शनिश्चरी अमावस्या

शनिश्चरी अमावस्या जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं-

  1. ग्रह दोष
  2. पितृदोष
  3. सहभागी कृत दोष

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष- आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

शनैश्चरी अमावस्या-

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री- इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य है, उन सभी के नाप की ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ प्राप्त कर लेनी चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित की गई हो। यह मुद्रिका ऐसी होनी चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

 

 

दण्डाधिकारी शनिदेव

दण्डाधिकारी शनिदेव शनिदेव की चित्र-विचित्र विशिष्टताओं की व्याख्या करने के लिये अनेकानेक प्रसंग प्राचीन भारतीय साहित्य में उपलब्ध होते हैं इनके द्वारा क्रूर तथा अनुकूल फल देने वाले शनि ग्रह की सामथ्र्य का पता चलता है। शनि के स्वरूप को यमझने के लिये इन पुराण के आख्यानों का उल्लेख आवश्यक है। इनसे ज्ञात होता है कि शनि ने ईश्वरीय अवतारों से लेकर चक्रवर्ती सम्राटों तक को अपनी विशेष ऊर्जा से विचलित किया है।

परब्रह्म के रूवरूप- ब्रह्मा-विष्णु-महेश में भूतभावन भगवान् शंकर ने सृष्टी के संहार अथवा विसर्जन का दायित्व ग्रहण किया है। सृर्ष्टि के समस्त जीवधारियों को आचरण के अनुरूप अनुशासित करना बहुत कठिन कार्य था। इस वृहत्तर कार्य में अपनी सहायता हेतु भगवान् शिव ने सहयोगी गणों को जब अपने साथ लिया था प्रायः इसी समय छाया के गर्भ से भगवान् भास्कर के 9 पुत्रों ने जन्म लिया था। इन 9 पुत्रों में शनि एवं यम की भयोत्पादक गतिविधियाँ विस्मयकारी थी। इनके प्रचण्ड बाहुबल से दैवी शक्तियाँ अत्यंत प्रभावित थीं। परिणामतः कल्याण तथा विध्वंस के देव भवान शंकर ने इन्हें अपनी सेवा में ग्रहण कर लिया। शनिदेव को शिव द्वारा कर्मानुसार दण्ड प्रदान करने का अधिकार प्राप्त हुआ। यम मृत्यु के निमित्त नियुक्त हुए। इस पुराणगाथा में शनि के कारकत्व से संबधित अनेक सूक्ष्म संकेत उपलब्ध होते हैं। साथ ही शनि-उपचार में शिवोपासना का माहात्म्य भी रेखांकित होता है।

भगवान् सूर्य के नौ पुत्रों में अपनी भीषणता के लिए शनि सर्वोपरि हैं। कृष्ण वर्ण यमुना शनि की सहोदरा और कालनियन्त्रक यम शनि के अनुज हैं। शनि की रूक्षता का कारण उनका विचित्र परिवार भी है। पुराण कथाओं के अनुसार सन्तानों के योग्य होने पर सूर्य ने प्रत्येक सन्तान हेतु एक-एक लोक की व्यवस्था की। किन्तु प्रकृति से पापप्रधान ग्रह शनि अपने एक लोक के अधिपत्य से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने समस्त लोकों पर आक्रमण करने की योजना तैयार की। सूर्य को शनि की भावना से अत्याधिक पीड़ा हुई। किन्तु उनके परामर्श का शनि पर कोई प्रभाव नहीं पडा। अन्ततः सूर्य ने भगवान् शिव से आतुर निवेदन किया। भक्तभयहारी शिव ने तब उद्दण्ड शनि को चेतावनी दी। शनि ने जब उपेक्षा की तो शिव-शनि युद्ध प्रारम्भ हुआ। शनि ने अदभुत पराक्रम से नन्दी तथा वीरभद्र सहित समस्त शिवगणों को परास्त कर दिया। अपने सैन्यबल का संहार देखकर शिव कुपित हो गये। उन्होंने प्रलयंकारी तृतीय नेत्र खोल दिया। शनि ने भी अपनी मारक दृष्टि का संधान किया। शिव और शनि की द्रिष्टियों से उत्पन्न एक अप्रतिम ज्योति ने शनि लोक को आच्छादित कर लिया।

तत्पश्चात भगवान् शंकर ने क्रोधित होकर शनि पर त्रिशूल से प्रहार किया। शनि यह आघात सहन नहीं कर सके। वह संज्ञासून्य हो गये। पुत्र की यह स्थिति देखकर सूर्य का पुत्रमोह जाग उठा। भगवान् आशुतोष से उन्होंने शनि के जीवन रक्षण हेतु भावभरा निवेदन किया आशुतोष ने प्रसन्न होकर शनि के संकट को हर लिया इस घटना से शनि ने भगवान् शिव की सर्वसमर्थता स्वीकार कर ली। उन्होंने शिव से पुनः पुनः क्षमायाचना की। शनि ने यह भी इच्छा व्यक्त की कि वह अपनी समस्त सेवायें शिव को समर्पित करना चाहते हैं। प्रचण्ड पराक्रमी शनि के रणकौशल से अभिभूत भूतभावन भगवान् भोले नाथ ने शनि को अपना सेवक बना लिया। शिव ने शनि को दण्डाधिकारी नियुक्त किया।

 

शनिदेव की क्रूरता क्यों

शनिदेव की क्रूरता क्यों शनि भगवान् सूर्य के पुत्र हैं। छाया (स्वर्णा) इनकी माता हैं शास्त्रों के अनुसार ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। यह कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में इस प्रकार आयी है-

बचपन से ही शनि देवता भगवान् कृष्ण के अनुराग में निमग्न रहते थे। व्यस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। पत्नी सती-साध्वी और तेजस्विनी थी। एक रात ऋतु-स्नानकर पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा से वह पति के पास पहुँची। पति ध्यान में बैठे थे। बाह्य ज्ञान न था। पत्नी प्रतीक्षा कर थक गयी। ऋतुकाल निष्फल हो चुका था। इस उपेक्षा से क्रुद्ध होकर सती ने शाप दे दिया कि जिसे तुम देख लोगे वह नष्ट हो जायेगा। ध्यान टूटने पर शनि देवता ने पत्नी को मनाया। पत्नी को स्वयं पश्चाताप हो रहा था, किंतु शाप के प्रतीकार की शक्ति उसमें न थी। तब से शनि देवता सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वे किसी का अहित नहीं चाहते थे। उनकी दृष्टि पड़ते कोई भी नष्ट हो सकता था। शनि ग्रह यदि कहीं रोहिणी-शकट भेदन कर दें तो पृथ्वी पर बारह वर्ष घोर दुर्भिक्ष पड़ जाये और प्राणियों का बचना ही कठिन हो जाये।

ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से शनिग्रह जब रोहिणी का भेदन कर बढ़ जाता है, तब यह योग आता है।

यह योग महाराज दशरथ के समय में आने वाला था। इस योग के आने पर पानी और अन्न के बिना उनकी प्रजा तड़प-तड़प कर मर जायेगा, यह दारुण दृश्य महाराज के सामने आ गया। प्रजा को इस कष्ट से बचाने के लिये रथ पर बैठकर महाराज दशरथ नक्षत्र मण्डल में जा पहुँचे। पहले तो महाराज ने शनि देवता को प्रतिदिन की भाँति प्रणाम किया और बाद में क्षत्रिय-धर्म के अनुसार उन पर संहारस्त्र का संधान किया। शनि देवता महाराज की राजोचित कर्तव्य-निष्ठा से प्रसन्न हो गये और वरदान माँगने को कहा। महाराज ने वर में माँगा कि जब तक सूर्य, नक्षत्र आदि विद्यमान हैं, आप कभी शकट-भेदन न करें। शनि देवता ने यह वरदान दे दिया। शनि देव की कृपा देखकर महाराज को रोमांच हो आया। उन्होंने रथ में धनुष डाल दिया और उनकी पूजा की। उसके बाद सरस्वती और गणेश का ध्यान कर स्तोत्र की रचना की।

शनि स्तोत्र-

नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।

नमः कालाग्रिरूपाय कृतान्ताय च वै नमः।।

नमो निर्मासदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते।।

नमो कोटरक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः।

नमो धोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तुते ।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च।।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः।

त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः।।

प्रसादं करू मे देव वराहोहमुपागतः।

एवं स्तुतस्तदा सौरिग्र्रहराजो महाबलः।।

यह शनि स्तोत्र अचूक प्रभावकारी है, प्रतिदिन इसका एक पाठ करना चाहिये।

यदि प्रतिदिन न कर सकें तो प्रत्येक शनिवार को अवश्य ही स्तोत्र पाठ करें।

इस स्तुति से शनि देवता संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने एक वरदान और माँगने को कहा। महाराज ने दूसरे वरदान मे माँगा- ‘भगवन्! देवता, मानव, पशु-पक्षी किसी को आप कष्ट न दें।’ शनि देवता ने एक शर्त के साथ यह वरदान भी दे दिया। शर्त यह थी कि यदि किसी की कुण्डली या गोचर में मृत्यु-स्थान, जन्मस्थान अथवा चतुर्थ स्थान में मैं रहूँ, तब मैं उसे मृत्यु का कष्ट दे सकता हूँ, किंतु यदि वह मेरी प्रतिमा की पूजा कर तुम्हारे द्वारा किये गये स्तोत्र का पाठ करेगा तो उसे मैं कभी पीड़ा नहीं दूंगा। अपितु उसकी रक्षा करूँगा। शनि के अधिदेवता प्रजापति और प्रत्याधिदेवता यम हैं। शनि ग्रह एक-एक राशि में तीस-तीस महीने रहते हैं और तीस ही वर्ष में सब राशियों को पार करते हैं।

(श्रीमद्भ० 5।22।14)

वर्ण- शनि देवता का वर्ण कृष्ण है।

(मत्स्यपु० 14।6)

वाहन- इनका वाहन गीध तथा रथ लोहे का बना हुआ है।

(मत्स्यपु० 127।8)

आयुध- धनुष-बाण और त्रिशूल इनके आयुध है। इनका स्वरूप इस प्रकार है-

इन्द्रनीलद्युतिः शूली वरदो गृध्रवाहनः।

बाणबाणासनधरः कर्तव्योऽर्कसुतस्तथा।।

(मस्त्यपु० 14।6)

‘शनैश्चर की शरीर-कान्ति इन्द्रनीलमणि की-सी है। वे गीध पर सवार होते हैं और हाथ में धनुष, बाण, त्रिशूल और वर मुद्रा धारण किये रहते हैं।’

वैदिक तथा तंत्रिक मंत्रों के रूप में हमें अनेक ग्रंथों में उपलब्ध हैं।

आज विज्ञान का युग है। पर इस युग में भी मंत्र-तंत्र में कोई वास्तविक शक्ति है या नहीं- यह एक पहेली बनी हुई है। यह तो र्निर्ववाद है कि प्राचीनकाल में मानवीय विश्वासों और मान्यताओं में मंत्र- तंत्रों का बहुत बड़ा स्थान था और आज भी है। अन्य दृष्टियों से विकसित और परिष्कृत रूचि के लोग मंत्र तंत्रों के चमत्कारिक गुण और प्रभाव में आज भी अगाध विश्‍वास रखते हैं। यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि तांत्रिक सिद्धियाँ और सिद्ध पुरूषों के वर्णनातीत प्रभाव हमें उलझन में डाल देते हैं और आज जब मनुश्य में स्थित छठी इंद्रिय की और इंद्रियातीत शक्तियों की खोजे हो रही है, हमें एक नितांत मानवीय विश्वास का पुर्नमूल्यांकन करने की सच्ची प्रेरणा मिलती दिखाई पड़ती है। परामनोविज्ञान की खोजों ने तो भौतिकवादी देश तक को इतना प्रभावित किया है कि रूस जैसे देश में भी इस पर शोधकार्य प्रारंभ हो गया। यह तो मानी हुई बात है कि किसी भी समस्या का दो टूक समाधान नहीं है और ऐसी जगह तो हमारे वैज्ञानिक साधन भी प्रायः समाप्त हो जाते हैं। पर आज ऐसे लोगों को भी जो इंद्रियातीत किसी शक्ति या रहस्य में विश्वास नहीं करते। आये दिन ऐसे अनुभव होते हैं, जिनसे उनकी सारी मान्यता धूल में मिल जाती है।

‘तंत्र’ का अर्थ वह शास्त्र है, जिसके द्वारा ज्ञान का विस्तार किया जाता है- तन्यते विस्तार्यते ज्ञानमनेन इति तंत्रम्। इसके दो विशिष्ट अंग है। संयम करना, नियंत्रण करना या विस्तृत शक्ति को केंद्रिकृत करना। सूर्य की किरणें जगत में व्याप्त हैं। इन विस्तीर्ण किरणों को केंद्रियभूत करने पर शक्ति संचारित होती है। जिससे अलौकिक कार्य किये जा सकते हैं। रशिमयों में अत्यंत सूक्ष्म शक्तियाँ हैं। जिन्हें एकत्रित कर विज्ञान के विधानानुसार विकीर्ण कर अनेक भीषण कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं।

अब मंत्रों को लीजिये- ‘मंत्र’ शब्द मन धातु के उत्तर ‘त्रै, धातु एवं ङ् प्रत्यय के योग से निष्पन्न होता है। (मनत्रै=मंत्र) ’ मननात् त्रायते यस्मात् तस्मान्मन्त्र मंत्र उदाहृतः।’ जिसके मनन द्वारा, चिंतन द्वारा, ध्यान द्वारा, दुःख कष्ट की निवृति होकर परमानंद की प्राप्ति होती है। उसी का नाम मंत्र है। सामान्यतया मंत्र के तीन प्रकार हैं- वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक। तीनों प्रकार के मंत्रों में तीन तत्त्व निहित रहते हैं। मंत्र के साथ प्रणव अथवा व्याहृतियों का चोली दामन का संबध है। इन से हमें आध्यात्मिक लाभ क्या हैं आइये इस पर एक दृष्टि डालें।

प्रणव अथवा व्याहृति- परम तत्त्व के निकट आना।

बीज- परम तत्त्व का दर्शन करना और उसे उपलब्ध करना।

देवता- लौटते समय अपने सभी तत्वों को तदभव से परिभावित करना। एकाक्षर मंत्र में भी ये तीनों तत्त्व पाये जाते हैं। एकाक्षर प्रणव या ऊँकार सर्वव्यापी भगवतत्त्व को प्रकाश करता है। इसमें शक्तिमान और शक्तितत्त्व के सब रहस्य विद्यमान हैं। इसके अकार, उकार, मकार- शक्तितत्त्व के और अर्द्धमात्रा ‘शांतं शिवमद्वैतम्’ के द्योतक हैं।

 

Dukh Nashak Shani Dev सर्व दुःख नाशक शनि देव

Shani Dev

Sarv Dukh Nashak Shani Dev सर्व दुःख नाशक शनि देव

Shani Dev
Sarv Dukh Nashak Shani Dev

समस्त ग्रहों में शनिदेव(shani dev)  ही ऐसे ग्रह हैं, जो अत्यन्त क्रोधी होते हये भी अत्यन्त दयालु कहे गये हैं। इनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं, तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।

पौराणिक कथाओं में शनि(shani dev) को सूर्य-पुत्र, यम का भाई, अपने भक्तों को अभय देने वाला, समस्त विघ्नों को नष्ट करने वाला एवं सम्पूर्ण सिद्धियों का दाता कहा गया है। जबकि ज्योतिष की दृष्टि में शनि एक क्रूर ग्रह है। कहा गया है, कि यह क्रूर ग्रह एक ही पल में राजा को रंक बना देता है।

जब बात आती है शनि दशा या साढेसाती की, तो हमारा भयभीत एवं चिन्तित होना स्वाभाविक होता है। समस्त ग्रहों में शनिदेव ही ऐसे ग्रह हैं, जो अत्यन्त क्रोधी होते हुये भी अत्यन्त दयालु हैं। इनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं, तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।

जब सृष्टि की रचना आरम्भ हुई, तो सृष्टि रचना का कार्यभार ब्रह्मा ने संभाला, विष्णु ने जीवों के पालन एंव उनकी रक्षा का उत्तरदायित्व लिया और भगवान शंकर को आवश्यकता पड़ने पर सृष्टि का संहार एवं दुष्ट जनों के विनाश का कार्य सौंपा गया। अपने भक्तों की रक्षा एवं पतितों को उनके पापों का दण्ड देने के लिये शिवजी ने अपने गणों की उत्पत्ति की।

सूर्य पुत्र यम एवं शनि (shani dev) को भी उनके गणों में सम्मिलित किया गया। शनि अत्यन्त पराक्रमी होने के साथ उद्दण्ड भी थे; तोड़-फोड़, मार-काट एवं विनाशकारी कार्यो में इनकी आरम्भ से ही रूचि थी। यह देखकर शिवजी ने यम को तो मृत्यु का देवता बनाया और शनि को दुष्ट जनों को उनके पापों का दण्ड देने का कार्य सौंपा।

शनि (shani dev) भगवान शंकर के शिष्य, सूर्य के पुत्र तथा यम के भाई हैं। शनि सर्वदा प्रभु भक्तों को अभय दान देते हैं, और उसकी हर प्रकार से रक्षा करते हैं। शनि समस्त सिद्धियों के दाता हैं। साधना, उपासना द्वारा सहज ही प्रसन्न होते हैं, और अपने भक्तों की समस्त कामनाओं को पूरा करते हैं। शनि सभी ग्रहों में महाशक्तिशाली और घातक हैं। कहते हैं कि सांप का काटा और शनि का मारा पानी नहीं मांगता।

जब शनि (shani dev) का प्रभाव पड़ा, तो श्री कृष्ण को द्वारिका में शरण लेनी पड़ी। और भगवान राम को, जिनका राज तिलक होने वाला था, सब कुछ छोड़कर नंगे पांव वन में जाना पडा। शनि के प्रभाव से जब अवतारी पुरूष भी नहीं बच सके, तो भला सामान्य लोगों का शनि के प्रकोप से बच पाना सम्भव कहां है?

ये सभी कथायें एक सीमा तक सत्य हैं, परन्तु इनके आधार पर भ्रमित होना विद्वता नहीं हैं। वस्तुतः शनि ग्रह की व्याख्या ही अधूरी है। शनि का तात्पर्य है ‘जीवन की गति’।

राशिगत शनि का प्रभाव किस प्रकार से पड़ता है? और किस राशि पर यह विचरण करता है, इस का क्या प्रभाव होता है? यह किसी विद्वान ज्योतिषी से ही जाना जा सकता है। शनि (shani dev) पीड़ादायक हो सकता है, लेकिन यदि शनि को अनुकूल बना लिया जाये, तो यह सर्वोच्चता भी प्रदान कर सकता है।

शनि देव सम्बंधित अन्य लेख : Shani Amavasya Upaya

ब्रह्मवैवर्त पुराण में यह वर्णन मिलता है, कि जब माता-पार्वती के गर्भ से भगवान गणपति ने जन्म लिया, तो नवजात शिशु को आशीर्वाद प्रदान करने के लिये समस्त देवी-देवता ग्रह नक्षत्र, यक्ष-गन्धर्व आदि उपस्थित हुये तथा एक-एक कर सभी ने गणपति को अपने सामर्थ्य अनुसार तेजस्विता प्रदान की।

इस क्रम में माता पार्वती का ध्यान शनि देव (shani dev) पर गया, जो कि एक किनारे चुप-चाप सिर झुकाऐ खडे़ थे। थोड़ी देर तक माता पार्वती इस बात को देखती रहीं, किन्तु समझ में नहीं आया, कि शनिदेव आगे बढ़कर शिशु का मुख देखकर उसे आशीर्वाद क्यों नहीं दे रहें हैं, अतः उन्होंने इसका कारण शनिदेव से ही पूछा-‘क्या आपको खुशी नहीं हो रही है?’

प्रसन्नता नहीं हो रही है? आप क्यों नहीं आगे बढ़कर मेरे पुत्र को आशीर्वाद दे रहे हैं? मेरे पुत्र की तरफ आप क्यों नहीं दृष्टिपात कर रहे हैं? यह सुनकर शनिदेव ने सिर झुकाये हुये अत्यन्त विनम्रता से कहा- ‘मां ! ऐसा करने के लिये आप मुझे न कहें, क्योंकि मैं नहीं चाहता हूं, कि इस कोमल शिशु का अनिष्ट हो।’ यह सुनकर पार्वती को उनकी बात पर भरोसा नहीं हुआ और उन्होनें आज्ञा दी-‘तुम आगे आओ और बालक को देखकर आशीर्वाद दो।’

अत्यन्त विवश होकर शनिदेव (shani dev) ने थोड़ा सा सिर उठाकर बालक की ओर देखा, तो उनकी दृष्टि पड़ते ही उस शिशु का सिर धड़ से अलग हो गया। यह देखकर पार्वती को बहुत कष्ट हुआ और क्रोध भी आया, किन्तु वे शनि को कुछ कह भी नहीं पा रही थीं, क्योंकि आज्ञा उन्होंने स्वयं दी थी। फिर उनके मुंह से निकल गया-‘भगवान शिव ही बचायें शनि की दृष्टि से’।

एक और प्रसंग है, रोहिणी शकट भेदन से सम्बन्धित, जो इस प्रकार है-
ज्योतिषियों ने जब नीलम सी क्रांति वाले शनिदेव को कृतिका नक्षत्र के अन्तिम चरण में देखा, तो वे भयभीत हो गए। रोहिणी शकट भेदन देवताओं के लिये भी दुःखदायी होता है, तथा राक्षस भी इससे भयभीत हो जाते हैं। सभी राजाओं के लिये यह परेशानी का कारण था, राजा दशरथ जो कि महा तेजस्वी व ईश्वर भक्त थे, उनका रथ नक्षत्र मण्डल को भी पार करने की शक्ति रखता था।

बहुत सोच-विचार करने पर भी तब कोई हल न निकला, तो वे अपने अलौकिक अस्त्र-शस्त्र लेकर नक्षत्र मण्डल की ओर चल दिये। वे सूर्य से भी ऊंचे उठकर रोहिणी पृष्ठ की ओर गये। वहां से उन्होंने शनिदेव को कृतिका से रोहिणी में प्रवेश को तत्पर जानकर अलौकिक संहारास्त्र का प्रयोग करने हेतु अपने आपको संयोजित किया।

तब शनिदेव (shani dev) महाराज दशरथ का यह अदम्य साहस देखकर बहुत प्रसन्न हुये और वरदान मांगने को कहा। शनिदेव को प्रसन्न हुये देख महाराज दशरथ ने उनकी स्तुति की और कहा, हे शनिदेव! प्रजा के कल्याण हेतु आप रोहिणी नक्षत्र का भेदन न करें।

शनि देव ने प्रसन्न हो कर तुरंत कहा ‘‘तथास्तु’’ और यह भी कहा कि जो व्यक्ति आप द्वारा सुनाये गये स्तोत्र से मेरी स्तुति करेंगे, उन पर मेरा प्रतिकूल प्रभाव कभी नहीं होगा।

जय शनि देव।। 

सम्बंधित : Shani Yantra Locket

शनैश्चरी अमावस्या – Shanaishchari Amavasya – 18 April 2015

Shani Amavasya 18 April 2015

 

Shani Amavasya 18 April 2015
Shani Amavasya 18 April 2015

जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं- 1. ग्रह दोष, 2. पितृदोष, 3. सहभागी कृत दोष।

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष– आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री– इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य शनि गृह से प्रभावित हैं , उन सभी के लिए ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ तथा “सिद्ध शनि गृह यंत्र लॉकेट (shani yantra locket)” प्राप्त कर लेना चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित किये गए हो। मुद्रिका तथा शनि गृह यंत्र लॉकेट ऐसे होने चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

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