सौभाग्य को चमका देती है ~ सूर्य रेखा

Surya Rekha

मनुष्य के हाथ में- सूर्य-रेखा को ‘रविरेखा’ या ‘तेजस्वी-रेखा’ भी कहा जाता हैं, कारण यह भाग्य-रेखा से होने वाले उज्जवल भविष्य या सौभाग्य को ठीक उसी प्रकार चमका देती हैं जिस प्रकार सूर्य अपने प्रखर प्रकाश से रात्रि के अंधकार को दूर करता है। जिस प्रकार से हिम के ढके हुई पर्वत श्रृंखलाओं को विशेष चमकाता हैं। इससे यह न समझ लेना चाहिये कि सूर्य-रेखा के अभाव में हाथ में पड़ी शुभ भाग्य-रेखा का कोई मूल्य ही नहीं होता या उसका प्रभाव ही मध्यम हो जाता हैं समझने के लिए उपर्युक्त शिखर-श्रृंखलाओं को ही ले लीजिये। वे बर्फ से ढंकी रहती हैं बर्फ का गुण हैं चमकना, चाहे रात्रि हो या दिन; उसके स्वाभाविक गुण चमकने में कोई अन्तर नहीं आता- वह सदा एक सा चमकता ही रहता हैं। सूर्य की किरणों से अन्तर केवल इतना ही होता हैं कि वे अपने सहयोग से उसमें एक विशेष प्रकार की चमक उत्पन्न कर देती है। और वह पहले की अपेक्षा और अधिक चमकने लग जाता है। यही बात रेखाओं के सम्बन्ध में भी है। यदि भाग्यरेखा के साथ सूर्यरेखा भी अधिक बलवान् होकर पड़ी हो तो वह सोने में सुगन्ध का काम करती हैं, अर्थात् यों कहिये कि एक राजा को चक्रवर्ती समा्रट बनाने का काम करती है, यही भाव है।

Surya Rekha
Surya Rekha

यदि किसी के हाथ में भाग्य-रेखा निर्बल हो या उसका सर्वथा ही अभाव हो तो सुन्दर, छोटी सी सूर्य-रेखा के प्रभाव से वह व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) वैसा प्रभावशाली न हो, फिर भी रजोगुणी अवश्य होगा। ऐसे व्यक्ति में सदैव धनाढय होने की, जनता में सम्मान पाने की या कोई बड़ा नेता बनने की अभिलाषाएँ बनी रहती हैं। वह दस्तकार न होकर भी दस्तकारों से प्रेम रखता हैं किसी विषय में पूर्ण ज्ञान रखते हुए भी वह अपनी योग्यता दूसरों पर प्रकट नहीं कर पाता। साधारण शुभ भाग्यरेखा के साथ भी सूर्य-रेखा अधिक उपयोगी समझी जाती है। इसमें संदेह नहीं कि जिस समय यह रेखा (सूर्य-रेखा) मनुष्य के हाथ में आरम्भ होती है उसी समय से उसके भाग्य में कुछ विशेष सुधार होने लग जाता है। यह रेखा निम्नलिखित सात स्थानों से आरम्भ होती है-

(1) मणिबन्ध या उसके समीप से।
(2) चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होकर सूर्यागुंलि की ओर
(3) जीवन-रेखा से।
(4) भाग्य-रेखा से प्रारम्भ होती है।
(5) मंगलक्षेत्र या हथेली के मध्य-भाग से।
(6) मस्तक-रेखा को स्पर्शकर
(7) हृदय-रेखा को स्पर्श करती (सूर्य के स्थान पर जाती है)।

 

इन सात स्थानों से प्रारम्भ होने वाली सूर्य-रेखा हमें समय समय पर हमारी दुर्घटनाओं या हमारे भाग्यसम्बन्धी अनेक अनेक जटिल प्रश्नों को हल करती है। यहां पृथक्-पृथक् सातों प्रकारों का विस्तृत विचार किया जा रहा है।

(1) यदि सूर्य-रेखा मणिबन्ध या उसके समीप से आरम्भ होकर भाग्य-रेखा के निकट समानान्तर अपने स्थान को जा रही हो तो यह सबसे उत्तम मानी गयी है। ऐसी रेखावाला व्यक्ति स्त्री या पुरूष प्रतिभा ओर भाग्य का मेल होने से, जिस काम को हाथ लगाता या आरंभ करता हैं उसमें पूर्णतः सफल होता है।

(2) इसके विपरीत यदि सूर्य-रेखा चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होती हो तो इसमें संदेह नहीं कि उसका भाग्य चमकेगा, पर उसकी यह उन्नति निजी परिश्रम द्वारा न होकर दूसरों की इच्छा ओर सहायता पर अधिक निर्भर करती हैं संभव है, उसे उसके मित्र सहायता करें, या इस सम्बन्ध में अपनी कोई शुभ सम्मति दें जिससे वह उन्नति के पथ पर अग्रसर हो।
चन्द्रक्षेत्र से आरम्भ होकर अनामिकांगुलि तक पहुंचने वाली गहरी सूर्यरेखा के सम्बन्ध में यह बात अवश्य ध्यान में रखने की है। ऐसे व्यक्ति का जीवन अनेक घटनाओं से भरा और संदेह पूर्ण होता है। उसमें बहुुत से परिवर्तन भी होते हें किन्तु यदि रेखा चन्द्रस्थान से निकलकर भाग्य-रेखा के समानान्तर जा रही हो तो भविष्य सुखमय हो सकता है। यदि प्रेम बाधक न हो, और विचारों में दृढ़ता होने के साथ ही साथ मस्तकरेखा भी अपना फल शुभ दे रही हो। निश्चय ही ऐसा व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) तेजस्वी और प्रसन्नचित्त होता है।, फिर भी उसमें एक बड़ा भारी दोष यह पाया जाता है कि उसके विचार कभी स्थिर नहीं रहते। सर्वसारण स्त्री या पुरूषों का उस पर अधिक प्रभाव पड़ता है। और अनायास ही वह अपने पूर्वनिश्चित विचारों को बदल देता हैं वह यश पाने की इच्छा करता है, किन्तु अपने संकल्प पर दृढ़ न रह सकने के कारण अपने प्रयत्नों अधिक सफल नहीं होता।

(3) जीवन-रेखा से आरम्भ होने वाली स्पष्ट सूर्य-रेखा भविष्य में उन्नति और यश बढाने वाली मानी गयी हैं किन्तु यह उन्नति उसके निजी परिश्रम और योग्यता से ही होती है। एक व्यावसायिक हाथ को छोड़कर शेष सभी हाथों में इसके प्रभाव से मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी कला में पूरी उन्नति कर सकता है। यह रेखा उपर्युक्त दशा में स्त्री या पुरूष के शीघ्र ग्राही होने का भी एक अचूक प्रमाण है ऐसे व्यक्ति सुन्दरता के पुजारी होते हैं ओर अपने जीवन का एक बड़ा भाग सौन्दर्य-उपासना में ही बिताते हैं यही कारण हैं कि वे उन स्त्री-पुरूषों की अपेक्षा, जिनकी सूर्य-रेखा स्वयं भाग्यरेखा से आरंभ हो रही हो, जीवन का अधिक उपभोग नहीं कर पाते।

(4) यदि यह रेखा भाग्य-रेखा से आरम्भ होती हो तो भाग्यरेखा के गुणों में वृद्धिकर उसकी शक्ति दूगनी कर देती है, प्रायः देखा गया है कि यह रेखा जिस स्थान से भाग्य-रेखा से ऊपर उठती है वहीं से किसी विशेष उत्कर्ष या उन्नति का आरम्भ होता है। रेखा जितनी ही अधिक स्पष्ट और सुन्दर होगी, उन्नति का क्षेत्र उतना ही विस्तृत और उन्नति भी अधिक होगी। ऐसी सूर्य-रेखा प्रायः ऐसे हाथों में भी दिख पड़ती है जो चित्रकार होना तो दूर रहा, एक सीधी रेखा भी नहीं खीच सकते। वे रंगों के अनुभवी भी इतने होते हैं कि पीले और गुलाबी रंग का अन्तर जानना भी उनकी शक्ति से बाहर की बात होती हैं अतः स्पष्ट है कि ऐसी रेखा वाला व्यक्ति कुशल कलाकार या दस्तकार नहीं हो सकता। हाँ, वह सुन्दरता का पुजारी और प्राकृतिक दृश्यों का प्रेमी अवश्य होता हैं दूसरे शब्दों में सुन्दरता तथा प्रकृति से प्रेम करना उनका एक स्वाभाविक गुण ही हो जाता हैं।

(5) मंगलक्षेत्र या हथेली के मध्यभाग से प्रारभ होने वाली सूर्य-रेखा अनेक अपत्ति और बाधाओं के बाद उन्नति सूचित करती है इसका सहायक मंगलक्षेत्र होता है यदि किसी के हाथ का मंगलक्षेत्र उच्च हो तो वह बहुत उन्नति करता है किन्तु मंगलकृत कष्ट भोग लेने के पश्चात् ही वह अपनी उन्नति कर पाता है।

(6) यदि यह रेखा मस्तकरेखा से आरंभ होती हो और स्पष्ट हो तो वह मानव के जीवन के मध्यकाल में (करीब 35 वें वर्ष) तक उन्नति करता है उसकी यह उन्नति जातीय योग्यता और मस्तिष्क शक्ति के अुनसार होती है।

(7) हृदय-रेखा से आरम्भ होने वाली सूर्य-रेखा जीवन के उत्तरकाल में मानव की उन्नति करती है। यह अवस्था लगभग 56 वर्ष की होगी, किन्तु एतदर्थ हृदयरेखा से ऊपर सूर्यरेखा का स्पष्ट होना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में उस स्त्री या पुरूष के जीवन का चैथा चरण सुखमय या कम से कम निरापदा बीतता है। इसके विपरीत यदि हृदय-रेखा से ऊपर सूर्य-रेखा का सर्वथा अभाव हो या वह छोटे-छोटे टुकडों से बनी या टूटी-फूटी हो तो जीवन का चैथाकाल चिन्ताओं से भरा और अन्धकारमय व्यतीत होगा, विशेषतः तब जब कि भाग्य रेखा निराशाजनक हो।

यदि सूर्य-रेखा और भाग्यरेखा दोनों ही शुभफल देने वाली होकर एक दूसरी के समानान्तर जा रही हों, साथ ही मस्तक-रेखा भी स्पष्ट और सीधी हो तो वह धनाढ़य और ऐश्वर्यपूर्ण होने का सबसे बड़ा लक्षण है। ऐसे योगवाला व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) बुद्धिमान् और दूरदर्शी होने के कारण जिस काम को हाथ लगाता हैं उसी में सफल होता है।

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यदि हाथ में सूर्य की अंगुली पहली अंगुली तर्जनी से अधिक लम्बी और बीच की मध्यमांगुलि के बराबर हो, साथ ही सूर्य-रेखा से अधिक बलवान् हो तो उस मनुष्य की प्रवृत्ति जुआ खेलने की ओर अधिक पायी जाती है, किन्तु उसमें धन या गुणों का अभाव नहीं होता। हाँ, कभी-कभी यदि मस्तक-रेखा नीचे की ओर झुकी हो तो उसका और भी अधिक बुरा प्रभाव पड़ता हैं जैसे-सदा सट्टा, लाटरी या जुआ खेलना, शर्त लगाना आदि।

यदि सूर्य-रेखा सूर्यक्षेत्र की ओर न जाकर शनि की अंगुली की ओर जा रही हो तो उस व्यक्ति की उन्नति या सफलता शोक और कठिनाइयों से मिली होती हैं। ऐसे व्यक्ति धनवान और उन्नतिशील होकर भी प्रायः सुखी नहीं रह पाते। यदि यह रेखा शनिक्षेत्र को काट रही हो या अपनी कोई शाखा गुरूक्षेत्र की ओर भेज रही हो तो उसकी उन्नति या सफलता कोई शासन-अधिकार अथवा राज्य द्वारा उच्च पद्वी पाने के रूप में होगी। परन्तु रेखा का यह लक्षण किसी भी दशा में इतना प्रभाव पूर्ण नहीं हो सकता जितना भाग्य-रेखा के गुरू अंगुली की ओर जाने के सम्बन्ध में हो सकता है।

प्रायः देखा गया है कि छोटी-छोटी एक या एक से अधिक रेखाएँ एक दूसरी के समानान्तर में सूर्यक्षेत्र पर दौड़ती पायी जाती हैं। ऐसे योगवाले व्यक्ति के विचार बिखरे होते हैं वह कभी कुछ करना चाहता है तो कभी कुछ। अतएव वह व्यापार, चित्रकारी या कला-कौशल किसी भी विशेष काम में कभी उन्नति नहीं कर पाता। सूर्यरेखा के साथ कुछ ऐसे चिन्ह भी पाये जाते हैं जो भाग्योन्नति में बाधा डालते हैं उदाहरणार्थ-हथेली यदि अधिक गहरी हो तो वह अशुभ लक्षण हैं।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer

वेद(vedas) और ब्रह्म(brahm)

 

vedas aur brahm
vedas aur brahm

यतो वा इमामि भूतानि जायते येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसेविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व, तद् ब्रह्म।

अर्थात् पंचभूतों में से भूत जिससे पैदा होते हैं, जन्म पाकर उसि के कारण जीवित रहते हैं। और नाश होते हुये जिसमें प्रविष्ट होते हैं, वही जानने योग्य है और वही ब्रह्म है।

ब्रह्म ही जगत् के जन्मादि का कारण है, इस विषय में तो किसी का मतभेद है ही नहीं। वही जगत जन्म का कारण है जो ब्रह्मके लक्ष्ण में अंर्तगत है। श्रुति कहती है कि सृष्टि के पूर्वकाल में जब सत् और असत् ही नहीं थे, तब केवल शिव ही थे। सत् कहते है। चेतन जगत को और असत् कहते है। जड वस्तुओं को। इस प्रकार इस जगत में केवल दो ही मुख्य तत्व हैं- चेतन और अचेतन। यह दोनो जब नहीं थे तब एक शिव ही थे। अर्थात् दोनो की उत्पत्ति से पहले केवल शिव ही थे। तब शिव को ही उनकी उत्पत्ति का कारण होना चाहिये?

ब्रह्माजी ब्रह्माण्डों की रचना करते करते और विष्णु जी उनका पालन करते करते कितने ही थक जायें, परंतु आप यदि चाहें तो उन के द्वारा रचित इस सारी सृष्टि को एक ही पल में अपना तीसरा नेत्र खोलकर अपने में समेट सकते हैं। हे देवाधिदेव महादेव! मेरी आपके चरणों में यही प्रार्थना है कि जिस प्रकार आप जगत के जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर उसका संहार कर उसे नवीन रूप देते हैं। उसी प्रकार विविध तापों से पीडित और जर्जरित मानव जाति के अंतःकरण के मल को जलाकर उसे सवर्ण की भाँति परिष्कृत कर दीजिये।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer

मां दुर्गा महाशक्ति – नवरात्रि पर्व

मां दुर्गा महाशक्ति – नवरात्रि पर्व

सर्व स्वस्ये सर्वेश सर्व शक्ति समन्विते।
भयेस्य स्त्राही नो देवी दुर्गे माॅ नमोस्तुते।।

shubh navratri aapkabhavishya.in
Shubh Navratri aapkabhavishya.in

आज के अर्थ प्रधन युग में मानव का लक्ष्य यश, मान प्राप्त करने के साथ धन भवन, वाहन आदि को प्राप्त कर परिपूर्ण होना है। अतः मानव अपने प्रयत्नों से सब कुछ प्राप्ति करने का करता रहता है क्योंकि क्रियाशील मानव का जीवन ही वास्तविक, जीवन है। जीवन में प्राप्ति तब तक संभव नही जब तक समय क्षण योग का ज्ञान नही होगा। क्योंकि प्रत्येक क्षण अपने आप में अलग-अलग महत्व लिये होता है। भक्ति, साधना आराधना कर्म से जुड़ी है। इनका समन्वय किसी पूर्व योग मुहुर्त में होता है तो मानव जीवन का निर्माण स्वतः ही संभव हो जाता है।

नवरात्रि पर्व याने जीवन में व्याप्त अंधकार कर समाप्त कर प्रकाश की ओर अग्रसर कर जीवन को सामर्थ बनाता है। साथ ही आने वाली विपदाओं से छुटकारा दिलवाता है, नवरात्रि पर्व मानव में अपनी प्रकृति के अनुसार सात्विक, राजस, तामस, त्रिगुणात्म गुण प्रकट करते हैं।

साधक जो गुरू के सानिध्य में मंत्रो द्वारा साधना कर शक्ति प्राप्त करता है। आराधक जो आत्मा से लीन होकर आराधना करता है एवं मोक्ष चाहता है। भक्त जो निष्ठा एवं भाव से समर्पित होता है एवं परिस्थितियों से संघर्ष कर सुयोग का लाभ उठा लेता है।

इस विशेष क्षण में माँ-दुर्गा की भक्ति आराधक को प्रकृल्लित विकसित करके सौभाग्य प्रदान करती है, जिस महाशक्ति की उपासना तीनो लोको के स्वामी ब्रह्मा-विष्णु-महेश एवं सभी देवता गण करते हैं, जो तीनो देवों से बढकर है, जो सूक्ष्म एवं स्थूल शरीर से परे महाप्राण आदि शक्ति है, वह स्वयं पर ब्रह्म स्वरूप है, जो केवल अपनी इच्छा मात्र से ही सृष्टि की रचना चल-अचल भौतिक प्राणिज वस्तुओं को पालन, रचना व संहार करने में समर्थ है। यद्यपि वह निगुर्ण स्वरूप है किन्तु धर्म की रक्षा व दुष्टों के नाश हेतु शक्ति ने अवतार धारण किये हैं।

श्रीमद्भागवत में स्वयं देवी ने ब्रह्मा जी से कहा है कि एक ही वास्तविकता है वह है सत्य, में ही सत्य हूँ, मैं न तो नर हूँ, न नारी! एवं न ही प्राणी लेकिन कोई वस्तु ऐसी नही जिसमें में, विधमान नही हूँ। प्रत्येक वस्तु में शक्ति रूप में रहती हूँ देवीपुराण में स्वयं भगवान विष्णु स्वीकार करते हैं। कि वे भी शक्ति से मुक्त नही हैं। वो कठपुतली की भांति कार्यरत है, कठपुतनी संचालन की डोर तो महादेवी के हाथ में है। ब्रह्माजी सृष्टि की रचना करते हैं तो विष्णु जी पालन करते हैं एवं शिवजी संहार करते हैं जो केवल यंत्र की भांति कार्यरत हैं, जो शक्ति की कठपुतली मात्र हैं।
महादानव दैत्यराज के अत्याचार से तंग आकर समस्त देवतागण ब्रह्माजी के पास एवं दैत्यराज से मुक्ति दिलाने की अर्चना की। तब ब्रह्माजी ने बताया कि दैत्यराज की मृत्यु कुवांरी कन्या के हाथ से होगी। तब सभी देवाताओं ने मिलकर अपने सम्मिलित तेज से देवी के इस शक्ति रूप को प्रकट किया। भगवान शंकर के तेज से देवी का मुंह, यमराज के तेज से केश, भगवान विष्णु के तेज से भुजायें, इन्द्र के तेज से स्तन, पवन के तेज से कमर, वरूण के तेज से जांघे, पृथ्वी के तेज से नितम्ब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से पैरों की उगलियाँ, वस्तुओं के तेज से भौहें, वायु के तेज से काल एवं अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने। देवी का शक्ति रूप प्रकट होने पर शिवजी ने शक्ति व बाणों का तरकस, यमराज ने दण्ड, काल ने तलवार, विश्वकर्मा ने परसा, प्रजापति न मणियों की माला, वरूण न दिव्य शंख, हनुमान जी ने गदा, शेषनाग ने मणियों से सुभोभिति नाग, इन्द्र ने वज्र, भगवान श्री नारायण ने धनुष, वरूण के पाश व तीर ब्रह्मा ने चारों वेद, हिमालय सवारी के लिये सिंह, समुद्र ने दिव्य वस्त्र एवं आभूषण दिये। जिससे शक्ति देवी 18 भुजाओं वाली प्रकट हुई। सभी के द्वारा देवी की स्तुति की गई कि शक्ति सदैव अजन्मी और अविनाशी है, यही आदि यही अंत है तो ब्रह्मा-विष्णु महेश सहित देवताओं व मनुष्यों द्वारा पूज्य हैं। शक्ति के नौ अवतार हैं जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं-

1. शैलपुत्री।
2. ब्रहमचारिणी।
3. चन्द्रघंटा।
4. कुष्माडा।
5. स्कन्दमाता।
6. कात्यानी।
7. कालरात्रि।
8. महागौरी।
9. सिद्धियात्री आदि।

श्री दुर्गा सप्तशती में देवी के नौ अवतारों का वर्णन है।

माँ की शक्ति वह शस्त्र है, जिसके माध्यम से किसी महा संग्राम को आसानी से जीता जा सकता है-
शक्ति की प्राप्ति माँ दुर्गा से गतिशील भक्त को होती है। भाग्य का रोना रोने वाले या असहाय का नहीं सृष्टि की अनन्त शक्ति प्राणी मात्र के सत्कर्म पुरूषार्थ एवं कर्तव्य परायणता में निहित है कर्म ही शक्ति का मूलाधार है वह परम शक्ति प्राप्त करने का मार्ग है। अतः शक्ति प्राप्त कर जीवन को आनन्दमयी, सुखी बनाकर विकास करना है, जो शक्ति पूजन करना चाहिये। क्योंकि शक्ति स्वरूप माँ दुर्गा की आराधना कर्म, निष्ठा और कर्तव्य परायण बनाकर जीवन को शक्ति प्रदान करती है।

माँ देवी के 108 नाम हैं, जिनका योग 9 है, माँ ने नौ अवतार धारण किये हैं। साधना में ली जाने वाली माला के मणियों की संख्या 108 है, जिनका योग 9 है, आकाशीय सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं। नवरात्रि का योग नौ है अंको की संख्या भी नौ है, जो शक्ति की साधना एवं भक्ति का योग हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से अणुबम, बिजली, बेतार, यान वायुयान आदि शक्ति ऊर्जा पर आधारित है। शक्ति बिना प्राणी निर्जिव है। अतः सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देवी का प्रतिबिम्ब छाया मात्र है। समस्त भौतिक पदार्थो एवं जीवों में शक्ति देवी द्वारा ही चेतना व प्राण का संचार होता है। इस नश्वर संसार में चेतना के रूप में प्रकट होने से देवी की चित स्वरूप मणी माना जाता है। प्रत्येक मानव में भी शक्ति अर्थात ऊर्जा है, जैसे इंजन से फालतू भाप निकाली जाती है, उसी प्रकार मानव भी व्यर्थ में अपनी ऊर्जा नष्ट करता है, किन्तु जिनकी शक्ति संगीत, खेलकूद, लिखने पढ़ने में शोध में विज्ञान की खोज में साधना, समाधि में खर्च होती है, वह व्यर्थ नही जाती।

सामान्य से सामान्य गृहस्थी मानव द्वारा माँ की आराधना कर शक्ति प्राप्त की जा सकती है। जिससे जीवन में पूर्ण प्रज्ञावान चेतन्य तथा सोलह कला पूर्ण व्यक्तित्व बन सकता है। इसके लिये कही भटकने या सन्यास लेने की आवश्यकता भक्ति साधनों की जिनका सीधा संबंध मन से, श्रद्धा से, विश्वास से है। अतः माॅ की शरण में जाना ही मानव कल्याण है।

साधना के लिए दुर्गा यंत्र (Durga Yantra) हमारे संस्थान से प्राप्त करें|

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे स्वार्थ साधिके।
शरण्ये अम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।

भगवती दुर्गा आप मंगल हैं। समस्त भक्तों का कल्याण करने वाली हैं। मैं आपकी शरण में हूँ आप मेरी रक्षा करें।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer