शनि देव

ग्रहों में यदि शनिदेव न होते …

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant), top best astrologer in delhi

ज्योतिषाचार्य जब कुण्डली में उन ग्रहों की महादशा व अन्तर्दशा के संदर्भ में ग्रहों के प्रभावों का विचार करते हैं, तब शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार के परिणाम की सूचना मिलती है, किन्तु शनि के प्रभाव का निरूपण करते समय वे इन्हें नितांत दु:ख व शोक-कारक ग्रह के रूप में स्वीकार करते हैं। शनिदेव की महादशा के विषय में कहा गया है कि- शनिदेव की महादशा सदैव मनुष्य के लिए दु:ख, शोक, नैराश्य तथा असफलता आदि के रूप में ही आती है, तथा उस समय मनुष्य को सब कुछ शून्य दिखाई देता है। आलस्य का प्रभाव शरीर पर बहुत हो जाता है, मनुष्य की विवेक शक्ति क्षीण हो जाती है, उसे अपने ही परिश्रम का पूर्ण फल नहीं मिलता, वे बार-बार अपनों की निंदा का पात्र बनता रहता है। आप पाठक भी विचारकों के इस तथ्य से सहमत होंगे कि शनिदेव की महादशा के बारे में ऊपर जो कुछ कहा गया है वह अधिकाशतः सत्य है।

वस्तुतः शनिदेव के पास वह सब अधिकार हैं, जो एक न्यायाधीश अथवा दण्डनायक के पास होते हैं। किन्तु प्रत्येक कुण्डली वाले जातक के लिये वे ऐसा नहीं करते दण्ड वा न्याय के अतिरिक्त भी बहुत कुछ करते हैं। उदाहरणार्थ- यदि शनिदेव वृषभ या तुला राशि में होकर केन्द्र में हैं, अथवा कुण्डली में योगकारक होकर केन्द्र या त्रिकोंण में हैं, अथवा केन्द्रेश होकर त्रिकोणेश के साथ या त्रिकोणेश में होकर केन्द्रेश के साथ हैं, तो इनकी महादशा में निम्नलिखित शुभ परिणाम होते हैं :-

कृषि कार्य में सफलता तथा लाभ, पशुओं की समृद्धि, बहुत आय, नौकर-चाकरों से सुख, मूल्यवान वस्तुओं की प्राप्ति, कार्यों में सफलता, व्यापार व्यवसाय में लाभ, राज्य से सम्मान, राजनैतिक सफलता, स्पष्ट है कि शनिदेव केेवल शोक-दुःखप्रद ग्रह नहीं हैं अपितु परिस्थिति विशेष में वह अन्य सौम्य ग्रहों की तरह, तथा कभी-कभी उनसे भी अधिक सुख तथा सौभाग्य की सूचना देने वाले ग्रह हैं। शनिदेव को केवल शोकमय ग्रह बताना जनमानस तथा विद्वजनों का भ्रम है, यह पूर्ण सत्य नहीं है। सत्य तो यह है कि शनिदेव सबसे अधिक सत्य का ज्ञान करवाने वाले एवं न्याय-प्रिय ग्रह हैं। एक सत्यप्रिय एव न्यायनिष्ठ न्यायाधीश में जो गुण होने चाहिए वे सभी गुण ग्रहों में न्यायाधीश के पद पर विराजमान शनिदेव में भरपूर मात्रा में हैं। अतः प्रकृति ने इन्हें इस संसार के सर्वशक्ति सम्पन्न दण्डाधिकारी के रूप में नियुक्त किया है। एक सच्चे न्यायाधीश की तरह शनिदेव मनुष्य को न केवल उसके द्वारा कुकृत्यों का दण्ड देते हैं, अपितु प्राणियों को सुकर्मो का पुरस्कार भी देते हैं। ‘न्यायाधीश’ के व्यापक अर्थ में शनिदेव शिक्षक भी हैं, और दण्डाधिकारी भी हैं, यह कार्य शनिदेव अपनी महादशा, अंतरदशा अथवा साढेसाती में मनुष्य को तपा कर शुद्ध सोने की तरह (खोट रहित) बना देने के लिये ही करते हैं। इन की महादशा, अंतरदशा या शनि साढ़ेसाती के समाप्त होने पर मनुष्य अच्छी तरह समझ जाता है, कि यह सब उसके अपने ही बुरे कर्मो का फल था, और अब आगे उसे ऐसे कुकृत्यों से बचकर रहना है। इस लिये शनिदेव से मनुष्य अपने जीवन को सही ढंग से जीने की कला भी सीखता है। वे दार्शनिक भी हैं, धर्मगुरु भी हैं, मन में वैराग्य भाव पैदा कर मनुष्य को संन्यासी भी बनाने वाले यह शनिदेव हैं; क्योकि आत्म जागरण व सच्ची शिक्षा ही संसार की समस्त व्याधियों से बचने का एक मात्र सार्वभौम उपचार है। अतः संसार में शुभ या अशुभ फल प्रदान करने के लिए जितने शक्ति सम्पन्न शनिदेव हैं उतना अन्य कोई ग्रह नहीं है। जातक पारिजातकार ने ठीक ही कहा है :- आयुर्जीवन, मृत्युकारण, विपत्, सम्पत्, प्रदाता शनिः।

शनिदेव प्राणीयों को सब कुछ देते हैं, केवल पात्रता चाहिए। यह बात और है, कि इस कलियुग में मनुष्य सुकर्मों की अपेक्षा कुकृत्य अधिक करता है। अतः इसे पुरस्कार की अपेक्षा दण्ड ही अधिक भुगताना पड़ता है। यही कारण है कि इस ग्रह को शुभकारक की अपेक्षा अशुभकारक (दण्ड देने वाला) अधिक माना जाता है। पारम्परिक रूप से शनिदेव के स्वरूप की इस प्रकार वंदना की जाती है :-

नीलान्जनं समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड-सम्मूतं तं नमामि शनेश्चरम्।।

शनिदेव का यह स्वरूप हमें याद दिलाता है :- न्यायाधीश की वर्तमान वेशभूषा तथा उसके चारों ओर घिरे हुए काले कोट पहने हुए वकीलों से युक्त परिवार की। उक्त श्लोक का अर्थ इस प्रकार है। ‘मैं ऐसे स्वरूप वाले शनिदेव की वंदना करता हूं जो- नीली आभा लिये हुये काले काजल के समान कांति वाले हैं। (सभी न्यायाधीश काले कोट पहन कर काजल के समान कांतिवाले लगते हैं)। सूर्य के पुत्र हैं, (सूर्य ग्रहों में राजा या अधिकारी हैं, उन्होंने ही शनिदेव को जन्म दिया है)। यमराज के बड़े भाई हैं (यमराज जेलर अथवा जल्लाद का प्रतीक है)। छाया एवं मार्तण्ड से उत्पन्न है (सूर्य शासन, प्रकाश एवं छाया-अंधकार के प्रतीक हैं। कहीं प्रकाश कहीं अपराध या अंधकार है, इसी कारण जिनका जन्म हुआ है)। धीमे चलने वाले हैं, (अदालतों में अनेक तारीखों अथवा लम्बी प्रतीक्षा के बाद जाकर न्याय मिलता है। इसी लिये कहा भी जाता है :- भगवान के घर देर है, परंतु अंधेर नहीं।) निलम्बित प्रकरणों के लिए लोग व्यर्थ ही न्याय व्यवस्था को दोष देते हैं। इस प्रकार न्यायाधीश के पक्ष में भी उक्त श्लोक का अर्थ एकदम युक्तियुक्त हो जाता है :- मैं ऐसे न्यायाधीश की वंदना करता हूं जो काजल के समान कांति वाले हैं, शासन के कर्म-पुत्र हैं, शासन के द्वारा नियुक्त वरिष्ठ अधिकारी हैं, अंधकार जन्य कृत्यों के प्रति शासन की चिंता के कारण ही इनका जन्म हुआ है, तथा जो मंदगति से चलने वाले बहुत सोच विचार के पश्चात बेशक अधिक समय लग जाये परंतु सच्चा न्याय करने वाले हैं।

न्यायाधीश से शनिदेव का साम्य तो बाह्य वैचित्र्य है किन्तु अधिक महत्वपूर्ण तो आंतरिक साम्य है। न्यायाधीश, सिविल, सर्वेण्टस, दार्शनिक, खोजकर्ता वैज्ञानिक आदि की जन्म पत्रिकाओं में उनको उच्चपद दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका शनिदेव की ही रहती हैं। जब प्राणी को अपने बुरे कर्मो का फल मिलने का समय आ जाता है, तब उस समय किसी न किसी रूप में शनिदेव का प्रभाव उस पर होता ही है। चाहे वे प्रभाव महादशा के रूप में हो, चाहे अंतरदशा के रूप में अथवा साढेसाती के रूप में ही क्यो न हो, परंतु यह प्रभाव होता मनुष्य की आशा के विपरीत ही है। वैपरीत्य की स्थिति में सामान्य रूप में शनिदेव निम्नलिखित परिणाम देने वाले होते हैं :-

रोग, धनहानि, पर बंधन अर्थात जेल यात्रा, वियोग, प्रियजन की मृत्यु, मृत्यु अथवा मृत्युतुल्य कष्ट, क्रान्ति (प्रबल विरोध) अथवा गृहयुद्ध, क्षत्र-भंग। यदि किसी व्यक्ति का आहार-व्यवहार असंयमित है, तो उसके शरीर में किसी न किसी प्रकार का विकार हो जाना निश्चित है। शरीर की इस विकृति को दूर करने के लिए अपनी दशा-अन्तर्दशा में अथवा साढे़साती की अवधि में शनिदेव व्यक्ति को रोगी बना देते हैं, ताकि वह औषधि से संयमित बने। ऐसा करके वे उसका रेचन करते हैं, तथा संयम के रास्ते पर लाने के लिए एक संकेत देते हैं। हममें से अधिकांश को यह मालूम होगा कि साढ़ेसाती के तत्काल बाद की अवधि में मनुष्य अपने आपको तरो-ताजा तथा नया महसूस करता है। हर मनुष्य पर, प्रत्येक 30 वर्ष की अवधि में एक बार शनिदेव यह उपकार करते हैं। जब शरीर अत्यंत जीर्ण हो जाता है, तब अपने तृतीय उपकार के समय शनिदेव सदा के लिए ही इस कष्ट को दूर कर देते हैं। इस रूप में शनिदेव उस कठोर-डाक्टर की तरह हैं, जो रोगी की व्याधिनाश के लिए आॅपरेशन के समय रोगी के चिल्लाने की परवाह नहीं करता क्योंकि वास्तविकता कल्याण (निरोगता) में निहित है। मनुष्य का शनिदेव को दोष देना उसी प्रकार अनुचित है, जैसे बच्चों का, डाॅक्टर के हाथ में इंजेक्शन को देखकर भयभीत होना।
इसी प्रकार जब मनुष्य अवैध तरीके से आपार धन सम्पत्ति एकत्रित कर लेता है तो शनिदेव अपनी दशा, अन्तर्दशा में उसका वह धननाश अवश्य करते हैं। अत्याचारी या अपराधी प्रवृति वाले अधिकारी से प्रजा को होने वाले कष्ट से बेखबर राजा को वह निर्ममता पूर्वक धूल में मिला देते हैं। समाज में यदि शोषण अत्यधिक बढ़ जाये तो क्रांतिकारियों के रूप में शनिदेव पुनः व्यवस्था कायम कराते हैं। शनिदेव हर प्रकार से हारे हुये मानव का मार्गदर्शन भी करते हैं, तथा प्रतिनिधित्व भी करते हैं, अतः प्रत्येक विचार क्रांति में शनिदेव की प्रेरणा ही रहती है। अन्यायी कोई भी वर्ग हो, शनिदेव के दण्ड से बच नहीं सकता। शनिदेव का अपना जीवन अत्यंत सादा है, जो उसे सार्वभौम न्याय प्रशासक के लिये उपयुक्त बनाता है। अपनी इच्छाओं तथा आवश्यकताओं से व्यक्ति मार्ग से विचलित होता है। शनिदेव ने स्वेच्छा से राजकुमार होते हुए भी सेवक होना स्वीकार किया, किसी प्रकार की राजकीय ठाटबाट स्वीकार नहीं की, हाथी घोड़ों को छोड़कर उसने ‘महिष से ही संतोष’ किया। सोना-चांदी आदि आभूषणों, मूल्यवान वस्तुओं को छोड़कर लोहा ही स्वीकार किया। उड़द तथा तेल ही इन्हें संतोष देते हैं। इन्हें रंग-बिरंगे रेशमी वस्त्र भी पसंद नहीं- काला कपड़ा ही अभीष्ट है। राजमंत्री, न्यायाधीश, दार्शनिक आदि महान व्यक्तियों को बनाने वाले यह ग्रह रूप शनिदेव जो किसी को इन्द्र के समान वैभवशाली जीवन प्रदान करते हैं, तथा अपराधी, अत्याचारी होने पर इन्द्र जैसे वैभवशाली को भिखारी बनाकर धूल में भी मिला सकते हैं, परंतु इनका अपना जीवन सादा तथा आडम्बरहीन है। हम कह सकते हैं, कि शनिदेव साक्षात शिव के अवतार हैं, जो अमृत पिलाने के लिए स्वयं विषपान करते हैं। अब आप स्वयं ही विचार करें कि :- ग्रहों में यदि शनिदेव न होते…? तो संसार में कितना अंधकार होता? ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नमः।

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जेल यात्रा योग

जेल यात्रा का योग – Jail travel yog

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka bhavishya.in), Astrological consul

जेल आर्थात् बन्दीगृह jail योग। आधुनिक भाषा में जेल को बन्दी-सुधार गृह कहा जाता है, परंतु यह नहीं कह सकते कि जेल में जाकर कितने प्रतिशत बन्दी सुधर कर बाहर आते हैं।

कभी-कभी मानव को अपने दुर्भाग्य या सौभाग्यवश जीवन में जेल-यात्रा Jail travel भी करनी पड़ जाती है। लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि जेल-यात्रा करने वाले सभी व्यक्ति अपराधी होते है। सामान्यतया ऐसा आभास होता है कि सदाचारी व्यक्ति को जेल-यात्रा Jail travel की नौबत नहीं आ सकती। किन्तु ऐसा सोचना भ्रम है। हम प्रत्यक्ष देखते है कि नृशंस डाकू-हत्यारे, चोर और लुटेरे ही नही, बल्कि कुलीन घरानों के महापुरूष भी कभी-कभी बन्दीगृह के मेहमान बन जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का तो जन्म ही बन्दीगृह में हुआ माना जाता है। जेल-यात्रियों पर shukracharya संस्थान के संस्थापक Dr.R.B.Dhawan ने सैकड़ों कुंडलीयों का संकलन तथा उन पर शोधकार्य किया है, shukracharya के अनुसार इन जेल यात्रा करने वालों को हम सामान्यतया चार श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं –

1. भयंकर सामाजिक अपराधी, जैसे डाकू, हत्यारे आदि।
2. राजनैतिक अपराधी, जैसे नेता लोग।
3. कारागार प्रशासन से सम्बन्धित राजकीय कर्मचारी, जैसे जेलर, जेल के डाक्टर आदि।
4. कैदियों से मुलाकात के लिये जाने वाले उनके परिचित मित्र अथवा सम्बन्धी।

आइये, हम विचार करें कि जेल-यात्रा Jail travel का अध्ययन किसी जातक की जन्म-कुण्डली से किस प्रकार किया जाये? भारतीय ज्योतिष-ग्रन्थों में जेल-यात्रा के अनेक योगों का उल्लेख मिलता है। जातकालकांर के अनुसार यदि सम्पूर्ण अशुभ ग्रह 2, 5, 9 और 12 वें भावों में स्थित हों, तो जातक गिरफ्तार होकर जेल जाता है, और यदि जन्म लग्न में मेष, वृषभ अथवा धनु राशि हो तो उसे सपरिश्रम-कारावास का दण्ड मिलता है।

जातकतत्व :- में भी इसी नियम का निर्देश है, किन्तु साथ ही एक विधान और है कि यदि वृश्चिक लग्न हो और द्वितीय, द्वादश, पंचम एवम् नवम् भाव में अशुभ ग्रह हों तो, जातक हवालात में बन्द रहता है। यदि मेष, मिथुन, कन्या अथवा तुला लग्न हो, तथा द्वितीय, द्वाद्वश पंचम् और नवम् भाव में अशुभ गृह हों तो जातक हथकडी पहनता है। परन्तु यदि कर्क, मकर, अथवा मीन लग्न हो, और लग्न से द्धितीय एवम् द्वादश भावों में अशुभ ग्रह हों तो, जातक को राजकीय भवन में नजर बन्द रहना पड़ता है, और यदि पंचम् एवम् नवम् स्थान से कोई शुभ ग्रह लग्न को देखता हो तो, उसे बेड़ियाँ नहीं डाली जाती। यदि लग्नेश और षष्ठेश शनि के साथ युक्त होकर केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हों तो जातक को कैद की सजा होती है।

उत्तरकालामृत:- के अनुसार द्वादश भाव से जेल का बोध होता है। संकेत-निधि के अनुसार यदि शुक्र द्वितीय भाव में, चन्द्रमा लग्न में, सूर्य एवं बुध द्वादश भाव में, और राहु पचंम भाव में हों तो जातक को जेल की सजा होती है। इसी ग्रन्थ में जेल यात्रा के लिए षष्ठम् एवम् द्वादश भाव का विवेचन भी आवश्यक माना गया है। इस प्रकार हमारे आचार्यो ने द्वादश भाव के साथ-साथ पचंम् नवम् एवम् अष्टम् भावों की विवेचना को ‘जेल यात्रा’ के लिए आवश्यक निर्दिष्ट किया है।

आज के इस वैज्ञानिक युग में मानव सतर्क है। उसकी जिज्ञासाओं का विकास हुआ है। संक्षेप में उसे आत्म-संतुष्टि नहीं होती। वह लकीर का फकीर नही बना रहना चाहता । वह हर बात की गहराई में जाना चाहता है। उसे प्रश्नों का तर्क पूर्ण समाधान चाहिये। वह पूछ सकता है कि ‘जेल यात्रा’ की परिभाषा क्या है ? जेल यात्रा कितनी अवधि की होगी ? कब होगी ? किस कारण से होगी ? आदि-आदि । अनेक बातें हैं जिनका उत्तर देने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए, इसलिये विद्वान ज्योतिषी को इस विषय पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए।

जेल-यात्रा में जातक अपने परिवार से बिछुड़ जाता है। उसके स्वच्छन्द विचरण की स्वतन्त्रता नष्ट हो जाती है। निवास स्थान का परिवर्तन हो जाता है, सुख-शयन का अवसर समाप्त हो जाता है, इन्हें हम ज्योतिषीय भाषा में इस प्रकार कह सकते है:–

1. परिवार (द्वितीय भाव) से वियोग।
2. स्वच्छन्द विचरण (द्वादश भाव ) में बाधा।
3. निवास स्थान (चतुर्थ भाव) का परिवर्तन।
4. शयन-सुख (द्वादश भाव) का अभाव।

5. मानसिक कष्ट (अष्टम् भाव)।
6. शारीरिक श्रम (षष्ठम् भाव) सामाजिक।
7. आत्मग्लानि (पंचम् भाव) पराधियों।
8. हार्दिक पश्चाताप (नवम् भाव) की स्थिति में।

ज्योतिष-जगत के आधुनिक विचारक एवम् सूक्ष्मनक्षत्र-गणित प्रणाली के अनन्य अन्वेषक स्वर्गीय प्रो. कृष्णमूर्ति जी ने अपने जीवन की दशाब्दियों के मन्थन एवम् प्रत्याक्षानुभूतियों के आधार पर ज्योतिष के अध्ययनशील समाज को एक नवीनतम दिशा प्रदान की है। उनकी तर्कपूर्ण मान्यतायें एवम् फलादेश के सरल और सुग्राह्य नियम कृष्णमूर्ति पद्धति के रूप में विख्यात है। देश में ही नहीं, विदेशी ज्यौतिर्विदों ने भी कृष्णमूर्ति पद्धति में आस्था एवम् अभिरूचि व्यक्त की है। आधुनिक युग में जेल-यात्रा योगों का विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता हैः–

1. वे अशुभ ग्रह जो द्वितीय और द्वादश भावस्थ ग्रहों के नक्षत्र में हों ।

2. द्वितीय और द्वादश भावस्थ ऐसे ग्रह जो दुःस्थानों (6, 8, 12) के स्वामी हों।

3. वे अशुभ ग्रह जो द्वितीय और द्वादश भावों के अधिपति ग्रहों के नक्षत्र में हों ।

4. द्वितीय और द्वादश भावों के स्वामी ग्रह।

इन ग्रहों की महादशा (विशोत्तरी), अन्तर्दशा अथवा प्रत्यन्तर में (जब संयुक्त रूप से दशाकाल इन्हीं ग्रहों द्वारा नियन्त्रित हो, तथा गोचर में सूर्य, चन्द्रमा एवम् दशानाथ मुक्तिनाथ आदि पारस्परिक नक्षत्रों एवम् सूक्ष्म में विचरण करें तब) जातक को जेल-यात्रा करनी पड़ेगी। जेल-यात्रा का कारण प्रमुखतः द्योतक ग्रहों Significators के अनुसार इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है:–

1. यदि लग्नेश उपरोक्त द्योतक-ग्रहों (Significators) से किसी प्रकार का सम्बन्ध रखता हो, तो जातक को अदालत के द्वारा जेल की सजा होती है।

2. यदि षष्ठेश उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध रखता हो तो जातक को दीवानी अदालत से, कर्जा न चुकाने के अपराध में, सजा होती है।

3. गुरू, शुक्र या नवमेश यदि लग्नेश तथा उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध रखते हों तो जातक को राजनैतिक कारणों से जेल की सजा होती है।

4. यदि मंगल अष्टमेश हो कर उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध रखता हो तो चोरी या डकैती के आरोप में जेल की सजा होती है।

5. यदि शनि और बुध उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्धित हो तो रिश्वतखोरी, मुनाफाखोरी, जालसाजी अथवा गबन के आरोप में जेल की सजा होती है।

6. मंगल, शनि और शुक्र का उपरोक्त ग्रहों से सम्बन्ध, जातक को बलात्कार अथवा अपहरण के अपराध में जेलयात्रा करवाता है।

7. मंगल और शनि का उपरोक्त ग्रहों तथा अष्ट्म भाव से सम्बन्ध हो, तो हत्या के अपराध में जातक को जेल का मार्ग प्रशस्त होता है।

इसी प्रकार जेल से मुक्ति का तात्पर्य है, परिवार से पुनर्मिलन एवं स्वेच्छाचरण की स्वतन्त्रता। यह स्थिति द्वितीय एवं एकादश भावों के अन्तर्गत आती है। अतः जेल से मुक्ति का निर्धारण वे शुभ ग्रह करते हैं, जो उपरोक्त रीति से द्वितीय एवं एकादश भावों के संयुक्त द्योतक हों। सारांश यह कि र्विशोत्तरी दशा-काल में द्वितीय एवं द्वादश भावों के द्योतक ग्रहों की दशा जहां जेल यात्रा इंगित करती है, वहीं द्वितीय एवं एकादश भावों के द्योतक ग्रहों की संयुक्त दशा जेल से मुक्ति का समय दर्शाती है। इस प्रकार जेल-प्रवास की अवधि का अनुमान लगाया जा सकता है। उपरोक्त विवेचन के अतिरिक्त कुछ अन्य बातें भी ध्यान में रखने की आवश्यकता हैं –

1. यदि द्वितीय एवं द्वादश भावों के द्योतक-ग्रह (Significators) तृतीय, षष्ठम् अथवा नवम् भावों में स्थित हों तथा उक्त भाव में यदि स्थिर राशि हो तो जेल यात्रा की अवधि लम्बी हो सकती है।

2. यदि अष्टमेश बली हो एवम् दूषित भी हो तो जातक की मृत्यु जेल-प्रवास की अवधि में ही हो जाती है।

3. जेल यात्रा का कारक ग्रह राहु है। यदि द्वितीय या द्वादशस्थ ग्रह राहु के नक्षत्र में हों अथवा राहु के सूक्ष्म (sub) में हो तथा राहु द्वितीय अथवा द्वादश भाव से सम्बन्ध रखता हो तो जातक को जेलयात्रा करनी ही पड़ती है। चाहे उसने अपराध किया हो अथवा नहीं। जेल-कर्मचारी अथवा किसी अन्य कार्यवश जेल में आने जाने वाले व्यक्तियों की कुण्डली में इसका प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।

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शाबर मंत्र साधना shabar mantra

Shabar mantra :- मंत्र तीन प्रकार के होते हैं – वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक।

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka bhavishya.in), Astrological consultant, shukracharya

विद्वानों की धारणा है कि कलियुग में तांत्रिक मंत्र सफल होते हैं, कलियुग के लिये तांत्रिक मंत्र ही शक्तिशाली हैं। तांत्रिक मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं – शाबर मंत्र, Shabar mantra डामर मंत्र और बीजाक्षर मंत्र। इन तीनों प्रकार के तांत्रिक मंत्रों का अपना-अपना विज्ञान है। जो लोग उसके वैज्ञानिक रहस्य को समझते हैं, वे ही मंत्रों का प्रयोग कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। शास्त्रों में हमें स्थान-स्थान पर शाबर मंत्रों के विषय में वर्णन मिलता है। यह एक प्रकार के तांत्रिक उपाय ही होते हैं, Dr.R.B.Dhawan, shukracharya के अनुसार इन की साधना करना थोड़ा जटिल कार्य होता है, परन्तु यदि सही ढंग से इन्हें सिद्ध कर लिया जाये तो लाभ भी अवश्य ही मिलता है। यहाँ मैं आपको कुछ शाबर मंत्रों के बारे में बताने जा रहा हूँ :-

1. दरिद्रता दूर करने के लिये धनदा मंत्र:- गरीबी और अभावों से मुक्ति के लिये धनदा मंत्र अत्यंत प्रभावकारी है।

मंत्र:- नमः विष्णवे सुरपतये महाबलाय स्वाहा।।

2. पदोन्नति के लिये भद्रकाली मंत्रः- भद्रकाली यंत्र को महाकाली यंत्र भी कहा जाता है। इसे स्वर्ण पर अंकित करायें। पैंतालिस दिनों तक प्रति दिन एक हजार बार मंत्र का जाप करें।
त्रयाणां देवानां त्रिगुण जनितानां तव शिवं मवेत् पूजा, पूजा तव चरणयोर्या विराचेता। महानिशा में शाबर मंत्रों की साधना- शाबर मंत्र किसी वेद, शास्त्र पुराण या अन्य ग्रन्थ में एक जगह संकलित नहीं मिलता। ये मंत्र लोक भाषा में प्रचलित हैं तो अपने से स्वयं सिद्ध हैं। यह तो साधक पर निर्भर करता है, कि वह मंत्रों का कब और कैसे प्रयोग करें।

3. रक्षा कवच मंत्र:- साधक हो या सामान्य व्यक्ति हर किसी को सर्वप्रथम अपनी रक्षा करनी चाहिये। हो सकता है आपके ऊपर ही कोई दूसरा तांत्रिक प्रयोग कर दे तो आप दूसरों की रक्षा करने से पहले ही स्वयं कष्ट में पड़ जायेंगे। ऐसी स्थिति में सर्वप्रथम अपनी रक्षा और बचाव करना चाहिये :-

मंत्र:- ॐ नमो आदेश गुरून को ईश्वरी वाचा, अजरी बजरी बाड़ा बजरी मैं बांधा दसो दुवार छवा और के घालो तो पलट हनुमंत वीर उसी को मारे पहली चैकी गनपती, दूजी चैकी हनुमंत, तीजो चैकी से भैरों चैथी, देह रक्षा करन को आवे श्री नरसिंह देवजी, शब्द सांचा पिंड सांचा चले मंत्र ईश्वरी वाचा।।

उक्त मंत्र शारीरिक पीड़ा से छटपटाते व्यक्ति पर भी प्रयोग किया जा सकता है। यदि किसी को भी मूर्छा आ जाये और कष्ट से घिर जाये तो इस मंत्र से झाड़ देने से वह व्यक्ति अच्छा हो जाता है, और शीघ्र स्वस्थ प्रसन्न जो जाता है। उक्त शाबर मंत्र Shabar mantra का प्रयोग किसी उपद्रव ग्रासित घर को शुद्ध करने में भी किया जाता है।

4. शत्रु एवं प्रतिद्वंदी को परास्त करने के लिये:- यह मंत्र अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को परास्त करने के लिये प्रयोग में लाया जाता है। महानिशा में इसे 108 बार पढ़कर हवन करके सिद्ध कर लिया जाता है। फिर जब चाहें अपने लिये प्रयोग करें। दूसरों के लिये इसका प्रयोग गंडा या ताबीज के रूप में किया जाता है –

मंत्र:- हाथ बसे हनुमान भैरों बसे लिलार, जो हनुमंत को टीका करे मोरे जग संसार। जो आवे छाती पांव धरे बजरंग बीर रक्षा करें, महम्मदा वीर छाती टोर जुगुनियाँ, बीर शिर फोर उगुनिया बीर मार-मार भास्वत करे भैरों बीर की आन फिरती रहे बजरंग बीर रक्षा करे, जो हमरे ऊपर घाव छाले तो पलट हनुमान बीर उसी को मारे जल बाँधे थल बाँधे आर्या आसमान बाँधे कुदवा और कलवा बांधे चक चक्की आसमान बाँधे वाचा साहिब साहिब के पूत धर्म के नाती आसरा तुम्हारा है।

5. सुख पूर्वक प्रसव का मंत्र:– इस मंत्र को 108 बार हवन करके सिद्ध कर लेने पर जब प्रयोग करना हो तब 11 बार पढ़कर जल अभिमंत्रित करके गार्भिणी को पिला दें। तुरंत सुख पूर्ण प्रसव हो जायेगा।

मंत्र:- ॐ मुक्ताः पाशा विमुक्ताः मुक्ताः सुर्येणरश्मयः। मुक्ताः सर्वभयापूर्व ऐहि माचिर-माचिर स्वाहा।।

6. चिंतित कार्य की सफलता के लिये:- जब किसी कार्य के होने न होने की चिंता बनी हो अथवा शत्रु भय या राज भय हो अथवा कोई कामना जो पूर्ण न हो रही हो तो निम्न मंत्र की एक माला नित्य जप लें। कुछ दिनों में ही चिंता समाप्त हो जायेगी और मंत्र सिद्ध हो जायेगा।

मंत्र:- ॐ हर त्रिपुर भवानी बाला, राजा प्रजा मोहिनी सर्व शत्रु। विध्यवासिनी मम चिंतित फलं, देहि-देहि भुवनेश्वरी स्वाहा।।

7. रोग हरण के लिये:- निम्न मंत्र की 21 माला महानिशा (काली रात) में जपकर सिद्ध कर लें। फिर जब कोई बीमार हो तब किसी बर्तन में शुद्ध जल लेकर इसे 21 बार पढ़कर जल को फूँककर मंत्रित करके रोगी को पिला दें। रोगी पहले से, ठीक होने लगेगा। रोग एवं रोगी की स्थिति के अनुसार इस तरह का अभिमंत्रित जल 3, 5, 7, 11, 21 दिन तक देना चाहिये।

मंत्र:- ॐ सं सां सिं सीं सुं सूं सें सैं सों सौं सं सः वं वां विं वीं वुं वूं वें वैं वों वौं वं वः सह अमृत वरचे स्वाहा।

शाबर मंत्र की विश्वश्नीयता पर कभी भी शक नहीं किया जा सकता है। परन्तु इनकी सिद्ध के लिये साधना का ढंग एकदम सही व सटीक होना चाहिये। (Top best astrologer in Delhi), marriage and after marriage problems salutations.

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भाग्योदय Bhagyodaya

Bhagyodaya :- भाग्योदय वाला समय अर्थात् सुखद समय जीवन में कब आयेगा? :-

Dr.R.B.Dhawan (editor – Aap ka bhavishya.in), Astrological consultant

हर मनुष्य अपने अनुभवों और विशेष रूप से जीवन के संघर्षों से सीख लेता है, और उसे पता रहता है की जीवन बिना संघर्ष के चलता ही नहीं। परंतु कभी बहुत अधिक संघर्ष, कभी मध्यम और कभी अल्प संघर्ष वाला समय भी जीवन में आता है। जीवन में जब कम संघर्ष और अधिक लाभ वाला समय रहता है, एेसे समय की हर किसी को प्रतीक्षा रहती है। क्योंकि वही तो वह सुख के पल हैं, जिन पलों में उसे मानसिक और शारीरिक थकावट नहीं होती, और सुखद अनुभव होते हैं। सुखद समय को ही भाग्योदय Bhagyodaya वाला समय कहा जाता है। भाग्योदय कब होगा? अथवा वह समय कब आयेगा जब एक बार नौकरी या कारोबार में अच्छा उठाव आयेगा। जीवन में भाग्योदय कब कब होगा? इस प्रश्न का सही उत्तर ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से अच्छी गणना करने वाला एक विद्वान ज्योतिषी ही बता सकता है। Shukracharya संस्थान के संस्थापक Dr.R.B.Dhawan, top best Astrologer in delhi के द्वारा आगे की पंक्तियों में भाग्योदय के कुछ प्रमाणिक योगों की चर्चा की जा रही है :-

1. भाग्याधिपति (नवम भाव का स्वामी ग्रह) के केन्द्र में रहने से प्रथम ही अवस्था में भाग्य की उन्नति होती है, और त्रिकोणगत अथवा उच्चगत रहने से मध्य अवस्था में जातक भाग्यवान होता है। केन्द्र और त्रिकोण को छोड़कर अन्य स्थानों में स्वक्षेत्रगत अथवा मित्रगृही होने से शेष आयु अर्थात् वृद्धावस्था में भाग्योदय होता है। परन्तु स्मरण रहे कि यह एक साधारण विधि है।

2. इसी प्रकार एक स्थूल रीति से ऐसे भी विचार किया जाता है कि यदि द्वादश राशि को तीन खण्डों में बाँटा जाये तो चार राशियों का एकैक खंड हुआ। लग्न, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ का प्रथम खंड। पंचम, षष्ठ, सप्तम और अष्टम का द्वितीय खंड तथा नवम, दशम, एकादश और द्वादश का तृतीय खंड हुआ।
बृहस्पति और शुक्र सर्वदा शुभग्रह हैं, और बुध भी शुभ हैं परन्तु पापयुक्त रहने से शुभ नहीं कहलाता। क्षीण चन्द्रमा के अतिरिक्त चन्द्रमा भी शुभ है। यह देखना भी जरूरी है कि कुंडली के किस खंड में शुभग्रह की विशेषता है यह सभी खंडों में शुभग्रह बराबर हैं। जिस खंड में शुभग्रह की विशेषता होगी वह जीवन खंड उस जातक का विशेष सुखमय होगा और यदि तीनों खंड़ों में शुभ ग्रह बराबर हैं तो जातक आजन्म एक जैसा रहेगा।

उदाहरण कुंडली में प्रथम खंड धन से मीन प्रर्यन्त है। मीन में चद्रंमा शुभ ग्रह है। द्वितीय खंड मेष से कर्क प्रर्यन्त है। उसमें एक शुभ ग्रह है। तृतीय खंड सिंह से वृश्चिक तक है। उसमें भी एक शुभ ग्रह शुक्र है। बुध भी उसी खंड में है परन्तु सूर्य के साथ रहने से पाप हो गया है। परिणाम यह निकला कि इस जातक का जीवन साधारणतः जन्म से मृत्यु प्रर्यन्त एक प्रकार से सुखमय होगा। साधारणतः ऐसा ही देखा भी जाता है।

3. यदि लग्नेश शुभ राशिगत हो और उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो, अथवा यदि लग्नेश नवम स्थान में हो, अथवा यदि लग्नेश नवम स्थान में हो, अथवा नवमेश पंचम स्थान में हो तो जातक सोलह वर्ष के बाद सुखी होता है।

4. यदि लग्न शुभ राशि का हो और उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि भी हो परन्तु लग्न में कोई पापग्रह न हो तो जातक बाल्यकाल ही से सुखी होता है। यदि लग्न में एक से अधिक पाप ग्रह हो तो जातक आजन्म दुःखी रहता है।

5. यदि लग्नेश का नवाँशेश अर्थात लग्न का स्वामी जिस नवांश में हो उस नवांश का पति यदि लग्न में अथवा त्रिकोण अथवा एकादश भाव में बली होकर हो अथवा उच्च हो जो जातक तीस वर्ष की अवस्था के उपरांत भाग्यशाली होता है।

6. (क) लग्नेश द्वितीय स्थानगत हो। (ख) लग्नेश जिस नवांश में ही उसका स्वामी द्वितीय स्थान में हो। (ग) यदि एकादशेश द्वितीय स्थान में हो तो इन तीन योगों में से किसी के रहने से जातक बीस वर्ष की अवस्था के बाद सुखी होती है।

7. भाग्याधिपति अर्थात् नवमेश जिस राशि में रहता है उस राशि के स्वामी को ‘भाग्यकर्ता’ कहते हैं। जैसे, उदाहरण कुंडली में नवमेश सूर्य तुला राशि में है और तुला का स्वामी शुक्र है। अतः इस जातक का ‘भाग्यकर्ता’ शुक्र हुआ। लिखा है कि यदि सूर्य ‘भाग्यकर्ता’ ग्रह हो तो उस जातक की उन्नति 22 वर्ष के पूर्व विशेष रूप से वर्ष, मंगल होने से 28 वर्ष, बुध से 32 वर्ष, बृहस्पति 16 वर्ष, शुक्र 24 वर्ष और शनि के ‘भाग्यकर्ता’ होने से 36 वर्ष के पूर्व भाग्योन्नति Bhagyodaya नहीं होती है। अर्थात् ‘भाग्यकर्ता’ ग्रह के नियमित समय के बाद से उन्नति होती है। यहाँ तक देखा गया है कि यदि इसके पूर्व दशा अन्तरदशा इत्यादि के अनुसार यदि शुभफल होता भी हो तो उत्कृष्ट फल उपर्युक्त समय के बाद ही होता है।

उदाहरण कुंडली का ‘भाग्यकर्ता’ शुक्र shukracharya है, इस कारण उक्त जातक की भाग्योन्नति 24 वर्ष के बाद सूचित होती है। यर्थाथ में इस जातक की उन्नति 28वें वर्ष से ही अारम्भ हुई थी।

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कबाड़ और वास्तु

घर का कबाड़ और वास्तुशास्त्र :-

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संग्रह करना मानव के स्वभाव में है। यह संग्रह किसी भी प्रकार हो सकता है जैसे धन, आभूषण, कपड़े, फर्नीचर, सुंदर वस्तुएं, कबाड़ इत्यादि। घर का कबाड़ वह होता है जिसकी जरूरत कभी-कभार ही पड़ती है परंतु कब पड़ जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। इसलिये इसे घर से निकालते समय मन में विचार रहता है कि शायद किसी समय इसमें से किसी वस्तु की आवश्यकता पड़ जाये और सच में देर-सबेर उनकी जरूरत पड़ भी जाती है। इस प्रकार के अनचाहे घरेलू सामान के संग्रह को ही कबाड़ कहा जाता है। घर का कबाड़ कहां और किधर रखा है। उससे उस घर में रहने वालों की आर्थिक, मानसिक और शारीरिक स्थिति का पता चल जाता है। आइये देखते हैं कि, किस तरह से घर में रखे कबाड़ का प्रभाव वहाँ रहने वालों के जीवन पर पड़ता है –

पूर्व:- घर की इस दिशा में घर का कबाड़ भरा हो तो घर के मालिक को किसी अनहोनी का सामना करना पड़ता है।
आग्नेय:- इस स्थान पर घर का कबाड़ रखने से घर के मुखिया की आमदनी घर के खर्चे से कम होने के कारण उस पर कर्ज बना रहता है।

आग्नेय:- यहां बहुत ऊर्जा रहती है, यदि यहां कबाड़ रखा जाता है तो, इस दिशा में शनि की विशेष वस्तुओं को नहीं रखें, शनि की विशेष वस्तुओं में – लकड़ी, लोहा और किसी भी तरह का तेल या पेट्रोलियम प्रोडक्ट आता है। इलैक्ट्रिक या इलैक्ट्रोनिक वस्तुओं, खाली सेलेन्डर, चूल्हा रख सकते हैं।

दक्षिण:- यहाँ बेडरूम में कबाड रखा जाये या बर्तन, लकड़ी का सामान, घड़े इत्यादि रखे जायें तो मालिक के भाई को कठिनाईयां और खतरों का सामना करना पड़ता है। घर का मुखिया की बातचीत में घमंड और अंहकार झलकता है और वह आगे जाकर शक्ति विहीन होकर अशांत रहता है।

नैऋत्य:- घर में कबाड़ रखने का सबसे उत्तम स्थान यही होता है। परंतु ध्यान रहे यहाँ पर किसी प्रकार की नमी या सिलन नहीं रहनी चाहिये और कमरे में रोशनदान अवश्य होना चाहिये। यदि यहाँ कम रोशनी या अंधेरे के साथ नमी हो और कबाड़ भी रखा गया हो तो ऐसी स्थिति में घर वालों को यहाँ भूत-प्रेत होने का एहसास होता है।

पश्चिम:- इस दिशा में यहाँ पर पुरानी त्यागी हुई वस्तुयें रखी जायें। खिड़की दरवाजे टूटी-फूटी हालत में हो, दीवारे खराब हों तो यहाँ रहने वाले हर कार्य को बहुत धीरे-धीरे करते है और उनमें समझ की कमी होती है। आमदनी का जरिया धोखा और फरेब होता है और घर का मुखिया गलत लोगों के संगत में रहता है और परिवार में हमेशा विवाद होते हैं और आरोप लगते रहते हैं।

वायव्य:- घर की इस दिशा में यदि कबाड़ रखा जाता है तो उस घर के मुखिया को अपने मित्रों की शत्रुता की जिम्मेदारी स्वयं उठानी पड़ती है। मुखिया को मानसिक अंशाति और उसका मन विचलित रहता है। उसकी माँ को कफ एवं कोल्ड और गैस की शिकायत रहती है। यह स्थिति यह भी दर्शाती है कि घर का मुखिया बहुत दूर से यहाँ आकर बसा है।

उत्तर:- यहाँ पर कबाड़ रखा गया हो तो मुखिया को उसके भाईयों से खुशियां कम प्राप्त होती है और उसका सबसे छोटा भाई मानसिक विक्षिप्त हो सकता है।

ईशान:- यहाँ पर यदि कबाड़ रखा जाये तो घर में रहने वाले नास्तिक होते हैं और इनको भगवान में श्रद्धा नहीं होती। उन्हें जोड़ों में दर्द की समस्या रहती है। घर के अंदर मुख्यद्वार के बाँये हाथ के कमरे में कबाड़ पड़ा रहता हो तो उस घर की महिला की आँखों में तकलीफ होती है और पति-पत्नी में आपसी तालमेल एवं सहयोग बड़ा साधारण रहता है। जिस घर में कबाड़ रखने का कमरा अन्य कमरों की तुलना में बड़े रहते है साथ ही वहाँ पर अंधेरा भी रहता है। वहाँ रहने वाले कुछ इस तरह के बेवकूफों जैसे कार्य करते है कि उनकी लोगों के साथ शत्रुता हो जाती है।

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मंत्र सिद्धि Mantra Siddhi

Mantra Siddhi :- मंत्र सिद्धि और मंत्रों में विद्युत शक्ति कैसे कार्य करती है? :-

Dr.R.B.Dhawan (editor – AAP ka Bhavishya), top best astrologer in delhi,shukracharya

यह अटूट सत्य है कि मंत्रों में अपार शक्ति है, परन्तु मंत्र साधना Mantra Siddhi क्यों और कैसे होती है ? हमारे इस भौतिक शरीर में दो और शरीर हैं – 1. वैद्युतिक (सूक्ष्म शरीर) और 2. मानसिक (कारण शरीर)। हम जो खाते हैं उससे उक्त तीनों शरीरों को पोषण प्राप्त होता है, और तीनों का प्रथक-प्रथक एवं संयुक्त कार्य है। हमारे स्थूल शरीर के प्रश्न के उत्तर में हमें यह भली प्रकार जान और मान लेना चाहिये कि आकाश में सूक्ष्म रूप में अन्य तत्व भी तो हैं। इस अन्यान्य तत्वों में आकाश भी गौण रूप में विद्यमान है। guruji shukracharya के संस्थापक जी का कथन है कि यह समस्त संसार जो भिन्न-भिन्न रूप और प्रकृति में दिखायी पड़ता है, वह मूलभूत इन्हीं पाँच तत्वों की माया है। उनका अनुपात विभिन्न प्रकार की आकृतियों स्वभाव और गुण धर्म का कारण बनता है। इन तथ्यों के प्रतीक अथवा तन्मात्रा जिस स्थूल में प्रजनन और संहार, आकर्षण और विकर्षण का कारण बनती है।

भारतीय संस्कृति ज्ञान या भारतीय वाङ्मय में शब्द को ब्रह्म का प्रतीक माना जाता है। यहाँ तक कि ब्रह्म का गुणात्मक शरीर शब्द ही तो है। इस संसार में यदि शब्द को हटा दिया जाये तो मानव समाज मूक ही नहीं अपितु सम्पूर्ण जड़-चेतन और चैतन्यता स्थिर हो जायेगा, और स्थिरता से उपक्रांति होगी जो महाविनाश का प्रतीक है। मंत्र मार्ग भी है, और लक्ष्य भी। यह गुणात्मक सत्ता से चलकर गुणात्मक तीन अवस्थाओं में पहुँच जाता है, और उस समय शब्द का सुस्पष्ट और प्रत्यक्ष दर्शन होता है।

जागतिक सफलता और चमत्कार के लिये मंत्र का प्रयोग किया जाता है। हमारा शरीर ही नहीं, मन-मस्तिष्क भी इन तत्वों का अनुपात हमारे शरीरों फिजिकल, अष्ट्रल, और साइकोलोजिकल रूप को भी प्रभावित करता है। मंत्रों में इन तत्वों को उत्कृष्ट और शांति करने की सूक्ष्म व्यवस्था है (जैसी विधि आयुर्वेद में वात, पित्त कफ के शमन उद्दीयन के द्वारा रोग निवारण में प्रचलित है। मंत्र मशीन से अधिक निर्दोष सबल और सरल है। एक बार सिद्ध करने पर इसे जहाँ चाहें प्रयोग में लाया जा सकता है। मंत्र की शुद्ध भावना शब्द है, इससे शब्द की ऊर्जा और भावना शक्ति परस्पर गणित होकर कार्य करती है। शब्द किंवा ध्वनि को अनुप्रष्ठ एवं अनुरदेध्य तरंगें विद्युत की प्रतिरोध गामिनी तरंगों के साथ जब एक रूप हो जाती हैं तो मंत्र जागृत और सिद्ध हो जाता है। मंत्र को सतत् जपने से यही स्थिति आती हैं मंत्र साधना से मंत्र का जप पहले साधक को मन, व्यवहार में नितान्त निर्मल करता है, और निर्मल तन-मन वाले व्यक्ति की तरंगें सबल, दीर्घ और इच्छित दिशा में शमन करने लगती है। इसलिये उसका मंत्र सभी भौतिक कार्यों को सिद्ध Mantra Siddhi कर देता है।

वैज्ञानिक विश्लेषणः- आप कल्पना कीजिये कि संसार में कुल तीन अरब प्राणी हैं, जिनमें आधे तो दिन के प्रकाश में कार्य व्यस्त हैं, और आधे रात्रि में आनन्द से सो रहे हैं। आधे, यानी डेढ़ अरब प्राणी जागरण काल में यदि तीन घंटे बातचीत करते हों, तब क्या आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि वे बातचीत द्वारा कितनी विद्युत शक्ति उत्पन्न करते हैं। विद्युत ध्वनि शास्त्र तथा इंजीनियरिंग द्वारा गणना करके देखा जाये तो लोग उक्त तीन घंटों में कम से कम 6,000 खरब वाट विद्युत शक्ति केवल अपने शब्दों और ध्वनियों से उत्पन्न करते हैं। यह विद्युत ऊर्जा दामोदर घाटी, रिहृंध बांध, तथा भाखड़ा नांगल एवं बम्बई के ट्रांबे परमाणु प्रतिवर्तक की सम्मिलित शक्ति से कहीं अधिक है तथा भारत में उत्पन्न होने वाली कुल बिजली से लगभग आठ गुनी अधिक है। इस विद्युत ऊर्जा से सम्पूर्ण विश्व में घंटों प्रकाश किया जा सकता है। यदि इस ऊर्जा की एक यूनिट की कीमत केवल पचास पैसे रखी जाये तो उसकी कीमत एक खरब रूपये होगी।

Dr.R.B.Dhawan (संस्थापक shukracharya) शब्द शक्ति के सम्बंध में कहते हैं कि- वैज्ञानिक डाॅ. बोएड ने एक ऐसा विचित्र यंत्र बनाया है, जिसके सम्मुख बोलने से हिलोरे और कंपन स्पष्ट देखे तथा आंके जा सकते हैं। यदि उसके सामने कोई जोर-जोर से बोले तो यंत्र टूटकर बिखर सकता है।

शब्दों का प्रभाव:- उच्चादित शब्दों का ठीक इसी प्रकार का प्रभाव हमारी त्वचा व कानों की त्वचा पर पड़ता है। इस सम्बंध में कान और त्वचा की संवेदना की प्रक्रिया लगभग एक ही प्रकार की है। शब्दों के लिये कानों की त्वचा की संवेदनशीलता सबसे अधिक होती है, जबकि त्वचा की संवेदना प्रायः नगण्य भी होती है। कान-विद्युत घट ‘वाई मारकस पीजो इलैक्ट्रिक साउंड सेल’ का भी काम करते हैं। इस प्रकार का विद्युत घट अर्ध-चालक पत्थरों के बचाव द्वारा उत्पन्न बिजली के सिद्धांत पर बनता है। साधारण तौर पर इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। कि कान को एक प्रकार का ‘माइक्रोफोन’ कह सकते हैं। इसकी विशेषता यह होती है कि उसमें 02 से 20,000 आवर्तन का कोई सुनायी पड़ने योग्य शब्द प्रवेश करते ही विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है और वह सीधे मस्तिष्क तक पहुँचती है। तद्नन्तर विविध क्रिया प्रक्रियाओं को जन्म देते हुये शरीर के सभी भागों एवं ग्रन्थियों को क्रियाशील और विद्युत धारावर्ती बना देती हैै।

चमड़ी से इसी प्रकार का काम एक माध्यम द्वारा होता है। त्वचा पर सर्वप्रथम ध्वनि-चाप ‘प्रैशर’ का प्रभाव पड़ता है। फिर ग्राहक स्नायु-तंतुओं में बिजली का संचरण होता है। बिजली की यह धारा तदनंतर अपनी दीर्घ यात्रा के पश्चात मस्तिष्क के स्नायु तन्तुओं को अल्प मात्रा में विद्युन्मयी करती है। शब्दों का सर्वाधिक प्रभाव उनका आलोड़न-विलोड़न क्रमशः कर्ण-स्नायु, मस्तिष्क, अन्य स्नायु सूत्र हृदय, अंतस्रावी ग्रन्थियों, पेट, वृक्क, यकृत, रक्त तथा प्रस्वेद ग्रन्थियों पर पड़ता है।

शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ावः- उच्चारित शब्दों का श्रोता के मस्तिष्क पर दो प्रकार से प्रभाव पड़ता है। पहला, मुख से शब्द निकलने से पूर्व वक्ता के मस्तिष्क से उसी प्रकार की विद्युत-चुम्बकीय तरंगें निकलती हैं, जिन्हें श्रोता का मस्तिष्क ग्रहण करने की चेष्टा करता है। दूसरा उच्चारित शब्द वायु के माध्यम से विद्युत संचार के रूप में कर्ण रंध्रों से होते हुये मस्तिष्क में पहुँचते हैं। तब वे हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा आदि आवेगों को मस्तिष्क में उत्पन्न करते हैं। इसी से शरीरांगों में प्रस्फुरण और संदीपन होते हैं। शब्द इस प्रकार प्रेरणा, प्रास्फुरण, स्फूर्ति उत्पन्न कर प्रायः शरीर के अवयवों में साधारण अवस्था से अधिक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। वे कभी-कभी निष्क्रियता और शिथिलता भी उत्पन्न करते हैं।
स्नायु मंडल पर भी शब्दों के विविध प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं। अद्विग्नता, क्लांति, विषाद, शरीर कम्पन, चित्त की चंचलता भयानक स्वप्न आदि उन प्रभावों की स्पष्ट विकृतियाँ होती हैं। मूर्छा, स्मृति, भ्रम और विक्षिप्तता का भी आक्रमण हो सकता है। शब्दों के काम, क्रोध, मोह, लोभ तथा भय उत्पन्न होने पर दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं, और रक्त का प्रवाह भी ऊँचा उठने लगता है। रक्त में विशेष प्रकार का विष टाक्सिन पैदा होने लगता है। इसी प्रकार हर्षोत्पादक व आशाजनक शब्द मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत तुल्य काम करते हैं।

शब्दों से रहस्योद्घाटन:- प्रिय, अप्रिय शब्दों के अनुसार पेट में भी प्रतिक्रियायें होती हैं। उनसे भूख और पाचन क्रियायें घट या बढ़ जाती हैं। इन्हीं सब तथ्यों को सामने रखकर शब्दों और प्रश्नों के माध्यम से उत्तेजित कर अपराधों का पता लगाने के लिये मिथ्यान्वेषी (लाइ-डिटेक्टर) यंत्र का आविष्कार किया गया है। शब्दों की बौछार से अपराधी के शरीरांगों में होने वाली क्रिया-प्रतिक्रियाओं को विद्युत धारा द्वारा ग्रहण कर रहस्य की मंत्र-मन् धातु के उत्तर उ – प्रत्यायत – त्रै – धातु जोड़ने से ‘मंत्र’ शब्द साधित Mantra Siddhi होता है। (मन् + त्रं = उ मंत्र’ मननात जायते यस्मात् मंत्र उदाहतः।’) जिसके मनन, चिंतन ओर ध्यान द्वारा लौकिक, परालौकिक सुख की उपलब्धि होती है। उसी का नाम मंत्र है।

गुत्थी को सुलझाने में मदद मिलती है :- क्रोध, घृणा और भयजनक शब्द को सुनकर व्यक्ति की ‘एड्रीनलग्लैंड’ से ‘एड्रोलिन’ नामक स्राव काफी वेग से निकल-निकल कर रक्त में मिलने लगता है और मस्तिष्क तथा अन्य अंगों को असाधारण रूप से जागरूक और शक्तिशाली बना देता है, पर केवल अल्पकाल के लिये। एड्रेलिन के निकलते समय यकृत (लीवर) से एक विशेष प्रकार की पहले से ही जमा हुई शर्करा (ग्लाइकोजिन) स्वयं निःसृत होने लगती है। इसी क्रम में बार-बार मूत्र आने की शिकायत होती है।

शब्द-प्रक्रियाओं का महत्व:- भारतीय संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों में शब्दों की इन्हीं सब प्रक्रियाओं को ध्यान में रखकर कल्याण, मनोकामना सिद्धि, शत्रुनाशन, शत्रु मारण, उच्चाटन आदि के लिये विविध शब्द प्रक्रियाओं का विधान किया गया है। आज के वैज्ञानिक युग में यह सब मनोवैज्ञानिक युद्ध यानी साइकोलाॅजिकल वार या स्नायविक युद्ध (वार आॅफ नवर््ज) के अंतर्गत आता है।

मंत्र शक्ति के मूल में मूल भावना :- मंत्र शक्ति के मूल में यही भावना काम करती है। गाली-गलौज, मखौल, व्यंग्य, धमकियाँ आदि इन्हीं उपर्युक्त कार्यों की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। पाश्चात्य देशों में इन्हीं के एक रूप को सम्मोहन (हिप्नोटिज्म) और आत्म परामर्श (आॅटो सजेशन) की संज्ञा प्रदान की गई है। प्रसिद्ध रूसी विद्वान पावलाव ने शब्दों को अत्यंत शक्तिशाली अनुकूलित प्रतिवर्त (उत्तेजन) कंडीशंड रेप्लेक्स कहा है। इस प्रकार उपर्युक्त विवरणों से स्पष्ट हो जाता है कि मंत्रों में सुनिश्चित रूप से शक्ति होती है और उनसे कार्यों की सिद्धि भी प्राप्त की जा सकती है। मंत्र तीन प्रकार के होते हैं – वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक। विद्वत समाज की धारणा है कि कलियुग में प्रथम दो प्रकार के मंत्र सफल नहीं होते। कलियुग के लिये तांत्रिक मंत्र ही शक्तिशाली है। तांत्रिक मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं – साबरी मंत्र, डामरी मंत्र, बीजाक्षर मंत्र। इन तीनों प्रकार के तांत्रिक मंत्रों का अपना-अपना विज्ञान है। जो लोग उसके वैज्ञानिक रहस्य को समझते हैं, वे ही मंत्रों का प्रयोग कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। तांत्रिक मंत्रों की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे बिना दीक्षा के न तो सिद्ध होते हैं, और न ही काम करते हैं। मंत्रों का पुरश्चरण भी है। पुरश्चरण से मंत्र की शक्ति एकत्र होकर संकल्प शक्ति और विचार शक्ति के साथ तादात्म्य स्थापित करती है। इसी को ‘मंत्र जागरण’ कहते हैं।

जप में मन का एकाग्र होना आवश्यक है। बिना होठ हिलाये मंत्र का जप करना चाहिये। तभी सिद्धि मिलती है। इस प्रकार मंत्र का जप करने से मंत्र शक्ति सूक्ष्मतम प्राण वायु ‘ईथर’ में अपने अधिष्ठान्न देवता का आकार प्रकार और रूप की रचना करने लग जाती है। जब रचना पूर्ण हो जाती है तब देवता उसमें प्रविष्ट होकर साधक से तादात्म्य स्थापित कर इच्छा अथवा संकल्प को पूर्ण करते हैं। इसीलिये सामान्य व्यक्ति को मंत्र-प्रणेता नहीं कहा गया है, वरन् ऋषियों को ही मंत्र द्रष्टा (ऋषयों मंत्र द्रष्टारः) कहा गया है।

पशु – पक्षी, पेड़ पौधे आदि सभी में बिजली होती है। वे सभी वैसे ही हमारी शब्दोत्पन्न शारीरिक और मानसिक बिजली से अत्यंत सूक्ष्म रूप से ही प्रभावित होते हैं। इतना ही नहीं पत्थरों पर भी शब्दों का प्रभाव पड़ता है। विल्लौर, टूरमेलीन, रोचीसाल्ट तथा अमोनियम के सम्मुख बोलने पर वे सक्रिय हो उठते हैं तथा उनमें से विद्युत धारा निकलती है। उसी सिद्धांत का लाभ उठाकर ‘ध्वनि- विद्युत घटक’ का निर्माण किया गया है। तानसेन के राग से दीपक का जल उठना और बैजू-बावरा के संगीत से हिरणों का आना प्रसिद्ध है। इन सबकी पृष्ठभूमि में शब्द शक्ति का अपूर्वसामंजस्य ही है, तांत्रिक मंत्रों में ऐसा ही सामंजस्य रहता है।

तंत्र शास्त्र के अनुसार प्रत्येक वर्ण की अपनी स्वतंत्र शक्ति है जिसे ‘वर्ण मातृका’ कहते हैं। प्रत्येक वर्णमातृ का अपना रंग, रूप और गति है। मनुष्य के तीन शरीर हैं – स्थूल, सूक्षम और कारण शरीर। प्रत्येक शरीर में तीन-तीन वर्णमातृका शक्ति केन्द्र हैं। कारण शरीर से उच्चारित शब्द को ‘पश्यंती’ और मध्यमा तथा स्थूल शरीर से उच्चारित शब्द को ‘वैखरी’ कहते हैं। पहले और दूसरे केन्द्र में बहिर्मुखी मन काम करता है। इसी प्रकार तीसरे केन्द्र में अन्तर्मुखी मन काम करता है। इसलिये जप से मन का अंतर्मुखी होना आवश्यक है। मन को अन्तर्मुखी करने के लिये ‘ध्यान’ का विधान है। ध्यान कई प्रकार का होता है, मगर उनमें निराकार ध्यान ही सर्वोत्तम है। उससे मन अंतर्मुखी होकर पराकेन्द्र से तादात्म्य स्थापित करता है।

शब्दों की शक्ति:- हमारी अंगुलियों के बीच घूमनेवाले माला के दाने उनको एकत्र करते रहते हैं। जप करते समय उन पर ध्यान रखना आवश्यक है। इससे मंत्र शक्ति को गति मिलती है जिससे मंत्र शीघ्र ही सिद्ध होते हैं। शब्दों में सुनिश्चित शक्ति है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। प्राचीन भारतीय वाङमय में इसलिये शब्दों को साक्षात् सर्वशक्तिमान ईश्वर, ब्रह्म या शब्द ब्रह्म की संज्ञा प्रदान की गई है।

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