संजीवनी मंत्र

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वेदों में महामृत्युंजय तथा गायत्री मंत्र की बड़ी महिमा बताई गई है, इसी लिए विद्वानों द्वारा कहा जाता है कि इन में से किसी भी एक मंत्र का सवा लाख जाप करके जीवनी की इच्छा को पूरा किया जा सकता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इन दोनों मंत्रों को मिलाकर एक अन्य मंत्र महामृत्युंजय गायत्री मंत्र अथवा मृत संजीवनी मंत्र का निर्माण किया था। इस मंत्र को संजीवनी विद्या के नाम से जाना जाता है। इस मंत्र के जाप से मृत व्यक्ति को भी जीवित करना संभव है।

क्या है संजीवनी मंत्र :-

ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ त्रयंबकंयजामहे ॐ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ॐ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम ॐ भर्गोदेवस्य धीमहि ॐ उर्वारूकमिव बंधनान ॐ धियो योन: प्रचोदयात ॐ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ॐ स्व: ॐ भुव: ॐ भू: ॐ स: ॐ जूं ॐ हौं ॐ

ऋषि शुक्राचार्य ने इस मंत्र की आराधना की थी जिसके प्रभाव से वह देव-दानव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए दानवों को सहज ही जीवित कर सके। महामृत्युंजय मंत्र में जहां सनातन धर्म के सभी 33 देवताओं (8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 वषट तथा ॐ) की शक्तियां समाहित हैं, वहीं गायत्री मंत्र की प्राण ऊर्जा तथा आत्मशक्ति को चमत्कारिक रूप से बढ़ाने वाला मंत्र है।

संजीवनी मंत्र के जाप में निम्न बातों का ध्यान रखें:-

1. जपकाल के दौरान पूर्ण रूप से सात्विक जीवन जिएं।

2. मंत्र के दौरान साधक का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।

3. इस मंत्र का जाप शिवमंदिर में या किसी शांत एकांत जगह पर रूद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए।

4. मंत्र का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और सही होना चाहिए साथ ही मंत्र की आवाज होठों से बाहर नहीं आनी चाहिए।

5. जपकाल के दौरान व्यक्ति को मांस, शराब, सेक्स तथा अन्य सभी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए। उसे पूर्ण ब्रहमचर्य के साथ रहते हुए अपनी पूजा करनी चाहिए।

महामृत्युंजय + गायत्री (संजीवनी) मंत्र का जाप का अभ्यास गुरु के द्वारा मंत्र प्राप्त करके ही करना चाहिये। आध्यात्म विज्ञान के अनुसार संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है, जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता। अर्थात् इस मंत्र साधना को किसी अनुभवी गुरू के दिशा- निर्देश में ही करनी चाहिए। गुरु जी से मंत्र प्राप्त करके गौरीपति मृत्युञ्जयेश्वर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करनेके पश्चात भक्त को सदा मृतसञ्जीवन नामक कवच का सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये। महादेव भगवान् शंकर का यह मृतसञ्जीवन नामक कवच पुण्यप्रद है, गुह्य और मङ्गल प्रदान करनेवाला है।

आचार्य शिष्य को उपदेश करते हैं कि – हे वत्स! अपने मन को एकाग्र करके इस मृतसञ्जीवन कवच को सुनो। यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है। इस मंत्र की गोपनीयता सदा बनाये रखना।

मृतसञ्जीवन नामक कवच:-

॥1॥ सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं । महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ 2।।समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं । शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥3॥ वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवित: । मृत्युञ्जयो महादेव: प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥4॥ जरा से अभय करनेवाले, निरन्तर यज्ञ करने वाले, सभी देवताओं से आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव ! आप पर्व-दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥4॥ दधाअन: शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुज: प्रभु: ।सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥5॥ अभय प्रदान करने वाली शक्ति को धारण करने वाले, तीन मुखों वाले तथा छ: भुजओं वाले, अग्रिरूपी प्रभु सदाशिव अग्रिकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥5॥ अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभु: । यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ॥6॥ अट्ठरह भुजाओं से युक्त, हाथ में दण्ड और अभय मुद्रा धारण करने वाले, सर्वत्र व्याप्त यमरुपी महादेव शिव दक्षिण-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥6॥ खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवित: । रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ॥7॥ हाथ में खड्ग और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, धैर्यशाली, दैत्यगणोंसे आराधित रक्षोरुपी महेश नैर्ऋत्यकोणमें मेरी सदा रक्षा करें ॥7।। पाशाभयभुज: सर्वरत्नाकरनिषेवित: । वरुणात्मा महादेव: पश्चिमे मां सदावतु ॥8॥ हाथ में अभय मुद्रा और पाश धाराण करनेवाले, शभी रत्नाकरों से सेवित, वरुण स्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम- दिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥8॥ गदाभयकर: प्राणनायक: सर्वदागति: । वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्कर: पातु सर्वदा ॥9॥ हाथों में गदा और अभय मुद्रा धारण करने वाले, प्राणों के रक्षक, सर्वदा गतिशील वायुस्वरूप शंकरजी वायव्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥9॥ शङ्खाभयकरस्थो मां नायक: परमेश्वर: । सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्कर: प्रभु: ॥10॥ हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले नायक (सर्वमार्गद्रष्टा) सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओं के मध्य में मेरी रक्षा करें ॥10॥ शूलाभयकर: सर्वविद्यानमधिनायक: । ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वर: ॥11॥ हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सभी विद्याओं के स्वामी, ईशानस्वरूप भगवान् परमेश्व शिव ईशानकोण में मेरी रक्षा करें ॥11॥ ऊधर्व भागे ब्र:मरूपी विश्वात्माऽध: सदावतु । शिरो मे शङ्कर: पातु ललाटं चन्द्रशेखर:॥12॥ ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊधर्व भाग में तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभाग में मेरी सदा रक्षा करें । शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें ॥12॥ भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु । भ्रूयुग्मं गिरिश: पातु कर्णौ पातु महेश्वर: ॥13॥ मेरे भौंहों के मध्य में सर्वलोकेश और दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें, दोनों भौंहों की रक्षा गिरिश एवं दोनों कानों की रक्षा भगवान् महेश्वर करें

॥13॥ नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वज: । जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ॥14॥ महादेव मेरी नासीका की तथा वृषभ ध्वज मेरे दोनों ओठों की सदा रक्षा करें । दक्षिणामूर्ति मेरी जिह्वा की तथा गिरिश मेरे दाँतोंकी रक्षा करें ॥14॥ मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषण: । पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ॥15॥ मृत्युञ्जय मेरे मुख की एवं नागभूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठ की रक्षा करें । पिनाकी मेरे दोनों हाथों की तथा त्रिशूली मेरे हृदय की रक्षा करें ॥15॥ पञ्चवक्त्र: स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वर: । नाभिं पातु विरूपाक्ष: पाश्र्वौ में पार्वतीपति: ॥16॥ पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनो की और जगदीश्वर मेरे उदर की रक्षा करें । विरूपाक्ष नाभि की और पार्वतीपति पाश्र्वभाग की रक्षा करें ॥16॥ कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिप: । गुह्यं महेश्वर: पातु ममोरू पातु भैरव: ॥17॥ गिरीश मेरे दोनों कटिभाग की तथा प्रमथाधिप पृष्टभाग की रक्षा करें । महेश्वर मेरे गुह्यभाग की और भैरव मेरे दोनों ऊरुओं की रक्षा करें ॥17॥ जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका । पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्य: सदाशिव: ॥18॥ जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनों की, जगदम्बिका मेरे दोनों जंघो की तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्तर मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें ॥18॥ गिरिश: पातु मे भार्यां भव: पातु सुतान्मम । मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायक: ॥19॥ गिरीश मेरी भार्या की रक्षा करें, तथा भव मेरे पुत्रों की रक्षा करें । मृत्युञ्जय मेरे आयु की गणनायक मेरे चित्त की रक्षा करें ॥19॥ सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकाल: सदाशिव: । एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥20॥ कालों के काल सदाशिव मेरे सभी अंगो की रक्षा करें ।

[ हे वत्स ! ] देवताओंके लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवचका वर्णन मैंने तुमसे किया है ॥20॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् । सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥21॥ महादेवजी ने मृतसञ्जीवन नामक इस कवच को कहा है । इस कवच की सहस्त्र (1000) आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है ॥21॥ य: पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहित: । सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥22॥ जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथावा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयुका उपयोग करता है ॥ 22॥ हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ । आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥23॥ जो व्यक्ति अपने हाथसे मरणासन्न व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कवच का पाठ करता है, उस आसन्नमृत्यु प्राणीके भीतर चेतनता आ जाती है । फिर उसे कभी आधि-व्याधि नहीं होती ॥23॥ कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा । अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तम: ॥24॥ यह मृतसञ्जीवन कवच काल के गाल में गये हुए व्यक्ति को भी जीवन प्रदान कर ‍देता है, और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणोंसे युक्त ऐश्वर्य को प्राप्त करता है ॥24॥ युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं । युद्दमध्ये स्थित: शत्रु: सद्य: सर्वैर्न दृश्यते ॥25॥ युद्ध आरम्भ होने के पूर्व जो इस मृतसञ्जीवन कवच का 28 बार पाठ करके रणभूमिमें उपस्थित होता है, वह उस समय सभी शत्रुओं से अदृश्य रहता है।

॥25॥ न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै । विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ॥26॥ यदि देवताओं के भी साथ युद्ध छिड जाये तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नही कर सकते, वह विजय प्राप्त करता है ॥26॥ प्रातरूत्थाय सततं य: पठेत्कवचं शुभं । अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ॥27॥ जो प्रात:काल उठकर इस कल्याणकारी कवच सदा पाठ करता है, उसे इस लोक तथा परलोक में भी अक्षय्य सुख प्राप्त होता है ॥27॥ सर्वव्याधिविनिर्मृक्त: सर्वरोगविवर्जित: । अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिक: ॥28॥ वह सम्पूर्ण व्याधियों से मुक्त हो जाता है, सब प्रकार के रोग उसके शरीर से भाग जाते हैं । वह अजर-अमर होकर सदा के लिये सोलह वर्षवाला व्यक्ति बन जाता है ॥28॥ विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् । तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ॥29॥ इस लोकमें दुर्लभ भोगों को प्राप्त कर सम्पूर्ण लोकों में विचरण करता रहता है । इसलिये इस महागोपनीय कवच को मृतसञ्जीवन नाम से कहा है ॥29॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ॥30॥ यह देवतओं के लिय भी दुर्लभ है ॥30॥ ॥ इति वसिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ॥——————————————————

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मंगल, मांगलिक

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मंगल से प्रायः सभी भयभीत रहते हैं। विशेषकर बालिका/बालक की कुंडली यदि मंगलीक हुई तो माता-पिता की चिंता बढ़ जाती है। वैसे ज्योतिष में मंगल को काल पुरूष का पराक्रम माना गया है। यह तमोगुणी अग्नि तत्व प्रधान ग्रह है। यह मेष एवं वृश्चिक राशि का स्वामी है। मकर राशि इसकी उच्च राशि तथा कर्क राशि इसकी नीच राशि है। यह मेष राशि में 1 से 12 अंश तक मूल त्रिकोण में, मेष में ही 13 अंश से
30 तक तथा सम्पूर्ण वृश्चिक राशि में स्वराशि का, मकर में 28 अंश तक उच्च का, एवं कर्क में 28 अंश तक नीच राशि का होता है। मंगल का सम्बंध मकर राशि से सर्वोत्तम, मेष से उत्तम, सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु व मीन राशि से मध्यम, वृष एवं मिथुन से सामान्य तथा कर्क, तुला व कुंभ राशि से प्रतिकूल होता है। मंगल कुंडली में अपने स्थित भाव से चौथे, सातवें एवं आठवें भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है। कुंडली में यह तीसरे भाव का कारक है। मंगल के लिये तीसरा, छठा एवं ग्यारहवाँ भाव पूर्णतः शुभ है, लेकिन तीसरे भाव में स्थित मंगल नौवें भाव में स्थित ग्रह से वेध पाता है। वेध प्राप्त शुभ मंगल भी अशुभ फलदायी होता है।

जन्म कुंडली में लग्न भाव से मंगल के लिये 3, 6, 10, 11 भाव शुभ होते हैं। 1, 2, 5, 7, 9 भाव अरिष्ट दायक तथा 4, 8, 12वाँ भाव में से किसी में भी स्थित मंगल जातक/जातिका के लिये अत्यंत अरिष्ट प्रभाव देता है। मंगल कर्क, सिंह, मीन लग्न के लिये प्रबल कारक ग्रह है। मेष राशि के लिये अष्टमेश होकर तथा वृश्चिक राशि लग्न के लिये षष्ठेश होकर तटस्थ स्वभाव का हो जाता है। कारक होकर अत्यंत शुभ फलदायक होता है।

यदि जन्म कुंडली में मंगल लग्न (प्रथम भाव) चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या बारहवें भाव में हो तो कुंडली मंगलिक अर्थात मंगल दोष युक्त हो जाती है, और ऐसा मंगल दाम्पत्य सुख की हानि करता है। लग्नस्थ मंगल की पति/ पत्नी भाव पर पूर्ण दृष्टि पड़ती है। अतः दाम्पत्य जीवन ठीक नहीं बीतता है। जातक/जातिका शिरोव्यथा से पीड़ित हो सकते हैं। लग्नस्थ मंगल जातक को क्रोधी, हिंसक, झगड़ालू प्रवृत्ति का कर देता है, जीवन भर कोई न कोई स्वास्थ्य बाधा बनी रहती है।

चतुर्थ भावास्थित मंगल की सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि पड़ती है, अतः यदि मंगली लड़के या लड़की की शादी गैर मंगली लड़की या लड़के से हो जाये तो पति/पत्नी सदैव रूग्ण रहते हैं। संतान का अभाव हो सकता है। गर्भाशय या गुप्तांग के विकार रहते हैं। आॅपरेशन से भी गुजरना पड़ सकता है। यदि मंगल युवावस्था में हो (प्रत्येक ग्रह 10 से 23 अंश तक युवावस्था में होता है) तथा सप्तम या अष्टम भाव में स्थित हो तो पति/पत्नी की आयुहानि करता है। वैधव्य/विधुरता देता है। बारहवें भाव स्थित मंगल व्यक्ति के जीवन में अस्थिरता देता है। दाम्पत्य सुख नहीं मिलने देता है। कोई न कोई बाधा सच्चा पति/पत्नी सुख नहीं भोगने देती है। द्वितीय भाव स्थित मंगल की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ भाव पर, अष्टम भाव पर एवं नवम भाव पर पड़ती है, अतः यह भी पति/पत्नी के सुख की हानि करता है।
मंगली लड़के की शादी मंगली लड़की से करने से यह दोष को दूर होता है, लेकिन दोनों के मंगल एक ही भाव में न हों। अशुभ प्रभावकारी मंगल उदर विकार, एपैन्डि साइटिस, रक्त विकार सूखा रोग, एनीमिनीया, पित्त विकार, जलना, गिरना, गुप्त रोग, स्नायु दौर्बल्य आदि रोगों से कष्ट देता है। मंगल की गर्मी को कोई भी ग्रह शांत नहीं कर सकता है। मंगल-शनि युति या मंगल-केतु युति या मंगल-राहु युति अत्यंत अशुभ परिणाम देती है। यदि यह युति सप्तम भाव, सप्तमेश, गुरू या शुक्र को प्रभावित करें तो भी दाम्पत्य सुख दिव्य स्वप्न बन जाता है। इसी प्रकार यदि दोनों अग्नि कारक ग्रह सूर्य एवं मंगल की युति हो जायें तो, बहुत हानि होती है। शुक्र के साथ मंगल की युति अति कामुक बना देगी तथा वीर्य स्राव दोष देती है। यदि रक्त का कारक ग्रह मंगल उपरोक्तानुसार पाप प्रभाव में हो तो कैंसर रोग हो सकता है। जिन लग्नों के लिये मंगल मारक प्रभाव वाला ग्रह हो, अर्थात् मारकेश हो तो उन लग्नों को मंगल की अशुभ स्थिति अत्यंत कष्टप्रद होती है। मंगल निम्नलिखित लग्नों के लिये मारक होता है- वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर एवं कुंभ। कुछ योग जो मंगलीक दोष को निष्प्रभावी कर देते हैं:-

1. यदि मेलापक में लड़के-लड़की दोनों ही मंगलीक हों तो, मंगल दोष निष्प्रभावी हो जाता है, अर्थात् शादी उपरांत दोनों का जीवन ठीक चलता है।

2. कुंडली में मंगल शुक्र के साथ स्थित हो या शुक्र से दृष्ट हो अर्थात दोनों एक दूसरे से सम सप्तक स्थित हों। केन्द्र में मंगल की युति भी मांगलीक दोष का निवारण करती है।

3. यदि मंगल अपनी ही राशि में हो, उच्च या नीच राशि में हो, वक्री हो, अस्त हो तो मंगलदोष नहीं रहता है। मूल त्रिकोण में भी मंगलिक दोष नहीं होता है।

4. जन्म कुंडली में मंगल जन्म लग्न से केन्द्रस्थ हो तथा चंद्रमा साथ में हो तो मंगल दोष मिट जाता है।

5. मिथुन लग्न एवं कन्या लग्न में जन्मे जातक/जातिका का पति/पत्नी भाव का स्वामी (सप्तमेश) गुरू होता है और यदि गुरू 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगलिक दोष मिट जाता है। मंगल 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं हो।

6. जन्म लग्न मेष या सिंह, कर्क, मीन, धनु होने पर मंगल दोष कारक नहीं रहता है। यदि एक पक्ष मंगलीक है, तथा दूसरे पक्ष की कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में यदि मंगल न हो तो, इन्हीं भावों में से किसी में भी सूर्य या शनि होने से मंगलिक दोष का निवारण हो जाता है।

7. चर राशि मेष, कर्क, तुला एवं मकर में से किसी भी राशि में स्थित मंगल दोषकारी नहीं है।

8. यदि शुभ ग्रह यथा बलवान चंद्रमा, बुध, गुरू शुक्र केन्द्र में हों, तथा शनि, राहु, केतु एवं सूर्य त्रिक स्थान में स्थित हों तो, भी मंगलिक दोष मिट जाता है।

9. लग्न में मेष का मंगल, चतुर्थ में वृश्चिक राशि का मंगल, सप्तम में मकर राशि का मंगल, बारहवें भाव मेें धनु राशि का मंगल, लग्न में सिंह या मकर राशि का मंगल, द्वादश भाव में वृष और तुला राशि का मंगल चौथे भाव में मेष, धनु या मीन राशि का मंगल हो तो, मंगल दोषदायक नहीं रहता है।

10. सप्तमेश केन्द्र में बलवान हो, और मंगल वृष या तुला राशि में हो तो, दोष मिट जाता है। मंगल गुरू के साथ हो, या गुरू से दृष्ट हो तो, भी मंगलिक दोष नहीं होता है।

11. यदि मेलापक के गुण 25 से आगे हों, राशि मैत्री हो, दोनों के गुण एक हों तो, भी मंगलदोष निष्प्रभावी हो जाता है।

मंगलिक दोष को मिटा देने वाले ये कुछ परिहार हैं- इनमें से कुछ विवादास्पद भी हैं, अतः कुंडली मिलान करते समय यदि कुंडली प्रथम दृष्टि में मंगलिक प्रतीत हो तो, उसका सूक्ष्म परीक्षण परिहारों के संदर्भ में करें केवल इस आधार पर कि –

लग्न व्यये च पाताले यामित्रे चाऽष्टमे कुजः।
कन्या भर्तृविनाशाय वरः कन्या विनाशकृत।।

किसी जातक/जातिका की कुंडली को मंगलिक घोषित कर माँ-बाप को चिंताग्रस्त नहीं बना देना चाहिये, और यदि कुुंडली वास्तव में मंगलिक दोष युक्त है तो-

कुज दोषवती देया कुज दोषवते सदा।
नास्ति दोषो न चानिष्टं दम्पत्योः सुख वर्धनम्।।

अर्थात् मंगलिक दोषयुक्त कन्या की शादी मंगलिक दोष युक्त लड़के से कर दी जाये तो दोष समाप्त हो जाता है। कोई अनिष्ट नहीं होता है, और दाम्पत्य सुख की वृद्धि होती है।

कब कुंडली मिलान की आवश्यकता नहीं:- मिलान केवल जन्म कुंडली होने पर ही मंगलिक दोष देखा जा सकता है। जन्म कुंडली न होने की स्थिति में दोनों के नाम के प्रथमाक्षर से केवल अष्टकूटों का मिलान ही देखना चाहिये। दोनों में से यदि एक विधवा या विधुर हों या परित्यक्त या परित्यक्ता हों तो किसी प्रकार के मिलान की आवश्यकता नहीं है। मंगलिक की भी नहीं। जातक/ जातिका में से कोई भी एक विकृतांग हो तो भी किसी भी प्रकार के मिलान की जरूरत नहीं है। दोनों में परस्पर शादी से पूर्व ही प्रेमाशक्ति हो और दोनों शादी करने के लिये उद्यत हों तो भी मिलान या अन्य किसी दोष को देखने की आवश्यकता नहीं है।

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मंगली, mangli

मंगली योग का प्रभाव क्या है?

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भारतीय जीवनशैली में गृहस्थ आश्रम का विशेष महत्व है। गृहस्थ जीवन की शुरुआत पाणिग्रहण संस्कार से आरंभ होती हैं। प्रणय-सूत्र में बंधना सुखदायी होगा या दुःखदायी, यह दोनों के ग्रहों पर निर्भर करेगा जो कि एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। भारत में सर्वाधिक प्रचलित योग ‘मंगली योग’ है। इसे कुज दोष कहते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि ज्योतिष के प्राचीन महत्वपूर्ण ग्रंथ, वृहत पाराशर, होरा शास्त्र, सारावली, जातक परिजात इत्यादि में मंगली योग का कहीं भी उल्लेख नहीं है फिर भी यह योग इतना प्रचलित है कि बच्चे के जन्म लेने के बाद, विशेषकर कन्या के जन्म लेने के उपरांत माता-पिता यही चिन्ता व्यक्त करते हैं कि कन्या मंगली तो नहीं है। आज भी यही धारणा है कि मंगली योग ही विवाह जीवन को नष्ट करता है, अथवा लड़की की कुंडली में यही योग वर को मृत्यु देगा। इतना भयावह रूप प्रचलित है। असल में तथाकथित झोला छाप पंडितों ने या अज्ञानियों ने तिल का पहाड़ बना दिया है। इसका परिहार होता है, या नहीं। कहां से अच्छा है और कहां बुरा, इसका पूर्ण ज्ञान किए बिना बस जातक को भयभीत करना ही जैसे उनका अधिकार है। मंगल ग्रह के देवता हैं श्री गणेश, श्री हनुमान और मां दुर्गा, ये तीनों ही विघ्न बाधाएं और अमंगल दूर करते हैं। अतः यह जानना आवश्यक है कि जिस ग्रह से मंगली या मांगलिक होना बताया गया है, उसके क्या गुण हैं? और स्वभाव क्या है?
मंगल ग्रह का नाम ‘लौहितंऽग’ हैं, क्योंकि यह दूर से लाल दीख पड़ता है। इसका नामा ‘कुज’ और ‘भौम’ भी है। भूमि पुत्र होने से कुज और पृथ्वी से पृथक् हो जाने के कारण भौम नाम हुआ। चूंकि कुछ संघर्ष के उपरान्त पृथ्वी से पृथकत्व हुआ। अतः मंगल लड़ाई-झगड़ा का कारक ग्रह माना गया है। ग्रहों के कुटुम्ब में रवि, पृथ्वी के पिता और चन्द्र माता के स्थान में है। इसीलिए मंगल में रवि और चन्द्र दोनों के गुणों का मिश्रण पाया जाता है।

आचार्य वराहमिहिर द्वारा –
क्रूरदृक तरुण मूर्ति रूदारः पैत्तिकः, सुचपलः कृशमध्यः।
दुष्ट दृष्टिवाला, नित्य युवा ही प्रतीत होने वाला, दाता, शरीर में पित्त की मात्रा अधिक, अस्थिर चित्त, संकुचि तथा पतली कमर, ऐसा मंगल का स्वरूप है।

पाराशर द्वारा-
‘सत्वकुंजः, नेताज्ञेयो धरात्मजः अत्युच्चांगोभौमः, रक्त वर्णो भौमः, देवता षडानन, भौमा अग्नि, कुजः क्षत्रियः आरः तमः भौमः मज्जा, भौमवार, भौम तिृक्तः, भौम, दक्षिणे, कुजः निशायांबली, भौमः कृष्णेचबली, क्रूर स्वदिवसमहो। रामासपर्वकालवीर्यक्रमात् श. कु. बु. गु. शु. चराघा वृद्धितोवीर्यवत्तराः। स्थूलान् जनयातिसूर्ये दुर्भगान्् सूर्यपुत्रकः। श्रीरोपेतान् तथा चन्द्रः कटुकाधान् धरासुतः। वस्त्रे रक्तचित्रे कुजस्य। कुजः ग्रीष्मः।।

सत्वगुण प्रधान तथा शक्तिशाली भौम है। मंगल नेता है। मंगल का कद बहुत ऊंचा है। भूमि पुत्र मंगल रक्तवर्ण है। इसका देवता षडानन, कीर्तिकेय है। यह पुरुषग्रह है। भौम अग्नितत्व प्रधान है। भौम क्षत्रिय है। यह तामस है। भौम मज्जासार है। वारों में भौमासार, मंगल का है। इसे तिक्त रस पसंद है। इसकी दिशा दक्षिण है यह रात्रिबली है। कृष्ण पक्ष में बली है। क्रूर स्वभाव है। अपने दिवस में, अपनी होरा में, अपने मास में, अपने पर्व और काल में श. भौ. बु. गु. और शु. वृद्धिक्रम से अधिक बलीयान होते हैं। सूर्य बली हो तो जातक स्थूलकाय होता है, शनि से जातक कुरूप और अभागा होता है। चन्द्र से क्षीर युक्त तथा रस प्रधान पदार्थ होते हैं। मंगल कटुक पदार्थों को जन्म देता है। मंगल के वस्त्र लाल और चित्रित होते हैं। मंगल-ग्रीष्म ऋतु का स्वामी है। जहां एक ओर यह क्रूर स्वभावी है, कटुक पदार्थों का जन्मदायक है वहीं वृहत् संहिता अनुसार यह कल्याणकारी भी है।

विपुल विमलमूर्तिः किंशुकाशोवर्णः स्पुटरूचिरमयूश्वस्तप्तताम्र प्रभावः।
विचरतियदि मार्गे चोत्तरे मेदिनीजः
शुभकृदवनिपाना हृदिदश्चप्रजानाम्।।

इसका आकार बड़ा होता है, वर्ण अशोक का किंशुक के फूलों जैसा लाल होता है। किरण स्वच्छ और मनोहर होते हैं, कांति तपे हुए तांबे के समान होती है।
यही मंगल मार्ग से जब चलता है, तब राजा और प्रजा के लिए कल्याणकारी होता है।
अर्थात इन सभी मतों से निष्कर्ष निकलता है कि मंगल ऊर्जा शक्ति है, चंचल स्वभाव, कार्यचतुर, शूर सिद्धांत वचन कहने वला, हिंसक प्रवृत्ति, तमोगुणी, प्रतापी, साहसी, शत्रुओं, को मारने में निपुण, स्वभाव में उग्र, दृष्टि में क्रूरता, कामक्रीड़ा में अति चचंल, उदारचित्त, चपल और आलस्य रहित है, निर्भीक है, स्पष्ट जोरदार बोलने वाला है। अर्थात यदि मंगल शुभ स्थिति में है, उच्च का है, मूल त्रिकोण में है, स्वराशि में है, मित्र राशि में है, योग कारक, शुभग्रहों के साथ तथा शुभ से दृष्ट है तो, उपर्युक्त लिखित गुण जातक में होंगे ही।
मंगली योग भावानुसार- मंगली योग जन्म कुण्डली में मंगल के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित होने से बनता है। उत्तर भारत में द्वितीय भाव में मंगल को मंगली नहीं मानते किन्तु दक्षिण भारत में मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश में कहीं भी वह मंगली ही माना जाता है।
अधिकांश विद्वानों का मत है कि मांगलिक दोष चन्द्र लग्न से तथा शुक्र लग्न से भी देखा जाना चाहिए।
चन्द्र लग्न से मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो तो (कुज दोष) मंगली योग होता है।
शुक्र लगन से मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम या अष्टम में भाव में स्थित हो तो मंगली योग होता है।
मंगली योग चन्द्र, शुक्र से इसलिए देखा जाना चाहिए क्योंकि लग्न के साथ, चन्द्रमा मन का कारक है जिससे समस्त मन की अनुभूति होती है तथा शुक्र, विवाह का कारक है। इसलिए इन दोनों का वैवाहिक जीवन में महत्व है।
मंगल क्रूर ग्रह है इसका गुण अशुभ ही होता है ऐसा सत्य नहीं है। इसको जानने के लिए 1, 2, 4, 7, 8, 12 भावों में परिणाम तथा प्रत्येक बारह राशियों में परिणाम जानने होंगे। क्योंकि मंगल विभिन्न राशियों में भिन्न-भिन्न फल देता है।

उदाहरणार्थ- यदि किसी की कुण्डली में मंगली योग है और मंगल निर्बल है तो मंगल अधिक हानि नहीं कर सकता ऐसी कुण्डली के मिलान के लिए, यह जरूरी नहीं है कि दूसरे की कुण्डली में मांगलिक योग हो। मंगल यदि अस्त है या बली क्रूर ग्रहों से दृष्ट है या संधि में हैं तो मंगल निर्बल होगा।
यदि किसी की कुण्डली में वैवाहिक जीवन सुखद है तथा आयु भी पूर्ण है, तो सका विवाह मंगली योग वाले से किया जाय तो कोई हानि नहीं होगी।
अतः हमें यह जानना आवश्यक है कि मंगल कुण्डली के किस भाव में स्थित है, तथा अपनी दृष्टि द्वारा किन-किन भावों को प्रभावित कर रहा है। मंगल किन ग्रहों के साथ है, तथा मंगल पर किसी ग्रह की दृष्टि है। मंगल के द्वारा कौन से योग बन रहे हैं।? मंगल तात्कालिक शुभ है और अशुभ। इससे पता चलेगा कि यह कुण्डली में कहा लाभ पहुंचाएगा। मंगल अपनी शक्ति अनुसार ही लाभ या हानि पहुंचाएगा। केवल मंगली होना ही वैवाहिक जीवन को खराब नहीं करता और इसका फल सभी के लिए एक जैसा भी नहीं होता। अतः भली भांति अध्ययन करके ही मंगली और वैवाहिक योग बताना चाहिए।
यूं तो ऊपर काफी कुछ लिखा जा चुका है परन्तु मंगली-दोष का परिहार अर्थात निरस्तीकरण भी होता है।

परिहार-
1. मंगल यदि मेष या वृश्चिक राशि में 1, 2, 4, 7, 8, 12वें भाव में हो।

2. बृहस्पति किसी भाव में स्थित होकर मंगल को पूर्ण दृष्टि से देखता हो।

3. शनि किसी भाव में स्थित होकर मंगल को पूर्ण दृष्टि से देखता हो।

4. राहु यदि बृहस्पति या शनि से पूर्ण दृष्टि होकर मंगल पर पूर्ण दृष्टि डालता हो।

5. मंगल चतुर्थ अथवा सप्तम भाव में हो और वहां मेष, कर्क, वृश्चिक या मकर राशि हो।

6. यदि मंगल 1, 2, 4, 7, 8, 12 भाव में बली चन्द्रमा, बृहस्पति या बुध से संयुक्त हो।

7. वृषभ व तुला में चतुर्थ व सप्तम भाव का मंगल हो।

8. मिथुन व कन्या राशि का द्वितीय भावसंधि में मंगल हो।

9. मंगल, कर्क, सिंह अथवा मकर में स्थित हो।

10. मंगल, धनु व मीन का अष्टम में स्थित हो।

11. मगल, तुला व वृषभ में द्वादश में स्थित हो।

12. यदि मंगल शनि के साथ स्थित हो।

13. लड़क या लड़की की कुण्डली में मंगल जहां है वहीं दूसरी कुण्डली में शनि हो।

14. द्वादश भाव में मंगल, बुध, शुक्र की राशि में हो।

15. मंगल, सिंह राशि में स्थित हो।

16. कुम्भ, मकर लग्न में मंगल सप्तम भाव में हो।

17. कर्क व सिंह लग्न में मंगल अष्टम भाव मं हो।

18. शनि की राशि पर मंगल अष्टम भाव में हो।

वक्रिणि नीचारिस्थे वार्कस्थे वा न कुजदोषः।

अनिष्ट स्थान में मंगल यदि वक्री हो व नीच (कर्क राशि) हो अथवा शत्रु राशि (मिथुन व कन्या) राशि का हो तो वह अनिष्ट कारक नहीं होता।

कुजो जीव समायुक्तो युक्तो व शशिना यदा।
चन्द्रः केन्द्रगतो वाऽपि तस्य दोषों न मंगली।।

1, 4, 7, 8, 12 भाव में या अरिष्ट कारक स्थानों में से किसी एक में मंगल बृहस्पति अथवा चन्द्रमा के साथ बैठा हो, किन्तु चन्द्रमा केन्द्र में हो तो वह मंगली दोष नहीं कहा जाता। इस प्रकार मांगलिक कुंडली के अनेक परिहार हैं, अतः अध्ययन करने की आवश्यकता है, डराने की नहीं, और ना ही डरने की आवश्यकता है।

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मानसिक रोग

चिकित्सा ज्योतिष में मानसिक रोगों का अध्ययन :-

Dr.R.B.Dhawan, top best astrologer in Delhi

आज के इस लेख में हम मानसिक रोगों के अध्ययन की बात करेगें- मानसिक रोग होने के बहुत से कारण होते हैं, लेकिन इन कारणों का ज्योतिषीय आधार क्या है? इसकी चर्चा इस लेख के माध्यम से की जा रही है चिकित्सा ज्योतिष में सभी रोगों के कुछ योग होते हैं, और ग्रहों के परस्पर संबंध बने होते हैं, जिनके आधार पर यह पता चलता है कि जातक को जीवन में किस प्रकार के रोग हो सकते हैं, लेकिन इसका निर्धारण किसी कुशल ज्योतिषी से ही कराना चाहिए अन्यथा बेकार का तनाव उत्पन्न हो सकता है। आइए कुंडली के उन योगों का अध्ययन करें, जिनके आधार पर मानसिक रोगों का पता चलता है :-

मानसिक रोगों में चंद्रमा, बुध, चतुर्थ भाव व पंचम भाव का आंकलन किया जाता है, चंद्रमा मन है, बुध से बुद्धि देखी जाती है, और चतुर्थ भाव भी मन है। तथा पंचम भाव से बुद्धि देखी जाती है, जब व्यक्ति भावुकता में बहकर मानसिक संतुलन खोता है, तब उसमें पंचम भाव व चंद्रमा की भूमिका अहम मानी जाती है, रोग में चतुर्थ भाव की भूमिका मुख्य मानी जाती है, शनि व चंद्रमा की युति भी मानसिक शांति के लिए शुभ नहीं मानी जाती है, मानसिक परेशानी में चंद्रमा पीड़ित होता है।

जन्म कुंडली में चंद्रमा अगर राहु के साथ है, तब जातक को मानसिक रोग होने की संभावना बनती है, क्योकि राहु मन को भ्रमित रखता है, और चंद्रमा मन है, मन के घोड़े बहुत ज्यादा दौड़ते हैं, व्यक्ति बहुत ज्यादा हवाई किले बनाता है। यदि जन्म कुंडली में बुध, केतु और चतुर्थ भाव का संबंध बन रहा है, और यह तीनों अत्यधिक पीड़ित हैं, तब जातक में अत्यधिक जिद्दीपन हो सकता है, और वह सेजोफ्रेनिया का शिकार हो सकता है. इसके लिए बहुत से लोगों ने बुध व चतुर्थ भाव पर अधिक जोर दिया है। जन्म कुंडली में गुरु लग्न में स्थित हो और मंगल सप्तम भाव में स्थित हो या मंगल लग्न में और सप्तम में गुरु स्थित हो तब मानसिक आघात लगने की संभावना बनती है। जन्म कुंडली में यदि शनि लग्न में और मंगल पंचम भाव या सप्तम भाव या नवम भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।
कृष्ण पक्ष का बलहीन चंद्रमा हो, और वह शनि के साथ 12वें भाव में स्थित हो, तब मानसिक रोग की संभावना बनती है। शनि व चंद्र की युति में जातक मानसिक तनाव ज्यादा रखता है। जन्म कुंडली में शनि लग्न में स्थित हो, सूर्य 12वें भाव में हो, मंगल व चंद्रमा त्रिकोण भाव में स्थित हो, तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।
जन्म कुंडली में मांदी सप्तम भाव में स्थित हो, और अशुभ ग्रह से पीड़ित हो रही हो। राहु व चंद्रमा लग्न में स्थित हो, और अशुभ ग्रह त्रिकोण में स्थित हों, तब भी मानसिक रोग की संभावना बनती है।
मंगल चतुर्थ भाव में शनि से दृष्ट हो, या शनि चतुर्थ भाव में राहु/केतु के अक्षांश पर स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है। जन्म कुंडली में शनि और मंगल की युति छठे भाव या आठवें भाव में हो रही हो। जन्म कुंडली में बुध पाप ग्रह के साथ तीसरे भाव में हो या छठे भाव में हो या आठवें भाव में हो या बारहवें भाव में स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है। यदि चंद्रमा की युति केतु व शनि के साथ हो रही हो, तब यह अत्यधिक अशुभ माना गया है, और अगर यह अंशात्मक रुप से नजदीक हैं, तब मानसिक रोग होने की संभावना अधिक बनती है। जन्म कुंडली में शनि और मंगल दोनो ही चंद्रमा या बुध से केन्द्र में स्थित हों तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है।

मिरगी होने के जन्म कुंडली में लक्षण :-

इसके लिए चंद्र तथा बुध की स्थिति मुख्य रुप से देखी जाती है, साथ ही अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जाती है। शनि व मंगल जन्म कुंडली में छठे या आठवें भाव में स्थित हों, तब जातक को मिरगी संबंधित बीमारी का सामना करना पड़ सकता है। कुंडली में शनि व चंद्रमा की युति हो, और यह दोनो मंगल से दृष्ट हों,
जन्म कुंडली में राहु व चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हों।

मानसिक रुप से कमजोर बच्चे अथवा मंदबुद्धि बच्चे:-

जन्म के समय लग्न अशुभ प्रभाव में हो, विशेष रुप से शनि का संबंध बन रहा हो, यह संबंध युति, दृष्टि व स्थिति किसी भी रुप से बन सकता है। शनि पंचम से लग्नेश को देख रहा हो, तब व्यक्ति जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है, जन्म के समय बच्चे की कुण्डली में शनि व राहु पंचम भाव में स्थित हो, बुध बारहवें भाव में स्थित हो, और पंचमेश पीड़ित अवस्था में हो, तब बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है। पंचम भाव, पंचमेश, चंद्रमा व बुध सभी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तब भी बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है। जन्म के समय चंद्रमा लग्न में स्थित हो और शनि व मंगल से दृष्ट हो तब भी व्यक्ति मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है। पंचम भाव का राहु भी व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट करने का काम करता है, बुद्धि अच्छी नहीं रहती है।

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संतान योग

इस‌ लेख में जन्म कुंडली में संतान योग कैसे बनता है, यह अनेक उदाहरणों के साथ समझाया गया है:-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

जन्म कुंडली में संतान विचारने के लिए पंचम भाव का मुख्य स्थान होता है। पंचम भाव से संतान का विचार करना चाहिए। दूसरी संतान का विचार करना हो, तो सप्तम भाव से करना चाहिए। तीसरी संतान के विषय में जानना हो, तो अपनी जन्म कुंडली के भाग्य स्थान से विचार करना चाहिए

1. पंचम भाव का स्वामी स्वग्रही हो।
2. पंचम भाव पर पाप ग्रहों की दॄष्टि ना होकर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो, अथवा स्वयं चतुर्थ सप्तम भाव को देखता हो।
3. पंचम भाव का स्वामी कोई नीच ग्रह ना हो यदि भाव पंचम में कोई उच्च ग्रह हो तो अति सुंदर योग होता है।
4. पंचम भाव में कोई पाप ग्रह ना होकर शुभ ग्रह विद्यमान हों, और षष्ठेश या अष्टमेश की उपस्थिति भाव पंचम में नही होनी चाहिये।
5. पंचम भाव का स्वामी को षष्ठ, अष्टम एवम द्वादश भाव में नहीं होना चाहिये, पंचम भाव के स्वामी के साथ कोई पाप ग्रह भी नही होना चाहिये साथ ही स्वयं पंचम भाव का स्वामी नीच का नही होना चाहिये।
6. पंचम भाव का स्वामी उच्च राशिगत होकर केंद्र त्रिकोण में हो।
7. पति एवम पत्नी दोनों की कुंडलियों का अध्ययन करना चाहिए।
8. सप्तमांश लग्न का स्वामी जन्म कुंडली में: बलवान, शुभ स्थान, सप्तमांश लग्न भी शुभ ग्रहों से युक्त।
9. एकादश भाव में शुभ ग्रह बलवान हो।

संसार में कोई भी ऐसा दंपति नहीं होगा, जो संतान सुख नहीं चाहता हो। चाहे वह गरीब हो या अमीर। सभी के लिए संतान सुख होना सुखदायी ही रहता है। संतान चाहे खूबसूरत हो या बदसूरत, लेकिन माता-पिता को बस संतान चाहिए। फिर चाहे वह संतान माता-पिता के लिए सहारा बने या न बने। अकबर बादशाह ने भी काफी मन्नतें मानकर सलीम को माँगा था।

किसी-किसी की संतान होती है, और फिर गुजर जाती है। ऐसा क्यों होता है? ये सब ग्रहों की अशुभ स्थिति से होता है। यहाँ पर हम इन्हीं सब बातों की जानकारी देंगे, जिससे आप भी जान सकें कि संतान होगी या नहीं।

पंचम स्थान संतान का होता है। वही विद्या का भी माना जाता है। पंचम स्थान कारक गुरु और पंचम स्थान से पंचम स्थान (नवम स्थान) पुत्र सुख का स्थान होता है। पंचम स्थान गुरु का हो तो हानिकारक होता है, यानी पुत्र में बाधा आती है।

सिंह लग्न में पंचम गुरु वृश्चिक लग्न में मीन का गुरु स्वग्रही हो, तो संतान प्राप्ति में बाधा आती है, परन्तु गुरु की पंचम दृष्टि हो, या पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो संतान सुख उत्तम मिलता है।

पंचम स्थान का स्वामी भाग्य स्थान में हो, तो प्रथम संतान के बाद पिता का भाग्योदय होता है। यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो उसकी पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो पुत्र अत्यंत प्रभावशाली होता है। मंगल की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या पंचम भाव पर पड़ रही हो, तो पुत्र अवश्य होता है।

पुत्र संततिकारक चँद्र, बुध, शुक्र यदि पंचम भाव पर दृष्टि डालें तो पुत्री संतति होती है। यदि पंचम स्थान पर बुध का संबंध हो, और उस पर चँद्र या शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो, तो वह संतान होशियार होती है। पंचम स्थान का स्वामी शुक्र यदि पुरुष की कुंडली में लग्न में या अष्टम में या तृतीय भाव पर हो, एवं सभी ग्रहों में बलवान हो, तो निश्चित तौर पर लड़की ही होती है। पंचम स्थान पर मकर का शनि कन्या संतति अधिक होता है। कुंभ का शनि भी लड़की देता है। पुत्र की चाह में पुत्रियाँ होती हैं। कुछ संतान नष्ट भी होती है।

पंचम स्थान का स्वामी जितने ग्रहों के साथ होगा, उतनी संतान होगी। जितने पुरुष ग्रह होंगे, उतने पुत्र और जितने स्त्रीकारक ग्रहों के साथ होंगे, उतनी संतान पुत्री होगी। सप्तमांश कुंडली के पंचम भाव पर या उसके साथ या उस भाव में कितने अंक लिखे हैं, उतनी संतान होगी। एक नियम यह भी है कि सप्तमांश कुंडली में चँद्र से पंचम स्थान में जो ग्रह हो, एवं उसके साथ जीतने ग्रहों का संबंध हो, उतनी संतान होगी।

संतान सुख कैसे होगा :-

संतान प्राप्ति के लिए भी हमें पंचम स्थान का ही विश्लेषण करना होगा। पंचम स्थान का मालिक किसके साथ बैठा है, यह भी जानना होगा। पंचम स्थान में गुरु शनि को छोड़कर पंचम स्थान का अधिपति पाँचवें हो, तो संतान संबंधित शुभ फल देता है। यदि पंचम स्थान का स्वामी आठवें, बारहवें हो, तो संतान सुख नहीं होता। यदि हो भी तो सुख मिलता नहीं या तो संतान नष्ट होती है, या अलग हो जाती है। यदि पंचम स्थान का अधिपति सप्तम, नवम, ग्यारहवें, लग्नस्थ, द्वितीय में हो, तो संतान से संबंधित सुख शुभ फल देता है। द्वितीय स्थान के स्वामी ग्रह पंचम में हो, तो संतान सुख उत्तम होकर लक्ष्मीपति बनता है।

पंचम स्थान का अधिपति छठे में हो, तो दत्तक पुत्र लेने का योग बनता है। पंचम स्थान में मीन राशि का गुरु कम संतान देता है। पंचम स्थान में धनु राशि का गुरु हो, तो संतान तो होगी, लेकिन स्वास्थ्य कमजोर रहेगा। गुरु का संबंध पंचम स्थान पर संतान योग में बाधा देता है। सिंह, कन्या राशि का गुरु हो तो संतान नहीं होती। इस प्रकार तुला राशि का शुक्र पंचम भाव में अशुभ ग्रह के साथ (राहु, शनि, केतु) के साथ हो, तो संतान नहीं होती।

पंचम स्थान में मेष, सिंह, वृश्चिक राशि हो, और उस पर शनि की दृष्टि हो, तो पुत्र संतान सुख नहीं होता। पंचम स्थान पर पड़ा राहु गर्भपात कराता है। यदि पंचम भाव में गुरु के साथ राहु हो, तो चांडाल योग बनता है, और संतान में बाधा डालता है, यदि यह योग स्त्री की कुंडली में हो तो। यदि यह योग पुरुष कुंडली में हो तो संतान नहीं होती। नीच का राहु भी संतान नहीं देता। राहु, मंगल, पंचम हो तो एक संतान होती है। पंचम स्थान में पड़ा चँद्र, शनि, राहु भी संतान बाधक होता है। यदि योग लग्न में न हों तो चँद्र कुंडली देखना चाहिए। यदि चँद्र कुंडली में यह योग बने तो उपरोक्त फल जानें।

पंचम स्थान पर राहु या केतु हो, तो पितृदोष, दैविक दोष, जन्म दोष होने से भी संतान नहीं होती। यदि पंचम भाव पर पितृदोष या पुत्रदोष बनता हो, तो उस दोष की शांति करवाने के बाद संतान प्राप्ति संभव है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य संतान पक्ष में चिंता देता है। पंचम स्थान पर नीच का सूर्य ऑपरेशन द्वारा संतान देता है। पंचम स्थान पर सूर्य मंगल की युति हो, और शनि की दृष्टि पड़ रही हो, तो संतान की शस्त्र से मृत्यु होती है।

पंचम भाव और गुरु :-

गुरु जब मीन राशी में पंचम में हो, तो अल्प संतति देते है। धनु में हो, तो बहुत प्रयास के बाद देते है। कर्क और कुम्भ राशी में होने पर गुरु संतति नहीं देते ऐसे ही फल पंचम भाव में कर्क, मीन, कुम्भ या धनु राशी में होने पर संतति सुख नहीं देते। लेकिन बाकी पंचमेश और युति और दृष्टि सम्बन्ध भी देख लेना चाहिए, खाली एक गुरु के उपर कुछ भी नहीं बोलना चाहिए।

एक बात हमेशा ध्यान रखें, की गुरु सिंह राशी में निर्बल हो जाते हैं, जबकि गुरु और सूर्य परम मित्र हैं, इसके पीछे एक तर्क तो ये है की गुरु मंत्री है और सूर्य रजा, अब राजा के घर में गुरु कैसे स्थान हानि करेंगे, और एक तर्क ये है, की गुरु अपनी उच्च राशी कर्क से निकल कर नीच राशी गत होता है, इसी कारण गुरु पंचम में सिंह राशी में स्थान हानि नहीं करते। वही कुम्भ राशी राजा के गृह से सबसे अधिक दूर होने से वह वे अपने स्थान भ्रष्ट करने के स्वभाव का पूर्ण प्रभाव दिखाते है।

सिर्फ गुरु के इन परिस्थतियो के आधार पर ही फलित नहीं करना चाहिए, कहा जाता है की पंचम का गुरु यदि मंगल और सूर्य से दृष्ट है, तो भी स्थान हानि नहीं कर पाता, अगर कर्क का गुरु चंद्रमा से दृष्ट या फिर कुम्भ का गुरु शनि से दृष्ट है तो भी गुरु के योग विफल हो जायेंगे। पंचम भाव पर पंचमेश की दृष्टि भी उस भाव को बल देगी, अतः इन परिस्थितियों में योग विफल हो जाएगा, ये तो हम सब जानते ही हैं की पूर्ण कुडंली विश्लेषण के बाद ही पूर्ण फलादेश किया जा सकता है, यहाँ तो हम सिर्फ गुरु के पंचम में होने की स्थितियों पर चर्चा कर रहे हैं।

संतान प्राप्ति का समय :-
संतान प्राप्ति के समय को जानने के लिए पंचम भाव, पंचमेश अर्थात पंचम भाव का स्वामी, पंचम कारक गुरु, पंचमेश, पंचम भाव में स्थित ग्रह और पंचम भाव, पंचमेश पर दृष्टियों पर ध्यान देना चाहिए। जातक का विवाह हो चुका हो, और संतान अभी तक नहीं हुई हो, संतान का समय निकाला जा सकता है। पंचम भाव जिन शुभ ग्रहों से प्रभावित हो उन ग्रहों की दशा-अंतर्दशा और गोचर के शुभ रहते संतान की प्राप्ति होती है। गोचर में जब ग्रह पंचम भाव पर या पंचमेश पर या पंचम भाव में बैठे ग्रहों के भावों पर गोचर करता है, तब संतान सुख की प्राप्ति का समय होता है। यदि गुरु गोचरवश पंचम, एकादश, नवम या लग्न में भ्रमण करे तो भी संतान लाभ की संभावना होती है। जब गोचरवश लग्नेश, पंचमेश तथा सप्तमेश एक ही राशि में भ्रमण करे, तो संतान लाभ होता है।

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शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा और स्वास्थ्यवर्धक खीर :-

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागिरी पूर्णिमा भी कहा जाता है, को हिंदू चंद्र पक्ष अश्विन महीने (सितंबर-अक्टूबर) के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन के रूप में इसे कुमुड़ी (चांदनी) के रूप में भी जाना जाता है, जैसा कि इस दिन, पृथ्वी पर चंद्रमा की बौछार ‘अमृत किरणें’ या जीवन के अमृत उसके किरणों के माध्यम से है पूर्णिमा की चमक विशेष आनन्द लेती है, यह बदलते मौसम का प्रतीक है, मानसून के अंत में शरद पूर्णिमा की रात्रि चन्द्रमा की किरणों में औषधीय गुण रहते हैं।

5000 वर्ष पहले भी इस रात में भगवान श्रीकृष्ण और राधाजी ने वृन्दावन में अनगिनत गोपी को दिव्य आनंद प्रकट किया था। यह माना जाता है कि चंद्रमा और पृथ्वी शरद पूर्णिमा रात्रि पर सबसे करीब दूरी पर हैं। इस वजह से, चंद्रमा की किरणों में कई अमृत किरणें (उपचारात्मक गुण) हैं, चांदनी के नीचे खीर रखना शरीर और आत्मा दोनों को पोषण करता है, निम्नलिखित कुछ स्वास्थ्य युक्तियां दी गई हैं, जिन्हें अपनाने पर हम सभी को शरद पूर्णिमा का लाभ मिल सकता है।

शरद पूर्णिमा पर, शाम को चावल, दूध और मिश्री की खीर बनायें, खीर बनाने के दौरान कुछ समय के लिए इस में सोने या चांदी की वस्तु रखें, बनने के बाद उसे निकाल कर लगभग 9 बजे से करीब 12 बजे तक इसे चाँदनी में रखें। उस रात के लिए कोई भी अन्य खाना न पकाया जाए, केवल खीर ही खानी चाहिए। देर रात में हमें अत्यधिक आहार नहीं लेना चाहिए, इसलिए खीर को तदनुसार खाना चाहिए। शरद पूर्णिमा ‌की रात में रखी खीर को दूसरे दिन प्रातःकाल भी खाया जा सकता है। क्योंकि इसे प्रसाद के रूप में भगवान को देने के बाद बनाया जाता है। रात में 15-20 मिनट के लिए चंद्रमा की ओर देखे । ध्यान रहे आप आँखों को नहीं झपका रहे हों।

आँखों की परेशानियों से मुक्त होने के लिए और आंखें पूरी तरह ठीक से काम करने के लिए, शरद पूर्णिमा चाँद की चांदनी में ही में एक सुई में धागा लगाने का प्रयास करें। (कोई अन्य प्रकाश पास नहीं होना चाहिए)। शरद पूर्णिमा पर पूरी रात यदि आप जागरण कर सकते हैं, तो यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा होगा।

शरद पूनम रात आध्यात्मिक उत्थान के लिए बहुत फायदेमंद है, इसलिए इस रात को जागने का प्रयास करना चाहिए, यदि संभव है, तो इस पवित्र रात को जप ध्यान कीर्तन करें, जिससे की आप अपने भाग्य को भी जगा सकते है! शरद पूर्णिमा वर्ष में एक बार आती है, और कहा जाता है की इस दिन भगवान् श्रीकृष्ण सभी की मनोकामना पूर्ण करते हैं, इसलिए जैसे आप खीर बनाए उसे भगवान् विष्णु के भोग लगा कर चांदनी में रख दें, जिससे की इसकी मिठास आपके जीवन में सुखो की भरमार कर देगी, और आप अपना जीवन सुखमय जी सकेंगे !यदि आप खुद खीर नहीं बना सकते हैं, तो आप किसी मंदिर से प्रसाद भी ला सकते हैं !

एेसी मान्यता है कि गाय के दूध से! किशमिश और केसर डालकर चावल मिश्रित खीर बनाकर शाम को चंद्रोदय के समय बाहर खुले में रखने से उसमें पुष्टिकारक औषधीय गुणों का समावेश हो जाता है, यह खीर आध्यात्मिक उत्थान के लिए श्रेष्ठ है, जब अगले दिन प्रातः काल उसका सेवन करते हैं, तो वह हमारे आरोग्य के लिए मानसिक स्वास्थ्य अत्यंत लाभकारी हो जाती है, एक अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है, यह तत्व चंद्र किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का अवशोषण करता है, चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है, इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है, जोकि विज्ञान पर आधारित है।

आयुर्वेद के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन खीर को चन्द्रमा की किरणों में रखने से उसमे औषधीय गुण पैदा हो जाते है, और इससे कई असाध्य रोग दूर किये जा सकते है, खीर खाने का अपना औषधीय महत्त्व भी है, इस समय दिन में गर्मी होती है, और रात को सर्दी होती है, ऋतु परिवर्तन के कारण पित्त प्रकोप हो सकता है, खीर खाने से पित्त शांत रहता है, इस प्रकार शारीरिक परेशानी से बचा जा सकता है, शरद पूर्णिमा की रात में खीर का सेवन करने से जीवनदायिनी ऊर्जा प्राप्त होती है।

आयुर्वेद में उल्लेखित है कि यदि यह खीर मिटटी की हंडिया में रखी जाये, और प्रातः बच्चे उसका सेवन करें, तो छोटे बच्चों के मानसिक विकास में अतिशय योगदान करती है .!

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शनि देव

ग्रहों में यदि शनिदेव न होते …

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant), top best astrologer in delhi

ज्योतिषाचार्य जब कुण्डली में उन ग्रहों की महादशा व अन्तर्दशा के संदर्भ में ग्रहों के प्रभावों का विचार करते हैं, तब शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार के परिणाम की सूचना मिलती है, किन्तु शनि के प्रभाव का निरूपण करते समय वे इन्हें नितांत दु:ख व शोक-कारक ग्रह के रूप में स्वीकार करते हैं। शनिदेव की महादशा के विषय में कहा गया है कि- शनिदेव की महादशा सदैव मनुष्य के लिए दु:ख, शोक, नैराश्य तथा असफलता आदि के रूप में ही आती है, तथा उस समय मनुष्य को सब कुछ शून्य दिखाई देता है। आलस्य का प्रभाव शरीर पर बहुत हो जाता है, मनुष्य की विवेक शक्ति क्षीण हो जाती है, उसे अपने ही परिश्रम का पूर्ण फल नहीं मिलता, वे बार-बार अपनों की निंदा का पात्र बनता रहता है। आप पाठक भी विचारकों के इस तथ्य से सहमत होंगे कि शनिदेव की महादशा के बारे में ऊपर जो कुछ कहा गया है वह अधिकाशतः सत्य है।

वस्तुतः शनिदेव के पास वह सब अधिकार हैं, जो एक न्यायाधीश अथवा दण्डनायक के पास होते हैं। किन्तु प्रत्येक कुण्डली वाले जातक के लिये वे ऐसा नहीं करते दण्ड वा न्याय के अतिरिक्त भी बहुत कुछ करते हैं। उदाहरणार्थ- यदि शनिदेव वृषभ या तुला राशि में होकर केन्द्र में हैं, अथवा कुण्डली में योगकारक होकर केन्द्र या त्रिकोंण में हैं, अथवा केन्द्रेश होकर त्रिकोणेश के साथ या त्रिकोणेश में होकर केन्द्रेश के साथ हैं, तो इनकी महादशा में निम्नलिखित शुभ परिणाम होते हैं :-

कृषि कार्य में सफलता तथा लाभ, पशुओं की समृद्धि, बहुत आय, नौकर-चाकरों से सुख, मूल्यवान वस्तुओं की प्राप्ति, कार्यों में सफलता, व्यापार व्यवसाय में लाभ, राज्य से सम्मान, राजनैतिक सफलता, स्पष्ट है कि शनिदेव केेवल शोक-दुःखप्रद ग्रह नहीं हैं अपितु परिस्थिति विशेष में वह अन्य सौम्य ग्रहों की तरह, तथा कभी-कभी उनसे भी अधिक सुख तथा सौभाग्य की सूचना देने वाले ग्रह हैं। शनिदेव को केवल शोकमय ग्रह बताना जनमानस तथा विद्वजनों का भ्रम है, यह पूर्ण सत्य नहीं है। सत्य तो यह है कि शनिदेव सबसे अधिक सत्य का ज्ञान करवाने वाले एवं न्याय-प्रिय ग्रह हैं। एक सत्यप्रिय एव न्यायनिष्ठ न्यायाधीश में जो गुण होने चाहिए वे सभी गुण ग्रहों में न्यायाधीश के पद पर विराजमान शनिदेव में भरपूर मात्रा में हैं। अतः प्रकृति ने इन्हें इस संसार के सर्वशक्ति सम्पन्न दण्डाधिकारी के रूप में नियुक्त किया है। एक सच्चे न्यायाधीश की तरह शनिदेव मनुष्य को न केवल उसके द्वारा कुकृत्यों का दण्ड देते हैं, अपितु प्राणियों को सुकर्मो का पुरस्कार भी देते हैं। ‘न्यायाधीश’ के व्यापक अर्थ में शनिदेव शिक्षक भी हैं, और दण्डाधिकारी भी हैं, यह कार्य शनिदेव अपनी महादशा, अंतरदशा अथवा साढेसाती में मनुष्य को तपा कर शुद्ध सोने की तरह (खोट रहित) बना देने के लिये ही करते हैं। इन की महादशा, अंतरदशा या शनि साढ़ेसाती के समाप्त होने पर मनुष्य अच्छी तरह समझ जाता है, कि यह सब उसके अपने ही बुरे कर्मो का फल था, और अब आगे उसे ऐसे कुकृत्यों से बचकर रहना है। इस लिये शनिदेव से मनुष्य अपने जीवन को सही ढंग से जीने की कला भी सीखता है। वे दार्शनिक भी हैं, धर्मगुरु भी हैं, मन में वैराग्य भाव पैदा कर मनुष्य को संन्यासी भी बनाने वाले यह शनिदेव हैं; क्योकि आत्म जागरण व सच्ची शिक्षा ही संसार की समस्त व्याधियों से बचने का एक मात्र सार्वभौम उपचार है। अतः संसार में शुभ या अशुभ फल प्रदान करने के लिए जितने शक्ति सम्पन्न शनिदेव हैं उतना अन्य कोई ग्रह नहीं है। जातक पारिजातकार ने ठीक ही कहा है :- आयुर्जीवन, मृत्युकारण, विपत्, सम्पत्, प्रदाता शनिः।

शनिदेव प्राणीयों को सब कुछ देते हैं, केवल पात्रता चाहिए। यह बात और है, कि इस कलियुग में मनुष्य सुकर्मों की अपेक्षा कुकृत्य अधिक करता है। अतः इसे पुरस्कार की अपेक्षा दण्ड ही अधिक भुगताना पड़ता है। यही कारण है कि इस ग्रह को शुभकारक की अपेक्षा अशुभकारक (दण्ड देने वाला) अधिक माना जाता है। पारम्परिक रूप से शनिदेव के स्वरूप की इस प्रकार वंदना की जाती है :-

नीलान्जनं समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड-सम्मूतं तं नमामि शनेश्चरम्।।

शनिदेव का यह स्वरूप हमें याद दिलाता है :- न्यायाधीश की वर्तमान वेशभूषा तथा उसके चारों ओर घिरे हुए काले कोट पहने हुए वकीलों से युक्त परिवार की। उक्त श्लोक का अर्थ इस प्रकार है। ‘मैं ऐसे स्वरूप वाले शनिदेव की वंदना करता हूं जो- नीली आभा लिये हुये काले काजल के समान कांति वाले हैं। (सभी न्यायाधीश काले कोट पहन कर काजल के समान कांतिवाले लगते हैं)। सूर्य के पुत्र हैं, (सूर्य ग्रहों में राजा या अधिकारी हैं, उन्होंने ही शनिदेव को जन्म दिया है)। यमराज के बड़े भाई हैं (यमराज जेलर अथवा जल्लाद का प्रतीक है)। छाया एवं मार्तण्ड से उत्पन्न है (सूर्य शासन, प्रकाश एवं छाया-अंधकार के प्रतीक हैं। कहीं प्रकाश कहीं अपराध या अंधकार है, इसी कारण जिनका जन्म हुआ है)। धीमे चलने वाले हैं, (अदालतों में अनेक तारीखों अथवा लम्बी प्रतीक्षा के बाद जाकर न्याय मिलता है। इसी लिये कहा भी जाता है :- भगवान के घर देर है, परंतु अंधेर नहीं।) निलम्बित प्रकरणों के लिए लोग व्यर्थ ही न्याय व्यवस्था को दोष देते हैं। इस प्रकार न्यायाधीश के पक्ष में भी उक्त श्लोक का अर्थ एकदम युक्तियुक्त हो जाता है :- मैं ऐसे न्यायाधीश की वंदना करता हूं जो काजल के समान कांति वाले हैं, शासन के कर्म-पुत्र हैं, शासन के द्वारा नियुक्त वरिष्ठ अधिकारी हैं, अंधकार जन्य कृत्यों के प्रति शासन की चिंता के कारण ही इनका जन्म हुआ है, तथा जो मंदगति से चलने वाले बहुत सोच विचार के पश्चात बेशक अधिक समय लग जाये परंतु सच्चा न्याय करने वाले हैं।

न्यायाधीश से शनिदेव का साम्य तो बाह्य वैचित्र्य है किन्तु अधिक महत्वपूर्ण तो आंतरिक साम्य है। न्यायाधीश, सिविल, सर्वेण्टस, दार्शनिक, खोजकर्ता वैज्ञानिक आदि की जन्म पत्रिकाओं में उनको उच्चपद दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका शनिदेव की ही रहती हैं। जब प्राणी को अपने बुरे कर्मो का फल मिलने का समय आ जाता है, तब उस समय किसी न किसी रूप में शनिदेव का प्रभाव उस पर होता ही है। चाहे वे प्रभाव महादशा के रूप में हो, चाहे अंतरदशा के रूप में अथवा साढेसाती के रूप में ही क्यो न हो, परंतु यह प्रभाव होता मनुष्य की आशा के विपरीत ही है। वैपरीत्य की स्थिति में सामान्य रूप में शनिदेव निम्नलिखित परिणाम देने वाले होते हैं :-

रोग, धनहानि, पर बंधन अर्थात जेल यात्रा, वियोग, प्रियजन की मृत्यु, मृत्यु अथवा मृत्युतुल्य कष्ट, क्रान्ति (प्रबल विरोध) अथवा गृहयुद्ध, क्षत्र-भंग। यदि किसी व्यक्ति का आहार-व्यवहार असंयमित है, तो उसके शरीर में किसी न किसी प्रकार का विकार हो जाना निश्चित है। शरीर की इस विकृति को दूर करने के लिए अपनी दशा-अन्तर्दशा में अथवा साढे़साती की अवधि में शनिदेव व्यक्ति को रोगी बना देते हैं, ताकि वह औषधि से संयमित बने। ऐसा करके वे उसका रेचन करते हैं, तथा संयम के रास्ते पर लाने के लिए एक संकेत देते हैं। हममें से अधिकांश को यह मालूम होगा कि साढ़ेसाती के तत्काल बाद की अवधि में मनुष्य अपने आपको तरो-ताजा तथा नया महसूस करता है। हर मनुष्य पर, प्रत्येक 30 वर्ष की अवधि में एक बार शनिदेव यह उपकार करते हैं। जब शरीर अत्यंत जीर्ण हो जाता है, तब अपने तृतीय उपकार के समय शनिदेव सदा के लिए ही इस कष्ट को दूर कर देते हैं। इस रूप में शनिदेव उस कठोर-डाक्टर की तरह हैं, जो रोगी की व्याधिनाश के लिए आॅपरेशन के समय रोगी के चिल्लाने की परवाह नहीं करता क्योंकि वास्तविकता कल्याण (निरोगता) में निहित है। मनुष्य का शनिदेव को दोष देना उसी प्रकार अनुचित है, जैसे बच्चों का, डाॅक्टर के हाथ में इंजेक्शन को देखकर भयभीत होना।
इसी प्रकार जब मनुष्य अवैध तरीके से आपार धन सम्पत्ति एकत्रित कर लेता है तो शनिदेव अपनी दशा, अन्तर्दशा में उसका वह धननाश अवश्य करते हैं। अत्याचारी या अपराधी प्रवृति वाले अधिकारी से प्रजा को होने वाले कष्ट से बेखबर राजा को वह निर्ममता पूर्वक धूल में मिला देते हैं। समाज में यदि शोषण अत्यधिक बढ़ जाये तो क्रांतिकारियों के रूप में शनिदेव पुनः व्यवस्था कायम कराते हैं। शनिदेव हर प्रकार से हारे हुये मानव का मार्गदर्शन भी करते हैं, तथा प्रतिनिधित्व भी करते हैं, अतः प्रत्येक विचार क्रांति में शनिदेव की प्रेरणा ही रहती है। अन्यायी कोई भी वर्ग हो, शनिदेव के दण्ड से बच नहीं सकता। शनिदेव का अपना जीवन अत्यंत सादा है, जो उसे सार्वभौम न्याय प्रशासक के लिये उपयुक्त बनाता है। अपनी इच्छाओं तथा आवश्यकताओं से व्यक्ति मार्ग से विचलित होता है। शनिदेव ने स्वेच्छा से राजकुमार होते हुए भी सेवक होना स्वीकार किया, किसी प्रकार की राजकीय ठाटबाट स्वीकार नहीं की, हाथी घोड़ों को छोड़कर उसने ‘महिष से ही संतोष’ किया। सोना-चांदी आदि आभूषणों, मूल्यवान वस्तुओं को छोड़कर लोहा ही स्वीकार किया। उड़द तथा तेल ही इन्हें संतोष देते हैं। इन्हें रंग-बिरंगे रेशमी वस्त्र भी पसंद नहीं- काला कपड़ा ही अभीष्ट है। राजमंत्री, न्यायाधीश, दार्शनिक आदि महान व्यक्तियों को बनाने वाले यह ग्रह रूप शनिदेव जो किसी को इन्द्र के समान वैभवशाली जीवन प्रदान करते हैं, तथा अपराधी, अत्याचारी होने पर इन्द्र जैसे वैभवशाली को भिखारी बनाकर धूल में भी मिला सकते हैं, परंतु इनका अपना जीवन सादा तथा आडम्बरहीन है। हम कह सकते हैं, कि शनिदेव साक्षात शिव के अवतार हैं, जो अमृत पिलाने के लिए स्वयं विषपान करते हैं। अब आप स्वयं ही विचार करें कि :- ग्रहों में यदि शनिदेव न होते…? तो संसार में कितना अंधकार होता? ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नमः।

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भाग्योदय Bhagyodaya

Bhagyodaya :- भाग्योदय वाला समय अर्थात् सुखद समय जीवन में कब आयेगा? :-

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka bhavishya.in), Astrological consultant

हर मनुष्य अपने अनुभवों और विशेष रूप से जीवन के संघर्षों से सीख लेता है, और उसे पता रहता है की जीवन बिना संघर्ष के चलता ही नहीं। परंतु कभी बहुत अधिक संघर्ष, कभी मध्यम और कभी अल्प संघर्ष वाला समय भी जीवन में आता है। जीवन में जब कम संघर्ष और अधिक लाभ वाला समय रहता है, एेसे समय की हर किसी को प्रतीक्षा रहती है। क्योंकि वही तो वह सुख के पल हैं, जिन पलों में उसे मानसिक और शारीरिक थकावट नहीं होती, और सुखद अनुभव होते हैं। सुखद समय को ही भाग्योदय Bhagyodaya वाला समय कहा जाता है। भाग्योदय कब होगा? अथवा वह समय कब आयेगा जब एक बार नौकरी या कारोबार में अच्छा उठाव आयेगा। जीवन में भाग्योदय कब कब होगा? इस प्रश्न का सही उत्तर ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से अच्छी गणना करने वाला एक विद्वान ज्योतिषी ही बता सकता है। Shukracharya संस्थान के संस्थापक Dr.R.B.Dhawan, top best Astrologer in delhi के द्वारा आगे की पंक्तियों में भाग्योदय के कुछ प्रमाणिक योगों की चर्चा की जा रही है :-

1. भाग्याधिपति (नवम भाव का स्वामी ग्रह) के केन्द्र में रहने से प्रथम ही अवस्था में भाग्य की उन्नति होती है, और त्रिकोणगत अथवा उच्चगत रहने से मध्य अवस्था में जातक भाग्यवान होता है। केन्द्र और त्रिकोण को छोड़कर अन्य स्थानों में स्वक्षेत्रगत अथवा मित्रगृही होने से शेष आयु अर्थात् वृद्धावस्था में भाग्योदय होता है। परन्तु स्मरण रहे कि यह एक साधारण विधि है।

2. इसी प्रकार एक स्थूल रीति से ऐसे भी विचार किया जाता है कि यदि द्वादश राशि को तीन खण्डों में बाँटा जाये तो चार राशियों का एकैक खंड हुआ। लग्न, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ का प्रथम खंड। पंचम, षष्ठ, सप्तम और अष्टम का द्वितीय खंड तथा नवम, दशम, एकादश और द्वादश का तृतीय खंड हुआ।
बृहस्पति और शुक्र सर्वदा शुभग्रह हैं, और बुध भी शुभ हैं परन्तु पापयुक्त रहने से शुभ नहीं कहलाता। क्षीण चन्द्रमा के अतिरिक्त चन्द्रमा भी शुभ है। यह देखना भी जरूरी है कि कुंडली के किस खंड में शुभग्रह की विशेषता है यह सभी खंडों में शुभग्रह बराबर हैं। जिस खंड में शुभग्रह की विशेषता होगी वह जीवन खंड उस जातक का विशेष सुखमय होगा और यदि तीनों खंड़ों में शुभ ग्रह बराबर हैं तो जातक आजन्म एक जैसा रहेगा।

उदाहरण कुंडली में प्रथम खंड धन से मीन प्रर्यन्त है। मीन में चद्रंमा शुभ ग्रह है। द्वितीय खंड मेष से कर्क प्रर्यन्त है। उसमें एक शुभ ग्रह है। तृतीय खंड सिंह से वृश्चिक तक है। उसमें भी एक शुभ ग्रह शुक्र है। बुध भी उसी खंड में है परन्तु सूर्य के साथ रहने से पाप हो गया है। परिणाम यह निकला कि इस जातक का जीवन साधारणतः जन्म से मृत्यु प्रर्यन्त एक प्रकार से सुखमय होगा। साधारणतः ऐसा ही देखा भी जाता है।

3. यदि लग्नेश शुभ राशिगत हो और उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो, अथवा यदि लग्नेश नवम स्थान में हो, अथवा यदि लग्नेश नवम स्थान में हो, अथवा नवमेश पंचम स्थान में हो तो जातक सोलह वर्ष के बाद सुखी होता है।

4. यदि लग्न शुभ राशि का हो और उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि भी हो परन्तु लग्न में कोई पापग्रह न हो तो जातक बाल्यकाल ही से सुखी होता है। यदि लग्न में एक से अधिक पाप ग्रह हो तो जातक आजन्म दुःखी रहता है।

5. यदि लग्नेश का नवाँशेश अर्थात लग्न का स्वामी जिस नवांश में हो उस नवांश का पति यदि लग्न में अथवा त्रिकोण अथवा एकादश भाव में बली होकर हो अथवा उच्च हो जो जातक तीस वर्ष की अवस्था के उपरांत भाग्यशाली होता है।

6. (क) लग्नेश द्वितीय स्थानगत हो। (ख) लग्नेश जिस नवांश में ही उसका स्वामी द्वितीय स्थान में हो। (ग) यदि एकादशेश द्वितीय स्थान में हो तो इन तीन योगों में से किसी के रहने से जातक बीस वर्ष की अवस्था के बाद सुखी होती है।

7. भाग्याधिपति अर्थात् नवमेश जिस राशि में रहता है उस राशि के स्वामी को ‘भाग्यकर्ता’ कहते हैं। जैसे, उदाहरण कुंडली में नवमेश सूर्य तुला राशि में है और तुला का स्वामी शुक्र है। अतः इस जातक का ‘भाग्यकर्ता’ शुक्र हुआ। लिखा है कि यदि सूर्य ‘भाग्यकर्ता’ ग्रह हो तो उस जातक की उन्नति 22 वर्ष के पूर्व विशेष रूप से वर्ष, मंगल होने से 28 वर्ष, बुध से 32 वर्ष, बृहस्पति 16 वर्ष, शुक्र 24 वर्ष और शनि के ‘भाग्यकर्ता’ होने से 36 वर्ष के पूर्व भाग्योन्नति Bhagyodaya नहीं होती है। अर्थात् ‘भाग्यकर्ता’ ग्रह के नियमित समय के बाद से उन्नति होती है। यहाँ तक देखा गया है कि यदि इसके पूर्व दशा अन्तरदशा इत्यादि के अनुसार यदि शुभफल होता भी हो तो उत्कृष्ट फल उपर्युक्त समय के बाद ही होता है।

उदाहरण कुंडली का ‘भाग्यकर्ता’ शुक्र shukracharya है, इस कारण उक्त जातक की भाग्योन्नति 24 वर्ष के बाद सूचित होती है। यर्थाथ में इस जातक की उन्नति 28वें वर्ष से ही अारम्भ हुई थी।

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कबाड़ और वास्तु

घर का कबाड़ और वास्तुशास्त्र :-

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संग्रह करना मानव के स्वभाव में है। यह संग्रह किसी भी प्रकार हो सकता है जैसे धन, आभूषण, कपड़े, फर्नीचर, सुंदर वस्तुएं, कबाड़ इत्यादि। घर का कबाड़ वह होता है जिसकी जरूरत कभी-कभार ही पड़ती है परंतु कब पड़ जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। इसलिये इसे घर से निकालते समय मन में विचार रहता है कि शायद किसी समय इसमें से किसी वस्तु की आवश्यकता पड़ जाये और सच में देर-सबेर उनकी जरूरत पड़ भी जाती है। इस प्रकार के अनचाहे घरेलू सामान के संग्रह को ही कबाड़ कहा जाता है। घर का कबाड़ कहां और किधर रखा है। उससे उस घर में रहने वालों की आर्थिक, मानसिक और शारीरिक स्थिति का पता चल जाता है। आइये देखते हैं कि, किस तरह से घर में रखे कबाड़ का प्रभाव वहाँ रहने वालों के जीवन पर पड़ता है –

पूर्व:- घर की इस दिशा में घर का कबाड़ भरा हो तो घर के मालिक को किसी अनहोनी का सामना करना पड़ता है।
आग्नेय:- इस स्थान पर घर का कबाड़ रखने से घर के मुखिया की आमदनी घर के खर्चे से कम होने के कारण उस पर कर्ज बना रहता है।

आग्नेय:- यहां बहुत ऊर्जा रहती है, यदि यहां कबाड़ रखा जाता है तो, इस दिशा में शनि की विशेष वस्तुओं को नहीं रखें, शनि की विशेष वस्तुओं में – लकड़ी, लोहा और किसी भी तरह का तेल या पेट्रोलियम प्रोडक्ट आता है। इलैक्ट्रिक या इलैक्ट्रोनिक वस्तुओं, खाली सेलेन्डर, चूल्हा रख सकते हैं।

दक्षिण:- यहाँ बेडरूम में कबाड रखा जाये या बर्तन, लकड़ी का सामान, घड़े इत्यादि रखे जायें तो मालिक के भाई को कठिनाईयां और खतरों का सामना करना पड़ता है। घर का मुखिया की बातचीत में घमंड और अंहकार झलकता है और वह आगे जाकर शक्ति विहीन होकर अशांत रहता है।

नैऋत्य:- घर में कबाड़ रखने का सबसे उत्तम स्थान यही होता है। परंतु ध्यान रहे यहाँ पर किसी प्रकार की नमी या सिलन नहीं रहनी चाहिये और कमरे में रोशनदान अवश्य होना चाहिये। यदि यहाँ कम रोशनी या अंधेरे के साथ नमी हो और कबाड़ भी रखा गया हो तो ऐसी स्थिति में घर वालों को यहाँ भूत-प्रेत होने का एहसास होता है।

पश्चिम:- इस दिशा में यहाँ पर पुरानी त्यागी हुई वस्तुयें रखी जायें। खिड़की दरवाजे टूटी-फूटी हालत में हो, दीवारे खराब हों तो यहाँ रहने वाले हर कार्य को बहुत धीरे-धीरे करते है और उनमें समझ की कमी होती है। आमदनी का जरिया धोखा और फरेब होता है और घर का मुखिया गलत लोगों के संगत में रहता है और परिवार में हमेशा विवाद होते हैं और आरोप लगते रहते हैं।

वायव्य:- घर की इस दिशा में यदि कबाड़ रखा जाता है तो उस घर के मुखिया को अपने मित्रों की शत्रुता की जिम्मेदारी स्वयं उठानी पड़ती है। मुखिया को मानसिक अंशाति और उसका मन विचलित रहता है। उसकी माँ को कफ एवं कोल्ड और गैस की शिकायत रहती है। यह स्थिति यह भी दर्शाती है कि घर का मुखिया बहुत दूर से यहाँ आकर बसा है।

उत्तर:- यहाँ पर कबाड़ रखा गया हो तो मुखिया को उसके भाईयों से खुशियां कम प्राप्त होती है और उसका सबसे छोटा भाई मानसिक विक्षिप्त हो सकता है।

ईशान:- यहाँ पर यदि कबाड़ रखा जाये तो घर में रहने वाले नास्तिक होते हैं और इनको भगवान में श्रद्धा नहीं होती। उन्हें जोड़ों में दर्द की समस्या रहती है। घर के अंदर मुख्यद्वार के बाँये हाथ के कमरे में कबाड़ पड़ा रहता हो तो उस घर की महिला की आँखों में तकलीफ होती है और पति-पत्नी में आपसी तालमेल एवं सहयोग बड़ा साधारण रहता है। जिस घर में कबाड़ रखने का कमरा अन्य कमरों की तुलना में बड़े रहते है साथ ही वहाँ पर अंधेरा भी रहता है। वहाँ रहने वाले कुछ इस तरह के बेवकूफों जैसे कार्य करते है कि उनकी लोगों के साथ शत्रुता हो जाती है।

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मंत्र सिद्धि Mantra Siddhi

Mantra Siddhi :- मंत्र सिद्धि और मंत्रों में विद्युत शक्ति कैसे कार्य करती है? :-

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यह अटूट सत्य है कि मंत्रों में अपार शक्ति है, परन्तु मंत्र साधना Mantra Siddhi क्यों और कैसे होती है ? हमारे इस भौतिक शरीर में दो और शरीर हैं – 1. वैद्युतिक (सूक्ष्म शरीर) और 2. मानसिक (कारण शरीर)। हम जो खाते हैं उससे उक्त तीनों शरीरों को पोषण प्राप्त होता है, और तीनों का प्रथक-प्रथक एवं संयुक्त कार्य है। हमारे स्थूल शरीर के प्रश्न के उत्तर में हमें यह भली प्रकार जान और मान लेना चाहिये कि आकाश में सूक्ष्म रूप में अन्य तत्व भी तो हैं। इस अन्यान्य तत्वों में आकाश भी गौण रूप में विद्यमान है। guruji shukracharya के संस्थापक जी का कथन है कि यह समस्त संसार जो भिन्न-भिन्न रूप और प्रकृति में दिखायी पड़ता है, वह मूलभूत इन्हीं पाँच तत्वों की माया है। उनका अनुपात विभिन्न प्रकार की आकृतियों स्वभाव और गुण धर्म का कारण बनता है। इन तथ्यों के प्रतीक अथवा तन्मात्रा जिस स्थूल में प्रजनन और संहार, आकर्षण और विकर्षण का कारण बनती है।

भारतीय संस्कृति ज्ञान या भारतीय वाङ्मय में शब्द को ब्रह्म का प्रतीक माना जाता है। यहाँ तक कि ब्रह्म का गुणात्मक शरीर शब्द ही तो है। इस संसार में यदि शब्द को हटा दिया जाये तो मानव समाज मूक ही नहीं अपितु सम्पूर्ण जड़-चेतन और चैतन्यता स्थिर हो जायेगा, और स्थिरता से उपक्रांति होगी जो महाविनाश का प्रतीक है। मंत्र मार्ग भी है, और लक्ष्य भी। यह गुणात्मक सत्ता से चलकर गुणात्मक तीन अवस्थाओं में पहुँच जाता है, और उस समय शब्द का सुस्पष्ट और प्रत्यक्ष दर्शन होता है।

जागतिक सफलता और चमत्कार के लिये मंत्र का प्रयोग किया जाता है। हमारा शरीर ही नहीं, मन-मस्तिष्क भी इन तत्वों का अनुपात हमारे शरीरों फिजिकल, अष्ट्रल, और साइकोलोजिकल रूप को भी प्रभावित करता है। मंत्रों में इन तत्वों को उत्कृष्ट और शांति करने की सूक्ष्म व्यवस्था है (जैसी विधि आयुर्वेद में वात, पित्त कफ के शमन उद्दीयन के द्वारा रोग निवारण में प्रचलित है। मंत्र मशीन से अधिक निर्दोष सबल और सरल है। एक बार सिद्ध करने पर इसे जहाँ चाहें प्रयोग में लाया जा सकता है। मंत्र की शुद्ध भावना शब्द है, इससे शब्द की ऊर्जा और भावना शक्ति परस्पर गणित होकर कार्य करती है। शब्द किंवा ध्वनि को अनुप्रष्ठ एवं अनुरदेध्य तरंगें विद्युत की प्रतिरोध गामिनी तरंगों के साथ जब एक रूप हो जाती हैं तो मंत्र जागृत और सिद्ध हो जाता है। मंत्र को सतत् जपने से यही स्थिति आती हैं मंत्र साधना से मंत्र का जप पहले साधक को मन, व्यवहार में नितान्त निर्मल करता है, और निर्मल तन-मन वाले व्यक्ति की तरंगें सबल, दीर्घ और इच्छित दिशा में शमन करने लगती है। इसलिये उसका मंत्र सभी भौतिक कार्यों को सिद्ध Mantra Siddhi कर देता है।

वैज्ञानिक विश्लेषणः- आप कल्पना कीजिये कि संसार में कुल तीन अरब प्राणी हैं, जिनमें आधे तो दिन के प्रकाश में कार्य व्यस्त हैं, और आधे रात्रि में आनन्द से सो रहे हैं। आधे, यानी डेढ़ अरब प्राणी जागरण काल में यदि तीन घंटे बातचीत करते हों, तब क्या आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि वे बातचीत द्वारा कितनी विद्युत शक्ति उत्पन्न करते हैं। विद्युत ध्वनि शास्त्र तथा इंजीनियरिंग द्वारा गणना करके देखा जाये तो लोग उक्त तीन घंटों में कम से कम 6,000 खरब वाट विद्युत शक्ति केवल अपने शब्दों और ध्वनियों से उत्पन्न करते हैं। यह विद्युत ऊर्जा दामोदर घाटी, रिहृंध बांध, तथा भाखड़ा नांगल एवं बम्बई के ट्रांबे परमाणु प्रतिवर्तक की सम्मिलित शक्ति से कहीं अधिक है तथा भारत में उत्पन्न होने वाली कुल बिजली से लगभग आठ गुनी अधिक है। इस विद्युत ऊर्जा से सम्पूर्ण विश्व में घंटों प्रकाश किया जा सकता है। यदि इस ऊर्जा की एक यूनिट की कीमत केवल पचास पैसे रखी जाये तो उसकी कीमत एक खरब रूपये होगी।

Dr.R.B.Dhawan (संस्थापक shukracharya) शब्द शक्ति के सम्बंध में कहते हैं कि- वैज्ञानिक डाॅ. बोएड ने एक ऐसा विचित्र यंत्र बनाया है, जिसके सम्मुख बोलने से हिलोरे और कंपन स्पष्ट देखे तथा आंके जा सकते हैं। यदि उसके सामने कोई जोर-जोर से बोले तो यंत्र टूटकर बिखर सकता है।

शब्दों का प्रभाव:- उच्चादित शब्दों का ठीक इसी प्रकार का प्रभाव हमारी त्वचा व कानों की त्वचा पर पड़ता है। इस सम्बंध में कान और त्वचा की संवेदना की प्रक्रिया लगभग एक ही प्रकार की है। शब्दों के लिये कानों की त्वचा की संवेदनशीलता सबसे अधिक होती है, जबकि त्वचा की संवेदना प्रायः नगण्य भी होती है। कान-विद्युत घट ‘वाई मारकस पीजो इलैक्ट्रिक साउंड सेल’ का भी काम करते हैं। इस प्रकार का विद्युत घट अर्ध-चालक पत्थरों के बचाव द्वारा उत्पन्न बिजली के सिद्धांत पर बनता है। साधारण तौर पर इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। कि कान को एक प्रकार का ‘माइक्रोफोन’ कह सकते हैं। इसकी विशेषता यह होती है कि उसमें 02 से 20,000 आवर्तन का कोई सुनायी पड़ने योग्य शब्द प्रवेश करते ही विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है और वह सीधे मस्तिष्क तक पहुँचती है। तद्नन्तर विविध क्रिया प्रक्रियाओं को जन्म देते हुये शरीर के सभी भागों एवं ग्रन्थियों को क्रियाशील और विद्युत धारावर्ती बना देती हैै।

चमड़ी से इसी प्रकार का काम एक माध्यम द्वारा होता है। त्वचा पर सर्वप्रथम ध्वनि-चाप ‘प्रैशर’ का प्रभाव पड़ता है। फिर ग्राहक स्नायु-तंतुओं में बिजली का संचरण होता है। बिजली की यह धारा तदनंतर अपनी दीर्घ यात्रा के पश्चात मस्तिष्क के स्नायु तन्तुओं को अल्प मात्रा में विद्युन्मयी करती है। शब्दों का सर्वाधिक प्रभाव उनका आलोड़न-विलोड़न क्रमशः कर्ण-स्नायु, मस्तिष्क, अन्य स्नायु सूत्र हृदय, अंतस्रावी ग्रन्थियों, पेट, वृक्क, यकृत, रक्त तथा प्रस्वेद ग्रन्थियों पर पड़ता है।

शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ावः- उच्चारित शब्दों का श्रोता के मस्तिष्क पर दो प्रकार से प्रभाव पड़ता है। पहला, मुख से शब्द निकलने से पूर्व वक्ता के मस्तिष्क से उसी प्रकार की विद्युत-चुम्बकीय तरंगें निकलती हैं, जिन्हें श्रोता का मस्तिष्क ग्रहण करने की चेष्टा करता है। दूसरा उच्चारित शब्द वायु के माध्यम से विद्युत संचार के रूप में कर्ण रंध्रों से होते हुये मस्तिष्क में पहुँचते हैं। तब वे हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा आदि आवेगों को मस्तिष्क में उत्पन्न करते हैं। इसी से शरीरांगों में प्रस्फुरण और संदीपन होते हैं। शब्द इस प्रकार प्रेरणा, प्रास्फुरण, स्फूर्ति उत्पन्न कर प्रायः शरीर के अवयवों में साधारण अवस्था से अधिक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। वे कभी-कभी निष्क्रियता और शिथिलता भी उत्पन्न करते हैं।
स्नायु मंडल पर भी शब्दों के विविध प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं। अद्विग्नता, क्लांति, विषाद, शरीर कम्पन, चित्त की चंचलता भयानक स्वप्न आदि उन प्रभावों की स्पष्ट विकृतियाँ होती हैं। मूर्छा, स्मृति, भ्रम और विक्षिप्तता का भी आक्रमण हो सकता है। शब्दों के काम, क्रोध, मोह, लोभ तथा भय उत्पन्न होने पर दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं, और रक्त का प्रवाह भी ऊँचा उठने लगता है। रक्त में विशेष प्रकार का विष टाक्सिन पैदा होने लगता है। इसी प्रकार हर्षोत्पादक व आशाजनक शब्द मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत तुल्य काम करते हैं।

शब्दों से रहस्योद्घाटन:- प्रिय, अप्रिय शब्दों के अनुसार पेट में भी प्रतिक्रियायें होती हैं। उनसे भूख और पाचन क्रियायें घट या बढ़ जाती हैं। इन्हीं सब तथ्यों को सामने रखकर शब्दों और प्रश्नों के माध्यम से उत्तेजित कर अपराधों का पता लगाने के लिये मिथ्यान्वेषी (लाइ-डिटेक्टर) यंत्र का आविष्कार किया गया है। शब्दों की बौछार से अपराधी के शरीरांगों में होने वाली क्रिया-प्रतिक्रियाओं को विद्युत धारा द्वारा ग्रहण कर रहस्य की मंत्र-मन् धातु के उत्तर उ – प्रत्यायत – त्रै – धातु जोड़ने से ‘मंत्र’ शब्द साधित Mantra Siddhi होता है। (मन् + त्रं = उ मंत्र’ मननात जायते यस्मात् मंत्र उदाहतः।’) जिसके मनन, चिंतन ओर ध्यान द्वारा लौकिक, परालौकिक सुख की उपलब्धि होती है। उसी का नाम मंत्र है।

गुत्थी को सुलझाने में मदद मिलती है :- क्रोध, घृणा और भयजनक शब्द को सुनकर व्यक्ति की ‘एड्रीनलग्लैंड’ से ‘एड्रोलिन’ नामक स्राव काफी वेग से निकल-निकल कर रक्त में मिलने लगता है और मस्तिष्क तथा अन्य अंगों को असाधारण रूप से जागरूक और शक्तिशाली बना देता है, पर केवल अल्पकाल के लिये। एड्रेलिन के निकलते समय यकृत (लीवर) से एक विशेष प्रकार की पहले से ही जमा हुई शर्करा (ग्लाइकोजिन) स्वयं निःसृत होने लगती है। इसी क्रम में बार-बार मूत्र आने की शिकायत होती है।

शब्द-प्रक्रियाओं का महत्व:- भारतीय संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों में शब्दों की इन्हीं सब प्रक्रियाओं को ध्यान में रखकर कल्याण, मनोकामना सिद्धि, शत्रुनाशन, शत्रु मारण, उच्चाटन आदि के लिये विविध शब्द प्रक्रियाओं का विधान किया गया है। आज के वैज्ञानिक युग में यह सब मनोवैज्ञानिक युद्ध यानी साइकोलाॅजिकल वार या स्नायविक युद्ध (वार आॅफ नवर््ज) के अंतर्गत आता है।

मंत्र शक्ति के मूल में मूल भावना :- मंत्र शक्ति के मूल में यही भावना काम करती है। गाली-गलौज, मखौल, व्यंग्य, धमकियाँ आदि इन्हीं उपर्युक्त कार्यों की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। पाश्चात्य देशों में इन्हीं के एक रूप को सम्मोहन (हिप्नोटिज्म) और आत्म परामर्श (आॅटो सजेशन) की संज्ञा प्रदान की गई है। प्रसिद्ध रूसी विद्वान पावलाव ने शब्दों को अत्यंत शक्तिशाली अनुकूलित प्रतिवर्त (उत्तेजन) कंडीशंड रेप्लेक्स कहा है। इस प्रकार उपर्युक्त विवरणों से स्पष्ट हो जाता है कि मंत्रों में सुनिश्चित रूप से शक्ति होती है और उनसे कार्यों की सिद्धि भी प्राप्त की जा सकती है। मंत्र तीन प्रकार के होते हैं – वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक। विद्वत समाज की धारणा है कि कलियुग में प्रथम दो प्रकार के मंत्र सफल नहीं होते। कलियुग के लिये तांत्रिक मंत्र ही शक्तिशाली है। तांत्रिक मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं – साबरी मंत्र, डामरी मंत्र, बीजाक्षर मंत्र। इन तीनों प्रकार के तांत्रिक मंत्रों का अपना-अपना विज्ञान है। जो लोग उसके वैज्ञानिक रहस्य को समझते हैं, वे ही मंत्रों का प्रयोग कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। तांत्रिक मंत्रों की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे बिना दीक्षा के न तो सिद्ध होते हैं, और न ही काम करते हैं। मंत्रों का पुरश्चरण भी है। पुरश्चरण से मंत्र की शक्ति एकत्र होकर संकल्प शक्ति और विचार शक्ति के साथ तादात्म्य स्थापित करती है। इसी को ‘मंत्र जागरण’ कहते हैं।

जप में मन का एकाग्र होना आवश्यक है। बिना होठ हिलाये मंत्र का जप करना चाहिये। तभी सिद्धि मिलती है। इस प्रकार मंत्र का जप करने से मंत्र शक्ति सूक्ष्मतम प्राण वायु ‘ईथर’ में अपने अधिष्ठान्न देवता का आकार प्रकार और रूप की रचना करने लग जाती है। जब रचना पूर्ण हो जाती है तब देवता उसमें प्रविष्ट होकर साधक से तादात्म्य स्थापित कर इच्छा अथवा संकल्प को पूर्ण करते हैं। इसीलिये सामान्य व्यक्ति को मंत्र-प्रणेता नहीं कहा गया है, वरन् ऋषियों को ही मंत्र द्रष्टा (ऋषयों मंत्र द्रष्टारः) कहा गया है।

पशु – पक्षी, पेड़ पौधे आदि सभी में बिजली होती है। वे सभी वैसे ही हमारी शब्दोत्पन्न शारीरिक और मानसिक बिजली से अत्यंत सूक्ष्म रूप से ही प्रभावित होते हैं। इतना ही नहीं पत्थरों पर भी शब्दों का प्रभाव पड़ता है। विल्लौर, टूरमेलीन, रोचीसाल्ट तथा अमोनियम के सम्मुख बोलने पर वे सक्रिय हो उठते हैं तथा उनमें से विद्युत धारा निकलती है। उसी सिद्धांत का लाभ उठाकर ‘ध्वनि- विद्युत घटक’ का निर्माण किया गया है। तानसेन के राग से दीपक का जल उठना और बैजू-बावरा के संगीत से हिरणों का आना प्रसिद्ध है। इन सबकी पृष्ठभूमि में शब्द शक्ति का अपूर्वसामंजस्य ही है, तांत्रिक मंत्रों में ऐसा ही सामंजस्य रहता है।

तंत्र शास्त्र के अनुसार प्रत्येक वर्ण की अपनी स्वतंत्र शक्ति है जिसे ‘वर्ण मातृका’ कहते हैं। प्रत्येक वर्णमातृ का अपना रंग, रूप और गति है। मनुष्य के तीन शरीर हैं – स्थूल, सूक्षम और कारण शरीर। प्रत्येक शरीर में तीन-तीन वर्णमातृका शक्ति केन्द्र हैं। कारण शरीर से उच्चारित शब्द को ‘पश्यंती’ और मध्यमा तथा स्थूल शरीर से उच्चारित शब्द को ‘वैखरी’ कहते हैं। पहले और दूसरे केन्द्र में बहिर्मुखी मन काम करता है। इसी प्रकार तीसरे केन्द्र में अन्तर्मुखी मन काम करता है। इसलिये जप से मन का अंतर्मुखी होना आवश्यक है। मन को अन्तर्मुखी करने के लिये ‘ध्यान’ का विधान है। ध्यान कई प्रकार का होता है, मगर उनमें निराकार ध्यान ही सर्वोत्तम है। उससे मन अंतर्मुखी होकर पराकेन्द्र से तादात्म्य स्थापित करता है।

शब्दों की शक्ति:- हमारी अंगुलियों के बीच घूमनेवाले माला के दाने उनको एकत्र करते रहते हैं। जप करते समय उन पर ध्यान रखना आवश्यक है। इससे मंत्र शक्ति को गति मिलती है जिससे मंत्र शीघ्र ही सिद्ध होते हैं। शब्दों में सुनिश्चित शक्ति है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। प्राचीन भारतीय वाङमय में इसलिये शब्दों को साक्षात् सर्वशक्तिमान ईश्वर, ब्रह्म या शब्द ब्रह्म की संज्ञा प्रदान की गई है।

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