह तक फड़कता ही रहे, तब उसका जीवन एक मास ही शेष है- ऐसा जानना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। जब सारे अंगों में अंगड़ाई आने लगे और तालू सूख जाये, तब वह मनुश्य एक मास तक ही जीवित रहता है-इसमें संशय नहीं है। त्रिदोष में जिसकी नाक बहने लगे, उसका जीवन 15 दिन से अधिक नहीं चलता। मुख और कण्ठ सूखने लगे तो यह जानना चाहिये कि छः महीने बीतते-बीतते इसकी आयु समाप्त हो जायेगी। भागिनी! जिसकी जीभ फूल जाये और दांतों से मवाद निकलने लगे, उसकी भी छः महीने के भीतर मृत्यु हो जाती है। इन चिन्हों से मृत्युकाल को समझना चाहिये।

सुन्दरी! जल, तेल, घी तथा दर्पण में जब भी अपनी परछाईं न दिखाई दे या विकृत दिखाई दे, तब कालचक्र के ज्ञाता पुरूष को यह जान लेना चाहिये कि उसकी भी आयु छः मास से अधिक नहीं है। देवेश्वरी! अब दूसरी बात सुनों, जिससे मृत्यु का ज्ञान होता है। जब अपनी छाया को सिर से रहित देखें अथवा अपने को छाया से रहित पायें, तब वह मनुश्य एक मास भी जीवित नहीं रहता।

पार्वती! ये मैने अंगों में प्रकट होने वाले मृत्यु के लक्षण बताये हैं। भदे्र! अब बाहर प्रकट हाने वाले लक्षणों का वर्णन करता हूँ, सुनों। देवी! जब चन्द्रमण्डल या सूर्यमण्डल प्रभाहीन एवं लाल दिखायी दे, तब आधे मास में भी मनुश्य की मृत्यु हो जाती है। अरूंधती, महायाना, चन्द्रमा- इन्हें जो न देख सके अथवा जिसे ताराओं का दर्शन न हो, ऐसा पुरूष एक मास तक जीवित रहता है। यदि ग्रहों का दर्शन होने पर भी दिशाओं का ज्ञान न हो- मन पर मूढता छाई रहे तो छः महीने में निश्चय ही मृत्यु हो जाती है। यदि उतथ्य नामक तारा का, धु्रव का अथवा सूर्यमण्डल का भी दर्शन न हो सके, रात में इन्द्रधनुष और मध्याहन में उल्कापात होता दिखाई दे तथा गीद्य और कौये घेरे रहें तो उस मनुश्य की आयु छः महीने से अधिक नहीं होती।

यदि आकाश में सप्तऋषि तथा स्वर्गमार्ग (छाया पथ) न दिखाई दे तो कालज्ञ पुरूषों को उस पुरूष की आयु छः मास ही शेष समझनी चाहिये। जो अक्समात् सूर्य और चन्द्रमा को राहु से ग्रस्त देखता है और सम्पूर्ण दिशायें जिसे घूमती दिखाई देती हैं, वह अवश्य ही छः महीने में मृत्यु को प्राप्त होता है। यदि अक्समात् नीली मक्खीयाँ आकर पुरूष को घेर लें तो वास्तव में उसकी आयु एक मास ही शेष जाननी चाहिये। यदि गीध, कौआ अथवा कबूतर सिर पर चढ़ जाये तो वह पुरूष शीघ्र ही एक मास के भीतर मर जाता है, इसमें संशय नहीं है।

 

 

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण भारतीय ऋषियों ने 16 संस्कारों के रूप में जो अनुशासित व्यवस्था व्यक्तित्व निर्माण के लिये रूपान्तरित की है, उसमें विवाह संस्कार का स्थान महत्वपूर्ण है। विवाह पीढ़ी-विस्तार का समाज सम्मत हेतु है। विवाह विभिन्न सभ्यताओं, सुसंस्कृतियों, संस्कारों, विचार धाराओं और भाव धाराओं के सम्पर्क का भी हेतु है।

विवाह नामक रसपूर्ण संस्कार के प्रति व्यक्ति कि उत्कंठा, जिज्ञासा और लालसा सहज ही है। किन्तु नियति सबके प्रति समान रूप से उदार नहीं होती। आज उचित समय पर विवाह सम्पन्न होना एक दुःसाध्य प्रक्रिया हो गई है- विशेषतः कन्या पक्ष के संदर्भ में। ग्रहों का अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन पर निर्विवाद रूप से पड़ता है। इस संदर्भ में आस्था अनास्था से कोई अन्तर नही पड़ता। जैसे किसी बंद कमरे में बैठकर सूर्य के आलोक अथवा तेज का प्रतिवाद नही किया जा सकता उसी प्रकार ज्योतिष भाग्य और ईश्वर में अश्रद्धा उसके मौलिक प्रभाव को क्षति नही पहुँचाती। इस सत्य को निरन्तर ध्यान में रखना चाहिए। व्यक्ति के जीवन में जन्म के समय ग्रहों की स्थिति एक प्रमुख भूमिका रखती है।

समस्त जीवन इनकी शुभता-अशुभता, सुसंयोगिता- कुसंयोगिता और प्रभुता-क्षीणता के द्वारा निर्धारित होता है। व्यक्ति आजीवन अपनी नियति से संघर्ष करता है और पराभूत होने का दर्शन सीखता है। कन्या के विवाह में अनपेक्षित विलम्ब देखकर अभिभावक चिन्ता के महासमुद्र में निमग्न हो जाते हैं।

अपनी समस्त शक्ति और सामाजिक परिचय का उपयोग करके भी वे अपनी कन्या के लिए उपयुक्त वर नहीं प्राप्त कर पाते। जीवन ऐसे अभावों का क्रूर साक्षात्कार है।

जीवन के अभावों की पूर्ति के लिए मानव ने तंत्र-मंत्र-यंत्र का भी समय समय पर प्रयोग-उपयोग किया है। सर्वप्रथम मंत्र के अर्थ विस्तार की संक्षिप्त विवेचना अनिवार्य है। वैदिक ऋचाओं से दैवी शक्तियों की स्तुतियों, यज्ञादि के लिए विचरित पदों एवं शब्द प्रतीकों तक मंत्र की एक सुसंस्कृत परम्परा प्रवाहमान है। मंत्र शब्द की सामथ्र्य का चरणतम केन्द्रियभूत आह्नान है। ‘मंत्र’ शब्द मंत्रि गुप्तभाषणे’’ धातु से घ् प्रत्यय द्वारा निष्पन्न होता है जिसका तात्पर्य है रहस्य। वह रहस्य जो देवोपम है किन्तु मानवीय अनुभूति का विषय है। तंत्र साहित्य के मतानुसार वह प्रत्येक शब्द मंत्र है जो देवता की स्तुति में निवेदित है। श्रुति, स्मृति, पुराण, उपनिषद, आगम और निगम सभी मंत्रों के उल्लेख से परिपूर्ण हैं। यह सत्य है कि वैदिक मंत्र जितने शक्तिसम्पन्न हैं, उनकी साधना उतनी हीं दुरूह और दुष्कर है। इसलिए वेदोक्त मंत्रों के स्थान पर तंत्र शास्त्र आज किंचित् सहज समझा जाता है। इस तथ्य के विस्तार में जाना इसलिए अप्रासंगिक होगा क्योंकि इस लेख की केन्द्रिय वस्तु है कि विवाह योग्य युवक या कन्या के विवाह में विलम्ब होने पर किन मंत्रो के प्रयोग से आशानुकूल सफलता प्राप्त होगी। अनुभव से सिद्ध हो चुका है कि युवक या कन्या के विवाह मे आने वाली अनेकानेक बाधाओं की शांति मंत्रशक्ति से सुनिश्चित हो सकती है।

जन्मांग में शनि की स्थिति, शनि द्वारा प्रचालित स्थिति, राशियाँ, नक्षत्र और भाव आदि का अध्ययन करना चाहिए। यदि शनि शुक्र से युक्त होकर, सूर्य अथवा चन्द्र किसी एक ग्रह पर दृष्टि निक्षेप करता हो तो विवाह मे विलम्ब होता है। यदि सूर्य अथवा चन्द्र या दोनों संयुक्त रूप से शनि के नवांश में स्थित हों और शुक्र भी शनि से अक्षिप्त हो तो विवाह में आशा के विपरीत विध्न उपस्थित होतें हैं। सप्तम भाव अथवा लग्न के पाप ग्रहक्रांत होने पर पापकर्तरि योग की स्थापना होती है जिसके परिणाम स्वरूप दाम्पत्य अनेकानेक संकटो से घिर जाता है। लग्न सप्तम भाव अथवा इसके अधिपति ग्रह यदि सूर्य और शनि, शनि और मंगल, शनि और राहु, आकर सूर्य जैसे क्रूर ग्रहों से आबद्ध होते हैं तो विवाह की दिशा में विलम्ब अथवा निषेध जैसे संकेत प्राप्त होते हैं। विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब तब भी होता है जब लग्नाधिपति, सप्तमाधिपति, चन्द्रराशि-अधिपति और स्वयं चन्द्र शनि से दृष्ट, युक्त अथवा द्वादश भावस्थ होते हैं। वक्री ग्रह की सप्तम भाव अथवा सप्तम भावेश पर दृष्टि अथवा स्थिति या युति विवाह में बाधा उत्पन्न करती हैं। इन्हीं स्थितियों में द्वितीय भाव या शुक्र हो तो विवाह विलम्बित होता है। पंचमेश और सप्तमेश का परस्पर परिवर्तन योग स्थापित हो अथवा राहु और शुक्र सप्तम अथवा नवम भाव में हों तथा क्रूर ग्रह की दृष्टि का कुसंयोग हो तो विवाह में ज्योतिषीय दृष्टि से विलम्ब की घोषणा की जा सकती है।

 

Diwali Pooja Muhurat 2016

diwali pooja muhurat 2016

Diwali Pooja Muhurat 2016

30 अक्तूबर 2016 दीपावली पर्व है। दीपावली की रात्रि प्रदोषकाल में महालक्ष्मी पूजन (Diwali Pooja Muhurat 2016) की परम्परा आदिकाल से चली आ रही है। इस दिन सूर्य व चन्द्रमा तुला (शुक्र की राशि) में विचरण कर रहे होते हैं।

कार्तिक अमावस्या की रात्रि स्थिर लग्न (वृष या सिंह) में महानिशीथ काल में महालक्ष्मी का पूजन करने से माता लक्ष्मी साधक के घर स्थाई निवास करती हैं।

इस वर्ष महालक्ष्मी पूजन MahaLaxmi Diwali Pooja Muhurat 2016 का शुभ तथा विशेष मुहूर्त सॉय 18:28 से आरम्भ होकर 20:22 तक रहेगा।

इस दिन सॉय 18:28 से 20:22 तक के समय में अमावस्या तिथि अंतर्गत वृष लग्न तथा शुभ, अमृत तथा चर का चौघडिया का शुभ योग बना है।

स्थिर लग्न के मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन करने से धन-धान्य स्थिर रहता है। इस मुहूर्त में दीपदान, गणपति सहित महालक्ष्मी पूजन, कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन तथा धर्मस्थलों में और अपने घर में दीप प्रज्जवलित करना चाहिये।

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दीपावली पूजन तथा इस रात्रि में की जाने वाली विशेष साधनाओं का विस्तार पूर्वक विवरण जानने के लिये देखें गुरूजी द्वारा प्रकाशित अॉनलाईन ज्योतिषीय मासिक पत्रिका aapkabhavishya यह पत्रिका www.shukracharya.com पर नि:शुल्क उपलब्ध है।

इस के अतिरिक्त AapKaBhavishya.in पर भी गुरूजी (डा. आर.बी.धवन) के ज्योतिषीय लेख भी आप पढ़ सकते हैं।

Santaan Prapti Upaya for Diwali – इस दीपावली करें संतान प्राप्ति उपाय

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Santaan Prapti Upaya संतान प्राप्ति उपाय (एक दिवसीय दीपावली साधना प्रयोग)

कुण्डली में संतानोत्पत्ति योग न हो अथवा अनेक बार गर्भ हानि होती रही हो या संतान दीघार्यु नहीं होती हो तो उसके लिए यह संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya महत्वपूर्ण है। इस साधना प्रयोग को दीपावली की रात्रि में संतान की इच्छा करने वाली महिला के संपन्न करने से संतान का योग प्रबल होकर एक वर्ष में संतानोत्पत्ति अवश्य होती है। और वह संतान आज्ञाकारी होती है। इस प्रकार के प्रयोग से गृहस्थ जीवन अनुकूल एवं सुखदायी बन जाता है।

संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya के लिए साधिका को चाहिए कि वह दीपावली की रात्रि में स्नानादि कर पीले वस्त्र धारण कर पूर्व की तरफ मुख कर के पीले आसन पर बैठ जाएं सामने लकड़ी की चौकी पर एक थाली में चावल से त्रिकोण बनाकर उसके मध्य में मोती पर बने अभिमंत्रित मुक्ता गणपति की स्थापना करें और फिर पंचोपचार (फूल, चावल, रोली, कलावा तथा धूप-दीप) से पूजा करके पुत्रजीवा की 108 दानों वाली माला से 51 माला अग्रलिखित मंत्र जप पूर्ण करें।

यही प्रयोग प्रत्येक माह शुक्ल पंचमी के दिन गर्भवती होने तक पुत्र की इच्छा रखने वाली महिला को दोहराना चाहिये। निश्चय ही उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। यही संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya उस महिला का पति या घर का कोई अन्य सदस्य भी कर सकता है, परंतु उसको उस महिला के नाम का संकल्प अवष्य लेना होगा। यदि कोई साधक-साधिका किसी दूसरे के लिए प्रयोग करना चाहे तो संकल्प ले लें कि ‘मैं यह प्रयोग अमुक व्यक्ति के लिए संपन्न कर रहा/रही हूँ।

मंत्र- ऊँ नमो नारायणाय पुत्र सन्तानं देही देहि ठः ठः स्वाहा।

जप पूर्ण होने पर गणपति जी को मिष्ठान का भोग लगवाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें। वह माला जल में विसर्जित कर दें। मुक्ता गणपति का चांदी में लॉकेट बनवाकर महिला को गले में धारण करना चाहिये।

साधना सामग्री– अभिमंत्रित मुक्ता गणपति (मोती पर बने गणपति), 108 दाने की पुत्रजीवा माला।

न्यौछावर राशि रू. 3100

संपर्क : Sukracharya, F-265, Street No. 22, Laxmi Nagar, Delhi-110092, Mob: 09810143516

नाग पंचमी उपाय Nag Panchami Muhurat & Upaya 2016

Nag Panchami Muhurat & Upaya 2016

Nag Panchami Muhurat & Upaya नाग पंचमी 7 अगस्त 2016

हमारे धर्म ग्रन्थों में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पूजा Nag Panchami Muhurat & Upaya का विधान है। पुराणें के अनुसार नागों की अनेक जातियाँ और प्रजातियाँ हैं। भविष्य पुराण में नागों के लक्षण, नाम, स्वरूप एवं जातियों का विस्तार से वर्णन मिलता है। मणिधारी तथा इच्छाधारी नागों का भी उल्लेख मिलता है।

श्रावणमास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) का त्यौहार नागों को समर्पित है। इस त्यौहार पर व्रत पूर्वक नागों का अर्चन-पूजन होता है। व्रत के साथ एक बार भोजन करने का नियम है। पूजा में पृथ्वी पर नागों का चित्रांकन किया जाता है। स्वर्ण, रजत, काष्ठ या मृत्तिका से नाग बनाकर पुष्प, गंध, धूप-दीप एवं विविध नैवेद्यों से नागों का पूजन होता है।

नाग अथवा सर्प पूजा की परम्परा पूरे भारतवर्ष में प्राचीनकाल से रही है, प्रत्येक गाँव में ऐसा स्थान अवश्य होता है, जिसमें नाग देव की प्रतिमा बनी होती है, और उसका पूजन किया जाता है।

नागपंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) के दिन को तो एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, इसके पीछे भी विशेष कारण है जिस का वर्णन आगे इसी लेख में करेंगे। समय के अनुसार मूल स्वरूप को अवश्य भुला दिया गया है।

क्या नाग देवता हैं?

जिस प्रकार मनुष्य योनि है, उसी प्रकार नाग भी योनि भी है, प्राचीन कथाओं में उल्लेख मिलता है कि पहले नागों का स्वरूप मनुष्य की भांति होता था, लेकिन नागों को विष्णु की अनन्य भक्ति के कारण वरदान प्राप्त होकर इनका स्वरूप बदल दिया गया, और इनका स्थान विष्णु की शय्या के रूप में हो गया, नाग ही ऐसे देव हैं, जिन्हें विष्णु का साथ हर समय मिलता है, और भगवान शंकर के गले में शोभा पाते हैं, भगवान भास्कर (सूर्य) के रथ के अश्व भी नाग का ही स्वरूप हैं।

भय एक ऐसा भाव है, जिससे कि बली से बली व्यक्ति, बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति, भी अपने को शक्तिहीन समझता है। कोई अपने शत्रुओं से भय खाता है, कोई अपने अधिकारी से भय खाता है, कोई भूत-प्रेत से भयभीत रहता है, भयभीत व्यक्ति उन्नति की राह पर कदम नहीं बढ़ा सकता है, भय का नाश, और भय पर विजय प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है, और नाग, सर्प देवता भय के प्रतीक हैं, इसलिए इनकी पूजा का विधान हर जगह मिलता है।

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नाग पंचमी रक्षात्मक प्रार्थना का पर्व-

आमतौर पर नागपंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) के पर्व को महिलाओं का ही पर्व माना जाता है, जो कि बिल्कुल गलत है, ‘‘नाग’’ वास्तव में कुण्डलिनी शक्ति के स्वरूप हैं, यह विशेष पर्व कुण्डलिनी शक्ति की उपासना का पर्व है। इस पर्व पर छोटा-मोटा कुण्डलिनी जागरण प्रयोग कर व्यक्ति किसी भी प्रकार की भय बाधा से मुक्ति पा सकता है।

इसका विधान भी अत्यंत सरल है-
नागपंचमी के दिन प्रातः जल्दी उठकर सूर्योदय के साथ सबसे पहले शिव पूजा संपन्न करनी चाहिए, शिव पूजा में शिवजी जी का ध्यान कर शिवलिंग पर दूध मिश्रित जल चढ़ायें और एक माला ‘ऊँ नमः शिवाय’ मंत्र का जप अवश्य करें। नाग पूजा में साधक अपने स्थान पर भी पूजा संपन्न कर सकता है, और किसी देवालय में भी।

किसी धातु का बना छोटा सा नाग का स्वरूप ले लें या फिर एक सफेद कागज पर नाग देवता का चित्र बना लें। इसे अपने पूजा स्थान में सामने सिंदूर से रंगे चावलों पर स्थापित करें, और एक पात्र में दूध नैवेद्य स्वरूप रखें। सर्वप्रथम अपने सदगुरू का ध्यान कर, सर्प भय निवृति हेतु प्रार्थना करें, तत्पश्चात नागदेवता का ध्यान करें कि-

हे नागदेव! मेरे समस्त भय, मेरी समस्त पीड़ाओं का नाश करें, मेरे शरीर में अहंकार रूपी विष को दूर करें, मेरे शरीर में व्याप्त क्रोध रूपी विष से मेरी रक्षा करें, इसके बाद नागदेव के चित्र पर सिंदूर का लेप करें, तथा इसी सिंदूर से अपने स्वयं के तिलक लगायें। इस के बाद अग्र लिखित मंत्र का 21 बार पाठ करते हुये नाग देवता तथा कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करें।

मंत्र-
जरत्कारूर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी। वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा ।।
जरत्कारूप्रिया स्तीकमाता विषहरेति च। महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता।।
द्वादशैतानि नमानि पूजाकाले तु यः पठेत्। तस्य नागभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

थोड़ी देर शांत होकर बैठ जायें तथा ऊँ नमः शिवाय का जप करते रहें, इससे भय का नाश होता है और बड़ी से बड़ी बाधा से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।

पूजन के बाद नागदेव के सम्मुख रखे दूध को प्रसाद स्वरूप स्वयं ग्रहण करें, यदि यह दूध किसी अस्वस्थ व्यक्ति को पिलाया जाये, तो उसे दिन-प्रतिदिन स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होगा। यदि कोई किसी पुराने रोग से पीड़ित हो तो यह प्रयोग 7 दिन तक करें, लेकिन पूजन से पहले अस्वस्थ व्यक्ति के नाम से संकल्प अवश्य लें। इस पूजा का प्रभाव इतना अनुकूल रहता है कि विशेष कार्य पर जाते समय नागदेव का ध्यान कर, यदि आप प्रबल से प्रबल शत्रु के पास भी चले जाते हैं, तो वह शत्रु आप से सत व्यवहार ही करेगा, हानि देने की बात ही दूर रही।

संतान प्राप्ति का नाग शान्ति प्रयोग-

जो स्त्रियाँ नागपंचमी के दिन नागदेव का विधि-विधान सहित पूजन करती हैं, उनकी संतान प्राप्ति की कामना अवश्य पूर्ण होती है। स्त्रियों को अपनी संतान रक्षा हेतु भी नाग शान्ति प्रयोग करना चाहिये। नागपंचमी के दिन सांयकाल शिव का ध्यान करते हुए नाग देव का पूजन करना चाहिए, इसमें पूजन तो ऊपर दी गई विधि के अनुसार ही करना है किंतु अंतर केवल इतना ही है, कि संतान प्राप्ति तथा रक्षा हेतु आगे दिये मंत्र का 51 बार जप करें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पùनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
संतान प्राप्यते संतान रक्षा तथा।
सर्वबाधा नास्ति सर्वत्र सिद्धि भवेत्।।

यह प्रयोग नागपंचमी से लेकर सात दिन तक संपन्न करें। इस प्रयोग को करने से भयबाधा व संतान की कामना पूर्ति अवश्य होती है।

Shivling Upasana शिवलिंगोपासना (Shivratri Special)

Maha Shivratri Special on Shivling

Shivling Upasana शिवलिंगोपासना

तैतीस करोड़ देवी-देवताओं में शिव ही ऐसे हैं जिनकी लिंग shivling के रूप में पूजा होती है जो देवलोक के ऐशो आराम से दूर एक फक्कड़ बाबा के रूप में माने जाते हैं। भांग-धतूरा खाकर, अंग विभूति लिपटा कर जहरीले नागों को गले में लिपटाये प्रसन्न घूमते हैं। शिव Shiv ही हैं जो अक्खड़ दानी हैं। शिवलिंग Shivling पर जल मात्र चढ़ाने से मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं।

भगवान शिव shiv सृष्टि के संहारक हैं। वे मानव के तन-मन की पीड़ा दूर करते हैं, वे आशुतोष है और अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते है। रूद्र उनका एक और नाम है जिसका अर्थ है रोगों को हरण करने वाला। भगवान शिव की उपासना में शिवलिंग shivling पूजा का सबसे अधिक प्रचलन है। लिंग पूजन से सभी मनोकामनायें पूर्ण होती है और सुख शांति की प्राप्ति होती है।

गरुड़ पुराण के अनुसार लिंग shivling अलग- अलग पदार्थों से अनेक प्रकार के बनाये जाते हैं जिस पदार्थ से लिंग बनाये जाते हैं वैसा ही फल प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अलग-अलग वस्तुओं से अभिषेक करने से भी भिन्न फल की प्राप्ति होती है।

जैसे-
श्री प्राप्ति के लिए गन्ने के रस में अभिषेक करना चाहिए।
ज्वर आदि प्रकोप से बचाव हेतु जलधारा से पूजन करें।
वंश वृद्धि हेतु धृत योग से अभिषेक करें।
पाप निवारण हेतु मधु से पूजन करना चाहिए।
समस्त व्याधियों के हरण हेतु पीली, सरसों के तेल से पूजन करें।
लम्बी आयु के लिए दुग्ध से पूजन करें।
एवं संतान प्राप्ति हेतु शर्करा से अभिषेक करना चाहिए।

मृत्युंजय साधना या रूद्राभिषेक दोनों ही मोक्ष और लम्बी आयु देने वाले हैं।

अठारहों पुराणों में शिव को श्रेष्ठ कहा गया है। शिव को उनकी श्रेष्ठता के कारण ही देवाधिदेव कहा गया है। इन्हीं शिव से संबंधित है महाशिवरात्रि-व्रत। देवों में श्रेष्ठ शिव हैं तो स्वभावतः शिव से सम्बद्ध महाशिवरात्रि व्रत व्रतों में सर्वश्रेष्ठ है यह सामान्य जन भी जानते हैं।

जिस व्रत को शिव की प्रियरात्रि में संपन्न किया जाता है वह व्रत शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है तो हर माह में कृष्ण पक्ष में शिवरात्रि व्रत पड़ता है। परन्तु महाशिवरात्रि व्रत फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को पड़ती हैं।

यह अर्थ, काम, मोक्ष तीनों की प्रदाता है अर्थात् मनोकामना पूर्ति हेतु महाशिवरात्रि व्रत करने योग्य है यह सद्या फलदाता है। भोले बाबा स्वयं तो दिगम्बर, श्मशान सेवी और वृषभ वाहन पर है परन्तु अपने भक्तों को अकल्पनीय ऐश्वर्य प्रदान करने में भी पीछे नहीं रहते है। कभी-कभी बाबा ऐसा वरदान दे देते हैं कि बाद में स्वयं परेशानी में पड़ जाते हैं।

रावण शिवभक्त ही था उसकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे इतना सशक्त बना दिया कि उसने सोने की लंका बना ली और विभिन्न देवताओं को बंदी बनाकर अपने अधीन कार्य लेने लगा। इन्द्र रावण के यहां पानी भरने लगे, अग्नि भोजन पकाने लगी, वायु पंखा झलने लगी।

इसी रावण को मारने के लिए रामावतार हुआ और राम भी रावण वध में तभी सफल हुए जब उन्होंने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना कर पूजा-अर्चना की। अतः आप दीन-हीन हो, पापी हो, पुण्यात्मा हो वैभवशाली हो। भगवान शिव की उपासना कीजिए आपकी आकांक्षाएं शीघ्रपूर्ण हो जाएंगी। शिवोपासन की सर्वथा सरल विधि महाशिवरात्रि व्रत का पालन है कहते हैं।

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपाप प्रणाशनम।
आचांडालमनुष्याणां मुक्तिमुति प्रदायकम्।।

संस्कृत भाषा में लिंग का अर्थ होता है चिन्ह और इसी अर्थ में यह शिवलिंग shivling के लिए प्रयुक्त होता है। शिवलिंग shivling का अर्थ है शिव का परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित चिह्न है।

त्रिगुण की जो अव्यक्तावस्था है, जिसके त्रिगुण उत्पन्न हुआ है, उसी में लीन हो जाता है, सारे संसार के उस उपादान कारण को, जो अनादि और अनन्त है, उसे लिंग कहते हैं। इसी से यह संपूर्ण संसार उत्पन्न होता है। इस प्रकार आधारसहित लिंग जगत का कारण है, माँ उमा, महेश्वर स्वरूप है। भगवान शिव स्वयं ज्योतिलिंग स्वरूप तमस से परे स्थित है। लिंग और वेदों के समायोग से वे अर्धनारीश्वर होते हैं।

भिन्न-भिन्न पदार्थो के बने शिवलिंग shivling –
» मिश्री से बनाये हुए शिवलिंग की पूजा से रोग आदि से छुटकारा मिलता है।
» तीनों का आटा समान भाग में गूंथ कर जो शिवलिंग पूजा जाता है, (गेहूं, चावल, जौ, आटा लें) इससे जातक को संतान, लक्ष्मी और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
» किसी से प्रेम प्यार बढ़ाने के लिए गुड़ की भेली में शिवलिंग बनाकर उस व्यक्ति का संकल्प और ध्यान करने से विशेष लाभ मिलता हैं
» यदि चीनी की चाशनी को जमा कर शिवलिंग बनाकर पूजा की जाए तो सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
» यदि किसी को वंश-वृद्धि में बाधा आ रही हो तो वह जातक बांस के अंकुर को शिवलिंग के समान काटकर पूजा करे तो लाभ होगा।
» आंवले को पीसकर बनाया गया शिवलिंग मुक्तिप्रदाता होता है। (आंवले के सीजन में 108 दिन लगातार शिवलिंग बनाकर पूजा करें तो मुक्ति पाओगे।)
» स्फटिक तथा अन्य रत्नों के बने शिवलिंगों जातकों की अभीष्ट कामनाएं पूरी करता है।
» शत्रुओं के नाश के लिए लहसुनिया के बने शिवलिंग की पूजा करने से विजय मिलती है।
» पीतल का शिवलिंग निर्धनता निवारक है। बृहस्पतिवार से पूजा शुरु करें।
» चांँदी का शिवलिंग धन-धान्य बढ़ाता है-सोमवार से पूजा शुरु करें।
» सोने से बना शिवलिंग समृद्धि का वर्द्धन करता है।
» यदि स्त्रियां मोती के शिवलिंग का पूजन करें तो भाग्य-वृद्धि होती है।
» यदि जातक कपूर से बने शिवलिंग का पूजन करता है तो उसको भक्ति और मुक्ति दोनों को प्राप्त करता है।
» यदि जिस जातक की पत्रिका में अकाल-मृत्यु का भय हो तो वह दूर्वा को शिवलिंग गुथकर उसकी आराधना करे तो विशेष लाभ होता है।
» गायत्री मंत्र का सवा लाख आहुति का यज्ञ करके उस भस्म से शिवलिंग बनाकर पूजा की जाए तो जातक की अभिलाषा बहुत शीघ्र पूर्ण होती है।
» वशीकरण के लिए सोंठ, मिर्च, पीपल के चूर्ण को सेंधा नमक के साथ गूंथ कर शिवलिंग बनाने पर पूजा करने पर लाभ मिलता है।
» चन्दन और कस्तूरी व गौलोचन के साथ गजमुक्ता को मिलाकर जो शिवलिंग की पूजा करेंगे तो वशीकरण, सम्मोहन आकर्षण के साथ शिव साम्राज्य की भी प्राप्ति होती है।
» यदि किसान जातक गुड़ की पिण्डी (लिंग) बनाकर उसमें गेहूं के दाने चिपका कर पूजा करने से उस को उत्पादन अधिक होगा।
» दही को बांधकर निचोड़ देने के बाद उससे जो शिवलिंग बन जाए उसकी पूजा करने से लक्ष्मी, सुख व काम सुख की प्राप्ति होती है।
» असली पारद से बनें शिवलिंग की शास्त्रों में बहुत ही प्रशंसा की गयी है। इस शिवलिंग को शास्त्रों में ज्योर्तिलिंग से भी बहुत श्रेष्ठ माना गया है। इसका पूजन सर्वकामनाप्रद, समस्त पापों का नाश करता है, यह जातक को जीवन के संपूर्ण सुख एवं मोक्षप्रद शिवस्वरूप प्रदान करता है। पारद शिवलिंग गारन्टी देने वाले से ही लें आजकल लैड के ऊपर पाॅलिश की जाती है। नकली पारद शिवलिंग की पूजा से कोई लाभ नहीं होगा।

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शिव-पूजन के लिए निम्न बातों पर विशेष ध्यान दिया जाए तो पूजा का फल कई गुणा ज्यादा मिलता है।
1. भगवान शिवजी की पूजा में तिल का प्रयोग नहीं होता और चम्पा के फूल भी नहीं चढ़ाया जाता।
2. शिवजी की पूजा में भी दूर्वा, तुलसी-दल चढ़ाया जाता है। इसमें संदेह नहीं किया जाना चाहिए। तुलसी की मंजरियों से पूजा बहुत श्रेष्ठ मानी जाती है।
3. शिवजी की पूजा में बिल्व पत्र प्रधान है और नीलकमल सर्वश्रेष्ठ पुष्प माना गया है। बिल्व-पत्र चढ़ाते समय बिल्व पत्र का चिकना भाग मूर्ति की ओर रखना चाहिए।
4. जितने अधिक बिल्व-पत्रों को चढ़ाया जाए उतना ही उत्तम होता है, खण्डित बिल्व पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए।
5. शिवजी के पूजन के समय करताल नहीं बजाना चाहिए।
6. विशेष शिवजी के पूजन (अनुष्ठान) कर भस्म त्रिपुण्ड और रूद्राक्ष माला जातक के शरीर पर जरूर होनी चाहिये।
7. शिवजी की परिक्रमा में संपूर्ण परक्रिमा नहीं की जाती।
8. चढ़े हुए जल वाली नाली का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। वहीं से परिक्रमा उल्टी की जाती है।

Dukh Nashak Shani Dev सर्व दुःख नाशक शनि देव

Shani Dev

Sarv Dukh Nashak Shani Dev सर्व दुःख नाशक शनि देव

Shani Dev
Sarv Dukh Nashak Shani Dev

समस्त ग्रहों में शनिदेव(shani dev)  ही ऐसे ग्रह हैं, जो अत्यन्त क्रोधी होते हये भी अत्यन्त दयालु कहे गये हैं। इनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं, तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।

पौराणिक कथाओं में शनि(shani dev) को सूर्य-पुत्र, यम का भाई, अपने भक्तों को अभय देने वाला, समस्त विघ्नों को नष्ट करने वाला एवं सम्पूर्ण सिद्धियों का दाता कहा गया है। जबकि ज्योतिष की दृष्टि में शनि एक क्रूर ग्रह है। कहा गया है, कि यह क्रूर ग्रह एक ही पल में राजा को रंक बना देता है।

जब बात आती है शनि दशा या साढेसाती की, तो हमारा भयभीत एवं चिन्तित होना स्वाभाविक होता है। समस्त ग्रहों में शनिदेव ही ऐसे ग्रह हैं, जो अत्यन्त क्रोधी होते हुये भी अत्यन्त दयालु हैं। इनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं, तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।

जब सृष्टि की रचना आरम्भ हुई, तो सृष्टि रचना का कार्यभार ब्रह्मा ने संभाला, विष्णु ने जीवों के पालन एंव उनकी रक्षा का उत्तरदायित्व लिया और भगवान शंकर को आवश्यकता पड़ने पर सृष्टि का संहार एवं दुष्ट जनों के विनाश का कार्य सौंपा गया। अपने भक्तों की रक्षा एवं पतितों को उनके पापों का दण्ड देने के लिये शिवजी ने अपने गणों की उत्पत्ति की।

सूर्य पुत्र यम एवं शनि (shani dev) को भी उनके गणों में सम्मिलित किया गया। शनि अत्यन्त पराक्रमी होने के साथ उद्दण्ड भी थे; तोड़-फोड़, मार-काट एवं विनाशकारी कार्यो में इनकी आरम्भ से ही रूचि थी। यह देखकर शिवजी ने यम को तो मृत्यु का देवता बनाया और शनि को दुष्ट जनों को उनके पापों का दण्ड देने का कार्य सौंपा।

शनि (shani dev) भगवान शंकर के शिष्य, सूर्य के पुत्र तथा यम के भाई हैं। शनि सर्वदा प्रभु भक्तों को अभय दान देते हैं, और उसकी हर प्रकार से रक्षा करते हैं। शनि समस्त सिद्धियों के दाता हैं। साधना, उपासना द्वारा सहज ही प्रसन्न होते हैं, और अपने भक्तों की समस्त कामनाओं को पूरा करते हैं। शनि सभी ग्रहों में महाशक्तिशाली और घातक हैं। कहते हैं कि सांप का काटा और शनि का मारा पानी नहीं मांगता।

जब शनि (shani dev) का प्रभाव पड़ा, तो श्री कृष्ण को द्वारिका में शरण लेनी पड़ी। और भगवान राम को, जिनका राज तिलक होने वाला था, सब कुछ छोड़कर नंगे पांव वन में जाना पडा। शनि के प्रभाव से जब अवतारी पुरूष भी नहीं बच सके, तो भला सामान्य लोगों का शनि के प्रकोप से बच पाना सम्भव कहां है?

ये सभी कथायें एक सीमा तक सत्य हैं, परन्तु इनके आधार पर भ्रमित होना विद्वता नहीं हैं। वस्तुतः शनि ग्रह की व्याख्या ही अधूरी है। शनि का तात्पर्य है ‘जीवन की गति’।

राशिगत शनि का प्रभाव किस प्रकार से पड़ता है? और किस राशि पर यह विचरण करता है, इस का क्या प्रभाव होता है? यह किसी विद्वान ज्योतिषी से ही जाना जा सकता है। शनि (shani dev) पीड़ादायक हो सकता है, लेकिन यदि शनि को अनुकूल बना लिया जाये, तो यह सर्वोच्चता भी प्रदान कर सकता है।

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ब्रह्मवैवर्त पुराण में यह वर्णन मिलता है, कि जब माता-पार्वती के गर्भ से भगवान गणपति ने जन्म लिया, तो नवजात शिशु को आशीर्वाद प्रदान करने के लिये समस्त देवी-देवता ग्रह नक्षत्र, यक्ष-गन्धर्व आदि उपस्थित हुये तथा एक-एक कर सभी ने गणपति को अपने सामर्थ्य अनुसार तेजस्विता प्रदान की।

इस क्रम में माता पार्वती का ध्यान शनि देव (shani dev) पर गया, जो कि एक किनारे चुप-चाप सिर झुकाऐ खडे़ थे। थोड़ी देर तक माता पार्वती इस बात को देखती रहीं, किन्तु समझ में नहीं आया, कि शनिदेव आगे बढ़कर शिशु का मुख देखकर उसे आशीर्वाद क्यों नहीं दे रहें हैं, अतः उन्होंने इसका कारण शनिदेव से ही पूछा-‘क्या आपको खुशी नहीं हो रही है?’

प्रसन्नता नहीं हो रही है? आप क्यों नहीं आगे बढ़कर मेरे पुत्र को आशीर्वाद दे रहे हैं? मेरे पुत्र की तरफ आप क्यों नहीं दृष्टिपात कर रहे हैं? यह सुनकर शनिदेव ने सिर झुकाये हुये अत्यन्त विनम्रता से कहा- ‘मां ! ऐसा करने के लिये आप मुझे न कहें, क्योंकि मैं नहीं चाहता हूं, कि इस कोमल शिशु का अनिष्ट हो।’ यह सुनकर पार्वती को उनकी बात पर भरोसा नहीं हुआ और उन्होनें आज्ञा दी-‘तुम आगे आओ और बालक को देखकर आशीर्वाद दो।’

अत्यन्त विवश होकर शनिदेव (shani dev) ने थोड़ा सा सिर उठाकर बालक की ओर देखा, तो उनकी दृष्टि पड़ते ही उस शिशु का सिर धड़ से अलग हो गया। यह देखकर पार्वती को बहुत कष्ट हुआ और क्रोध भी आया, किन्तु वे शनि को कुछ कह भी नहीं पा रही थीं, क्योंकि आज्ञा उन्होंने स्वयं दी थी। फिर उनके मुंह से निकल गया-‘भगवान शिव ही बचायें शनि की दृष्टि से’।

एक और प्रसंग है, रोहिणी शकट भेदन से सम्बन्धित, जो इस प्रकार है-
ज्योतिषियों ने जब नीलम सी क्रांति वाले शनिदेव को कृतिका नक्षत्र के अन्तिम चरण में देखा, तो वे भयभीत हो गए। रोहिणी शकट भेदन देवताओं के लिये भी दुःखदायी होता है, तथा राक्षस भी इससे भयभीत हो जाते हैं। सभी राजाओं के लिये यह परेशानी का कारण था, राजा दशरथ जो कि महा तेजस्वी व ईश्वर भक्त थे, उनका रथ नक्षत्र मण्डल को भी पार करने की शक्ति रखता था।

बहुत सोच-विचार करने पर भी तब कोई हल न निकला, तो वे अपने अलौकिक अस्त्र-शस्त्र लेकर नक्षत्र मण्डल की ओर चल दिये। वे सूर्य से भी ऊंचे उठकर रोहिणी पृष्ठ की ओर गये। वहां से उन्होंने शनिदेव को कृतिका से रोहिणी में प्रवेश को तत्पर जानकर अलौकिक संहारास्त्र का प्रयोग करने हेतु अपने आपको संयोजित किया।

तब शनिदेव (shani dev) महाराज दशरथ का यह अदम्य साहस देखकर बहुत प्रसन्न हुये और वरदान मांगने को कहा। शनिदेव को प्रसन्न हुये देख महाराज दशरथ ने उनकी स्तुति की और कहा, हे शनिदेव! प्रजा के कल्याण हेतु आप रोहिणी नक्षत्र का भेदन न करें।

शनि देव ने प्रसन्न हो कर तुरंत कहा ‘‘तथास्तु’’ और यह भी कहा कि जो व्यक्ति आप द्वारा सुनाये गये स्तोत्र से मेरी स्तुति करेंगे, उन पर मेरा प्रतिकूल प्रभाव कभी नहीं होगा।

जय शनि देव।। 

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