आत्मा की सत्ता

आत्मा की सत्ता महर्षि पातांजलि के अनुसार वासनाओं के अनुसार ही अगले जन्म में नया शरीर प्राप्त होता है। डार्विन का कहना है कि कामनाओं की पूर्ति के निमित्त जीवधारियों के शरीर में परिवर्तन होता रहता है और एक पीढ़ी का परिवर्तन दूसरी पीढ़ी को उत्तराधिकार के रूप में मिलता है। इस प्रकार परिवर्तन होते-होते एक योनि दूसरी योनि में परिवर्तित हो जाती है। अपने मत की पुष्टि में अफ्रीका के पशु जिराफ का उदाहरण देते हैं, जिनकी गर्दन इसलिये बहुत लंबी हो गई है कि अफ्रीका के वृक्ष बहुत ऊंचे होते हैं और उसकी पत्तियाँ खाने के लिये उन्हें अपनी गर्दन बहुत अधिक उठानी पड़ती थी। प्रत्यक्ष भी देखने में आता है कि काम-क्रोध, भय, शोक, लोभादि का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ता है, जिसका एक सूक्ष्म अंश स्थायी परिवर्तन छोड़ देता है। यही कारण है कि अनुभवी लोग मनुश्य की आकृति को देखकर बहुत ऊँचे स्वभाव एवं चरित्र का पता लगा लेते हैं।

कामना और शरीर का संबंध एक प्रकार से समझ में आता है। जीवन में जो कुछ भी हमें अपनी कामनाओं के अनुकल प्राप्त होता है, उसे ही हम रखने का प्रयत्न करते हैं और जो कुछ ऐसा प्राप्त होता है जो हमारी कामनाओं में बाधक हो, उसे हटाने का प्रबंध करते हैं और जो कामनाओं की पूर्ति में न तो सहायक है न बाधक उसकी ओर हमारी दृष्टि तटस्थता की होती है अब शरीर को लीजिये इसे न तो हम त्यागना चाहते हैं और न इसकी ओर तटस्थ हैं। यही नही, इसके छूट जाने की कल्पना तक से हम सिहर उठते हैं। अतः सिद्ध हुआ कि हमारा शरीर हमारी कामनाओं के अनुरूप ही है। पातांजलि और डार्कवन दोनों के अनुसार कामना कारण है और शरीर कार्य। प्रत्यक्ष देखने में आता है कि मृत्युकाल तक हमारी वे कामनायें नष्ट नहीं होती, जो एक शरीर के बिना पूरी नही हो सकती तो फिर जिस प्रकार एक घर के नष्ट हो जाने पर यदि वे कामनायें नष्ट नहीं हुई, जिनकी पूर्ति एक घर के बिना असंभव है, एक वस्त्र के बिना असंभव है, तो हम अपनी आवश्यकता, सामथ्र्य और परिस्थितियों के अनुसार नया घर अथवा नये वस्त्र को प्राप्त होते हैं।

उसी प्रकार एक शरीर छूट जाने पर यदि हमारी कामनायें नहीं छूटी, जिनकी पूर्ति एक शरीर के बिना असंभव है, तो हम अपनी वासना, सामथ्र्य और परिस्थितियों के अनुसार एक नया शरीर धारण करते हैं। जब तक कारण नष्ट नहीं हुआ, कार्य नष्ट नहीं हो कर वह अपना रूप बदलता रहता है। शरीर और वासना का संबंध समझ लेने के पश्चात् हम यह भी जान सकते हैं कि अगले जन्म में किसे कौन सी योनि प्राप्त होगी। जो लोग अति कामुक हैं उन्हें बंदर या चिड़े की योनि प्राप्त होनी चाहिये; क्योकि मानव शरीर में इतने काम सेवन की क्षमता नहीं है। इसलिये अत्यंत क्रोध वालों के लिये हम सर्प योनि की भविष्यवाणी कर सकते हैं।

एक वस्त्र छूट जाने पर दूसरा वस्त्र धारण करने तक के बीच का जो समय निर्वस्त्रता का है, वैसा ही एक शरीर छूट जाने पर दूसरा शरीर प्राप्त होने के बीच का समय प्रेतावस्था का है। पर आजकल विकासवादी धूम है। शरीर रचना में वासना के महत्व को स्वीकार करते हुये भी विकासवाद पुनर्जन्म को नही मानता । विकासवादी शरीर से भिन्न आत्मा की सत्ता स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार जड़ के एक विशेष संयोग से चेतन उत्पन्न हो जाता है और शरीर के नष्ट होने के साथ-साथ वह भी नष्ट हो जाता है। अतः पुनर्जन्म या परलोक का भी कोई प्रश्न नहीं उठता। हम पुनर्जन्मवादी इसमें केवल इतना स्वीकार करते हैं कि जड़ के विशेष प्रकार के संयोग में विशेष प्रकार की आत्मा को आकर्षित करने की शक्ति आ जाती है परंतु वह संयोग आत्मा को उत्पन्न कर देता है-

हम यह स्वीकार नहीं कर सकते । गुड़ में मक्खी को आकर्षित करने की शक्ति है। वह मक्खी को उत्पन्न नही कर सकता । यदि चेतन की उत्पत्ति केवल जड़ और परिस्थितियों पर ही निर्भर है तो एक ही परिस्थिति में उसी जड़ का केवल एक अंश ही मनुश्य क्यों बना? दूसरा वनस्पति बनकर क्यों रूक गया ? तीसरा केवल मछली तक और चैथा केवल वानर तक ही क्यों पहुंच पाया और पांचवाँ आज भी क्यों जड़ है? एक उद्योगशाला में एक ही परिस्थिति में एक से कच्चे माल से जो पदार्थ निर्मित होते हैं, वे एक से होते हैं, जबकि क्रमिक विकास की सृष्टि में ऐसा नही है। यहाँ तक कि मानव योनि में भी कोई दो व्यक्ति ऐसे नही मिलेंगें, जिनके अंगूठों की छाप तक एक जैसी हो। अतः मानना पड़ेगा कि जीवधारियों के पारस्परिक भेद का कारण परिस्थिति विकासवाद और वंशानुक्रम के अतिरिक्त कुछ और भी है।

जिस क्षेत्र में मानव का अवतरण हो चुका है।, वहाँ बंदर अब भी रहते हैं। अतः मानना पड़ेगा कि जो वानर मनुश्य बन गये, वे विशेष प्रकार के वानर थे और इन वानरों से भिन्न थे, जो मानव नहीं बन पाये और जो आगे चलकर मानव बनने का कोई लक्षण उनमें आज भी पाया जाता है इसी प्रकार जो जड़ मछली बना और जो मछली वानर बनी, वह आज के जड़ और मछली से नितांत भिन्न थे। नही तो क्या कारण है कि हमारा वर्तमान जड़ मछली और आज की मछली वानर नहीं बन सकी। प्रकृति में इतनी विषमता क्यों हुई कि उसकी क्रमिक विकास की चेष्टा का कुछ तो प्रभाव हुआ और कुछ पर नही और जिन पर हुआ उन पर भी एक सा नही ? यदि सारा ही जड़ मानव बन जाये तो मानव क्या एक दूसरे को खायेगा? क्रमिक विकास के साथ साथ प्रकृति की यह चेष्टा भी देखने को मिलती है कि जड़ वनस्पति, जलचर, नभचर, वनचर और मानव में एक उचित संतुलन रखा जाये, नहीं तो विकास का अर्थ विनाश होगा। अतः मानना पड़ेगा कि इस क्रमिक विकास के पीछे भी किसी चेतन सत्ता का हाथ है जड़वादी यह बतलाने में असमर्थ हैं कि यदि पृथ्वी पर भी वे परिस्थितियाँ उत्पन्न न हुई होती जो क्रमिक विकास का कारण बनी और सारी पृथ्वी जड़ पड़ी रहती जैसा कि बहुत से ग्रह अब भी पड़े हुये हैं तो क्या हानि थी? मनुश्य का अवतरण जैसी एक भीषण क्रांति जो आगे चलकर सारी क्रान्तियों का कारण बनी -क्या एकमात्र संयोग की बात है? क्या इस विकास में मनुश्य का अपना कुछ कर्तव्य नहीं है? क्या यह सब निरूद्देश्य है? यदि ऐसा ही है तो फिर मनुश्य जीवन में ही उद्देश्य की स्थापना क्यों की जाये? जब मानव जड़ का ही एक रूप है तो मानव जीवन की महत्ता ही क्या रही? जब मानव को यह शरीर उसके पूर्वजन्मकृत सुकृत का फल न होकर केवल संयोगवश प्राप्त हुआ है तो उससे यह छीन लेने में कौन सा पाप है?

परलोकवाद को न मानने वाले और नैतिकता के समर्थक यह कहा करते हैं कि मनुश्य को अपने पाप पुण्यों का फल इसी जन्म में मिल जाता है। ऐसा भी हो तो इतना तो वे भी स्वीकार करेंगें कि हमें अपने पाप पुण्य का फल तत्काल नहीं मिलता। परिस्थिति व दूसरों की चेष्टा के अतिरिक्त इसमें हमारी चेष्टा भी एक बहुत बड़ा कारण होती है। प्रयत्न करने पर हम अपने पाप कर्मों के फल को कुछ और समय तक के लिये टाल सकते हैं तो जीवन पर्यंत भी टाल सकते हैं। केवल परलोकवादी ही धर्म पर स्थिर रह सकता है; क्योंकि वह समझता है कि यदि पाप कर्म का फल आजीवन टाल भी दिया तो उसे परलोक या अगलेे जन्म में भोगना पड़ेगा।

अतः वह पाप करने का और यदि पाप बन गया तो उसके फल को टालने का प्रयत्न नहीं करता जबकि जड़वादी की सारी चेष्टा यही रहती है कि जिन पापों से अपने स्वार्थ की पूर्ति होती है। उन्हें इस प्रकार करो कि जिससे उनका फल न भोगना पड़े। इसी प्रकार पुण्यकर्म करने के बाद उसका फल प्राप्त करने के लिये भी जड़वादी बहुत उतावला रहता है क्यो कि पुण्य कर्म का फल भी तत्काल नहीं मिलता। जड़वादी समझता है कि यदि इसी बीच में मेरी मृत्यु हो गई तो वह पुण्यकर्म निष्फल गया। परलोक वादी ऐसा नहीं मानता । वह समझता है कि इस जन्म में न सही अगले जन्म में फल अवश्य मिलेगा। नैतिक आचरण के पक्ष में जड़वादियों का कहना है कि हमंे जनता को यह समझाना चाहिये कि हमारे पाप पुण्यों के कर्मों का फल हमें भले ही न मिले, वह हमारे समाज, जाति, राष्ट्र, मानवता व भावी पीढि़यों को अवश्य प्राप्त होगा।

यह ठीक है कि कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति कर्म करते समय उसके परिणाम को न केवल व्यक्तिगत, अपितु पारिवारिक, सामाजिक जातीय, राष्ट्रीय व भावी पीढि़यों की दृष्टि से भी सोचता है; परंतु हमें यह नहीं भूल जाना चाहिये कि ये सारे पारिवारिक सामाजिक, जातीय, राष्ट्रीय व भावी पीढ़ीगत स्वः-व्यक्तिगत स्वः के ही विस्तार हैं और जब तक मनुश्य की समझ में यह न आ जाये कि उसके पाप पुण्य कर्मो का फल उसके व्यक्तिगत स्वः को भी अवश्य प्राप्त होगा, तब तक नैतिकता के लिये कोई भी सुदृढ़ आधार नहीं मिलता। जड़वाद नहीं, परलोकवाद ही व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक जातीय, राष्ट्रीय मानवतागत व भावी पीढ़ीगत सभी ‘स्व’ में समन्वय स्थापित करता है और बतलाता है जो बात विशाल से विशालतर सबके लिये लाभदायक है। इस प्रकार आत्मा और परलोक का अस्तित्व न मानने से नैतिकता की जड़ें हिल गयी हैं।

जब मानव जड़ का ही एक रूप है तो फिर जड़ से अधिक उसका महत्व क्यों? रही सुसंस्कृत मन की बात तो सुसंस्कृत मन तो वही कहा जायेगा जो सारे विश्व को ‘सीयाराममय’ जानकर युगपत नमस्कार करता है, न कि वह अपने को भी जड़वाद मानकर चलता है। एक विकासवादी भावी पीढ़ी की भी चिंता क्यों करें? जब हमारे पूर्वज जड़, मत्स्य और वानरों ने भावी पीडि़यों की कोई चिंता किये बिना और न इनमें इस प्रकार की चिंतन की कोई क्षमता ही थी, अपनी भावी पीढि़यों को मानव बनाकर दिखला दिया तो हम भावी पीढि़यों की चिंता कर इससे भी अधिक अच्छे परिणाम दिखला सकेगें? जीवन में सबसे महत्वपूर्ण घटना हमारा अपना जीवन है। व्यक्तिगत दृष्टि से और सामूहिक दृष्टि से मनुश्य का पृथ्वी पर अवतरण।

यदि जन्म नहीं तो, कुछ भी नही और यदि पृथ्वी पर मानव अवतरित न हुआ होता तो। और यही जन्म हमारे अपने पाप पुण्य का फल न होकर केवल संयोगमात्र है और यही पृथ्वी पर मानव का अवतरण उसके पूर्वजों की योजना तथा पुरूषार्थ का परिणाम न होकर प्रकृति की एक चेष्टा मात्र है तो हमारे सारे पुरूषार्थ एवं प्रयास का क्या मूल्य रह जाता है? इस प्रकार जड़वाद की पुरूषार्थ से संगति नही बैठती। फिर यह जड़वाद यह भी नहीं बतलाता कि जब अनादि काल से सृष्टि जड़ चली आ रही थी तो यकायक यह रचना क्यों आरंभ हो गई। क्या पहले भी ऐसी कोई रचना आरंभ होकर नष्ट हुई है? नष्ट नहीं हुई तो वह कहां है और यह विकास कब तक चलता रहेगा? इसकी कोई अंतिम परिणति है या नही, तो वह क्या है। विकासवाद अंतिम सत्य नहीं है। अधिक से अधिक वह एक देशीय सत्य हो सकता है। अंतिम दर्शन तो भारतीय दर्शन है। जिसमें उचित स्थान विकासवाद को भी मिला है और आत्मा एवं शरीर की पृथक सत्ता व पुनर्जन्म सभी भारतीय मनीषियों ने स्वीकार किया है और हमारे आचार्यो के अतिरिक्त अनेक महापुरूषों और जातियों ने, जिनमें से कुछ के नाम नीचे दिये जाते हैं-

 

  1. पाईथागोरस प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक एवं गणितज्ञ।
  2. हेनरी फार्ड प्रसिद्ध अमेरिकन धनकुबेर एवं उद्योगपति।
  3. गाल जाति वर्तमान आयरलैण्ड वासियों के पूर्वज। इनमें सती की प्रथा भी थी।
  4. इंग्लैण्ड के वेल्स प्रदेश के निवासियों के पूर्वज जो पुनर्जन्म, निर्वाण वेदांत, ज्योतिष और देवी देवताओं तथा यज्ञ में विश्वास रखते थे। इनका कहना था कि

ष् लवन सपअमक दक कपमक उंदल जपउमे नदजपस लवन मतम मक बसमंद व नउंद पससे दक उमदजंस पउचनतपजलण्ष्

जब तक मनुश्य पाप और वासनाओं से मुक्त नही हो जाता तब तक वह बार-बार जन्म मरण को प्राप्त होता रहता है। यह जाति बड़ी विद्याव्यसनी थी। इनके बड़े-बड़े पुस्तकालय एवं विद्यालय थे। लगभग 4000 वर्ष तक इस जाति की तूती बोली। जब रोमन लोगों ने (60 ई0 पू0 लगभग) इन पर आक्रमण करके इनके पुस्तकालय तथा विद्यालय फूक डाले और इनका हत्याकांड आरंभ कर दिया तो वे नार्वे तथा आइसलैंड भाग गये। ये लोग अब से 6000 वर्ष पूर्व दक्षिणी एशिया से चलकर मिश्र, यूनान, फ्रांस होते हुये इंग्लैंड पंहुचे थे।

संतान प्राप्ति के लिये शास्त्रीय उपाय ‘संतानगोपाल मंत्र

संतान प्राप्ति के लिये शास्त्रीय उपायों में ‘संतानगोपाल मंत्र’ की साधना अत्यंत प्रभावशाली है। अतः संतान की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस मंत्र का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये। इस मंत्र का जप दो प्रकार से किया जाता है। एक बीज सहित और दूसरे बिना बीज मंत्र के। बीज सहित मंत्र शीघ्र फलदायी होता है। किन्तु इसे गुरू से दीक्षा लिये हुये व्यक्ति को ही करना चाहिये, बिना बीजाक्षरों के कोई भी कर सकता है। आगे बीज सहित संतानगोपाल मंत्र के अनुष्ठान की विधि दी जा रही है। यदि पाठक स्वयं न कर सके तो किसी विद्वान ब्राह्मण से यह अनुष्ठान करवा सकते हैं। इस मंत्र की सम्पूर्ण जप संख्या 100000 (एक लाख मंत्र) है। उसका दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण और तर्पण का दशांश मार्जन करना चाहिये। यदि बिना बीज मंत्र के साधक स्वयं जप करता है तब चैगुना संख्या में जप करने का शास्त्र निर्देश है। सर्वप्रथम निम्नांकित वाक्य पढ़कर विनियोग करे- अस्य श्रीसंतान गोपाल मंत्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छंद्ः, श्रीकृष्णो देवता, ग्लौं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अंगन्यास- ‘देवकीसुत गोविंद’ हृदयाय नमः (इस वाक्य की बोलकर दाहिने हाथ की मध्यमा, अनामिका और तर्जनी अंगुलियों से हृदय का स्पर्श करें)। ‘वासुदेव जगत्पते’ शिरसे स्वाहा’ (इस वाक्य को बोलकर सिर का स्पर्श करें)। ‘देहि में तनयं कृष्ण’ शिखयै वषट् (इस वाक्य को बोलकर दाहिने हाथ के अंगुठे से सिर का स्पर्श करें)। ‘त्वामहं शरणं गतः’ ( इस वाक्य को बोलकर दाहिनी हाथ के पाँचों उंगलियों से बायीं भुजा का एवं बायीं हाथ की पाँचों उंगलियों से दाहिनी भुजा का स्पर्श करें)। ‘ऊँ नमः’ अस्त्राय फट् (इस वाक्य को बोलकर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से पीछे की ओर ले जाकर दाहिनी ओर से आगे कि ओर ले आय और तर्जनी तथा मध्यमा उंगुलियों से बाँय हाथ की हथेली पर बजायें।

इसके पश्चात् निम्नांकित रूप से ध्यान करें-

 

वैकुण्ठाद्गतं कृष्णं रथस्थं करूणानिधिम्।

किरीटिसारथि पुत्रमानयंत्र परात्परम्।। 1 ।।

आदाय तं जलस्थं च गुरूवे वैदिकाय च।

अर्पयंतं महाभागं ध्यायेत् पुत्रार्थमच्यृतम्।। 2 ।।

‘पार्थसारथि अच्युत भगवान् श्रीकृष्ण करूणा के सागर हैं। वे जल में डूबे हुए गुरू पुत्र को लेकर आ रहें है। वे वैकुण्ठ से अभी-अभी पधारे हैं और रथ पर विराजमान हैं। अपने वैदिक गुरू सांदीपनि को उनका पुत्र अर्पित कर रहें है- साधक पुत्र की प्राप्ति के लिए इस रूप में महाभाग भगवान् श्रीकृष्ण का चिंतन करें’।

मूल मंत्र (बीज सहित) –

ऊँ श्रीं ह्नीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः।।’

इस मंत्र का भावार्थ इस प्रकार है- सच्चिदानंद स्वरूप, ऐश्वर्यशाली, कामनापूरक, सौभाग्य स्वरूप, देवकीनंदन! गोविंद! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरण में आया हुँ, आप मुझे पुत्र प्रदान करें।

आगे संतान गोपाल मंत्र बिना बीज मंत्र के भी दिया जा रहा है जिसे कोई भी साधक संकल्प लेकर स्वयं ही कर सकता है।

संतानगोपाल मंत्र- 2

विनियोग

अस्त श्रीसंतानगोपालमंत्रमंत्रस्य ब्रह्म ऋषिर्गायत्रीच्छंदः, श्रीकृष्ण देवता, क्लीं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अंगन्यास-

ग्लौं हृदयाय नमः। क्लीं श्शिरसे स्वाहा। ह्नीं शिखायै वषट्। श्रीं कवचाय हुम्। ऊँ अस्त्राय फट्।

ध्यान-

यांखचक्रगदापह्मं दधानं सूतिकागृहे।

अंके शयानं देवक्याः कृष्णं वंदे विमुक्तये।।

जो सूतिकार गृह में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये माता देवकी की गोद में सो रहें हैं, उन भगवान् श्री कृष्ण की मैं (संतान रूप में ) मोक्ष की प्राप्ति के लिए वन्दना करता हूँ।

बिना बीज का मूल मंत्र इस प्रकार है-

ऊँ नमो भगवते जगदात्मसूतये नमः’

(सम्पूर्ण जगत् जिनकी अपनी संतान है, उन भगवान् श्री कृष्ण को नमस्कार है) इसका चार लाख जप करना चाहिए।

 

दण्डाधिकारी शनिदेव

दण्डाधिकारी शनिदेव शनिदेव की चित्र-विचित्र विशिष्टताओं की व्याख्या करने के लिये अनेकानेक प्रसंग प्राचीन भारतीय साहित्य में उपलब्ध होते हैं इनके द्वारा क्रूर तथा अनुकूल फल देने वाले शनि ग्रह की सामथ्र्य का पता चलता है। शनि के स्वरूप को यमझने के लिये इन पुराण के आख्यानों का उल्लेख आवश्यक है। इनसे ज्ञात होता है कि शनि ने ईश्वरीय अवतारों से लेकर चक्रवर्ती सम्राटों तक को अपनी विशेष ऊर्जा से विचलित किया है।

परब्रह्म के रूवरूप- ब्रह्मा-विष्णु-महेश में भूतभावन भगवान् शंकर ने सृष्टी के संहार अथवा विसर्जन का दायित्व ग्रहण किया है। सृर्ष्टि के समस्त जीवधारियों को आचरण के अनुरूप अनुशासित करना बहुत कठिन कार्य था। इस वृहत्तर कार्य में अपनी सहायता हेतु भगवान् शिव ने सहयोगी गणों को जब अपने साथ लिया था प्रायः इसी समय छाया के गर्भ से भगवान् भास्कर के 9 पुत्रों ने जन्म लिया था। इन 9 पुत्रों में शनि एवं यम की भयोत्पादक गतिविधियाँ विस्मयकारी थी। इनके प्रचण्ड बाहुबल से दैवी शक्तियाँ अत्यंत प्रभावित थीं। परिणामतः कल्याण तथा विध्वंस के देव भवान शंकर ने इन्हें अपनी सेवा में ग्रहण कर लिया। शनिदेव को शिव द्वारा कर्मानुसार दण्ड प्रदान करने का अधिकार प्राप्त हुआ। यम मृत्यु के निमित्त नियुक्त हुए। इस पुराणगाथा में शनि के कारकत्व से संबधित अनेक सूक्ष्म संकेत उपलब्ध होते हैं। साथ ही शनि-उपचार में शिवोपासना का माहात्म्य भी रेखांकित होता है।

भगवान् सूर्य के नौ पुत्रों में अपनी भीषणता के लिए शनि सर्वोपरि हैं। कृष्ण वर्ण यमुना शनि की सहोदरा और कालनियन्त्रक यम शनि के अनुज हैं। शनि की रूक्षता का कारण उनका विचित्र परिवार भी है। पुराण कथाओं के अनुसार सन्तानों के योग्य होने पर सूर्य ने प्रत्येक सन्तान हेतु एक-एक लोक की व्यवस्था की। किन्तु प्रकृति से पापप्रधान ग्रह शनि अपने एक लोक के अधिपत्य से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने समस्त लोकों पर आक्रमण करने की योजना तैयार की। सूर्य को शनि की भावना से अत्याधिक पीड़ा हुई। किन्तु उनके परामर्श का शनि पर कोई प्रभाव नहीं पडा। अन्ततः सूर्य ने भगवान् शिव से आतुर निवेदन किया। भक्तभयहारी शिव ने तब उद्दण्ड शनि को चेतावनी दी। शनि ने जब उपेक्षा की तो शिव-शनि युद्ध प्रारम्भ हुआ। शनि ने अदभुत पराक्रम से नन्दी तथा वीरभद्र सहित समस्त शिवगणों को परास्त कर दिया। अपने सैन्यबल का संहार देखकर शिव कुपित हो गये। उन्होंने प्रलयंकारी तृतीय नेत्र खोल दिया। शनि ने भी अपनी मारक दृष्टि का संधान किया। शिव और शनि की द्रिष्टियों से उत्पन्न एक अप्रतिम ज्योति ने शनि लोक को आच्छादित कर लिया।

तत्पश्चात भगवान् शंकर ने क्रोधित होकर शनि पर त्रिशूल से प्रहार किया। शनि यह आघात सहन नहीं कर सके। वह संज्ञासून्य हो गये। पुत्र की यह स्थिति देखकर सूर्य का पुत्रमोह जाग उठा। भगवान् आशुतोष से उन्होंने शनि के जीवन रक्षण हेतु भावभरा निवेदन किया आशुतोष ने प्रसन्न होकर शनि के संकट को हर लिया इस घटना से शनि ने भगवान् शिव की सर्वसमर्थता स्वीकार कर ली। उन्होंने शिव से पुनः पुनः क्षमायाचना की। शनि ने यह भी इच्छा व्यक्त की कि वह अपनी समस्त सेवायें शिव को समर्पित करना चाहते हैं। प्रचण्ड पराक्रमी शनि के रणकौशल से अभिभूत भूतभावन भगवान् भोले नाथ ने शनि को अपना सेवक बना लिया। शिव ने शनि को दण्डाधिकारी नियुक्त किया।

 

शनिदेव की क्रूरता क्यों

शनिदेव की क्रूरता क्यों शनि भगवान् सूर्य के पुत्र हैं। छाया (स्वर्णा) इनकी माता हैं शास्त्रों के अनुसार ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। यह कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में इस प्रकार आयी है-

बचपन से ही शनि देवता भगवान् कृष्ण के अनुराग में निमग्न रहते थे। व्यस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। पत्नी सती-साध्वी और तेजस्विनी थी। एक रात ऋतु-स्नानकर पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा से वह पति के पास पहुँची। पति ध्यान में बैठे थे। बाह्य ज्ञान न था। पत्नी प्रतीक्षा कर थक गयी। ऋतुकाल निष्फल हो चुका था। इस उपेक्षा से क्रुद्ध होकर सती ने शाप दे दिया कि जिसे तुम देख लोगे वह नष्ट हो जायेगा। ध्यान टूटने पर शनि देवता ने पत्नी को मनाया। पत्नी को स्वयं पश्चाताप हो रहा था, किंतु शाप के प्रतीकार की शक्ति उसमें न थी। तब से शनि देवता सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वे किसी का अहित नहीं चाहते थे। उनकी दृष्टि पड़ते कोई भी नष्ट हो सकता था। शनि ग्रह यदि कहीं रोहिणी-शकट भेदन कर दें तो पृथ्वी पर बारह वर्ष घोर दुर्भिक्ष पड़ जाये और प्राणियों का बचना ही कठिन हो जाये।

ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से शनिग्रह जब रोहिणी का भेदन कर बढ़ जाता है, तब यह योग आता है।

यह योग महाराज दशरथ के समय में आने वाला था। इस योग के आने पर पानी और अन्न के बिना उनकी प्रजा तड़प-तड़प कर मर जायेगा, यह दारुण दृश्य महाराज के सामने आ गया। प्रजा को इस कष्ट से बचाने के लिये रथ पर बैठकर महाराज दशरथ नक्षत्र मण्डल में जा पहुँचे। पहले तो महाराज ने शनि देवता को प्रतिदिन की भाँति प्रणाम किया और बाद में क्षत्रिय-धर्म के अनुसार उन पर संहारस्त्र का संधान किया। शनि देवता महाराज की राजोचित कर्तव्य-निष्ठा से प्रसन्न हो गये और वरदान माँगने को कहा। महाराज ने वर में माँगा कि जब तक सूर्य, नक्षत्र आदि विद्यमान हैं, आप कभी शकट-भेदन न करें। शनि देवता ने यह वरदान दे दिया। शनि देव की कृपा देखकर महाराज को रोमांच हो आया। उन्होंने रथ में धनुष डाल दिया और उनकी पूजा की। उसके बाद सरस्वती और गणेश का ध्यान कर स्तोत्र की रचना की।

शनि स्तोत्र-

नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।

नमः कालाग्रिरूपाय कृतान्ताय च वै नमः।।

नमो निर्मासदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते।।

नमो कोटरक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः।

नमो धोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तुते ।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च।।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः।

त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः।।

प्रसादं करू मे देव वराहोहमुपागतः।

एवं स्तुतस्तदा सौरिग्र्रहराजो महाबलः।।

यह शनि स्तोत्र अचूक प्रभावकारी है, प्रतिदिन इसका एक पाठ करना चाहिये।

यदि प्रतिदिन न कर सकें तो प्रत्येक शनिवार को अवश्य ही स्तोत्र पाठ करें।

इस स्तुति से शनि देवता संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने एक वरदान और माँगने को कहा। महाराज ने दूसरे वरदान मे माँगा- ‘भगवन्! देवता, मानव, पशु-पक्षी किसी को आप कष्ट न दें।’ शनि देवता ने एक शर्त के साथ यह वरदान भी दे दिया। शर्त यह थी कि यदि किसी की कुण्डली या गोचर में मृत्यु-स्थान, जन्मस्थान अथवा चतुर्थ स्थान में मैं रहूँ, तब मैं उसे मृत्यु का कष्ट दे सकता हूँ, किंतु यदि वह मेरी प्रतिमा की पूजा कर तुम्हारे द्वारा किये गये स्तोत्र का पाठ करेगा तो उसे मैं कभी पीड़ा नहीं दूंगा। अपितु उसकी रक्षा करूँगा। शनि के अधिदेवता प्रजापति और प्रत्याधिदेवता यम हैं। शनि ग्रह एक-एक राशि में तीस-तीस महीने रहते हैं और तीस ही वर्ष में सब राशियों को पार करते हैं।

(श्रीमद्भ० 5।22।14)

वर्ण- शनि देवता का वर्ण कृष्ण है।

(मत्स्यपु० 14।6)

वाहन- इनका वाहन गीध तथा रथ लोहे का बना हुआ है।

(मत्स्यपु० 127।8)

आयुध- धनुष-बाण और त्रिशूल इनके आयुध है। इनका स्वरूप इस प्रकार है-

इन्द्रनीलद्युतिः शूली वरदो गृध्रवाहनः।

बाणबाणासनधरः कर्तव्योऽर्कसुतस्तथा।।

(मस्त्यपु० 14।6)

‘शनैश्चर की शरीर-कान्ति इन्द्रनीलमणि की-सी है। वे गीध पर सवार होते हैं और हाथ में धनुष, बाण, त्रिशूल और वर मुद्रा धारण किये रहते हैं।’

वैदिक तथा तंत्रिक मंत्रों के रूप में हमें अनेक ग्रंथों में उपलब्ध हैं।

आज विज्ञान का युग है। पर इस युग में भी मंत्र-तंत्र में कोई वास्तविक शक्ति है या नहीं- यह एक पहेली बनी हुई है। यह तो र्निर्ववाद है कि प्राचीनकाल में मानवीय विश्वासों और मान्यताओं में मंत्र- तंत्रों का बहुत बड़ा स्थान था और आज भी है। अन्य दृष्टियों से विकसित और परिष्कृत रूचि के लोग मंत्र तंत्रों के चमत्कारिक गुण और प्रभाव में आज भी अगाध विश्‍वास रखते हैं। यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि तांत्रिक सिद्धियाँ और सिद्ध पुरूषों के वर्णनातीत प्रभाव हमें उलझन में डाल देते हैं और आज जब मनुश्य में स्थित छठी इंद्रिय की और इंद्रियातीत शक्तियों की खोजे हो रही है, हमें एक नितांत मानवीय विश्वास का पुर्नमूल्यांकन करने की सच्ची प्रेरणा मिलती दिखाई पड़ती है। परामनोविज्ञान की खोजों ने तो भौतिकवादी देश तक को इतना प्रभावित किया है कि रूस जैसे देश में भी इस पर शोधकार्य प्रारंभ हो गया। यह तो मानी हुई बात है कि किसी भी समस्या का दो टूक समाधान नहीं है और ऐसी जगह तो हमारे वैज्ञानिक साधन भी प्रायः समाप्त हो जाते हैं। पर आज ऐसे लोगों को भी जो इंद्रियातीत किसी शक्ति या रहस्य में विश्वास नहीं करते। आये दिन ऐसे अनुभव होते हैं, जिनसे उनकी सारी मान्यता धूल में मिल जाती है।

‘तंत्र’ का अर्थ वह शास्त्र है, जिसके द्वारा ज्ञान का विस्तार किया जाता है- तन्यते विस्तार्यते ज्ञानमनेन इति तंत्रम्। इसके दो विशिष्ट अंग है। संयम करना, नियंत्रण करना या विस्तृत शक्ति को केंद्रिकृत करना। सूर्य की किरणें जगत में व्याप्त हैं। इन विस्तीर्ण किरणों को केंद्रियभूत करने पर शक्ति संचारित होती है। जिससे अलौकिक कार्य किये जा सकते हैं। रशिमयों में अत्यंत सूक्ष्म शक्तियाँ हैं। जिन्हें एकत्रित कर विज्ञान के विधानानुसार विकीर्ण कर अनेक भीषण कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं।

अब मंत्रों को लीजिये- ‘मंत्र’ शब्द मन धातु के उत्तर ‘त्रै, धातु एवं ङ् प्रत्यय के योग से निष्पन्न होता है। (मनत्रै=मंत्र) ’ मननात् त्रायते यस्मात् तस्मान्मन्त्र मंत्र उदाहृतः।’ जिसके मनन द्वारा, चिंतन द्वारा, ध्यान द्वारा, दुःख कष्ट की निवृति होकर परमानंद की प्राप्ति होती है। उसी का नाम मंत्र है। सामान्यतया मंत्र के तीन प्रकार हैं- वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक। तीनों प्रकार के मंत्रों में तीन तत्त्व निहित रहते हैं। मंत्र के साथ प्रणव अथवा व्याहृतियों का चोली दामन का संबध है। इन से हमें आध्यात्मिक लाभ क्या हैं आइये इस पर एक दृष्टि डालें।

प्रणव अथवा व्याहृति- परम तत्त्व के निकट आना।

बीज- परम तत्त्व का दर्शन करना और उसे उपलब्ध करना।

देवता- लौटते समय अपने सभी तत्वों को तदभव से परिभावित करना। एकाक्षर मंत्र में भी ये तीनों तत्त्व पाये जाते हैं। एकाक्षर प्रणव या ऊँकार सर्वव्यापी भगवतत्त्व को प्रकाश करता है। इसमें शक्तिमान और शक्तितत्त्व के सब रहस्य विद्यमान हैं। इसके अकार, उकार, मकार- शक्तितत्त्व के और अर्द्धमात्रा ‘शांतं शिवमद्वैतम्’ के द्योतक हैं।

 

सौभाग्य को चमका देती है ~ सूर्य रेखा

Surya Rekha

मनुष्य के हाथ में- सूर्य-रेखा को ‘रविरेखा’ या ‘तेजस्वी-रेखा’ भी कहा जाता हैं, कारण यह भाग्य-रेखा से होने वाले उज्जवल भविष्य या सौभाग्य को ठीक उसी प्रकार चमका देती हैं जिस प्रकार सूर्य अपने प्रखर प्रकाश से रात्रि के अंधकार को दूर करता है। जिस प्रकार से हिम के ढके हुई पर्वत श्रृंखलाओं को विशेष चमकाता हैं। इससे यह न समझ लेना चाहिये कि सूर्य-रेखा के अभाव में हाथ में पड़ी शुभ भाग्य-रेखा का कोई मूल्य ही नहीं होता या उसका प्रभाव ही मध्यम हो जाता हैं समझने के लिए उपर्युक्त शिखर-श्रृंखलाओं को ही ले लीजिये। वे बर्फ से ढंकी रहती हैं बर्फ का गुण हैं चमकना, चाहे रात्रि हो या दिन; उसके स्वाभाविक गुण चमकने में कोई अन्तर नहीं आता- वह सदा एक सा चमकता ही रहता हैं। सूर्य की किरणों से अन्तर केवल इतना ही होता हैं कि वे अपने सहयोग से उसमें एक विशेष प्रकार की चमक उत्पन्न कर देती है। और वह पहले की अपेक्षा और अधिक चमकने लग जाता है। यही बात रेखाओं के सम्बन्ध में भी है। यदि भाग्यरेखा के साथ सूर्यरेखा भी अधिक बलवान् होकर पड़ी हो तो वह सोने में सुगन्ध का काम करती हैं, अर्थात् यों कहिये कि एक राजा को चक्रवर्ती समा्रट बनाने का काम करती है, यही भाव है।

Surya Rekha
Surya Rekha

यदि किसी के हाथ में भाग्य-रेखा निर्बल हो या उसका सर्वथा ही अभाव हो तो सुन्दर, छोटी सी सूर्य-रेखा के प्रभाव से वह व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) वैसा प्रभावशाली न हो, फिर भी रजोगुणी अवश्य होगा। ऐसे व्यक्ति में सदैव धनाढय होने की, जनता में सम्मान पाने की या कोई बड़ा नेता बनने की अभिलाषाएँ बनी रहती हैं। वह दस्तकार न होकर भी दस्तकारों से प्रेम रखता हैं किसी विषय में पूर्ण ज्ञान रखते हुए भी वह अपनी योग्यता दूसरों पर प्रकट नहीं कर पाता। साधारण शुभ भाग्यरेखा के साथ भी सूर्य-रेखा अधिक उपयोगी समझी जाती है। इसमें संदेह नहीं कि जिस समय यह रेखा (सूर्य-रेखा) मनुष्य के हाथ में आरम्भ होती है उसी समय से उसके भाग्य में कुछ विशेष सुधार होने लग जाता है। यह रेखा निम्नलिखित सात स्थानों से आरम्भ होती है-

(1) मणिबन्ध या उसके समीप से।
(2) चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होकर सूर्यागुंलि की ओर
(3) जीवन-रेखा से।
(4) भाग्य-रेखा से प्रारम्भ होती है।
(5) मंगलक्षेत्र या हथेली के मध्य-भाग से।
(6) मस्तक-रेखा को स्पर्शकर
(7) हृदय-रेखा को स्पर्श करती (सूर्य के स्थान पर जाती है)।

 

इन सात स्थानों से प्रारम्भ होने वाली सूर्य-रेखा हमें समय समय पर हमारी दुर्घटनाओं या हमारे भाग्यसम्बन्धी अनेक अनेक जटिल प्रश्नों को हल करती है। यहां पृथक्-पृथक् सातों प्रकारों का विस्तृत विचार किया जा रहा है।

(1) यदि सूर्य-रेखा मणिबन्ध या उसके समीप से आरम्भ होकर भाग्य-रेखा के निकट समानान्तर अपने स्थान को जा रही हो तो यह सबसे उत्तम मानी गयी है। ऐसी रेखावाला व्यक्ति स्त्री या पुरूष प्रतिभा ओर भाग्य का मेल होने से, जिस काम को हाथ लगाता या आरंभ करता हैं उसमें पूर्णतः सफल होता है।

(2) इसके विपरीत यदि सूर्य-रेखा चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होती हो तो इसमें संदेह नहीं कि उसका भाग्य चमकेगा, पर उसकी यह उन्नति निजी परिश्रम द्वारा न होकर दूसरों की इच्छा ओर सहायता पर अधिक निर्भर करती हैं संभव है, उसे उसके मित्र सहायता करें, या इस सम्बन्ध में अपनी कोई शुभ सम्मति दें जिससे वह उन्नति के पथ पर अग्रसर हो।
चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होकर अनामिकांगुलि तक पहुंचने वाली गहरी सूर्यरेखा के सम्बन्ध में यह बात अवश्य ध्यान में रखने की है। ऐसे व्यक्ति का जीवन अनेक घटनाओं से भरा और संदेह पूर्ण होता है। उसमें बहुुत से परिवर्तन भी होते हें किन्तु यदि रेखा चन्द्रस्थान से निकलकर भाग्य-रेखा के समानान्तर जा रही हो तो भविष्य सुखमय हो सकता है। यदि प्रेम बाधक न हो, और विचारों में दृढ़ता होने के साथ ही साथ मस्तकरेखा भी अपना फल शुभ दे रही हो। निश्चय ही ऐसा व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) तेजस्वी और प्रसन्नचित्त होता है।, फिर भी उसमें एक बड़ा भारी दोष यह पाया जाता है कि उसके विचार कभी स्थिर नहीं रहते। सर्वसारण स्त्री या पुरूषों का उस पर अधिक प्रभाव पड़ता है। और अनायास ही वह अपने पूर्वनिश्चित विचारों को बदल देता हैं वह यश पाने की इच्छा करता है, किन्तु अपने संकल्प पर दृढ़ न रह सकने के कारण अपने प्रयत्नों अधिक सफल नहीं होता।

(3) जीवन-रेखा से आरम्भ होने वाली स्पष्ट सूर्य-रेखा भविष्य में उन्नति और यश बढाने वाली मानी गयी हैं किन्तु यह उन्नति उसके निजी परिश्रम और योग्यता से ही होती है। एक व्यावसायिक हाथ को छोड़कर शेष सभी हाथों में इसके प्रभाव से मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी कला में पूरी उन्नति कर सकता है। यह रेखा उपर्युक्त दशा में स्त्री या पुरूष के शीघ्र ग्राही होने का भी एक अचूक प्रमाण है ऐसे व्यक्ति सुन्दरता के पुजारी होते हैं ओर अपने जीवन का एक बड़ा भाग सौन्दर्य-उपासना में ही बिताते हैं यही कारण हैं कि वे उन स्त्री-पुरूषों की अपेक्षा, जिनकी सूर्य-रेखा स्वयं भाग्यरेखा से आरंभ हो रही हो, जीवन का अधिक उपभोग नहीं कर पाते।

(4) यदि यह रेखा भाग्य-रेखा से आरम्भ होती हो तो भाग्यरेखा के गुणों में वृद्धिकर उसकी शक्ति दूगनी कर देती है, प्रायः देखा गया है कि यह रेखा जिस स्थान से भाग्य-रेखा से ऊपर उठती है वहीं से किसी विशेष उत्कर्ष या उन्नति का आरम्भ होता है। रेखा जितनी ही अधिक स्पष्ट और सुन्दर होगी, उन्नति का क्षेत्र उतना ही विस्तृत और उन्नति भी अधिक होगी। ऐसी सूर्य-रेखा प्रायः ऐसे हाथों में भी दिख पड़ती है जो चित्रकार होना तो दूर रहा, एक सीधी रेखा भी नहीं खीच सकते। वे रंगों के अनुभवी भी इतने होते हैं कि पीले और गुलाबी रंग का अन्तर जानना भी उनकी शक्ति से बाहर की बात होती हैं अतः स्पष्ट है कि ऐसी रेखा वाला व्यक्ति कुशल कलाकार या दस्तकार नहीं हो सकता। हाँ, वह सुन्दरता का पुजारी और प्राकृतिक दृश्यों का प्रेमी अवश्य होता हैं दूसरे शब्दों में सुन्दरता तथा प्रकृति से प्रेम करना उनका एक स्वाभाविक गुण ही हो जाता हैं।

(5) मंगलक्षेत्र या हथेली के मध्यभाग से प्रारभ होने वाली सूर्य-रेखा अनेक अपत्ति और बाधाओं के बाद उन्नति सूचित करती है इसका सहायक मंगलक्षेत्र होता है यदि किसी के हाथ का मंगलक्षेत्र उच्च हो तो वह बहुत उन्नति करता है किन्तु मंगलकृत कष्ट भोग लेने के पश्चात् ही वह अपनी उन्नति कर पाता है।

(6) यदि यह रेखा मस्तकरेखा से आरंभ होती हो और स्पष्ट हो तो वह मानव के जीवन के मध्यकाल में (करीब 35 वें वर्ष) तक उन्नति करता है उसकी यह उन्नति जातीय योग्यता और मस्तिष्क शक्ति के अुनसार होती है।

(7) हृदय-रेखा से आरम्भ होने वाली सूर्य-रेखा जीवन के उत्तरकाल में मानव की उन्नति करती है। यह अवस्था लगभग 56 वर्ष की होगी, किन्तु एतदर्थ हृदयरेखा से ऊपर सूर्यरेखा का स्पष्ट होना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में उस स्त्री या पुरूष के जीवन का चैथा चरण सुखमय या कम से कम निरापदा बीतता है। इसके विपरीत यदि हृदय-रेखा से ऊपर सूर्य-रेखा का सर्वथा अभाव हो या वह छोटे-छोटे टुकडों से बनी या टूटी-फूटी हो तो जीवन का चैथाकाल चिन्ताओं से भरा और अन्धकारमय व्यतीत होगा, विशेषतः तब जब कि भाग्य रेखा निराशाजनक हो।

यदि सूर्य-रेखा और भाग्यरेखा दोनों ही शुभफल देने वाली होकर एक दूसरी के समानान्तर जा रही हों, साथ ही मस्तक-रेखा भी स्पष्ट और सीधी हो तो वह धनाढ़य और ऐश्वर्यपूर्ण होने का सबसे बड़ा लक्षण है। ऐसे योगवाला व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) बुद्धिमान् और दूरदर्शी होने के कारण जिस काम को हाथ लगाता हैं उसी में सफल होता है।

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यदि हाथ में सूर्य की अंगुली पहली अंगुली तर्जनी से अधिक लम्बी और बीच की मध्यमांगुलि के बराबर हो, साथ ही सूर्य-रेखा से अधिक बलवान् हो तो उस मनुष्य की प्रवृत्ति जुआ खेलने की ओर अधिक पायी जाती है, किन्तु उसमें धन या गुणों का अभाव नहीं होता। हाँ, कभी-कभी यदि मस्तक-रेखा नीचे की ओर झुकी हो तो उसका और भी अधिक बुरा प्रभाव पड़ता हैं जैसे-सदा सट्टा, लाटरी या जुआ खेलना, शर्त लगाना आदि।

यदि सूर्य-रेखा सूर्यक्षेत्र की ओर न जाकर शनि की अंगुली की ओर जा रही हो तो उस व्यक्ति की उन्नति या सफलता शोक और कठिनाइयों से मिली होती हैं। ऐसे व्यक्ति धनवान और उन्नतिशील होकर भी प्रायः सुखी नहीं रह पाते। यदि यह रेखा शनिक्षेत्र को काट रही हो या अपनी कोई शाखा गुरूक्षेत्र की ओर भेज रही हो तो उसकी उन्नति या सफलता कोई शासन-अधिकार अथवा राज्य द्वारा उच्च पद्वी पाने के रूप में होगी। परन्तु रेखा का यह लक्षण किसी भी दशा में इतना प्रभाव पूर्ण नहीं हो सकता जितना भाग्य-रेखा के गुरू अंगुली की ओर जाने के सम्बन्ध में हो सकता है।

प्रायः देखा गया है कि छोटी-छोटी एक या एक से अधिक रेखाएँ एक दूसरी के समानान्तर में सूर्यक्षेत्र पर दौड़ती पायी जाती हैं। ऐसे योगवाले व्यक्ति के विचार बिखरे होते हैं वह कभी कुछ करना चाहता है तो कभी कुछ। अतएव वह व्यापार, चित्रकारी या कला-कौशल किसी भी विशेष काम में कभी उन्नति नहीं कर पाता। सूर्यरेखा के साथ कुछ ऐसे चिन्ह भी पाये जाते हैं जो भाग्योन्नति में बाधा डालते हैं उदाहरणार्थ-हथेली यदि अधिक गहरी हो तो वह अशुभ लक्षण हैं।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer