जीवन संचालन करने वाले मुख्य पाँच भौतिक तत्व

जीवन संचालन करने वाले मुख्य पाँच भौतिक तत्व धरती पर जीवन का संचालन करने वाले मुख्य पाँच भौतिक तत्व ही हैं-

  1. पृथ्वी
  2. अग्नि
  3. आकाश
  4. जल
  5. वायु

इन सबसे मिलकर यह सारा ब्रह्माण्ड बना है। हमारा शरीर भी पंचभूत है इन्हीं पांच तत्त्वों से भरपूर जीवन में मनुष्य वास्तु में इन पांचों तत्वों को संतुलित करके ही सुख समृद्धि तथा शांति प्राप्त कर सकता है लेकिन इन पांचों तत्वों में से एक भी तत्त्व की कमी हो तो हानि, रोग, शोक आदि का मुंह देखना पड़ता है। प्राचीनकाल में हमारे भवन का निर्माण करने वाले राज मिस्त्रियों को वास्तु का बहुत ज्ञान था। जहां मनुष्य, वास करता है। उसी का नाम वास्तु है, सुखी समृद्धि एवं सुखमय जीवन यापन करने के लिए वास्तु के नियमों का पालन अवश्य करना चाहिये।

पिरामिडोलॉजी’ नामक एक विशुद्ध विज्ञान का विकास प्राचीनकाल में इसी उद्देश्य के लिये हमारे ऋषियों के द्वारा किया गया है। आज इसके प्रवक्ताओं का मत है कि पिरामिडों के विशिष्ट आकार प्रकार में ‘अलौकिक शक्ति’ छिपी पड़ी है। इनकी आकृति इतनी मायावी है कि उसे निखिल ब्रह्माण्ड का मानव कृत लघु संस्करण कहा जा सकता है। इनमें ‘सूक्ष्म ब्रह्माण्डीय ऊर्जा’ का बहुलता से एकत्रीकरण होता रहता है। जो जीवित तथा निर्जीव पदार्थों को प्रभावित किए बिना नहीं रहती।

पिरामिडनुमा भवन चाहे वह चैकोर हो अथवा गोलाकार, विभिन्न प्रकार की ब्रह्मंडीय तरंगों को आकर्षित कर अपना प्रभाव मानव शरीर और मन पर अवश्य डालते हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि सभी पिरामिड उत्तर-दक्षिण एक्सिस पर बने हैं। यह भी एक वैज्ञानिक रहस्य है जो बताता है कि भू चुम्बकत्व एवं ब्रह्मांडीय तरंगों का इस विशिष्ट संरचना से निश्चय ही कोई संबंध है। उत्तर-दक्षिण गोलाद्धों को मिलाने वाली रेखा पृथ्वी की चुम्बकीय रेखा है। चुम्बकीय शक्तियाँ विद्युत तरंगों से सीधी जुड़ी हुई हैं जो यह दर्शाती हैं कि ब्रह्मांड में बिखरी मैग्नेटोस्फीयर में विद्यमान चुम्बकीय किरणों को संचित करने की अभूतपूर्व क्षमता पिरामिड में है। यही किरणें एकत्रित होकर अपना प्रभाव अंदर विद्यमान वस्तुओं या जीवधारियों पर सकारात्मक रूप से डालती हैं। इन सभी पिरामिडों का प्रयोग यदि आज की आवश्यकता के अनुरूप किया जाये तो मनुष्य अवश्य इनसे अनेक लाभ उठा सकता है।

 

आत्मा की सत्ता

आत्मा की सत्ता महर्षि पातांजलि के अनुसार वासनाओं के अनुसार ही अगले जन्म में नया शरीर प्राप्त होता है। डार्विन का कहना है कि कामनाओं की पूर्ति के निमित्त जीवधारियों के शरीर में परिवर्तन होता रहता है और एक पीढ़ी का परिवर्तन दूसरी पीढ़ी को उत्तराधिकार के रूप में मिलता है। इस प्रकार परिवर्तन होते-होते एक योनि दूसरी योनि में परिवर्तित हो जाती है। अपने मत की पुष्टि में अफ्रीका के पशु जिराफ का उदाहरण देते हैं, जिनकी गर्दन इसलिये बहुत लंबी हो गई है कि अफ्रीका के वृक्ष बहुत ऊंचे होते हैं और उसकी पत्तियाँ खाने के लिये उन्हें अपनी गर्दन बहुत अधिक उठानी पड़ती थी। प्रत्यक्ष भी देखने में आता है कि काम-क्रोध, भय, शोक, लोभादि का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ता है, जिसका एक सूक्ष्म अंश स्थायी परिवर्तन छोड़ देता है। यही कारण है कि अनुभवी लोग मनुश्य की आकृति को देखकर बहुत ऊँचे स्वभाव एवं चरित्र का पता लगा लेते हैं।

कामना और शरीर का संबंध एक प्रकार से समझ में आता है। जीवन में जो कुछ भी हमें अपनी कामनाओं के अनुकल प्राप्त होता है, उसे ही हम रखने का प्रयत्न करते हैं और जो कुछ ऐसा प्राप्त होता है जो हमारी कामनाओं में बाधक हो, उसे हटाने का प्रबंध करते हैं और जो कामनाओं की पूर्ति में न तो सहायक है न बाधक उसकी ओर हमारी दृष्टि तटस्थता की होती है अब शरीर को लीजिये इसे न तो हम त्यागना चाहते हैं और न इसकी ओर तटस्थ हैं। यही नही, इसके छूट जाने की कल्पना तक से हम सिहर उठते हैं। अतः सिद्ध हुआ कि हमारा शरीर हमारी कामनाओं के अनुरूप ही है। पातांजलि और डार्कवन दोनों के अनुसार कामना कारण है और शरीर कार्य। प्रत्यक्ष देखने में आता है कि मृत्युकाल तक हमारी वे कामनायें नष्ट नहीं होती, जो एक शरीर के बिना पूरी नही हो सकती तो फिर जिस प्रकार एक घर के नष्ट हो जाने पर यदि वे कामनायें नष्ट नहीं हुई, जिनकी पूर्ति एक घर के बिना असंभव है, एक वस्त्र के बिना असंभव है, तो हम अपनी आवश्यकता, सामथ्र्य और परिस्थितियों के अनुसार नया घर अथवा नये वस्त्र को प्राप्त होते हैं।

उसी प्रकार एक शरीर छूट जाने पर यदि हमारी कामनायें नहीं छूटी, जिनकी पूर्ति एक शरीर के बिना असंभव है, तो हम अपनी वासना, सामथ्र्य और परिस्थितियों के अनुसार एक नया शरीर धारण करते हैं। जब तक कारण नष्ट नहीं हुआ, कार्य नष्ट नहीं हो कर वह अपना रूप बदलता रहता है। शरीर और वासना का संबंध समझ लेने के पश्चात् हम यह भी जान सकते हैं कि अगले जन्म में किसे कौन सी योनि प्राप्त होगी। जो लोग अति कामुक हैं उन्हें बंदर या चिड़े की योनि प्राप्त होनी चाहिये; क्योकि मानव शरीर में इतने काम सेवन की क्षमता नहीं है। इसलिये अत्यंत क्रोध वालों के लिये हम सर्प योनि की भविष्यवाणी कर सकते हैं।

एक वस्त्र छूट जाने पर दूसरा वस्त्र धारण करने तक के बीच का जो समय निर्वस्त्रता का है, वैसा ही एक शरीर छूट जाने पर दूसरा शरीर प्राप्त होने के बीच का समय प्रेतावस्था का है। पर आजकल विकासवादी धूम है। शरीर रचना में वासना के महत्व को स्वीकार करते हुये भी विकासवाद पुनर्जन्म को नही मानता । विकासवादी शरीर से भिन्न आत्मा की सत्ता स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार जड़ के एक विशेष संयोग से चेतन उत्पन्न हो जाता है और शरीर के नष्ट होने के साथ-साथ वह भी नष्ट हो जाता है। अतः पुनर्जन्म या परलोक का भी कोई प्रश्न नहीं उठता। हम पुनर्जन्मवादी इसमें केवल इतना स्वीकार करते हैं कि जड़ के विशेष प्रकार के संयोग में विशेष प्रकार की आत्मा को आकर्षित करने की शक्ति आ जाती है परंतु वह संयोग आत्मा को उत्पन्न कर देता है-

हम यह स्वीकार नहीं कर सकते । गुड़ में मक्खी को आकर्षित करने की शक्ति है। वह मक्खी को उत्पन्न नही कर सकता । यदि चेतन की उत्पत्ति केवल जड़ और परिस्थितियों पर ही निर्भर है तो एक ही परिस्थिति में उसी जड़ का केवल एक अंश ही मनुश्य क्यों बना? दूसरा वनस्पति बनकर क्यों रूक गया ? तीसरा केवल मछली तक और चैथा केवल वानर तक ही क्यों पहुंच पाया और पांचवाँ आज भी क्यों जड़ है? एक उद्योगशाला में एक ही परिस्थिति में एक से कच्चे माल से जो पदार्थ निर्मित होते हैं, वे एक से होते हैं, जबकि क्रमिक विकास की सृष्टि में ऐसा नही है। यहाँ तक कि मानव योनि में भी कोई दो व्यक्ति ऐसे नही मिलेंगें, जिनके अंगूठों की छाप तक एक जैसी हो। अतः मानना पड़ेगा कि जीवधारियों के पारस्परिक भेद का कारण परिस्थिति विकासवाद और वंशानुक्रम के अतिरिक्त कुछ और भी है।

जिस क्षेत्र में मानव का अवतरण हो चुका है।, वहाँ बंदर अब भी रहते हैं। अतः मानना पड़ेगा कि जो वानर मनुश्य बन गये, वे विशेष प्रकार के वानर थे और इन वानरों से भिन्न थे, जो मानव नहीं बन पाये और जो आगे चलकर मानव बनने का कोई लक्षण उनमें आज भी पाया जाता है इसी प्रकार जो जड़ मछली बना और जो मछली वानर बनी, वह आज के जड़ और मछली से नितांत भिन्न थे। नही तो क्या कारण है कि हमारा वर्तमान जड़ मछली और आज की मछली वानर नहीं बन सकी। प्रकृति में इतनी विषमता क्यों हुई कि उसकी क्रमिक विकास की चेष्टा का कुछ तो प्रभाव हुआ और कुछ पर नही और जिन पर हुआ उन पर भी एक सा नही ? यदि सारा ही जड़ मानव बन जाये तो मानव क्या एक दूसरे को खायेगा? क्रमिक विकास के साथ साथ प्रकृति की यह चेष्टा भी देखने को मिलती है कि जड़ वनस्पति, जलचर, नभचर, वनचर और मानव में एक उचित संतुलन रखा जाये, नहीं तो विकास का अर्थ विनाश होगा। अतः मानना पड़ेगा कि इस क्रमिक विकास के पीछे भी किसी चेतन सत्ता का हाथ है जड़वादी यह बतलाने में असमर्थ हैं कि यदि पृथ्वी पर भी वे परिस्थितियाँ उत्पन्न न हुई होती जो क्रमिक विकास का कारण बनी और सारी पृथ्वी जड़ पड़ी रहती जैसा कि बहुत से ग्रह अब भी पड़े हुये हैं तो क्या हानि थी? मनुश्य का अवतरण जैसी एक भीषण क्रांति जो आगे चलकर सारी क्रान्तियों का कारण बनी -क्या एकमात्र संयोग की बात है? क्या इस विकास में मनुश्य का अपना कुछ कर्तव्य नहीं है? क्या यह सब निरूद्देश्य है? यदि ऐसा ही है तो फिर मनुश्य जीवन में ही उद्देश्य की स्थापना क्यों की जाये? जब मानव जड़ का ही एक रूप है तो मानव जीवन की महत्ता ही क्या रही? जब मानव को यह शरीर उसके पूर्वजन्मकृत सुकृत का फल न होकर केवल संयोगवश प्राप्त हुआ है तो उससे यह छीन लेने में कौन सा पाप है?

परलोकवाद को न मानने वाले और नैतिकता के समर्थक यह कहा करते हैं कि मनुश्य को अपने पाप पुण्यों का फल इसी जन्म में मिल जाता है। ऐसा भी हो तो इतना तो वे भी स्वीकार करेंगें कि हमें अपने पाप पुण्य का फल तत्काल नहीं मिलता। परिस्थिति व दूसरों की चेष्टा के अतिरिक्त इसमें हमारी चेष्टा भी एक बहुत बड़ा कारण होती है। प्रयत्न करने पर हम अपने पाप कर्मों के फल को कुछ और समय तक के लिये टाल सकते हैं तो जीवन पर्यंत भी टाल सकते हैं। केवल परलोकवादी ही धर्म पर स्थिर रह सकता है; क्योंकि वह समझता है कि यदि पाप कर्म का फल आजीवन टाल भी दिया तो उसे परलोक या अगलेे जन्म में भोगना पड़ेगा।

अतः वह पाप करने का और यदि पाप बन गया तो उसके फल को टालने का प्रयत्न नहीं करता जबकि जड़वादी की सारी चेष्टा यही रहती है कि जिन पापों से अपने स्वार्थ की पूर्ति होती है। उन्हें इस प्रकार करो कि जिससे उनका फल न भोगना पड़े। इसी प्रकार पुण्यकर्म करने के बाद उसका फल प्राप्त करने के लिये भी जड़वादी बहुत उतावला रहता है क्यो कि पुण्य कर्म का फल भी तत्काल नहीं मिलता। जड़वादी समझता है कि यदि इसी बीच में मेरी मृत्यु हो गई तो वह पुण्यकर्म निष्फल गया। परलोक वादी ऐसा नहीं मानता । वह समझता है कि इस जन्म में न सही अगले जन्म में फल अवश्य मिलेगा। नैतिक आचरण के पक्ष में जड़वादियों का कहना है कि हमंे जनता को यह समझाना चाहिये कि हमारे पाप पुण्यों के कर्मों का फल हमें भले ही न मिले, वह हमारे समाज, जाति, राष्ट्र, मानवता व भावी पीढि़यों को अवश्य प्राप्त होगा।

यह ठीक है कि कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति कर्म करते समय उसके परिणाम को न केवल व्यक्तिगत, अपितु पारिवारिक, सामाजिक जातीय, राष्ट्रीय व भावी पीढि़यों की दृष्टि से भी सोचता है; परंतु हमें यह नहीं भूल जाना चाहिये कि ये सारे पारिवारिक सामाजिक, जातीय, राष्ट्रीय व भावी पीढ़ीगत स्वः-व्यक्तिगत स्वः के ही विस्तार हैं और जब तक मनुश्य की समझ में यह न आ जाये कि उसके पाप पुण्य कर्मो का फल उसके व्यक्तिगत स्वः को भी अवश्य प्राप्त होगा, तब तक नैतिकता के लिये कोई भी सुदृढ़ आधार नहीं मिलता। जड़वाद नहीं, परलोकवाद ही व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक जातीय, राष्ट्रीय मानवतागत व भावी पीढ़ीगत सभी ‘स्व’ में समन्वय स्थापित करता है और बतलाता है जो बात विशाल से विशालतर सबके लिये लाभदायक है। इस प्रकार आत्मा और परलोक का अस्तित्व न मानने से नैतिकता की जड़ें हिल गयी हैं।

जब मानव जड़ का ही एक रूप है तो फिर जड़ से अधिक उसका महत्व क्यों? रही सुसंस्कृत मन की बात तो सुसंस्कृत मन तो वही कहा जायेगा जो सारे विश्व को ‘सीयाराममय’ जानकर युगपत नमस्कार करता है, न कि वह अपने को भी जड़वाद मानकर चलता है। एक विकासवादी भावी पीढ़ी की भी चिंता क्यों करें? जब हमारे पूर्वज जड़, मत्स्य और वानरों ने भावी पीडि़यों की कोई चिंता किये बिना और न इनमें इस प्रकार की चिंतन की कोई क्षमता ही थी, अपनी भावी पीढि़यों को मानव बनाकर दिखला दिया तो हम भावी पीढि़यों की चिंता कर इससे भी अधिक अच्छे परिणाम दिखला सकेगें? जीवन में सबसे महत्वपूर्ण घटना हमारा अपना जीवन है। व्यक्तिगत दृष्टि से और सामूहिक दृष्टि से मनुश्य का पृथ्वी पर अवतरण।

यदि जन्म नहीं तो, कुछ भी नही और यदि पृथ्वी पर मानव अवतरित न हुआ होता तो। और यही जन्म हमारे अपने पाप पुण्य का फल न होकर केवल संयोगमात्र है और यही पृथ्वी पर मानव का अवतरण उसके पूर्वजों की योजना तथा पुरूषार्थ का परिणाम न होकर प्रकृति की एक चेष्टा मात्र है तो हमारे सारे पुरूषार्थ एवं प्रयास का क्या मूल्य रह जाता है? इस प्रकार जड़वाद की पुरूषार्थ से संगति नही बैठती। फिर यह जड़वाद यह भी नहीं बतलाता कि जब अनादि काल से सृष्टि जड़ चली आ रही थी तो यकायक यह रचना क्यों आरंभ हो गई। क्या पहले भी ऐसी कोई रचना आरंभ होकर नष्ट हुई है? नष्ट नहीं हुई तो वह कहां है और यह विकास कब तक चलता रहेगा? इसकी कोई अंतिम परिणति है या नही, तो वह क्या है। विकासवाद अंतिम सत्य नहीं है। अधिक से अधिक वह एक देशीय सत्य हो सकता है। अंतिम दर्शन तो भारतीय दर्शन है। जिसमें उचित स्थान विकासवाद को भी मिला है और आत्मा एवं शरीर की पृथक सत्ता व पुनर्जन्म सभी भारतीय मनीषियों ने स्वीकार किया है और हमारे आचार्यो के अतिरिक्त अनेक महापुरूषों और जातियों ने, जिनमें से कुछ के नाम नीचे दिये जाते हैं-

 

  1. पाईथागोरस प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक एवं गणितज्ञ।
  2. हेनरी फार्ड प्रसिद्ध अमेरिकन धनकुबेर एवं उद्योगपति।
  3. गाल जाति वर्तमान आयरलैण्ड वासियों के पूर्वज। इनमें सती की प्रथा भी थी।
  4. इंग्लैण्ड के वेल्स प्रदेश के निवासियों के पूर्वज जो पुनर्जन्म, निर्वाण वेदांत, ज्योतिष और देवी देवताओं तथा यज्ञ में विश्वास रखते थे। इनका कहना था कि

ष् लवन सपअमक दक कपमक उंदल जपउमे नदजपस लवन मतम मक बसमंद व नउंद पससे दक उमदजंस पउचनतपजलण्ष्

जब तक मनुश्य पाप और वासनाओं से मुक्त नही हो जाता तब तक वह बार-बार जन्म मरण को प्राप्त होता रहता है। यह जाति बड़ी विद्याव्यसनी थी। इनके बड़े-बड़े पुस्तकालय एवं विद्यालय थे। लगभग 4000 वर्ष तक इस जाति की तूती बोली। जब रोमन लोगों ने (60 ई0 पू0 लगभग) इन पर आक्रमण करके इनके पुस्तकालय तथा विद्यालय फूक डाले और इनका हत्याकांड आरंभ कर दिया तो वे नार्वे तथा आइसलैंड भाग गये। ये लोग अब से 6000 वर्ष पूर्व दक्षिणी एशिया से चलकर मिश्र, यूनान, फ्रांस होते हुये इंग्लैंड पंहुचे थे।

संतान प्राप्ति के लिये शास्त्रीय उपाय ‘संतानगोपाल मंत्र

संतान प्राप्ति के लिये शास्त्रीय उपायों में ‘संतानगोपाल मंत्र’ की साधना अत्यंत प्रभावशाली है। अतः संतान की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस मंत्र का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये। इस मंत्र का जप दो प्रकार से किया जाता है। एक बीज सहित और दूसरे बिना बीज मंत्र के। बीज सहित मंत्र शीघ्र फलदायी होता है। किन्तु इसे गुरू से दीक्षा लिये हुये व्यक्ति को ही करना चाहिये, बिना बीजाक्षरों के कोई भी कर सकता है। आगे बीज सहित संतानगोपाल मंत्र के अनुष्ठान की विधि दी जा रही है। यदि पाठक स्वयं न कर सके तो किसी विद्वान ब्राह्मण से यह अनुष्ठान करवा सकते हैं। इस मंत्र की सम्पूर्ण जप संख्या 100000 (एक लाख मंत्र) है। उसका दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण और तर्पण का दशांश मार्जन करना चाहिये। यदि बिना बीज मंत्र के साधक स्वयं जप करता है तब चैगुना संख्या में जप करने का शास्त्र निर्देश है। सर्वप्रथम निम्नांकित वाक्य पढ़कर विनियोग करे- अस्य श्रीसंतान गोपाल मंत्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छंद्ः, श्रीकृष्णो देवता, ग्लौं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अंगन्यास- ‘देवकीसुत गोविंद’ हृदयाय नमः (इस वाक्य की बोलकर दाहिने हाथ की मध्यमा, अनामिका और तर्जनी अंगुलियों से हृदय का स्पर्श करें)। ‘वासुदेव जगत्पते’ शिरसे स्वाहा’ (इस वाक्य को बोलकर सिर का स्पर्श करें)। ‘देहि में तनयं कृष्ण’ शिखयै वषट् (इस वाक्य को बोलकर दाहिने हाथ के अंगुठे से सिर का स्पर्श करें)। ‘त्वामहं शरणं गतः’ ( इस वाक्य को बोलकर दाहिनी हाथ के पाँचों उंगलियों से बायीं भुजा का एवं बायीं हाथ की पाँचों उंगलियों से दाहिनी भुजा का स्पर्श करें)। ‘ऊँ नमः’ अस्त्राय फट् (इस वाक्य को बोलकर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से पीछे की ओर ले जाकर दाहिनी ओर से आगे कि ओर ले आय और तर्जनी तथा मध्यमा उंगुलियों से बाँय हाथ की हथेली पर बजायें।

इसके पश्चात् निम्नांकित रूप से ध्यान करें-

 

वैकुण्ठाद्गतं कृष्णं रथस्थं करूणानिधिम्।

किरीटिसारथि पुत्रमानयंत्र परात्परम्।। 1 ।।

आदाय तं जलस्थं च गुरूवे वैदिकाय च।

अर्पयंतं महाभागं ध्यायेत् पुत्रार्थमच्यृतम्।। 2 ।।

‘पार्थसारथि अच्युत भगवान् श्रीकृष्ण करूणा के सागर हैं। वे जल में डूबे हुए गुरू पुत्र को लेकर आ रहें है। वे वैकुण्ठ से अभी-अभी पधारे हैं और रथ पर विराजमान हैं। अपने वैदिक गुरू सांदीपनि को उनका पुत्र अर्पित कर रहें है- साधक पुत्र की प्राप्ति के लिए इस रूप में महाभाग भगवान् श्रीकृष्ण का चिंतन करें’।

मूल मंत्र (बीज सहित) –

ऊँ श्रीं ह्नीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः।।’

इस मंत्र का भावार्थ इस प्रकार है- सच्चिदानंद स्वरूप, ऐश्वर्यशाली, कामनापूरक, सौभाग्य स्वरूप, देवकीनंदन! गोविंद! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरण में आया हुँ, आप मुझे पुत्र प्रदान करें।

आगे संतान गोपाल मंत्र बिना बीज मंत्र के भी दिया जा रहा है जिसे कोई भी साधक संकल्प लेकर स्वयं ही कर सकता है।

संतानगोपाल मंत्र- 2

विनियोग

अस्त श्रीसंतानगोपालमंत्रमंत्रस्य ब्रह्म ऋषिर्गायत्रीच्छंदः, श्रीकृष्ण देवता, क्लीं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अंगन्यास-

ग्लौं हृदयाय नमः। क्लीं श्शिरसे स्वाहा। ह्नीं शिखायै वषट्। श्रीं कवचाय हुम्। ऊँ अस्त्राय फट्।

ध्यान-

यांखचक्रगदापह्मं दधानं सूतिकागृहे।

अंके शयानं देवक्याः कृष्णं वंदे विमुक्तये।।

जो सूतिकार गृह में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये माता देवकी की गोद में सो रहें हैं, उन भगवान् श्री कृष्ण की मैं (संतान रूप में ) मोक्ष की प्राप्ति के लिए वन्दना करता हूँ।

बिना बीज का मूल मंत्र इस प्रकार है-

ऊँ नमो भगवते जगदात्मसूतये नमः’

(सम्पूर्ण जगत् जिनकी अपनी संतान है, उन भगवान् श्री कृष्ण को नमस्कार है) इसका चार लाख जप करना चाहिए।

 

फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या

फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या फैंगशुई एक प्राचीन वास्तु विद्या है जो आज पूरे विश्व में छाई हुई है फैंगशुई का अर्थ है विन्ड वॉटर (हवा और पानी) हवा ऊर्जा को चारों ओर वितरित करती है और पानी संचित करती है। ये दोनों ऊर्जाएं मनुष्य के जीवन पर प्रभाव डालती है अच्छी ऊर्जा (च्वेपजपअम म्दमतहल) उस परिवेश में रहने वालों को अच्छा स्वास्थ्य शांति तथा समृद्धि प्रदान करती हैं। फैंगशुई को अपनाकर इस नकरात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के लिए क्र्योस (उपाय) का सहारा लेते हैं।

वास्तव में यह एक जीवनशैली (लाइफ स्टाइल) है जो पूर्ण रूप से हमारे जीवन से जुड़ी हुई है हमारे आस-पास की चीजों का स्थान परिवर्तन करके जीवन में सुधार लाया जा सकता है। फैंगशुई को चीन की वास्तुकला भी कहते हैं। हजारों वर्षो से चीन के लोग वातावरण में मौजूद इन सकारात्मक एवं नकारात्मक शक्तियों का सफलता पूर्वक प्रयोग करके व उन्हें ठीक दिशा में प्रवाहित करके उनके माध्यम से अपने जीवन में खुशहाली प्राप्त करने में सफल रहे हैं।

यदि आप भी अपने आस-पास की वस्तुओं को ठीक जगह पर स्थापित कर लें जो प्रकृति के साथ अच्छा तालमेल बिठाने में समर्थ होंगे। दोषपूर्ण फैंगशुई जीवन में असामंजस्यता तथा परेशानियों का कारण हो सकती है। वास्तुशास्त्र के अनुसार भवन निर्माण से पहले दिशाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है या निर्मित भवन को तोड़कर उसमें सुधार लाया जा सकता है जबकि फैंगशुई में आप सिर्फ अपने आस-पास की वस्तुओं को ठीक जगह स्थापित करके या क्योर लगा कर इसका लाभ उठा सकते है सही दिशा में संबंधित क्योर लगाकर हम उस दिशा से संबंधित परेशानियों का निवारण कर सकते हैं।

 

उपनिषद् में शक्ति का रहस्य

उपनिषद् में शक्ति का रहस्य विश्व में जो कुछ है, वह व्यापक ब्रह्म है। ‘तैत्तिरीयोपनिषद्’’ ने ब्रह्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि जिसमें सारा विश्व पैदा होता है, पैदा होकर जीता है और जीकर जिसमें लय हो जाता है, उसी का नाम ब्रह्म है। इस बात को समझाते हुए गुरूदेव ने पहले शिष्य को यह बताया कि ‘अन्न ब्रह्मेति व्यजानत’ अर्थात् अन्न ब्रह्म है। देह अन्न से पैदा हुआ, अन्न से जीता है और अन्न में लय होता है। अतएव अन्न को ब्रह्म मानो। शिष्य को इस व्याख्या से संतोष न हुआ, तब गुरूजी ने ‘प्राणं ब्रह्मोति व्यजानत’ कहा अर्थात प्राण ब्रह्म है। देह प्राण से पैदा हुआ, प्राण से जीता और प्राण में लय होता है। शिष्य को इस व्याख्या से भी सन्तोष न हुआ। फिर गुरूजी ने ‘मन ब्रह्मेति व्यजानत’ बताया अर्थात मन ब्रह्म है। शिष्य को इस व्याख्या से भी सन्तोष न हुआ। तब गुरूजी ने ‘विज्ञान’ को और पीछे ‘आन्नद’ को ब्रह्म बताया, लेकिन जब इतने सारे ब्रह्म बताए गये, तब हम किसको सचमुच ब्रह्म मानें? ब्रह्म की उक्त व्याख्याओं से हमें सन्तोष नहीं होता।

‘माण्डूक्योपनिषद्’ ने आत्मा की चार अवस्थायें बताई हैं-

  1. जाग्रत
  2. स्वप्न
  3. सुशुप्ति
  4. तुरीय।

जाग्रत् और स्वप्न का अनुभव सबको होता है। सुषुप्ति अर्थात् गाढ़ निद्रा। तुरीय का अनुभव सबको नहीं होता। अतः उसे आत्मा की चैथी अवस्था कह कर उसका सारा वर्णन नकार में ही किया है। जब आत्मा की यह हालत है, तब ब्रह्म क्या वस्तु है, कैसे समझ में आये? आदि शंकराचार्य अपने शिष्य के साथ जंगल में जा रहे थे। रास्ते में एक पागल हाथी आता दिखाई पड़ा। सबलोग इधर-उधर हो गये। हाथी के निकल जाने के बाद एक शिष्य ने गुरू से पूछा कि आप तो ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ बताते हैं। अतएव हम और हाथी सब ब्रह्म ही हैं। फिर हम सब हाथी को देखकर भाग क्यों गये? शंकराचार्यजी ने कहा कि ‘‘हाथी का आना, हमारा देखना और छिपना सभी ब्रह्म था।’’

इतना सोचने-विचारने के बाद जो कुछ है, यह मानने में नहीं आता। यदि कोई कहे कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’, तो मानना पड़ेगा कि ‘मैं’ और ‘ब्रह्म’ अलग-अलग वस्तु हैं, क्यो कि वस्तु और वस्तु का मालिक दोनों एक नहीं होते। सभी तरह से ब्रह्म का विचार करने पर यही ज्ञात होता है कि जो कुछ है, वह अकेला ब्रह्म नहीं है, अपितु साथ में कुछ और भी है। वह क्या है, यह जानना चाहिये।

जिस द्रव में से नवीन पदार्थ प्राप्त हो या पैदा हुआ पदार्थ फिर द्रव बनकर अणु-अणु में मिल जाये, उस द्रव का नाम ‘तत्त्व’ है। उदाहरण के लिये पृथ्वी में एक ही बीज को जल, वायु और अग्नि मिलने से वह अवकाश में प्रस्फुटित होकर पेड़ बनता है और पेड़ में से रूई और कपड़ा भी बनता है। वह कपड़ा यदि जल गया, तो कहा जायेगा कि बीज ने जो रूपक धारण किया था, वह अग्नि में जलकर तत्त्व, तत्त्व में मिल गया। तत्त्व अर्थात् भू, जल अग्नि, वायु और आकाश। प्रत्येक तत्व में दूसरे चार तत्वो की कुछ-न-कुछ मिलावट विद्यमान है। तत्त्व अणु में से पैदा होते हैं। अणु में भयंकर शक्ति है।

अणु-बम कितनी हानि कर सकता है, उससे लोग अपरिचित नहीं हैं। अणु में छिपी हुई भयंकर शक्ति क्या है, उसे जानना चाहिए।

विश्व अनन्त है और अनंत होने से प्रत्येक बिन्दु मध्य बिन्दु है। जो चीज शान्त है, उसका मध्य बिन्दु एक ही होगा। यदि अनन्त का बिन्दु एक ही माना जाये, तो अनंत शान्त हो जायगा। अतएव अनंत का प्रत्येक बिन्दु चिद्-बिन्दु है। उसमें जीवन्त चिद्-शक्ति है। उस प्रत्येक बिन्दु या अणु में भयंकर शक्ति है। तो फिर उस शक्ति को ही विश्व की आदि-शक्ति क्यों न माना जाये ?

कठोपनिषद्’’ में यम ने नचिकेता को बताया कि सूर्य विश्व की आँखें हैं, लेकिन आँख में रोग होने से सूर्य में रोग नहीं होता। इसी तरह प्राणी मात्र की अन्तरात्मा एक होते हुए भी व्यक्तिगत दुःख से आत्मा कुछ नहीं बिगड़ता अर्थात आत्मा को कुछ भी कष्ट नहीं होता। यम ने ब्रह्म का भाव न बताकर सूर्य में विद्यमान शक्ति का भाव बताया। सूर्य की गुरूत्वाकर्षण-शक्ति से नवग्रह नियमानुसार सूर्य के चारों ओर बराबर घुम रहें हैं। तब सोच सकते हैं कि सूर्य में कितनी शक्ति है। सूर्य में जो शक्ति हैं, वह अणु में भी है क्योंकि सूर्य अणु से बनता है।

ईशावास्योपनिषद्’ कहता है कि जो आदमी केवल विद्या की उपासना करता है, वह अंधकार में प्रवेश करता है और जो केवल अविद्या की उपासना करता है, वह भी अंधकार में पड़ता है। जैसे केवल विद्या या अविद्या को मानने से अपना काम नहीं चलता, वैसे ही न अकेले ब्रह्म को मानने से हमारा काम चलेगा, न अकेली शक्तिो मानने से।

यह सब सोचने पर मानना पड़ेगा कि विश्व में दो चीजें होनी चाहिये-एक व्यापक ब्रह्म और दुसरी शक्ति। व्यापक ब्रह्म शिव है और बाकी जो कुछ है, वह शक्ति है। उस शक्ति को कुछ भी नाम दीजिये। चाहे चिद्शक्ति कहो या आदिशक्ति कहो या विश्व की परमेश्वरी ही क्यों न कह डालो।

यह मैं नहीं कहता पुराणों में लिखा है

पार्वती शिव से बोलीं- प्रभो! यदि आप प्रसन्न हैं तो योगी योगाकाशजनित वायु को जिस प्रकार प्राप्त होता है, वह सब मुझे बताइये।

भगवान शिव ने कहा- सुन्दरी! इससे पूर्व मैने योगियों के हित की कामना से कालपर विजय प्राप्त करने की विधि का वर्णन किया है। योगी किस प्रकार वायु का स्वरूप धारण करता है, यह भी बताया है। अब और भी बताता हूँ- इससे पूर्व बताई गई विधि से योगशक्ति के द्वारा मृत्यु-दिवस को योगी जानकर और प्राणायाम में तत्पर हो जाय। ऐसा करने पर वह आधे मास में ही आनेवाले काल को जीत लेता है। हृदय में स्थित हुई प्राणवायु सदा अग्नि को उद्दीप्त करनेवाली है। उसे अग्नि का सहायक बताया गया है। वह वायु बाहर और भीतर सर्वत्र व्याप्त और महान है। ज्ञान, विज्ञान और उत्साह- सबकी प्रवृति वायु से ही होती है। जिसने वायु को जीत लिया, उसने इस सम्पूर्ण जगत पर विजय पा ली।

साधक को चाहिये कि वह जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु को जीतने की इच्छा से सदा धारणा में स्थित रहे; क्योकि योगपरायण योगी को भलीभाँति धारणा और ध्यान में तत्पर रहना चाहिये। जैसे लोहार मुख से धौकनी को फूक-फूंककर उस वायु के द्वारा अपने सब कार्य सम्पन्न करता है, उसी प्रकार योगी को प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये। प्राणायाम के समय जिसका ध्यान किया जाता है, वे आराध्यदेव परमेश्वर सहस्त्रों मस्तक, नेत्र, पैर और हाथों से युक्त हैं। तथा समस्त ग्रन्थियों को आवृत करके उनसे भी दस अंगुल आगे स्थित हैं। आदि में व्याहृति और अंत में शिरोमंत्र सहित गायत्री का तीन बार जप करें और प्राणवायु को रोके रहें। प्राणों के इस आयाम का नाम प्राणायाम है। चन्दमा और सूर्य आदि ग्रह जा-जाकर लौट आते हैं। परंतु प्राणायाम पूर्वक ध्यानपरायण योगी जाने पर आज तक नहीं लौटे हैं। (अर्थात्- मुक्त हो गये हैं)। देवी! जो द्विज सौ वर्षों तक तपस्या करके कुशों के अग्रभाग से एक बूंद जल पीता है, वह जिस फल को पाता है, वही ब्राह्मणों को एकमात्र धारण अथवा प्रणायाम द्वारा मिल जाता है। जो द्विज प्रातः उठकर एक प्राणायाम करता है, वह अपने सम्पूर्ण पाप को शीध्र ही नष्ट कर देता है और ब्रह्मलोक को जाता है। जो आलस्यरहित होकर सदा एकांत में प्राणायाम करता है, वह जरा और मृत्यु को जीतकर वायु के समान गतिशील हो आकाश में विचरता है। वह सिद्धों के स्वरूप, कांति, मेधा, पराक्रम और शौर्य को प्राप्त कर लेता है। उसकी गति वायु के समान हो जाती है। तथा उसे स्पृहणीय सौख्य एवं परम सुख की प्राप्ति होती है।

देवेश्वरी! योगी जिस प्रकार वायु से सिद्धि प्राप्त करता है, वह सब विधान मैने बता दिया है। अब तेज से जिस तरह वह सिद्धि लाभ करता है, उसे भी बता रहा हूँ। जहां दूसरे लोगों की बातचीत का कोलाहल न पहुँचता हो, ऐसे शांत एकांत स्थान में अपने सुखद आसन पर बैठकर चन्द्रमा और सूर्य (वाम और दक्षिण नेत्र) की कांति से प्रकाशित मध्यवर्ती देश भ्रूमध्यभाग में जो अग्नि का तेज अव्यक्त रूप से प्रकाशित होता है, उसे आलस्यरहित योगी दीपकर रहित अंधकारपूर्ण स्थान में चिन्तन करने पर निश्चय ही देख सकता है- इसमें संशय नही है। योगी हाथ की अंगुलियों से यत्नपूर्वक दोनो नेत्रों को कुछ-कुछ दबाये रक्खे और उनके तारों को देखता हुआ एकाग्र चित्त से आधे मुहूर्त तक उन्हीं का चिंतन करे। तदन्तर अंधकार में भी ध्यान करने पर वह उस ईश्वरीय ज्योति को देख सकता है। वह ज्योति सॅद, लाल, पीली, काली तथा इन्द्रधनुष के समान रंगवाली होती है। भौंहों के बीच में ललाटवर्ती बालसूर्य के समान तेजवाले उन अग्निदेव का साक्षात्कार करके योगी इच्छानुसार रूप धारण करने वाला हो जाता है। तथा मनोवांछित शरीर धारण करके क्रीड़ा करता है। वह योगी कारण तत्व को शांत करके उसमें आविष्ट होना, दूसरे के शरीर में प्रवेश करना, अणिमा आदि गुणों को पा लेना, मन से ही सब कुछ देखना, दूर की बातों को सुनना और जानना, अदृष्य हो जाना, बहुत से रूप धारण कर लेना तथा आकाश मार्ग में विचरना इत्यादि सिद्धियों को निरंतर अभ्यास प्रभाव से प्राप्त कर लेता है। जो अंधकार से परे और सूर्य के समान तेजस्वी है, उसी इस महान् ज्योतिर्मय पुरूष (परमात्मा) को मैं जानता हूँ। उन्हीं को जानकर मनुश्यकाल या मृत्यु को लाँघ जाता है। मोक्ष के लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

देवी! इस प्रकार मैने तुमसे तेजस्तत्व के चिन्न की उत्तम विधि का वर्णन किया है, जिससे योगी काल पर विजय पाकर अमरत्व को प्राप्त कर लेता है।

देवी! अब पुनः दूसरा श्रेष्ठ उपाय बताता हूँ, जिससे मनुश्य की मृत्यु नहीं होती।

देवी! ध्यान करने वाले योगियों की चैथी गति साधना बताई जाती है। योगी अपने चित्त को वश में करके यथायोग्य स्थान में सुखद आसन पर बैठे। वह शरीर को ऊँचा करके अंजली बांधकर चोंचकी-सी आकृति वाले मुख के द्वारा धीरे-धीरे वायु का पान करें। ऐसा करने पर क्षणभर में तातु के भीतर स्थित जीवनदायी जल की बूँदें टपकने लगती हैं। उन बूँदों को वायु के द्वारा लेकर सूँघे। वह शीतल जल अमृत स्वरूप है। जो योगी उसे प्रतिदिन पीता है, वह कभी मृत्यु के आधीन नहीं होता। उसे भूख-प्यास नहीं लगती। उसका शरीर दिव्य और तेज महान् हो जाता है। वह बल में हाथी के समान तथ वेग में घोडे के समान हो जाता है। उसकी दृष्टि गरूड़ के समान तेज हो जाती है और उसे दूर की बातें भी सुनाई देने लगती हैं। उसके केश काले और घुंघराले हो जाते है तथा अंग की कांति गंधर्व एवं विद्याधरों की समानता करती है। वह मनुश्य सौ वर्ष तक जीवित रहता है तथा अपनी उत्तम बुद्धि के द्वारा बृहस्पति के तुल्य हो जाता है। उसमें इच्छानुसार विचरने की शक्ति आ जाती है और वह सदा सुखी रहकर आकाश मार्ग में विचरण करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।

देवी! अब मृत्यु पर विजय पाने की पुनः तीसरी विधि बता रहा हूँ, जिसे देवताओं ने भी प्रयत्नपूर्वक छिपा रक्खा है, तुम उसे सुनो- योगी पुरूष अपनी जिव्हा को मोड़कर तालु में लगाने का प्रयत्न करें। कुछ काल तक ऐसा करने से वह क्रमशः लम्बी होकर गले की घाँटी तक पहुंच जाती है। तदन्तर जब जिव्हा से गले की घाँटी सटती है, तब शीतल सुधा का स्त्राव करती है। उस सुधा को जो योगी सदा पीता है, वह अमरत्व को प्राप्त होता है।

(शिव पुराण- अध्याय 27)

पार्वती भगवान शिव से बोलीं- भगवन! मैने आपकी कृपा से सम्पूर्ण मत जान लिया है। देव! जिन मंत्रों द्वारा जिस विधि से जिस प्रकार आपकी पूजा होती है, वह भी मुझे ज्ञान हो गया है। किंतु प्रभों! अब भी कालचक्र के सम्बन्ध में एक संशय है कृपया मेरा यह संशय दूर करें। देव! मृत्यु का क्या चिन्ह है? आयु का क्या प्रमाण है? नाथ यदि मैं आपकी प्रिया हूँ तो मुझे ये सब बातें बतायें।

महादेव जी ने कहा- प्रिये! यदि अक्समात् शरीर सब ओर से पीला पड़ जाये और ऊपर से कुछ लाल दिखे, तो यह जानना चाहिये कि उस मनुश्य की मृत्यु छः महीने के भीतर हो जायेगी। शिवे! जब मुहँ, कान, नेत्र और जिव्हा का स्तम्भव हो जाये, तब भी छः महीने के भीतर ही मृत्यु जाननी चाहिये। भद्रे! जो रूरू मृग के पीछे होनेवाली शिकारियों की भयानक आवाज को भी जल्दी नहीं सुनता, उसकी मृत्यु भी छः महीने के भीतर ही जाननी चाहिये। जब सूर्य, चन्द्रमा या अग्नि के सानिध्य से प्रकट होनेवाले प्रकाश को मनुश्य नहीं देखता, उसे सब कुछ काला-काला अंधकारमय ही दिखाई देता है, तब उसका जीवन छः मास से अधिक नहीं होता। देवी! प्रिय! जब मनुश्य का बायां हाथ लगातार एक सप्ताह तक फड़कता ही रहे, तब उसका जीवन एक मास ही शेष है- ऐसा जानना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। जब सारे अंगों में अंगड़ाई आने लगे और तालू सूख जाये, तब वह मनुश्य एक मास तक ही जीवित रहता है-इसमें संशय नहीं है। त्रिदोष में जिसकी नाक बहने लगे, उसका जीवन 15 दिन से अधिक नहीं चलता। मुख और कण्ठ सूखने लगे तो यह जानना चाहिये कि छः महीने बीतते-बीतते इसकी आयु समाप्त हो जायेगी। भागिनी! जिसकी जीभ फूल जाये और दांतों से मवाद निकलने लगे, उसकी भी छः महीने के भीतर मृत्यु हो जाती है। इन चिन्हों से मृत्युकाल को समझना चाहिये।

सुन्दरी! जल, तेल, घी तथा दर्पण में जब भी अपनी परछाईं न दिखाई दे या विकृत दिखाई दे, तब कालचक्र के ज्ञाता पुरूष को यह जान लेना चाहिये कि उसकी भी आयु छः मास से अधिक नहीं है। देवेश्वरी! अब दूसरी बात सुनों, जिससे मृत्यु का ज्ञान होता है। जब अपनी छाया को सिर से रहित देखें अथवा अपने को छाया से रहित पायें, तब वह मनुश्य एक मास भी जीवित नहीं रहता।

पार्वती! ये मैने अंगों में प्रकट होने वाले मृत्यु के लक्षण बताये हैं। भदे्र! अब बाहर प्रकट हाने वाले लक्षणों का वर्णन करता हूँ, सुनों। देवी! जब चन्द्रमण्डल या सूर्यमण्डल प्रभाहीन एवं लाल दिखायी दे, तब आधे मास में भी मनुश्य की मृत्यु हो जाती है। अरूंधती, महायाना, चन्द्रमा- इन्हें जो न देख सके अथवा जिसे ताराओं का दर्शन न हो, ऐसा पुरूष एक मास तक जीवित रहता है। यदि ग्रहों का दर्शन होने पर भी दिशाओं का ज्ञान न हो- मन पर मूढता छाई रहे तो छः महीने में निश्चय ही मृत्यु हो जाती है। यदि उतथ्य नामक तारा का, धु्रव का अथवा सूर्यमण्डल का भी दर्शन न हो सके, रात में इन्द्रधनुष और मध्याहन में उल्कापात होता दिखाई दे तथा गीद्य और कौये घेरे रहें तो उस मनुश्य की आयु छः महीने से अधिक नहीं होती।

यदि आकाश में सप्तऋषि तथा स्वर्गमार्ग (छाया पथ) न दिखाई दे तो कालज्ञ पुरूषों को उस पुरूष की आयु छः मास ही शेष समझनी चाहिये। जो अक्समात् सूर्य और चन्द्रमा को राहु से ग्रस्त देखता है और सम्पूर्ण दिशायें जिसे घूमती दिखाई देती हैं, वह अवश्य ही छः महीने में मृत्यु को प्राप्त होता है। यदि अक्समात् नीली मक्खीयाँ आकर पुरूष को घेर लें तो वास्तव में उसकी आयु एक मास ही शेष जाननी चाहिये। यदि गीध, कौआ अथवा कबूतर सिर पर चढ़ जाये तो वह पुरूष शीघ्र ही एक मास के भीतर मर जाता है, इसमें संशय नहीं है।

 

 

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण भारतीय ऋषियों ने 16 संस्कारों के रूप में जो अनुशासित व्यवस्था व्यक्तित्व निर्माण के लिये रूपान्तरित की है, उसमें विवाह संस्कार का स्थान महत्वपूर्ण है। विवाह पीढ़ी-विस्तार का समाज सम्मत हेतु है। विवाह विभिन्न सभ्यताओं, सुसंस्कृतियों, संस्कारों, विचार धाराओं और भाव धाराओं के सम्पर्क का भी हेतु है।

विवाह नामक रसपूर्ण संस्कार के प्रति व्यक्ति कि उत्कंठा, जिज्ञासा और लालसा सहज ही है। किन्तु नियति सबके प्रति समान रूप से उदार नहीं होती। आज उचित समय पर विवाह सम्पन्न होना एक दुःसाध्य प्रक्रिया हो गई है- विशेषतः कन्या पक्ष के संदर्भ में। ग्रहों का अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन पर निर्विवाद रूप से पड़ता है। इस संदर्भ में आस्था अनास्था से कोई अन्तर नही पड़ता। जैसे किसी बंद कमरे में बैठकर सूर्य के आलोक अथवा तेज का प्रतिवाद नही किया जा सकता उसी प्रकार ज्योतिष भाग्य और ईश्वर में अश्रद्धा उसके मौलिक प्रभाव को क्षति नही पहुँचाती। इस सत्य को निरन्तर ध्यान में रखना चाहिए। व्यक्ति के जीवन में जन्म के समय ग्रहों की स्थिति एक प्रमुख भूमिका रखती है।

समस्त जीवन इनकी शुभता-अशुभता, सुसंयोगिता- कुसंयोगिता और प्रभुता-क्षीणता के द्वारा निर्धारित होता है। व्यक्ति आजीवन अपनी नियति से संघर्ष करता है और पराभूत होने का दर्शन सीखता है। कन्या के विवाह में अनपेक्षित विलम्ब देखकर अभिभावक चिन्ता के महासमुद्र में निमग्न हो जाते हैं।

अपनी समस्त शक्ति और सामाजिक परिचय का उपयोग करके भी वे अपनी कन्या के लिए उपयुक्त वर नहीं प्राप्त कर पाते। जीवन ऐसे अभावों का क्रूर साक्षात्कार है।

जीवन के अभावों की पूर्ति के लिए मानव ने तंत्र-मंत्र-यंत्र का भी समय समय पर प्रयोग-उपयोग किया है। सर्वप्रथम मंत्र के अर्थ विस्तार की संक्षिप्त विवेचना अनिवार्य है। वैदिक ऋचाओं से दैवी शक्तियों की स्तुतियों, यज्ञादि के लिए विचरित पदों एवं शब्द प्रतीकों तक मंत्र की एक सुसंस्कृत परम्परा प्रवाहमान है। मंत्र शब्द की सामथ्र्य का चरणतम केन्द्रियभूत आह्नान है। ‘मंत्र’ शब्द मंत्रि गुप्तभाषणे’’ धातु से घ् प्रत्यय द्वारा निष्पन्न होता है जिसका तात्पर्य है रहस्य। वह रहस्य जो देवोपम है किन्तु मानवीय अनुभूति का विषय है। तंत्र साहित्य के मतानुसार वह प्रत्येक शब्द मंत्र है जो देवता की स्तुति में निवेदित है। श्रुति, स्मृति, पुराण, उपनिषद, आगम और निगम सभी मंत्रों के उल्लेख से परिपूर्ण हैं। यह सत्य है कि वैदिक मंत्र जितने शक्तिसम्पन्न हैं, उनकी साधना उतनी हीं दुरूह और दुष्कर है। इसलिए वेदोक्त मंत्रों के स्थान पर तंत्र शास्त्र आज किंचित् सहज समझा जाता है। इस तथ्य के विस्तार में जाना इसलिए अप्रासंगिक होगा क्योंकि इस लेख की केन्द्रिय वस्तु है कि विवाह योग्य युवक या कन्या के विवाह में विलम्ब होने पर किन मंत्रो के प्रयोग से आशानुकूल सफलता प्राप्त होगी। अनुभव से सिद्ध हो चुका है कि युवक या कन्या के विवाह मे आने वाली अनेकानेक बाधाओं की शांति मंत्रशक्ति से सुनिश्चित हो सकती है।

जन्मांग में शनि की स्थिति, शनि द्वारा प्रचालित स्थिति, राशियाँ, नक्षत्र और भाव आदि का अध्ययन करना चाहिए। यदि शनि शुक्र से युक्त होकर, सूर्य अथवा चन्द्र किसी एक ग्रह पर दृष्टि निक्षेप करता हो तो विवाह मे विलम्ब होता है। यदि सूर्य अथवा चन्द्र या दोनों संयुक्त रूप से शनि के नवांश में स्थित हों और शुक्र भी शनि से अक्षिप्त हो तो विवाह में आशा के विपरीत विध्न उपस्थित होतें हैं। सप्तम भाव अथवा लग्न के पाप ग्रहक्रांत होने पर पापकर्तरि योग की स्थापना होती है जिसके परिणाम स्वरूप दाम्पत्य अनेकानेक संकटो से घिर जाता है। लग्न सप्तम भाव अथवा इसके अधिपति ग्रह यदि सूर्य और शनि, शनि और मंगल, शनि और राहु, आकर सूर्य जैसे क्रूर ग्रहों से आबद्ध होते हैं तो विवाह की दिशा में विलम्ब अथवा निषेध जैसे संकेत प्राप्त होते हैं। विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब तब भी होता है जब लग्नाधिपति, सप्तमाधिपति, चन्द्रराशि-अधिपति और स्वयं चन्द्र शनि से दृष्ट, युक्त अथवा द्वादश भावस्थ होते हैं। वक्री ग्रह की सप्तम भाव अथवा सप्तम भावेश पर दृष्टि अथवा स्थिति या युति विवाह में बाधा उत्पन्न करती हैं। इन्हीं स्थितियों में द्वितीय भाव या शुक्र हो तो विवाह विलम्बित होता है। पंचमेश और सप्तमेश का परस्पर परिवर्तन योग स्थापित हो अथवा राहु और शुक्र सप्तम अथवा नवम भाव में हों तथा क्रूर ग्रह की दृष्टि का कुसंयोग हो तो विवाह में ज्योतिषीय दृष्टि से विलम्ब की घोषणा की जा सकती है।

 

Diwali Pooja Muhurat 2016

diwali pooja muhurat 2016

Diwali Pooja Muhurat 2016

30 अक्तूबर 2016 दीपावली पर्व है। दीपावली की रात्रि प्रदोषकाल में महालक्ष्मी पूजन (Diwali Pooja Muhurat 2016) की परम्परा आदिकाल से चली आ रही है। इस दिन सूर्य व चन्द्रमा तुला (शुक्र की राशि) में विचरण कर रहे होते हैं।

कार्तिक अमावस्या की रात्रि स्थिर लग्न (वृष या सिंह) में महानिशीथ काल में महालक्ष्मी का पूजन करने से माता लक्ष्मी साधक के घर स्थाई निवास करती हैं।

इस वर्ष महालक्ष्मी पूजन MahaLaxmi Diwali Pooja Muhurat 2016 का शुभ तथा विशेष मुहूर्त सॉय 18:28 से आरम्भ होकर 20:22 तक रहेगा।

इस दिन सॉय 18:28 से 20:22 तक के समय में अमावस्या तिथि अंतर्गत वृष लग्न तथा शुभ, अमृत तथा चर का चौघडिया का शुभ योग बना है।

स्थिर लग्न के मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन करने से धन-धान्य स्थिर रहता है। इस मुहूर्त में दीपदान, गणपति सहित महालक्ष्मी पूजन, कुबेर पूजन, बही-खाता पूजन तथा धर्मस्थलों में और अपने घर में दीप प्रज्जवलित करना चाहिये।

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दीपावली पूजन तथा इस रात्रि में की जाने वाली विशेष साधनाओं का विस्तार पूर्वक विवरण जानने के लिये देखें गुरूजी द्वारा प्रकाशित अॉनलाईन ज्योतिषीय मासिक पत्रिका aapkabhavishya यह पत्रिका www.shukracharya.com पर नि:शुल्क उपलब्ध है।

इस के अतिरिक्त AapKaBhavishya.in पर भी गुरूजी (डा. आर.बी.धवन) के ज्योतिषीय लेख भी आप पढ़ सकते हैं।

Santaan Prapti Upaya for Diwali – इस दीपावली करें संतान प्राप्ति उपाय

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Santaan Prapti Upaya संतान प्राप्ति उपाय (एक दिवसीय दीपावली साधना प्रयोग)

कुण्डली में संतानोत्पत्ति योग न हो अथवा अनेक बार गर्भ हानि होती रही हो या संतान दीघार्यु नहीं होती हो तो उसके लिए यह संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya महत्वपूर्ण है। इस साधना प्रयोग को दीपावली की रात्रि में संतान की इच्छा करने वाली महिला के संपन्न करने से संतान का योग प्रबल होकर एक वर्ष में संतानोत्पत्ति अवश्य होती है। और वह संतान आज्ञाकारी होती है। इस प्रकार के प्रयोग से गृहस्थ जीवन अनुकूल एवं सुखदायी बन जाता है।

संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya के लिए साधिका को चाहिए कि वह दीपावली की रात्रि में स्नानादि कर पीले वस्त्र धारण कर पूर्व की तरफ मुख कर के पीले आसन पर बैठ जाएं सामने लकड़ी की चौकी पर एक थाली में चावल से त्रिकोण बनाकर उसके मध्य में मोती पर बने अभिमंत्रित मुक्ता गणपति की स्थापना करें और फिर पंचोपचार (फूल, चावल, रोली, कलावा तथा धूप-दीप) से पूजा करके पुत्रजीवा की 108 दानों वाली माला से 51 माला अग्रलिखित मंत्र जप पूर्ण करें।

यही प्रयोग प्रत्येक माह शुक्ल पंचमी के दिन गर्भवती होने तक पुत्र की इच्छा रखने वाली महिला को दोहराना चाहिये। निश्चय ही उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। यही संतान प्राप्ति उपाय Santaan Prapti Upaya उस महिला का पति या घर का कोई अन्य सदस्य भी कर सकता है, परंतु उसको उस महिला के नाम का संकल्प अवष्य लेना होगा। यदि कोई साधक-साधिका किसी दूसरे के लिए प्रयोग करना चाहे तो संकल्प ले लें कि ‘मैं यह प्रयोग अमुक व्यक्ति के लिए संपन्न कर रहा/रही हूँ।

मंत्र- ऊँ नमो नारायणाय पुत्र सन्तानं देही देहि ठः ठः स्वाहा।

जप पूर्ण होने पर गणपति जी को मिष्ठान का भोग लगवाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें। वह माला जल में विसर्जित कर दें। मुक्ता गणपति का चांदी में लॉकेट बनवाकर महिला को गले में धारण करना चाहिये।

साधना सामग्री– अभिमंत्रित मुक्ता गणपति (मोती पर बने गणपति), 108 दाने की पुत्रजीवा माला।

न्यौछावर राशि रू. 3100

संपर्क : Sukracharya, F-265, Street No. 22, Laxmi Nagar, Delhi-110092, Mob: 09810143516

Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

janmashtami 2016

Janmashtami 2016 जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण

आज जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के शुभअवसर पर आपके लिए प्रस्तुत है यह लेख।  सनातन दर्शन का यह मूलभूत सिद्धांत है कि जिस सत्चित् आनंद के आश्रय से यह दृश्यमान जगत अथवा यह धरातल संचालित हो रहा है, उसी के सहारे नियमित रूप से प्राणियों की आवश्यकता और रक्षा की व्यवस्था भी हो रही है।

भक्तों की धारणा है कि जब-जब विश्व व्यवस्था में अतिक्रमण होता है, तब-तब निराकार ईश्वर का एक अंश मूर्त साकार रूप ग्रहण करके व्यवस्था की पुनः स्थापना करने के लिये अवतीर्ण होता है, विश्व-व्यवस्था कि सुस्थिति, विश्वमंगल के लिये आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। इसलिये पूर्णब्रह्म परमेश्वर अवतार धारण कर अव्यवस्था जन्य भूमिभार का हरण करते हैं।

शास्त्रों ने ऐसे चैबीस अवतारों में श्रीराम और श्रीकृष्ण के अवतारों को विशेष महत्व दिया है। श्रीराम सोइ सच्चिदानंदघन रामा हैं और श्री कृष्ण भागवताकार के शब्दों में कृष्णस्तु भगवान स्वयम् हैं।

दोनों ने तत्कालीन अव्यवस्था एवं धर्मग्लानि को दूर करने के लिये अलौकिक शक्ति, अद्भुद् सौंदर्य और मर्यादा क्षमाशील विधान का आदर्श रूप उपस्थित कर विश्व व्यवस्था को सुचारूता दी। दोनों ने रावण, कंस आदि नृशंस राजाओं की उच्छृंखलता को परास्त कर साधु संरक्षण और लोक मंगल की विधायिनी व्यवस्था को संस्थापित किया।

यही कारण है कि इनकी अवतरण तिथियों को मनाये जाने वाले हमारे व्रत, उत्सव आदि में इनका प्रभाव अक्षुण्ण है और हम इनके आदर्श को समझने एवं व्यवहार में लाने के लिये इनकी जन्म जयंतियाँ प्रतिवर्ष व्रत के रूप में मनाते हैं। तथा लौकिक व परलौकिक लाभ उठाते हैं।

उसी परंपरा में हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रª के ये दो महान पर्व हैं- श्रीराम नवमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016)। श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण का आर्विभाव इसी तिथि को बुधवार के दिन रोहिणी नक्षत्र में अर्द्धरात्रि के समय हुआ था।

शास्त्रों में अष्टमी व्रत के दो भेद किये गये हैं- शुद्धा और विद्धा। सूर्योदय से सूर्योदय तक व्याप्त अष्टमी शुद्धा और सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच सप्तमी अथवा नवमी से युक्त होने पर विद्धा कही जाती है। फिर इनके तीन भेद किये जाते हैं:- समा, न्यूना और अधिका। इन भेदों के कारण अष्टमी अट्ठारह प्रकार की ही हो जाती है।

परंतु मान्यता की दृष्टि से तत्काल (अर्धरात्रि-व्यापिनी) अष्टमी ही ग्राह्य मानी गई है। ऐसी अष्टमी (Janmashtami) दो दिनों तक अथवा दोनों ही दिन न हो तो नवमी विद्धा ही ग्रहण करनी चाहिये।

इस वर्ष जन्माष्टमी का यह पर्व 25 अगस्त 2016 के दिन मनाया जाना शास्त्र सम्मत है, इस दिन सूर्याेदय के समय कृतिका नक्षत्र उदय होगा तदुपरांत दोपहर 12:10 से रोहिणी नक्षत्र आरम्भ होगा।

इस व्रत का महत्व शिव, विष्णु, ब्रह्मा भविष्य आदि पुराणों में तथा धर्मसिंधु, निर्णय-सिंधु आदि निबंध-ग्रंथों में प्रचूरता से वर्णित है। यह सर्वमान्य, पापघ्न तथा बाल, वृद्ध, कुमार, युवा अवस्था वाले नरों व नारियों के लिए अनुष्ठेय है।

कुछ शास्त्रों के अनुसार जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत नहीं करने वाले सक्षम नर-नारियों को पाप लगता है, और करने वालों के पापों की निवृत्ति एवं सुख की अभिवृद्धि होती है। इस व्रत में अष्टमी में उपवास और भगवत्पूजन का तथा नवमी में पारणा करने का विधान है।

अष्टमी (Janmashtami 2016) के एक दिन पहले लघु भोजन करना चाहिये। रात्रि में जितेंद्रिय रहना चाहिये। उपवास के दिन प्रातः स्नानादि नित्यकर्म करके सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि आकाष, आकाषचारी देवता और ब्रह्मा आदि को नमस्कार करके पूर्व या उत्तर मुख बैठें, हाथ में जल, फूल, कुष और गंध लेकर संकल्प करें-
ममाखिलपापप्रषमनपूर्वकं सर्वाभीष्टसिद्धये श्री कृष्णजन्माष्टमीव्रतमहं करिष्ये।

मध्याह्न समय में काले तिल डालकर उस जल से स्नान करके देवकी जी के लिये -सूतिकागृह नियत करें। उसे स्वच्छ व सुषोभित करके उसमें सूतिकोपयोगी सामग्री यथाक्रम रखें। गीतवाद्य का आयोजन करना और अधिक अच्छा होगा।

सूतिका गृह के सुःखद शोभन विभाग में सुंदर सुकोमल बिछौने के सुदृढ़ मंत्र पर अक्षतादि का मंडल बनवाकर उसपर शुभ कलष स्थापित करें एवं उसी पर सोना, चांदी, तांबा, पीतल, मणि, वृक्ष, मिट्टी या चित्ररूप भगवान की मूर्ति स्थापित करें।

मूर्ति में सद्यःप्रसूत श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और श्री लक्ष्मी जी उनके चरणस्पर्ष किये हुए हों- यह भाव प्रकाष्य होना चाहिए। फिर यथा समय भगवान के आर्विभाव की भावना कर वैदिक विधि पुरूष सुक्त से षोडशोपचार पूजन करना चाहिये।

यदि ऐसा करना संभव न हो तो पौराणिक अथवा संप्रदायानुसार दषोपचार या पंचोपचार आदि से पूजन करके आरती उतारनी चाहिये। इस पूजन में देवकी, वसुदेव, नंद, यषोदा और लक्ष्मीजी- इन सबका नाममंत्र से पूजन करना चाहिए।

अंत में निम्नांकित मंत्र से अध्र्य दें-
प्रणमे देवजननीं त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात्तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमोनमः।।
सपुत्राघ्र्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।।

फिर श्रीकृष्ण को पुष्पांजलि दें –
‘धर्माय धर्मेष्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’

इसके बाद जातकर्म-संस्कार, नालच्छेदन, षष्ठी पूजन और नामकरणादि करके चंद्रमा का भी पूजन करें-
‘सोमाय सोमेष्वराय सोमपतये सोमसम्भवाय सोमाय नमो नमः।’

फिर शंख में जल, कुष, कुसुम और गंध डालकर दोनों घुटने भूमि में टेककर प्रार्थना करते हुए अघ्र्य देवें-
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्र समुद्भव। गृहाणाध्र्यं शषांकेमं रोहिण्या सहितो मम।।
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषाम्पते। नमस्ते रोहिणीकान्त अघ्र्यं मे प्रतिगृह्यताम।।

रात्रि के शेष भाग को स्तोत्र-पाठादि अथवा संकीर्तन करते हुए व्यतीत करें। उसके बाद अगले दिन पूर्वार्द्ध में स्नानादिक नित्य क्रिया संपन्न कर जिस नक्षत्र तिथि या योग की प्रमुखता मानकर व्रत किया हो उसके अंत में भगवदर्पण पूर्वक अन्नादिक ग्रहण कर पारणा करें।

अष्टमी (Janmashtami 2016) व्रत करने से प्रणत क्लेषहारी वृन्दावनबिहारी भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और अपनी भक्त्ति देते हैं। अष्टमी व्र्रत का महत्त्व अत्यधिक है, अतः यह व्रत प्रत्येक को श्रद्धा व निष्ठा पूर्वक करना चाहिये।

आगे की पक्तियों में साधकों के लिये कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर एक इच्छा पूर्ति प्रयोग दिया जा रहा है, आप चाहें तो यह प्रयोग आप भी संपन्न कर सकते हैं, यह विशेष श्रेणी का काम्य प्रयोग है- इतनी बात निश्चित है कि श्री कृष्ण साधना हेतु किया गया कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता।

साधक अपना निर्णय स्वयं लेते हुए श्री कृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2016) के इस महान सिद्ध पर्व पर कोई न कोई साधना कर्म अवश्य संपन्न करें।

इच्छा पूर्ति गोविंद प्रयोग

इस साधना प्रयोग हेतु साधक 25 अगस्त 2016 रात्रि का प्रथम प्रहर बीत जाने के बाद साधना क्रम प्रारंभ करें। अर्द्ध रात्रि के साथ पूर्ण कर मंत्र जप संपन्न करे, इस साधना हेतु- श्री कृष्ण यंत्र तथा एक वैजयन्ती माला का होना आवश्यक हैं। अपने सामने सर्वप्रथम एक बाजोट पीले पुष्प बिछा दें और उन पुष्पों के बीचों बीच श्री कृष्ण यंत्र स्थापित करें, तथा इस यंत्र का पूजन केवल चंदन तथा केसर से ही संपन्न करें।
अपने सामने कृष्ण का एक सुंदर चित्र फ्रेम में मढ़वा कर स्थापित करें। चित्र को भी तिलक करें तथा प्रसाद स्वरूप पंचामृत साथ रख लें, जिसमें घी, दूध, दही, शक्कर तथा गंगाजल मिश्रित हो। इसके अतिरिक्त अन्य नैवेद्य भी अर्पित कर सकते हैं। इच्छा पूर्ति यंत्र के दोनों और दो-दो गोमती चक्र स्थापित करें, तथा उन्हें केसर का तिलक लगायें और दोनों हाथ जोड़ कर भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें, श्री कृष्ण का ध्यान कर उनकी आठ शक्तियाँ लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कांति, कीर्ति, तुष्टि एवं पुष्टि की मानसिक पूजा करें। प्रत्येक शक्ति के लिए निम्न मंत्र का उच्चारण करें-

ऊँ लक्ष्म्यै नमः।
ऊँ सरस्वत्ये नमः।
ऊँ रत्ये नमः।
ऊँ प्रीत्यै नमः।
ऊँ कान्त्ये नमः।
ऊँ कीत्र्ये नमः।
ऊँ तुष्टयै नमः।
ऊँ पुष्टये नमः।

शक्ति पूजन के पश्चात् इच्छापूर्ति मंत्र का जप प्रारंभ किया जाता है, इसकी भी विशेष विधि है, इसमें अपने दोनों हाथों में अक्षत् पुष्प और थोड़ा गंगाजल लें, और इच्छा पूर्ति मंत्र का उच्चारण करते हुए उसे अर्पित कर दें।
इच्छा पूर्ति मन्त्र- ऊँ श्रीं हृीं क्लीं कृष्णायै गोविन्दायै नमः।

इस प्रकार 108 बार इस मंत्र का उच्चारण इसी विधि से संपन्न करें यह प्रयोग पूर्ण हो जाने के बाद पहले से जलाकर रखे हुए दीपक, अगरबत्ती तथा धूप से आरती संपन्न कर प्रसाद ग्रहण करें। यदि कोई साधक 40 दिन तक प्रतिदिन एक माला मंत्र जप संपन्न करे तो उसका इच्छित कार्य अवश्य ही संपन्न हो जाता है।

नाग पंचमी उपाय Nag Panchami Muhurat & Upaya 2016

Nag Panchami Muhurat & Upaya 2016

Nag Panchami Muhurat & Upaya नाग पंचमी 7 अगस्त 2016

हमारे धर्म ग्रन्थों में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पूजा Nag Panchami Muhurat & Upaya का विधान है। पुराणें के अनुसार नागों की अनेक जातियाँ और प्रजातियाँ हैं। भविष्य पुराण में नागों के लक्षण, नाम, स्वरूप एवं जातियों का विस्तार से वर्णन मिलता है। मणिधारी तथा इच्छाधारी नागों का भी उल्लेख मिलता है।

श्रावणमास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) का त्यौहार नागों को समर्पित है। इस त्यौहार पर व्रत पूर्वक नागों का अर्चन-पूजन होता है। व्रत के साथ एक बार भोजन करने का नियम है। पूजा में पृथ्वी पर नागों का चित्रांकन किया जाता है। स्वर्ण, रजत, काष्ठ या मृत्तिका से नाग बनाकर पुष्प, गंध, धूप-दीप एवं विविध नैवेद्यों से नागों का पूजन होता है।

नाग अथवा सर्प पूजा की परम्परा पूरे भारतवर्ष में प्राचीनकाल से रही है, प्रत्येक गाँव में ऐसा स्थान अवश्य होता है, जिसमें नाग देव की प्रतिमा बनी होती है, और उसका पूजन किया जाता है।

नागपंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) के दिन को तो एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, इसके पीछे भी विशेष कारण है जिस का वर्णन आगे इसी लेख में करेंगे। समय के अनुसार मूल स्वरूप को अवश्य भुला दिया गया है।

क्या नाग देवता हैं?

जिस प्रकार मनुष्य योनि है, उसी प्रकार नाग भी योनि भी है, प्राचीन कथाओं में उल्लेख मिलता है कि पहले नागों का स्वरूप मनुष्य की भांति होता था, लेकिन नागों को विष्णु की अनन्य भक्ति के कारण वरदान प्राप्त होकर इनका स्वरूप बदल दिया गया, और इनका स्थान विष्णु की शय्या के रूप में हो गया, नाग ही ऐसे देव हैं, जिन्हें विष्णु का साथ हर समय मिलता है, और भगवान शंकर के गले में शोभा पाते हैं, भगवान भास्कर (सूर्य) के रथ के अश्व भी नाग का ही स्वरूप हैं।

भय एक ऐसा भाव है, जिससे कि बली से बली व्यक्ति, बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति, भी अपने को शक्तिहीन समझता है। कोई अपने शत्रुओं से भय खाता है, कोई अपने अधिकारी से भय खाता है, कोई भूत-प्रेत से भयभीत रहता है, भयभीत व्यक्ति उन्नति की राह पर कदम नहीं बढ़ा सकता है, भय का नाश, और भय पर विजय प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है, और नाग, सर्प देवता भय के प्रतीक हैं, इसलिए इनकी पूजा का विधान हर जगह मिलता है।

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नाग पंचमी रक्षात्मक प्रार्थना का पर्व-

आमतौर पर नागपंचमी (Nag Panchami Muhurat & Upaya) के पर्व को महिलाओं का ही पर्व माना जाता है, जो कि बिल्कुल गलत है, ‘‘नाग’’ वास्तव में कुण्डलिनी शक्ति के स्वरूप हैं, यह विशेष पर्व कुण्डलिनी शक्ति की उपासना का पर्व है। इस पर्व पर छोटा-मोटा कुण्डलिनी जागरण प्रयोग कर व्यक्ति किसी भी प्रकार की भय बाधा से मुक्ति पा सकता है।

इसका विधान भी अत्यंत सरल है-
नागपंचमी के दिन प्रातः जल्दी उठकर सूर्योदय के साथ सबसे पहले शिव पूजा संपन्न करनी चाहिए, शिव पूजा में शिवजी जी का ध्यान कर शिवलिंग पर दूध मिश्रित जल चढ़ायें और एक माला ‘ऊँ नमः शिवाय’ मंत्र का जप अवश्य करें। नाग पूजा में साधक अपने स्थान पर भी पूजा संपन्न कर सकता है, और किसी देवालय में भी।

किसी धातु का बना छोटा सा नाग का स्वरूप ले लें या फिर एक सफेद कागज पर नाग देवता का चित्र बना लें। इसे अपने पूजा स्थान में सामने सिंदूर से रंगे चावलों पर स्थापित करें, और एक पात्र में दूध नैवेद्य स्वरूप रखें। सर्वप्रथम अपने सदगुरू का ध्यान कर, सर्प भय निवृति हेतु प्रार्थना करें, तत्पश्चात नागदेवता का ध्यान करें कि-

हे नागदेव! मेरे समस्त भय, मेरी समस्त पीड़ाओं का नाश करें, मेरे शरीर में अहंकार रूपी विष को दूर करें, मेरे शरीर में व्याप्त क्रोध रूपी विष से मेरी रक्षा करें, इसके बाद नागदेव के चित्र पर सिंदूर का लेप करें, तथा इसी सिंदूर से अपने स्वयं के तिलक लगायें। इस के बाद अग्र लिखित मंत्र का 21 बार पाठ करते हुये नाग देवता तथा कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करें।

मंत्र-
जरत्कारूर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी। वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा ।।
जरत्कारूप्रिया स्तीकमाता विषहरेति च। महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता।।
द्वादशैतानि नमानि पूजाकाले तु यः पठेत्। तस्य नागभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

थोड़ी देर शांत होकर बैठ जायें तथा ऊँ नमः शिवाय का जप करते रहें, इससे भय का नाश होता है और बड़ी से बड़ी बाधा से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।

पूजन के बाद नागदेव के सम्मुख रखे दूध को प्रसाद स्वरूप स्वयं ग्रहण करें, यदि यह दूध किसी अस्वस्थ व्यक्ति को पिलाया जाये, तो उसे दिन-प्रतिदिन स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होगा। यदि कोई किसी पुराने रोग से पीड़ित हो तो यह प्रयोग 7 दिन तक करें, लेकिन पूजन से पहले अस्वस्थ व्यक्ति के नाम से संकल्प अवश्य लें। इस पूजा का प्रभाव इतना अनुकूल रहता है कि विशेष कार्य पर जाते समय नागदेव का ध्यान कर, यदि आप प्रबल से प्रबल शत्रु के पास भी चले जाते हैं, तो वह शत्रु आप से सत व्यवहार ही करेगा, हानि देने की बात ही दूर रही।

संतान प्राप्ति का नाग शान्ति प्रयोग-

जो स्त्रियाँ नागपंचमी के दिन नागदेव का विधि-विधान सहित पूजन करती हैं, उनकी संतान प्राप्ति की कामना अवश्य पूर्ण होती है। स्त्रियों को अपनी संतान रक्षा हेतु भी नाग शान्ति प्रयोग करना चाहिये। नागपंचमी के दिन सांयकाल शिव का ध्यान करते हुए नाग देव का पूजन करना चाहिए, इसमें पूजन तो ऊपर दी गई विधि के अनुसार ही करना है किंतु अंतर केवल इतना ही है, कि संतान प्राप्ति तथा रक्षा हेतु आगे दिये मंत्र का 51 बार जप करें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पùनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
संतान प्राप्यते संतान रक्षा तथा।
सर्वबाधा नास्ति सर्वत्र सिद्धि भवेत्।।

यह प्रयोग नागपंचमी से लेकर सात दिन तक संपन्न करें। इस प्रयोग को करने से भयबाधा व संतान की कामना पूर्ति अवश्य होती है।

Shivling Upasana शिवलिंगोपासना (Shivratri Special)

Maha Shivratri Special on Shivling

Shivling Upasana शिवलिंगोपासना

तैतीस करोड़ देवी-देवताओं में शिव ही ऐसे हैं जिनकी लिंग shivling के रूप में पूजा होती है जो देवलोक के ऐशो आराम से दूर एक फक्कड़ बाबा के रूप में माने जाते हैं। भांग-धतूरा खाकर, अंग विभूति लिपटा कर जहरीले नागों को गले में लिपटाये प्रसन्न घूमते हैं। शिव Shiv ही हैं जो अक्खड़ दानी हैं। शिवलिंग Shivling पर जल मात्र चढ़ाने से मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं।

भगवान शिव shiv सृष्टि के संहारक हैं। वे मानव के तन-मन की पीड़ा दूर करते हैं, वे आशुतोष है और अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते है। रूद्र उनका एक और नाम है जिसका अर्थ है रोगों को हरण करने वाला। भगवान शिव की उपासना में शिवलिंग shivling पूजा का सबसे अधिक प्रचलन है। लिंग पूजन से सभी मनोकामनायें पूर्ण होती है और सुख शांति की प्राप्ति होती है।

गरुड़ पुराण के अनुसार लिंग shivling अलग- अलग पदार्थों से अनेक प्रकार के बनाये जाते हैं जिस पदार्थ से लिंग बनाये जाते हैं वैसा ही फल प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अलग-अलग वस्तुओं से अभिषेक करने से भी भिन्न फल की प्राप्ति होती है।

जैसे-
श्री प्राप्ति के लिए गन्ने के रस में अभिषेक करना चाहिए।
ज्वर आदि प्रकोप से बचाव हेतु जलधारा से पूजन करें।
वंश वृद्धि हेतु धृत योग से अभिषेक करें।
पाप निवारण हेतु मधु से पूजन करना चाहिए।
समस्त व्याधियों के हरण हेतु पीली, सरसों के तेल से पूजन करें।
लम्बी आयु के लिए दुग्ध से पूजन करें।
एवं संतान प्राप्ति हेतु शर्करा से अभिषेक करना चाहिए।

मृत्युंजय साधना या रूद्राभिषेक दोनों ही मोक्ष और लम्बी आयु देने वाले हैं।

अठारहों पुराणों में शिव को श्रेष्ठ कहा गया है। शिव को उनकी श्रेष्ठता के कारण ही देवाधिदेव कहा गया है। इन्हीं शिव से संबंधित है महाशिवरात्रि-व्रत। देवों में श्रेष्ठ शिव हैं तो स्वभावतः शिव से सम्बद्ध महाशिवरात्रि व्रत व्रतों में सर्वश्रेष्ठ है यह सामान्य जन भी जानते हैं।

जिस व्रत को शिव की प्रियरात्रि में संपन्न किया जाता है वह व्रत शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है तो हर माह में कृष्ण पक्ष में शिवरात्रि व्रत पड़ता है। परन्तु महाशिवरात्रि व्रत फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को पड़ती हैं।

यह अर्थ, काम, मोक्ष तीनों की प्रदाता है अर्थात् मनोकामना पूर्ति हेतु महाशिवरात्रि व्रत करने योग्य है यह सद्या फलदाता है। भोले बाबा स्वयं तो दिगम्बर, श्मशान सेवी और वृषभ वाहन पर है परन्तु अपने भक्तों को अकल्पनीय ऐश्वर्य प्रदान करने में भी पीछे नहीं रहते है। कभी-कभी बाबा ऐसा वरदान दे देते हैं कि बाद में स्वयं परेशानी में पड़ जाते हैं।

रावण शिवभक्त ही था उसकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे इतना सशक्त बना दिया कि उसने सोने की लंका बना ली और विभिन्न देवताओं को बंदी बनाकर अपने अधीन कार्य लेने लगा। इन्द्र रावण के यहां पानी भरने लगे, अग्नि भोजन पकाने लगी, वायु पंखा झलने लगी।

इसी रावण को मारने के लिए रामावतार हुआ और राम भी रावण वध में तभी सफल हुए जब उन्होंने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना कर पूजा-अर्चना की। अतः आप दीन-हीन हो, पापी हो, पुण्यात्मा हो वैभवशाली हो। भगवान शिव की उपासना कीजिए आपकी आकांक्षाएं शीघ्रपूर्ण हो जाएंगी। शिवोपासन की सर्वथा सरल विधि महाशिवरात्रि व्रत का पालन है कहते हैं।

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपाप प्रणाशनम।
आचांडालमनुष्याणां मुक्तिमुति प्रदायकम्।।

संस्कृत भाषा में लिंग का अर्थ होता है चिन्ह और इसी अर्थ में यह शिवलिंग shivling के लिए प्रयुक्त होता है। शिवलिंग shivling का अर्थ है शिव का परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित चिह्न है।

त्रिगुण की जो अव्यक्तावस्था है, जिसके त्रिगुण उत्पन्न हुआ है, उसी में लीन हो जाता है, सारे संसार के उस उपादान कारण को, जो अनादि और अनन्त है, उसे लिंग कहते हैं। इसी से यह संपूर्ण संसार उत्पन्न होता है। इस प्रकार आधारसहित लिंग जगत का कारण है, माँ उमा, महेश्वर स्वरूप है। भगवान शिव स्वयं ज्योतिलिंग स्वरूप तमस से परे स्थित है। लिंग और वेदों के समायोग से वे अर्धनारीश्वर होते हैं।

भिन्न-भिन्न पदार्थो के बने शिवलिंग shivling –
» मिश्री से बनाये हुए शिवलिंग की पूजा से रोग आदि से छुटकारा मिलता है।
» तीनों का आटा समान भाग में गूंथ कर जो शिवलिंग पूजा जाता है, (गेहूं, चावल, जौ, आटा लें) इससे जातक को संतान, लक्ष्मी और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
» किसी से प्रेम प्यार बढ़ाने के लिए गुड़ की भेली में शिवलिंग बनाकर उस व्यक्ति का संकल्प और ध्यान करने से विशेष लाभ मिलता हैं
» यदि चीनी की चाशनी को जमा कर शिवलिंग बनाकर पूजा की जाए तो सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
» यदि किसी को वंश-वृद्धि में बाधा आ रही हो तो वह जातक बांस के अंकुर को शिवलिंग के समान काटकर पूजा करे तो लाभ होगा।
» आंवले को पीसकर बनाया गया शिवलिंग मुक्तिप्रदाता होता है। (आंवले के सीजन में 108 दिन लगातार शिवलिंग बनाकर पूजा करें तो मुक्ति पाओगे।)
» स्फटिक तथा अन्य रत्नों के बने शिवलिंगों जातकों की अभीष्ट कामनाएं पूरी करता है।
» शत्रुओं के नाश के लिए लहसुनिया के बने शिवलिंग की पूजा करने से विजय मिलती है।
» पीतल का शिवलिंग निर्धनता निवारक है। बृहस्पतिवार से पूजा शुरु करें।
» चांँदी का शिवलिंग धन-धान्य बढ़ाता है-सोमवार से पूजा शुरु करें।
» सोने से बना शिवलिंग समृद्धि का वर्द्धन करता है।
» यदि स्त्रियां मोती के शिवलिंग का पूजन करें तो भाग्य-वृद्धि होती है।
» यदि जातक कपूर से बने शिवलिंग का पूजन करता है तो उसको भक्ति और मुक्ति दोनों को प्राप्त करता है।
» यदि जिस जातक की पत्रिका में अकाल-मृत्यु का भय हो तो वह दूर्वा को शिवलिंग गुथकर उसकी आराधना करे तो विशेष लाभ होता है।
» गायत्री मंत्र का सवा लाख आहुति का यज्ञ करके उस भस्म से शिवलिंग बनाकर पूजा की जाए तो जातक की अभिलाषा बहुत शीघ्र पूर्ण होती है।
» वशीकरण के लिए सोंठ, मिर्च, पीपल के चूर्ण को सेंधा नमक के साथ गूंथ कर शिवलिंग बनाने पर पूजा करने पर लाभ मिलता है।
» चन्दन और कस्तूरी व गौलोचन के साथ गजमुक्ता को मिलाकर जो शिवलिंग की पूजा करेंगे तो वशीकरण, सम्मोहन आकर्षण के साथ शिव साम्राज्य की भी प्राप्ति होती है।
» यदि किसान जातक गुड़ की पिण्डी (लिंग) बनाकर उसमें गेहूं के दाने चिपका कर पूजा करने से उस को उत्पादन अधिक होगा।
» दही को बांधकर निचोड़ देने के बाद उससे जो शिवलिंग बन जाए उसकी पूजा करने से लक्ष्मी, सुख व काम सुख की प्राप्ति होती है।
» असली पारद से बनें शिवलिंग की शास्त्रों में बहुत ही प्रशंसा की गयी है। इस शिवलिंग को शास्त्रों में ज्योर्तिलिंग से भी बहुत श्रेष्ठ माना गया है। इसका पूजन सर्वकामनाप्रद, समस्त पापों का नाश करता है, यह जातक को जीवन के संपूर्ण सुख एवं मोक्षप्रद शिवस्वरूप प्रदान करता है। पारद शिवलिंग गारन्टी देने वाले से ही लें आजकल लैड के ऊपर पाॅलिश की जाती है। नकली पारद शिवलिंग की पूजा से कोई लाभ नहीं होगा।

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शिव-पूजन के लिए निम्न बातों पर विशेष ध्यान दिया जाए तो पूजा का फल कई गुणा ज्यादा मिलता है।
1. भगवान शिवजी की पूजा में तिल का प्रयोग नहीं होता और चम्पा के फूल भी नहीं चढ़ाया जाता।
2. शिवजी की पूजा में भी दूर्वा, तुलसी-दल चढ़ाया जाता है। इसमें संदेह नहीं किया जाना चाहिए। तुलसी की मंजरियों से पूजा बहुत श्रेष्ठ मानी जाती है।
3. शिवजी की पूजा में बिल्व पत्र प्रधान है और नीलकमल सर्वश्रेष्ठ पुष्प माना गया है। बिल्व-पत्र चढ़ाते समय बिल्व पत्र का चिकना भाग मूर्ति की ओर रखना चाहिए।
4. जितने अधिक बिल्व-पत्रों को चढ़ाया जाए उतना ही उत्तम होता है, खण्डित बिल्व पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए।
5. शिवजी के पूजन के समय करताल नहीं बजाना चाहिए।
6. विशेष शिवजी के पूजन (अनुष्ठान) कर भस्म त्रिपुण्ड और रूद्राक्ष माला जातक के शरीर पर जरूर होनी चाहिये।
7. शिवजी की परिक्रमा में संपूर्ण परक्रिमा नहीं की जाती।
8. चढ़े हुए जल वाली नाली का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। वहीं से परिक्रमा उल्टी की जाती है।