वास्तु शास्त्र

वास्तु शास्त्र से करें गृह निर्माण :-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

प्रत्येक परिवार की पहली आवश्यकता होती है- अपना घर। मध्यम वर्ग इस सपने को संजोने के लिए जीवन भर संघर्ष करता है। जिस समय यह सपना सच होने जा रहा हो, तो हमें वह घर पूर्ण रूप से समृद्धि दें, इसका ध्यान रखना चाहिए। अत: वास्तु के अनुसार गृह निर्माण करवाना चाहिए।

किसी भी प्लॉट या भूमि पर गृह निर्माण करते समय यह ध्यान रखें कि भूमि (प्लॉट) के अग्नि कोण में खाना बनाने का स्थान (रसोई घर), दक्षिण-पश्चिम में शयन गृह, अस्त्र-शस्त्रागार, पश्चिम में भोजन करने का स्थान, वायव्य कोण में मेहमान का कमरा, ईशान में देवालय एवं उत्तर में भारी वस्तुयें रखने का स्थान होना चाहिए, तथा उत्तर-पूर्व के मध्य बाथरूम होना अच्छा है।

जल स्थान एवं वास्तुशास्त्र :-

मकान में पानी का स्थान सभी मतों से ईशान से प्राप्त करने को कहा जाता है, और घर के पानी को उत्तर दिशा में घर के पानी को निकालने के लिये कहा जाता है। लेकिन जिनके घर पश्चिम दिशा की तरफ़ अपनी फ़ेसिंग किये होते हैं, और पानी आने का मुख्य स्तोत्र या तो वायव्य से होता है, या फ़िर दक्षिण पश्चिम से होता है, उन घरों के लिये पानी को ईशान से कैसे प्राप्त किया जा सकता है? इसके लिये वास्तुशास्त्री अपनी अपनी राय के अनुसार कहते हैं, कि पानी को पहले ईशान में ले जायें।
मेरा मानना है कि घर के अन्दर पानी का इन्टरेन्स कहीं से भी हो, लेकिन पानी को ईशान में ले जाने से पानी की घर के अन्दर प्रवेश की क्रिया से तो वास्तुदोष दूर नही किया जा सकता है, लेकिन ईशान में रख कर उसका ख़राब इफ़ेक्ट तो हम कम कर सकते ही हैं।

पानी के प्रवेश के लिये अगर घर का फ़ेस साउथ में है, तो और भी जटिल समस्या पैदा हो जाती है, नैऋत्य दिशा से आता है तो कीटाणुओं और रसायनिक जांच से उसमे किसी न किसी प्रकार की गंदगी जरूर मिलेगी, और अगर वह अग्नि दिशा से प्रवेश करता है, तो घर के अन्दर पानी की कमी ही रहेगी, और जितना पानी घर के अन्दर प्रवेश करेगा, उससे कहीं अधिक महिलाओं सम्बन्धी बीमारियां मिलेंगी।

पानी को उत्तर दिशा वाले मकानों के अन्दर ईशान और वायव्य से घर के अन्दर प्रवेश दिया जा सकता है, लेकिन मकान के बनाते समय अगर पानी को ईशान में नैऋत्य से ऊंचाई से घर के अन्दर प्रवेश करवा दिया गया तो भी पानी अपनी वही स्थिति रखेगा जो नैऋत्य से पानी को घर के अन्दर लाने से माना जा सकता है।

पानी को ईशान से लाते समय जमीनी सतह से नीचे लाकर एक टंकी पानी की अण्डर ग्राउंड बनवानी चाहिए, फ़िर पानी को घर के प्रयोग के लिये लाना चाहिये। बरसात के पानी को निकालने के लिये जहां तक हो उत्तर दिशा से ही निकालें, फ़िर देखें घर के अन्दर धन की आवक में कितना इजाफ़ा होता है, लेकिन उत्तर से पानी निकालने के बाद आपका मनमुटाव सामने वाले पडौसी से हो सकता है, इसके लिये उससे भी मधुर सम्बन्ध बनाने की कोशिश करते रहे।

वास्तुशास्त्र में भवन का निर्माण करते समय जल का भंडारण किस दिशा में हो यह एक महत्वपूर्ण विषय है शास्त्रों के अनुसार भवन में जल का स्थान ईशान कोण (नॉर्थ ईस्ट) में होना चाहिए परन्तु उतर दिशा, पूर्व दिशा और पश्चिम दिशा में भी जल का स्थान हो सकता है, परन्तु आग्नेय कोण में यदि जल का स्थान होगा तो पुत्र नाश, शत्रु भय और बाधा का सामना होता है, दक्षिण पश्चिम दिशा में जल का स्थान पुत्र की हानि,दक्षिण दिशा में पत्नी की हानि, वायव्य दिशा में शत्रु पीड़ा और घर का मध्य में धन का नाश होता है।

वास्तु शास्त्र में भूखंड के या भवन के दक्षिण और पश्चिम दिशा की और कोई नदी या नाला या कोई नहर भवन या भूखंड के समानंतर नहीं होनी चाहिए परन्तु यदि जल का बहाव पश्चिम से पूर्व की और हो या फिर दक्षिण से उतर की और तो उत्तम होता है, भवन में जल का भंडारण आग्नेय, दक्षिण पश्चिम, वायव्य कोण, दक्षिण दिशा में ना हो, जल भंडारण की सबसे उत्तम दिशा पूर्व, उत्तर या ईशान कोण है।

अग्नि कोण के गेट वाले घर :-

अग्नि कोण के गेट वाले घरों में और उत्तर की तरफ़ सीढियों वाले मकान कभी भी कर्जे से मुक्त नही हो पाते हैं। जिन घरों के दरवाजे नैऋत्य में होते हैं, और उनके नैऋत्य में ही अगर पानी के टेंक अन्डरग्राउंड बना दिये गये हैं, तो उस मकान में रहने वाले जीवन भर कोर्ट केस और सरकारी कर्जों से मुक्त नही हो पाते हैं। अक्सर इस दिशा के दरवाजे वालों के दो ही पुत्र होते हैं, जिनमें बडे पुत्र के कारण पूरे घर की सम्पत्ति का विनाश हो जाता है,और अंत में वह भी एक पुत्री के होने के बाद अपनी लीला किसी तामसी कारण से समाप्त कर लेता है।

ईशान दिशा :-

यदि ईशान क्षेत्र की उत्तरी या पूर्वी दीवार कटी हो, तो उस कटे हुए भाग पर एक बड़ा शीशा लगाएं। इससे भवन का ईशान क्षेत्र प्रतीकात्मक रूप से बढ़ जाता है। यदि ईशान कटा हो, अथवा किसी अन्य कोण की दिशा बढ़ी हो, तो किसी साधु पुरुष अथवा अपने गुरु या बृहस्पति ग्रह या फिर ब्रह्मा जी का कोई चित्र अथवा मूर्ति या कोई अन्य प्रतीक चिह्न ईशान में रखें। गुरु की सेवा करना सर्वोत्तम उपाय है। बृहस्पति ईशान के स्वामी और देवताओं के गुरु हैं। कटे ईशान के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए साधु पुरुषों को बेसन की बनी बर्फी या लड्डुओं का प्रसाद बांटना चाहिए। यह क्षेत्र जलकुंड, कुआं अथवा पेयजल के किसी अन्य स्रोत हेतु सर्वोत्तम स्थान है। यदि यहां जल हो, तो चीनी मिट्टी के एक पात्र में जल और तुलसीदल या फिर गुलदस्ता अथवा एक पात्र में फूलों की पंखुड़ियां और जल रखें। शुभ फल की प्राप्ति के लिए इस जल और फूलों को नित्य प्रति बदलते रहें। अपने शयन कक्ष की ईशान दिशा की दीवार पर भोजन की तलाश में उड़ते शुभ पक्षियों का एक सुंदर चित्र लगाएं। कमाने हेतु बाहर निकलने से हिचकने वाले लोगों पर इसका चमत्कारी प्रभाव होता है। यह अकर्मण्य लोगों में नवीन उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है। बर्फ से ढके कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ योगी की मुद्रा में बैठे महादेव शिव का ऐसा फोटो, चित्र अथवा मूर्ति स्थापित करें, जिसमें उनके भाल पर चंद्रमा हो और लंबी जटाओं से गंगा जी निकल रही हों।
ईशान में विधि पूर्वक बृहस्पति यंत्र की स्थापना करें।

पूर्व दिशा में दोष /बचाव के उपाय :-

* यदि भवन में पूर्व दिशा का स्थान ऊँचा हो, तो व्यक्ति का सारा जीवन आर्थिक अभावों, परेशानियों में ही व्यतीत होता रहेगा, और उसकी सन्तान अस्वस्थ, कमजोर स्मरणशक्ति वाली, पढाई-लिखाई में जी चुराने तथा पेट और यकृत के रोगों से पीडित रहेगी।

* यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान न हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर हो, तो परिवार के मुखिया को आँखों की बीमारी, स्नायु अथवा ह्रदय रोग की स्मस्या का सामना करना पडता है।

* घर के पूर्वी भाग में कूडा-कर्कट, गन्दगी एवं पत्थर, मिट्टी इत्यादि के ढेर हों, तो गृहस्वामिनी में गर्भहानि का सामना करना पडता है।

* भवन के पश्चिम में नीचा या रिक्त स्थान हो, तो गृहस्वामी यकृत, गले, गाल ब्लैडर इत्यादि किसी बीमारी से परिवार को मंझधार में ही छोडकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

* यदि पूर्व की दिवार पश्चिम दिशा की दिवार से अधिक ऊँची हो, तो संतान हानि का सामना करना पडता है।

* अगर पूर्व दिशा में शौचालय का निर्माण किया जाए, तो घर की बहू-बेटियाँ अवश्य अस्वस्थ रहेंगीं।

बचाव के उपाय:-

* पूर्व दिशा में पानी, पानी की टंकी, नल, हैंडापम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा।

* पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है, जो कि कालपुरूष के मुख का प्रतीक है, इसके लिए घर के मुखिया को चांदी पर बना ‘सूर्य यन्त्र’ हमेशा धारण करना चाहिए, और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज (झंडा) लगायें।

* पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें, धन और वंश की वृद्धि होगी, तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढेगी।

• दूध, दही, घी, सिरका, अचार का स्थान रसोई के बगल में होना चाहिए। श्रृंगार एवं औषधि सामग्री शयनकक्ष के बगल में होना चाहिए। विद्यार्थियों के पढ़ने का कमरा देवालय के बगल में होना चाहिए।

• घर के आस-पास बड़, पीपल, इमली, कैथ, नींबू, कांटे वाले एवं दूध वाले वृक्ष नहीं होना चाहिए। इस वृक्षों के घर के आस-पास होने से धन की हानि होती है।

• कुआं एवं जल का स्थान मुख्य द्वार से पूर्व ईशान, उत्तर अथवा पश्चिम में होने से धन प्राप्त होता है। सौभाग्य में बढ़ोतरी होती है।

• अग्निकोण में संतान हानि, दक्षिण में गृहिणी का नाश, नैऋत्य कोण में गृह मालिक का नाश एवं वायु कोण में भय, चिंता बनी रहती है।

• भवन में स्तंभ लगाने की आवश्यकता हो, तो स्तंभ सम संख्या में लगवाना चाहिए। इनकी संख्या यदि विषम हो, तो अशुभ फल देते है।

• पूर्ण रूप से उपरोक्त विधि को ध्यान में रखते हुए भवन निर्माण करने से घर में सुख-समृद्धि, यश, वैभव एवं शांति प्राप्त होती है।

——————————————————————————–

अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

Astrological products and astrology course के लिए विजिट कीजिए :- www.shukracharya.com

श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष साधना

श्री महालक्ष्मी कल्पवृक्ष दीपावली सिद्धि प्रयोग :-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

वैसे तो श्रीमहालक्ष्मीजी की साधना अनेक अवसरों पर की जाती है, परंतु दीपावली पर्व श्रीमहालक्ष्मीजी की विशेष कृपा प्राप्ति का ऐसा पर्व है, जिस पर्व को साधक वर्ग तथा तंत्र के ज्ञाता महासिद्धिपर्व के नाम से पुकारते हैं, कारण यह है, कि प्रत्येक वर्ष में साधारण पर्व तो कम-से-कम 8 (1. चैत्र नवरात्र। 2. दो गुप्त नवरात्र। 3. शारदीय नवरात्र। यह चार नवरात्र पर्व हैं, तथा 4. होली। 5. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी। 6. महाशिवरात्रि। और 7. कम से कम दो ग्रहणकाल।) यह सभी 8 सिद्धिपर्व हर वर्ष साधकों के लिये उपलब्ध होते हैं। परंतु इसके अतिरिक्त महासिद्धिपर्व केवल एक ही उपलब्ध रहता है, और वह है- श्रीमहालक्ष्मीपर्व महासिद्धिपर्व ‘दीपावली पर्व’ जो सभी साधकवर्ग को प्रिय होता है, तथा इस विशेष अवसर की प्रतीक्षा हर एक को रहती है। चाहे वे तांत्रिक हो या साधक अथवा साधारण गृहस्थ ही हो। यहाँ आगे की पंक्तियों में इसी महासिद्धिपर्व (दीपावली) पर की जाने वाली एक विशेष साधना का उल्लेख किया जा रहा है, जिसे कोई भी साधक या गृहस्थ चाहे वे स्त्री हो या पुरूष सिद्ध कर सकता है, आवश्यकता है तो केवल दृढ़ इच्छाशक्ति की।

प्रस्तुत साधना “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” सिद्धि ऐसी महत्वपूर्ण साधना है, जिसमें कमलधारणी महालक्ष्मी के एक ऐसे यंत्र को सिद्ध किया जाता है, जिसमें एक ओर लक्ष्मी जी का यंत्र तथा दूसरी ओर श्रीलक्ष्मी का चित्र उत्कीर्ण हुआ हो, तथा वह यंत्र ऐसे आकार में बनाया गया हो, जो कि गले में धारण किया जा सके इसके लिए एक चांदी के ऐसे लाकेट को सिद्धि किया जाता है, जिसके एक ओर लक्ष्मी जी का यंत्र तथा दूसरी ओर श्री लक्ष्मी का चित्र उत्कीर्ण हुआ हो, यह साधना केवल दीपावली पर्व की मध्यरात्रि में ही सम्पन्न की जाती है। कमल धारिणी महालक्ष्मी की यह चांदी पर उत्कीर्ण लॉकेट “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” कहलाती है। इस सिद्ध लघु प्रतिमा को सिद्ध करने के उपरांत साधक या साधिका इसे गले में धारण कर सकते हैं। अर्थात सिद्ध श्री महालक्ष्मी कल्पवृक्ष हमेशा अपने ही निकट प्रकाशित होता रहता है। इस साधना को सम्पन्न करने वाले साधक या गृहस्थ को कभी भी किसी भौतिक वस्तु की कमी नही रहती। जब भी आवश्यकता हो मां लक्ष्मी के चरणों में बैठकर सच्चे मन से उसे याद करें श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष की तरह साधक की हर मुराद पूर्ण करती हैं, यदि साधक ने यह साधना सिद्ध कर ली है, और उसके पास अपना भवन नहीं, या वाहन नहीं या फिर विवाह अथवा संतान बाधा है, तो कल्पवृक्ष की तरह साधक सिद्ध श्रीमहालक्षमी कल्पवृक्ष प्रतिमा के समक्ष अपनी कामना रखे, वास्तव में ही वह कामना चाहे विवाह की हो या संतान के लिये अथवा भवन, वाहन के लिये हो अवश्य साधक इनका स्वामी होता है। इसी लिये तो इस साधना को तंत्र क्षेत्र के विद्वानों ने अति गोपनीय साधनाओं की श्रेणी में रखा है। साधना के उपरांत अपने गले में यह सिद्ध कल्पवृक्ष रखने मात्र से ही साधक को धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह साधना अन्धकार में प्रकाश की तरह है, जो साधक इस अद्वितीय साधना को दीपावली की रात्रि में सिद्ध करता है, (अपने घर या व्यापार स्थान में अथवा दोनो ही स्थानों में साधना द्वारा “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष”) धारण करता है, वह वास्तव में ही सौभाग्यशाली माना जाता है, वास्तव में ही उसके घर तथा व्यापार स्थल में समृद्धि के देव निवास करते हैं, वास्तव में ही उसके घर में कल्पवृक्ष स्थापित रहता है। और जब तक वह “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” गले में धारण किये रहता है, तब तक उस के घर में महालक्ष्मी का निवास सदा बना रहता है। देखा गया है कि इस साधना की सिद्धि करने वाले साधक के घर में जब से “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” स्थापित हुआ, कुछ ही दिनों में उसका कर्ज उतर गया, आर्थिक तंगी के कारण होने वाले घर के लड़ाई-झगड़े समाप्त हो गये, व्यापार में वृद्धि होने लगी, आर्थिक उन्नति और राज्य में सम्मान प्राप्ति होने लगी है, और उसके जन्म-जन्म के दुःख और दर्द समाप्त होने लगे हैं। वास्तव में ही इस सिद्धि की जितनी प्रशंसा उपनिषदों में की है, और आगे के ऋषियों ने भी इस साधना की विशेषताएं बतलाई हैं, वे अपने आप में अन्यतम हैं। इस सिद्धि से प्राप्त ऊर्जा के प्रभाव से श्रीमहालक्ष्मी का असीम भण्डार प्राप्त कर जीवन की पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। इस सकारात्मक ऊर्जा में तांत्रिक और मांत्रिक दोनों शक्तियों का पूर्ण समावेश है, यह सिद्धि अपने आप में अद्वितीय है।

साधना प्रयोग-
यद्यपि शास्त्रों में बताया गया है, कि ऐसी महासाधना हर मनुष्य को सिद्ध करना आवश्यक है, क्योंकि यदि साधक को सदा एक जैसी ऊर्जा बनाये रखनी है, तो जीवन में एक बार इस श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष साधना को अवश्य सिद्ध करना चाहिए, जिस की सकारात्मक ऊर्जा वर्षो तक साधक के शरीर में प्रभावशाली बनी रहती है।

इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन अमावस्या तिथि दिल्ली की गणना अनुसार लगभग 20:32 तक रहेगी। महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। इन दोनो महूर्त में स्वाती नक्षत्र 19 बजकर 37 मिनट तक, इसके पश्चात विशाखा नक्षत्र पढेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन दोनो लग्नों का यह समय दिल्ली प्रदेश के लिये है। शेष भारत अथवा विदेशों में रहने वाले पाठक अपने देश या प्रदेश के लिये उपरोक्त स्थिर लग्नों का समय shukracharya कार्यालय से फोन द्वारा पता कर सकते हैं। इन्हीं दो स्थिर लग्न में से किसी लग्न में जब अनुकूल चौघड़िया भी हो तब महालक्ष्मी पूजन किया जा सकता है।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़िया मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग। 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चौघड़िया
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चौघड़िया पूजन के समय होनी चाहियें। इस प्रकार शुद्ध ज्योतिषीय गणनाओं तथा विशेष दृष्टिकोंण से यह स्पष्ट होता है, कि साधना व पूजन के लिये 7 नवम्बर 2018 की रात्रि 19:00 से 19:52 वृषभ लग्न के साथ साथ शुभ का चौघडिया भी अत्यन्त विशेष फलदायक तथा सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त हैं। अतः सभी गृहस्थ तथा साधक-साधिकाओं से मेरा यही आग्रह है की वे इस वर्ष इसी मुहूर्त में दीपावली पूजन अथवा तंत्र-मंत्र सम्बंधी साधनायें सम्पन्न करें।

विनियोग- अस्य श्री महालक्ष्मी हृदयमाला मंत्रस्य भार्गव ऋषिः आद्यादि श्री महालक्ष्मी देवता, अनुष्टुपादिनाना छन्दांसि, श्री बीजम् हृीं शक्तिः, ऐं कीलकम् श्री महालक्ष्मी प्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

इसके बाद साधक हाथ में जल ले कर संकल्प करें कि मैं अमुक गौत्र अमुक पिता का पुत्र, अमुक नाम का साधक दीपावली के पर्व पर भगवती लक्ष्मी को नवनिधियों के साथ अपने घर में स्थापित करने के लिये यह प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूँ। ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल भूमि पर छोड़ दें, और फिर “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” (चांदी पर उत्कीर्ण लॉकेट) के सामने शुद्ध घृत के पांच दीपक लगावें (यह दीपक पूरी रात्रि जलते रहें इतना घी इनमें डाल देना चाहिये।) सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करें, और दूध के बने हुये प्रसाद का नैवेद्य समर्पित करें, इसके बाद हाथ जोड़ कर ध्यान करें।

ध्यान- हस्तद्वयेन कमले धारयन्तीं स्वलीलया। हारनूपुरसंयुक्तां लक्ष्मीं देवी विचिन्तये।।

इसके बाद साधक स्फटिक की सिद्धलक्ष्मी माला से निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप करें, इसमें सिद्धलक्ष्मी माला का ही प्रयोग होता है, यह विशेष ध्यान रखें।

महामंत्र- ॐ श्रीं हृीं ऐं महालक्ष्म्यै कमल धारिण्यै पुष्पसिंहासन्यै स्वाहा।

इसके बाद साधक लक्ष्मीजी की आरती करें और “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” को अपने पूजास्थान तथा सिद्धलक्ष्मी माला को पीले वस्त्र में लपेटकर अपनी तिजोरी में रख दें या पूजा स्थान में रहने दें, प्रसाद को घर के सभी सदस्यों में वितरित कर दें, इस प्रकार यह साधना सम्पन्न होती है जो कि इस वर्ष की श्रेष्ठतम और अद्वितीय साधना कही जा सकती है।

साधना सामग्री :- स्फटिक की सिद्धलक्ष्मी माला, तथा “सिद्ध श्रीमहालक्ष्मी कल्पवृक्ष” (चांदी पर उत्कीर्ण लॉकेट)। इस साधना सामग्री के लिए न्यौक्षावर राशि 3600/-रू मात्र है। जो कि विशेष मुहर्त में निर्मित करवाकर श्रीमहालक्ष्मी के सिद्ध मंत्रों से प्राणप्रतिष्ठित है, साधना सामग्री का पैकिट आप भी कार्यालय से मंगवा सकते हैं। इस पैकिट को जितना जल्दी हो सके मंगवा लें। दीपावली से कम से कम 20-25 दिन पहले तो अवश्य ही कार्यालय से सम्पर्क करके यह साधना सामग्री मंगवा लेना उचित होगा। क्योंकि पार्सल डाक द्वारा भेजा जाता है। पार्सल पहुँचने में कभी-कभी 10 से 15 दिन या अधिक का समय भी लग जाता है। अतः आपकी साधना समग्री सही समय पर आपके पास पहुँच जाये, इस बात का विशेष ध्यान रखें।

——————————————————————————–

अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

Astrological products and astrology course के लिए विजिट कीजिए :- www.shukracharya.com

मानसिक स्वास्थ्य

चिकित्सा ज्योतिष में मानसिक बीमारियों का अध्ययन:-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

आज के इस लेख में हम मानसिक स्वास्थ्य चर्चा करेंगे, मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाने के बहुत से कारण हो सकते हैं, परंतु इन कारणों का ज्योतिषीय आधार क्या है? इसकी चर्चा इस लेख के माध्यम से की जाएगी।

चिकित्सा ज्योतिष में शरीर में होने वाली सभी बीमारियों के योग बतायेगा गये हैं, और कुछ ग्रहों के परस्पर संबंध बनते हैं जिनके आधार पर यह पता चलता है कि जातक को किस तरह के रोग हो सकते हैं? लेकिन इसका निर्धारण किसी अनुभवी ज्योतिषी से ही कराना चाहिए अन्यथा बेकार का तनाव उत्पन्न हो सकता है, आइए कुंडली के उन योगों का अध्ययन करें जिनके आधार पर मानसिक रोगों का पता चलता है:-

मानसिक बीमारी में:- चंद्रमा, बुध, चतुर्थ भाव व पंचम भाव का आंकलन किया जाता है, चंद्रमा मन है, बुध से बुद्धि देखी जाती है और चतुर्थ भाव भी मन है, तथा पंचम भाव से बुद्धि देखी जाती है, जब व्यक्ति भावुकता में बहकर मानसिक संतुलन खोता है, तब उसमें पंचम भाव व चंद्रमा की भूमिका अहम मानी जाती है, सेजोफ्रेनिया बीमारी में चतुर्थ भाव की भूमिका मुख्य मानी जाती है, यह देखने के लिए अनुभवी ज्योतिषी शनि व चंद्रमा की युति भी मानसिक शांति के लिए शुभ नहीं मानते हैं, मानसिक परेशानी में चंद्रमा पीड़ित होना चाहिए।

जन्म कुंडली में चंद्रमा अगर राहु के साथ है, तब व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने की संभावना बनी रहती है क्योकि राहु मन को भ्रमित रखता है, और चंद्रमा मन है, मन के घोड़े बहुत ज्यादा दौड़ते हैं, व्यक्ति बहुत ज्यादा हवाई किले बनाता है,
यदि जन्म कुंडली में बुध, केतु और चतुर्थ भाव का संबंध बन रहा है, और यह तीनों अत्यधिक पीड़ित हैं, तब व्यक्ति में अत्यधिक जिद्दीपन हो सकती है,और वह सेजोफ्रेनिया का शिकार हो सकता है, इसके लिए बहुत से लोगों ने बुध व चतुर्थ भाव पर अधिक जोर दिया है।

जन्म कुंडली में गुरु लग्न में स्थित हो और मंगल सप्तम भाव में स्थित हो या मंगल लग्न में और सप्तम में गुरु स्थित हो तब मानसिक आघात लगने की संभावना बनती है।

जन्म कुंडली में शनि लग्न में और मंगल पंचम भाव या सप्तम भाव या नवम भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

कृष्ण पक्ष का बलहीन चंद्रमा हो और वह शनि के साथ 12वें भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग की संभावना बनती है।

शनि व चंद्र की युति में व्यक्ति मानसिक तनाव ज्यादा रखता है,
जन्म कुंडली में शनि लग्न में स्थित हो, सूर्य 12वें भाव में हो, मंगल व चंद्रमा त्रिकोण भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

जन्म कुंडली में मांदी सप्तम भाव में स्थित हो, और अशुभ ग्रह से पीड़ित हो रही हो, राहु व चंद्रमा लग्न में स्थित हो, और अशुभ ग्रह त्रिकोण में स्थित हों, तब भी मानसिक रोग की संभावना बनती है।

मंगल चतुर्थ भाव में शनि से दृष्ट हो या शनि चतुर्थ भाव में राहु/केतु अक्ष पर स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

जन्म कुंडली में शनि व मंगल की युति छठे भाव या आठवें भाव में हो रही हो, जन्म कुंडली में बुध पाप ग्रह के साथ तीसरे भाव में हो, या छठे भाव में हो, या आठवें भाव में हो, या बारहवें भाव में स्थित हो, तब भी मानसिक शांति नहीं मिलती, मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

यदि चंद्रमा की युति केतु व शनि के साथ हो रही हो तब यह अत्यधिक अशुभ माना गया है, और अगर यह अंशात्मक रुप से नजदीक हैं, तब मानसिक रोग होने की संभावना अधिक बनती है।

जन्म कुंडली में शनि और मंगल दोनो ही चंद्रमा या बुध से केन्द्र में स्थित हों तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

मिरगी होने के जन्म कुंडली में लक्षण :-

इसके लिए चंद्र तथा बुध की स्थिति मुख्य रुप से देखी जाती है, साथ ही अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जाती है, शनि व मंगल जन्म कुंडली में छठे या आठवें भाव में स्थित हो तब व्यक्ति को मिरगी संबंधित बीमारी का सामना करना पड़ सकता है।

कुंडली में शनि व चंद्रमा की युति हो, और यह दोनो मंगल से दृष्ट हों, जन्म कुंडली में राहु व चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हों, मानसिक रुप से कमजोर बच्चे अथवा मंदबुद्धि बच्चे जन्म के समय लग्न अशुभ प्रभाव में हो विशेष रुप से शनि का संबंध बन रहा हो, यह संबंध युति, दृष्टि व स्थिति किसी भी रुप से बन सकता है।

शनि पंचम से लग्नेश को देख रहा हो, तब व्यक्ति जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

जन्म के समय बच्चे की कुण्डली में शनि व राहु पंचम भाव में स्थित हो, बुध बारहवें भाव में स्थित हो, और पंचमेश पीड़ित अवस्था में हो, तब बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

पंचम भाव, पंचमेश, चंद्रमा व बुध सभी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तब भी बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

जन्म के समय चंद्रमा लग्न में स्थित हो और शनि व मंगल से दृष्ट हो तब भी व्यक्ति मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है।

पंचम भाव का राहु भी व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट करने का काम करता है, बुद्धि अच्छी नहीं रहती है।

——————————————————————————–

अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

Astrological products and astrology course के लिए विजिट कीजिए :- www.shukracharya.com

आत्महत्या का योग ( हस्तरेखा से)

हस्तरेखाओं के द्वारा हम जातक के जीवन में होने वाली प्रत्येक घटना Suicide का भी पूर्वानुमान लगा सकते हैं।

Dr.R.B.Dhawan (Top best astrologer in delhi)

मनुष्य के हाथ की प्रत्येक रेखा अपना विशेष महत्व रखती है, जैसे जीवन रेखा, भाग्य रेखा, मस्तिष्क रेखा, यश रेखा, स्वास्थ्य रेखा आदि। आगे की पंक्तियों में हम इन हस्तरेखाओं पर पाये जाने वाले चिन्हों और रेखाओं का विवरण लिखेंगे, जो चिन्ह यदि जातकों के हाथ में पाये जायें, तो वे मनुष्य अपनी प्रकृति के कारण अपने व्यक्तिगत चरित्र को प्रदर्शित करता है। शायद ही कभी ऐसा हो कि कोई चिन्ह या विशेषता हाथ पर किसी व्यक्ति की प्रकृति को नष्ट या धुंधला कर देती हो।

एक खतरनाक चिन्ह व्यक्ति की खतरनाक प्रकृति का पता इस तरह बता देता है। जिस प्रकार घड़ी समय की सूचना देती है, और घड़ी बनाने के लिये जैसे कई प्रकार के पुर्जों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार किसी व्यक्ति को अपराधी या सन्त बनाने के लिये भी हस्त विशिष्टताओं की आवश्यकता होेती है। जिन हाथों में आत्महत्या Suicide करने की प्रवृति होती है वे हाथ प्रायः लम्बे होते हैं। उस पर मस्तिष्क रेखा ढलवा होती है, तथा चन्द्र पर्वत अपने मूल स्थान पर उन्नत एवं विकसित होता है। वहाँ मस्तिष्क रेखा भी जीवन रेखा के साथ जुड़ी हुई होती है। जिसके कारण व्यक्ति की संवेदनशीलता में और अधिक वृद्धि हो जाती। ऐसे व्यक्ति आत्महत्या Suicide पर उतारू नहीं हो सकते, लेकिन अत्याधिक संवेदनशीलता एवं कल्पनाशीलता के कारण किसी कष्ट, दुख या कलंक का प्रभाव उन पर हजारों गुना अधिक होता है। तब शायद वह आत्महत्या करके अपने को शहीद बनाना चाहें। उन्नत शनि पर्वत क्षेत्र भी इस प्रकार की सूचना देता है, तब भी व्यक्ति संवेदनशील होता है, और मानसिक स्थिति से तंग आकर यह निश्चिय कर सकता है कि जीवन जीने योग्य नहीं है। ऐेसे में थोडी सी उकसाहट अथवा निराशा के कारण वह आत्महत्या Suicide कर सकता है।

किसी नुकीले या अधिक नुकीले हाथ में ढलवां मस्तिष्क रेखा का भी यही परिणाम होता है। लेकिन ऐसा व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप क्षणिक आवेश में आकर आत्महत्या Suicide कर सकता है, तथा कोई गहरा आघात अथवा मुसीबत ऐसे व्यक्ति को उत्तेजित करने के लिये काफी होती है। ऐसा व्यक्ति आत्महत्या करने के लिये पहले कुछ सोचता विचारता नहीं है। इसके विपरीत मस्तिष्क रेखा के अस्वाभाविक रूप से झुके हुये न होने पर भी व्यक्ति आत्महत्या Suicide कर लेता है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा जीवन रेखा के साथ जुड़ी होनी चाहिये

बृहस्पति (गुरू) पर्वत क्षेत्र धंसा हुआ तथा शनि पर्वत क्षेत्र पूर्ण उन्नत होना चाहिये। ऐसा व्यक्ति जीवन के संघर्ष में निराश एवं निरूत्साहित हो जाता है, और उसकी सहनशक्ति जबाब दे जाती है, और तब वह आत्महत्या Suicide कर बैठता है। लेकिन ऐसा वह सहसा नहीं करता, बल्कि परिस्थितियों पर पूर्ण रूप से विचार करने के बाद जब उसे आशा की कोई भी किरण दिखाई नहीं देती तब वह आत्महत्या Suicide कर लेता है।

आत्महत्या Suicide की प्रवृत्ति वालों को हत्या के विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है, तथा हाथ को देखकर अपराध करने की असाधारण प्रवृत्ति का पता लगाया जा सकता है। हाथ की बनावट देखकर यह भी पता लगाया जा सकता है कि अपराध का क्या रूप होगा। कुछ लोगों की अपराध करने की सहज प्रवृत्ति होती है, और इस पर संदेह नहीं किया जा सकता, पर कुछ व्यक्ति जन्मजात अपराधी भी होते हैं, जैसे जन्मजात संत। अपराधी प्रवृत्तियों का विकसित होना उस वातावरण और परिस्थिति पर निर्भर करता है, जिनमें व्यक्ति रहता है। आपने प्रायः देखा होगा कि कुछ बच्चों में हर वस्तु को नष्ट करने की प्रवृत्ति होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनमें बुद्धि की कमी होती है, बल्कि यह है कि नष्ट करने की प्रवृत्ति उनमें जन्मजात होती है। ऐसी प्रवृत्तियों को सुधारा जा सकता है, लेकिन कुछ लोगों में इस प्रकार की प्रवृत्ति इतनी अधिक होती है कि, यदि वे दूषित वातावरण अथवा परिस्थितियों में रहने लगें तो दुर्बल मानसिक शक्ति के कारण अथवा आवेश में आकर या प्रलोभन के शिकार होकर अपराधी बन जाते हैं। जहाँ तक हाथ का सम्बंध है, हत्या के अनुसार उसे तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

1. वे हत्या जो आवेश में आने पर क्रोधित होने पर या प्रतिशोध की भावना से की जा सकती है।

2. धन सम्पत्ति अथवा अन्य किसी लाभ के लिये की गई हत्या। ऐसी हत्या व्यक्ति द्वारा अपनी लालची प्रवृत्ति की संतुष्टी के लिये की जा सकती है।

3. जब हत्या करने वाला अपने शिकार के साथ भी मित्रतापूर्ण सम्बंध बनाये रखता है, ऐसी हत्या करने वालों को दूसरों को यातनायें देकर प्रसन्नता होती है, तथा काम की अपेक्षा हत्यारे की पैशाचिक वृत्तियों का पोषण होता है।

पहली श्रेणी साधारण होती है। व्यक्ति केवल परिस्थितिवश हत्यारा बन जाता है, ऐसे व्यक्ति सज्जन एवं भले मानस होते हैं, लेकिन किसी विशेष परिस्थिति में क्रोध से पागल होकर हत्या कर बैठते हैं। होश आने पर जब उन्हें अपने इस हिंसक कृत्य का आभास होता है, तो वे पश्चाताप के कारण टूटकर बिखर जाते हैं। इस प्रकार हत्या करने वाले व्यक्तियों के हाथ में अनियंत्रित क्रोध एवं पाश्विक उत्तेजना के अतिरिक्त दूसरा कोई अशुभ लक्षण नहीं होता है। इस प्रकार के व्यक्तियों के हाथ अविकसित अथवा वैसे होते हैं, ऐसे हाथों में मस्तिष्क रेखा छोटी-मोटी व लाल होती है, तथा नाखून छोटे व लाल व हाथ मारी व सख्त होते हैं। ऐसे हाथों का अंगूठा अति विशिष्ट यानी काफी नीचा छोटा अपने दूसरे पर्व पर मोटा व पहले पर्व पर गदामुखी होता है, ऐसा अंगूठा अत्यंत छोटा चैड़ा वर्गाकार व चपटा होता है, ऐसे व्यक्तियों के हाथों में शुक्र पर्वत क्षेत्र भी असाधारण रूप से उन्नत व विस्तृत होता है, उनमें काम वासना की अधिकता होती है, जिसके कारण वे इस प्रकार के कृत्य कर बैठते हैं।

दूसरी श्रेणी में कुछ भी असाधारण नहीं होता। ऐसे व्यक्तियों के हाथों की मस्तिष्क रेखा में ही विशेषता दिखाई पड़ती है, ऐसे हाथों पर मस्तिष्क रेखा गहरी बुध पर्वत क्षेत्र की ओर ऊपर को उठती हुई अथवा बुध पर्वत क्षेत्र पर पहुँचने से पहले दाँये हाथ में अपने स्थान से हटी हुई होगी। जैसे-जैसे व्यक्ति की प्रवृत्तियों में वृद्धि होती जाती है, वे हृदय रेखा पर अधिकार जमा लेती है। ऐसे हाथ प्रायः सख्त लेकिन अंगूठा असाधारण रूप से मोटा नहीं परंतु सख्त व अन्दर को सिकुड़ा हुआ होता है। अंगूठे की ऐसी बनावट व्यक्ति में लालची प्रवृत्ति की द्योतक होती है, ऐसे व्यक्ति अपने लाभ के लिये अपने अन्तर ज्ञान को भी खत्म कर देते हैं।

तीसरी श्रेणी सर्वाधिक दिलचस्प व सबसे अधिक भयावह भी हो सकती है, ऐसे हाथ में कोई भी असाधारण चिन्ह दिखाई नहीं देता लेकिन सभी विशेषताओं का पूर्ण निरीक्षण करने के बाद व्यक्ति की प्रवृत्ति उसके स्वभाव और छल कपट को देखा जा सकता है, ऐसे व्यक्ति का हाथ पतला लम्बा व सख्त होता है। अंगुलियाँ थोडी-थोड़ी भीतर को मुड़ी हुई तथा अंगूठा लम्बा और उसके दोनों पर्व पूर्ण विकसित होते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति में दृढ़ इच्छा शक्ति योजना बनाने व उसके क्रियान्वित करने की क्षमता होती है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा अपने स्थान पर भी हो सकती है, तथा उससे कुछ हटकर हाथ को पार करती हुई अपने सामान्य स्थान से कुछ ऊपर को भी स्थित होती है। यह व्यक्ति की कपटपूर्ण भावनाओं को व्यक्त करती है। ऐसी मस्तिष्क रेखा लम्बी व महान होगी तथा हाथ में शुक्र पर्वत क्षेत्र या तो धंसा हुआ होगा या बहुत उन्नत होगा।

यदि शुक्र पर्वत हस्त क्षेत्र में धंसा हुआ हो, तो व्यक्ति केवल अपराध करने के लिये ही अपराध करता है, लेकिन यदि शुक्र पर्वत क्षेत्र अत्याधिक उन्नत हो, तो हत्या या अपराध किसी पाश्विक वासना पूर्ति के लिये किया जाता है। अपराध जगत के दक्ष व्यक्तियों के हाथ ऐसे ही होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिये हत्या करना एक कला होती है, जिसे पूरा करने हेतु वह एक-एक विवरण का सूक्ष्म अध्ययन करते हैं। ऐसे व्यक्ति कभी भी हिंसापूर्ण ढंग से हत्या नहीं करते, क्योंकि इसे वे अश्लील समझते हैं। ऐसे व्यक्ति विष का सहारा लेते हैं, व उसका प्रयोग इतनी कुशलता के साथ करते हैं, कि हत्या नहीं बल्कि स्वाभाविक कारणों से हुई मृत्यु जान पड़ती है।

मेरे और लेख देखें :- rbdhawan@wordpress.com, shukracharya.com, astroguruji.in, vaidhraj.com, aapkabhavishya.in

प्रसिद्धि के योग

जीवन में प्रसिद्धि Fame पाने वाले मनुष्य भाग्यशाली होते हैं, क्योंकि प्रसिद्धि पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों के कारण ही इस जन्म में प्राप्त होती है, और इस जन्म में प्रसिद्धि मिलेगी या नहीं, मिलेगी तो किस स्तर तक मिलेगी? इस की सूचना जन्म कुंडली में ग्रह स्थिति से मिलती है। इस लेख के द्वारा प्रसिद्धि fame के ज्योतिषीय योगों की चर्चा की जा रही है :-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

वेदों को संसार का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना गया है। ज्योतिष शास्त्र भी वेद का ही एक अंग है। इसे सम्पूर्ण शास्त्र भी माना जाता है। इसलिये इसका प्रमाणिक ज्ञान प्राप्त कर उसे व्यावहारिक अर्थात प्रायोगिक तौर पर परखकर जगत का कल्याण करना प्रत्येक के वश की बात नहीं है। ज्योतिष शास्त्र द्वारा तीनों काल की जानकारी प्राप्त की जा सकती है, जबकि अन्य शास्त्र वर्तमान तक ही सीमित हैं। इसीलिये ज्योतिष रूपी महासागर में गोता लगाकर कल्याण करने हेतु विशेष बुद्धि की आवश्यकता रहती है। इसी के कारण जातक ज्योतिष के नियमों को सुनकर समझकर परिस्थितियों के अनुसार सामंजस्य बिठाकर विकल्प ढूँढना एवं अन्तिम सत्य का निर्माण करना संभव हो पाता है। प्राचीन काल में ज्योतिष ज्ञान एक वर्ग विशेष तक ही सीमित था लेकिन वर्तमान में ज्योतिष वर्ग विशेष तक सीमित न रहकर प्रत्येक वर्ग के लोग इसे सीख रहे हैं। विभिन्न संस्थायें भी ज्योतिष विषय के पाठ्यक्रम चलाकर डिप्लोमा एवं डिग्री स्तर के कोर्स करवा रही हैं। इन कोर्सों को करने के पश्चात ज्योतिष का ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन इस ज्ञान के द्वारा उसे धन, मान एवं सम्मान की प्राप्ति भी हो यह आवश्यक नहीं है।

वर्तमान में कम्प्यूटर के चलन के कारण वास्तविक ज्योतिषीय ज्ञाता पिछड़ रहे हैं। ये तथाकथित कम्प्यूटर ज्योतिषी कम्प्यूटर की भाषा में ही फलित बता देते है लेकिन फलित घटित होता नहीं है। तब ज्योतिष से मोह भंग होना भी स्वाभाविक है। ज्योतिषीय गणना हेतु कम्प्यूटर का प्रयोग सटीक है। लेकिन प्रयोग किये जाने वाले साॅफ्टवेयर की शुद्ध गणना की परख भी आवश्यक है। फलित एवं उपाय हेतु भी ज्योतिषी की बुद्धि का समावेश अति आवश्यक है। केवल गणित के सहारे ही कोई ज्योतिषी प्रसिद्धि fame प्राप्त नहीं कर सकता। प्रसिद्धि हेतु गणितीय ज्ञान के साथ-साथ फलित एवं उपाय ज्योतिष का ज्ञान अति आवश्यक है। किसी एक के अभाव में उसको पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती है। इन सबके पश्चात जन्मांग में ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त होने के योगों का होना भी अति आवश्यक है। इन योगों की जन्मांग में उपस्थिति ही उसकी प्रसिद्धि fame का स्तर निर्धारित करती है। भविष्य कथन के साथ-साथ ज्योतिषी स्वर्णिम भविष्य हेतु उपाय भी बताता है। इस कारण इसे भाग्यवाद का समर्थक शास्त्र माना जाता है लेकिन यह पूर्णतया कर्मवाद से प्रेरित है। पूर्व जन्म के शुभ अशुभ कर्मों के परिणाम स्वरूप ही इस जन्म में किसी जातक को प्रसिद्ध प्राप्त हो सकती है। इसलिये ज्योतिष शास्त्र हमेशा शुभ कर्म करने को प्रेरित कर मनुष्य का जीवन सुधारता है। उपरोक्त गुणों के होने पर ही कोई जातक ज्योतिष से प्रसिद्धि fame प्राप्त कर सकता है। यवन के मतानुसार –

चन्द्रा र जीवासुर पूजिताङा नरं प्रकुर्वान्ति सदा धनस्थाः।
विद्या विनितं गणक प्रधानं मेधाविनं ब्राह्मण वल्लभं च।।

अर्थात द्वितीय भाव में चंद्र, मंगल, बृहस्पति व शुक्र की युति हो तो जातक विद्या व विनय से सम्पन्न ज्योतिष में प्रवीण बुद्धिमान एवं ब्राह्मणों का प्यारा होता है। उदाहरणार्थ एक उभरते हुये युवा ज्योतिषी की कुण्डली दी जा रही है जिसने सामान्य मार्गदर्शन से ज्योतिष विद्या आत्मसात कर ली है एवं प्रसिद्धि भी दिनों दिन बढ़ती जा रही है जो कुंडली में स्थित ग्रह योगों के कारण ही सम्भव है –

प्रस्तुत कुंडली में द्वितीय भाव में चंद्र मंगल, बृहस्पति व शुक्र की युति ज्योतिष में प्रवीणता लाकर प्रसिद्ध fame का योग बना रही है। दशम भाव पर शनि, बुध, राहु व बृहस्पति की दृष्टि ज्योतिष में प्रसिद्धि दिला रही है। बृहस्पति की नीच दृष्टि के कारण संघर्ष की स्थिति भी बना रही है। पंचमेश सूर्य तृतीय भाव में एवं तृतीयेश बुध चतुर्थ में होने के कारण इनकी लेखनी शक्ति अच्छी बन रही है। चतुर्थेश उच्च राशि में, द्वितीयेश स्वराशि, लग्नेश व अष्टमेश उच्च नवांश में होने के कारण परम्परा से प्राप्त ज्ञान के अलावा स्वयं के शोध कार्य से प्रसिद्धि का योग भी बन रहा है। जातक तत्व के अनुसार –

जीवे स्वांशे मृदुवंशे त्रिकालज्ञः। जीवे गोपुरे शुभदृष्टे त्रिकालज्ञः।।

अर्थात बृहस्पति अपने नवांश, मृदु षष्टयंश या गोपुरांश में होकर शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक प्रसिद्ध ज्योतिषी होता है। यदि इस योग के साथ त्रिकोणेश भी बलवान हो तो प्रसिद्धि स्थायी रहती है।

दशम भाव पर एवं सप्तम भाव पर शनि मंगल राहु बृहस्पति व बुध, शुक्र का प्रभाव होने पर जातक प्रसिद्ध ज्योतिषी होता है। ये ग्रह जितने बली एवं योगकारक होकर स्थित होंगे उतनी ही प्रसिद्धि अधिक होती है।

प्रस्तुत कुण्डली प्रसिद्ध ज्योतिषि बी.वी. रमण की है। इनकी कुंडली में दशम भाव पर मंगल, शनि, राहु व चंद्र का दृष्टि प्रभाव है जो इन्हें गणित ज्योतिष में कुशल बना रहा है। एवं पूर्वाभास की शक्ति दे रहा है। सप्तम भाव एवं दशम भाव पर मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र की स्थिति प्रभाव इन्हें फलित ज्योतिष एवं उपाय ज्योतिष में प्रवीणता दे रहा है। इसी योग के कारण इन्हें धन मान सम्मान एवं प्रसिद्धि भी प्राप्त हुई। लग्न, दशम एवं द्वितीय भाव पर भावेशों का दृष्टि प्रभाव इसे प्रबल बना रहा है।

कारकांश कुंडली में द्वितीय, तृतीय व पंचम भाव पर बली केतु व बृहस्पति का स्थिति दृष्टि प्रभाव ज्योतिष में प्रसिद्धि प्राप्त करवाता है। जन्मांग चक्र में धन भाव में चंद्र मंगल की युति हो व अष्टम में बुध स्थित हो या सप्तम में मंगल हो तो जातक धन मान सम्मान की प्राप्ति ज्योतिष के द्वारा प्राप्त होती है। धन भाव में चंद्र मंगल की युति जातक को धन की प्राप्ति करवाता है तो अष्टम भाव में बुध की स्थिति ज्योतिष में गुढ ज्ञान या शोध कार्य में सहायता देती है। लेकिन बुध की चंद्र पर दृष्टि के कारण ऐसे जातक प्रसिद्धि fame तो इस ज्ञान के कारण प्राप्त कर सकते हैं लेकिन धन की प्राप्ति कमजोर ही रहेगी। यदि धन भाव में चंद्र बुध की युति बन जाये तब धनमान व सम्मान की प्राप्ति भी होती है। जन्मांग चक्र में बुध व बृहस्पति की बली स्थिति होने पर ही ज्योतिष की पूर्ण जानकारी सम्भव है। इसी प्रकार धनेश लाभेश शुक्र की बलवान स्थिति धन मान सम्मान की प्राप्ति हेतु आवश्यक है। बुध व मंगल शनि की राशि में हों एवं उस पर शनि की दृष्टि भी हो तो उसे ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त होती है।

चंद्र को ज्योतिष में मन का कारक माना है। इससे त्रिकोण में बृहस्पति व बुध से त्रिकोण में मंगल स्थित हो तो जातक त्रिकालज्ञ होता है। बृहस्पति को ज्ञान, बुध बुद्धि व ज्योतिष का, मंगल गणित व तर्क शक्ति का कारक है। तो शुक्र लक्ष्मी रूप है। अतः ज्योतिष द्वारा प्रसिद्धि हेतु मंगल बुध बृहस्पति व शुक्र का बलवान होकर शुभ स्थिति में होना आवश्यक है। जो ग्रह जन्मांग में अशुभ स्थिति में रहेगा उसके कारक सम्बंधी ज्योतिषी में गुणों की कमी होगी। यदि बुध व मंगल कमजोर हुआ तो उसे गणित ज्योतिष में असुविधा महसूस होगी। बुध एवं बृहस्पति कमजोर होने पर उसे ज्योतिषीय ज्ञान का सही समय पर सही उपयोग करने की असुविधा महसूस होगी। शुक्र की निर्बल स्थिति ज्योतिषी के लिये धन प्राप्ति में कमी कराती है। उसकी प्रसिद्धि एवं लोगों को आकर्षित करने की क्षमता भी कम रहती है। इसके लिये जन्मांग चक्र में ज्योतिष में प्रसिद्ध होने के योगों के साथ शुक्र का बलवान होना आवश्यक है। अतः किसी ज्योतिषी को प्रसिद्धि हेतु बुध, बृहस्पति व शुक्र का बलवान होना एवं शनि राहु का योगकारक होना आवश्यक है।

मेरे और लेख देखें :- rbdhawan.wordpress.com, astroguruji.in, shukracharya.com, guruji ke totke.com, vaidhraj.com पर।

शनि देव

ग्रहों में यदि शनिदेव न होते …

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant), top best astrologer in delhi

ज्योतिषाचार्य जब कुण्डली में उन ग्रहों की महादशा व अन्तर्दशा के संदर्भ में ग्रहों के प्रभावों का विचार करते हैं, तब शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार के परिणाम की सूचना मिलती है, किन्तु शनि के प्रभाव का निरूपण करते समय वे इन्हें नितांत दु:ख व शोक-कारक ग्रह के रूप में स्वीकार करते हैं। शनिदेव की महादशा के विषय में कहा गया है कि- शनिदेव की महादशा सदैव मनुष्य के लिए दु:ख, शोक, नैराश्य तथा असफलता आदि के रूप में ही आती है, तथा उस समय मनुष्य को सब कुछ शून्य दिखाई देता है। आलस्य का प्रभाव शरीर पर बहुत हो जाता है, मनुष्य की विवेक शक्ति क्षीण हो जाती है, उसे अपने ही परिश्रम का पूर्ण फल नहीं मिलता, वे बार-बार अपनों की निंदा का पात्र बनता रहता है। आप पाठक भी विचारकों के इस तथ्य से सहमत होंगे कि शनिदेव की महादशा के बारे में ऊपर जो कुछ कहा गया है वह अधिकाशतः सत्य है।

वस्तुतः शनिदेव के पास वह सब अधिकार हैं, जो एक न्यायाधीश अथवा दण्डनायक के पास होते हैं। किन्तु प्रत्येक कुण्डली वाले जातक के लिये वे ऐसा नहीं करते दण्ड वा न्याय के अतिरिक्त भी बहुत कुछ करते हैं। उदाहरणार्थ- यदि शनिदेव वृषभ या तुला राशि में होकर केन्द्र में हैं, अथवा कुण्डली में योगकारक होकर केन्द्र या त्रिकोंण में हैं, अथवा केन्द्रेश होकर त्रिकोणेश के साथ या त्रिकोणेश में होकर केन्द्रेश के साथ हैं, तो इनकी महादशा में निम्नलिखित शुभ परिणाम होते हैं :-

कृषि कार्य में सफलता तथा लाभ, पशुओं की समृद्धि, बहुत आय, नौकर-चाकरों से सुख, मूल्यवान वस्तुओं की प्राप्ति, कार्यों में सफलता, व्यापार व्यवसाय में लाभ, राज्य से सम्मान, राजनैतिक सफलता, स्पष्ट है कि शनिदेव केेवल शोक-दुःखप्रद ग्रह नहीं हैं अपितु परिस्थिति विशेष में वह अन्य सौम्य ग्रहों की तरह, तथा कभी-कभी उनसे भी अधिक सुख तथा सौभाग्य की सूचना देने वाले ग्रह हैं। शनिदेव को केवल शोकमय ग्रह बताना जनमानस तथा विद्वजनों का भ्रम है, यह पूर्ण सत्य नहीं है। सत्य तो यह है कि शनिदेव सबसे अधिक सत्य का ज्ञान करवाने वाले एवं न्याय-प्रिय ग्रह हैं। एक सत्यप्रिय एव न्यायनिष्ठ न्यायाधीश में जो गुण होने चाहिए वे सभी गुण ग्रहों में न्यायाधीश के पद पर विराजमान शनिदेव में भरपूर मात्रा में हैं। अतः प्रकृति ने इन्हें इस संसार के सर्वशक्ति सम्पन्न दण्डाधिकारी के रूप में नियुक्त किया है। एक सच्चे न्यायाधीश की तरह शनिदेव मनुष्य को न केवल उसके द्वारा कुकृत्यों का दण्ड देते हैं, अपितु प्राणियों को सुकर्मो का पुरस्कार भी देते हैं। ‘न्यायाधीश’ के व्यापक अर्थ में शनिदेव शिक्षक भी हैं, और दण्डाधिकारी भी हैं, यह कार्य शनिदेव अपनी महादशा, अंतरदशा अथवा साढेसाती में मनुष्य को तपा कर शुद्ध सोने की तरह (खोट रहित) बना देने के लिये ही करते हैं। इन की महादशा, अंतरदशा या शनि साढ़ेसाती के समाप्त होने पर मनुष्य अच्छी तरह समझ जाता है, कि यह सब उसके अपने ही बुरे कर्मो का फल था, और अब आगे उसे ऐसे कुकृत्यों से बचकर रहना है। इस लिये शनिदेव से मनुष्य अपने जीवन को सही ढंग से जीने की कला भी सीखता है। वे दार्शनिक भी हैं, धर्मगुरु भी हैं, मन में वैराग्य भाव पैदा कर मनुष्य को संन्यासी भी बनाने वाले यह शनिदेव हैं; क्योकि आत्म जागरण व सच्ची शिक्षा ही संसार की समस्त व्याधियों से बचने का एक मात्र सार्वभौम उपचार है। अतः संसार में शुभ या अशुभ फल प्रदान करने के लिए जितने शक्ति सम्पन्न शनिदेव हैं उतना अन्य कोई ग्रह नहीं है। जातक पारिजातकार ने ठीक ही कहा है :- आयुर्जीवन, मृत्युकारण, विपत्, सम्पत्, प्रदाता शनिः।

शनिदेव प्राणीयों को सब कुछ देते हैं, केवल पात्रता चाहिए। यह बात और है, कि इस कलियुग में मनुष्य सुकर्मों की अपेक्षा कुकृत्य अधिक करता है। अतः इसे पुरस्कार की अपेक्षा दण्ड ही अधिक भुगताना पड़ता है। यही कारण है कि इस ग्रह को शुभकारक की अपेक्षा अशुभकारक (दण्ड देने वाला) अधिक माना जाता है। पारम्परिक रूप से शनिदेव के स्वरूप की इस प्रकार वंदना की जाती है :-

नीलान्जनं समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड-सम्मूतं तं नमामि शनेश्चरम्।।

शनिदेव का यह स्वरूप हमें याद दिलाता है :- न्यायाधीश की वर्तमान वेशभूषा तथा उसके चारों ओर घिरे हुए काले कोट पहने हुए वकीलों से युक्त परिवार की। उक्त श्लोक का अर्थ इस प्रकार है। ‘मैं ऐसे स्वरूप वाले शनिदेव की वंदना करता हूं जो- नीली आभा लिये हुये काले काजल के समान कांति वाले हैं। (सभी न्यायाधीश काले कोट पहन कर काजल के समान कांतिवाले लगते हैं)। सूर्य के पुत्र हैं, (सूर्य ग्रहों में राजा या अधिकारी हैं, उन्होंने ही शनिदेव को जन्म दिया है)। यमराज के बड़े भाई हैं (यमराज जेलर अथवा जल्लाद का प्रतीक है)। छाया एवं मार्तण्ड से उत्पन्न है (सूर्य शासन, प्रकाश एवं छाया-अंधकार के प्रतीक हैं। कहीं प्रकाश कहीं अपराध या अंधकार है, इसी कारण जिनका जन्म हुआ है)। धीमे चलने वाले हैं, (अदालतों में अनेक तारीखों अथवा लम्बी प्रतीक्षा के बाद जाकर न्याय मिलता है। इसी लिये कहा भी जाता है :- भगवान के घर देर है, परंतु अंधेर नहीं।) निलम्बित प्रकरणों के लिए लोग व्यर्थ ही न्याय व्यवस्था को दोष देते हैं। इस प्रकार न्यायाधीश के पक्ष में भी उक्त श्लोक का अर्थ एकदम युक्तियुक्त हो जाता है :- मैं ऐसे न्यायाधीश की वंदना करता हूं जो काजल के समान कांति वाले हैं, शासन के कर्म-पुत्र हैं, शासन के द्वारा नियुक्त वरिष्ठ अधिकारी हैं, अंधकार जन्य कृत्यों के प्रति शासन की चिंता के कारण ही इनका जन्म हुआ है, तथा जो मंदगति से चलने वाले बहुत सोच विचार के पश्चात बेशक अधिक समय लग जाये परंतु सच्चा न्याय करने वाले हैं।

न्यायाधीश से शनिदेव का साम्य तो बाह्य वैचित्र्य है किन्तु अधिक महत्वपूर्ण तो आंतरिक साम्य है। न्यायाधीश, सिविल, सर्वेण्टस, दार्शनिक, खोजकर्ता वैज्ञानिक आदि की जन्म पत्रिकाओं में उनको उच्चपद दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका शनिदेव की ही रहती हैं। जब प्राणी को अपने बुरे कर्मो का फल मिलने का समय आ जाता है, तब उस समय किसी न किसी रूप में शनिदेव का प्रभाव उस पर होता ही है। चाहे वे प्रभाव महादशा के रूप में हो, चाहे अंतरदशा के रूप में अथवा साढेसाती के रूप में ही क्यो न हो, परंतु यह प्रभाव होता मनुष्य की आशा के विपरीत ही है। वैपरीत्य की स्थिति में सामान्य रूप में शनिदेव निम्नलिखित परिणाम देने वाले होते हैं :-

रोग, धनहानि, पर बंधन अर्थात जेल यात्रा, वियोग, प्रियजन की मृत्यु, मृत्यु अथवा मृत्युतुल्य कष्ट, क्रान्ति (प्रबल विरोध) अथवा गृहयुद्ध, क्षत्र-भंग। यदि किसी व्यक्ति का आहार-व्यवहार असंयमित है, तो उसके शरीर में किसी न किसी प्रकार का विकार हो जाना निश्चित है। शरीर की इस विकृति को दूर करने के लिए अपनी दशा-अन्तर्दशा में अथवा साढे़साती की अवधि में शनिदेव व्यक्ति को रोगी बना देते हैं, ताकि वह औषधि से संयमित बने। ऐसा करके वे उसका रेचन करते हैं, तथा संयम के रास्ते पर लाने के लिए एक संकेत देते हैं। हममें से अधिकांश को यह मालूम होगा कि साढ़ेसाती के तत्काल बाद की अवधि में मनुष्य अपने आपको तरो-ताजा तथा नया महसूस करता है। हर मनुष्य पर, प्रत्येक 30 वर्ष की अवधि में एक बार शनिदेव यह उपकार करते हैं। जब शरीर अत्यंत जीर्ण हो जाता है, तब अपने तृतीय उपकार के समय शनिदेव सदा के लिए ही इस कष्ट को दूर कर देते हैं। इस रूप में शनिदेव उस कठोर-डाक्टर की तरह हैं, जो रोगी की व्याधिनाश के लिए आॅपरेशन के समय रोगी के चिल्लाने की परवाह नहीं करता क्योंकि वास्तविकता कल्याण (निरोगता) में निहित है। मनुष्य का शनिदेव को दोष देना उसी प्रकार अनुचित है, जैसे बच्चों का, डाॅक्टर के हाथ में इंजेक्शन को देखकर भयभीत होना।
इसी प्रकार जब मनुष्य अवैध तरीके से आपार धन सम्पत्ति एकत्रित कर लेता है तो शनिदेव अपनी दशा, अन्तर्दशा में उसका वह धननाश अवश्य करते हैं। अत्याचारी या अपराधी प्रवृति वाले अधिकारी से प्रजा को होने वाले कष्ट से बेखबर राजा को वह निर्ममता पूर्वक धूल में मिला देते हैं। समाज में यदि शोषण अत्यधिक बढ़ जाये तो क्रांतिकारियों के रूप में शनिदेव पुनः व्यवस्था कायम कराते हैं। शनिदेव हर प्रकार से हारे हुये मानव का मार्गदर्शन भी करते हैं, तथा प्रतिनिधित्व भी करते हैं, अतः प्रत्येक विचार क्रांति में शनिदेव की प्रेरणा ही रहती है। अन्यायी कोई भी वर्ग हो, शनिदेव के दण्ड से बच नहीं सकता। शनिदेव का अपना जीवन अत्यंत सादा है, जो उसे सार्वभौम न्याय प्रशासक के लिये उपयुक्त बनाता है। अपनी इच्छाओं तथा आवश्यकताओं से व्यक्ति मार्ग से विचलित होता है। शनिदेव ने स्वेच्छा से राजकुमार होते हुए भी सेवक होना स्वीकार किया, किसी प्रकार की राजकीय ठाटबाट स्वीकार नहीं की, हाथी घोड़ों को छोड़कर उसने ‘महिष से ही संतोष’ किया। सोना-चांदी आदि आभूषणों, मूल्यवान वस्तुओं को छोड़कर लोहा ही स्वीकार किया। उड़द तथा तेल ही इन्हें संतोष देते हैं। इन्हें रंग-बिरंगे रेशमी वस्त्र भी पसंद नहीं- काला कपड़ा ही अभीष्ट है। राजमंत्री, न्यायाधीश, दार्शनिक आदि महान व्यक्तियों को बनाने वाले यह ग्रह रूप शनिदेव जो किसी को इन्द्र के समान वैभवशाली जीवन प्रदान करते हैं, तथा अपराधी, अत्याचारी होने पर इन्द्र जैसे वैभवशाली को भिखारी बनाकर धूल में भी मिला सकते हैं, परंतु इनका अपना जीवन सादा तथा आडम्बरहीन है। हम कह सकते हैं, कि शनिदेव साक्षात शिव के अवतार हैं, जो अमृत पिलाने के लिए स्वयं विषपान करते हैं। अब आप स्वयं ही विचार करें कि :- ग्रहों में यदि शनिदेव न होते…? तो संसार में कितना अंधकार होता? ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नमः।

मेरे और लेख देखें :- shukracharya.com, aapkabhavishya.in, astroguruji.in, rbdhawan@wordpress.com, gurujiketotke.com, vaidhraj.com

जेल यात्रा योग

जेल यात्रा का योग – Jail travel yog

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka bhavishya.in), Astrological consul

जेल आर्थात् बन्दीगृह jail योग। आधुनिक भाषा में जेल को बन्दी-सुधार गृह कहा जाता है, परंतु यह नहीं कह सकते कि जेल में जाकर कितने प्रतिशत बन्दी सुधर कर बाहर आते हैं।

कभी-कभी मानव को अपने दुर्भाग्य या सौभाग्यवश जीवन में जेल-यात्रा Jail travel भी करनी पड़ जाती है। लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि जेल-यात्रा करने वाले सभी व्यक्ति अपराधी होते है। सामान्यतया ऐसा आभास होता है कि सदाचारी व्यक्ति को जेल-यात्रा Jail travel की नौबत नहीं आ सकती। किन्तु ऐसा सोचना भ्रम है। हम प्रत्यक्ष देखते है कि नृशंस डाकू-हत्यारे, चोर और लुटेरे ही नही, बल्कि कुलीन घरानों के महापुरूष भी कभी-कभी बन्दीगृह के मेहमान बन जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का तो जन्म ही बन्दीगृह में हुआ माना जाता है। जेल-यात्रियों पर shukracharya संस्थान के संस्थापक Dr.R.B.Dhawan ने सैकड़ों कुंडलीयों का संकलन तथा उन पर शोधकार्य किया है, shukracharya के अनुसार इन जेल यात्रा करने वालों को हम सामान्यतया चार श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं –

1. भयंकर सामाजिक अपराधी, जैसे डाकू, हत्यारे आदि।
2. राजनैतिक अपराधी, जैसे नेता लोग।
3. कारागार प्रशासन से सम्बन्धित राजकीय कर्मचारी, जैसे जेलर, जेल के डाक्टर आदि।
4. कैदियों से मुलाकात के लिये जाने वाले उनके परिचित मित्र अथवा सम्बन्धी।

आइये, हम विचार करें कि जेल-यात्रा Jail travel का अध्ययन किसी जातक की जन्म-कुण्डली से किस प्रकार किया जाये? भारतीय ज्योतिष-ग्रन्थों में जेल-यात्रा के अनेक योगों का उल्लेख मिलता है। जातकालकांर के अनुसार यदि सम्पूर्ण अशुभ ग्रह 2, 5, 9 और 12 वें भावों में स्थित हों, तो जातक गिरफ्तार होकर जेल जाता है, और यदि जन्म लग्न में मेष, वृषभ अथवा धनु राशि हो तो उसे सपरिश्रम-कारावास का दण्ड मिलता है।

जातकतत्व :- में भी इसी नियम का निर्देश है, किन्तु साथ ही एक विधान और है कि यदि वृश्चिक लग्न हो और द्वितीय, द्वादश, पंचम एवम् नवम् भाव में अशुभ ग्रह हों तो, जातक हवालात में बन्द रहता है। यदि मेष, मिथुन, कन्या अथवा तुला लग्न हो, तथा द्वितीय, द्वाद्वश पंचम् और नवम् भाव में अशुभ गृह हों तो जातक हथकडी पहनता है। परन्तु यदि कर्क, मकर, अथवा मीन लग्न हो, और लग्न से द्धितीय एवम् द्वादश भावों में अशुभ ग्रह हों तो, जातक को राजकीय भवन में नजर बन्द रहना पड़ता है, और यदि पंचम् एवम् नवम् स्थान से कोई शुभ ग्रह लग्न को देखता हो तो, उसे बेड़ियाँ नहीं डाली जाती। यदि लग्नेश और षष्ठेश शनि के साथ युक्त होकर केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हों तो जातक को कैद की सजा होती है।

उत्तरकालामृत:- के अनुसार द्वादश भाव से जेल का बोध होता है। संकेत-निधि के अनुसार यदि शुक्र द्वितीय भाव में, चन्द्रमा लग्न में, सूर्य एवं बुध द्वादश भाव में, और राहु पचंम भाव में हों तो जातक को जेल की सजा होती है। इसी ग्रन्थ में जेल यात्रा के लिए षष्ठम् एवम् द्वादश भाव का विवेचन भी आवश्यक माना गया है। इस प्रकार हमारे आचार्यो ने द्वादश भाव के साथ-साथ पचंम् नवम् एवम् अष्टम् भावों की विवेचना को ‘जेल यात्रा’ के लिए आवश्यक निर्दिष्ट किया है।

आज के इस वैज्ञानिक युग में मानव सतर्क है। उसकी जिज्ञासाओं का विकास हुआ है। संक्षेप में उसे आत्म-संतुष्टि नहीं होती। वह लकीर का फकीर नही बना रहना चाहता । वह हर बात की गहराई में जाना चाहता है। उसे प्रश्नों का तर्क पूर्ण समाधान चाहिये। वह पूछ सकता है कि ‘जेल यात्रा’ की परिभाषा क्या है ? जेल यात्रा कितनी अवधि की होगी ? कब होगी ? किस कारण से होगी ? आदि-आदि । अनेक बातें हैं जिनका उत्तर देने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए, इसलिये विद्वान ज्योतिषी को इस विषय पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए।

जेल-यात्रा में जातक अपने परिवार से बिछुड़ जाता है। उसके स्वच्छन्द विचरण की स्वतन्त्रता नष्ट हो जाती है। निवास स्थान का परिवर्तन हो जाता है, सुख-शयन का अवसर समाप्त हो जाता है, इन्हें हम ज्योतिषीय भाषा में इस प्रकार कह सकते है:–

1. परिवार (द्वितीय भाव) से वियोग।
2. स्वच्छन्द विचरण (द्वादश भाव ) में बाधा।
3. निवास स्थान (चतुर्थ भाव) का परिवर्तन।
4. शयन-सुख (द्वादश भाव) का अभाव।

5. मानसिक कष्ट (अष्टम् भाव)।
6. शारीरिक श्रम (षष्ठम् भाव) सामाजिक।
7. आत्मग्लानि (पंचम् भाव) पराधियों।
8. हार्दिक पश्चाताप (नवम् भाव) की स्थिति में।

ज्योतिष-जगत के आधुनिक विचारक एवम् सूक्ष्मनक्षत्र-गणित प्रणाली के अनन्य अन्वेषक स्वर्गीय प्रो. कृष्णमूर्ति जी ने अपने जीवन की दशाब्दियों के मन्थन एवम् प्रत्याक्षानुभूतियों के आधार पर ज्योतिष के अध्ययनशील समाज को एक नवीनतम दिशा प्रदान की है। उनकी तर्कपूर्ण मान्यतायें एवम् फलादेश के सरल और सुग्राह्य नियम कृष्णमूर्ति पद्धति के रूप में विख्यात है। देश में ही नहीं, विदेशी ज्यौतिर्विदों ने भी कृष्णमूर्ति पद्धति में आस्था एवम् अभिरूचि व्यक्त की है। आधुनिक युग में जेल-यात्रा योगों का विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता हैः–

1. वे अशुभ ग्रह जो द्वितीय और द्वादश भावस्थ ग्रहों के नक्षत्र में हों ।

2. द्वितीय और द्वादश भावस्थ ऐसे ग्रह जो दुःस्थानों (6, 8, 12) के स्वामी हों।

3. वे अशुभ ग्रह जो द्वितीय और द्वादश भावों के अधिपति ग्रहों के नक्षत्र में हों ।

4. द्वितीय और द्वादश भावों के स्वामी ग्रह।

इन ग्रहों की महादशा (विशोत्तरी), अन्तर्दशा अथवा प्रत्यन्तर में (जब संयुक्त रूप से दशाकाल इन्हीं ग्रहों द्वारा नियन्त्रित हो, तथा गोचर में सूर्य, चन्द्रमा एवम् दशानाथ मुक्तिनाथ आदि पारस्परिक नक्षत्रों एवम् सूक्ष्म में विचरण करें तब) जातक को जेल-यात्रा करनी पड़ेगी। जेल-यात्रा का कारण प्रमुखतः द्योतक ग्रहों Significators के अनुसार इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है:–

1. यदि लग्नेश उपरोक्त द्योतक-ग्रहों (Significators) से किसी प्रकार का सम्बन्ध रखता हो, तो जातक को अदालत के द्वारा जेल की सजा होती है।

2. यदि षष्ठेश उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध रखता हो तो जातक को दीवानी अदालत से, कर्जा न चुकाने के अपराध में, सजा होती है।

3. गुरू, शुक्र या नवमेश यदि लग्नेश तथा उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध रखते हों तो जातक को राजनैतिक कारणों से जेल की सजा होती है।

4. यदि मंगल अष्टमेश हो कर उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध रखता हो तो चोरी या डकैती के आरोप में जेल की सजा होती है।

5. यदि शनि और बुध उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्धित हो तो रिश्वतखोरी, मुनाफाखोरी, जालसाजी अथवा गबन के आरोप में जेल की सजा होती है।

6. मंगल, शनि और शुक्र का उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध, जातक को बलात्कार अथवा अपहरण के अपराध में जेलयात्रा करवाता है।

7. मंगल और शनि का उपरोक्त ग्रहों तथा अष्ट्म भाव से सम्बन्ध हो, तो हत्या के अपराध में जातक को जेल का मार्ग प्रशस्त होता है।

इसी प्रकार जेल से मुक्ति का तात्पर्य है, परिवार से पुनर्मिलन एवं स्वेच्छाचरण की स्वतन्त्रता। यह स्थिति द्वितीय एवं एकादश भावों के अन्तर्गत आती है। अतः जेल से मुक्ति का निर्धारण वे शुभ ग्रह करते हैं, जो उपरोक्त रीति से द्वितीय एवं एकादश भावों के संयुक्त द्योतक हों। सारांश यह कि र्विशोत्तरी दशा-काल में द्वितीय एवं द्वादश भावों के द्योतक ग्रहों की दशा जहां जेल यात्रा इंगित करती है, वहीं द्वितीय एवं एकादश भावों के द्योतक ग्रहों की संयुक्त दशा जेल से मुक्ति का समय दर्शाती है। इस प्रकार जेल-प्रवास की अवधि का अनुमान लगाया जा सकता है। उपरोक्त विवेचन के अतिरिक्त कुछ अन्य बातें भी ध्यान में रखने की आवश्यकता हैं –

1. यदि द्वितीय एवं द्वादश भावों के द्योतक-ग्रह (Significators) तृतीय, षष्ठम् अथवा नवम् भावों में स्थित हों तथा उक्त भाव में यदि स्थिर राशि हो तो जेल यात्रा की अवधि लम्बी हो सकती है।

2. यदि अष्टमेश बली हो एवम् दूषित भी हो तो जातक की मृत्यु जेल-प्रवास की अवधि में ही हो जाती है।

3. जेल यात्रा का कारक ग्रह राहु है। यदि द्वितीय या द्वादशस्थ ग्रह राहु के नक्षत्र में हों अथवा राहु के सूक्ष्म (sub) में हो तथा राहु द्वितीय अथवा द्वादश भाव से सम्बन्ध रखता हो तो जातक को जेलयात्रा करनी ही पड़ती है। चाहे उसने अपराध किया हो अथवा नहीं। जेल-कर्मचारी अथवा किसी अन्य कार्यवश जेल में आने जाने वाले व्यक्तियों की कुण्डली में इसका प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।

(Top best astrologer in Delhi), shukracharya, marriage and after marriage problems salution.

मेरे और लेख देखें :- rbdhawan.wordpress.com, aapkabhavishya.in, shukracharya.com, astroguruji.in, gurujiketotke.com, vaidhraj.com पर।

कबाड़ और वास्तु

घर का कबाड़ और वास्तुशास्त्र :-

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka bhavishya.in), Astrological consultant

संग्रह करना मानव के स्वभाव में है। यह संग्रह किसी भी प्रकार हो सकता है जैसे धन, आभूषण, कपड़े, फर्नीचर, सुंदर वस्तुएं, कबाड़ इत्यादि। घर का कबाड़ वह होता है जिसकी जरूरत कभी-कभार ही पड़ती है परंतु कब पड़ जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। इसलिये इसे घर से निकालते समय मन में विचार रहता है कि शायद किसी समय इसमें से किसी वस्तु की आवश्यकता पड़ जाये और सच में देर-सबेर उनकी जरूरत पड़ भी जाती है। इस प्रकार के अनचाहे घरेलू सामान के संग्रह को ही कबाड़ कहा जाता है। घर का कबाड़ कहां और किधर रखा है। उससे उस घर में रहने वालों की आर्थिक, मानसिक और शारीरिक स्थिति का पता चल जाता है। आइये देखते हैं कि, किस तरह से घर में रखे कबाड़ का प्रभाव वहाँ रहने वालों के जीवन पर पड़ता है –

पूर्व:- घर की इस दिशा में घर का कबाड़ भरा हो तो घर के मालिक को किसी अनहोनी का सामना करना पड़ता है।
आग्नेय:- इस स्थान पर घर का कबाड़ रखने से घर के मुखिया की आमदनी घर के खर्चे से कम होने के कारण उस पर कर्ज बना रहता है।

आग्नेय:- यहां बहुत ऊर्जा रहती है, यदि यहां कबाड़ रखा जाता है तो, इस दिशा में शनि की विशेष वस्तुओं को नहीं रखें, शनि की विशेष वस्तुओं में – लकड़ी, लोहा और किसी भी तरह का तेल या पेट्रोलियम प्रोडक्ट आता है। इलैक्ट्रिक या इलैक्ट्रोनिक वस्तुओं, खाली सेलेन्डर, चूल्हा रख सकते हैं।

दक्षिण:- यहाँ बेडरूम में कबाड रखा जाये या बर्तन, लकड़ी का सामान, घड़े इत्यादि रखे जायें तो मालिक के भाई को कठिनाईयां और खतरों का सामना करना पड़ता है। घर का मुखिया की बातचीत में घमंड और अंहकार झलकता है और वह आगे जाकर शक्ति विहीन होकर अशांत रहता है।

नैऋत्य:- घर में कबाड़ रखने का सबसे उत्तम स्थान यही होता है। परंतु ध्यान रहे यहाँ पर किसी प्रकार की नमी या सिलन नहीं रहनी चाहिये और कमरे में रोशनदान अवश्य होना चाहिये। यदि यहाँ कम रोशनी या अंधेरे के साथ नमी हो और कबाड़ भी रखा गया हो तो ऐसी स्थिति में घर वालों को यहाँ भूत-प्रेत होने का एहसास होता है।

पश्चिम:- इस दिशा में यहाँ पर पुरानी त्यागी हुई वस्तुयें रखी जायें। खिड़की दरवाजे टूटी-फूटी हालत में हो, दीवारे खराब हों तो यहाँ रहने वाले हर कार्य को बहुत धीरे-धीरे करते है और उनमें समझ की कमी होती है। आमदनी का जरिया धोखा और फरेब होता है और घर का मुखिया गलत लोगों के संगत में रहता है और परिवार में हमेशा विवाद होते हैं और आरोप लगते रहते हैं।

वायव्य:- घर की इस दिशा में यदि कबाड़ रखा जाता है तो उस घर के मुखिया को अपने मित्रों की शत्रुता की जिम्मेदारी स्वयं उठानी पड़ती है। मुखिया को मानसिक अंशाति और उसका मन विचलित रहता है। उसकी माँ को कफ एवं कोल्ड और गैस की शिकायत रहती है। यह स्थिति यह भी दर्शाती है कि घर का मुखिया बहुत दूर से यहाँ आकर बसा है।

उत्तर:- यहाँ पर कबाड़ रखा गया हो तो मुखिया को उसके भाईयों से खुशियां कम प्राप्त होती है और उसका सबसे छोटा भाई मानसिक विक्षिप्त हो सकता है।

ईशान:- यहाँ पर यदि कबाड़ रखा जाये तो घर में रहने वाले नास्तिक होते हैं और इनको भगवान में श्रद्धा नहीं होती। उन्हें जोड़ों में दर्द की समस्या रहती है। घर के अंदर मुख्यद्वार के बाँये हाथ के कमरे में कबाड़ पड़ा रहता हो तो उस घर की महिला की आँखों में तकलीफ होती है और पति-पत्नी में आपसी तालमेल एवं सहयोग बड़ा साधारण रहता है। जिस घर में कबाड़ रखने का कमरा अन्य कमरों की तुलना में बड़े रहते है साथ ही वहाँ पर अंधेरा भी रहता है। वहाँ रहने वाले कुछ इस तरह के बेवकूफों जैसे कार्य करते है कि उनकी लोगों के साथ शत्रुता हो जाती है।

मेरे और लेख देखें :- rbdhawan.wordpress.com, aapkabhavishya.in, shukracharya.com, astroguruji.in, gurujiketotke.com, vaidhraj.com पर।

पुष्प चिकित्सा

कैसे करें पुष्पों से चिकित्सा –

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka Bhavishya), top best astrologer in Delhi

पुष्प, जहाँ अपनी सुन्दरता से मन को आह्लादित एवं प्रफुल्लित करते है, वहीं वे अपनी सुगन्धि से सम्पूर्ण परिवेश को आप्यायित का सुवासित भी कर देते है। अपने आराध्य के चरणों में प्रेमी भक्त की पुष्पांजलि प्रेमास्पद का सहसा प्राकट्य करा देती है। पुष्पों की अनन्त महिमा है। पुष्प के सभी अवयव उपयोगी होते हैं। इनके यथाविधि उपयोग से अनेक रोगों का शमन किया जा सकता है।

फूलों के रस से तैयार किया गया लेप बाह्य रूप से त्वचा पर लगाने से उसकी सुगन्धि हृदय तथा नासिका तक अपना प्रभाव दिखाकर मन को आनन्दित कर देती है। सबसे अच्छी बात यह है कि पुष्प-चिकित्सा के कोई दुष्प्रभाव नहीं होते। फूलों को शरीर पर धारण करने से शरीर की शोभा, कान्ति, सौंदर्य और श्री की वृद्धि होती है। उनकी सुगन्धि रोगनाशक भी है। फूल के सुगन्धित परमाणु वातावरण में घुलकर नासिका की झिल्ली में पहुँचकर अपनी सुगन्धि का मस्तिष्क, हृदय, आँख, कान तथा पाचन क्रिया आदि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। ये थकान को तुरंत दूर करते हैं। इनकी सुगन्धि से की गयी उपचार प्रणाली को एरोमा थेरेपी कहा जाता है। यहाँ कुछ पुष्पों के संक्षेप में औषधीय प्रयोग दिये जा रहे हैं, सम्यक् जानकारी प्राप्त करके उनसे लाभ उठाया जा सकता है –

कमल:- कमल और लक्ष्मी का सम्बंध अविभाज्य है। कमल सृष्टि की वृद्धि का द्योतक है। इसके पराग से मधुमक्खी शहद तो बनाती ही है, इनके फूलों से तैयार किये गये गुलकन्द का उपयोग प्रत्येक प्रकार के रोगों में तथा कब्ज के निवारण हेतु किया जाता है। कमल के फूल के अंदर हरे रंग के दाने से निकलते है, जिन्हें भूनकर मखाने बनाये जाते हैं, परंतु उनको कच्चा छीलकर खाने से ओज एवं बल की वृद्धि होती है। इनका गुण शीत है। इसका सबसे अधिक प्रयोग अंजन की भाँति नेत्रों में ज्योति बढ़ाने के लिये शहद में मिलाकर किया जाता है। पंखुड़ियों को पीसकर उबटन में मिलाकर चेहरे पर मलने से चेहरे की सुन्दरता बढ़ती है।

केवड़ा:- इसकी गंध कस्तूरी जैसी मोहक होती है। इसके पुष्प दुर्गन्धनाशक तथा उन्मादक है। केवड़े का तेल उत्तेजक श्वासविकार में लाभकारी है। इसका इत्र सिरदर्द और गठिया में उपयोगी है। इसकी मंजरी का उपयोग पानी में उबालकर कुष्ठ, चेचक, खुजली तथा हृदय रोगों में स्नान करके किया जा सकता है। इसका अर्क पानी में डालकर पीने से सिरदर्द तथा थकान दूर होती है। बुखार में एक बूँद देने से पसीना बाहर आता है। इसका इत्र दो बूँद कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है।

गुलाब:- गुलाब का पुष्प सौंदर्य, स्नेह एवं प्रेम का प्रतीक है। इसका गुलकंद रेचक है, जो पेट और आँतों की गर्मी शांत करके हृदय को प्रसन्नता प्रदान करता है। गुलाब जल से आँखें धोने से आँखों की लाली तथा सूजन कम होती है। गुलाब का इत्र उत्तेजक होता है तथा इसका तेल मस्तिष्क को ठंडा रखता है। गुलाब के अर्क का भी मधुर भोज्य पदार्थों में प्रयोग किया जाता है। गर्मी में इसका प्रयोग शीतवर्धक होता है।

चंपा:- चंपा के फूलों को पीसकर कुष्ठरोग के घाव में लगाया जा सकता है। इसका अर्क रक्त-कृमि को नष्ट करता है। इसके फूलों को सुखाकर बनाया गया चूर्ण खुजली में उपयोगी है। यह उत्सर्जक, नेत्रज्योति वर्धक तथा पुरूषों को शक्ति एवं उत्तेजना प्रदान करता है।

सौंफ (शतपुष्पा):- सौंफ अत्यंत गुणकारी है। सौंफ के पुष्पों को पानी में डालकर उबाल लें, साथ में एक बड़ी इलायची तथा कुछ पुदीना के पत्ते भी डाल दें। अच्छा यह रहे कि मिट्टी के बर्तन में उबाले पानी को ठंडा करके दाँत निकलने वाले बच्चे या छोटे बच्चे जो गर्मी से पीड़ित हों, उन्हें एक-एक चम्मच कई बार दें। इससे उनके पेट की पीड़ा शांत होगी तथा दाँत भी ठीक प्रकार से निकलेंगे।

गेंदा:- मलेरिया के मच्छरों का प्रकोप दूर करने के लिये यदि गेंदे की खेती गंदे नालों और घर के आस-पास की जाये तो इसकी गंध से मच्छर दूर भाग जाते हैं। लीवर के रोगी के लीवर की सूजन, पथरी एवं चर्मरोगों में इसका प्रयोग किया जा सकता है।

बेला:- यह अत्याधिक सुगंधयुक्त प्रदाहनाशक है। उसकी कलियों को चबाने से स्त्रियों के मासिक धर्म का अवरोध दूर हो जाता है।

रात-रानी:- इसकी गंध इतनी तीव्र होती है कि यह दूर-दूर तक के स्थानों को मुग्ध कर देती है। इसका पुष्प प्रायः सांयकाल से लेकर अर्धरात्रि के कुछ पूर्व तक सुगन्ध अधिक देता है। पंरतु इसके बाद धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है इसकी गंध से मच्छर नहीं आते। इसकी गंध मादक और निद्रादायक है

सूरजमुखी:- इसमें विटामिन ए तथा डी होता है। यह सूर्य का प्रकाश न मिलने के कारण होने वाले रोगों को रोकता है। इसका तेल हृदय रोगों में कोलेस्ट्राॅल को कम करता है।

चमेली:- चर्मरोगों, पायरिया, दंतशूल घाव, नेत्ररोगों और फोड़े-फुंसियों में चमेली का तेल बनाकर उपयोग किया जाता है। यह शरीर में रक्तसंचार की मात्रा बढ़ाकर उसे स्फूर्ति प्रदान करता है। इसके पत्ते चबाने से मुँह के छाले तुरंत दूर हो जाते हैं। मानसिक प्रसन्नता देने में चमेली का अद्भुत योगदान है।

केसर:- यह मन को प्रसन्न करता तथा चेहरे को कान्तिमान बनाता है। यह शक्तिवर्धक, वमन को रोकने वाला तथा वात, पित्त एवं कफ (त्रिदोषों) का नाशक है। तन्त्रिकाओं में व्याप्त उद्विन्नता एवं तनाव को केसर शांत रखता है। इसलिये इसे प्रकृति-प्रदन्त टैंकुलाइजर, भी कहा जाता है। दूध या पान के साथ इसका सेवन करने से यह अत्यंत ओज, बल, शक्ति एवं स्फूर्ति को बढ़ाता है।

अशोक:- यह मदन-वृक्ष भी कहलाता है। इसके फूल, छाल तथा पत्तियाँ स्त्रियों के अनेक रोगों में औषधि के रूप में उपयोगी है। इसकी छाल का आसव सेवन कराकर स्त्रियों की अधिकांश शोक (मानसिक पीड़ा) को ठीक किया जा सकता है।

ढाक (पलाश):- ढाक को अप्रतिम सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि इसके गुच्छेदार फूल बहुत दूर से ही आकर्षित करते हैं। इसी आकर्षण के कारण इसे वन की ज्योति भी कहते हैं। इसका चूर्ण पेट के किसी भी प्रकार के कृमिका नाश करने में सहायक है। इसके पुष्पों को पानी के साथ पीसकर लुगदी पेडू पर रखने से पथरी के कारण दर्द होने पर या नाम उतरने पर लाभ होता है।

गुड़हल (जवा):- गुड़हल के पुष्प का सम्बंध गर्भाशय से ऋतुकाल के बाद यदि फूल को घी में भूनकर सेवन करें तो गर्भ स्थिर होता है। गुड़हल के फूल चबाने से मुँह के छाले दूर हो जाते है। इसके फूलों को पीसकर बालों में लेप करने से बालों का गंजापन मिटता है। यह उन्माद को दूर करने वाला एकमात्र पुष्प है। गुड़हल शीतवर्धक, वाजीकरण तथा रक्तशोधक है। इसे सुजाक के रोग में गुलकंद या शर्बत बनाकर दिया जा सकता है। इसका शर्बत हृदय को फूल की भाँति प्रफुल्लित करने वाला तथा रूचिकर होता है।

शंखपुष्पी (विष्णुकांता):- शंखपुष्पी गर्मियों में अधिक खिलता है। यह घास की तरह होता है। इसके फूल-पत्ते तथा डंठल तीनों को उखाड़कर पीसकर पानी में मिलाकर छान लेने तथा इसमें शहद या मिश्री मिलाकर पीने से पूरे दिन मस्तिष्क में ताजगी रहती है। सुस्ती नहीं आती। इसका सेवन विद्यार्थियों को अवश्य करना चाहिये।

बबूल (कीकर):- बबूल के फूलों को पीसकर सिर में लगाने से सिरदर्द गायब हो जाता है। इसका लेप दाद और एग्जिमा पर करने से चर्मरोग दूर होता है। इसके अर्क के सेवन से रक्तविकार दूर हो जाता है। यह खाँसी और श्वांस के रोग में लाभकारी है। इसके कुल्ले दंतक्षय को रोकते हैं।

नीम:- इसके फूलों को पीसकर लुगदी बनाकर फोड़े-फुंसी पर लगाने से जलन तथा गर्मी दूर होती है। शरीर पर मलकर स्नान करने से दाद दूर होता है। यदि फूलों को पीसकर पानी में घोलकर छान लें और इसमें शहद मिलाकर पीयें तो वजन कम होता है तथा रक्त साफ होता है। यह संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाला है। नीम हर प्रकार से उपयोगी है, इसे घर का वैद्य कहा जाता है।

लौंग:- यह आमाशय और आँतों में रहने वाले उन सूक्ष्म कीटाणुओं को नष्ट करती है। जिनके कारण मनुष्य का पेट फूलता है। यह रक्त के श्वेत कणों में वृद्धि करके शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि करती है। शरीर तथा मुँह के दुर्गन्ध नाश करती है। शरीर के किसी भी हिस्से पर इसे घिसकर लगाने से दर्दनाशक औषधि का काम करती है। दाढ़ या दंतशूल में मुँह में डालकर चूसने से लाभ होता है। इसके धूम्र सेवन से शरीर में उत्पन्न अनावश्यक तत्वों को पसीने द्वारा बाहर निकाल देता है।

जूही:- जूही के फूलों का चूर्ण या गुलकंद अम्लपित्त को नष्ट करके पेट के अल्सर तथा छाले को दूर करता है। इसके सांन्ध्यि में निरन्तर रहने से क्षयरोग नहीं होता।

माधवी:- चर्मरोगों के निवारण के लिये इसके चूर्ण का लेप किया जाता है। गठिया-रोग में प्रातःकाल फूलों को चबाने से आराम मिलता है। इसके फूल श्वांसरोग को भी दूर करते हैं।
हारसिंगार (परिजात):- यह गठिया-रोगों का नाशक है। इसका लेप चेहरे की कांति को बढ़ाता है। इसकी मधुर सुगंध मन को प्रफुल्लित कर देती है।

आक:- इसका फूल कफनाशक है, यह प्रदाहकारक भी है। यदि पीलिया-रोग में पान में रखकर एक या दो कली तीन दिन तक दी जाये तो काफी हद तक आराम होता है।

कदम्ब:- यम मदन-वृक्ष भी कहलाता है। बीमारी में फूल एवं पत्तों वाली इसकी टहनी लेकर गोशाला में लगा देने से बीमारी दूर होती है। वर्षा ऋतु में पल्लवित होने वाला यह गोपीप्रिय वृक्ष है।

कचनार:- इसकी कली शरद्-ऋतु में प्रस्फुटित होती है। इसकी कलियाँ बार-बार मल-त्याग की प्रवृत्ति को रोकती हैं। कचनार की छाल एवं फूल को जल के साथ मिलाकर तैयार की गई पुलटिस जले घाव एवं फोड़े के उपचार में उपयोगी है।

शिरीष:- यह तेज सुगन्ध वाला जंगली वृक्ष है। इसकी सुगन्ध जब तेज हवा के साथ आती है तो मानव झूम सा जाता है। खुजली में इसके फूल पीसकर लगाने चाहिये, इसके फूलों के काढ़े से नेत्र धोने पर किसी भी प्रकार के नेत्र-विकारों में लाभ होगा।

नागकेसर:- यह खुजली नाशक है और लौंग जैसा लम्बा तथा डंडी में लगा रहता है। इसके फूलों का चूर्ण बनाकर मक्खन के साथ या दही के साथ खाने से रक्तार्श में लाभ होता है। इसका चूर्ण गर्भधारण में भी सहायक है।

मौलसिरी (बकुल):- इसके फूलों को तेल में मिलाकर इत्र बनता है। मौलसिरी के फूलांे का चूर्ण बनाकर त्वचा पर लेप करने से त्वचा अधिक कोमल हो जाती है। इसके फूलों का शर्बत स्त्रियों के बाँझपन को दूर करने में समर्थ है।

अमलतास:- ग्रीष्म ऋतु में फूलने वाला गहरे पीले रंग के गुच्छेदार पुष्पों का यह पेड़ दूर से देेखने में ही आँखों को प्रिय लगता है। इसके फूलों का गुलकंद बनाकर खाने से कब्ज दूर होता है पंरतु अधिक मात्रा में सेवन करने से यह दस्तावर होता है जी मिचलाता है एवं पेट में ऐंठन उत्पन्न करता है।

अनार:- शरीर में पित्ती होने पर अनार के फूलों का रस मिश्री मिलाकर पीना चाहिये। मुँह के छालों में फल रखकर चूसना चाहिये। आँख आने पर कली का रस आँख में डालना चाहिये। अनार के फूल खाने से शराब छूट जाती है। फूलों के पौधों की भीतरी कोशिकाओं में विशेष प्रकार के प्रद्रवी झिल्लियों के आवरण वाले कण होते हैं। इन्हें लवक (प्लास्टिड्स) कहते है। ये कण जब तक फूलों का रंग समाप्त न हो जाये तब तक जीवित रहते हैं।

ये लवक दो प्रकार के होते हैं – 1 वर्णिक लवक और 2 हरित लवक इनमें रंगीन लवकों को वर्णी लवक कहते हैं। वर्णीलवक ही फूल-पौधों को विभिन्न रंग प्रदान करते हैं। वर्णी लवक का आकार निश्चित नहीं होता, बल्कि लवक अलग-अलग पौधों में अलग-अलग रचना वाले होते हैं। पौधें में सबसे महत्वपूर्ण लवक है हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट)। हरित लवक पौधों में हरा रंग ही नहीं देता, बल्कि पौधों में भोजन का निर्माण भी करता है। हरित लवक कार्बन-डाइआॅक्साइड गैस, जल और सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में ग्लूकोज कार्बोहाइडेट पदार्थ का निर्माण करता है।

पुष्प सूर्य के प्रकाश में सूर्य की किरणों से सम्पर्क स्थापित करके अपनी रंगीन किरणें हमारी आँखों तक पहुँचाते हैं। जिससे शरीर को ऋणात्मक, धनात्मक तथा कुछ न्यूट्रल प्रकाश की किरणें मिलती है जो शरीर के अंदर पहुँचकर विभिन्न प्रकार के रोगों को रोकने में सहायता प्रदान करती हैं। इस प्रकार हम कलर थैरेपी द्वारा भी चिकित्सा के लाभ ले सकते हैं।

नोट- किसी भी औषधी को वैद्य की सलाह से ही सेवन करें।

मेरे और लेख देखें :- rbdhawan.wordpress.com, astroguruji.in, shukracharya.com, gurujiketotke.com

यातायात और ज्योतिष

यातायात का सम्बंध बिजनेस और ज्योतिष से-

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka Bhavishya), Top best astrologer in delhi

प्रत्येक देश के विकास में यातायात के साधनों का अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारा देश बहुत बड़ा है तथा आबादी भी अधिक है। केवल सरकारी यातातात के साधन रेल, बस, वायुयान आदि आवश्यकता पूरा नहीं कर सकते। अतः प्राईवेट यातायात सुविधाओं का भी महत्व बढ़ जाता है। इस व्यवसाय में धन भी अधिक प्राप्त होता है साथ ही देशवासियों को यातायात के सुविधा पूर्ण साधन भी उपलब्ध होते हैं एवं व्यवसायी को प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती है तथा कई व्यक्तियों को रोजगार भी प्राप्त होता है। इस क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति को सफलता प्राप्त नहीं हो सकती है। जब तक ग्रह योगों का सहयोग न हो। अब हम ज्योतिषीय आधार पर इस व्यवसाय में सफलता प्राप्त करने के योगों का विवरण निम्नानुसार प्रस्तुत कर रहे हैं:-

1. वाहन कारक शुक्र व्यवसाय एवं जनता कारक शनि, यात्रा कारक मंगल प्रेरित करने वाले ग्रह राहु यदि जन्म पत्रिका में बलवान हो तो ऐसा जातक वाहन से सम्बंधित व्यवसाय में रूचि रखने वाला होता है।

2. इस व्यवसाय से धन प्राप्त करने वालों की पत्रिका में शुक्र, शनि मंगल का सम्बंध लग्नेश, धनेश, लाभेश, कर्मेश आदि से किसी भी रूप में होना चाहिये।

3. यदि उच्च का शनि लाभ भाव में मंगल भाग्येश के साथ केन्द्र में लग्न के राहु से दृष्ट हो, कर्मेश बुध के साथ लाभेश शुक्र छठे स्थान में (06 भाव) बैठकर आवागमन के व्यवभाव (12 भाव) को दृष्ट करें, साथ ही उच्च के गुरू, चन्द्र के साथ अच्छी स्थिति में हो तो, ऐसा जातक जनता को आवागमन की सुविधा प्रदान कर इस व्यवसाय में अति सफल होता है।

4. जातक की कुण्डली में यदि शुक्र उच्चाभिलाषी होकर पराक्रम भाव में कुंभ राशि का होकर भाग्यभाव को देखे, जनता कारक चतुर्थ में लाभेश शनि के साथ जनता कारक शनि बैठे और दशम में बैठे लग्नेश व चतुर्थेश गुरू पर दृष्टि हो योग कारक मंगल पंचमेश होकर वाहन कारक शुक्र की राशि लाभ भाव में बैठे, दशमेश बुध, व्यवसाय कारक व धनेश शनि की राशि मकर में हो तथा इस पर लग्नेश गुरू की पंचम दृष्टि हो साथ ही भाग्येश सूर्य स्वयं गुरू की राशि धनु में लग्नगत हो, तो ऐसे जातक को आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराने का व्यवसाय (वाहनों का) कर सफल होकर धन कमाता है।

5. लग्नेश स्वयं वाहन कारक शुक्र होकर कार्यक्षेत्र में व्यवसाय कारक शनि की राशि कुंभ में उच्चाभिलाषी हो, द्वितीय यंत्रिक कारक मंगल स्वग्रही लाभेश के साथ लाभ स्थान में राहु से दृष्ट हो, धनेश, पंचमेश व सुखेश भाग्य भाव में युक्ति करें, योग कारक शनि धनभाव में हो तो ऐसा जातक पुस्तैनी ट्रांसपोर्ट व्यवसाय को आगे बढ़ाते हुये अति सफल प्रतिष्ठित व धनाढ्य ट्रांसपोर्ट व्यवसायी होता है।

अब कुछ सफल यातायात व्यवसाय करने वाले जातकों की जन्म पत्रिकाओं का विवेचन करेंगे –

पत्रिका क्रमांक-1 एक पुस्तैनी ट्रांसपोर्ट व्यवसाय करने वाले जातक की है। पत्रिका में वाहन कारक उच्चाभिलाषी शुक्र लाभेश होकर पराक्रम भाव में बैठकर भाग्य भाव को दृष्टि द्वारा प्रभावित कर रहा है। द्वितीय यांत्रिक कारक मंगल वाहन कारक शुक्र की राशि तुला में लाभ भाव में होकर व्यापार कारक धनभाव में बैठे कर्मेश बुध को चैथी दृष्टि से प्रभावित कर रहा है।

1 लग्नेश व जनता भाव के स्वामी गुरू कर्मभाव में बैठकर जनता कारक धनेश शनि व राहु की युक्ति से परस्पर दृष्टि सम्बंध कर अच्छी स्थिति में है। लग्नेश गुरू की पंचम (5वीं) दृष्टि कर्मेश बुध और धन भाव में होकर दोनों को बल प्रदान कर रही है। भाग्येश सूर्य मित्र लग्न में बैठकर मनकारक चन्द्रमा के साथ परस्पर दृष्टि सम्बंध बना रहा है। नवांश में स्वनवांश के जनता कारक धनेश शनि के साथ कर्मेश व नवांश लग्न का स्वामी व्यापार कारक बुध बैठकर राहु की दृष्टि से प्रभावित है। वाहन कारक शुक्र वृश्चिक नवांश में होकर जनता कारक शनि व लग्नेश गुरू की दृष्टि से प्रभावित है। शुक्र यांत्रिक कारक मंगल के नक्षत्र में तथा कर्मेश बुध, भाग्येश सूर्य के नक्षत्र में होने आदि के कारणों से ही बने, सभी तरह से वाहन से सम्बंधित व्यवसाय के ग्रहयोगों से ही जातक जनता के आवागमन से जुड़े यातायात व्यवसाय से लाभ व यश अर्जित कर रहा है।

विवेचन कुंडली क्रमांक-2 यह एक उच्च स्तर के जनता के आवागमन से जुड़े यातायात से सम्बंधित व्यवसाय करने वाले धनाढ्य व्यवसायी की है। पत्रिका में वाहन कारक शुक्र लाभेश होकर व्यवसाय कारक कर्मेश बुध के साथ युति कर स्वगृही होकर बली है। यांत्रिक कारक मंगल भाग्येश सूर्य के साथ केन्द्र में युति, कर राहु जैसे ग्रह की परस्पर दृष्टि सम्बंध से प्रभावित होकर बैठा है। जनता भाव 04 का स्वामी लग्नेश गुरू उच्च का होकर गजकेसरी योग बनाते हुये जनता कारक धनेश शनि की दृष्टि से प्रभावित है उधर कर्मभाव में मंगल की चतुर्थ दृष्टि कर्मभाव को बल प्रदान कर रहा है। जनता कारक उच्च का शनि लाभ भाव में बैठकर लग्न और लग्न में बैठे प्रेरक राहु को दृष्टि द्वारा बल प्रदान कर रहा है। चन्द्र पत्रिका में लग्न में गजकेसरी योग है एवं वाहन कारक उच्च का शनि और प्रेरक राहु दृष्टि देकर बल प्रदान कर रहे हैं। कर्मेश मंगल धनेश सूर्य के साथ होकर राहु से परस्पर दृष्टि सम्बंध कर रहे हैं। नवांश में शुक्र व्यापार कारक बुध की राशि नवांश में होकर जनता कारक शनि की दृष्टि से प्रभावित होते हुये लग्न के भाग्येश एवं नवांश भाग्य भाव को दृष्टि द्वारा प्रभावित कर रहा है। पुनः नवांश में गजकेसरी योग निर्माण होकर व्यापार, कारक कर्मेश बुध इसी क्षेत्र के साथ है। जिसके कारण ही जातक जनता से सम्बंधित यातायात के व्यवसाय में यश धन एवं ख्याति अर्जित कर रहा है।

मेरे और लेख देखें :- rbdhawan.wordpress.com, astroguruji.in, shukracharya.com पर।