काल को जीतने का उपाय

काल को जीतने का उपाय देवी पार्वती ने कहा- प्रभु! काल से आकाश का भी नाश होता है। वह भयंकर काल बडा विकराल है। वह स्वर्ग का भी एक मात्र स्वामी है। आपने उसे दग्ध कर दिया था, परंतु अनेक प्रकार के स्त्रोतो द्वारा जब उसने आपकी स्तुति कि तब आप फिर संतुष्ट हो गये और वह काल पुनः अपनी प्रकृति को प्राप्त हुआ- पूर्णतः स्वस्थ हो गया। आपने उससे बातचीत में कहा- ‘‘काल! तुम सर्वत्र विचरोगे, किंतु लोग तुम्हें देख नहीं सकेंगे।’’

आप प्रभु की कृपादृष्टि होने और वर मिलने से वह काल जी उठा तथा उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया। अतः महेश्वर! क्या यहां ऐसा कोई साधन है, जिससे वह काल को नष्ट किया जा सके? यदि हो तो मुझे बताईये; क्योकि आप योगियों में शिरोमणि और स्वतंत्र प्रभु हैं। आप परोपकार के लिये ही शरीर धारण करते हैं।

शिव बोले– देवी! श्रेष्ठ देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, नाग और मनुश्य- किसी के द्वारा भी काल का नाश नहीं किया जा सकता; परंतु जो ध्यान परायण योगी है, वे शरीर धारी होने पर भी सुख पूर्वक काल को नष्ट कर देते हैं। वरारोहे! ये पंचभौतिक शरीर सदा उन भूतों के गुणों से युक्त होता है और उन्हीं में इसका लय होता है। मिट्टी की देह मिट्टी में ही मिल जाती है।

आकाश से वायु उत्पन्न होती है, वायु से तेज तत्व प्रकट होता है, तेज से जल का प्रकाट्य बताया गया है और जल से पृथ्वी का आविर्भाव होता है। पृथ्वी आदि भूत क्रमशः अपने कारण में लीन होते हैं। पृथ्वी के पांच, जल के चार, तेज के तीन और वायु के दो गुण होते हैं। आकाश का एकमात्र शब्द ही गुण है। पृथ्वी आदि में जो गुण बताये गये हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं- शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। जब भूत अपने गुण को त्याग देता है, तब वह नष्ट हो जाता है और जब गुण को ग्रहण करता है, तब उसका प्रादुर्भाव हुआ बताया जाता है।

देवेश्वरी! इस प्रकार तुम पांचो भूतों के यथार्थ स्वरूप को समझो। देवी! इस कारण काल को जीतने की इच्छा वाले योगी को चाहिये की वे प्रतिदिन प्रयत्न पूर्वक अपने-अपने काल में उसके अंशभूत गुणों का चिंतन करे।

योगवेत्ता पुरूष को चाहिये कि सुखद आसन पर बैठकर विशुद्ध श्वास (प्राणायाम) द्वारा योगाम्यास करे। रात में जब सब लोग सो जायें, उस समय दीपक बुझाकर अंधकार में योगधारण करें। तर्जनी अंगुली से दोनो कानों को बंद करके दो घडी तक दबाये रखें। उस अवस्था में अग्निप्रेरित शब्द सुनाई देता है। इससे संध्या के बादका खाया हुआ अन्न क्षण भर में पच जाता है और सम्पूर्ण रोगों तथा ज्वर आदि बहुत से उपद्रवों का शीघ्र नाश कर देता है।

जो साधक प्रतिदिन इसी प्रकार दो घडी तक शब्द गृहण का साक्षात्कार करता है, वह मृत्यु तथा काम को जीतकर इस जगत में स्वछंद विचरता है और सर्वज्ञ एवं समदर्शी होकर सम्पूर्ण सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। जैसे आकाश में वर्षा से युक्त बादल गरजता है, उसी प्रकार उस शब्द को सुनकर योगी तत्काल संसार बंधन से मुक्त हो जाता है।

तदंतर योगियों द्वारा प्रतिदिन चिंतन किया जाता हुआ वह शब्द क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो जाता है। देवी! इस प्रकार मैने तुम्हें शब्द ब्रह्म के चिंतन का क्रम बताया है। जैसे ध्यान चाहने वाला पुरूष पुआलको छोड देता है, उसी तरह मोक्ष की इच्छा वाला योगी सारे बंधनों को त्याग देता है।

इस शब्द-ब्रह्म को पाकर भी जो दूसरी वस्तु की अभिलाषा करते हैं, वे मुक्के से आकाश को मारते और भूख-प्यास की कामना करते हैं। यह शब्द-ब्रह्म ही सुखद, मोक्ष का कारण, बाहर-भीतर के भेद से रहित, अविनाशी और स्मस्त उपाधियों से रहित परब्रह्म हैं। इसे जानकर मनुश्य मुक्त हो जाते हैं। जो लोग कालपाश से मोहित हो शब्दब्रह्म को नहीं जानते, वे पापी और कुबुद्धि मनुश्य मौत के फंदे में फंसे रहते हैं। मनुश्य तभी तक संसार में जन्म लेते हैं, जबतक सबके आश्रयभूत परम तत्व (परब्रह्म परमात्मा) की प्राप्ति नहीं होती।

परमतत्व का ज्ञान हो जाने पर मनुश्य जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है। निद्रा और आलस्य साधना का बहुत बड़ा विध्न है। इस शत्रु को यत्नपूर्वक जीतकर सुखद आसन पर आसीन हो प्रतिदिन शब्दब्रह्म का अभ्यास करना चाहिये। सौ वर्ष की अवस्था वाला वृद्ध पुरूष आजीवन इसका अभ्यास करे तो उसका शरीर रूपी स्तम्भ मृत्यु को जीतने वाला हो जाता है और उसे प्राणवायु की शक्ति को बढ़ाने वाला आरोग्य प्राप्त होता है।

वृद्ध पुरूष में भी शब्द ब्रह्म के अभ्यास से होने वाले लाभ का विश्वास देखा जाता है, फिर तरूण मनुश्य को इस साधना से पूर्ण लाभ हो, इसके लिये तो कहना ही क्या है। यह शब्द ब्रह्म न ओंकार है न मंत्र है, न बीज है, न अक्षर है। यह अनाहत्नाद (बिना आहत् के अथवा बिना बजाये ही प्रकट होने वाला शब्द) है। इसका उच्चारण किये बिना ही चिंतन होता है। यह शब्दब्रह्म परम कल्याणमय है। प्रिय! शुद्ध बुद्धि वाले पुरूष यत्न पूर्वक निरंतर इसका अनुसंधान करते हैं। अतः 9 प्रकार के शब्द बताये गये हैं। जिन्हें प्राणवेत्ता पुरूषों ने लक्षित किया है। मैं उन्हें प्रयत्न करके बता रहा हूँ। उन शब्दों को नाद्सिद्धि भी कहते हैं। वे शब्द क्रमशः इस प्रकार हैं-

घोष, कांस्य (झांझ आदि), शृंग (सिगा आदि), घंटा, वीणां आदि, बांसुरी, दुन्दु भी, शंख, नवां मेघ गर्जन- इन 9 प्रकार के शब्दों को त्याग कर तुंकार का अभ्यास करें। इस प्रकार सदा ही ध्यान करने वाले योगी पुण्य और पापों से लिप्त नहीं होते। देवी! योगाभ्यास के द्वारा सुनने का प्रयत्न करने पर भी जब योगी उन शब्दों को नहीं सुनता और अभ्यास करते-करते मरणासन्न हो जाता है, तब भी वह दिन-रात उस अभ्यास में ही लगा रहे। ऐसा करने से सात दिनों में वह शब्द प्रकट होता है, जो मृत्यु को जीतने वाला है। देवी! वह शब्द 9 प्रकार का है। उसका मैं यथार्थ रूप से वर्णन करता हूँ।

पहले तो घोषात्मक नाद् प्रकट होता है, जो आत्म शुद्धि का उत्कृष्ठ साधन है। वह उत्तम नाद् सब रोगों को हर लेने वाला तथा मन को वशीभूत करके अपनी और खींचने वाला है।

दूसरा कांस्य-नाद है, जो प्राणियों की गति को स्तम्भित् कर देता है। वह विष, भूत और ग्रह आदि सबको बांधता है- इसमें संशय नहीं है।

तीसरा श्रृग नाद् है, जो अभिचार से सम्बन्ध रखने वाला है। उसका शत्रु के उच्चाटन और मारण में नियोग एवं प्रयोग होता है।

चैथा घंटा नाद् है, जिसका साक्षात् परमेश्वर शिव उच्चारण करते हैं। वह नाद् सम्पूर्ण देवताओं को आकर्षित कर लेता है, फिर भूतल के मनुष्यों की तो बात ही क्या है। यक्षों और गंघर्वो की कन्यायें उस नाद् से आकर्षित हो योगी को उसकी इच्छा के अनुसार महासिद्धि प्रदान करती हैं तथा उसकी अन्य कामनायें भी पूर्ण करती हैं।

पांचवा नाद् वींणा है, जिसे योगी पुरूष ही सदा सुनते हैं। देवी! उस वींणा नाद् से दूर दर्शन की शक्ति प्राप्त होती है। वंशी नाद् का ध्यान करने वाले योगी को सम्पूर्ण तत्व प्राप्त हो जाता है।

दुंदुभी नाद् का चिंतन करने वाला साधक जरा और मृत्यु के कष्ट से छूट जाता है। देवेश्वरी्! शंख नाद् का अनुसंधान होने पर इच्छा अनुसार रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। मेघ नाद् के चिंतन से योगी को कभी विपत्ति का सामना नहीं करना पड़ता। वरानने! जो प्रतिदिन एकाग्र चित्त से ब्रह्म रूपी तुंकार का ध्यान करता है, उसके लिये कुछ भी असाध्य नहीं होता।

उसे मनोवांछित सिद्धि प्राप्त हो जाती है। वह सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और इच्छानुसार रूपधारी होकर सर्वत्र विचरण करता है, कभी विकारों के वशीभूत नहीं होता। वह साक्षात् शिव ही है- इसमें संशय नहीं है। परमेश्वरी! इस प्रकार मैने तुम्हारे समक्ष शब्दब्रह्म के नवधा स्वरूप का पूर्णतया वर्णन किया है।

 

प्रचण्ड शक्ति है बगलामुखी

प्रचण्ड शक्ति है बगलामुखी  साधकों के लिये समस्त साधनाओं की कुंजी है ‘तंत्र’! सब सम्प्रदायों की सब प्रकार की साधना का गूढ़ रहस्य तंत्रशास्त्र में निहित है। तंत्र केवल शक्ति उपासना का ही प्रधान अवलम्बन नहीं है, वह सभी साधनाओं का एकमात्र आश्रय है इसमें स्थूलतम साधन प्रणाली से लेकर अति गुह्य मंत्रशास्त्र और अति गुह्यतर योग साधनादि के समस्त क्रिया कौशलों का सविस्तार वर्णन है। तंत्रान्तर्गत दार्शनिक तत्त्व भी कम सूक्ष्म नहीं हैं। हाँ, ये प्रचलित दर्शन शास्त्रों के समान जटिल भाष्य, टीका और विविध मतवाद द्वारा भायाक्रान्त या दुर्बोध्य नहीं है।

जिस प्रकार मनुश्य की प्रकृति सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भेद से तीन प्रकार की होती है, उसी प्रकार तंत्र शास्त्र भी सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भेद से तीन प्रकार का होता है, तथा इसकी साधना प्रणाली भी उसी प्रकार गुणभेद से तीन प्रकार की व्याख्यात होती है। जिसकी जैसी प्रकृति व रुचि हो, तदनुसार ही साधन पथ को ग्रहण कर साधन करने से वह जीवन को कृतकृत्य कर सकता है। शक्ति जिस प्रकार देव स्वभाव वा दैवीगुण युक्त जीवों की जननी रूपा हैं, उसी प्रकार वह असुर गुण युक्त अथवा असुरों की भी जननी है। इसी कारण असुर और देवता दोनों ही उनकी उपासना में प्रवृत्त होते हैं तथा दोनों ही अपने-अपने स्वभावानुसार उपासना की प्रणाली का अवलम्बन करते हैं, एवं उनका साधन फल भी साधना की प्रकृति के अनुसार ही होता है। इसी कारण शास्त्र दोनों प्रकार की साधन प्रणाली बतलाते हैं। यहां पाठकों को एक ऐसी प्रचण्ड शक्ति बगलामुखी की सरल और शास्त्रोक्त साधना पद्धति का उल्लेख किया जा रहा है जिस देवी का स्थान शक्ति के दस महाविद्या स्वरूपों में प्रमुख है, साधक शत्रु बाधा से मुक्ति चाहता हो अथवा कलह नाश तिरस्कार से छुटकारा या भय-मुक्ति चाहता हो तो इसके लिये बगलामुखी देवी की साधना से तीव्र कोई साधना नहीं है।

आज हम यह विशेष तांत्रोक्त सरल साधना पद्धति साधकों के लिये स्पष्ट कर रहे हैं, जो अत्यंत प्रचण्ड तथा गुह्यतम साधना पद्धति है। गुरू भक्ति में पूर्ण समर्पित साधक तथा गुरू पूजन करने वाले साधकों के लिए है, इस तीव्र साधना का आधार गुरू भक्ति ही है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को ऐश्वर्यशाली बनकर आनन्द से जीना चाहता है, और यह आनन्द, ऐश्वर्य प्राप्त करनें के लिये निरन्तर इच्छा करता है, तथा प्रयत्न भी करता रहता है, परंतु क्या सब के साथ ऐसा ही होता है? इसका यही उत्तर मिलेगा, कि ऐसा संभव नहीं हो पाता, वास्तविक जीवन में तो कष्ट आते हैं, बार-बार बाधायें उपस्थित होती हैं। जीवन में चार बड़े भयंकर विष हैं, जिनके रहते जीवन में आनन्द आ ही नहीं सकता, ये चार विष हैं-

  1. शत्रु बाधा
  2. कलह
  3. तिरस्कार
  4. भय

वास्तव में शत्रु तो चैबीस घंटे आप पर सवार ही रहता है, मित्र से तो आप कभी-कभी मिलते हैं। यदि आप का भी कोई शत्रु बन गया है तो आप का चिन्तन हर समय उसकी ओर ही रहेगा। आपका विचार प्रवाह पहले की तरह न रहकर बदल जायेगा। आप हर समय आशंकित रहेंगे और सोचने लगेंगे कि ऐसा जीवन क्या जीवन है? आपको कोई पुरस्कृत न करे, तो कोई अन्तर नहीं पड़ता, लेकिन यदि कोई आपका तिरस्कार करे, कोई आपको तुच्छ समझे, तो यह मरण समान ही है।

कलह मानव जीवन की सभी उपलब्धियों, सभी कलाओं का नाश कर देती है। कलह शारीरिक क्षति तो पहुंचाती ही है, मानसिक दृष्टि से भी मनुश्य को दुर्बल कर देती है। वह कुछ रचनात्मक कार्य करना चाहता है, लेकिन यदि नित्य प्रति कलह का सामना करना पड़े, चाहे वह कलह पारिवारिक हो, अथवा बाहर के किसी शत्रु के द्वारा उत्पन्न की गयी हो। जीवन का आनन्द तत्व तो समाप्त हो ही जाता है।

चैथी महत्वपूर्ण विपरीत स्थिति भय है, यह भय शत्रु से भी हो सकता है, अपने अधिकारी से भी हो सकता है और अपने व्यापारिक प्रतिस्पर्धी से भी हो सकता है। भय के तो सैकड़ों प्रकार हैं, इसमें से एक भी प्रकार का भय यदि मनुश्य को है तो वह सामान्य रूप से जीवनयापन नहीं कर सकता। यही चारों स्थितियां ही विष हैं, और विष को अपने जीवन से दूर करने का, नष्ट करने का एक उपाय है, वह है- गुरू की भक्ति से गुरू कृपा, प्राप्त कर साधना में सिद्धि प्राप्त कर लेना।

बगलामुखी साधना प्रयोगः-

देवी बगलामुखी की सिद्धि मंगलवार की चतुर्दशी से आरम्भ कर 40 दिन में सवा लाख मंत्र जप द्वारा की जाती है। विस्तृत साधना के तीन खण्ड प्रातः काल, मध्याह्न काल, तथा सायंकाल की साधना का विशेष क्रम है, और इस तांत्रोक्त साधना को इसी रूप में सम्पन्न करने से पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। परंतु बगलामुखी साधना पर्वकाल (होली, दीपावली, महाशिवरात्रि) में केवल एक रात्रि में ही सिद्ध की जा सकती है। इसके अतिरिक्त बगलामुखी जयंती पर्व भी बगलामुखी साधना के लिये उपयुक्त है। इस वर्ष 26 अप्रैल 2015 के दिन श्री बगलामुखी जयंती पर्व है, इस दिन साधक यह साधना सम्पन्न कर सकते हैं।

साधना के लिये जिस सामग्री की आवश्यकता होती है वह इस प्रकार है- एक लकडी की चैकी तथा उस पर बिछाने के लिये पीला वस्त्र, पीले पुष्प, पीले रंगे हुये चावल, कुंकुम, पीली मौली, 21 साबुत सुपारी, हल्दी का चूर्ण, पीले रंग की नैवेद्य (मिठाई), हल्दी की 108 दाने की प्राण प्रतिष्ठित माला, तथा स्वर्णपत्र पर बने अथवा स्वर्ण आलेपित प्राण प्रतिष्ठित बगलामुखी महायंत्र, शुद्ध मुहूर्त में निर्मित स्वर्ण के कवच में रक्षा कवच, तथा बगलामुखी देवी का रंगीन चित्र।

इस साधना में बगलामुखी देवी का चित्र देखे तो इस देवी का स्वरूप दस महाविद्याओं में सबसे निराला लगता है। यह तीन नेत्र वाली देवी अपने एक हाथ में मुग्दर और दूसरे में शत्रु की जीभ लिये तीव्रतम प्रचण्ड रूप धारण किये तीनों लोकों को स्तम्भित कर देने वाली शक्ति है। देवी के इस स्वरूप में सोलह शक्तियाँ समाहित हैं-

  1. मंगला
  2. स्तम्भिनी
  3. जृम्भिणी
  4. मोहिनी
  5. वश्या
  6. वला
  7. बलका
  8. भूधरा
  9. कल्मषा
  10. धात्री
  11. कलना
  12. कलाकर्षिणी
  13. भ्राम्रिका
  14. मन्दगमा
  15. भोगस्था
  16. भाविका

यह प्रचण्ड साधना तीव्रतम साधना की श्रेणी में आती है, अतः किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु ही गुरू आज्ञा से की जानी चाहिए, अन्यथा इससे भयंकर दोष पैदा होकर शरीर का क्षय करने लग जाते हैं।

ऊपर लिखे जो चार दोष हैं, उनके निवारण हेतु विशेष संकल्प लेकर यह प्रयोग आरम्भ करना चाहिए। जब तक इन चार में से कोई एक कष्ट न हो तब तक गुरू भी इस साधना की आज्ञा नहीं देते-

  1. भयंकर शत्रु बाधा
  2. दीर्घकालिक कलह
  3. अति तिरस्कार
  4. प्राण हरने वाला भय।

कई सामान्य साधक जिन्हें पूजन विधि का पूर्ण ज्ञान नहीं होता, उनसे साधना में गलतियाँ हो सकती हैं, अतः शास्त्रों में विधान है, कि यदि पहले गुरू आज्ञा और गुरू पूजन कर के प्राणायाम साधन तथा गायत्री पाठ करके यह साधना प्रारम्भ की जाय, तो कोई साधनात्मक दोष नहीं रहता। साधना की आज्ञा गुरू से लेकर शुभ मुहूर्त अथवा पर्वकाल (दीपावली की रात्रि) में स्नानादि कर शुद्ध पीले वस्त्र धारण कर पीले ऊनी आसन पर बैठकर प्रथम हाथ में थोडे पीले रंगे हुये चावल तथा पवित्र जल लेकर संकल्प लिया जाता है-

संकल्प मंत्र-

ऊँ अस्य श्रीबगलामुखी महामंत्रस्य नारद ऋषिः वृहतीश्छन्दः श्रीबगलामुखी देवता ह्लीं बीजं स्वाहा शक्तिः मम् सकलकामनासिद्धयर्थे जपे विनियोगः

अब सामने एक लकडी की चैकी पर पीला वस्त्र बिछा कर उस पर बगलामुखी देवी का रंगीन चित्र स्थापित करें (इस चित्र को पहले ही फ्रेम करवा लें) फिर पीतल का दीपक शुद्ध घी से प्रज्जवलित करें। पीले पुष्प, पीले रंगे हुये चावल, साबुत सुपारी तथा एक पात्र में 250 ग्रा. हल्दी चूर्ण, हल्दी की माला तथा अन्य साधना सामग्री रखकर अर्धमुद्रित नेत्रों से देवी का ध्यान तथा मानसिक आहवाहन् करें-

ध्यान मंत्र-

दुष्ट स्तम्भन मुग्र विध्न शमनं दारिद्रîविच्छेदनं भूमद्धीशमनं चलन्मृगद्दशां चेतः समाकर्षणम्। सौभाग्यैक निकेतन मम दृशोः कारूण्यपूर्णेक्षणो शत्रो र्मारण माविरस्तु पुरतो मातस्त्वदीयं वपुः।।

करूणापूर्ण नेत्रों वाली माता बगलामुखी मेरे समक्ष आपका वह स्वरूप प्रगट हो जो शत्रुओं की शत्रुता को नष्ट तथा दुष्टों का स्तम्भन, भयंकर विध्नों का निवारण, दरिद्रता का विनाश, राजभय का शमन करने वाला है, मेरे नेत्रों के लिए सौभाग्य का एक मात्र निकेतन है, तुम्हारे चरणों में सादर प्रणाम !!

अब स्वर्णपत्र पर बने अथवा स्वर्ण आलेपित प्राण प्रतिष्ठित बगलामुखी महायंत्र तथा शुद्ध मुहूर्त में निर्मित स्वर्ण के कवच में रक्षा कवच को चैकी पर देवी के चित्र के सामने रखकर देवी के चित्र के साथ पूजन करें- पूजन में पीले पुष्प, पीले कुंकुम, हल्दी तथा मौली समर्पित करते हुये पूजा सम्पन्न करें, देवी के समक्ष पीले रंग की नैवेद्य (मिठाई) अर्पित करें। अब देवी की सोलह शक्तियों का पूजन प्रारम्भ करें, इस हेतु निम्न एक-एक मंत्र पढ़ते हुए सोलह बगलामुखी शक्तियों की स्थापना करें (सोलह स्थानो पर मंत्र पढते हुये एक-एक मुट्ठी हल्दी का चूर्ण रखें)।

ऊँ मंगलायै नमः

ऊँ स्तम्भिन्यै नमः

ऊँ जृम्भिण्यै नमः

ऊँ मोहिन्यै नमः

ऊँ वश्यायै नमः

ऊँ वलायै नमः

ऊँ बलकायै नमः

ऊँ भूधरायै नमः

ऊँ कल्मषायै नमः

ऊँ धात्रयै नमः

ऊँ कलनायै नमः

ऊँ कालाकर्षिण्यै नमः

ऊँ भ्रामिकायै नमः

ऊँ मन्दगमनायै नमः

ऊँ भोगस्थायै नमः

ऊँ भाविकायै नमः

अब प्रत्येक देवी शक्ति के आगे एक साबुत सुपारी रखें और पीले चावल तथा पीले पुष्प अर्पित करें। और फिर हल्दी की माला से जप आरम्भ कर सूर्योदय तक मंत्र का जप करते रहें। यदि जप के बीच में लघुशंका के लिये उठना पडे तब देवी को विलम्ब की प्रार्थना करके उठें और दोबारा देवी का ध्यान करते हुये जप आरम्भ कर सूर्योदय तक जप करें दीपक में घी की आवश्यकता हो तो चम्मच से डालते रहें।

जप मंत्र-

ऊँ हृीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जीह्नां कील्य बुद्विं विनाश्य हृीं ऊँ स्वाहाः।

ओम र्हिं बाग्लमुखी सरवदुस्ताना वाचम मुखाम पदम स्तंभयाए जीव्हां कीलयाए बुधीं विनाश्याए र्हिं ओम स्वाहा 

जप पूर्ण होने पर जप समर्पण मंत्र का पाठ हाथ में माला लेकर हाथ जोडकर प्रार्थना करते हुये करें-

जप समर्पण मंत्र-

गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्। सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात् सुरेश्वर।।

अर्थात् हे ‘देवी ! सुरेश्वरी !! आप गोपनीय से भी अति गोपनीय वस्तु की गोप्ता (संरक्षक) हैं, हमारे द्वारा किये गये इस जप को ग्रहण करें और आपकी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो। इस के पश्चात् देवी को मानसिक विदाई देते हुये नमस्कार करें और देवी को जो नवैदय का भोग लगाया था उस मिष्ठान का परिवार सहित प्रसाद ग्रहण करें। प्रज्जवलित दीपक शांत होने पर स्वर्ण आलेपित प्राण प्रतिष्ठित बगलामुखी महायंत्र तथा देवी बगलामुखी के रंगीन चित्र को छोडकर शेष सामग्री हटा लें। शुद्ध मुहूर्त में निर्मित स्वर्ण के कवच में रक्षा कवच को देवी के चित्र के सामने से हटाकर अपने गले में पीले धागे के साथ श्रद्धापूर्वक धारण करें और हमेशा धारण किये रहें। (यह कवच गुरूजी द्वारा विशेष रूप से शुद्ध मुहर्त में निर्माण किया गया है।) इस कवच के प्रभाव से शत्रु निर्बल तथा स्वयं के पराक्रम में वृद्धि होती है। शेष सभी सामग्री फूल, चावल, हल्दी व सुपारी इत्यादि जल में विसर्जित कर दें। देवी के चित्र को तथा बगलामुखी यंत्र को अपने पूजा स्थान में ही स्थापित कर दें।

नोट- इस विशेष साधना को करने से पहले गुरूजी से आज्ञा लेकर साधना सामग्री का कार्यालय से प्राप्त कर सकते हैं।

 

शनिदेव की क्रूरता क्यों

शनिदेव की क्रूरता क्यों शनि भगवान् सूर्य के पुत्र हैं। छाया (स्वर्णा) इनकी माता हैं शास्त्रों के अनुसार ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। यह कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में इस प्रकार आयी है-

बचपन से ही शनि देवता भगवान् कृष्ण के अनुराग में निमग्न रहते थे। व्यस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। पत्नी सती-साध्वी और तेजस्विनी थी। एक रात ऋतु-स्नानकर पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा से वह पति के पास पहुँची। पति ध्यान में बैठे थे। बाह्य ज्ञान न था। पत्नी प्रतीक्षा कर थक गयी। ऋतुकाल निष्फल हो चुका था। इस उपेक्षा से क्रुद्ध होकर सती ने शाप दे दिया कि जिसे तुम देख लोगे वह नष्ट हो जायेगा। ध्यान टूटने पर शनि देवता ने पत्नी को मनाया। पत्नी को स्वयं पश्चाताप हो रहा था, किंतु शाप के प्रतीकार की शक्ति उसमें न थी। तब से शनि देवता सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वे किसी का अहित नहीं चाहते थे। उनकी दृष्टि पड़ते कोई भी नष्ट हो सकता था। शनि ग्रह यदि कहीं रोहिणी-शकट भेदन कर दें तो पृथ्वी पर बारह वर्ष घोर दुर्भिक्ष पड़ जाये और प्राणियों का बचना ही कठिन हो जाये।

ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से शनिग्रह जब रोहिणी का भेदन कर बढ़ जाता है, तब यह योग आता है।

यह योग महाराज दशरथ के समय में आने वाला था। इस योग के आने पर पानी और अन्न के बिना उनकी प्रजा तड़प-तड़प कर मर जायेगा, यह दारुण दृश्य महाराज के सामने आ गया। प्रजा को इस कष्ट से बचाने के लिये रथ पर बैठकर महाराज दशरथ नक्षत्र मण्डल में जा पहुँचे। पहले तो महाराज ने शनि देवता को प्रतिदिन की भाँति प्रणाम किया और बाद में क्षत्रिय-धर्म के अनुसार उन पर संहारस्त्र का संधान किया। शनि देवता महाराज की राजोचित कर्तव्य-निष्ठा से प्रसन्न हो गये और वरदान माँगने को कहा। महाराज ने वर में माँगा कि जब तक सूर्य, नक्षत्र आदि विद्यमान हैं, आप कभी शकट-भेदन न करें। शनि देवता ने यह वरदान दे दिया। शनि देव की कृपा देखकर महाराज को रोमांच हो आया। उन्होंने रथ में धनुष डाल दिया और उनकी पूजा की। उसके बाद सरस्वती और गणेश का ध्यान कर स्तोत्र की रचना की।

शनि स्तोत्र-

नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।

नमः कालाग्रिरूपाय कृतान्ताय च वै नमः।।

नमो निर्मासदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते।।

नमो कोटरक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः।

नमो धोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तुते ।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च।।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः।

त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः।।

प्रसादं करू मे देव वराहोहमुपागतः।

एवं स्तुतस्तदा सौरिग्र्रहराजो महाबलः।।

यह शनि स्तोत्र अचूक प्रभावकारी है, प्रतिदिन इसका एक पाठ करना चाहिये।

यदि प्रतिदिन न कर सकें तो प्रत्येक शनिवार को अवश्य ही स्तोत्र पाठ करें।

इस स्तुति से शनि देवता संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने एक वरदान और माँगने को कहा। महाराज ने दूसरे वरदान मे माँगा- ‘भगवन्! देवता, मानव, पशु-पक्षी किसी को आप कष्ट न दें।’ शनि देवता ने एक शर्त के साथ यह वरदान भी दे दिया। शर्त यह थी कि यदि किसी की कुण्डली या गोचर में मृत्यु-स्थान, जन्मस्थान अथवा चतुर्थ स्थान में मैं रहूँ, तब मैं उसे मृत्यु का कष्ट दे सकता हूँ, किंतु यदि वह मेरी प्रतिमा की पूजा कर तुम्हारे द्वारा किये गये स्तोत्र का पाठ करेगा तो उसे मैं कभी पीड़ा नहीं दूंगा। अपितु उसकी रक्षा करूँगा। शनि के अधिदेवता प्रजापति और प्रत्याधिदेवता यम हैं। शनि ग्रह एक-एक राशि में तीस-तीस महीने रहते हैं और तीस ही वर्ष में सब राशियों को पार करते हैं।

(श्रीमद्भ० 5।22।14)

वर्ण- शनि देवता का वर्ण कृष्ण है।

(मत्स्यपु० 14।6)

वाहन- इनका वाहन गीध तथा रथ लोहे का बना हुआ है।

(मत्स्यपु० 127।8)

आयुध- धनुष-बाण और त्रिशूल इनके आयुध है। इनका स्वरूप इस प्रकार है-

इन्द्रनीलद्युतिः शूली वरदो गृध्रवाहनः।

बाणबाणासनधरः कर्तव्योऽर्कसुतस्तथा।।

(मस्त्यपु० 14।6)

‘शनैश्चर की शरीर-कान्ति इन्द्रनीलमणि की-सी है। वे गीध पर सवार होते हैं और हाथ में धनुष, बाण, त्रिशूल और वर मुद्रा धारण किये रहते हैं।’

वैदिक तथा तंत्रिक मंत्रों के रूप में हमें अनेक ग्रंथों में उपलब्ध हैं।

आज विज्ञान का युग है। पर इस युग में भी मंत्र-तंत्र में कोई वास्तविक शक्ति है या नहीं- यह एक पहेली बनी हुई है। यह तो र्निर्ववाद है कि प्राचीनकाल में मानवीय विश्वासों और मान्यताओं में मंत्र- तंत्रों का बहुत बड़ा स्थान था और आज भी है। अन्य दृष्टियों से विकसित और परिष्कृत रूचि के लोग मंत्र तंत्रों के चमत्कारिक गुण और प्रभाव में आज भी अगाध विश्‍वास रखते हैं। यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि तांत्रिक सिद्धियाँ और सिद्ध पुरूषों के वर्णनातीत प्रभाव हमें उलझन में डाल देते हैं और आज जब मनुश्य में स्थित छठी इंद्रिय की और इंद्रियातीत शक्तियों की खोजे हो रही है, हमें एक नितांत मानवीय विश्वास का पुर्नमूल्यांकन करने की सच्ची प्रेरणा मिलती दिखाई पड़ती है। परामनोविज्ञान की खोजों ने तो भौतिकवादी देश तक को इतना प्रभावित किया है कि रूस जैसे देश में भी इस पर शोधकार्य प्रारंभ हो गया। यह तो मानी हुई बात है कि किसी भी समस्या का दो टूक समाधान नहीं है और ऐसी जगह तो हमारे वैज्ञानिक साधन भी प्रायः समाप्त हो जाते हैं। पर आज ऐसे लोगों को भी जो इंद्रियातीत किसी शक्ति या रहस्य में विश्वास नहीं करते। आये दिन ऐसे अनुभव होते हैं, जिनसे उनकी सारी मान्यता धूल में मिल जाती है।

‘तंत्र’ का अर्थ वह शास्त्र है, जिसके द्वारा ज्ञान का विस्तार किया जाता है- तन्यते विस्तार्यते ज्ञानमनेन इति तंत्रम्। इसके दो विशिष्ट अंग है। संयम करना, नियंत्रण करना या विस्तृत शक्ति को केंद्रिकृत करना। सूर्य की किरणें जगत में व्याप्त हैं। इन विस्तीर्ण किरणों को केंद्रियभूत करने पर शक्ति संचारित होती है। जिससे अलौकिक कार्य किये जा सकते हैं। रशिमयों में अत्यंत सूक्ष्म शक्तियाँ हैं। जिन्हें एकत्रित कर विज्ञान के विधानानुसार विकीर्ण कर अनेक भीषण कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं।

अब मंत्रों को लीजिये- ‘मंत्र’ शब्द मन धातु के उत्तर ‘त्रै, धातु एवं ङ् प्रत्यय के योग से निष्पन्न होता है। (मनत्रै=मंत्र) ’ मननात् त्रायते यस्मात् तस्मान्मन्त्र मंत्र उदाहृतः।’ जिसके मनन द्वारा, चिंतन द्वारा, ध्यान द्वारा, दुःख कष्ट की निवृति होकर परमानंद की प्राप्ति होती है। उसी का नाम मंत्र है। सामान्यतया मंत्र के तीन प्रकार हैं- वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक। तीनों प्रकार के मंत्रों में तीन तत्त्व निहित रहते हैं। मंत्र के साथ प्रणव अथवा व्याहृतियों का चोली दामन का संबध है। इन से हमें आध्यात्मिक लाभ क्या हैं आइये इस पर एक दृष्टि डालें।

प्रणव अथवा व्याहृति- परम तत्त्व के निकट आना।

बीज- परम तत्त्व का दर्शन करना और उसे उपलब्ध करना।

देवता- लौटते समय अपने सभी तत्वों को तदभव से परिभावित करना। एकाक्षर मंत्र में भी ये तीनों तत्त्व पाये जाते हैं। एकाक्षर प्रणव या ऊँकार सर्वव्यापी भगवतत्त्व को प्रकाश करता है। इसमें शक्तिमान और शक्तितत्त्व के सब रहस्य विद्यमान हैं। इसके अकार, उकार, मकार- शक्तितत्त्व के और अर्द्धमात्रा ‘शांतं शिवमद्वैतम्’ के द्योतक हैं।

 

उपनिषद् में शक्ति का रहस्य

उपनिषद् में शक्ति का रहस्य विश्व में जो कुछ है, वह व्यापक ब्रह्म है। ‘तैत्तिरीयोपनिषद्’’ ने ब्रह्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि जिसमें सारा विश्व पैदा होता है, पैदा होकर जीता है और जीकर जिसमें लय हो जाता है, उसी का नाम ब्रह्म है। इस बात को समझाते हुए गुरूदेव ने पहले शिष्य को यह बताया कि ‘अन्न ब्रह्मेति व्यजानत’ अर्थात् अन्न ब्रह्म है। देह अन्न से पैदा हुआ, अन्न से जीता है और अन्न में लय होता है। अतएव अन्न को ब्रह्म मानो। शिष्य को इस व्याख्या से संतोष न हुआ, तब गुरूजी ने ‘प्राणं ब्रह्मोति व्यजानत’ कहा अर्थात प्राण ब्रह्म है। देह प्राण से पैदा हुआ, प्राण से जीता और प्राण में लय होता है। शिष्य को इस व्याख्या से भी सन्तोष न हुआ। फिर गुरूजी ने ‘मन ब्रह्मेति व्यजानत’ बताया अर्थात मन ब्रह्म है। शिष्य को इस व्याख्या से भी सन्तोष न हुआ। तब गुरूजी ने ‘विज्ञान’ को और पीछे ‘आन्नद’ को ब्रह्म बताया, लेकिन जब इतने सारे ब्रह्म बताए गये, तब हम किसको सचमुच ब्रह्म मानें? ब्रह्म की उक्त व्याख्याओं से हमें सन्तोष नहीं होता।

‘माण्डूक्योपनिषद्’ ने आत्मा की चार अवस्थायें बताई हैं-

  1. जाग्रत
  2. स्वप्न
  3. सुशुप्ति
  4. तुरीय।

जाग्रत् और स्वप्न का अनुभव सबको होता है। सुषुप्ति अर्थात् गाढ़ निद्रा। तुरीय का अनुभव सबको नहीं होता। अतः उसे आत्मा की चैथी अवस्था कह कर उसका सारा वर्णन नकार में ही किया है। जब आत्मा की यह हालत है, तब ब्रह्म क्या वस्तु है, कैसे समझ में आये? आदि शंकराचार्य अपने शिष्य के साथ जंगल में जा रहे थे। रास्ते में एक पागल हाथी आता दिखाई पड़ा। सबलोग इधर-उधर हो गये। हाथी के निकल जाने के बाद एक शिष्य ने गुरू से पूछा कि आप तो ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ बताते हैं। अतएव हम और हाथी सब ब्रह्म ही हैं। फिर हम सब हाथी को देखकर भाग क्यों गये? शंकराचार्यजी ने कहा कि ‘‘हाथी का आना, हमारा देखना और छिपना सभी ब्रह्म था।’’

इतना सोचने-विचारने के बाद जो कुछ है, यह मानने में नहीं आता। यदि कोई कहे कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’, तो मानना पड़ेगा कि ‘मैं’ और ‘ब्रह्म’ अलग-अलग वस्तु हैं, क्यो कि वस्तु और वस्तु का मालिक दोनों एक नहीं होते। सभी तरह से ब्रह्म का विचार करने पर यही ज्ञात होता है कि जो कुछ है, वह अकेला ब्रह्म नहीं है, अपितु साथ में कुछ और भी है। वह क्या है, यह जानना चाहिये।

जिस द्रव में से नवीन पदार्थ प्राप्त हो या पैदा हुआ पदार्थ फिर द्रव बनकर अणु-अणु में मिल जाये, उस द्रव का नाम ‘तत्त्व’ है। उदाहरण के लिये पृथ्वी में एक ही बीज को जल, वायु और अग्नि मिलने से वह अवकाश में प्रस्फुटित होकर पेड़ बनता है और पेड़ में से रूई और कपड़ा भी बनता है। वह कपड़ा यदि जल गया, तो कहा जायेगा कि बीज ने जो रूपक धारण किया था, वह अग्नि में जलकर तत्त्व, तत्त्व में मिल गया। तत्त्व अर्थात् भू, जल अग्नि, वायु और आकाश। प्रत्येक तत्व में दूसरे चार तत्वो की कुछ-न-कुछ मिलावट विद्यमान है। तत्त्व अणु में से पैदा होते हैं। अणु में भयंकर शक्ति है।

अणु-बम कितनी हानि कर सकता है, उससे लोग अपरिचित नहीं हैं। अणु में छिपी हुई भयंकर शक्ति क्या है, उसे जानना चाहिए।

विश्व अनन्त है और अनंत होने से प्रत्येक बिन्दु मध्य बिन्दु है। जो चीज शान्त है, उसका मध्य बिन्दु एक ही होगा। यदि अनन्त का बिन्दु एक ही माना जाये, तो अनंत शान्त हो जायगा। अतएव अनंत का प्रत्येक बिन्दु चिद्-बिन्दु है। उसमें जीवन्त चिद्-शक्ति है। उस प्रत्येक बिन्दु या अणु में भयंकर शक्ति है। तो फिर उस शक्ति को ही विश्व की आदि-शक्ति क्यों न माना जाये ?

कठोपनिषद्’’ में यम ने नचिकेता को बताया कि सूर्य विश्व की आँखें हैं, लेकिन आँख में रोग होने से सूर्य में रोग नहीं होता। इसी तरह प्राणी मात्र की अन्तरात्मा एक होते हुए भी व्यक्तिगत दुःख से आत्मा कुछ नहीं बिगड़ता अर्थात आत्मा को कुछ भी कष्ट नहीं होता। यम ने ब्रह्म का भाव न बताकर सूर्य में विद्यमान शक्ति का भाव बताया। सूर्य की गुरूत्वाकर्षण-शक्ति से नवग्रह नियमानुसार सूर्य के चारों ओर बराबर घुम रहें हैं। तब सोच सकते हैं कि सूर्य में कितनी शक्ति है। सूर्य में जो शक्ति हैं, वह अणु में भी है क्योंकि सूर्य अणु से बनता है।

ईशावास्योपनिषद्’ कहता है कि जो आदमी केवल विद्या की उपासना करता है, वह अंधकार में प्रवेश करता है और जो केवल अविद्या की उपासना करता है, वह भी अंधकार में पड़ता है। जैसे केवल विद्या या अविद्या को मानने से अपना काम नहीं चलता, वैसे ही न अकेले ब्रह्म को मानने से हमारा काम चलेगा, न अकेली शक्तिो मानने से।

यह सब सोचने पर मानना पड़ेगा कि विश्व में दो चीजें होनी चाहिये-एक व्यापक ब्रह्म और दुसरी शक्ति। व्यापक ब्रह्म शिव है और बाकी जो कुछ है, वह शक्ति है। उस शक्ति को कुछ भी नाम दीजिये। चाहे चिद्शक्ति कहो या आदिशक्ति कहो या विश्व की परमेश्वरी ही क्यों न कह डालो।

यह मैं नहीं कहता पुराणों में लिखा है

पार्वती शिव से बोलीं- प्रभो! यदि आप प्रसन्न हैं तो योगी योगाकाशजनित वायु को जिस प्रकार प्राप्त होता है, वह सब मुझे बताइये।

भगवान शिव ने कहा- सुन्दरी! इससे पूर्व मैने योगियों के हित की कामना से कालपर विजय प्राप्त करने की विधि का वर्णन किया है। योगी किस प्रकार वायु का स्वरूप धारण करता है, यह भी बताया है। अब और भी बताता हूँ- इससे पूर्व बताई गई विधि से योगशक्ति के द्वारा मृत्यु-दिवस को योगी जानकर और प्राणायाम में तत्पर हो जाय। ऐसा करने पर वह आधे मास में ही आनेवाले काल को जीत लेता है। हृदय में स्थित हुई प्राणवायु सदा अग्नि को उद्दीप्त करनेवाली है। उसे अग्नि का सहायक बताया गया है। वह वायु बाहर और भीतर सर्वत्र व्याप्त और महान है। ज्ञान, विज्ञान और उत्साह- सबकी प्रवृति वायु से ही होती है। जिसने वायु को जीत लिया, उसने इस सम्पूर्ण जगत पर विजय पा ली।

साधक को चाहिये कि वह जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु को जीतने की इच्छा से सदा धारणा में स्थित रहे; क्योकि योगपरायण योगी को भलीभाँति धारणा और ध्यान में तत्पर रहना चाहिये। जैसे लोहार मुख से धौकनी को फूक-फूंककर उस वायु के द्वारा अपने सब कार्य सम्पन्न करता है, उसी प्रकार योगी को प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये। प्राणायाम के समय जिसका ध्यान किया जाता है, वे आराध्यदेव परमेश्वर सहस्त्रों मस्तक, नेत्र, पैर और हाथों से युक्त हैं। तथा समस्त ग्रन्थियों को आवृत करके उनसे भी दस अंगुल आगे स्थित हैं। आदि में व्याहृति और अंत में शिरोमंत्र सहित गायत्री का तीन बार जप करें और प्राणवायु को रोके रहें। प्राणों के इस आयाम का नाम प्राणायाम है। चन्दमा और सूर्य आदि ग्रह जा-जाकर लौट आते हैं। परंतु प्राणायाम पूर्वक ध्यानपरायण योगी जाने पर आज तक नहीं लौटे हैं। (अर्थात्- मुक्त हो गये हैं)। देवी! जो द्विज सौ वर्षों तक तपस्या करके कुशों के अग्रभाग से एक बूंद जल पीता है, वह जिस फल को पाता है, वही ब्राह्मणों को एकमात्र धारण अथवा प्रणायाम द्वारा मिल जाता है। जो द्विज प्रातः उठकर एक प्राणायाम करता है, वह अपने सम्पूर्ण पाप को शीध्र ही नष्ट कर देता है और ब्रह्मलोक को जाता है। जो आलस्यरहित होकर सदा एकांत में प्राणायाम करता है, वह जरा और मृत्यु को जीतकर वायु के समान गतिशील हो आकाश में विचरता है। वह सिद्धों के स्वरूप, कांति, मेधा, पराक्रम और शौर्य को प्राप्त कर लेता है। उसकी गति वायु के समान हो जाती है। तथा उसे स्पृहणीय सौख्य एवं परम सुख की प्राप्ति होती है।

देवेश्वरी! योगी जिस प्रकार वायु से सिद्धि प्राप्त करता है, वह सब विधान मैने बता दिया है। अब तेज से जिस तरह वह सिद्धि लाभ करता है, उसे भी बता रहा हूँ। जहां दूसरे लोगों की बातचीत का कोलाहल न पहुँचता हो, ऐसे शांत एकांत स्थान में अपने सुखद आसन पर बैठकर चन्द्रमा और सूर्य (वाम और दक्षिण नेत्र) की कांति से प्रकाशित मध्यवर्ती देश भ्रूमध्यभाग में जो अग्नि का तेज अव्यक्त रूप से प्रकाशित होता है, उसे आलस्यरहित योगी दीपकर रहित अंधकारपूर्ण स्थान में चिन्तन करने पर निश्चय ही देख सकता है- इसमें संशय नही है। योगी हाथ की अंगुलियों से यत्नपूर्वक दोनो नेत्रों को कुछ-कुछ दबाये रक्खे और उनके तारों को देखता हुआ एकाग्र चित्त से आधे मुहूर्त तक उन्हीं का चिंतन करे। तदन्तर अंधकार में भी ध्यान करने पर वह उस ईश्वरीय ज्योति को देख सकता है। वह ज्योति सॅद, लाल, पीली, काली तथा इन्द्रधनुष के समान रंगवाली होती है। भौंहों के बीच में ललाटवर्ती बालसूर्य के समान तेजवाले उन अग्निदेव का साक्षात्कार करके योगी इच्छानुसार रूप धारण करने वाला हो जाता है। तथा मनोवांछित शरीर धारण करके क्रीड़ा करता है। वह योगी कारण तत्व को शांत करके उसमें आविष्ट होना, दूसरे के शरीर में प्रवेश करना, अणिमा आदि गुणों को पा लेना, मन से ही सब कुछ देखना, दूर की बातों को सुनना और जानना, अदृष्य हो जाना, बहुत से रूप धारण कर लेना तथा आकाश मार्ग में विचरना इत्यादि सिद्धियों को निरंतर अभ्यास प्रभाव से प्राप्त कर लेता है। जो अंधकार से परे और सूर्य के समान तेजस्वी है, उसी इस महान् ज्योतिर्मय पुरूष (परमात्मा) को मैं जानता हूँ। उन्हीं को जानकर मनुश्यकाल या मृत्यु को लाँघ जाता है। मोक्ष के लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

देवी! इस प्रकार मैने तुमसे तेजस्तत्व के चिन्न की उत्तम विधि का वर्णन किया है, जिससे योगी काल पर विजय पाकर अमरत्व को प्राप्त कर लेता है।

देवी! अब पुनः दूसरा श्रेष्ठ उपाय बताता हूँ, जिससे मनुश्य की मृत्यु नहीं होती।

देवी! ध्यान करने वाले योगियों की चैथी गति साधना बताई जाती है। योगी अपने चित्त को वश में करके यथायोग्य स्थान में सुखद आसन पर बैठे। वह शरीर को ऊँचा करके अंजली बांधकर चोंचकी-सी आकृति वाले मुख के द्वारा धीरे-धीरे वायु का पान करें। ऐसा करने पर क्षणभर में तातु के भीतर स्थित जीवनदायी जल की बूँदें टपकने लगती हैं। उन बूँदों को वायु के द्वारा लेकर सूँघे। वह शीतल जल अमृत स्वरूप है। जो योगी उसे प्रतिदिन पीता है, वह कभी मृत्यु के आधीन नहीं होता। उसे भूख-प्यास नहीं लगती। उसका शरीर दिव्य और तेज महान् हो जाता है। वह बल में हाथी के समान तथ वेग में घोडे के समान हो जाता है। उसकी दृष्टि गरूड़ के समान तेज हो जाती है और उसे दूर की बातें भी सुनाई देने लगती हैं। उसके केश काले और घुंघराले हो जाते है तथा अंग की कांति गंधर्व एवं विद्याधरों की समानता करती है। वह मनुश्य सौ वर्ष तक जीवित रहता है तथा अपनी उत्तम बुद्धि के द्वारा बृहस्पति के तुल्य हो जाता है। उसमें इच्छानुसार विचरने की शक्ति आ जाती है और वह सदा सुखी रहकर आकाश मार्ग में विचरण करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।

देवी! अब मृत्यु पर विजय पाने की पुनः तीसरी विधि बता रहा हूँ, जिसे देवताओं ने भी प्रयत्नपूर्वक छिपा रक्खा है, तुम उसे सुनो- योगी पुरूष अपनी जिव्हा को मोड़कर तालु में लगाने का प्रयत्न करें। कुछ काल तक ऐसा करने से वह क्रमशः लम्बी होकर गले की घाँटी तक पहुंच जाती है। तदन्तर जब जिव्हा से गले की घाँटी सटती है, तब शीतल सुधा का स्त्राव करती है। उस सुधा को जो योगी सदा पीता है, वह अमरत्व को प्राप्त होता है।

(शिव पुराण- अध्याय 27)

पार्वती भगवान शिव से बोलीं- भगवन! मैने आपकी कृपा से सम्पूर्ण मत जान लिया है। देव! जिन मंत्रों द्वारा जिस विधि से जिस प्रकार आपकी पूजा होती है, वह भी मुझे ज्ञान हो गया है। किंतु प्रभों! अब भी कालचक्र के सम्बन्ध में एक संशय है कृपया मेरा यह संशय दूर करें। देव! मृत्यु का क्या चिन्ह है? आयु का क्या प्रमाण है? नाथ यदि मैं आपकी प्रिया हूँ तो मुझे ये सब बातें बतायें।

महादेव जी ने कहा- प्रिये! यदि अक्समात् शरीर सब ओर से पीला पड़ जाये और ऊपर से कुछ लाल दिखे, तो यह जानना चाहिये कि उस मनुश्य की मृत्यु छः महीने के भीतर हो जायेगी। शिवे! जब मुहँ, कान, नेत्र और जिव्हा का स्तम्भव हो जाये, तब भी छः महीने के भीतर ही मृत्यु जाननी चाहिये। भद्रे! जो रूरू मृग के पीछे होनेवाली शिकारियों की भयानक आवाज को भी जल्दी नहीं सुनता, उसकी मृत्यु भी छः महीने के भीतर ही जाननी चाहिये। जब सूर्य, चन्द्रमा या अग्नि के सानिध्य से प्रकट होनेवाले प्रकाश को मनुश्य नहीं देखता, उसे सब कुछ काला-काला अंधकारमय ही दिखाई देता है, तब उसका जीवन छः मास से अधिक नहीं होता। देवी! प्रिय! जब मनुश्य का बायां हाथ लगातार एक सप्ताह तक फड़कता ही रहे, तब उसका जीवन एक मास ही शेष है- ऐसा जानना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। जब सारे अंगों में अंगड़ाई आने लगे और तालू सूख जाये, तब वह मनुश्य एक मास तक ही जीवित रहता है-इसमें संशय नहीं है। त्रिदोष में जिसकी नाक बहने लगे, उसका जीवन 15 दिन से अधिक नहीं चलता। मुख और कण्ठ सूखने लगे तो यह जानना चाहिये कि छः महीने बीतते-बीतते इसकी आयु समाप्त हो जायेगी। भागिनी! जिसकी जीभ फूल जाये और दांतों से मवाद निकलने लगे, उसकी भी छः महीने के भीतर मृत्यु हो जाती है। इन चिन्हों से मृत्युकाल को समझना चाहिये।

सुन्दरी! जल, तेल, घी तथा दर्पण में जब भी अपनी परछाईं न दिखाई दे या विकृत दिखाई दे, तब कालचक्र के ज्ञाता पुरूष को यह जान लेना चाहिये कि उसकी भी आयु छः मास से अधिक नहीं है। देवेश्वरी! अब दूसरी बात सुनों, जिससे मृत्यु का ज्ञान होता है। जब अपनी छाया को सिर से रहित देखें अथवा अपने को छाया से रहित पायें, तब वह मनुश्य एक मास भी जीवित नहीं रहता।

पार्वती! ये मैने अंगों में प्रकट होने वाले मृत्यु के लक्षण बताये हैं। भदे्र! अब बाहर प्रकट हाने वाले लक्षणों का वर्णन करता हूँ, सुनों। देवी! जब चन्द्रमण्डल या सूर्यमण्डल प्रभाहीन एवं लाल दिखायी दे, तब आधे मास में भी मनुश्य की मृत्यु हो जाती है। अरूंधती, महायाना, चन्द्रमा- इन्हें जो न देख सके अथवा जिसे ताराओं का दर्शन न हो, ऐसा पुरूष एक मास तक जीवित रहता है। यदि ग्रहों का दर्शन होने पर भी दिशाओं का ज्ञान न हो- मन पर मूढता छाई रहे तो छः महीने में निश्चय ही मृत्यु हो जाती है। यदि उतथ्य नामक तारा का, धु्रव का अथवा सूर्यमण्डल का भी दर्शन न हो सके, रात में इन्द्रधनुष और मध्याहन में उल्कापात होता दिखाई दे तथा गीद्य और कौये घेरे रहें तो उस मनुश्य की आयु छः महीने से अधिक नहीं होती।

यदि आकाश में सप्तऋषि तथा स्वर्गमार्ग (छाया पथ) न दिखाई दे तो कालज्ञ पुरूषों को उस पुरूष की आयु छः मास ही शेष समझनी चाहिये। जो अक्समात् सूर्य और चन्द्रमा को राहु से ग्रस्त देखता है और सम्पूर्ण दिशायें जिसे घूमती दिखाई देती हैं, वह अवश्य ही छः महीने में मृत्यु को प्राप्त होता है। यदि अक्समात् नीली मक्खीयाँ आकर पुरूष को घेर लें तो वास्तव में उसकी आयु एक मास ही शेष जाननी चाहिये। यदि गीध, कौआ अथवा कबूतर सिर पर चढ़ जाये तो वह पुरूष शीघ्र ही एक मास के भीतर मर जाता है, इसमें संशय नहीं है।

 

 

नाग पंचमी उपाय Nag Panchami Muhurat & Upaya 2016

Nag Panchami Muhurat & Upaya 2016

Nag Panchami Muhurat & Upaya नाग पंचमी 7 अगस्त 2016

हमारे धर्म ग्रन्थों में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पूजा Nag Panchami Muhurat & Upaya का विधान है। पुराणें के अनुसार नागों की अनेक जातियाँ और प्रजातियाँ हैं। भविष्य पुराण में नागों के लक्षण, नाम, स्वरूप एवं जातियों का विस्तार से वर्णन मिलता है। मणिधारी तथा इच्छाधारी नागों का भी उल्लेख मिलता है।

श्रावणमास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) का त्यौहार नागों को समर्पित है। इस त्यौहार पर व्रत पूर्वक नागों का अर्चन-पूजन होता है। व्रत के साथ एक बार भोजन करने का नियम है। पूजा में पृथ्वी पर नागों का चित्रांकन किया जाता है। स्वर्ण, रजत, काष्ठ या मृत्तिका से नाग बनाकर पुष्प, गंध, धूप-दीप एवं विविध नैवेद्यों से नागों का पूजन होता है।

नाग अथवा सर्प पूजा की परम्परा पूरे भारतवर्ष में प्राचीनकाल से रही है, प्रत्येक गाँव में ऐसा स्थान अवश्य होता है, जिसमें नाग देव की प्रतिमा बनी होती है, और उसका पूजन किया जाता है।

नागपंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) के दिन को तो एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, इसके पीछे भी विशेष कारण है जिस का वर्णन आगे इसी लेख में करेंगे। समय के अनुसार मूल स्वरूप को अवश्य भुला दिया गया है।

क्या नाग देवता हैं?

जिस प्रकार मनुष्य योनि है, उसी प्रकार नाग भी योनि भी है, प्राचीन कथाओं में उल्लेख मिलता है कि पहले नागों का स्वरूप मनुष्य की भांति होता था, लेकिन नागों को विष्णु की अनन्य भक्ति के कारण वरदान प्राप्त होकर इनका स्वरूप बदल दिया गया, और इनका स्थान विष्णु की शय्या के रूप में हो गया, नाग ही ऐसे देव हैं, जिन्हें विष्णु का साथ हर समय मिलता है, और भगवान शंकर के गले में शोभा पाते हैं, भगवान भास्कर (सूर्य) के रथ के अश्व भी नाग का ही स्वरूप हैं।

भय एक ऐसा भाव है, जिससे कि बली से बली व्यक्ति, बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति, भी अपने को शक्तिहीन समझता है। कोई अपने शत्रुओं से भय खाता है, कोई अपने अधिकारी से भय खाता है, कोई भूत-प्रेत से भयभीत रहता है, भयभीत व्यक्ति उन्नति की राह पर कदम नहीं बढ़ा सकता है, भय का नाश, और भय पर विजय प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है, और नाग, सर्प देवता भय के प्रतीक हैं, इसलिए इनकी पूजा का विधान हर जगह मिलता है।

सम्बंधित : Nazardosh Ke Saral Upay

नाग पंचमी रक्षात्मक प्रार्थना का पर्व-

आमतौर पर नागपंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) के पर्व को महिलाओं का ही पर्व माना जाता है, जो कि बिल्कुल गलत है, ‘‘नाग’’ वास्तव में कुण्डलिनी शक्ति के स्वरूप हैं, यह विशेष पर्व कुण्डलिनी शक्ति की उपासना का पर्व है। इस पर्व पर छोटा-मोटा कुण्डलिनी जागरण प्रयोग कर व्यक्ति किसी भी प्रकार की भय बाधा से मुक्ति पा सकता है।

इसका विधान भी अत्यंत सरल है-
नागपंचमी के दिन प्रातः जल्दी उठकर सूर्योदय के साथ सबसे पहले शिव पूजा संपन्न करनी चाहिए, शिव पूजा में शिवजी जी का ध्यान कर शिवलिंग पर दूध मिश्रित जल चढ़ायें और एक माला ‘ऊँ नमः शिवाय’ मंत्र का जप अवश्य करें। नाग पूजा में साधक अपने स्थान पर भी पूजा संपन्न कर सकता है, और किसी देवालय में भी।

किसी धातु का बना छोटा सा नाग का स्वरूप ले लें या फिर एक सफेद कागज पर नाग देवता का चित्र बना लें। इसे अपने पूजा स्थान में सामने सिंदूर से रंगे चावलों पर स्थापित करें, और एक पात्र में दूध नैवेद्य स्वरूप रखें। सर्वप्रथम अपने सदगुरू का ध्यान कर, सर्प भय निवृति हेतु प्रार्थना करें, तत्पश्चात नागदेवता का ध्यान करें कि-

हे नागदेव! मेरे समस्त भय, मेरी समस्त पीड़ाओं का नाश करें, मेरे शरीर में अहंकार रूपी विष को दूर करें, मेरे शरीर में व्याप्त क्रोध रूपी विष से मेरी रक्षा करें, इसके बाद नागदेव के चित्र पर सिंदूर का लेप करें, तथा इसी सिंदूर से अपने स्वयं के तिलक लगायें। इस के बाद अग्र लिखित मंत्र का 21 बार पाठ करते हुये नाग देवता तथा कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करें।

मंत्र-
जरत्कारूर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी। वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा ।।
जरत्कारूप्रिया स्तीकमाता विषहरेति च। महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता।।
द्वादशैतानि नमानि पूजाकाले तु यः पठेत्। तस्य नागभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

थोड़ी देर शांत होकर बैठ जायें तथा ऊँ नमः शिवाय का जप करते रहें, इससे भय का नाश होता है और बड़ी से बड़ी बाधा से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।

पूजन के बाद नागदेव के सम्मुख रखे दूध को प्रसाद स्वरूप स्वयं ग्रहण करें, यदि यह दूध किसी अस्वस्थ व्यक्ति को पिलाया जाये, तो उसे दिन-प्रतिदिन स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होगा। यदि कोई किसी पुराने रोग से पीड़ित हो तो यह प्रयोग 7 दिन तक करें, लेकिन पूजन से पहले अस्वस्थ व्यक्ति के नाम से संकल्प अवश्य लें। इस पूजा का प्रभाव इतना अनुकूल रहता है कि विशेष कार्य पर जाते समय नागदेव का ध्यान कर, यदि आप प्रबल से प्रबल शत्रु के पास भी चले जाते हैं, तो वह शत्रु आप से सत व्यवहार ही करेगा, हानि देने की बात ही दूर रही।

संतान प्राप्ति का नाग शान्ति प्रयोग-

जो स्त्रियाँ नागपंचमी के दिन नागदेव का विधि-विधान सहित पूजन करती हैं, उनकी संतान प्राप्ति की कामना अवश्य पूर्ण होती है। स्त्रियों को अपनी संतान रक्षा हेतु भी नाग शान्ति प्रयोग करना चाहिये। नागपंचमी के दिन सांयकाल शिव का ध्यान करते हुए नाग देव का पूजन करना चाहिए, इसमें पूजन तो ऊपर दी गई विधि के अनुसार ही करना है किंतु अंतर केवल इतना ही है, कि संतान प्राप्ति तथा रक्षा हेतु आगे दिये मंत्र का 51 बार जप करें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पùनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
संतान प्राप्यते संतान रक्षा तथा।
सर्वबाधा नास्ति सर्वत्र सिद्धि भवेत्।।

यह प्रयोग नागपंचमी से लेकर सात दिन तक संपन्न करें। इस प्रयोग को करने से भयबाधा व संतान की कामना पूर्ति अवश्य होती है।

Shivling Upasana शिवलिंगोपासना (Shivratri Special)

Maha Shivratri Special on Shivling

Shivling Upasana शिवलिंगोपासना

तैतीस करोड़ देवी-देवताओं में शिव ही ऐसे हैं जिनकी लिंग shivling के रूप में पूजा होती है जो देवलोक के ऐशो आराम से दूर एक फक्कड़ बाबा के रूप में माने जाते हैं। भांग-धतूरा खाकर, अंग विभूति लिपटा कर जहरीले नागों को गले में लिपटाये प्रसन्न घूमते हैं। शिव Shiv ही हैं जो अक्खड़ दानी हैं। शिवलिंग Shivling पर जल मात्र चढ़ाने से मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं।

भगवान शिव shiv सृष्टि के संहारक हैं। वे मानव के तन-मन की पीड़ा दूर करते हैं, वे आशुतोष है और अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते है। रूद्र उनका एक और नाम है जिसका अर्थ है रोगों को हरण करने वाला। भगवान शिव की उपासना में शिवलिंग shivling पूजा का सबसे अधिक प्रचलन है। लिंग पूजन से सभी मनोकामनायें पूर्ण होती है और सुख शांति की प्राप्ति होती है।

गरुड़ पुराण के अनुसार लिंग shivling अलग- अलग पदार्थों से अनेक प्रकार के बनाये जाते हैं जिस पदार्थ से लिंग बनाये जाते हैं वैसा ही फल प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अलग-अलग वस्तुओं से अभिषेक करने से भी भिन्न फल की प्राप्ति होती है।

जैसे-
श्री प्राप्ति के लिए गन्ने के रस में अभिषेक करना चाहिए।
ज्वर आदि प्रकोप से बचाव हेतु जलधारा से पूजन करें।
वंश वृद्धि हेतु धृत योग से अभिषेक करें।
पाप निवारण हेतु मधु से पूजन करना चाहिए।
समस्त व्याधियों के हरण हेतु पीली, सरसों के तेल से पूजन करें।
लम्बी आयु के लिए दुग्ध से पूजन करें।
एवं संतान प्राप्ति हेतु शर्करा से अभिषेक करना चाहिए।

मृत्युंजय साधना या रूद्राभिषेक दोनों ही मोक्ष और लम्बी आयु देने वाले हैं।

अठारहों पुराणों में शिव को श्रेष्ठ कहा गया है। शिव को उनकी श्रेष्ठता के कारण ही देवाधिदेव कहा गया है। इन्हीं शिव से संबंधित है महाशिवरात्रि-व्रत। देवों में श्रेष्ठ शिव हैं तो स्वभावतः शिव से सम्बद्ध महाशिवरात्रि व्रत व्रतों में सर्वश्रेष्ठ है यह सामान्य जन भी जानते हैं।

जिस व्रत को शिव की प्रियरात्रि में संपन्न किया जाता है वह व्रत शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है तो हर माह में कृष्ण पक्ष में शिवरात्रि व्रत पड़ता है। परन्तु महाशिवरात्रि व्रत फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को पड़ती हैं।

यह अर्थ, काम, मोक्ष तीनों की प्रदाता है अर्थात् मनोकामना पूर्ति हेतु महाशिवरात्रि व्रत करने योग्य है यह सद्या फलदाता है। भोले बाबा स्वयं तो दिगम्बर, श्मशान सेवी और वृषभ वाहन पर है परन्तु अपने भक्तों को अकल्पनीय ऐश्वर्य प्रदान करने में भी पीछे नहीं रहते है। कभी-कभी बाबा ऐसा वरदान दे देते हैं कि बाद में स्वयं परेशानी में पड़ जाते हैं।

रावण शिवभक्त ही था उसकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे इतना सशक्त बना दिया कि उसने सोने की लंका बना ली और विभिन्न देवताओं को बंदी बनाकर अपने अधीन कार्य लेने लगा। इन्द्र रावण के यहां पानी भरने लगे, अग्नि भोजन पकाने लगी, वायु पंखा झलने लगी।

इसी रावण को मारने के लिए रामावतार हुआ और राम भी रावण वध में तभी सफल हुए जब उन्होंने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना कर पूजा-अर्चना की। अतः आप दीन-हीन हो, पापी हो, पुण्यात्मा हो वैभवशाली हो। भगवान शिव की उपासना कीजिए आपकी आकांक्षाएं शीघ्रपूर्ण हो जाएंगी। शिवोपासन की सर्वथा सरल विधि महाशिवरात्रि व्रत का पालन है कहते हैं।

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपाप प्रणाशनम।
आचांडालमनुष्याणां मुक्तिमुति प्रदायकम्।।

संस्कृत भाषा में लिंग का अर्थ होता है चिन्ह और इसी अर्थ में यह शिवलिंग shivling के लिए प्रयुक्त होता है। शिवलिंग shivling का अर्थ है शिव का परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित चिह्न है।

त्रिगुण की जो अव्यक्तावस्था है, जिसके त्रिगुण उत्पन्न हुआ है, उसी में लीन हो जाता है, सारे संसार के उस उपादान कारण को, जो अनादि और अनन्त है, उसे लिंग कहते हैं। इसी से यह संपूर्ण संसार उत्पन्न होता है। इस प्रकार आधारसहित लिंग जगत का कारण है, माँ उमा, महेश्वर स्वरूप है। भगवान शिव स्वयं ज्योतिलिंग स्वरूप तमस से परे स्थित है। लिंग और वेदों के समायोग से वे अर्धनारीश्वर होते हैं।

भिन्न-भिन्न पदार्थो के बने शिवलिंग shivling –
» मिश्री से बनाये हुए शिवलिंग की पूजा से रोग आदि से छुटकारा मिलता है।
» तीनों का आटा समान भाग में गूंथ कर जो शिवलिंग पूजा जाता है, (गेहूं, चावल, जौ, आटा लें) इससे जातक को संतान, लक्ष्मी और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
» किसी से प्रेम प्यार बढ़ाने के लिए गुड़ की भेली में शिवलिंग बनाकर उस व्यक्ति का संकल्प और ध्यान करने से विशेष लाभ मिलता हैं
» यदि चीनी की चाशनी को जमा कर शिवलिंग बनाकर पूजा की जाए तो सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
» यदि किसी को वंश-वृद्धि में बाधा आ रही हो तो वह जातक बांस के अंकुर को शिवलिंग के समान काटकर पूजा करे तो लाभ होगा।
» आंवले को पीसकर बनाया गया शिवलिंग मुक्तिप्रदाता होता है। (आंवले के सीजन में 108 दिन लगातार शिवलिंग बनाकर पूजा करें तो मुक्ति पाओगे।)
» स्फटिक तथा अन्य रत्नों के बने शिवलिंगों जातकों की अभीष्ट कामनाएं पूरी करता है।
» शत्रुओं के नाश के लिए लहसुनिया के बने शिवलिंग की पूजा करने से विजय मिलती है।
» पीतल का शिवलिंग निर्धनता निवारक है। बृहस्पतिवार से पूजा शुरु करें।
» चांँदी का शिवलिंग धन-धान्य बढ़ाता है-सोमवार से पूजा शुरु करें।
» सोने से बना शिवलिंग समृद्धि का वर्द्धन करता है।
» यदि स्त्रियां मोती के शिवलिंग का पूजन करें तो भाग्य-वृद्धि होती है।
» यदि जातक कपूर से बने शिवलिंग का पूजन करता है तो उसको भक्ति और मुक्ति दोनों को प्राप्त करता है।
» यदि जिस जातक की पत्रिका में अकाल-मृत्यु का भय हो तो वह दूर्वा को शिवलिंग गुथकर उसकी आराधना करे तो विशेष लाभ होता है।
» गायत्री मंत्र का सवा लाख आहुति का यज्ञ करके उस भस्म से शिवलिंग बनाकर पूजा की जाए तो जातक की अभिलाषा बहुत शीघ्र पूर्ण होती है।
» वशीकरण के लिए सोंठ, मिर्च, पीपल के चूर्ण को सेंधा नमक के साथ गूंथ कर शिवलिंग बनाने पर पूजा करने पर लाभ मिलता है।
» चन्दन और कस्तूरी व गौलोचन के साथ गजमुक्ता को मिलाकर जो शिवलिंग की पूजा करेंगे तो वशीकरण, सम्मोहन आकर्षण के साथ शिव साम्राज्य की भी प्राप्ति होती है।
» यदि किसान जातक गुड़ की पिण्डी (लिंग) बनाकर उसमें गेहूं के दाने चिपका कर पूजा करने से उस को उत्पादन अधिक होगा।
» दही को बांधकर निचोड़ देने के बाद उससे जो शिवलिंग बन जाए उसकी पूजा करने से लक्ष्मी, सुख व काम सुख की प्राप्ति होती है।
» असली पारद से बनें शिवलिंग की शास्त्रों में बहुत ही प्रशंसा की गयी है। इस शिवलिंग को शास्त्रों में ज्योर्तिलिंग से भी बहुत श्रेष्ठ माना गया है। इसका पूजन सर्वकामनाप्रद, समस्त पापों का नाश करता है, यह जातक को जीवन के संपूर्ण सुख एवं मोक्षप्रद शिवस्वरूप प्रदान करता है। पारद शिवलिंग गारन्टी देने वाले से ही लें आजकल लैड के ऊपर पाॅलिश की जाती है। नकली पारद शिवलिंग की पूजा से कोई लाभ नहीं होगा।

सम्बंधित : शिवलिंग कहाँ से प्राप्त करें » Buy Shivling Online

शिव-पूजन के लिए निम्न बातों पर विशेष ध्यान दिया जाए तो पूजा का फल कई गुणा ज्यादा मिलता है।
1. भगवान शिवजी की पूजा में तिल का प्रयोग नहीं होता और चम्पा के फूल भी नहीं चढ़ाया जाता।
2. शिवजी की पूजा में भी दूर्वा, तुलसी-दल चढ़ाया जाता है। इसमें संदेह नहीं किया जाना चाहिए। तुलसी की मंजरियों से पूजा बहुत श्रेष्ठ मानी जाती है।
3. शिवजी की पूजा में बिल्व पत्र प्रधान है और नीलकमल सर्वश्रेष्ठ पुष्प माना गया है। बिल्व-पत्र चढ़ाते समय बिल्व पत्र का चिकना भाग मूर्ति की ओर रखना चाहिए।
4. जितने अधिक बिल्व-पत्रों को चढ़ाया जाए उतना ही उत्तम होता है, खण्डित बिल्व पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए।
5. शिवजी के पूजन के समय करताल नहीं बजाना चाहिए।
6. विशेष शिवजी के पूजन (अनुष्ठान) कर भस्म त्रिपुण्ड और रूद्राक्ष माला जातक के शरीर पर जरूर होनी चाहिये।
7. शिवजी की परिक्रमा में संपूर्ण परक्रिमा नहीं की जाती।
8. चढ़े हुए जल वाली नाली का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। वहीं से परिक्रमा उल्टी की जाती है।

मां दुर्गा महाशक्ति – नवरात्रि पर्व

मां दुर्गा महाशक्ति – नवरात्रि पर्व

सर्व स्वस्ये सर्वेश सर्व शक्ति समन्विते।
भयेस्य स्त्राही नो देवी दुर्गे माॅ नमोस्तुते।।

shubh navratri aapkabhavishya.in
Shubh Navratri aapkabhavishya.in

आज के अर्थ प्रधन युग में मानव का लक्ष्य यश, मान प्राप्त करने के साथ धन भवन, वाहन आदि को प्राप्त कर परिपूर्ण होना है। अतः मानव अपने प्रयत्नों से सब कुछ प्राप्ति करने का करता रहता है क्योंकि क्रियाशील मानव का जीवन ही वास्तविक, जीवन है। जीवन में प्राप्ति तब तक संभव नही जब तक समय क्षण योग का ज्ञान नही होगा। क्योंकि प्रत्येक क्षण अपने आप में अलग-अलग महत्व लिये होता है। भक्ति, साधना आराधना कर्म से जुड़ी है। इनका समन्वय किसी पूर्व योग मुहुर्त में होता है तो मानव जीवन का निर्माण स्वतः ही संभव हो जाता है।

नवरात्रि पर्व याने जीवन में व्याप्त अंधकार कर समाप्त कर प्रकाश की ओर अग्रसर कर जीवन को सामर्थ बनाता है। साथ ही आने वाली विपदाओं से छुटकारा दिलवाता है, नवरात्रि पर्व मानव में अपनी प्रकृति के अनुसार सात्विक, राजस, तामस, त्रिगुणात्म गुण प्रकट करते हैं।

साधक जो गुरू के सानिध्य में मंत्रो द्वारा साधना कर शक्ति प्राप्त करता है। आराधक जो आत्मा से लीन होकर आराधना करता है एवं मोक्ष चाहता है। भक्त जो निष्ठा एवं भाव से समर्पित होता है एवं परिस्थितियों से संघर्ष कर सुयोग का लाभ उठा लेता है।

इस विशेष क्षण में माँ-दुर्गा की भक्ति आराधक को प्रकृल्लित विकसित करके सौभाग्य प्रदान करती है, जिस महाशक्ति की उपासना तीनो लोको के स्वामी ब्रह्मा-विष्णु-महेश एवं सभी देवता गण करते हैं, जो तीनो देवों से बढकर है, जो सूक्ष्म एवं स्थूल शरीर से परे महाप्राण आदि शक्ति है, वह स्वयं पर ब्रह्म स्वरूप है, जो केवल अपनी इच्छा मात्र से ही सृष्टि की रचना चल-अचल भौतिक प्राणिज वस्तुओं को पालन, रचना व संहार करने में समर्थ है। यद्यपि वह निगुर्ण स्वरूप है किन्तु धर्म की रक्षा व दुष्टों के नाश हेतु शक्ति ने अवतार धारण किये हैं।

श्रीमद्भागवत में स्वयं देवी ने ब्रह्मा जी से कहा है कि एक ही वास्तविकता है वह है सत्य, में ही सत्य हूँ, मैं न तो नर हूँ, न नारी! एवं न ही प्राणी लेकिन कोई वस्तु ऐसी नही जिसमें में, विधमान नही हूँ। प्रत्येक वस्तु में शक्ति रूप में रहती हूँ देवीपुराण में स्वयं भगवान विष्णु स्वीकार करते हैं। कि वे भी शक्ति से मुक्त नही हैं। वो कठपुतली की भांति कार्यरत है, कठपुतनी संचालन की डोर तो महादेवी के हाथ में है। ब्रह्माजी सृष्टि की रचना करते हैं तो विष्णु जी पालन करते हैं एवं शिवजी संहार करते हैं जो केवल यंत्र की भांति कार्यरत हैं, जो शक्ति की कठपुतली मात्र हैं।
महादानव दैत्यराज के अत्याचार से तंग आकर समस्त देवतागण ब्रह्माजी के पास एवं दैत्यराज से मुक्ति दिलाने की अर्चना की। तब ब्रह्माजी ने बताया कि दैत्यराज की मृत्यु कुवांरी कन्या के हाथ से होगी। तब सभी देवाताओं ने मिलकर अपने सम्मिलित तेज से देवी के इस शक्ति रूप को प्रकट किया। भगवान शंकर के तेज से देवी का मुंह, यमराज के तेज से केश, भगवान विष्णु के तेज से भुजायें, इन्द्र के तेज से स्तन, पवन के तेज से कमर, वरूण के तेज से जांघे, पृथ्वी के तेज से नितम्ब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से पैरों की उगलियाँ, वस्तुओं के तेज से भौहें, वायु के तेज से काल एवं अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने। देवी का शक्ति रूप प्रकट होने पर शिवजी ने शक्ति व बाणों का तरकस, यमराज ने दण्ड, काल ने तलवार, विश्वकर्मा ने परसा, प्रजापति न मणियों की माला, वरूण न दिव्य शंख, हनुमान जी ने गदा, शेषनाग ने मणियों से सुभोभिति नाग, इन्द्र ने वज्र, भगवान श्री नारायण ने धनुष, वरूण के पाश व तीर ब्रह्मा ने चारों वेद, हिमालय सवारी के लिये सिंह, समुद्र ने दिव्य वस्त्र एवं आभूषण दिये। जिससे शक्ति देवी 18 भुजाओं वाली प्रकट हुई। सभी के द्वारा देवी की स्तुति की गई कि शक्ति सदैव अजन्मी और अविनाशी है, यही आदि यही अंत है तो ब्रह्मा-विष्णु महेश सहित देवताओं व मनुष्यों द्वारा पूज्य हैं। शक्ति के नौ अवतार हैं जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं-

1. शैलपुत्री।
2. ब्रहमचारिणी।
3. चन्द्रघंटा।
4. कुष्माडा।
5. स्कन्दमाता।
6. कात्यानी।
7. कालरात्रि।
8. महागौरी।
9. सिद्धियात्री आदि।

श्री दुर्गा सप्तशती में देवी के नौ अवतारों का वर्णन है।

माँ की शक्ति वह शस्त्र है, जिसके माध्यम से किसी महा संग्राम को आसानी से जीता जा सकता है-
शक्ति की प्राप्ति माँ दुर्गा से गतिशील भक्त को होती है। भाग्य का रोना रोने वाले या असहाय का नहीं सृष्टि की अनन्त शक्ति प्राणी मात्र के सत्कर्म पुरूषार्थ एवं कर्तव्य परायणता में निहित है कर्म ही शक्ति का मूलाधार है वह परम शक्ति प्राप्त करने का मार्ग है। अतः शक्ति प्राप्त कर जीवन को आनन्दमयी, सुखी बनाकर विकास करना है, जो शक्ति पूजन करना चाहिये। क्योंकि शक्ति स्वरूप माँ दुर्गा की आराधना कर्म, निष्ठा और कर्तव्य परायण बनाकर जीवन को शक्ति प्रदान करती है।

माँ देवी के 108 नाम हैं, जिनका योग 9 है, माँ ने नौ अवतार धारण किये हैं। साधना में ली जाने वाली माला के मणियों की संख्या 108 है, जिनका योग 9 है, आकाशीय सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं। नवरात्रि का योग नौ है अंको की संख्या भी नौ है, जो शक्ति की साधना एवं भक्ति का योग हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से अणुबम, बिजली, बेतार, यान वायुयान आदि शक्ति ऊर्जा पर आधारित है। शक्ति बिना प्राणी निर्जिव है। अतः सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देवी का प्रतिबिम्ब छाया मात्र है। समस्त भौतिक पदार्थो एवं जीवों में शक्ति देवी द्वारा ही चेतना व प्राण का संचार होता है। इस नश्वर संसार में चेतना के रूप में प्रकट होने से देवी की चित स्वरूप मणी माना जाता है। प्रत्येक मानव में भी शक्ति अर्थात ऊर्जा है, जैसे इंजन से फालतू भाप निकाली जाती है, उसी प्रकार मानव भी व्यर्थ में अपनी ऊर्जा नष्ट करता है, किन्तु जिनकी शक्ति संगीत, खेलकूद, लिखने पढ़ने में शोध में विज्ञान की खोज में साधना, समाधि में खर्च होती है, वह व्यर्थ नही जाती।

सामान्य से सामान्य गृहस्थी मानव द्वारा माँ की आराधना कर शक्ति प्राप्त की जा सकती है। जिससे जीवन में पूर्ण प्रज्ञावान चेतन्य तथा सोलह कला पूर्ण व्यक्तित्व बन सकता है। इसके लिये कही भटकने या सन्यास लेने की आवश्यकता भक्ति साधनों की जिनका सीधा संबंध मन से, श्रद्धा से, विश्वास से है। अतः माॅ की शरण में जाना ही मानव कल्याण है।

साधना के लिए दुर्गा यंत्र (Durga Yantra) हमारे संस्थान से प्राप्त करें|

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे स्वार्थ साधिके।
शरण्ये अम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।

भगवती दुर्गा आप मंगल हैं। समस्त भक्तों का कल्याण करने वाली हैं। मैं आपकी शरण में हूँ आप मेरी रक्षा करें।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer