श्रीयंत्र की साधना | Shri Yantra for Money

Shri Yantra Gold Plated 3x3

श्रीयंत्र की साधना (Shri Yantra for Money)

Shri Yantra Gold Plated
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मानव जीवन का संचालन धन के बिना संभव नहीं हैं, मनुष्य को अपनी आवश्यकता पूर्ति हेतु पग-पग पर धन की आवश्यकता पड़ती हैं दरिद्रता को सबसे बड़ा अभिशाप माना गया है। यदि धन न हो तो जीवन नरक तुल्य बन जाता है। ऐसे व्यक्ति को भाई-बंधु, मित्रा, रिश्तेदार सब छोड़ देते हैं। व्यक्ति को कितना धन मिलेगा, वह कैसा जीवन जियेगा यह सब उसके पूर्व जन्म कर्मानुसार माँ के गर्भ में ही तय हो जाता है-
आयु कर्म वित च विद्या निधनमेव च।
प चैतानि सृजयन्ते गर्भस्थयैव देहिनः।।

पूर्वजन्मदुष्कर्मानुसार ही व्यक्ति की कुंडली में केमद्रुम, हृद योग, काक योग, दरिद्र योग, हुताशन योग, रेका योग, शकट योग, ऋण योग, मृति योग, दुर्याेग, निर्भाग्य योग, निःस्व योग एवं ऋण ग्रस्त योग आदि अशुभ योग आते हैं। ये योग व्यक्ति के जीवन को धन एवं ऐश्वर्यहीन बनाते हैं। इन कुयोगों को दूर करने हेतु हमें जप, पूजा, अनुष्ठान एवं यंत्र-मंत्र-तंत्रादि का सहारा लेना पड़ता हैं। इन कुयोगों को दूर कर व्यक्ति को धन एवेश्वर्य देने वाले यंत्र राज श्री यंत्र(shri yantra) की महत्ता प्रस्तुत हैं। यंत्र मंत्र मय हैं जिस प्रकार आत्मा और शरीर में भेद नहीं होता उसी प्रकार यंत्र एवं देवता में कोई भेद नहीं होता है। यंत्रादेवता का निवास स्थान माना गया है-
यन्त्रमन्त्रमयं प्रोक्तं मंत्रात्मा देवतैवहि। देहात्मनोर्यथा भेदो यन्त्र देवयोस्तथा।

यंत्र और मंत्र मिलकर शीघ्र फलदायी होते हैं। मंत्रों में शक्ति शब्दों में निहित होती है, वहीं यह शक्ति यंत्रों के रेखा एवं बिन्दुओं में रहती है। श्री यंत्र में लक्ष्मी का निवास रहता है। इस यंत्र की रचना के बारे में कहा गया है-
बिंदुत्रिकोण वसुकोण दशारयुग्म, मन्वस्व नागदल षोडसपंचयुक्तम्।
वृत्तत्रायं च धरणी सदनत्रायं च, श्री चक्रमेतदुदितं परदेवतायाः।।

अर्थात् श्री यंत्र बिंदु, त्रिकोण, वसुकोण, दशारयुग्म, चतुर्दशार, अष्टदल, षोडसार, तीनवृत तथा भूपुर से निर्मित है। इसमें चार ऊपर मुख वाले त्रिकोण शिव त्रिकोण, पाँच नीचे मुख वाले शक्ति त्रिकोण होते हैं। इस तरह त्रिकोण, अष्टकोण, दो दशार, पाँच शक्ति तथा बिंदु, अष्टकमल षोडस दल कमल तथा चतुरस्र हैं। ये इसकी कृपा से व्यक्ति को अष्टसिद्धि एवं नौ विधियों की कृपा प्राप्त होती है। इस यंत्र के पूजन अनुष्ठान से व्यक्ति को दश महाविद्याओं की भी कृपा प्राप्त होती हैं-
काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी, भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या घुमावती तथा।
मातंगी सिद्ध विद्या च कथिता बगलामुखी, एतादश महाविद्या सर्वतंत्रोषु गोपिता।।

काली, तारा, शोडषी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, मातंगी, कमला और बगलामुखी ये दश महाविद्यायें हैं।

श्री यंत्र(shri yantra) का निर्माण स्वर्ण, चाँदी, स्फटिक, भोजपत्र आदि पर किया जाता है। भोज पत्र पर निर्मित यंत्र साधारण फलदायी रहता हैं। यह ताम्र पत्र पर श्रेष्ठ, चाँदी पर श्रेष्ठता तथा स्वर्ण पर निर्मित होने पर श्रेष्ठतम फल देता है। स्फटिक एवं मणि आदि पर निर्मित श्री यंत्र(sphatik shri yantra) भी अत्यंत शुभ फलप्रद रहता हैं। विभिन्न प्रसिद्ध तीर्थस्थलों पर स्थापित इन यंत्रों की महिमा सर्वविदित हैं। तिरूपति के बालाजी मंदिर में स्थापित श्री यंत्र (षोडश यंत्र), जगन्नाथ जी के मंदिर में भैरवी चक्र तथा श्री नाम मंदिर में सुदर्शन चक्र स्थापित हैं, जो यंत्रो की महत्ता का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इन तीर्थ स्थलों पर अपार संपत्ति है। विभिन्न तांत्रिक गंथों में श्री यंत्र की महिमा को अपार बताया गया है। इसमें सभी देवी देवताओं का निवास बताया गया है। यंत्र का निर्माण शुभ मुहुर्त जैसे- सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, रविपुष्य, गुरू पुष्य योग, चारों नवरात्र, दीपावली, शिवरात्रि आदि दिनों में किया जाना चाहिये या कराया जाना चाहिये। यह कार्य जटिल एवं श्रमसाध्य हैं। हर कोई इस कार्य को नहीं कर सकता है। कर्मकांड जानने वाले विद्वान पंडितों से यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा करवा लेना चाहिये। प्राण प्रतिष्ठा युक्त यंत्र शीघ्र फलदायी होते हैं। यदि ऐसा कराया जाना संभव न हो तो किसी विश्वसनीय प्रतिष्ठान, संस्थान से प्राण प्रतिष्ठा युक्त यंत्र प्राप्त कर अपनी पूजा में शुभ मुहूर्त में किसी पंडित से अनुष्ठान पूर्वक स्थापित करा लेना चाहिये। फिर प्रतिदिन पवित्र होकर इस यंत्र की पूजा करनी चाहिये, पवित्रता का ध्यान रखना अत्यावाश्यक हैं। यथा-देवोभूत्वा यजे देवं ना देवो देवमर्चयेत्। देवार्चा योग्यता प्राप्त्यैभूतिशुद्धि समाचरेत्।। इस यंत्र की प्रतिदिन पूजा करें तथा श्री सूक्त के 12 पाठ करें एवं निम्नलिखित लक्ष्मी मंत्रों में से किसी एक मंत्र का नियमित एक माला जप करने मात्र से ही धन संकट दूर होता है। व्यक्ति संपन्न एवं ऐश्वर्यशाली बन जाता है, जप के लिये ‘‘माला कमल गट्टे’’ की श्रेष्ठ है। रूद्राक्ष की माला का भी उपयोग किया जा सकता है। इस साधना से लक्ष्मी जी के साथ सभी देवी देवताओं की कृपा बनी रहती है। लेकिन व्यक्ति को सदाचरण नहीं छोड़ना चाहिये। चरित्र बल बनाये रखना एवं मांस मदिरा से दूर रहना चाहिये। यंत्र, मंत्र, तंत्र, देवी, देवता, यज्ञ, औषधि, तीर्थ, एवं गुरू में श्रद्धा अनिवार्य शर्त है, तभी ये चीजें फलदायी होती हैं। श्री यंत्र में तो इतना आकर्षण है कि, इसका दर्शन मात्र ही लाभ दे देता हैं।

मंत्र:-
(1) ऊँ श्रीं हृीं श्रीं कमले कमलालेय प्रसीद प्रसीद श्रीं हृीं ऊँ महालक्ष्मयै नमः।
(2) ऊँ हृीं श्रीं लक्ष्मीं महालक्ष्मी सर्वकामप्रदे सर्व-सौभाग्यदायिनी अभिमत्ं प्रयच्छ सर्वसर्वगत सुरूपे सर्वदुर्जयविमोचनी हृीं सः स्वाहा।
(3) ऊँ महालक्ष्मर्य च विद्महे विष्णु पत्नीम् च धीमहि तन्नों लक्ष्मी प्रचोदयात्।
(4) ऊँ श्रीं हृीं क्लीं श्रीं लक्ष्मी रागच्छागच्छमममन्दिरे तिष्ठ स्वाहा।
(5) ऊँ श्रीं दृीं श्रीं नमः।
(6) ऊँ दृीं श्रीं लक्ष्मी दुर्भाग्यनाशिनी सौभाग्यप्रदायिनी श्रीं हृीं ऊँ।
(7) ऐं दृीं श्रीं क्लीं सौं जगत्प्रसूत्यै नमः।
(8) ऊँ नमः कमलवासिन्यै स्वाहा।
(9) ऊँ श्री हृीं जयलक्ष्मी प्रियाय नित्यप्रदितचेत से लक्ष्मी सिद्धां देहाय श्रीं हृीं नमः।

संतान प्राप्ति मंत्र | Santaan Prapti Mantra – दीपावली विशेष साधना

जब जन्म कुण्डली में संतानोत्पत्ति योग न हो, अथवा अनेक बार गर्भ हानि होती रहे, या संतान दीघार्यु नहीं होती हो तो, उसके लिये यह प्रयोग महत्वपूर्ण है। इस साधना प्रयोग को दीपावली की रात्रि में संतान की इच्छा करने वाली महिला के संपन्न करने से संतान का योग प्रबल होकर संतानोत्पत्ति का योग बनता है। और वह संतान आज्ञाकारी होती है। इस प्रकार के प्रयोग से गृहस्थ जीवन अनुकूल एवं सुखदायक बन जाता है।

साधना विधि– साधिक को चाहिये कि वह दीपावली की रात्रि में स्नानादि कर पीले वस्त्र धारण कर पूर्व की तरफ मुख कर के पीले आसन पर बैठ जाये, सामने लकड़ी के तख्ते पर एक थाली में चावल से त्रिकोण बनाकर उसके मध्य में मोती पर बने अभिमंत्रित मुक्ता गणपति की स्थापना करें, और फिर पंचोपचार (फूल, चावल, रोली, कलावा तथा धूप-दीप) से पूजा करके पुत्रजीवा की 108 दानों वाली माला से 21 माला अग्रलिखित मंत्र जप पूर्ण करें।

यही प्रयोग प्रत्येक माह गर्भवती होने तक संतान की इच्छा रखने वाली महिला को दोहराना चाहिये। निश्चय ही उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। यही प्रयोग उस महिला का पति भी सम्पन्न कर सकता है, या घर का कोई अन्य सदस्य भी कर सकता है, परंतु उसको उस महिला के नाम का पहले संकल्प अवश्य लेना होगा। यदि कोई साधक-साधिका किसी दूसरे के लिये प्रयोग करना चाहे तो संकल्प ले लें कि ‘मैं यह प्रयोग अमुक व्यक्ति के लिये संपन्न कर रहा हूँ।

Santaan prapti mantra मंत्र – ऊँ नमो नारायणाय पुत्र सन्तानं देही देहि ठः ठः स्वाहा।

जप पूर्ण होने पर गणपति जी को मिष्ठान का भोग लगवाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें। वह माला जल में विसर्जित कर दें। मुक्ता गणपति का लॉकेट महिला को गले में धारण करना होगा।

साधना सामग्री – अभिमंत्रित मुक्ता गणपति (मोती पर बने गणपति), 108 दाने की पुत्रजीवा माला (putrajeeva mala)

न्यौछावर राषि – रू. 2000 रू

संपर्क – Shukracharya Delhi, 09810143516

ज्योतिष की नजर में शेयर बाज़ार – July 2015

Share Market in July-2015 in Astrology

जुलाई में व्यापार का आरम्भ 1 तारीख को बुधवार के दिन होगा आरम्भ के समय सूर्यदेव मंगलदेव के साथ मिथुन राशी में होंगे, चन्द्रमा धनु में , बुधदेव वृषभ में, गुरुदेव शुक्रदेव के साथ कर्क में, शनिदेव वृश्चिक में, राहुदेव कन्या में और केतुदेव मीन राशि में होंगे|

ग्रहों के प्रभाव स्वरूप बाजार सकारात्मक रूप से खुलने की  प्रबल आशा रहेगी लेकिन प्रत्येक तेजी पर जिस भी सेक्टर में लाभ मिले  लाभ कमाना ठीक रहेगा तेल, तिलहन, चीनी-चावल, मिलो और F.M.C.G. उद्योग में बिकवाली को प्राथमिकता देना ठीक रहेगा UNITED SPIRIT, ITC, HIND UNI, BRITANNIA, RUCHI SOYA, MARICO., EMAMI में लाभ कमाना ठीक रहेगा, ऐश्वर्य विलासिता और रिटेल ,फेशन, होटल, रेस्टोरेंट, फ़ूड चेन आदि में FUTURE RETAIL, TITAN, ARVIND, TBJ, MONT CARLO, GEETANJALI GEMS, JUBILANT FOOD, SPECIALTY RESTAURANT में भी लाभ कमाना ठीक रहेगा क्यों की असंतुलित वर्षा और मौसम की अनियमितता के चलते इनमे  गिरावट कि प्रबल सम्भावना रहेगी पहली तिमाही के परिणामो के भी नकारात्मक रहने  के समाचारो से बाजार में निवेशकों का अभाव रहेगा विदेशी व्यापार में भी घाटे के संकेत नज़र आने से रूपये के अवमूल्य्न की भी आशा रहेगी इसलिए किसी भी नवीन निवेश से दूर ही रहना ठीक रहेगा।

सरकारी हस्तक्षेप और नियमो की सख्ती के चलते रियल्टी, इंफ्रास्टक्चर के प्रोजेक्ट में देरी की संभावना बनेगी जिसके चलते, सीमेंट और स्टील की मांग में भी कमी रहने की आशा रहेगी लेकिन प्रत्येक गिरावट पर ACC, AMBUJA, ULTRA TECH, SHREE CEMENT, SAIL, TATA STEEL, JSW STEEL में निवेश करना ठीक रहेगा अंतिम सप्ताह में हास्पिटल मेडिसन और फार्मा सेक्टर में गिरावट का रुख रहेगा ऐसे में GSK PHARMA, DR REDDY, BIOCON, APPOLO HOSPITAL में निवेश  के  लिए एक उचित   अवसर रहेगा माह के अंत में बाज़ार गिरावट  के साथ बंद होने की आशा रहेगी।

नोट: – उपरोक्त फलादेश गृह स्थिति पर आधारित हे, इसका उद्धेश्य पाठको का मार्ग दर्शन करना है। कोई भी निर्णय लेने से पहले बाज़ार को प्रभावित करने वाले अन्य कारणों पर भी ध्यान दे| सट्टा खेलने की प्रवर्ति, निर्णय में गलती एवं निजी भाग्यहीनता के कारण होने वाले किसी भी नुकसान के लिए लेखक, सम्पादक, समाचार पत्र, वेबसाइट आदि की कोई जिम्मेदारी नही होगी।

शनैश्चरी अमावस्या – Shanaishchari Amavasya – 18 April 2015

Shani Amavasya 18 April 2015

 

Shani Amavasya 18 April 2015
Shani Amavasya 18 April 2015

जीवन में मनुष्य को तीन प्रकार के दोषों के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और वह उनकी निवृति के लिए अनेक प्रयत्न भी करता रहता है। वह तीन दोष इस प्रकार हैं- 1. ग्रह दोष, 2. पितृदोष, 3. सहभागी कृत दोष।

‘ग्रह दोष’ वह दोष हैं जो उसके पूर्व जन्मों में किये गये बुरे कर्मो के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं। ‘पितृ दोष’ वह दोष हैं जो उस से जाने अनजाने पूर्व सगे संबन्धियों के अपमान या उन्हें कष्ट होने से उत्त्पन्न होते हैं। ‘सहभागी कृत दोष’ वह हैं जो पूर्व जन्मों में उस प्राणी ने अपने पति-पत्नि के साथ अत्याचार करने से उत्त्पन्न हुए हों।

ग्रह दोष- पूर्वअर्जित बुरे कर्मो का प्रभाव ग्रह दोष के रूप में मानव जीवन पर पड़ता है, और उसके कारण मनुष्य को वर्तमान जीवनकाल में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ते हैं नवग्रहों में भी सूर्य, मंगल, राहु और शनि अत्यंत क्रुर और घातक ग्रह हैं इनकी दशा महादशा में विविध प्रकार के कष्ट एवं दुख भोगने पड़ सकते हैं। शनि की दशा आने पर भगवान राम तक को वनवास भोगना पड़ा था। इन ग्रहों की शांति के लिए ‘‘शनैश्चरी अमावस्या’’ का प्रयोग एक दुर्लभ और तुरंत अनुकूलता देने वाला प्रयोग है।

पितृदोष– आज की पीढ़ी इस बात को स्वीकार करे या न करे व्यक्ति को पितृदोष तो भुगतना ही पड़ता है। हमारे माता-पिता, बड़ा भाई या कोई अन्य कोई सगा संबंधी जब रूष्ट हो जाता है या उन की इच्छाओं का असम्मान किया जाता है। तब मनुष्य को उस का कष्टफल जीवन में भुगतना ही पड़ता है। हमने अनेक लोगों को अपने जीवन में पितृ दोष के कारण कष्ट पाते देखा है। उन के घर में भी निरंतर उपद्रव होते रहते हैं, लड़के या लड़कियाँ कहना नही मानते, पति या पत्नी को एक एक मिनट में क्रोध आने लगता है। जिससे कि सारा वातावरण दूषित हो जाता है। इसका मूल कारण पितृदोष ही है और इसका समाधान भी शनैश्चरी अमावस्या प्रयोग से ही हो सकता है।

सहभागी कृत दोष- कभी-कभी घर में ऐसा रोग जड़ कर जाता है कि घर में पति या पत्नी में से कोई न कोई सदा रोगी ही बना रहता है, और काफी धन उसकी चिकित्सा में व्यय हो जाता है। चिकित्सा कराने पर दो चार दिन तो लाभ दिखाई देता है किंतु इसके बाद फिर वैसा ही दृश्य या वैसी ही स्थिति बन जाती है। इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते है और इन रोगों से उसे कोई चिकित्सक छुटकारा नही दिला पाता। परंतु इसके लिए शास्त्रों में ’शनैश्चरी अमावस्या’ का प्रयोग अवश्य लाभ देता है।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार कई वर्षों बाद शनैश्चरी अमावस्या की स्थिति बनती है। जिस अमावस्या को शनिवार हो उसे शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं। अतः इसका महत्व बहुत अधिक बन गया है। इस दिन उपरोक्त समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक साधक को इस इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। (इससे संबंधित साधना अवश्य करनी चाहिए) जिससे कि जीवन में ग्रह दोष, पितृ दोष तथा सहभागीकृत दोष से मुक्ति मिल सके और जीवन में रोग, शोक, दुख, दारिद्रय, आदि से भी मुक्ति पा सकें तथा परिवार में सभी प्रकार की अनुकूलता आ सके।

साधना सामग्री– इसके लिए कोई विशेष साधना सामग्री की आवश्यकता नही है। घर में जितने भी सदस्य शनि गृह से प्रभावित हैं , उन सभी के लिए ‘‘अभिमंत्रित शनैश्चरी मुद्रिका’’ तथा “सिद्ध शनि गृह यंत्र लॉकेट (shani yantra locket)” प्राप्त कर लेना चाहिए। जो कि ‘‘ग्रह, पितृ सहभागीकृत दोष निवारण पद्धति’’ से अभिमंत्रित किये गए हो। मुद्रिका तथा शनि गृह यंत्र लॉकेट ऐसे होने चाहिए जिस पर ‘‘तांत्रोक्त शनैश्चर मंत्र’’ की साधना की गई हो।

सिद्ध शनि गृह यंत्र लॉकेट (shani yantra locket) हमारे कार्यालय से प्राप्त करें। क्लिक करें । 

कालसर्प योग – KaalSarp Yog

KaalSarp Yog Kundli
KaalSarp Yog Kundli

कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है।

देश भर में हजारों की संख्या में हमारे पाठक वर्ग की ओर से निरंतर पत्र प्राप्त हो रहे थे की कालसर्प योग पर ‘आप का भविष्य’ मे एक विशेष लेख प्रकाशित किया जाये। अब जब ईष्ट की प्रेरणा और प्रभु की इच्छा हुई तब यह ‘कालसर्प योग विशेष’ लेख पाठकों से समक्ष प्रस्तुत है।

कालसर्प योग की शांति के लिए कालसर्प दोष निवारण यंत्र (kaalsarp dosh nivaran yantra) की आराधना करनी चाहिए।

पाठको कालसर्प योग कोई नया योग नहीं है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में इसका वर्णन ‘‘कालसर्प योग’’ के नाम से नहीं मिलता। संभव है पराशर के बाद के आचार्यों ने इस योग को अपने अनुभव से खोजा हो। आप देखें भगवान श्री राम के युग तक राहु और केतु को जन्म कुण्डली में स्थान नहीं दिया जाता था। राहु और केतु की गणना अवश्य महर्षि द्वितीय वराहमिहिर के काल में प्रारम्भ हुई है। जो कि पराशर के बहुत बाद में हुये हैं। यही कारण है कि प्राचीन पाराशरी ग्रन्थों में ‘‘कालसर्प नामक’’ योग का वर्णन नहीं मिलता। कहीं-कहीं सर्प योग का अवश्य वर्णन मिलता है। इसी लिये इस योग को लेकर ज्योतिषीयों में भी अनेक मतभेद हैं।

मेरा अपना अनुभव यह है की जिस कुण्डली में राहु और केतु के मध्य सभी सात ग्रह स्थित होते हैं वह जातक इस प्रकार के योग के प्रभाव में अवश्य होता है। बहुत से लोगों का कहना है कि कालसर्प योग पं. जवाहर लाल नेहरू जी की कुण्डली में भी था। तब वह देश के प्रधान मंत्री कैसे बने? जबकी कालसर्प योग मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियाँ देता है। यहाँ पाठकों को मैं कहूँगा की प्रत्येक कुण्डली में अनेक योग बनते हैं और वह सभी योग अपना-अपना फल भी अवश्य समय-समय पर प्रकट करते हैं। किसी एक योग से फलादेश करना बुद्धिमानी नहीं है। पं. जवाहर लाल जी की कुण्डली में भी इसी प्रकार से अनेक राजयोग तथा एक कालसर्प योग बना है। इन दोनो का ही फल उनके जीवन में घटित भी हुआ है। वह लम्बे समय तक जेल में भी रहे थे। उन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति भी नहीं मिली थी। क्योकि उनके पिता ने सारी सम्पत्ति देश को दान दी थी। इस प्रकार वह अपनी पैतृक संपत्ति से वंचित हुये। परंतु कुण्डली में एक से अधिक राजयोगों का निर्माण होने के कारण उन्हें ‘‘शासक’’ का पद भी प्राप्त हुआ।

मैने अपने जीवन में अनेक ऐसे उच्चकोटी के संतों की कुण्डली में भी कालसर्प योग देखा है। परंतु उन सभी संतों का जीवन राष्ट्र के लिये आज भी समर्पित है। यह बिलकुल सत्य है कि वह सभी व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नही कर पाये परंतु जब वह समाज और देश के लिये समर्पित हुये तब उच्चकोटी का सम्मान आज भी उन्हें मिल रहा है। वह सभी किसी न किसी रूप से ट्रस्ट बनाकर संचित धन का राष्ट्र के लिये प्रयोग कर रहे हैं। अतः यह स्पष्ट है कि यह कालसर्प नामक योग व्यक्तिगत रूप से आर्थिक उन्नति नहीं करने देता। परंतु देश के लिये या समाज के लिये संकल्पित होने पर यह योग बहुविख्यात करता है।

मैं पाठकों को यह भी बताना चाहता हूँ कि प्रत्येक वह ‘कालसर्प योग’ कालसर्प योग नहीं होता जिस कुण्डली में राहु या केतु के साथ कोई अन्य ग्रह भी विराजमान हों। क्योंकि यदि वह अन्य ग्रह यदि राहु या केतु से डिग्रीयों में इनसे एक डिग्री भी बाहर है तब इस योग का वह प्रभाव मेरे अनुभव में कालसर्प योग जैसा कभी नहीं देखा गया। अतः पहले कुण्डली में इस प्रकार की ग्रहदशा होने पर राहु या केतु के साथ वाले ग्रहों को डिग्रीयों का अवश्य जांच लें।

~ Dr. R. B. Dhawan (Guruji), Famous Astrologer