आत्मा की सत्ता

आत्मा की सत्ता महर्षि पातांजलि के अनुसार वासनाओं के अनुसार ही अगले जन्म में नया शरीर प्राप्त होता है। डार्विन का कहना है कि कामनाओं की पूर्ति के निमित्त जीवधारियों के शरीर में परिवर्तन होता रहता है और एक पीढ़ी का परिवर्तन दूसरी पीढ़ी को उत्तराधिकार के रूप में मिलता है। इस प्रकार परिवर्तन होते-होते एक योनि दूसरी योनि में परिवर्तित हो जाती है। अपने मत की पुष्टि में अफ्रीका के पशु जिराफ का उदाहरण देते हैं, जिनकी गर्दन इसलिये बहुत लंबी हो गई है कि अफ्रीका के वृक्ष बहुत ऊंचे होते हैं और उसकी पत्तियाँ खाने के लिये उन्हें अपनी गर्दन बहुत अधिक उठानी पड़ती थी। प्रत्यक्ष भी देखने में आता है कि काम-क्रोध, भय, शोक, लोभादि का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ता है, जिसका एक सूक्ष्म अंश स्थायी परिवर्तन छोड़ देता है। यही कारण है कि अनुभवी लोग मनुश्य की आकृति को देखकर बहुत ऊँचे स्वभाव एवं चरित्र का पता लगा लेते हैं।

कामना और शरीर का संबंध एक प्रकार से समझ में आता है। जीवन में जो कुछ भी हमें अपनी कामनाओं के अनुकल प्राप्त होता है, उसे ही हम रखने का प्रयत्न करते हैं और जो कुछ ऐसा प्राप्त होता है जो हमारी कामनाओं में बाधक हो, उसे हटाने का प्रबंध करते हैं और जो कामनाओं की पूर्ति में न तो सहायक है न बाधक उसकी ओर हमारी दृष्टि तटस्थता की होती है अब शरीर को लीजिये इसे न तो हम त्यागना चाहते हैं और न इसकी ओर तटस्थ हैं। यही नही, इसके छूट जाने की कल्पना तक से हम सिहर उठते हैं। अतः सिद्ध हुआ कि हमारा शरीर हमारी कामनाओं के अनुरूप ही है। पातांजलि और डार्कवन दोनों के अनुसार कामना कारण है और शरीर कार्य। प्रत्यक्ष देखने में आता है कि मृत्युकाल तक हमारी वे कामनायें नष्ट नहीं होती, जो एक शरीर के बिना पूरी नही हो सकती तो फिर जिस प्रकार एक घर के नष्ट हो जाने पर यदि वे कामनायें नष्ट नहीं हुई, जिनकी पूर्ति एक घर के बिना असंभव है, एक वस्त्र के बिना असंभव है, तो हम अपनी आवश्यकता, सामथ्र्य और परिस्थितियों के अनुसार नया घर अथवा नये वस्त्र को प्राप्त होते हैं।

उसी प्रकार एक शरीर छूट जाने पर यदि हमारी कामनायें नहीं छूटी, जिनकी पूर्ति एक शरीर के बिना असंभव है, तो हम अपनी वासना, सामथ्र्य और परिस्थितियों के अनुसार एक नया शरीर धारण करते हैं। जब तक कारण नष्ट नहीं हुआ, कार्य नष्ट नहीं हो कर वह अपना रूप बदलता रहता है। शरीर और वासना का संबंध समझ लेने के पश्चात् हम यह भी जान सकते हैं कि अगले जन्म में किसे कौन सी योनि प्राप्त होगी। जो लोग अति कामुक हैं उन्हें बंदर या चिड़े की योनि प्राप्त होनी चाहिये; क्योकि मानव शरीर में इतने काम सेवन की क्षमता नहीं है। इसलिये अत्यंत क्रोध वालों के लिये हम सर्प योनि की भविष्यवाणी कर सकते हैं।

एक वस्त्र छूट जाने पर दूसरा वस्त्र धारण करने तक के बीच का जो समय निर्वस्त्रता का है, वैसा ही एक शरीर छूट जाने पर दूसरा शरीर प्राप्त होने के बीच का समय प्रेतावस्था का है। पर आजकल विकासवादी धूम है। शरीर रचना में वासना के महत्व को स्वीकार करते हुये भी विकासवाद पुनर्जन्म को नही मानता । विकासवादी शरीर से भिन्न आत्मा की सत्ता स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार जड़ के एक विशेष संयोग से चेतन उत्पन्न हो जाता है और शरीर के नष्ट होने के साथ-साथ वह भी नष्ट हो जाता है। अतः पुनर्जन्म या परलोक का भी कोई प्रश्न नहीं उठता। हम पुनर्जन्मवादी इसमें केवल इतना स्वीकार करते हैं कि जड़ के विशेष प्रकार के संयोग में विशेष प्रकार की आत्मा को आकर्षित करने की शक्ति आ जाती है परंतु वह संयोग आत्मा को उत्पन्न कर देता है-

हम यह स्वीकार नहीं कर सकते । गुड़ में मक्खी को आकर्षित करने की शक्ति है। वह मक्खी को उत्पन्न नही कर सकता । यदि चेतन की उत्पत्ति केवल जड़ और परिस्थितियों पर ही निर्भर है तो एक ही परिस्थिति में उसी जड़ का केवल एक अंश ही मनुश्य क्यों बना? दूसरा वनस्पति बनकर क्यों रूक गया ? तीसरा केवल मछली तक और चैथा केवल वानर तक ही क्यों पहुंच पाया और पांचवाँ आज भी क्यों जड़ है? एक उद्योगशाला में एक ही परिस्थिति में एक से कच्चे माल से जो पदार्थ निर्मित होते हैं, वे एक से होते हैं, जबकि क्रमिक विकास की सृष्टि में ऐसा नही है। यहाँ तक कि मानव योनि में भी कोई दो व्यक्ति ऐसे नही मिलेंगें, जिनके अंगूठों की छाप तक एक जैसी हो। अतः मानना पड़ेगा कि जीवधारियों के पारस्परिक भेद का कारण परिस्थिति विकासवाद और वंशानुक्रम के अतिरिक्त कुछ और भी है।

जिस क्षेत्र में मानव का अवतरण हो चुका है।, वहाँ बंदर अब भी रहते हैं। अतः मानना पड़ेगा कि जो वानर मनुश्य बन गये, वे विशेष प्रकार के वानर थे और इन वानरों से भिन्न थे, जो मानव नहीं बन पाये और जो आगे चलकर मानव बनने का कोई लक्षण उनमें आज भी पाया जाता है इसी प्रकार जो जड़ मछली बना और जो मछली वानर बनी, वह आज के जड़ और मछली से नितांत भिन्न थे। नही तो क्या कारण है कि हमारा वर्तमान जड़ मछली और आज की मछली वानर नहीं बन सकी। प्रकृति में इतनी विषमता क्यों हुई कि उसकी क्रमिक विकास की चेष्टा का कुछ तो प्रभाव हुआ और कुछ पर नही और जिन पर हुआ उन पर भी एक सा नही ? यदि सारा ही जड़ मानव बन जाये तो मानव क्या एक दूसरे को खायेगा? क्रमिक विकास के साथ साथ प्रकृति की यह चेष्टा भी देखने को मिलती है कि जड़ वनस्पति, जलचर, नभचर, वनचर और मानव में एक उचित संतुलन रखा जाये, नहीं तो विकास का अर्थ विनाश होगा। अतः मानना पड़ेगा कि इस क्रमिक विकास के पीछे भी किसी चेतन सत्ता का हाथ है जड़वादी यह बतलाने में असमर्थ हैं कि यदि पृथ्वी पर भी वे परिस्थितियाँ उत्पन्न न हुई होती जो क्रमिक विकास का कारण बनी और सारी पृथ्वी जड़ पड़ी रहती जैसा कि बहुत से ग्रह अब भी पड़े हुये हैं तो क्या हानि थी? मनुश्य का अवतरण जैसी एक भीषण क्रांति जो आगे चलकर सारी क्रान्तियों का कारण बनी -क्या एकमात्र संयोग की बात है? क्या इस विकास में मनुश्य का अपना कुछ कर्तव्य नहीं है? क्या यह सब निरूद्देश्य है? यदि ऐसा ही है तो फिर मनुश्य जीवन में ही उद्देश्य की स्थापना क्यों की जाये? जब मानव जड़ का ही एक रूप है तो मानव जीवन की महत्ता ही क्या रही? जब मानव को यह शरीर उसके पूर्वजन्मकृत सुकृत का फल न होकर केवल संयोगवश प्राप्त हुआ है तो उससे यह छीन लेने में कौन सा पाप है?

परलोकवाद को न मानने वाले और नैतिकता के समर्थक यह कहा करते हैं कि मनुश्य को अपने पाप पुण्यों का फल इसी जन्म में मिल जाता है। ऐसा भी हो तो इतना तो वे भी स्वीकार करेंगें कि हमें अपने पाप पुण्य का फल तत्काल नहीं मिलता। परिस्थिति व दूसरों की चेष्टा के अतिरिक्त इसमें हमारी चेष्टा भी एक बहुत बड़ा कारण होती है। प्रयत्न करने पर हम अपने पाप कर्मों के फल को कुछ और समय तक के लिये टाल सकते हैं तो जीवन पर्यंत भी टाल सकते हैं। केवल परलोकवादी ही धर्म पर स्थिर रह सकता है; क्योंकि वह समझता है कि यदि पाप कर्म का फल आजीवन टाल भी दिया तो उसे परलोक या अगलेे जन्म में भोगना पड़ेगा।

अतः वह पाप करने का और यदि पाप बन गया तो उसके फल को टालने का प्रयत्न नहीं करता जबकि जड़वादी की सारी चेष्टा यही रहती है कि जिन पापों से अपने स्वार्थ की पूर्ति होती है। उन्हें इस प्रकार करो कि जिससे उनका फल न भोगना पड़े। इसी प्रकार पुण्यकर्म करने के बाद उसका फल प्राप्त करने के लिये भी जड़वादी बहुत उतावला रहता है क्यो कि पुण्य कर्म का फल भी तत्काल नहीं मिलता। जड़वादी समझता है कि यदि इसी बीच में मेरी मृत्यु हो गई तो वह पुण्यकर्म निष्फल गया। परलोक वादी ऐसा नहीं मानता । वह समझता है कि इस जन्म में न सही अगले जन्म में फल अवश्य मिलेगा। नैतिक आचरण के पक्ष में जड़वादियों का कहना है कि हमंे जनता को यह समझाना चाहिये कि हमारे पाप पुण्यों के कर्मों का फल हमें भले ही न मिले, वह हमारे समाज, जाति, राष्ट्र, मानवता व भावी पीढि़यों को अवश्य प्राप्त होगा।

यह ठीक है कि कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति कर्म करते समय उसके परिणाम को न केवल व्यक्तिगत, अपितु पारिवारिक, सामाजिक जातीय, राष्ट्रीय व भावी पीढि़यों की दृष्टि से भी सोचता है; परंतु हमें यह नहीं भूल जाना चाहिये कि ये सारे पारिवारिक सामाजिक, जातीय, राष्ट्रीय व भावी पीढ़ीगत स्वः-व्यक्तिगत स्वः के ही विस्तार हैं और जब तक मनुश्य की समझ में यह न आ जाये कि उसके पाप पुण्य कर्मो का फल उसके व्यक्तिगत स्वः को भी अवश्य प्राप्त होगा, तब तक नैतिकता के लिये कोई भी सुदृढ़ आधार नहीं मिलता। जड़वाद नहीं, परलोकवाद ही व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक जातीय, राष्ट्रीय मानवतागत व भावी पीढ़ीगत सभी ‘स्व’ में समन्वय स्थापित करता है और बतलाता है जो बात विशाल से विशालतर सबके लिये लाभदायक है। इस प्रकार आत्मा और परलोक का अस्तित्व न मानने से नैतिकता की जड़ें हिल गयी हैं।

जब मानव जड़ का ही एक रूप है तो फिर जड़ से अधिक उसका महत्व क्यों? रही सुसंस्कृत मन की बात तो सुसंस्कृत मन तो वही कहा जायेगा जो सारे विश्व को ‘सीयाराममय’ जानकर युगपत नमस्कार करता है, न कि वह अपने को भी जड़वाद मानकर चलता है। एक विकासवादी भावी पीढ़ी की भी चिंता क्यों करें? जब हमारे पूर्वज जड़, मत्स्य और वानरों ने भावी पीडि़यों की कोई चिंता किये बिना और न इनमें इस प्रकार की चिंतन की कोई क्षमता ही थी, अपनी भावी पीढि़यों को मानव बनाकर दिखला दिया तो हम भावी पीढि़यों की चिंता कर इससे भी अधिक अच्छे परिणाम दिखला सकेगें? जीवन में सबसे महत्वपूर्ण घटना हमारा अपना जीवन है। व्यक्तिगत दृष्टि से और सामूहिक दृष्टि से मनुश्य का पृथ्वी पर अवतरण।

यदि जन्म नहीं तो, कुछ भी नही और यदि पृथ्वी पर मानव अवतरित न हुआ होता तो। और यही जन्म हमारे अपने पाप पुण्य का फल न होकर केवल संयोगमात्र है और यही पृथ्वी पर मानव का अवतरण उसके पूर्वजों की योजना तथा पुरूषार्थ का परिणाम न होकर प्रकृति की एक चेष्टा मात्र है तो हमारे सारे पुरूषार्थ एवं प्रयास का क्या मूल्य रह जाता है? इस प्रकार जड़वाद की पुरूषार्थ से संगति नही बैठती। फिर यह जड़वाद यह भी नहीं बतलाता कि जब अनादि काल से सृष्टि जड़ चली आ रही थी तो यकायक यह रचना क्यों आरंभ हो गई। क्या पहले भी ऐसी कोई रचना आरंभ होकर नष्ट हुई है? नष्ट नहीं हुई तो वह कहां है और यह विकास कब तक चलता रहेगा? इसकी कोई अंतिम परिणति है या नही, तो वह क्या है। विकासवाद अंतिम सत्य नहीं है। अधिक से अधिक वह एक देशीय सत्य हो सकता है। अंतिम दर्शन तो भारतीय दर्शन है। जिसमें उचित स्थान विकासवाद को भी मिला है और आत्मा एवं शरीर की पृथक सत्ता व पुनर्जन्म सभी भारतीय मनीषियों ने स्वीकार किया है और हमारे आचार्यो के अतिरिक्त अनेक महापुरूषों और जातियों ने, जिनमें से कुछ के नाम नीचे दिये जाते हैं-

 

  1. पाईथागोरस प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक एवं गणितज्ञ।
  2. हेनरी फार्ड प्रसिद्ध अमेरिकन धनकुबेर एवं उद्योगपति।
  3. गाल जाति वर्तमान आयरलैण्ड वासियों के पूर्वज। इनमें सती की प्रथा भी थी।
  4. इंग्लैण्ड के वेल्स प्रदेश के निवासियों के पूर्वज जो पुनर्जन्म, निर्वाण वेदांत, ज्योतिष और देवी देवताओं तथा यज्ञ में विश्वास रखते थे। इनका कहना था कि

ष् लवन सपअमक दक कपमक उंदल जपउमे नदजपस लवन मतम मक बसमंद व नउंद पससे दक उमदजंस पउचनतपजलण्ष्

जब तक मनुश्य पाप और वासनाओं से मुक्त नही हो जाता तब तक वह बार-बार जन्म मरण को प्राप्त होता रहता है। यह जाति बड़ी विद्याव्यसनी थी। इनके बड़े-बड़े पुस्तकालय एवं विद्यालय थे। लगभग 4000 वर्ष तक इस जाति की तूती बोली। जब रोमन लोगों ने (60 ई0 पू0 लगभग) इन पर आक्रमण करके इनके पुस्तकालय तथा विद्यालय फूक डाले और इनका हत्याकांड आरंभ कर दिया तो वे नार्वे तथा आइसलैंड भाग गये। ये लोग अब से 6000 वर्ष पूर्व दक्षिणी एशिया से चलकर मिश्र, यूनान, फ्रांस होते हुये इंग्लैंड पंहुचे थे।

संतान प्राप्ति के लिये शास्त्रीय उपाय ‘संतानगोपाल मंत्र

संतान प्राप्ति के लिये शास्त्रीय उपायों में ‘संतानगोपाल मंत्र’ की साधना अत्यंत प्रभावशाली है। अतः संतान की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस मंत्र का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये। इस मंत्र का जप दो प्रकार से किया जाता है। एक बीज सहित और दूसरे बिना बीज मंत्र के। बीज सहित मंत्र शीघ्र फलदायी होता है। किन्तु इसे गुरू से दीक्षा लिये हुये व्यक्ति को ही करना चाहिये, बिना बीजाक्षरों के कोई भी कर सकता है। आगे बीज सहित संतानगोपाल मंत्र के अनुष्ठान की विधि दी जा रही है। यदि पाठक स्वयं न कर सके तो किसी विद्वान ब्राह्मण से यह अनुष्ठान करवा सकते हैं। इस मंत्र की सम्पूर्ण जप संख्या 100000 (एक लाख मंत्र) है। उसका दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण और तर्पण का दशांश मार्जन करना चाहिये। यदि बिना बीज मंत्र के साधक स्वयं जप करता है तब चैगुना संख्या में जप करने का शास्त्र निर्देश है। सर्वप्रथम निम्नांकित वाक्य पढ़कर विनियोग करे- अस्य श्रीसंतान गोपाल मंत्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छंद्ः, श्रीकृष्णो देवता, ग्लौं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अंगन्यास- ‘देवकीसुत गोविंद’ हृदयाय नमः (इस वाक्य की बोलकर दाहिने हाथ की मध्यमा, अनामिका और तर्जनी अंगुलियों से हृदय का स्पर्श करें)। ‘वासुदेव जगत्पते’ शिरसे स्वाहा’ (इस वाक्य को बोलकर सिर का स्पर्श करें)। ‘देहि में तनयं कृष्ण’ शिखयै वषट् (इस वाक्य को बोलकर दाहिने हाथ के अंगुठे से सिर का स्पर्श करें)। ‘त्वामहं शरणं गतः’ ( इस वाक्य को बोलकर दाहिनी हाथ के पाँचों उंगलियों से बायीं भुजा का एवं बायीं हाथ की पाँचों उंगलियों से दाहिनी भुजा का स्पर्श करें)। ‘ऊँ नमः’ अस्त्राय फट् (इस वाक्य को बोलकर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से पीछे की ओर ले जाकर दाहिनी ओर से आगे कि ओर ले आय और तर्जनी तथा मध्यमा उंगुलियों से बाँय हाथ की हथेली पर बजायें।

इसके पश्चात् निम्नांकित रूप से ध्यान करें-

 

वैकुण्ठाद्गतं कृष्णं रथस्थं करूणानिधिम्।

किरीटिसारथि पुत्रमानयंत्र परात्परम्।। 1 ।।

आदाय तं जलस्थं च गुरूवे वैदिकाय च।

अर्पयंतं महाभागं ध्यायेत् पुत्रार्थमच्यृतम्।। 2 ।।

‘पार्थसारथि अच्युत भगवान् श्रीकृष्ण करूणा के सागर हैं। वे जल में डूबे हुए गुरू पुत्र को लेकर आ रहें है। वे वैकुण्ठ से अभी-अभी पधारे हैं और रथ पर विराजमान हैं। अपने वैदिक गुरू सांदीपनि को उनका पुत्र अर्पित कर रहें है- साधक पुत्र की प्राप्ति के लिए इस रूप में महाभाग भगवान् श्रीकृष्ण का चिंतन करें’।

मूल मंत्र (बीज सहित) –

ऊँ श्रीं ह्नीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः।।’

इस मंत्र का भावार्थ इस प्रकार है- सच्चिदानंद स्वरूप, ऐश्वर्यशाली, कामनापूरक, सौभाग्य स्वरूप, देवकीनंदन! गोविंद! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरण में आया हुँ, आप मुझे पुत्र प्रदान करें।

आगे संतान गोपाल मंत्र बिना बीज मंत्र के भी दिया जा रहा है जिसे कोई भी साधक संकल्प लेकर स्वयं ही कर सकता है।

संतानगोपाल मंत्र- 2

विनियोग

अस्त श्रीसंतानगोपालमंत्रमंत्रस्य ब्रह्म ऋषिर्गायत्रीच्छंदः, श्रीकृष्ण देवता, क्लीं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अंगन्यास-

ग्लौं हृदयाय नमः। क्लीं श्शिरसे स्वाहा। ह्नीं शिखायै वषट्। श्रीं कवचाय हुम्। ऊँ अस्त्राय फट्।

ध्यान-

यांखचक्रगदापह्मं दधानं सूतिकागृहे।

अंके शयानं देवक्याः कृष्णं वंदे विमुक्तये।।

जो सूतिकार गृह में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये माता देवकी की गोद में सो रहें हैं, उन भगवान् श्री कृष्ण की मैं (संतान रूप में ) मोक्ष की प्राप्ति के लिए वन्दना करता हूँ।

बिना बीज का मूल मंत्र इस प्रकार है-

ऊँ नमो भगवते जगदात्मसूतये नमः’

(सम्पूर्ण जगत् जिनकी अपनी संतान है, उन भगवान् श्री कृष्ण को नमस्कार है) इसका चार लाख जप करना चाहिए।

 

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण

वैवाहिक विलम्ब के ज्योतिषीय कारण भारतीय ऋषियों ने 16 संस्कारों के रूप में जो अनुशासित व्यवस्था व्यक्तित्व निर्माण के लिये रूपान्तरित की है, उसमें विवाह संस्कार का स्थान महत्वपूर्ण है। विवाह पीढ़ी-विस्तार का समाज सम्मत हेतु है। विवाह विभिन्न सभ्यताओं, सुसंस्कृतियों, संस्कारों, विचार धाराओं और भाव धाराओं के सम्पर्क का भी हेतु है।

विवाह नामक रसपूर्ण संस्कार के प्रति व्यक्ति कि उत्कंठा, जिज्ञासा और लालसा सहज ही है। किन्तु नियति सबके प्रति समान रूप से उदार नहीं होती। आज उचित समय पर विवाह सम्पन्न होना एक दुःसाध्य प्रक्रिया हो गई है- विशेषतः कन्या पक्ष के संदर्भ में। ग्रहों का अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन पर निर्विवाद रूप से पड़ता है। इस संदर्भ में आस्था अनास्था से कोई अन्तर नही पड़ता। जैसे किसी बंद कमरे में बैठकर सूर्य के आलोक अथवा तेज का प्रतिवाद नही किया जा सकता उसी प्रकार ज्योतिष भाग्य और ईश्वर में अश्रद्धा उसके मौलिक प्रभाव को क्षति नही पहुँचाती। इस सत्य को निरन्तर ध्यान में रखना चाहिए। व्यक्ति के जीवन में जन्म के समय ग्रहों की स्थिति एक प्रमुख भूमिका रखती है।

समस्त जीवन इनकी शुभता-अशुभता, सुसंयोगिता- कुसंयोगिता और प्रभुता-क्षीणता के द्वारा निर्धारित होता है। व्यक्ति आजीवन अपनी नियति से संघर्ष करता है और पराभूत होने का दर्शन सीखता है। कन्या के विवाह में अनपेक्षित विलम्ब देखकर अभिभावक चिन्ता के महासमुद्र में निमग्न हो जाते हैं।

अपनी समस्त शक्ति और सामाजिक परिचय का उपयोग करके भी वे अपनी कन्या के लिए उपयुक्त वर नहीं प्राप्त कर पाते। जीवन ऐसे अभावों का क्रूर साक्षात्कार है।

जीवन के अभावों की पूर्ति के लिए मानव ने तंत्र-मंत्र-यंत्र का भी समय समय पर प्रयोग-उपयोग किया है। सर्वप्रथम मंत्र के अर्थ विस्तार की संक्षिप्त विवेचना अनिवार्य है। वैदिक ऋचाओं से दैवी शक्तियों की स्तुतियों, यज्ञादि के लिए विचरित पदों एवं शब्द प्रतीकों तक मंत्र की एक सुसंस्कृत परम्परा प्रवाहमान है। मंत्र शब्द की सामथ्र्य का चरणतम केन्द्रियभूत आह्नान है। ‘मंत्र’ शब्द मंत्रि गुप्तभाषणे’’ धातु से घ् प्रत्यय द्वारा निष्पन्न होता है जिसका तात्पर्य है रहस्य। वह रहस्य जो देवोपम है किन्तु मानवीय अनुभूति का विषय है। तंत्र साहित्य के मतानुसार वह प्रत्येक शब्द मंत्र है जो देवता की स्तुति में निवेदित है। श्रुति, स्मृति, पुराण, उपनिषद, आगम और निगम सभी मंत्रों के उल्लेख से परिपूर्ण हैं। यह सत्य है कि वैदिक मंत्र जितने शक्तिसम्पन्न हैं, उनकी साधना उतनी हीं दुरूह और दुष्कर है। इसलिए वेदोक्त मंत्रों के स्थान पर तंत्र शास्त्र आज किंचित् सहज समझा जाता है। इस तथ्य के विस्तार में जाना इसलिए अप्रासंगिक होगा क्योंकि इस लेख की केन्द्रिय वस्तु है कि विवाह योग्य युवक या कन्या के विवाह में विलम्ब होने पर किन मंत्रो के प्रयोग से आशानुकूल सफलता प्राप्त होगी। अनुभव से सिद्ध हो चुका है कि युवक या कन्या के विवाह मे आने वाली अनेकानेक बाधाओं की शांति मंत्रशक्ति से सुनिश्चित हो सकती है।

जन्मांग में शनि की स्थिति, शनि द्वारा प्रचालित स्थिति, राशियाँ, नक्षत्र और भाव आदि का अध्ययन करना चाहिए। यदि शनि शुक्र से युक्त होकर, सूर्य अथवा चन्द्र किसी एक ग्रह पर दृष्टि निक्षेप करता हो तो विवाह मे विलम्ब होता है। यदि सूर्य अथवा चन्द्र या दोनों संयुक्त रूप से शनि के नवांश में स्थित हों और शुक्र भी शनि से अक्षिप्त हो तो विवाह में आशा के विपरीत विध्न उपस्थित होतें हैं। सप्तम भाव अथवा लग्न के पाप ग्रहक्रांत होने पर पापकर्तरि योग की स्थापना होती है जिसके परिणाम स्वरूप दाम्पत्य अनेकानेक संकटो से घिर जाता है। लग्न सप्तम भाव अथवा इसके अधिपति ग्रह यदि सूर्य और शनि, शनि और मंगल, शनि और राहु, आकर सूर्य जैसे क्रूर ग्रहों से आबद्ध होते हैं तो विवाह की दिशा में विलम्ब अथवा निषेध जैसे संकेत प्राप्त होते हैं। विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब तब भी होता है जब लग्नाधिपति, सप्तमाधिपति, चन्द्रराशि-अधिपति और स्वयं चन्द्र शनि से दृष्ट, युक्त अथवा द्वादश भावस्थ होते हैं। वक्री ग्रह की सप्तम भाव अथवा सप्तम भावेश पर दृष्टि अथवा स्थिति या युति विवाह में बाधा उत्पन्न करती हैं। इन्हीं स्थितियों में द्वितीय भाव या शुक्र हो तो विवाह विलम्बित होता है। पंचमेश और सप्तमेश का परस्पर परिवर्तन योग स्थापित हो अथवा राहु और शुक्र सप्तम अथवा नवम भाव में हों तथा क्रूर ग्रह की दृष्टि का कुसंयोग हो तो विवाह में ज्योतिषीय दृष्टि से विलम्ब की घोषणा की जा सकती है।

 

Mesh Lagn Features मेष लग्न की विशेषता

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मेष लग्न की विशेषता Mesh Lagn Features

मेष लग्न (Mesh Lagn) में जन्म लेने वाला व्यक्ति मंझले कद का तथा ललाई युक्त गौर वर्ण का होता है। ऐसा व्यक्ति चतुर तथा तुरन्त निर्णय लेने वाला होता है, राज्य समाज में प्रगति करता है। प्रत्येक कार्य के वैज्ञानिक विधि से सम्पन्न करना चाहता है। स्वयं की प्रतिभा से प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। ज्यौतिष आदि किसी कला का प्रेमी होता है,परंतु जल से भय करता है।

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मेष लग्न (Mesh Lagn) के विभिन्न ग्रहों से सम्बन्धित फल :

सूर्य:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में सूर्य पंचमेश होता है, वह इस भाव से सम्बन्धित-विद्या, बुद्धि, विवेक, वाणी, सन्तान तथा तेज से सम्बन्धित फल प्रदान करता है। त्रिकोणाधिपति होने से सूर्य कारक माना जाता है। तथा अपनी महादशा व अन्तर्दशा में भाव स्थिति के अनुसार शुभ फल प्रदान करता है।

चन्द्र:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में चन्द्र चतुर्थ, भाव का अधिपति होता है। शुभ ग्रह केन्द्राधिपति हो तो अशुभ फल प्रदान करता है। चन्द्र माता का नैसर्गिक कारक ग्रह है। यह माता, भूमि मनोबल, सुख, वाहन, जायदाद आदि से सम्बन्धित फल प्रदान करेगा।

मंगल:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में मंगल लग्नेश व अष्टमेश होता है, लग्नेश होने से कारक तथा अष्टमेश होने से मारक होता है, पर लग्नेश को अष्टमेश होने का दोष नहीं लगता। अतः मंगल कारक ही रहेगा तथा अपनी दशा अन्तर्दशा में शुभ फल प्रदान करेगा। मंगल छठे, आठवे या बारहवें भाव में स्थित होने पर इसके कारकत्व में कुछ कमी आ जाती है। मंगल तन, रूप, आयु दिनचर्या, आत्मबल, पुरातत्व, उदर आदि से सम्बन्धित फल प्रदान करता है।

बुध:- तृतीयेश व षष्ठेश होने से बुध मेष लग्न (Mesh Lagn) में सर्वथा अकारक माना जाता है, तथा अपनी दशा अन्तर्दशा में अशुभ फल प्रदान करता है। यह चर्म रोग व शत्रु उत्पन्न करता है। तथा व्यापार में उतार-चढ़ाव लाता है। भाई-बहन, पराक्रम, प्रभाव, शत्रु, रोग ननिहाल, आदि से सम्बन्धित फलादेश बुध की स्थिति से देखा जाता है।

गुरू:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में गुरू भाग्येश व व्ययेश होता है। भाग्येश होने से पूर्ण कारक तथा व्ययेश होने से अकारक होता है। अतः गुरू-दशा का पूर्वाद्ध शुभ तथा उत्तरार्द्ध व्यय कारक होता है। कतिपय पंडितों के मतभेद के बाबजूद भी मेष लग्न में गुरू को कारक ही मानना चाहिये। क्योंकि लग्न से गिनने पर जो भाव पहले आता है, उससे सम्बन्धित फल ही वह ग्रह प्रदान करता है।
नवम भाव द्वादश भाव से प्रथम आने के कारण गुरू भाग्य-वर्द्धक ही रहेगा। फिर वह नैसर्गिक शुभ ग्रह भी है। तीसरे यह भी सामान्य सिद्धान्त है कि दो भावों का अधिपति होने की दशा में कोई भी ग्रह उस भाव से सम्बन्धित फल विशेष रूप से प्रदान करेगा। जिस भाव में उसकी मूल त्रिकोण राशि होगी। गुरू की मूल त्रिकोण राशि नवम भाव में होगी।
अतः गुरू इस भाव से सम्बन्धित फल ही प्रदान करेगा। शुभ स्थान में स्थित होने पर अवश्यमेव उच्च फल प्रदान करेगा। भाग्य, धर्म, यश, व्यय, अन्य स्थान आदि से सम्बन्धित फल गुरू की स्थिति से देखना चाहिये।

शुक्र:- मेष लग्न में शुक्र द्धितीयेश व सप्तमेश होता है। द्धितीयेश होने से शुक्र का सम्बन्ध धन-कुटुम्ब आदि से तथा सप्तमेश होने के कारण जीवन साथी, रोजगार, भोग-विलास आदि से होता है। द्धितीयेश होने से शुक्र अकारक तथा मारक प्रभाव लिये हुये होता है। पर स्वगृही या उच्च का होने पर अपनी महादशा व अन्तर्दशा में खूब धन व भोग विलास देता है। सप्तमेश (शुभ ग्रह केन्द्राधिपति होने से) शुक्र भी अकारक माना जाता है। अतः मेष लग्न में शुक्र अकारक ही रहेगा। तीसरे भाव का शुक्र भी अपनी दशा में अशुभ फल ही देगा। मेष लग्न में शुक्र की सर्वोत्तम स्थिति द्धितीय व द्धादश भाव में होगी।

शनि:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में शनि दशमेश व एकादशेश अर्थात् राज्येश लाभेश होगा। दशमेश होने से (क्रूर ग्रह केन्द्राधिपति होने पर शुभ फल प्रदान करता है) शनि कारक तथा एकादशेश होने से अकारक है, लग्न से दशम भाव प्रथम होने के कारण उस भाव से सम्बन्धित फल शनि अधिक देगा पर उसकी मूल त्रिकोण राशि कुम्भ एकादश भाव में होने के कारण एकादश भाव से सम्बन्धित फल ही प्रदान करेगा।
अतः शनि सम हुआ। पर स्वभाव से क्रूर ग्रह होने के कारण मेष लग्न में शनि अकारक ही रहेगा। शुभ भाव में स्थित होने पर ही (सप्तम या दशम भाव में) अपनी महादशा व अन्तर्दशा में उच्च फल प्रदान करेगा, अन्यथा नहीं।

राहु-केतु:- मेष लग्न (Mesh Lagn) में तीसरे, छठे एवं ग्यारहवें भाव में स्थित होने पर राहु केतु अच्छा फल प्रदान करेगे।

मेष लग्न (Mesh Lagn) में उच्च नीच व स्वगृही ग्रहों का फल:-

सूर्य:- मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली Kundli  में प्रथम भाव में स्थित होने पर सूर्य उच्च का होता है, 10 अंश तक परमेच्य होता है। जिस जातक के सूर्य लग्न में स्थित होता है, वह व्यक्ति स्वस्थ शरीर वाला, विद्वान होता है। सन्तान पक्ष की प्रबलता, बुद्धिमत्ता, साहस, धैर्य, व्यवहार कुशलता तथा महात्वाकाँक्षा आदि गुण उसे सहज ही प्राप्त होते हैं।

पर सप्तम भाव पर सूर्य की नीच दृष्टि पड़ने के कारण उस भाव में सम्बन्धित फल में न्यूनता आ जायेगी। अतः जातक को दाम्पत्य सुख में कुछ कमी तथा क्लेश की प्राप्ति होती है, और उसकी मर्जी के अनुसार भी कम ही चलेगी। रोजगार के क्षेत्र में भी (विशेष कर सूर्य की दशा, अन्तर्दशा में) उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

पंचम भाव में स्वगृही सूर्य के होने पर जातक अत्यन्त व्रिद्धान, बुद्धिमान, प्रभावशाली तथा वाणी का धनी होगा, तथा सन्तान से शक्ति प्राप्त करेगा। ऐसे सूर्य की लाभ स्थान पर शत्रु क्षेत्रीय दृष्टि होने से आमदनी के मार्ग में रूकावट आयेगी।

मेष लग्न (Mesh Lagn) की कुण्डली kundli के सप्तम भाव में नीच राशिस्थ सूर्य के प्रभाव से जीवन साथी के सम्बन्ध में कुछ न कुछ परेशानी बनी रहेगी, तथा जीवन साथी का सुख कम प्राप्त होगा। जीवन यापन के मार्ग में निरन्तर कठिनाइयाँ आयेंगी।

पंचमेश सूर्य के नीच राशि में होने से विद्या क्षेत्र में कमजोरी रहेगी, तथा सन्तान पक्ष कमजोर रहेगा। सूर्य की सप्तम उच्च दृष्टि लग्न पर होने के कारण जातक का शरीर कुछ लम्बे कद का होगा। हृदय में स्वाभिमान की मात्रा अधिक होगी। युक्ति बल द्वारा वह सम्मान तथा प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा।

उच्च नीच व स्वगृही चन्द्र का फल:-

द्वितीय भाव में उच्चस्थ चन्द्र के प्रभाव से जातक बहुत धनी तथा जमीन जायदाद का स्वामी होगा। श्वेत वस्तु चाँदी आदि का व्यापार करेगा। जिसमें अच्छा लाभ होगा। कुटुम्ब की वृद्धि होगी। द्धितीय स्थान मारक प्रभाव युक्त भी होता है।

अतः माता के सम्बन्ध में किसी न किसी कमी का अनुभव भी होता रहेगा। अष्टम भाव पर नीच दृष्टि होने से आयु, व पुरातत्व के सम्बन्ध में कुछ परेशानी भी बनी रहेगी। शुक्र की महादशा व चन्द्र के अन्तर में यदि चाँदी आदि श्वेत वस्तु का व्यवसाय किया जाये तो लाखों की प्राप्ति होती है।

चतुर्थ भाव में स्वगृही चन्द्र के प्रभाव से जातक की माता, भूमि व जमीन जायदाद का उŸाम सुख प्राप्त होगा। मनोरंजन के साधन निरन्तर प्राप्त होंगे। पर दशम भाव में शनि की मकर राशि पर चन्द्र की दृष्टि होने से पिता से वैमनस्य रहता है, तथा राज्य पक्ष में भी व्यवधान आ सकता है।

अष्टम भाव में नीच राशिस्थ चन्द्र के प्रभाव से आयु व पुरातत्व सम्बन्धी हानि उठानी पड़ती है। चतुर्थेश के नीचस्थ होने के कारण माता सम्बन्धी सुख में कमी आती है, जन्म स्थान से बाहर रहना पड़ता है। तथा घरेलू सुख शान्ति में कमी आती है। पर धन भाव पर चन्द्र की उच्य दृष्टि पड़ने से धन सम्बन्धी सुख निरन्तर प्राप्त होता रहता है। जातक धन व सुख प्राप्त करने हेतु मनोयोग के साथ निरन्तर प्रयत्न शील रहेगा।

उच्च, स्वगृही व नीचस्थ मंगल का फल:-

मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली के दशम भाव में मंगल के स्थित होने पर वह उच्च का माना जाता है। मंगल अपने शत्रु शनि की राशि पर होने के कारण पिता के साथ जातक का कुछ वैमनस्य रहता है, पर जातक व्यवसाय में विशेष उन्नति प्राप्त करेगा, तथा राज्य से भी पुरस्कार प्राप्त हो सकता है। मंगल जो लग्नेश है लग्न भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है। अतः शारीरिक प्रभाव में उन्नति करेगा। चतुर्थ भाव पर नीच दृष्टि पड़ने से माता तथा भूमि सम्बन्धी सुख में कमी आयेगी।

प्रथम भाव में स्वगृही मंगल की स्थिति के प्रभाव से जातक का शरीर पुष्ट होगा, तथा आत्मबल प्रचुर मात्रा में होगा पर अष्टमेश होने के कारण कभी-कभी रोगों का शिकार भी होना पड़ता है।
चतुर्थ भाव पर नीच दृष्टि होने से माता, जमीन, जायदाद के सम्बन्ध में परेशानी होती है।
सप्तम भाव पर मंगल की दृष्टि स्त्री व रोजगार के क्षेत्र में बाधा डालती है।
मंगल की महादशा व अंतर्दशा सामान्यतया लाभप्रद रहेगी।

चतुर्थ भाव में नीचस्थ मंगल के प्रभाव से जातक को माता, जमीन, जायदाद तथा सुख में कमी आती है।
सप्तम भाव पर दृष्टि होने से स्त्री व रोजगार सम्बन्धी बाधा आती है।
पर दशम भाव पर उच्च दृष्टि पड़ने से पिता तथा राज्य सम्बन्धी मामलों मे विशेष उन्नति होती है।
जिस भाव में कोई भी नीच का ग्रह स्थित होगा वहाँ उस भाव से सम्बन्धी फलों में कुछ न्यूनता आ जायेगी।
स्वगृही ग्रह अपने भाव से सम्बन्धित उच्च फल ही देगा।

मेष लग्न में विभिन्न योग:-

1. रूचक योग:- किसी भी लग्न कुण्डली में यदि मंगल अपनी राशि का होकर, या मूल त्रिकोण का होकर अथवा उच्च राशि का होकर केन्द्र में स्थित होगा तो रूचक योग बनेगा। मेष लग्न कुण्डली में मंगल के लग्न अथवा दशम भाव में स्थित होने पर यह योग बनता है।
फल:- इस योग वाला जातक हृष्ट-पुष्ट बलिष्ठ तथा चरित्रवान होता है। वह अपने कार्यो से प्रसिद्धि प्राप्त करता है। देश व संस्कृति के प्रति जागरूक रहता है, सेना में उच्च अधिकारी हो सकता है।

2. मालव्य योग:- शुक्र के स्वराशि, मूल त्रिकोण या उच्च राशि का होकर केन्द्र में स्थित होने पर मालव्य योग बनता है। मेष लग्न में शुक्र केवल सप्तम भाव में बैठ कर मालव्य योग बना सकता है। (सप्तम भाव में शुक्र अकारक तथा गृहस्थ-जीवन को बिगाड़ने वाला माना जाता है।)
फल:- इस योग वाला जातक सुन्दर व आकर्षक शरीर वाला, धनी ख्याति प्राप्त कलाकार, दीर्घायु एवं उŸाम वाहन का मालिक होता है।

3. शश योग:- शनि अपनी उच्च शशि, स्वराशि या मूल त्रिकोण राशि का हो, तथा केन्द्र में स्थित हो तो शश योग बनता है। मेष लग्न की कुण्डली में शनि सप्तम भाव एवं दशम भाव में स्थित होकर शश योग बनता है।
फल:- शश योग रखने वाला जातक राजनीति में चतुर होता हैं। धीरे-धीरे उन्नति करता है, तथा नौकरों पर उसकी आज्ञा चलती है।

4. चामर योग:- लग्नेश उच्च का होकर केन्द्र में स्थित हो तथा गुरू उसे देखता हो। मेष लग्न कुण्डली में यदि मंगल दशम भाव में स्थित हो तथा गुरू द्वितीय, चतुर्थ, तथा षष्ठ भाव में हो तो चामर योग बनता है।
फल:- चामर योग वाला जातक उच्च, प्रतिष्ठित, मान्य, विद्धान, वेद शास्त्रों, का ज्ञाता व पूर्णायु होता है। तथा स्व-कार्यो से प्रसिद्धि प्राप्त करता है।
5. लक्ष्मी योग:- भाग्येश यदि स्वराशि, उच्च अथवा मूल त्रिकोण राशि का होकर केन्द्र में स्थित हो, तथा लग्नेश बलवान हो तो, लक्ष्मी योग बनता है। मेष लग्न में गुरू भाग्येश होता है। जो चतुर्थ भाव में बैठ कर लक्ष्मी योग बनाता है। इसके साथ-साथ मंगल लग्न अथवा दशम भाव में होना चाहिये।
फल:- लक्ष्मी योग वाला जातक सम्पन्न धनवान, भाषण कला में प्रवीण, लोगों को अपने पक्ष में करने की युक्ति जानने वाला, गुणी, चतुर, योग्य तथा ख्याति प्राप्त व्यक्ति होता है।

6. राज योग:- मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली में सूर्य चन्द्र का संयोग प्रबल राज योग कारक होता है। क्योंकि चन्द्र चतुर्थ का व सूर्य पंचम भाव का अधिपति होने से केन्द्र त्रिकोण का सम्बन्ध स्थापित कर देते है। मंगल सूर्य तथा शनि गुरू की युति भी राज योग कारक मानी गई है। पर मंगल लग्नेश होने के साथ-साथ अष्टमेश भी है, गुरू नवमेश होने के साथ-साथ व्ययेश भी होता है। तथा शनि दशमेश के साथ लाभेश है, अतः इस राजयोग में कुछ न्यूनता आ जाती है। कुछ पण्डितों का यह भी मत है कि मंगल सूर्य की युति भी प्रबल राजयोग कारक होती है, क्योंकि लग्नेश को अष्टमेश होने का दोष नहीं लगता ।

7. अन्य सामान्य योग:-
(1) मेष लग्न (Mesh Lagn) कुण्डली में शुक्र की सर्वोत्तम स्थिति द्वादश भाव में होती है। ऐसा शुक्र अपार धन देता है। तथा सर्वोत्तम जीवन साथी का सुख भी। द्वादश भाव में शुक्र सामान्यतः भोगदाता होता है। मेष लग्न (Mesh Lagn) में द्वादश भाव में शुक्र की उच्च राशि होती है। इस प्रकार शुक्र धनेश व सप्तमेश होकर अपनी उच्च राशि एवं प्रिय भाव में बैठ कर अतुल धन राशि तथा उत्तम स्त्री सुख देगा। द्वितीय भाव में भी शुक्र स्वगृही होने से धन दाता माना गया है।
(2) मंगल का सम्बन्ध डाक्टरी विद्या (सर्जन) से होता है। अतः लग्न द्वितीय भाव एवं पंचम भाव का सम्बन्ध मंगल से हो तो वह व्यक्ति डाक्टर बनता है। चूँकि मेष लग्न में मंगल स्थित हो तो उसकी द्रष्टि द्धितीय तथा पंचम भाव पर पड़ेगी। इस प्रकार मंगल का सम्बन्ध लग्न, द्धितीय व पंचम भाव से हो जाने के कारण जातक एक सफल डाक्टर (सर्जन) होगा। दशम या द्वितिय भाव में मंगल की स्थिति भी डाक्टरी योग बनाती है।
(3) भावार्थ रत्नाकर की पंक्ति “शुक्रस्य षष्ठ संस्थानं योगदं भवतु ध्रुवम्” के अनुसार छठे भाव में भी शुक्र योग कारक होता है। पर मेष लग्न मे यह नियम लागू नहीं होगा। क्योंकि षष्ठ भाव में शुक्र की नीच राशि होगी। धनेश का नीच राशि में होना भी हानि कारक है, तथा सप्तमेश शुक्र का नीच राशिगत होना और अधिक बाधा कारक होगा। इसका कारण यह है कि एक तो शुक्र स्त्री भवन का अधिपति है, दूसरे वह स्त्री सुख का नैसर्गिक कारक ग्रह है। अतः छठे भाव में शुक्र के होने से जातक को गृहस्थ जीवन का सुख बहुत कम मिलेगा, तथा साथी बीमार रहेगा।
(4) षष्ठेश बुध यदि सप्तम भाव में होगा तो, जातक के जीवन-साथी को रोगी बना देगा।
(5) मेष लग्न जातक की कुण्डली में बुध और मंगल का संयोग सिर दर्द तथा मस्तिष्क की शिराओं का रोग देने वाला होगा।
(6) लग्नेश मंगल, धनेश शुक्र एवं भाग्येश गुरू का परस्परिक सम्बन्ध या धनेश, लग्नेश व पंचमेश का सम्बन्ध किसी भी शुभ भाव में हो तो, खूब लाभ देगा।
(7) लग्नेश अष्टमेश मंगल यदि नीच राशि में (चतुर्थ भाव ) हो, और साथ में गुरू न हो तो, चेचक अथवा अन्य घावों जैसे निशान होंगे।
(8) नवम भाव में शुक्र गुरू की युति जातक को कलाकार बनाती है।

कुण्डली में विवाह प्रतिबंधक योग Vivah Pratibandak Yog in Kundli

कुण्डली में विवाह प्रतिबंधक योग Vivah Pratibandak Yog in Kundli

मित्रों इस लेख में जातकों की कुंडली में विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) के बारे में आपको अति अन्वेषित एवं अनुभव युक्त लेख सम्पादित कर रहा हूँ। शेयर करें व ज्ञान को असीम जनता तक पहुँचायें।

बचपन की सीमा लांघ कर जैसे ही मनुष्य यौवनावस्था में प्रवेश करता है, उसे एक जीवन-साथी की आवश्यकता महसूस होती है। यह प्राकृतिक नियम है, यौवन के आते ही युवा स्त्री अथवा पुरुष में विवाह की इच्छा उत्पन्न होती ही है। आदिमकाल में तो असभ्य मानव अन्य प्राणियों की तरह यौन सम्बंध बनाकर अपनी यौनेच्छा की पूर्ति कर लेता था, किन्तु ज्यों-ज्यों मनुष्य में सामाजिक भावना का उदय हुआ उसने समाज की व्यवस्था को बनाये रखने के लिये ‘विवाह’ vivah जैसी सामाजिक प्रथा को जन्म दिया, और स्वीकार किया।

तभी से समाज की स्वीकृति के बिना स्थापित किया गया यौन सम्बंध अनैतिक समझा जाने लगा। भारत में विवाह को एक पवित्र बंधन माना जाता है, प्रणय-सूत्र में बंधते ही स्त्री और पुरुष दोनों ही कुछ व्यक्तिगत पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों को समझने लगते हैं। जिनके फलस्वरूप उनमें प्रेम, स्नेह, आत्मसमर्पण एवं कर्त्तव्च्य परायणता से युक्त भावनाओं का जन्म होता है, और इसी कारण उनका विवाहित अथवा गृहस्थ जीवन सुखमय बन पाता है।

सुखमय और प्रेम पूर्ण विवाहित जीवन के लिये यह आवश्यक है कि, स्त्री और पुरुष दोनों ही उत्तम चरित्र से युक्त हों, एक दूसरे को पसंद करते हों, और एक-दूसरे के सुख दुःख में भाग लेते हों, और एक दूसरे को इतना अधिक प्रेम करते हों कि अल्प समय के लिये बिछुड़ने पर बेचैनी का अनुभव करते हों।

अगर स्त्री या पुरुष में से कोई एक अथवा दोनों अपने दायित्वों को नहीं समझते और उनमें उपरोक्त भावनाओं का अभाव हो तो, उनका जीवन कलहपूर्ण होने की संभावना बनी रहती है, या वे विवाहित जीवन में सुख का अभाव या न्यूनता का अनुभव करने लगते हैं, जिसके फलस्वरूप तलाक अथवा आत्महत्या तक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

यह सभी तो तब महत्वपूर्ण है, जब जातक की जन्म कुण्डली में विवाह का योग उचित समय में बन रहा हो, इसके विपरीत यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में विवाह का योग ही नहीं बन रहा हो, अर्थात् विवाह प्रतिबंधक योग बना हो तब! ऐसी स्थिति में जातक के साथ-साथ उसके माता-पिता भी चिंता में डूबे रहते हैं।

अनेक उपाय, अनेक यत्न-प्रयत्न करने पर भी विवाह नहीं होता, तब निराश होकर ज्योतिषीयों और कभी-कभी ओझाओं मौलवीयों की शरण में जाते हैं। वस्तुतः विवाह का योग या विवाह का सुख प्रारब्ध का खेल समझा जाता है, जिसकी सूचना हमें जन्म समय की ग्रह स्थिति (जन्म कुण्डली kundli) से मिलती है।

कभी-कभी जन्म कुण्डली kundli में अनेक प्रकार के ग्रहयोग से विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) का निर्माण हो रहा होता है। इन योगों के साथ-साथ यदि उन विवाह प्रतिबंधक योग बनाने वाले ग्रहों पर किसी शुभ ग्रह की कृपा नहीं होती तो विवाह या विवाह होकर भी वैहिक सुख से जातक हीन रहता है। शुभ ग्रह यदि अपना शुभ प्रभाव डाल रहे हों, तब वह विवाह प्रतिबंधक योगों को भीे भंग कर देते हैं।

अतः एक कुशल विद्वान को विवाह प्रतिबंध करने वाले ग्रहयोंगों के साथ-साथ यह भी विचार करना आवश्यक होता है कि, विवाह प्रतिबंधक योगों पर शुभग्रह अपना प्रभाव किस हद तक डाल रहे हैं? शुभ ग्रह अपना प्रभाव डाल भी रहे हैं अथवा नहीं?

आगे एक जातक की जन्म कुण्डली प्रस्तुत की जा रही है, इस कुण्डली में किस प्रकार विवाह प्रतिबंधक ग्रहों (vivah pratibandak yog in kundli) का प्रभाव है, देखें-
30/10/1982 16:37 Vadodara

vivah pratibandak yog in kundli
vivah pratibandak yog in kundli

ग्रहों के भोगांश
लग्न        11रा    17° 25″ 15′
सूर्य         06रा   13° 06″ 03′
चन्द्रमा    11रा   16°  15″ 58′
मंगल      08रा  05° 26″ 39′
बुध          06रा  00° 22″ 41′
गुरू          06रा  23° 41″ 50′
शुक्र         06रा   11° 55″ 50′
शनि        06रा  03° 00″ 40′
राहु          02रा  13°  33″ 07′

आज इस जातक की आयु लगभग 34 वर्ष हो चुकी है, अभी तक अनेक प्रयत्न कर चुके इसके अभिभावक अनेक उपाय कर, कर के थक चुके हैं, परंतु विवाह नहीं हो रहा। मीन लग्न की इस कुण्डली में सप्तम भाव का स्वामी बुध है, यह ग्रह शुक्र की तुला राशि में परंतु अष्टम भाव में सूर्य से अस्त है, हालांकि सप्तम भाव पर पंचमेश चन्द्रमा की सप्तम पूर्ण दृष्टि का योग है, कुण्डली में लग्न तथा चन्द्र लग्न दोनों से सप्तमेश बुध अस्त तथा अष्टम भाव में विवाह का प्रतिबंध सूचित कर रहा है।vivah pratibandhak yog in navansh kundli

विवाह कारक शुक्र द्वितीय व अष्टम भावाधिपति होकर अष्टम भाव में स्थित है, बेशक यह ग्रह स्वग्रही है परंतु इस स्थान में अशुभ फल ही प्रदान कर रहा है, यह शुक्र यहां सूर्य से अस्त भी है। शुक्र तथा बुध का षष्ठेश सूर्य के साथ अष्टम भाव में अस्त होना निश्चित ही विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) का निर्माण कर रहा है।

यहां लग्नेश गुरू शुभ ग्रह होने के कारण थोड़ा शुभ फल दे सकता था परंतु यह ग्रह भी सूर्य के सानिध्य में अस्त है। लग्नेश गुरू, सप्तमेश-चतुर्थेश बुध तथा विवाह सुख का कारक ग्रह शुक्र अष्टम भाव में तो हैं ही, साथ-ही अस्त भी हैं।

इन ग्रहों के साथ कुण्डली में भाग्य स्थान के स्वामी मंगल पर शनि की क्रूर दृष्टि भी विवाह प्रतिबंधक योग (vivah pratibandak yog in kundli) में अपना योगदान दे रही है। वर्तमान समय में 13-06-2007 से जातक की शुक्र की महादशा है, इस समय शुक्र की महादशा में राहु की अंतरदशा 13-08-2017 तक रहेगी।

आगे 13 अगस्त 2017 से 13-04-2020 तक गुरू की अंतरदशा होगी, इस अवधि में नैसर्गिक शुभ ग्रह गुरू के शुभ प्रभाव से उपरोक्त अवधि में जातक के लिये शुभ की आशा की जा सकती है। परंतु इस अवधि में भी विवाह संभव होगा या नहीं? पूरी तरह मैं आशा नहीं कर सकता।

गुरू ही एक ग्रह है, जो इस जन्म कुण्डली के अशुभ ग्रहों को अपने शुभ प्रभाव से अनुकूल कर सकता है। परंतु कुण्डली के अधिकांश ग्रह विवाह प्रतिबंधक ग्रहों अथवा योगों (vivah pratibandak yog in kundli) को ही बलवान सूचित कर रहे हैं।

नरेंद्र मोदी की कुण्डली में विदेश यात्रायें Modi Kundli & Travelling

Modi Kundli

मित्रों यूं तो सभी प्रधान मंत्रीयों की विदेश यात्रायें होती ही रहती हैं, क्योंकि राजनेता राजनैतिक विदेश यात्रायें करते रहते हैं, अर्थात् विदेश यात्रायें राजनेताओं की कुण्डली में होती ही हैं, परंतु प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) की कुण्डली( modi kundli) में कुछ अधिक ही विदेश यात्राओं के योग हैं। इससे पूर्व जो 18 प्रधानमंत्री हुये हैं, उनमें से अधिकांश ने भी अपने कार्यकाल में राजनैतिक कारणों से विदेश यात्रायें की होंगी। परंतु वर्तमान प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के कारण कुण्डली के कुछ ऐसे ग्रह हैं जो सामान्य से अधिक विदेश यात्रायें करवाने वाला योग बनाते हैं? इस ज्योतिषीय लेख में मैं श्री नरेन्द्र मोदी जी की जन्म कुण्डली (modi kundli) के आधार पर राजनैतिक विदेश यात्राओं का विशलेषण कर रहा हूँ। किन ज्योतिषीय कारणों से वर्तमान प्रधानमंत्री अनेक देशों की यात्रायें करते हैं?

श्री नरेन्द्र मोदी की जन्म तिथि 17 सितम्बर 1950 है, जन्म समय 11 बजे प्रातः तथा जन्म स्थान मेहसाना (गुजरात) है।

श्री नरेन्द्र मोदी की लग्न कुण्डली व नवांश कुण्डली
Narendra Modi Kundli ( Lagn & Navansha)
Modi Kundli

 

यह कुण्डली वृश्चिक लग्न की कुण्डली(modi kundli) है। इस कुण्डली के प्रथम स्थान में चन्द्रमा और मंगल स्थित हैं। चतुर्थ में गुरू, पंचम में राहु की स्थिति है, शनि और शुक्र दशम स्थान में तथा सूर्य, बुध व केतु एकादश स्थान में स्थित हैं।

किसी भी कुण्डली में विदेश यात्राओं का विचार द्वादश स्थान से किया जाता है। विदेश का कारक ग्रह शनि है। आधुनिक आर्थिक सम्पन्नता का कारक ग्रह शुक्र तथा राजनीति का ग्रह सूर्य है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की कुण्डली में विदेश का स्थान (द्वादश) तथा व्यापार स्थान (सप्तम) का स्वामी तथा आधुनिक आर्थिक सम्पन्नता का कारक ग्रह शुक्र विदेश के कारक ग्रह शनि के साथ दशम (कर्म स्थान) में योग (सम्बंध) बना रहे हैं। इसके अतिरिक्त दशम (कर्म) तथा एकादश (आय) स्थान के स्वामी एकादश स्थान में योग सम्बंध बना रहे हैं।

प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की कुण्डली में अनेक विशेषतायें तो हैं ही, एक यह विशेषता भी दिखाई देती है कि, यह देश के लिये विदेशों से आधुनिक आर्थिक सम्पन्नता के लिये व्यापारिक रिश्ते बखूबी मजबूत बना रहे हैं।

इनकी कुण्डली के ग्यारहवें स्थान का स्वामी ग्रह बुध एक व्यापारी ग्रह है, जो राजनीति के कारक ग्रह सूर्य के साथ युति सम्बंध बना रहा है, यह एक सुन्दर व मजबूत योग है, तथा इसका प्रभाव वर्तमान समय में दिखाई भी दे रहा है। यह व्यापारिक सम्बंध चन्द्रमा (भाग्येश) की महादशा में शनि की अंतरदशा (फरवरी 2016 से सितम्बर 2016 तक) और मजबूत होंगे। सितम्बर 2016 से फरवरी 2019 के मध्य चन्द्रमा में बुध का अंतर होगा, इस अवधि में यह रिश्ते चौगुना मजबूती के साथ आगे बढ़ेंगे।

परंतु ध्यान रखना होगा कि इस के बाद फरवरी 2019 से सितम्बर 2019 के मध्य चन्द्रमा की महादशा में केतु का अंतर होगा। इस समय दशमेश सूर्य तथा एकादशेश बुध के साथ में केतु अतिचतुर (कैम्युनिस्ट) ग्रह भी अपनी उपस्थिति दर्शा रहा है। यह ग्रह कहीं कोई बना-बनाया खेल न बिगाड़ दे। इस अवधि में ऐसी विचारधारा व ऐसे देश से सावधान रहने की आवश्यकता होगी।

इस समय के उपरांत सितम्बर 2019 से मई 2021 के मध्य जब चन्द्रमा में शुक्र का अंतर तथा मई 2021 से नवम्बर 2021 तक चन्द्रमा में सूर्य का अंतर रहेगा, इस समय श्री नरेन्द्र मोदी(Narendra Modi) देश को आगे ले जाने के लिये सैकड़ों गुना आर्थिक समृद्धि का सपना पूरा कर सकते हैं।

मेरी राय में 2019 के लोकसभा चुनाव सितम्बर 2019 से पहले नहीं करवाने चाहियें। इस समय में भी केतु (कैम्युनिस्ट) ग्रह अपनी उपस्थिति दिखा रहा है, जिससे सावधान रहना होगा।

कालसर्प योग – KaalSarp Yog

KaalSarp Yog Kundli
KaalSarp Yog Kundli

कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है।

देश भर में हजारों की संख्या में हमारे पाठक वर्ग की ओर से निरंतर पत्र प्राप्त हो रहे थे की कालसर्प योग पर ‘आप का भविष्य’ मे एक विशेष लेख प्रकाशित किया जाये। अब जब ईष्ट की प्रेरणा और प्रभु की इच्छा हुई तब यह ‘कालसर्प योग विशेष’ लेख पाठकों से समक्ष प्रस्तुत है।

कालसर्प योग की शांति के लिए कालसर्प दोष निवारण यंत्र (kaalsarp dosh nivaran yantra) की आराधना करनी चाहिए।

पाठको कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है। पं. जवाहर लाल जी की कुण्डली में भी इसी प्रकार से अनेक राजयोग तथा एक कालसर्प योग बना है। इन दोनो का ही फल उनके जीवन में घटित भी हुआ है। वह लम्बे समय तक जेल में भी रहे थे। उन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति भी नहीं मिली थी। क्योकि उनके पिता ने सारी सम्पत्ति देश को दान दी थी। इस प्रकार वह अपनी पैतृक संपत्ति से वंचित हुये। परंतु कुण्डली में एक से अधिक राजयोगों का निर्माण होने के कारण उन्हें ‘‘शासक’’ का पद भी प्राप्त हुआ।

मैने अपने जीवन में अनेक ऐसे उच्चकोटी के संतों की कुण्डली में भी कालसर्प योग देखा है। परंतु उन सभी संतों का जीवन राष्ट्र के लिये आज भी समर्पित है। यह बिलकुल सत्य है कि वह सभी व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नही कर पाये परंतु जब वह समाज और देश के लिये समर्पित हुये तब उच्चकोटी का सम्मान आज भी उन्हें मिल रहा है। वह सभी किसी न किसी रूप से ट्रस्ट बनाकर संचित धन का राष्ट्र के लिये प्रयोग कर रहे हैं। अतः यह स्पष्ट है कि यह कालसर्प नामक योग व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नहीं करने देता। परंतु देश के लिये या समाज के लिये संकल्पित होने पर यह योग बहुविख्यात करता है।

मैं पाठकों को यह भी बताना चाहता हूँ कि प्रत्येक वह ‘कालसर्प योग’ कालसर्प योग नहीं होता जिस कुण्डली में राहु या केतु के साथ कोई अन्य ग्रह भी विराजमान हों। क्योंकि यदि वह अन्य ग्रह यदि राहु या केतु से डिग्रीयों में इनसे एक डिग्री भी बाहर है तब इस योग का वह प्रभाव मेरे अनुभव में कालसर्प योग जैसा कभी नहीं देखा गया। अतः पहले कुण्डली में इस प्रकार की ग्रहदशा होने पर राहु या केतु के साथ वाले ग्रहों को डिग्रीयों का अवश्य जांच लें।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer