वेद(vedas) और ब्रह्म(brahm)

 

vedas aur brahm
vedas aur brahm

यतो वा इमामि भूतानि जायते येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसेविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व, तद् ब्रह्म।

अर्थात् पंचभूतों में से भूत जिससे पैदा होते हैं, जन्म पाकर उसि के कारण जीवित रहते हैं। और नाश होते हुये जिसमें प्रविष्ट होते हैं, वही जानने योग्य है और वही ब्रह्म है।

ब्रह्म ही जगत् के जन्मादि का कारण है, इस विषय में तो किसी का मतभेद है ही नहीं। वही जगत जन्म का कारण है जो ब्रह्मके लक्ष्ण में अंर्तगत है। श्रुति कहती है कि सृष्टि के पूर्वकाल में जब सत् और असत् ही नहीं थे, तब केवल शिव ही थे। सत् कहते है। चेतन जगत को और असत् कहते है। जड वस्तुओं को। इस प्रकार इस जगत में केवल दो ही मुख्य तत्व हैं- चेतन और अचेतन। यह दोनो जब नहीं थे तब एक शिव ही थे। अर्थात् दोनो की उत्पत्ति से पहले केवल शिव ही थे। तब शिव को ही उनकी उत्पत्ति का कारण होना चाहिये?

ब्रह्माजी ब्रह्माण्डों की रचना करते करते और विष्णु जी उनका पालन करते करते कितने ही थक जायें, परंतु आप यदि चाहें तो उन के द्वारा रचित इस सारी सृष्टि को एक ही पल में अपना तीसरा नेत्र खोलकर अपने में समेट सकते हैं। हे देवाधिदेव महादेव! मेरी आपके चरणों में यही प्रार्थना है कि जिस प्रकार आप जगत के जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर उसका संहार कर उसे नवीन रूप देते हैं। उसी प्रकार विविध तापों से पीडित और जर्जरित मानव जाति के अंतःकरण के मल को जलाकर उसे सवर्ण की भाँति परिष्कृत कर दीजिये।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer